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महिलाओं का नेल पॉलिस लगाना इस्लाम में हराम :दारुल उलूम देवबंद का फतवा

दारुल उलूम देवबंद ने एक महिला के खिलाफ केवल इसलिए फतवा जारी कर दिया है, क्योंकि उसने अपने नाखून पर नेल पॉलिस लगाए थे. फतवा में कहा गया है कि महिलाओं के लिए नाखून काटना और नाखून पर नेल पॉलिस लगाना इस्लाम के खिलाफ है. दारुल उलूम के मुफ्ती इशरार गौरा ने कहा है कि इस्लाम में महिलाएं नाखून पर मेहंदी लगा सकती हैं, नेल पॉलिश गैर इस्लामिक है. दारुल उलूम इससे पहले भी महिलाओं से जुड़ी कई आदतों के खिलाफ फतवा जारी कर चुका है.
पिछले साल 21 अक्टूबर को दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी कर कहा था कि सोशल मीडिया पर मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं की फोटो अपलोड करना नाजायज है. दारूम उलूम देवबंद से एक शख्स ने यह सवाल किया था कि क्या फेसबुक, व्हाट्सअप एवं सोशल मीडिया पर अपनी (पुरुष) या महिलाओं की फोटो अपलोड करना जायज है. इसके जबाव में फतवा जारी करके यह कहा है कि मुस्लिम महिलाओं एवं पुरुषों को अपनी या परिवार के फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करना जायज नहीं है, क्योंकि इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता.
इस संबंध में मुफ्ती तारिक कासमी का कहना है कि जब इस्लाम में बिना जरूरत के पुरुषों एवं महिलाओं के फोटो खिंचवाना ही जायज न हो, तब सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करना जायज नहीं हो सकता.
महिलाओं का आइब्रो बनवाना और बाल कटवाना नाजायज है
सात अक्टूबर को दारुल उलूम देवबंद ने मुस्लिम महिलाओं के लिए चौंकाने वाला फतवा जारी किया था. दारुल उलूम देवबंद के फतवा में कहा गया है कि मुस्लिम महिलाओं के लिए हेयर कटिंग और आइब्रो बनवाना नाजायज है. दारुल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के मौलाना लुतफुर्रहमान सादिक कासमी ने कहा कि ये फतवा काफी पहले जारी कर दिया जाना चाहिए था. दरअसल, सहारनपुर के एक शख्स ने दारुल उलूम देवबंद से पूछा था कि क्या इस्लाम महिलाओं को बाल कटवाने और आइब्रो बनवाने की इजाजत देता है? क्या मैं अपनी पत्नी को ऐसा करने दूं? इस शख्स के सवाल के बाद ही दारु उलूम ने यह फतवा जारी किया है.

फतवा में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘इस्लाम में आइब्रो बनवाना और बाल कटवाना धर्म के खिलाफ है. कोई महिला ऐसा करती है तो वह इस्लाम के नियमों का उल्लंघन कर रही है.’ इस फतवा को जारी करने के पीछे तर्क दिया गया है कि इस्लाम में महिलाओं पर 10 पाबंदियां लगाई गई हैं. उन्हीं में बाल काटना और आइब्रो बनवाना भी शामिल है. लंबे बाल महिलाओं की खूबसूरती का हिस्सा है. इस्लाम मजबूरी में बाल काटने की इजाजत देता है. बिना किसी मजबूरी के बाल कटवाना नाजायज है.’
माथे पर बिन्दी और पैरों में बिछुए 
वैसे तो इस्लाम में बिन्दी और पैरों में बिछुए पहनने पर भी पाबन्दी है, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ मुस्लिम महिला परिधानों में बहुत बदलाव आ चूका है, आज हिन्दू महिलाओं की भाँति मुस्लिम महिलाएं बिन्दी और बिछुए का प्रयोग कर रही हैं। जबकि सुहागन हिन्दू औरत ही बिछुए पहनती है।   
ज्ञात हो कि दारुल उलूम देवबंद मुस्लिमों के लिए एक विशेष स्थान है. दारुल उलूम देवबंद का कहना है कि वह दुनिया में इस्लाम की मौलिकता को कायम रखने के लिए काम कर रही हैं. इस विचारधार से प्रभावित  मुसलमानों को देवबंदी कहा जाता है. दारुल उलूम देवबंद की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना क़ासिम नानौतवी ने रखी थी.

मोहर्रम के मातम को उलेमा ने बताया नाजायज

Image result for मोहर्रममोहर्रम इस्लामी साल का पहला महीना है जो चांद के हिसाब से चलता है। इस्लामी साल का यह महीना दुनिया भर के मुस्लिमों के लिए ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।
मुस्लिम समाज में सुन्नी और शिया दोनों मिलकर मोहर्रम मनाते हैं। हालांकि दोनों के तरीकों में फर्क होता है। इस्लाम धर्म में रमजान के बाद मोहर्रम के महीने को दूसरा सबसे पाक महीना माना जाता है।
मोहर्रम पर मातम मनाने और तलवार लहराने को देवबंदी उलेमाओं ने नाजायज बताया. सहारनपुर के देवबंदी उलेमाओं का कहना है कि मोहर्रम के पाक महीने के अवसर पर नंगी तलवारें लहराना और मातम करना, अखाड़े बाजी करना ये सब इस्लाम में नाजायज है. 
देवबन्दी उलेमाओं ने कहा कि मोहर्रम एक मुबारक महीने में आता है. उन्होंने बताया कि इसमें हमारे इस्लाम और शरीयत ये नहीं कहता की तलवारों के साथ मातम किया जाए, इसलिए ये नाजायज हैं.
 ‘ये उलेमा आतंक का चेहरा’-- वसीम रिजवी, शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष
वहीं, शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने कहा की इमाम हुसैन की शहादत पर मातम मनाना देवबंदी मौलाना को क्यों खलता है. वसीम रिजवी ने कहा की हम इमाम हुसैन के नाम पर खुद को तकलीफ़ देते हैं तो यह उनको नाजायज लग रहा है, ये कतई नाजायज नहीं हो सकता. उन्होंने देवबंदी मौलानाओं को आतंक का चेहरा बताया. देवबंदी उलेमाओं द्वारा दिए गए बयान की कड़ी निंदा करते हुए वसीम रिजवी ने कहा कि देवबंदी उलेमा दूसरों का सिर काटना, तलवार की नोक पर जिहाद और हलाला की तरफदारी करते हैं. 
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम उलेमा और नेताओं ने समुदाय से अपील की थी कि मुहर्रम के जुलूस के दौरान हथियार ले जाने से परहेज करें. शहर की मुख्य मस्जिद नखोडा के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने गुरुवार को कहा कि उन्होंने समुदाय के लोगों से अपील की है कि वह शुक्रवार को मुहर्रम के दौरान हथियारों के साथ जुलूस निकालने से बचें, क्योंकि यह इस्लाम के खिलाफ है. मौलाना कासमी ने कहा, ‘‘हमारे इस्लामी कानूनों में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि मुहर्रम के दौरान हथियारों के साथ जुलूस निकालना चाहिए.’’

जानिए क्यों मनाया जाता है मोहर्रममोहर्रम क्यों मनाते हैं

मोहर्रम को इमाम हुसैन की शहादत का प्रतीक माना गया है। इस दिन मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए शोक मनाते हैं और अपनी हर खुशी को त्याग देते हैं।
आज से तकरीबन 1400 साल पहले की बात है, सन् 61 हिजरी के मोहर्रम का महीना था, जब हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को उनके 72 साथियों के साथ बहुत बेदर्दी से कर्बला इराक के बयाबान में जालिम यजीदी फौज ने शहीद कर दिया था।
कहा जाता है कि इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह हुआ करता था जो इंसानियत का दुश्मन था। और तो और यजीद खुद को खलीफा मानता था और वह अल्लाह को भी नहीं मानता था।
यजीद चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके गुट में शामिल हो जाएं लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था। सन् 680 में कर्बला नामक स्थान मे एक धर्म युद्ध हुआ, जो पैगम्बर हजरत मुहम्म्द स० के नाती तथा इब्न ज़्याद के बीच हुआ। 
इस धर्म युद्ध में वास्तविक जीत हज़रत इमाम हुसैन की हुई। प‍र जाहिरी तौर पर इब्न ज़्याद के कमांडर शिम्र ने हज़रत हुसैन रज़ी० और उनके सभी 72 साथियो (परिवार वालोद्) को शहीद कर दिया था। जिसमें उनके छः महीने की उम्र के पुत्र हज़रत अली असग़र भी शामिल थे।
तभी से तमाम दुनिया के ना सिर्फ़ मुसलमान बल्कि दूसरी क़ौमों के लोग भी इस महीने में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का ग़म मनाकर उनकी याद करते हैं और शोक मनाते हैं।

शिया करते हैं मातम

शिया समुदाय के लोग 10 मोहर्रम के दिन तक काले कपड़े पहनकर खूनी मातम करते है। मातम के दौरान इमाम हुसैन को याद करते हुए अपने शरीर पर बार करते हैं। 10 मोहर्रम को आशूरा भी कहा जाता है।
10 मोहर्रम के दिन मुस्लिम समाज के लोग इमाम हुसैन की याद में बने ताजिए को कर्बला पर लेजाकर शहीद कर देते हैं। इस इस्लामी महीने में मुस्लिम सुदाय के लोग शादी- विवाह में शिरकत नहीं करते। 

सुन्नी रखते हैं रोज़ा

वहीं मुस्लिम समाज में सुन्नी समुदाय के लोग इस इस्लामी महीने में 10 मोहर्रम के दिन तक रोज़ा रखते हैं। सुन्नी समुदाय के लोग शिया समुदाय के लोगों की तरह मातम नहीं करते।
इमाम हुसैन के साथ कर्बला में शहीद हुए लोगों को याद किया जाता है और उनकी आत्मा का शांति के लिए दुवा की जाती है। 61 हिजरी में शहीद हुए लोगों को एक तरह से यह श्रद्धांजलि देने का तरीका है।