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IAS-IPS, डाॅक्टर… कुछ भी बने मुस्लिम औरत पर रहे हिजाब में ही: खुले बाल को बताया ‘शैतान की रस्सी’, मेकअप लगाने से भी मना किया: सांसद बदरुद्दीन अजमल

असम के मुस्लिम नेता और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने मुस्लिम महिलाओं के पहनावे को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अच्छे पेशों वाली महिलाओं को हिजाब पहनना चाहिए वरना उन्हें कोई मुस्लिम के तौर पर नहीं पहचानेगा। उनके इस बयान पर विवाद हो गया है।
पिछले वर्ष मार्च 16, 2023 को शीर्षक "महिला द्वारा खुले बाल रखना शोक और अशुद्धि की प्रतीक",(देखिए नीचे दिए लिंक को) जिसमे हिन्दू संस्कृति में महिलाओं द्वारा केश(बाल) का खुले रखने के दुष्प्रभाव पर रौशनी डालने का प्रयास किया, लेकिन उसी बात को बदरुद्दीन द्वारा इस्लामिक तरीके से बताया। यानि कहने का तात्पर्य यह कि हिन्दू संस्कृति जिस बात को सत(सत्य) युग से निर्देश दिए जा रहे है।   

AIUDF सुप्रीमो बदरुद्दीन ने यह बयान असम के करीमगंज में एक जनसभा में दिया। उन्होंने कहा कि अच्छे पेशे में लगी महिलाएँ जैसे कि IAS, IPS और डॉक्टरों के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे उनकी मुस्लिम पहचान का पता लगेगा।

उन्होंने कहा, “अगर मुस्लिम महिलाएँ अपने बाल नहीं ढकेंगी या हिजाब नहीं पहनेंगी तो उन्हें मुस्लिम के तौर पर कैसे पहचाना जाएगा?”

उन्होंने बताया कि हिजाब मुस्लिम महिलाओं के लिए एक विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि खुले बाल शैतान की रस्सी होते हैं और महिलाओं का मेकअप लगाना शैतानों वाला काम है।

बदरुद्दीन अजमल ने कहा, “मैं जब बाहर जाता हूँ तो देखता हूँ कि मुस्लिम लडकियाँ हिजाब पहने हुए होती हैं और सर नीचे की तरफ करके आँखे झुका कर चलती हैं। असम में मुस्लिम लड़कियाँ ऐसा नहीं करती, सर के बाल छुपा के रखना इस्लाम में है।”

अजमल ने करीमगंज में एक मस्जिद और कब्रिस्तान का शिलान्यास करने के दौरान यह विवादित बयान दिया। इससे पहले उन्होंने एक बयान में कहा था, “ज्यादातर मुसलमान आपराधिक प्रवृति के पृष्ठभूमि के क्यों हैं? डकैती, बलात्कार, लूट जैसे अपराधों में मुसलमान नंबर वन क्यों हैं? हम जेल जाने में नंबर वन क्यों हैं? क्योंकि ज्यादातर मुस्लिम पढ़ाई नहीं करना चाहते हैं।”

अवलोकन करें:-

महिला द्वारा खुले बाल रखना शोक और अशुद्धि की प्रतीक

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महिला द्वारा खुले बाल रखना शोक और अशुद्धि की प्रतीक
आजकल महिलाएं फैशन के चलते खुले केश रख कैसा अनर्थ कर रही है, शायद वह पश्चिमी सभ्यता के आगे अपनी ही भारतीय संस्कृति का...

इस मामले में इंडिया टुडे से बातचीत में बदरुद्दीन अजमल ने बाद में अपनी सफाई पेश की थी। उन्होंने कहा था, “मैंने दुनिया भर के मुसलमानों में शिक्षा की कमी देखी है। मुझे बहुत दुख है कि मुस्लिम पढ़ाई नहीं करते, उच्च शिक्षा के लिए नहीं जाते। यहाँ तक कि मैट्रिक की परीक्षा तक पास नहीं कर पाते। इसीलिए वो अपराध की दुनिया में निकल जाते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मैं चाहता हूँ कि मुस्लिम बच्चे ज्यादा से ज्यादा पढ़ाई करें और अच्छे रास्ते पर चलें।”

मलेशिया : 11 बच्चे, 22 नाती-पोते वाली 62 साल की महिला ने 27 साल के मुहम्मद से किया तीसरा निकाह, कहा- 40 जैसा फील करती हूँ…

                                                                                                            साभार: malaymail.com
मलेशिया की रोकैया समत (Rokiah Samat) 62 साल की हैं। 11 बच्चे हैं। 22 नाती-पोते भी। अब वे 27 साल के सबहान मुहम्‍मद अमीन जुमदैल (Sabahan Muhamad Amin Jumdail) से निकाह के कारण चर्चा में हैं। यह उनकी तीसरी निकाह है। रोकैया का कहना है कि इस उम्र में भी वे 40 के जैसा महसूस करती हैं। साथ ही उम्मीद जताई है कि यह उनकी आखिरी निकाह होगी।

रिपोर्ट के अनुसार 2021 में टिकटॉक (TikTok) के जरिए रोकैया और मुहम्मद संपर्क में आए। फिर मुलाकात हुई और दोनों एक-दूसरे के करीब आते गए। जून 2022 में दोनों ने सगाई की। इसके तीन महीने बाद सितंबर में निकाह हो गया। अब एक टिकटॉक वीडियो के ही कारण यह निकाह चर्चा का विषय बन गया है। कुछ रिपोर्टों में मुहम्मद की उम्र 28 साल और रोकैया के 10 बच्चे बताए गए हैं।

रोकैया का खुद का सबसे बड़ा बच्चा 45 साल का और सबसे छोटा 18 साल का है। मुहम्मद से निकाह को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने बताया, ‘वह बेहद नेक, जिम्मेदार, धैर्यवान और ख्याल रखने वाला इंसान है।’ रोकैया के अनुसार उन्हें अपने बच्चों के साथ रहना पसंद नहीं। अकेले में वह खुद को ज्यादा सहज पाती है। उन्हें एक जीवनसाथी की जरूरत महसूस हो रही थी, इसलिए उन्होंने एक और निकाह कर लिया है। वे कहती हैं, “यह अल्लाह की मर्जी। मेरे लिए उम्र मायने नहीं रखता। ईमानदार शौहर मिलना महत्वपूर्ण है।”

रोकैया का पहला निकाह 1977 में हुआ था जो 40 साल चला। पहले शौहर से अलग होने के बाद उन्होंने 2018 में म्यांमार के एक आदमी से दूसरी निकाह की। यह करीब दो साल ही चला। रोकैया के अनुसार उनके दूसरे शौहर चीन में काम करते थे। इसके कारण रिश्ते में गर्मजोशी नहीं थी और उन्होंने तलाक ले लिया।

कुछ दिन पहले ही रोकैया और मुहम्मद ने अपनी निकाह की जानकारी वाला वीडियो टिकटॉक पर पोस्ट किया है। इसे 24 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। इसमें दोनों ने उम्र के फासले के बारे में भी बताया है। रोकैया का कहना है, “हालाँकि वह (मुहम्मद) बहुत छोटे हैं, पर मुझे पूरा यकीन है कि मेरे शौहर आखिरी साँस तक मेरा ख्याल रखेंगे। मैं उम्मीद करती हूँ कि यह मेरी आखिरी निकाह होगी।” वहीं मुहम्मद का कहना है शुरुआत में वे रोकैया का दोस्त बनकर रहना चाहते, लेकिन बाद में वे उनसे जुड़ते गए। इसके बाद आखिरकार 2022 में अपने जन्मदिन पर 10 जनवरी को वे रोकैया से मिलने उनके घर पहुँचे। दोनों ने 9 सितंबर 2022 को निकाह किया था।

‘शरीयत एक्ट’ के खिलाफ HC में याचिका, केंद्र से माँगा जवाब ; शरीयत कानून : मुस्लिम पर्सनल लॉ भेदभाव करता है, संविधान नहीं

कट्टरपंथियों द्वारा नूपुर शर्मा के विरुद्ध 'सिर तन से जुदा' गैंग को सक्रीय करने से अब इस्लाम के ही विरुद्ध आवाज़ बुलंद होनी शुरू हो गयी है। नूपुर विवाद ने जयपुर डायलॉग, सच और न्यूज़ नेशन द्वारा 'इस्लाम क्या कहता है' आदि ने इस्लाम की उन कमियों को उजागर कर दिया है, जिन्हें ये कट्टरपंथी परदे में रख समस्त गैर-मुस्लिमों को बेवकूफ बना रहे थे। अभी तो शरीयत के खिलाफ आवाज़ उठी है, आगे-आगे देखिए हलाल, हलाला आदि कई मुद्दों पर कोर्ट के दरवाज़े खटखटाये जायेंगे।   
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 को चुनौती देने वाली याचिका पर भारत के अटॉर्नी जनरल को नोटिस जारी किया है। याचिका में आईपीसी की धारा 494 की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। ‘हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड’ द्वारा जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसपर जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने यह आदेश जारी किया।

‘पिछले दिनों कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान ‘हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड’ के वकील अशोक पाँडे ने कहा कि धारा 494 हिंदू, बौद्ध, सिख और ईसाई धर्म के मानने वालों पर लागू होती है।’ इसके तहत यदि व्यक्ति अपने पत्नी के रहते दूसरा विवाह करता है तो उसे मान्य नहीं माना जाएगा। साथ ही व्यक्ति को सात साल की कैद की सजा और जुर्माना लगा दिया जाएगा लेकिन देश के मुस्लिमों पर यह धारा लागू नहीं होती।

अदालत को जानकारी दी गई कि आईपीसी की धारा 494 मुस्लिमों पर इसलिए लागू नहीं होताी क्योंकि उन्हें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 के तहत सुरक्षा प्राप्त है। शरीयत अप्लीकेशन एक्ट मुस्लिम पुरुष को चार शादियाँ करने की इजाजत देता है। यह सीधे तौर पर धर्म के आधार पर भेदभाव का मामला है। जो कि संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। इसलिए आईपीसी की धारा 494 को असंवैधानिक करार दे कर निरस्त कर देना चाहिए।

याचिका कर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि मुस्लिमों को प्राप्त इस विशेषाधिकार की वजह से समाज में बलात्कार जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। दौलतमंद और ताकतवर मुस्लिम कई शादियाँ कर रहे हैं जबकि गरीब मुस्लिमों को एक शादी भी नसीब नहीं हो रही, जिससे समाज में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। याचिका में कहा गया है कि अधिनियम 1937 महिलाओं को प्राप्त मौलिक और बुनियादी मानवाधिकारों का लिंग के आधार पर हनन करती है।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने केंद्र सरकार को छह हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। आईपीसी की धारा 494 की वैधता पर सवाल उठाए जाने पर कोर्ट ने अटार्नी जनरल को भी नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र की तरफ से जवाब दाखिल होने के बाद याचिका कर्ता को भी प्रत्युत्तर देने के लिए 2 हफ्ते का समय दिया जाएगा। अगली सुनवाई मई 2023 में होने की उम्मीद है। 

शरीयत कानून : मुस्लिम पर्सनल लॉ भेदभाव करता है, संविधान नहीं

एक मुस्लिम महिला ने शरीयत कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है। महिला ने अपनी याचिका में कहा है कि संपत्ति बँटवारे में उसे पुरुष सदस्यों की तुलना में आधा हिस्सा मिला, जो उसके साथ भेदभाव है। महिला ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान बराबरी का हक देता है, जबकि शरीयत कानून भेदभावपूर्ण है। ऐसे में उसने न्याय की गुहार लगाई।

बुशरा अली नाम की महिला ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में कहा कि उसके परिवार में जब संपत्ति का बँटवारा हुआ तो उसे 7/152 का हिस्सा दिया गया। महिला ने दावा किया कि वहीं पुरुषों को 14/152 का हिस्सा दिया गया, जो उसकी हिस्सेदारी से दोगुना है।

बुशरा अली ने कहा कि भारत का संविधान बराबरी का हक देता है। इसलिए वह संपत्ति का बँटवारा बराबरी के आधार पर चाहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई के बाद प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। बता दें कि मुस्लिमों में सिविल मामलों का निबटारा शरीयत कानून पर आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार होता है। इसमें महिलाओं को कई अधिकारों से महरूम रखा गया है।

बुशरा अली ने शरीयत कानून की धारा-2 को चुनौती देते हुए कहा कि संविधान की धारा-15 का उल्लंघन बताया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्ण मुरारी और संजय करोल ने प्रतिवादी इरफान मोहम्मद और संबंधित को नोटिस जारी किया।

मुस्लिमों के सिविल मामलों को शरीयत कानून के तहत देखा जाता है। इसमें महिलाओं के हक से संबंधित कई तरह की खामियाँ हैं। इनमें पुरुषों को चार शादियाँ, तलाक, तलाक के बाद गुजारा भत्ता, संपत्ति में बराबरी का हक, बच्चे को गोद लेने का मामला, बच्चों की कस्टडी, महिलाओं को वसीयत, दान आदि प्रमुख हैं।

मुस्लिम महिलाओं से जुड़ा ‘खुला’ : इस्लाम क्या कहता है? : मद्रास हाईकोर्ट ने कहा : किसी निजी शरीयत परिषद के प्रमाण-पत्र की मान्यता नहीं

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में मुस्लिम महिलाओं (Muslim Women) के ‘खुला’ को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाएँ ‘खुला’ के तहत अपने शौहर से तलाक लेने की अधिकारी हैं। हालाँकि, कोर्ट ने इसके लिए कुछ प्रावधान बताए हैं।

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘खुला’ के तहत तलाक लेने के लिए मुस्लिम महिलाओं को फैमिली कोर्ट जाना होगा। किसी निजी शरीयत परिषद को इस संबंध में प्रमाण पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे प्रमाण-पत्र की कोई मान्यता नहीं है।

क्या है मामला

एक मुस्लिम महिला अपने पति अब्दुल के साथ नहीं रहना चाहती थी। उसने ‘खुला’ के जरिए अपने पति से तलाक ले लिया। इसके लिए 2017 में वह तमिलनाडु के तौहीद जमात की शरीयत परिषद के शरण में गई और वहाँ से इस बाबत प्रमाण पत्र जारी करवा लिया।
महिला के पति ने इस संबंध में साल 2019 में न्यायालय में याचिका देकर इस प्रमाण-पत्र को रद्द करने का आग्रह किया। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस सी सरवनन ने शरीयत परिषद की ओर से जारी प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि महिला को खुला के तहत तलाक लेने के लिए तमिलनाडु कानूनी सेवा प्राधिकरण या फैमिली कोर्ट जाना होगा। हाईकोर्ट ने कहा कि शरीयत परिषद जैसी संस्थाएँ न तो अदालत हैं और न ही मध्यस्थ। ऐसे में इन्हें प्रमाण पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं है।

मुस्लिम महिलाओं को तलाक का अधिकार

इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं को भी अपने शौहर से तलाक लेने का प्रावधान है। यदि मुस्लिम महिला अपने पति से खुश नहीं है या किसी अन्य वजह से उसके साथ रहना नहीं चाहती है तो वह निकाह को तोड़ सकती है। मुस्लिम महिला तलाक-ए-ताफवीज, मुबारत, ‘खुला’, लिएन या फिर मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 के तहत अपने शौहर से अलग हो सकती है।
मुस्लिम महिला तलाक-ए-ताफवीज़ के तहत तलाक ले सकती है। ताफवीज एक ऐसा अनुबंध है, जिसमें मुस्लिम पुरुष अनुबंध के जरिए निकाह को खत्म करने का अपना अधिकार महिला को सौंपता है। बफातन बनाम शेख मेमूना बीवी AIR (1995) कोलकाता (304) और महराम अली बनाम आयशा खातून इसका प्रमुख उदाहरण है।
मुबारत के जरिए भी शौहर-बीवी अलग हो सकते हैं। मुबारत का शाब्दिक अर्थ होता है पारस्परिक छुटकारा। मुबारत में अलग होने का प्रस्ताव चाहे पत्नी की ओर से आए या पति की ओर से, उसकी स्वीकृति से तलाक हो जाता है। इसके बाद पत्नी को इद्दत का पालन करना अनिवार्य हो जाता है।
लिएन वह प्रक्रिया है, जब कोई मुस्लिम शौहर अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाता है, लेकिन वह आरोप झूठा हो जाता है तो बीवी को तलाक लेने का अधिकार मिल जाता है।
मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939 के तहत भी मुस्लिम महिला को तलाक लेने का अधिकार है। इस अधिनियम की धारा 2 के तहत मुस्लिम महिलाओं को शौहर की अनुपस्थिति (चार साल से अधिक), बीवी की भरण पोषण करने में असफलता (शौहर अगर 2 साल से उसका भरण-पोषण नहीं दे रहा है), शौहर को कारावास (कम से कम 7 साल), शौहर द्वारा वैवाहिक दायित्व पालन में असफलता (कम से कम 2 साल से), शौहर की नपुंसकता, शौहर को पागलपन या कुष्ठ-एड्स जैसे संक्रामक रोग होना, बीवी द्वारा निकाह अस्वीकार करना और शौहर की क्रूरता की स्थिति में तलाक लेने का अधिकार है।

क्या है खुला?

खुला के तहत अगर बीवी अपने शौहर से अलग होती है तो उसे अपने शौहर से उसकी जायदाद लौटानी पड़ेगी। पर यह जरूरी है कि दोनों इसके लिए रजामंद हों। उल्लेखनीय है कि खुला की पहल केवल बीवी ही कर सकती है। कुरान और हदीस मे इसका जिक्र है।
वहीं, भारत में मुस्लिमों के बीच मान्य पुस्तक फतवा-ए-आलमगीरी में कहा गया है कि जब निकाह के बाद शौहर-बीवी इस बात पर राज़ी हैं कि अब वे साथ नहीं रह सकते तो तो पत्नी कुछ संपत्ति पति को वापस करके स्वयं को उसके बंधन से मुक्त कर सकती है। जायदाद में बीवी अपनी मेहर की रकम छोड़ सकती है या फिर कोई अन्य रकम/संपत्ति दे सकती है।

खुला को लेकर मुस्लिमों की आपत्ति

‘खुला’ को लेकर हनफी सहित कुछ तबके के उलेमाओं का कहना है कि इसके तहत मुस्लिम महिला तभी तलाक ले सकती है, जब उसका शौहर तैयार हो। अगर शौहर मना कर दे तो महिला के पास मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम 1939 के प्रावधानों के तहत अदालत जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने साल 2021 में ‘खुला’ के संबंध में कहा था कि इस प्रक्रिया में पति की स्वीकृति एक शर्त है। वहीं, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कुरान एक मुस्लिम पत्नी को एक प्रक्रिया निर्धारित किए बिना उसकी निकाह को रद्द करने के लिए ‘खुला’ का अधिकार देता है।

बीवी के ऑर्केस्ट्रा पर डांस और देह व्यापार से मना करने पर नसीम अहमद ने कहा तलाक-तलाक-तलाक

औरत को मात्र एक मनोरंजन और भोग की वस्तु समझने वालों की कोई कमी नहीं। आखिर ऐसे लोगों पर कब लगाम  लगेगी?
उत्तर प्रदेश के वाराणसी से तीन तलाक का एक हैरान करने वाला मामला आया है। खबर है कि वहाँ एक मुस्लिम महिला ने थाने में उसके शौहर के विरुद्ध शिकायत दी। महिला ने बताया कि उसके शौहर ने इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि उसने देह व्यापार में घुसने से और ऑर्केस्ट्रा में नाचने से मना कर दिया था।

अब पीड़िता ने पुलिस थाने में इस संबंध में अपने शौहर नसीम अहमद, उसकी अम्मी और दो बहनों के ख़िलाफ़ शिकायत दी है। पुलिस के मुताबिक महिला ने बताया कि साल 2007 में उसका निकाह जौनपुर जिले के मुंगरा बादशाहपुर इलाके में रहने वाले नसीम अहमद से हुआ था। इसके बाद दोनों के 3 बच्चे हुए- 2 बेटे और 1 बेटी। महिला का आरोप है कि साल 2015 में नसीम और उसके घरवालों ने उसके अब्बा से 2 लाख रुपए माँगे थे जबकि उसके अब्बा एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं।

नसीम पर आरोप है कि वो अपनी बीवी से ऑर्केस्ट्रा शो में डांस करने के लिए दबाव बनाता था और उसे देह व्यापार में ढकेलने के लिए मजबूर करता था। महिला ने बताया कि ससुराल वालों के अत्याचार से बचाने के लिए उसकी अम्मी ने ससुराल में 5000 रुपए देने शुरू कर दिए थे ताकि उसे किसी तरह मजबूर न किया जाए।

बावजूद इतनी कोशिशों के नसीम के घरवालों ने अगस्त 2021 में महिला को घर से निकाल दिया। वह बार-बार अपने शौहर से घर बुलाने को कहती रही। लेकिन, कोई सुनवाई नहीं हुई। हाल में जब उसने फोन किया तो उसे तलाक-तलाक-तलाक कहकर रिश्ता तोड़ दिया गया।

देहरादून में तीन तलाक

कुछ दिन पहले देहरादून से एक तीन तलाक का मामला प्रकाश में आया था। उस समय बीवी ने आरोप लगाया था कि शौहर दहेज के लिए उसे आए दिन ताने मारता था। उसकी शक्ल सूरत पर नकारात्मक कमेंट करता था। विरोध करने पर दूसरी निकाह की धमकी देता था। आरोप था कि शौहर ने उससे अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। फिर तीन तलाक दे घर से निकाल दिया। पीड़िता का कहना था कि मई 2021 में उसकी सास की मौत के बाद प्रताड़ना और अधिक बढ़ गई। पटेल नगर के इंस्पेक्टर देवेंद्र चौहान के अनुसार महिला की शिकायत पर केस दर्ज किया गया। आरोपित शौहर पर तीन तलाक देने और अप्राकृतिक संबध बनाकर कर उत्पीड़न की भी धाराएँ लगाई गई थी।

बंगाल : हिजाब पहनी 1000+ मुस्लिम लड़कियाँ हुईं परीक्षा से बाहर, बंगाल पुलिस भर्ती बोर्ड ने कैंसिल किया आवेदन, क्यों?

                                                                                                       साभार: क्लैरियन इंडिया/न्यूज 18
पश्चिम बंगाल पुलिस भर्ती बोर्ड की ओर से कॉन्स्टेबल और महिला कॉन्स्टेबल के पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे, जिसमें 1000 से अधिक मुस्लिम लड़कियों ने फॉर्म भरते वक्त हिजाब पहनकर फोटो लगाई थी, जिससे उनके आवेदनों को रद कर दिया गया था। अब इस मामले में विवाद बढ़ने के बाद कोलकाता हाईकोर्ट ने पुलिस भर्ती प्रक्रिया पर ही रोक लगा दी है।

बंगाल पुलिस भर्ती बोर्ड के फैसले के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं के एक समूह ने कोलकाता हाईकोर्ट का रुख किया था। इस मामले में कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस अरिंदम मुखर्जी ने अंतरिम फैसला सुनाते हुए कहा कि भर्ती का भविष्य इस मामले के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा।

बहरहाल कोर्ट के फैसलो को अपनी जीत बताते हुए इस मामले से जुड़ी एक याचिकाकर्ता तुहिना खातून ने स्थगन आदेश को ‘हमारी आशाओं की जीत’ करार दिया। खातून ने क्लेरियन इंडिया को बताया, “हम लंबे समय से इस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन हमें अवसर देने से वंचित कर दिया गया। अब अदालत हमारी बात सुन रही है और हमें उम्मीद है कि हमें न्याय मिलेगा।” मुस्लिम महिलाओं की पैरवी कर रहे वकील फिरदौस समीम ने कहा, “संविधान अनुमति देता है कि एक मुस्लिम लड़की हिजाब पहन सकती है, लेकिन पुलिस बोर्ड द्वारा दी गई अधिसूचना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है।”

                                                                                                                   साभार: लाइव लॉ

पश्चिम बंगाल पुलिस भर्ती बोर्ड (WBPRB) ने 26 सितंबर 2021 को राज्य पुलिस में कॉन्स्टेबलों और महिला कॉन्स्टेबलों की भर्ती के लिए प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की थी। बोर्ड ने 6 सितंबर को परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र जारी किए थे। लेकिन कई कारणों के कारण 30,000 से अधिक छात्र परीक्षा देने से वंचित रह गए।

इस मामले में पीड़ित लड़कियों ने सीएम ममता बनर्जी से भी मिलने की कोशिश की थी, लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकीं।

WBPRB के चेयरमैन को लिखा पत्र

इस तरह के मामले में पीड़ित उम्मीदवारों ने WBPRB के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा है और पूछा कि सिख समुदाय के उम्मीदवारों के लिए नियमों को अपवाद करार दिया गया है ठीक उसी प्रकार से पुलिस भर्ती बोर्ड में नियमों को अपवाद बनाने की माँग की है।
मुस्लिम उम्मीदवारों का तर्क है कि हिजाब पहनना राज्य में मुस्लिम समुदाय की आस्था और उनकी प्रथाओं का एक हिस्सा है। पत्र में उम्मीदवारों ने लिखा है, “हम मानते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का दायरा सभी धार्मिक विश्वासों को समायोजित करने के लिए पर्याप्त है।”

क्या कहते हैं भर्ती के नियम

WBPRB की गाइडलाइंस में कहा गया है कि फोटो में आवेदकों के चेहरे किसी भी तरह से ढके नहीं होने चाहिए। गाइडलाइंस में लिखा है, “आवेदकों को सलाह दी जाती है कि वे फोटोग्राफ और हस्ताक्षर के स्थान पर अन्य वस्तुओं की तस्वीरें अपलोड न करें। चेहरा/सिर ढकने वाला फोटोग्राफ, आँखों को ढकने वाले धूप के चश्मे/टिंटेड ग्लासेस को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
जाँच के दौरान ‘ग्रुपीज’ या ‘सेल्फ़ी’ से क्रॉप किए गए फ़ोटोग्राफ की भी अनुमति नहीं रहेगी।

कर्नाटक : हिन्दुओं की दुकान से खरीदारी पर मुस्लिम महिलाओं को कट्टरपंथियों ने धमकाया, गाली-गलौज की

कर्नाटक
हिन्दू दुकान से खरीददारी करने पर मुस्लिम महिलाओं
को धमकाती मुस्लिम भीड़ 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कुछ दिन पूर्व तमिलनाडु स्थित जैन बेकरी में मुस्लिम की नियुक्ति नहीं होने और कुछ स्थानों पर रेहड़ी वालों द्वारा भगवा और हिन्दू दुकान लिखे जाने पर छद्दम धर्म-निरपेक्षों ने खूब शोर मचाया था, वहीं की सरकार द्वारा उन पर कानूनी कार्यवाही की, लेकिन अब कर्नाटक में कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं की दुकानों से खरीदारी कर रही मुस्लिम महिलाओं को धमकाया जाने पर सबके मुंह में दही जम गया है। क्या अब साम्प्रदायिकता नहीं? क्या भगवा और हिन्दू ही साम्प्रदायिकता है? स्वयं चाहे कुछ भी करें अथवा कहें, वह धर्म-निरपेक्षता, वही काम हिन्दू करे तो साम्प्रदायिकता? 
कर्नाटक के दावणगेरे जिले से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। यहाँ मुस्लिम गुंडे हिन्दुओं की दुकान से सामान खरीदने वाली मुस्लिम महिलाओं को निशाना बना रहे हैं।
इससे संबंधित कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। वीडियो में हिन्दू दुकान से सामान खरीदने पर मुस्लिम महिलाओं के मुस्लिम भीड़ को साथ गाली-गलौज करते हुए देखा जा सकता है। एक वीडियो में मुस्लिम भीड़ ने दावणगेरे की सड़कों पर मुस्लिम महिलाओं के एक समूह से सवाल-जवाब करना शुरू कर दिया, जो हिन्दू दुकान से खरीददारी करने निकली थीं।
वीडियो में देखा जा सकता है कि रमजान के पवित्र महीने में जैसे ही हिन्दुओं के स्वामित्व वाली एक लोकप्रिय कपड़े की दुकान ‘बीएस चन्नबसप्पा एंड संस’ से बुर्का-पहने महिलाएँ बाहर निकलती हैं कि मुस्लिमों की भीड़ उन पर आक्रामक हो जाती है। उनको चारों तरफ से घेर लिया जाता है और सवाल-जवाब किए जाते हैं।
इतना ही नहीं उनके हाथ से कपड़ों की थैली भी छीन ली जाती है और कपड़े रखकर थैली को फेंक दी जाती है। शायद इसलिए क्योंकि उस थैली का रंग ‘भगवा’ था। वीडियो में महिलाओं को आक्रामक मुस्लिम भीड़ से जाने देने की विनती करते हुए देखा जा सकता है।
इसी घटना का एक दूसरा वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे मुस्लिम मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू स्टोर से खरीदे गए सामान को वापस करने के लिए मजबूर किया जाता है।


एक लड़का बुर्का पहने मुस्लिम महिला के हाथ से नारंगी रंग के थैले छीन लेता है और फिर मुस्लिम भीड़ दो मुस्लिम महिलाओं को ऑटो में बैठने के लिए मजबूर करता है, ताकि वो हिन्दू दुकान जाकर सामान वापस करके आएँ।
इसी तरह, एक अन्य मुस्लिम भीड़ ने दावणगेरे शहर के एक अन्य हिस्से में इसी तरह एक दुकान पर खरीददारी के लिए गई दो महिलाओं और एक बच्चे को धमकी दी। वीडियो में देखा जा सकता है कि उर्दू में बात कर रहे एक शख्स बुर्का पहने महिला और उसके बच्चे को कपड़े की दुकान में प्रवेश नहीं करने के लिए धमकाता है। बताया जा रहा है कि यह घटना दावणगेरे शहर के क्लॉक टॉवर के पास की है।

उर्दू में बोलने वाली भीड़ को महिलाओं को ‘मालाबार कॉटन्स’ नामक दुकान पर कपड़े खरीदने के लिए धमकाते हुए देखा जा सकता है और बार-बार यह कहते हैं कि वह लगातार चेतावनी देने के बावजूद उस दुकान पर क्यों गईं।
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झारखंड में ‘हिन्दू फल दुकान’ का बैनर लगाना अपराध है। कुछ ही दिन पहले इस तरह का बैनर लगाने पर जमशेदपुर पुलिस ने फल दु...
एक डरा हुआ बच्चा भी यह कहते हुए देखा गया कि उन्होंने दुकान से कुछ नहीं खरीदा।
हालाँकि ऑपइंडिया इस बात की पुष्टि नहीं कर सका कि ‘मालाबार कॉटन्स’ का मालिक हिन्दू है, मगर वीडियो देखकर लगता है कि यह हाल का ही है, क्योंकि कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से लोगों को मास्क पहने हुए देखा जा सकता है।

मोदी ने खाते में ₹1000 डाले हैं: अफवाह फैलते ही बैंक दौड़ीं मुस्लिम महिलाएँ

"कागज नहीं दिखाएंगे" चिल्लाने वाले मोदी द्वारा खातों में
रूपए डालने की खबर सुनते ही बैंक की लाइन में 
दिल्ली के शाहीन बाग़ सहित पूरे देश में हुए सीएए विरोधी आन्दोलनों का लब्बोलुआब यही था कि कागज़ नहीं दिखाएँगे। लेकिन, कोरोना वायरस से उपजे ख़तरों के बीच सरकारी सहायता लेने के लिए लोग न सिर्फ़ लाइन में लगे हुए हैं, बल्कि कागज़ भी दिखा रहे हैं। मेरठ में अफवाह फैला दी गई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं के खाते में हज़ार रुपए डाले हैं। इसके बाद महिलाओं की भारी भीड़ मेरठ के कई बैंकों में पासबुक लेकर दौड़ी चली गई। बैंकों के बाहर भारी भीड़ जुट गई और महिलाओं की अधिकारी लगातार समझाते रहे। इनमें अधिकतर मुस्लिम महिलाएँ थीं, जिन्होंने हंगामा किया।
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"कागज नहीं दिखाएंगे", लेकिन बैंक से रूपए निकलवाने सबसे पहले 
मुस्लिम पुरुष भी अपने-अपने घर की महिलाओं को लेकर बैंक पहुँचे। महिलाएँ माँग कर रही थीं कि उनके पासबुक पर प्रिंट कर दिखाया जाए कि रुपए आए हैं या नहीं। बता दें कि भारत सरकार ने ऐलान किया है कि जिन महिलाओं के पास जन-धन अकाउंट हैं, उनके खाते में अगले तीन महीने तक 500 रुपए डाले जाएँगे, यानी कुल 1500 रुपए की सहायता मिलेगी। जबकि मुस्लिम महिलाओं के बीच अफवाह फ़ैल गई कि 1000 रुपए मोदी ने उनके अकाउंट में डाल दिए हैं। फिर क्या था। सभी अपने-अपने रुपए निकालने के लिए बैंकों की ओर भागीं।
इन महिलाओं ने ‘इंडिया टीवी’ से बात करते हुए दावा किया कि मोदी ने उन्हें जो पैसे दिए हैं, उसे निकालने नहीं दिया जा रहा है। कई लोगों ने इस भीड़ को देख नोटबंदी के बाद बैंकों में लगी भीड़ को याद किया। मेरठ ही नहीं बल्कि अलीगढ़ में भी भीड़ जुटी। एक बैंक के अधिकारी ने बताया कि अफरातफरी के माहौल के कारण लोग 100 रुपए भी निकाल के ले जा रहे हैं। सभी महिलाएँ पासबुक व अन्य कागज़ लेकर बैंक पहुँची हुई थीं। बैंक के अधिकारियों ने सरकार से सहायता की गुहार लगाई। अलीगढ़ में तो अफवाह के कारण नगर निगम और डीएम ऑफिस के बाहर भी लोग पहुँच गए।
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने मुस्लिम महिलाओं को रुपए के लिए कतार में लगे देख कर उन पर तंज कसा, जो ख़ुद को मुसलमानों का ठेकेदार बताते हुए ये दावा करते हैं कि कोई भी कागज़ नहीं दिखाएगा। लोगों ने कहा कि कोई भी सरकारी सहायता तभी मिलेगी, जब सही कागज़ दिखाए जाएँगे। बता दें कि मोदी सरकार द्वारा जो वित्तीय मदद का ऐलान किया गया है, वो सभी लाभार्थियों के खाते में ‘डायरेक्ट ट्रांसफर’ के जरिए भेजा जाएगा।
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पाकिस्तान में कोरोना वायरस संक्रमितों की संख्या 1500 के पार पहुँच गई है। 12 लोगों की मौत भी हो चुकी है। स्थिति भयावह है,...

CAA से अच्छा ट्रिपल तलाक --सुप्रिया सुले, एनसीपी सांसद

NCP सांसद सुप्रिया सुले
CAA का विरोध कर रही मुस्लिम महिलाओं को सम्बोधित करते
एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले 
एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले की नजर में तीन तलाक महिलाओं के अच्छा है। मुंबई में शुक्रवार को नागरिकता संशोधन कानून CAA के विरोध में आयोजित एक रैली के दौरान कुरान का हवाला देते हुए उन्होंने इसे अच्छा बताया है।
शरद पवार की बेटी ने यह बयान YMCA मैदान में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए दिया। इस सभा में ज्यादातर महिलाएँ बुर्क़ा पहने हुए आई थीं जो कि एक बार फिर CAA के विरोध के पीछे छुपे हुए इस्लामिक एजेंडा को दर्शाता है।
सुप्रिया सुले ने कहा कि आम लोगों से मिलने जब वो एक बार बाजार में घूम रही थीं तो उन्होंने लोकसभा में अपने भाषण से पहले कुछ महिलाओं से हिजाब की एक दूकान में ट्रिपल तलाक़ पर उनकी राय जानने की कोशिश की। NCP नेता ने कहा कि वो एक ऐसी महिला से मिलीं जो पूरी तरह से बुर्क़ा पहने हुए थीं, वो एक डॉक्टर थी और उसकी बेटी भी डॉक्टर थी।
सुले ने कहा कि जब उसने बुर्का पहने हुए डॉक्टर महिला से पुछा कि ट्रिपल तलाक़ रहना चाहिए या नहीं तो डॉक्टर ने कहा कि रहना चाहिए। फिर सुले ने उस महिला से पूछा कि जब उनके पति को गुस्सा आता है तो वे क्या करती हैं? इस सवाल पर डॉक्टर नाराज हो गई और पीछे बैठ गई।
इसके बाद सुप्रिया सुले ने महिला से ट्रिपल तलाक की अहमियत के बारे में पुछा। तो महिला ने बताया कि उसका नाम किरण कुलकर्णी है और उसने एक मुस्लिम से शादी की है। शादी के बाद उसने क़ुरान पढ़ी। महिला ने सुप्रिया सुले से कहा- “मैं पूरी क़ुरान जानती हूँ। इससे मुझे पता चला है कि ट्रिपल तलाक़ जैसी व्यवस्थाएँ होनी चाहिए। और मैं मानती हूँ कि किसी को भी इसके लिए जेल नहीं भेजा जाना चाहिए।”
घटना के बारे में बताते हुए सुप्रिया सुले ने कहा- “मेरे पति जैसे भी हों, वो मेरे पति और मेरे बच्चों के पिता हैं और उन्हें कोई जेल नहीं भेज सकता। अगर घर में कोई मतभेद हो जाता है तो हम इसे खुद निपटाएँगे।” उसने कहा कि रिश्तेदार उसके पति को मामला सुलझाने की सलाह देंगे क्योंकि घर के मुद्दे बाहर नहीं जाने चाहिए। उसने कहा कि एक महिला अपने पति को कभी भी जेल नहीं भेजेगी।
सुप्रिया सुले ने कहा कि अगर कोई महिला अपने पति (तीन तलाक देने के बाद) को इस कारण से जेल भेजती है, तो समाज उसकी बुराई करेगा, लोग उनके बच्चों से कहेंगे कि उनकी माँ बुरी महिला है जिसने अपने पति को जेल भेजा। सुप्रिया सुले के अनुसार, उस महिला ने सुले से कहा कि हर कम्युनिटी को अपने नियम बनाने का अधिकार है और सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। महिलाएँ खुद यह तय करेंगी कि उनके लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है। जैसे कि CAA और NRC हम लोगों के लिए बुरा है।
ट्रिपल तलाक़ के खिलाफ बोलते हुए यह पहली बार नहीं है जब सुप्रिया सुले ने किरण कुलकर्णी, जिसका कि अब हिना नाम है, का जिक्र किया हो। दिसंबर 2018 में लोकसभा में अपने भाषण के दौरान भी सुप्रिया सुले ने जिक्र किया था कि किस तरह से एक हिन्दू महिला ने मुस्लिम से शादी करने के बाद क़ुरान के अनुसार तीन तलाक़ को जरूरी बताया था।
यह भी दिलचस्प बात है कि सुप्रिया सुले ने एक ऐसी महिला का उदाहरण दिया जो पढ़ी-लिखी है और वह भी शरिया कानून को मानते हुए ट्रिपल तलाक की व्यवस्था का समर्थन करती है। अक्सर देखा जाता है कि एक आर्थिक रूप से समर्थ परिवार में ट्रिपल तलाक जैसे मामले कम ही देखे जाते हैं। ट्रिपल तलाक से वास्तविक पीड़ित महिलाएँ ज्यादातार अनपढ़ या फिर आर्थिक रूप से बदहाल परिवारों से होती हैं। ट्रिपल तलाक जैसे प्रचलनों से उन्हीं का सबसे ज्यादा शोषण भी होता है।

सऊदी अरब में आधी आबादी ने ली राहत की सांस


यह वर्ष मुस्लिम महिलाओं के लिए सौग़ात भरा वर्ष सिद्ध हो रहा है। एक तरफ जहाँ भारत में तीन तलाक से निजाद मिली है, तो सऊदी सरकार ने भी महिलाओं पर लगे प्रतिबन्धों को ख़त्म कर दिया है।  
सऊदी अरब की महिलाओं के लिए आज का दिन बेहद खास है। अब इस देश की महिलाएं किसी संरक्षक की अनुमति के बिना विदेश यात्राओं पर निकल सकेंगी। इस ऐतिहासिक सुधार के बाद वह पुरानी संरक्षण प्रणाली समाप्‍त हो गई, जिसके तहत कानूनन महिलाओं को स्‍थाई रूप से नाबालिग समझा जाता है। उनके सरंक्षकों यानी पति, पिता और अन्‍य पुरुष संबंधियों को उन पर मनमाना अधिकार प्रदान करती थी। ये दशक सऊदी अरब की महिलाओं के लिए महत्‍वपूर्ण रहा है। आइए हम आपको बताते हैं‍ कि किन वजहाें से विगत के दस वर्ष सऊदी महिलाओं के लिए खास रहा।
क्‍या है नया कानून  
इस नियम के मुताबिक अब 21 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को पासपोर्ट हासिल करने और अभिभावक की सहमति हासिल किए बिना देश छोड़ने की इजाजत होगी। यह जानकारी सरकारी गजट उम्‍म उल कुरा में प्रकाशित की गई थी। हालांकि, अखबार ने यह नहीं बताया था कि उसे यह जानकारी कहां से हासिल हुई है। पुराने कानून के मुताबिक सऊदी अरब में किसी भी उम्र की महिला बिना किसी पुरुष संरक्षक के विदेश यात्रा पर नहीं जा सकती है। यह नियम 21 वर्ष के कम उम्र के पुरुषों के साथ भी लागू है।

क्‍या था पुराना नियम 
इस फैसले के पूर्व सऊदी महिलाओं को अकेले विदेश यात्रा करने की इजाजत नहीं थी। हालांकि, इस नियम की पिछले वर्ष विश्‍व जगत में काफी निंदा हुई थी। इसके बाद सऊदी सरकार ने महिलाओं के हक में यह सुधारात्‍मक कदम उठाया है। एक अगस्‍त को सऊदी अरब सरकार ने कहा था कि महिलाअों को किसी संरक्षक की इजाजत के बिना विदेश यात्रा पर जा सकेंगी। इस घोषणा के 20 दिन बाद 21 अगस्‍त को यह नियम अमल में आ गया।

शरणार्थियों की संख्‍या से बना दबाव
खास बात यह है कि सऊदी अरब अपने नागरिकों की विदेश यात्रा पर पाबंदियों में ढील देने का यह प्रस्‍ताव उस समय लाया है, जब उनके देश में शरणार्थियों की संख्‍या में लगातार इजाफा हो रहा है। सात वर्षों में सऊदी में शरणार्थियों की संख्‍या चौगुनी हो गई है। सऊदी शरणार्थियों में पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल हैं। इससे यह जाहिर होता है कि सऊदी में अरब नागरिकों में उन्‍मुक्‍त जीवन जीने की लालसा निरंतर बढ़ रही है।

सऊदी महिलाओं के लिए खास रहा ये दशक  

  • सऊदी महिलाओं की आजादी के मामले में यह दशक अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण है। अगर इस दशक पर हम नजर दौड़ाएं तो वर्ष 2012 में सऊदी महिलाओं को खेलों में हिस्‍सा लेने का हक मिला। पहली बार सऊदी महिला ओलिंपिक खेलों में शामिल हुईं। अतंरराष्‍ट्रीय खेलों में पहली बार सऊदी का प्रतिनिधित्‍व देखने को मिला।
  • दिसंबर 2015 में महिलाओं को वोट डालने का अधिकार हासिल हुआ। इसके पूर्व उनको इस अधिकार से वंचित रखा गया था।
  • वर्ष 2017 में सऊदी महिलाओं को पासपोर्ट दिए जाने के सारे बंधन हटा दिए गए। उन्‍हें स्‍वतंत्र पासपोर्ट दिया जाने लगा।
  • वर्ष 2018 में महिलाओं को स्‍टेडियम में प्रवेश की अनुमति हासिल हुई। इसी वर्ष महिलाओं को सेना में भर्ती की अनुमति प्रदान की गई। इसके साथ उन्‍हें स्‍वतंत्र कारोबार की इजाजत भी मिली।

इराक के कुर्द क्षेत्र में ‘खतना’ के खिलाफ आवाज उठा रही हैं महिलाएं

भारत में कट्टरवाद मुस्लिम महिलाओं को डरा-धमका कर रखने में प्रयत्नशील है, जबकि मुस्लिम देश महिलाओं को होने वाली समस्याओं को सुन दूर कर रहे हैं। तीन तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों पर प्रतिबन्ध लग चुका है, और इसका उल्लंघन करने वालों को कोड़े मारने की सजा है। परन्तु भारत में तीन तलाक और हलाला  कानून बनाने पर इस्लाम पर कुठाराघात कह कर सरकार के विरुद्ध माहौल बनाया जा रहा है।  इराक के एक कुर्द गांव में ठंड में काले बादलों और बारिश के आसार के बावजूद एक महिला घर के बंद दरवाजे के बाहर खड़ी है। वह वहां से हिलने को तैयार नहीं है, क्योंकि उसे डर है कि उसके जाने के बाद उस घर में रहने वाली महिलाएं अपनी दो बच्चियों का खतना कर देंगी। बचपन में खतने का दंश झेल चुकीं 35 वर्षीय रसूल घर के बाहर खड़ी हैं और आवाज लगा रही हैं ‘‘मुझे मालूम है कि आप घर में हैं। मुझे सिर्फ बात करनी है।’’ 
कुर्द इलाके में चल रहा है अभियान
इराक के कुर्द इलाके में महिलाओं/बच्चियों के खतने के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाने वाले ‘वादी’ एनजीओ की कार्यकर्ता रसूल कई बच्चियों के लिए देवदूत जैसी हैं। एक वक्त इराक के कुर्द इलाके में बच्चियों/महिलाओं के बीच खतना बहुत सामान्य बात थी। लेकिन ‘वादी’ के अभियान ने काफी हद तक इस संबंध में महिलाओं की सोच बदली है और अब पूरे इराक के मुकाबले कुर्द क्षेत्र में बच्चियों के खतने की संख्या में कमी आयी है
 
इमाम की सोच को बदलने की कोशिश
रसूल क्षेत्रीय राजधानी अरबिल के पूर्व में स्थित शरबती सगीरा गांव में खतने के खिलाफ जागरुकता फैलाने और इस परंपरा को बंद कराने के लिए 25 बार जा चुकी हैं। वह गांव के इमाम की सोच को बदलने का प्रयास कर रही हैं, जो सोचते हैं कि खतना इस्लामिक परंपरा है। वह गांव की प्रशिक्षित दाईयों को खतने से होने वाले नुकसान, उसके कारण वर्षों तक होने वाले रक्तस्राव, संक्रमण के खतरों और मानसिक प्रताड़ना के संबंध में समझाती हैं
 

इराक के कुर्द इलाके की बात करें तो इसे सामान्य तौर पर महिलाओं के लिए प्रगतिशील क्षेत्र माना जाता है लेकिन यहां भी दशकों से बच्चियों के खतने की परंपरा रही है। तमाम अभियानों के बाद कुर्द प्राधिकार ने 2011 में खतने को घरेलू हिंसा कानून के तहत शामिल कर खतना करने वालों के लिए अधिकतम तीन साल की सजा और करीब 80,000 अमेरिकी डॉलर के जुर्माने का प्रावधान किया था 
2014 में हुआ था 58.5% महिलाओं का खतना
कानून बनने और एनजीओ के अभियानों के बाद खतने की संख्या में कुछ कमी भी आई है। यूनिसेफ के अनुसार, 2014 में कुर्द क्षेत्र की करीब 58.5 प्रतिशत महिलाओं का खतना हुआ था
 

महिलाओं का नेल पॉलिस लगाना इस्लाम में हराम :दारुल उलूम देवबंद का फतवा

दारुल उलूम देवबंद ने एक महिला के खिलाफ केवल इसलिए फतवा जारी कर दिया है, क्योंकि उसने अपने नाखून पर नेल पॉलिस लगाए थे. फतवा में कहा गया है कि महिलाओं के लिए नाखून काटना और नाखून पर नेल पॉलिस लगाना इस्लाम के खिलाफ है. दारुल उलूम के मुफ्ती इशरार गौरा ने कहा है कि इस्लाम में महिलाएं नाखून पर मेहंदी लगा सकती हैं, नेल पॉलिश गैर इस्लामिक है. दारुल उलूम इससे पहले भी महिलाओं से जुड़ी कई आदतों के खिलाफ फतवा जारी कर चुका है.
पिछले साल 21 अक्टूबर को दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी कर कहा था कि सोशल मीडिया पर मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं की फोटो अपलोड करना नाजायज है. दारूम उलूम देवबंद से एक शख्स ने यह सवाल किया था कि क्या फेसबुक, व्हाट्सअप एवं सोशल मीडिया पर अपनी (पुरुष) या महिलाओं की फोटो अपलोड करना जायज है. इसके जबाव में फतवा जारी करके यह कहा है कि मुस्लिम महिलाओं एवं पुरुषों को अपनी या परिवार के फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करना जायज नहीं है, क्योंकि इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता.
इस संबंध में मुफ्ती तारिक कासमी का कहना है कि जब इस्लाम में बिना जरूरत के पुरुषों एवं महिलाओं के फोटो खिंचवाना ही जायज न हो, तब सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करना जायज नहीं हो सकता.
महिलाओं का आइब्रो बनवाना और बाल कटवाना नाजायज है
सात अक्टूबर को दारुल उलूम देवबंद ने मुस्लिम महिलाओं के लिए चौंकाने वाला फतवा जारी किया था. दारुल उलूम देवबंद के फतवा में कहा गया है कि मुस्लिम महिलाओं के लिए हेयर कटिंग और आइब्रो बनवाना नाजायज है. दारुल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के मौलाना लुतफुर्रहमान सादिक कासमी ने कहा कि ये फतवा काफी पहले जारी कर दिया जाना चाहिए था. दरअसल, सहारनपुर के एक शख्स ने दारुल उलूम देवबंद से पूछा था कि क्या इस्लाम महिलाओं को बाल कटवाने और आइब्रो बनवाने की इजाजत देता है? क्या मैं अपनी पत्नी को ऐसा करने दूं? इस शख्स के सवाल के बाद ही दारु उलूम ने यह फतवा जारी किया है.

फतवा में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘इस्लाम में आइब्रो बनवाना और बाल कटवाना धर्म के खिलाफ है. कोई महिला ऐसा करती है तो वह इस्लाम के नियमों का उल्लंघन कर रही है.’ इस फतवा को जारी करने के पीछे तर्क दिया गया है कि इस्लाम में महिलाओं पर 10 पाबंदियां लगाई गई हैं. उन्हीं में बाल काटना और आइब्रो बनवाना भी शामिल है. लंबे बाल महिलाओं की खूबसूरती का हिस्सा है. इस्लाम मजबूरी में बाल काटने की इजाजत देता है. बिना किसी मजबूरी के बाल कटवाना नाजायज है.’
माथे पर बिन्दी और पैरों में बिछुए 
वैसे तो इस्लाम में बिन्दी और पैरों में बिछुए पहनने पर भी पाबन्दी है, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ मुस्लिम महिला परिधानों में बहुत बदलाव आ चूका है, आज हिन्दू महिलाओं की भाँति मुस्लिम महिलाएं बिन्दी और बिछुए का प्रयोग कर रही हैं। जबकि सुहागन हिन्दू औरत ही बिछुए पहनती है।   
ज्ञात हो कि दारुल उलूम देवबंद मुस्लिमों के लिए एक विशेष स्थान है. दारुल उलूम देवबंद का कहना है कि वह दुनिया में इस्लाम की मौलिकता को कायम रखने के लिए काम कर रही हैं. इस विचारधार से प्रभावित  मुसलमानों को देवबंदी कहा जाता है. दारुल उलूम देवबंद की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना क़ासिम नानौतवी ने रखी थी.