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सऊदी अरब में आधी आबादी ने ली राहत की सांस


यह वर्ष मुस्लिम महिलाओं के लिए सौग़ात भरा वर्ष सिद्ध हो रहा है। एक तरफ जहाँ भारत में तीन तलाक से निजाद मिली है, तो सऊदी सरकार ने भी महिलाओं पर लगे प्रतिबन्धों को ख़त्म कर दिया है।  
सऊदी अरब की महिलाओं के लिए आज का दिन बेहद खास है। अब इस देश की महिलाएं किसी संरक्षक की अनुमति के बिना विदेश यात्राओं पर निकल सकेंगी। इस ऐतिहासिक सुधार के बाद वह पुरानी संरक्षण प्रणाली समाप्‍त हो गई, जिसके तहत कानूनन महिलाओं को स्‍थाई रूप से नाबालिग समझा जाता है। उनके सरंक्षकों यानी पति, पिता और अन्‍य पुरुष संबंधियों को उन पर मनमाना अधिकार प्रदान करती थी। ये दशक सऊदी अरब की महिलाओं के लिए महत्‍वपूर्ण रहा है। आइए हम आपको बताते हैं‍ कि किन वजहाें से विगत के दस वर्ष सऊदी महिलाओं के लिए खास रहा।
क्‍या है नया कानून  
इस नियम के मुताबिक अब 21 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को पासपोर्ट हासिल करने और अभिभावक की सहमति हासिल किए बिना देश छोड़ने की इजाजत होगी। यह जानकारी सरकारी गजट उम्‍म उल कुरा में प्रकाशित की गई थी। हालांकि, अखबार ने यह नहीं बताया था कि उसे यह जानकारी कहां से हासिल हुई है। पुराने कानून के मुताबिक सऊदी अरब में किसी भी उम्र की महिला बिना किसी पुरुष संरक्षक के विदेश यात्रा पर नहीं जा सकती है। यह नियम 21 वर्ष के कम उम्र के पुरुषों के साथ भी लागू है।

क्‍या था पुराना नियम 
इस फैसले के पूर्व सऊदी महिलाओं को अकेले विदेश यात्रा करने की इजाजत नहीं थी। हालांकि, इस नियम की पिछले वर्ष विश्‍व जगत में काफी निंदा हुई थी। इसके बाद सऊदी सरकार ने महिलाओं के हक में यह सुधारात्‍मक कदम उठाया है। एक अगस्‍त को सऊदी अरब सरकार ने कहा था कि महिलाअों को किसी संरक्षक की इजाजत के बिना विदेश यात्रा पर जा सकेंगी। इस घोषणा के 20 दिन बाद 21 अगस्‍त को यह नियम अमल में आ गया।

शरणार्थियों की संख्‍या से बना दबाव
खास बात यह है कि सऊदी अरब अपने नागरिकों की विदेश यात्रा पर पाबंदियों में ढील देने का यह प्रस्‍ताव उस समय लाया है, जब उनके देश में शरणार्थियों की संख्‍या में लगातार इजाफा हो रहा है। सात वर्षों में सऊदी में शरणार्थियों की संख्‍या चौगुनी हो गई है। सऊदी शरणार्थियों में पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल हैं। इससे यह जाहिर होता है कि सऊदी में अरब नागरिकों में उन्‍मुक्‍त जीवन जीने की लालसा निरंतर बढ़ रही है।

सऊदी महिलाओं के लिए खास रहा ये दशक  

  • सऊदी महिलाओं की आजादी के मामले में यह दशक अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण है। अगर इस दशक पर हम नजर दौड़ाएं तो वर्ष 2012 में सऊदी महिलाओं को खेलों में हिस्‍सा लेने का हक मिला। पहली बार सऊदी महिला ओलिंपिक खेलों में शामिल हुईं। अतंरराष्‍ट्रीय खेलों में पहली बार सऊदी का प्रतिनिधित्‍व देखने को मिला।
  • दिसंबर 2015 में महिलाओं को वोट डालने का अधिकार हासिल हुआ। इसके पूर्व उनको इस अधिकार से वंचित रखा गया था।
  • वर्ष 2017 में सऊदी महिलाओं को पासपोर्ट दिए जाने के सारे बंधन हटा दिए गए। उन्‍हें स्‍वतंत्र पासपोर्ट दिया जाने लगा।
  • वर्ष 2018 में महिलाओं को स्‍टेडियम में प्रवेश की अनुमति हासिल हुई। इसी वर्ष महिलाओं को सेना में भर्ती की अनुमति प्रदान की गई। इसके साथ उन्‍हें स्‍वतंत्र कारोबार की इजाजत भी मिली।

तेलंगाना : विधायक के भाई ने 'महिला अधिकारी' के सिर पर गन्ने से किया हमला

विधायक के भाई ने 'महिला अधिकारी' के सिर पर गन्ने से किया हमला, देखें VIDEO
TRS कार्यकर्ताओं ने पुलिस टीम पर किया हमला
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
देश में होने वाले चुनाव प्रचार में हर पार्टी भ्रष्टाचार और अपराध पर अंकुश लगाने की बात कर जनता को कितना भ्रमित करते हैं, वह आज कल नेताओं द्वारा ही सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाते नज़र आ रहे हैं। अधिकारियों पर हमला करते दिख रहे हैं। अधिकारी काम करे तो मुसीबत नहीं करे तो मुसीबत।
NOTA वोट में होती वृद्धि 
जनता द्वारा सरकारी काम में रुकावट डालना, मार-पिटाई समझ में आता है, परन्तु नेता किस आधार पर सरकारी कामकाज में रुकावट डाल रहे हैं, जो शायद सिद्ध करता है, देश में फैले व्याप्त भ्रष्टाचार और अपराध में नेताओं का ही हाथ होता है। और इस मनोविकार से शायद ही कोई पार्टी बची हो। ये तो केवल चुनावों में ही एक-दूसरे को आरोपित कर जनता को भ्रमित करते हैं, जिससे निर्दोष तो लॉलीपॉप समझ झांसे में आ जाते हैं, विपरीत इसके भ्रष्टाचारी और अपराधी बेअसर ही दिखते हैं। दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि जनसेवा के नाम पर सफेदपोश गुंडों का सियासत पर कब्ज़ा हो रहा है। और जब ऐसे लोगों का बोलबाला रहेगा, देश से भ्रष्टाचार और अपराध किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं हो सकते। शायद यही कारण है आज NOTA के वोटों में वृद्धि हो रही है।
पुलिस पर हमला करते हुए लोगों का एक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में दिख रहा है कि कुछ लोग पुलिस टीम और वन रक्षकों पर हमला कर रहे हैं। एक शख्स ने तो फॉरेस्ट रेंज अधिकारी सी अनीता के सिर पर गन्ने से कई वार किए। कथित तौर पर हमला करने वाले लोग तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (TRS) के बताए जा रहे हैं। मामला तेलंगाना के आसिफाबाद जिले के सिरपुर कगाजनगर का है और यह घटना शनिवार को वृक्षारोपण अभियान के दौरान हुई। अधिकारी ने हमलावर शख्स की पहचान कर ली है. हमलावर का नाम कोनेरू कृष्णा है। वह स्थानीय निकाय का चेयरमैन है और इलाके के टीआरएस विधायक का भाई है। 
क्या ऐसे नेताओं के चलते महिला सशक्तिकरण संभव हो सकता है?
फॉरेस्ट गार्ड की टीम राज्य सरकार के आदेश के बाद इलाके में वृक्षारोपण के लिए गई थी। यह वृक्षारोपण अभियान कालेश्वरम इरीगेशन प्रोजेक्ट का हिस्सा है जो सीएम के चंद्रशेखर राव का दूसरा सबसे बड़ा सपना है। 

Embedded video

Telangana: A police team & forest guards were allegedly by Telangana Rashtra Samithi workers in Sirpur Kagaznagar block of Komaram Bheem Asifabad district, during a tree plantation drive. (29-06)
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उत्तराखंड में कांग्रेस पार्षद द्वारा युवकों की पिटाई, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी देवगौड़ा द्वारा जेडीयू कार्यक....

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार सत्ता का नशा नेताओं पर किस कदर हावी होता है, इसका नमूना मध्य प्रदेश के इंदौर में देखने ....

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हैदराबाद पुलिस ने राजा सिंह पर कथित रूप से खुद को चोट पहुंचाने का आरोप लगाया. हैदराबाद से आर.बी.एल.निगम हैदराबाद में...

महिला अधिकारी ने बताया कि वह लोगों को बता रही थीं कि वह सरकार के निर्देशों का पालन कर रही हैं लेकिन भीड़ में किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। पुलिस ने कहा कि वह हमलावरों की पहचान करके उन्हें गिरफ्तार करेगी। 
Randeep Hooda seeks PM Narendra Modi help For Lady forest officer beaten Accident in Telanganaरणदीप हुड्डा ने लगाई पीएम मोदी से मदद की गुहार
जून 30 को एक वीडियो सामने आया था जिसमें तेलंगाना राष्ट्र समिति के कार्यकर्ताओं ने एक महिला वन अधिकारी की जमकर पिटाई की थी। जान बचाने के लिए वन अधिकारी ट्रैक्टर पर चढ़ गई लेकिन फिर भी लोगों ने नहीं छोड़ा। लगातार अधिकारी पर लाठी-डंडों से वार किए गए। महिला बुरी तरह घायल हो गई और मौके पर ही बेहोश हो गई। अब बॉलीवुड एक्टर रणदीप हुड्डा ने सोशल मीडिया पर इस मामले में पीएम मोदी से मदद की गुहार लगाई है। रणदीप हुड्डा ने हाल ही में घटना का वीडियो शेयर किया है। जिसमें ऑफिसर पर कुछ लोग हमला करते हुए नजर आ रहे हैं। इस वीडियो को पोस्ट करते हुए रणदीप ने पूरा मामला बताया और सरकार को इस तरह ध्यान देने को कहा। 
रणदीप हुड्डा ने लिखा, 'राज्य के किसी यूनिफॉर्म ऑफिसर पर अटैक करना उस राज्य पर खुद एक हमला है। एक लेडी फॉरेस्ट ऑफिसर पर कागजनगर(तेलांगना) में बुरी तरह से हमला कर दिया गया। स्थानीय विधायक कोनेरू कृष्ण के भाई और पुलिस की मौजूदगी में गुंडों द्वारा सरसाला गांव में लेडी फॉरेस्ट ऑफिसर पर ये हमला हुआ। फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर कागजनगर में पिछले 3 महीनों से अवैध खेती को रोक रही थी। महिला पर हमला तब हुआ जब वो अपने कर्तव्यों का पालन कर रही थी और सरकारी ट्रैक्टर को बचाने की कोशिश कर रही थी। तभी उस पर लाठियां से हमला हुआ।'


रणदीप आगे लिखते हैं, 'ऐसी ही एक घटना टिपेश्वर अभयारण्य में हुई थी। लोकल माफिया और राजनीतिक समर्थन के चलते। कागजनगर डीएफओ द्वारा पत्र प्रस्तुत किया गया है। सिरपुर-कागजनगर उन आखिरी बचे हुए कॉरिडोर में से है जहां ज्यादा संख्या में टाइगर रहते है। ताडोबा रिजर्व फॉरेस्ट से कवाल टीआर तक में करीब 100 से भी ज्यादा संख्या में टाइगर रहते हैं। कवाल में लगातार टाइगर कम होते जा रहे हैं जिसकी वजह खराब कोरिडोर हैं। डियर नरेंद्र मोदी सर, प्रकाश जावड़ेकर, बाबुल सुप्रियो, हरदीप सिंह पुरी, अमित शाह फॉरेस्ट डिपार्टमेंट स्टाफ देश की इस अमूल्य संपत्ति को बचाने की कोशिश कर रहा है। जो कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार आपराधिक गतिविधियों के कारण खत्म हो रही है। प्लीज मदद करें....।'

सूडानः आज़ादी की आवाज़ बुलंद करती महिलाओं का सेना ने किया रेप

सूडानसूडान में लोकतंत्र के पक्ष में सेना मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों में मौजूद महिलाओं के साथ सेना की एक टुकड़ी ने कथित तौर पर बलात्कार किया. इस मामले में प्रत्यक्षदर्शी रहे एक शख्स ने बीबीसी को बताया है कि 12 दिन पहले यानी 3 जून को सेना ने इन प्रदर्शकारियों पर कार्रवाई के दौरान ऐसा किया.
सेना ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया है, लेकिन ख़ालिद (बदला हुआ नाम) नामक शख्स ने बीबीसी को बताया कि जब सैन्य कार्रवाई प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ की जा रही थी उसी दौरान कुछ महिलाओं का बलात्कार भी किया गया.
उनके मुताबिक़, जब सुबह की प्रार्थना के बाद शूटिंग शुरू हुई तो वह अपने एक अन्य प्रदर्शन कर रहे साथी के साथ पास की एक इमारत में भागे. लेकिन जैसे ही वह इमारत के ऊपरी हिस्से के एक कमरे में पहुंचे तो दोनों ने चीख-पुकार सुनी. उन्होंने सीढ़ियों से बाहर निकल कर देखा.
ख़ालिद कहते हैं, ''हमने देखा कि छह सैनिक मिलकर दो लड़कियों का रेप कर रहे थे.''
ये जवान रैपिड सपोर्ट बल का हिस्सा थे जिसे स्थानीय भाषा में जांजवेद कहते हैं.
ख़ालिद और उनके साथी 'दूर हटो' चिल्लाते हुए उन सैनिकों की ओर दौड़े लेकिन अपनी ओर बढ़ता देख सैनिकों ने उन पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं.
'उन्होंने मेरा रेप करने की कोशिश की'
सूडान की राजधानी खार्तूम में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के कारण तख्तापलट हुआ, जिसने अप्रैल की शुरुआत में उमर अल-बशीर को लगभग 30 साल बाद सत्ता से बाहर कर दिया था और इसके बाद भी प्रदर्शनकारियों ने सेना मुख्यालय के सामने नागरिक शासन की वापसी के लिए अपना प्रदर्शन जारी रखा.
ख़ालिद कहते हैं कि जब हम किसी तरह बचकर नीचे की ओर आ रहे थे तो हमें दो महिलाएं और मिलीं जो काफ़ी परेशान दिख रही थीं. ये चारों महिलाएं सेना मुख्यालय के सामने प्रदर्शन कर रहे लोगों में मौजूद थीं.
उन्होंने कहा, ''लड़कियां कुछ बोल नहीं रही थीं. वो बस रो और चिल्ला रही थीं. मैं उन्हें शांत करने की कोशिश कर रहा था. मैंने कई कोशिशें कीं ताकि वे बेहतर महसूस करें लेकिन वे बस रो रही थीं.''
हम लोगों ने तय किया कि हम इन महिलाओं को एक मस्जिद में ले जाएं. जहां वे सुरक्षित महसूस कर सकें. दोनों इन कोशिशों में जुट गए कि कैसे महिलाओं को लेकर इस गोलीबारी से निकला जा सकता है.
जैसे ही वे लोग मस्जिद की ओर निकले उन्हें रास्ते में जांजवेद का एक दस्ता मिला. उनमें से एक शख्स वो था जो इमारत में महिलाओं का रेप करने वाले छह सैनिकों में शामिल था.
ख़ालिद कहते हैं, "उसने मुझे धक्का दिया और मैं गिर गया."
इसके बाद उन्होंने बताया कि हमें वहीं दोबार ले जाया गया जहां महिलाओं का रेप किया गया था.
वह कहते हैं, ''वह मेरे कपड़े उतारने की कोशिश करने लगे और मेरा रेप करने की कोशिश की. मैं चिल्ला रहा था ताकि कोई मेरी आवाज़ सुन ले और बचा ले. तीन-चार मिनट के बाद इमारत के अंदर गोलियों की आवाज़ आने लगी और उन्होंने जल्दी मुझे छोड़ दिया.'' खालिद बताते है कि वह किसी तरह वहां से निकले हालांकि घर आते वक्त रास्ते में कई बार उन्हें जांजावेदों ने मारा. 'दुनिया को गुमराह करने की कोशिश' इन कथित अत्याचारों की पूरी तस्वीर क्या है इसका पता लगाना मुश्किल हो गया है, हजारों जांजवेद के लड़ाके प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने उतरे थे. हालात को देखते हुए इंटरनेट काट दिया गया था और लोग अब बोलने से डर रहे हैं. विपक्ष के मुताबिक़ सेना की इस कार्रवाई में कुल 100 लोगों की मौत हो चुकी है. कई लोगों को नील नदी में फ़ेंक दिया गया. ट्रांज़िशनल मिलिट्री काउंसिल ने अब मान लिया है कि प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का आदेश उसने दिया था लेकिन यौन हिंसा के आरोपों से उन्होंने इंकार किया है.
प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल शम्स अल-दीन कबाशी ने कहा, "झूठी जानकारी जो हमारे लोगों को लेकर और दुनिया के बाकी हिस्सों में फैलाई जा रही है, ऐसा दुनिया को गुमराह करने के लिए किया जा गया है."
सूडान
एक अन्य गवाह, एक एम्बुलेंस ड्राइवर ने पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि उसने देखा कि सेना के लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि कौन महिला का रेप करेगा.
एक महिला को इलाज के लिए उनकी एबुलेंस में लाया जा रहा था लेकिन सेना की एक टुकड़ी ने उन्हें रोक लिया और वे लोग इस पर बहस करने लगे कि उस महिला के साथ रेप करेगा.
जैसे ही सेना के लोग वहां से निकले हम महिला की ओर दौड़े ताकि उसे अस्पताल ले जाया जा सके लेकिन हमने देखा की उसकी मौत हो चुकी थी.
वह कहते हैं, ''हमें पता चला कि वह लड़की पहले ही मर चुकी थी लेकिन उन्होंने फ़िर भी उसे नहीं छोड़ा. ''
क्रांति को रोकने का हथियार?
अफहाद यूनिवर्सिटी में ट्रॉमा सेंटर की प्रमुख हिमा इस्हाक शरीफ़ कहती हैं, '' हम लोग 12 ऐसी महिलाओं का इलाज कर रहे हैं जिनका रेप तीन जून को किया गया है.''
वह मानती हैं कि रेप की ख़बरें उन्हें हैरान नहीं कर रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये संख्या असल में काफ़ी ज़्यादा होगी. कई रेप की घटनाएं रिपोर्ट नहीं की जाती क्योंकि ये शर्म की बात मानी जाती है.
मानसिक स्वास्थ कार्यकर्ताओं की मानें तो ये घटना जांजवेदों की बर्बरता को दर्शाता है. वह कहते हैं, ''कई लोग ग़ायब हैं, जहां ये प्रदर्शनकारी गए थे वहां हम हालात का जायज़ा लेने पहुंचे. सब कुछ तबाह कर दिया गया है. ऐसा लगता है कि हम दारफ़ुर के किसी गांव से निकल रहे हों, जहां इन लोगों ने कुछ वक्त पहले लोगों की हत्या और लूट की थी.''
शरीफ़ मानती हैं कि ''ये महज़ एक सेक्स की बात नहीं है, इस तरह से लोगों को आंतरिक तौर पर रौंदा जाता है. ये एक हथियार क्रांति को ख़त्म कर देने का है.''
ख़ालिद भी मानते हैं कि मानसिक चोट से बाहर निकलना बेहद मुश्किल होता है.
वह कहते हैं, ''मैं घर पर बैठे-बैठे चिल्लाने लगता हूं, अकेला रोता हूं. '' वह मानते हैं कि ये जांजवेद सड़कों पर भारी संख्या में मौजूद रहते हैं ऐसे में काउंसलिंग का असर भी इंसान पर नहीं हो पाता. जब भी आप उन्हें देखते हैं, आपका भूत वर्तमान बनकर आपके साथ चलने लगते हैं."
लेकिन वह कहते हैं कि ''किसी को बोलना होगा. इस दुनिया को सच पता चलना चाहिए. ''
(साभार: https://www.bbc.com/hindi/international-48645640)