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‘शरीयत एक्ट’ के खिलाफ HC में याचिका, केंद्र से माँगा जवाब ; शरीयत कानून : मुस्लिम पर्सनल लॉ भेदभाव करता है, संविधान नहीं

कट्टरपंथियों द्वारा नूपुर शर्मा के विरुद्ध 'सिर तन से जुदा' गैंग को सक्रीय करने से अब इस्लाम के ही विरुद्ध आवाज़ बुलंद होनी शुरू हो गयी है। नूपुर विवाद ने जयपुर डायलॉग, सच और न्यूज़ नेशन द्वारा 'इस्लाम क्या कहता है' आदि ने इस्लाम की उन कमियों को उजागर कर दिया है, जिन्हें ये कट्टरपंथी परदे में रख समस्त गैर-मुस्लिमों को बेवकूफ बना रहे थे। अभी तो शरीयत के खिलाफ आवाज़ उठी है, आगे-आगे देखिए हलाल, हलाला आदि कई मुद्दों पर कोर्ट के दरवाज़े खटखटाये जायेंगे।   
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 को चुनौती देने वाली याचिका पर भारत के अटॉर्नी जनरल को नोटिस जारी किया है। याचिका में आईपीसी की धारा 494 की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। ‘हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड’ द्वारा जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसपर जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने यह आदेश जारी किया।

‘पिछले दिनों कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान ‘हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड’ के वकील अशोक पाँडे ने कहा कि धारा 494 हिंदू, बौद्ध, सिख और ईसाई धर्म के मानने वालों पर लागू होती है।’ इसके तहत यदि व्यक्ति अपने पत्नी के रहते दूसरा विवाह करता है तो उसे मान्य नहीं माना जाएगा। साथ ही व्यक्ति को सात साल की कैद की सजा और जुर्माना लगा दिया जाएगा लेकिन देश के मुस्लिमों पर यह धारा लागू नहीं होती।

अदालत को जानकारी दी गई कि आईपीसी की धारा 494 मुस्लिमों पर इसलिए लागू नहीं होताी क्योंकि उन्हें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 के तहत सुरक्षा प्राप्त है। शरीयत अप्लीकेशन एक्ट मुस्लिम पुरुष को चार शादियाँ करने की इजाजत देता है। यह सीधे तौर पर धर्म के आधार पर भेदभाव का मामला है। जो कि संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। इसलिए आईपीसी की धारा 494 को असंवैधानिक करार दे कर निरस्त कर देना चाहिए।

याचिका कर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि मुस्लिमों को प्राप्त इस विशेषाधिकार की वजह से समाज में बलात्कार जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। दौलतमंद और ताकतवर मुस्लिम कई शादियाँ कर रहे हैं जबकि गरीब मुस्लिमों को एक शादी भी नसीब नहीं हो रही, जिससे समाज में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। याचिका में कहा गया है कि अधिनियम 1937 महिलाओं को प्राप्त मौलिक और बुनियादी मानवाधिकारों का लिंग के आधार पर हनन करती है।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने केंद्र सरकार को छह हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। आईपीसी की धारा 494 की वैधता पर सवाल उठाए जाने पर कोर्ट ने अटार्नी जनरल को भी नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र की तरफ से जवाब दाखिल होने के बाद याचिका कर्ता को भी प्रत्युत्तर देने के लिए 2 हफ्ते का समय दिया जाएगा। अगली सुनवाई मई 2023 में होने की उम्मीद है। 

शरीयत कानून : मुस्लिम पर्सनल लॉ भेदभाव करता है, संविधान नहीं

एक मुस्लिम महिला ने शरीयत कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है। महिला ने अपनी याचिका में कहा है कि संपत्ति बँटवारे में उसे पुरुष सदस्यों की तुलना में आधा हिस्सा मिला, जो उसके साथ भेदभाव है। महिला ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान बराबरी का हक देता है, जबकि शरीयत कानून भेदभावपूर्ण है। ऐसे में उसने न्याय की गुहार लगाई।

बुशरा अली नाम की महिला ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में कहा कि उसके परिवार में जब संपत्ति का बँटवारा हुआ तो उसे 7/152 का हिस्सा दिया गया। महिला ने दावा किया कि वहीं पुरुषों को 14/152 का हिस्सा दिया गया, जो उसकी हिस्सेदारी से दोगुना है।

बुशरा अली ने कहा कि भारत का संविधान बराबरी का हक देता है। इसलिए वह संपत्ति का बँटवारा बराबरी के आधार पर चाहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई के बाद प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। बता दें कि मुस्लिमों में सिविल मामलों का निबटारा शरीयत कानून पर आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार होता है। इसमें महिलाओं को कई अधिकारों से महरूम रखा गया है।

बुशरा अली ने शरीयत कानून की धारा-2 को चुनौती देते हुए कहा कि संविधान की धारा-15 का उल्लंघन बताया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्ण मुरारी और संजय करोल ने प्रतिवादी इरफान मोहम्मद और संबंधित को नोटिस जारी किया।

मुस्लिमों के सिविल मामलों को शरीयत कानून के तहत देखा जाता है। इसमें महिलाओं के हक से संबंधित कई तरह की खामियाँ हैं। इनमें पुरुषों को चार शादियाँ, तलाक, तलाक के बाद गुजारा भत्ता, संपत्ति में बराबरी का हक, बच्चे को गोद लेने का मामला, बच्चों की कस्टडी, महिलाओं को वसीयत, दान आदि प्रमुख हैं।