Showing posts with label challenging. Show all posts
Showing posts with label challenging. Show all posts

ममता बनर्जी 75 मुस्लिम जातियों को बनाना चाहती थी OBC, सरकार ने बदला फैसला: SC से वापस लेगी याचिका, 1.69 करोड़ जाति प्रमाण पत्रों की होगी जाँच


पश्चिम बंगाल में नई BJP सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बड़ा फैसला लिया गया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस याचिका को वापस लेने का निर्णय किया है, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने 75 मुस्लिम और 2 हिंदू समुदायों समेत कुल 77 समुदायों का OBC दर्जा रद्द कर दिया था।

22 मई 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इन समुदायों को बिना उचित सामाजिक और शैक्षणिक सर्वे के केवल धार्मिक आधार पर OBC सूची में शामिल किया गया था, जो संविधान के खिलाफ है। ये समुदाय 2010 से 2012 के बीच पहले वाम मोर्चा सरकार और बाद में TMC सरकार के दौरान OBC सूची में जोड़े गए थे।

जबकि मुसलमानों में शिया, सुन्नी, पठान, अहमदी, वहाबी और पासमांदा आदि अनेकों फिरकों में इतना ज्यादा भेदभाव है कि कोई एक दूसरे की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकता दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकने के अलावा जातियों को मानते ही नहीं फिर सिर्फ वोट की सियासत में यह काम एकदम गलत है।      

कोर्ट ने 2010 के बाद जारी सभी OBC प्रमाणपत्रों को अमान्य कर दिया था और नौकरी व एडमिशन में उनके इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके तुरंत बाद ममता बनर्जी की सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेने की तैयारी

आनंदबाजार पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार के वकील कुनाल मिमानी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार को पत्र भेजकर इस मामले को वापस लेने की अनुमति माँगी है। सरकार ने मामले की जल्द सुनवाई की भी माँग की है। इस फैसले से 2010 के बाद जारी हुए करीब 5 लाख OBC प्रमाणपत्र प्रभावित हो सकते हैं।

इससे पहले वाम मोर्चा सरकार ने 42 मुस्लिम समुदायों और TMC सरकार ने 35 अन्य समुदायों को OBC सूची में शामिल किया था। बाद में 2023 में OBC रिजर्वेशन एक्ट भी लाया गया था।

1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्रों की होगी दोबारा जाँच

नई सरकार ने इसके साथ ही 2011 के बाद जारी सभी SC, ST और OBC प्रमाणपत्रों की दोबारा जाँच का आदेश भी दिया है। इसमें करीब 1.69 करोड़ दस्तावेज शामिल हैं। जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अधिकारी सभी प्रमाणपत्रों की जाँच करें और फर्जी या अनियमित पाए जाने पर कार्रवाई करें।

भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष तपस राय ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा, “TMC सरकार ने मनमाने ढंग से काम किया। उसने किसी कानून, संविधान या नियम का पालन नहीं किया। ओबीसी आरक्षण के मामले में भी यही हुआ है। नई सरकार ने सही कदम उठाया है।”

वहीं TMC प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा है, “पिछली सरकार ने जनता के हितों की रक्षा के लिए कदम उठाए थे। पार्टी नेतृत्व द्वारा नई सरकार के इस फैसले की कानूनी स्तर पर जाँच की जाएगी।”

भाजपा ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘वोट बैंक की राजनीति’ और पिछली सरकार के दौरान हुई अनियमितताओं का अंत बताया है। सरकार ने संकेत दिया है कि OBC सूची को संशोधित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँचे, एक नया, संवैधानिक रूप से अनुपालन करने वाला पिछड़ापन सर्वेक्षण कराया जाएगा।

हाई कोर्ट पहुँचे विभव कुमार कहा: ‘मेरी गिरफ्तारी अवैध, दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ हो जाँच’ : माँगा मुआवजा; सुनीता केजरीवाल के खिलाफ भी कोर्ट में वीडियो बनाने पर PIL

The News चैनल के अनुसार कोर्ट में अरविन्द केजरीवल की चल रही कार्यवाही का वीडियो बनाने के विरुद्ध PIL फाइल की गयी है, किसी अन्य चैनल से इस समाचार की पुष्टि तो नहीं की है, लेकिन अगर इस चैनल की माने तो मुसीबत केवल अरविन्द ही नहीं परिवार और पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

   

दूसरी ओर बिभव कुमार जिस दलील को लेकर हाई कोर्ट पहुंचा है, उसमे और केजरीवाल की दलीलों में बहुत समानताएं है। दोनों अपनी गिरफ़्तारी को अवैध बता रहे हैं। दोनों ही सबूतों और बयानों में नाम शामिल होने को गलत बता रहे हैं। दोनों ही अपने मोबाइल का पासवर्ड नहीं बता रहे।   

दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सहयोगी रहे विभव कुमार ने बुधवार (29 मई 2024) को दिल्ली हाईकोर्ट में अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ गुहार लगाई है। विभव ने गिरफ्तारी को पूरी तरह से 
‘अवैध’ बताया है। खबरों की मानें तो कुमार ने इस संबंध में एक रिट याचिका डाली है, जिसमें उन्होंने माँग की है कि उनकी गिरफ्तारी को अवैध करार दिया जाए, उन्हें इस अवैध गिरफ्तारी का मुआवजा मिले और जिसने उनके खिलाफ कार्रवाई की है उनपर एक्शन लिया जाए।

कुमार के खिलाफ दिल्ली राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल से मारपीट के आरोप हैं। मालीवाल ने पुलिस के बयान और अपने कई इंटरव्यू में बताया है कि कुमार ने सीएम आवास में उनसे साथ बदसलूकी की और उन्हें खूब मारा-पीटा।

मालीवाल के आरोपों के अनुसार, कुमार ने मालीवाल के साथ गाली-गलौच की। उन्हें इस तरह मारा की उनका सिर जाकर सेंटर टेबल से अड़ा। फिर उन्हें उठाया गया जिसमें उनके कुर्ते के बटन तक खुल गए। स्वाति बताती हैं कि इस घटना के दौरान वो खूब चिल्लाईं लेकिन कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया।

इस मामले में फिलहाल विभव न्यायिक हिरासत में है। कल उनकी हिरासत कोर्ट ने तीन दिन के लिए और बढ़ा दी है। उन्होंने पहले तीस हजारी कोर्ट में बेल की माँग की थी। हालाँकि कोर्ट ने स्वाति मालीवाल और दिल्ली पुलिस का पक्ष सुनने के बाद उन्हें बेल देने से मना कर दिया था।

स्वाति इस सुनवाई के दौरान रोने भी लगी थीं। उन्होंने कोर्ट में कहा था कि अगर विभव को रिहाई दी गई तो उनकी जान के लिए और उनके परिवार के लिए वो खतरा हो सकता है।


‘शरीयत एक्ट’ के खिलाफ HC में याचिका, केंद्र से माँगा जवाब ; शरीयत कानून : मुस्लिम पर्सनल लॉ भेदभाव करता है, संविधान नहीं

कट्टरपंथियों द्वारा नूपुर शर्मा के विरुद्ध 'सिर तन से जुदा' गैंग को सक्रीय करने से अब इस्लाम के ही विरुद्ध आवाज़ बुलंद होनी शुरू हो गयी है। नूपुर विवाद ने जयपुर डायलॉग, सच और न्यूज़ नेशन द्वारा 'इस्लाम क्या कहता है' आदि ने इस्लाम की उन कमियों को उजागर कर दिया है, जिन्हें ये कट्टरपंथी परदे में रख समस्त गैर-मुस्लिमों को बेवकूफ बना रहे थे। अभी तो शरीयत के खिलाफ आवाज़ उठी है, आगे-आगे देखिए हलाल, हलाला आदि कई मुद्दों पर कोर्ट के दरवाज़े खटखटाये जायेंगे।   
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 को चुनौती देने वाली याचिका पर भारत के अटॉर्नी जनरल को नोटिस जारी किया है। याचिका में आईपीसी की धारा 494 की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। ‘हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड’ द्वारा जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसपर जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने यह आदेश जारी किया।

‘पिछले दिनों कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान ‘हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड’ के वकील अशोक पाँडे ने कहा कि धारा 494 हिंदू, बौद्ध, सिख और ईसाई धर्म के मानने वालों पर लागू होती है।’ इसके तहत यदि व्यक्ति अपने पत्नी के रहते दूसरा विवाह करता है तो उसे मान्य नहीं माना जाएगा। साथ ही व्यक्ति को सात साल की कैद की सजा और जुर्माना लगा दिया जाएगा लेकिन देश के मुस्लिमों पर यह धारा लागू नहीं होती।

अदालत को जानकारी दी गई कि आईपीसी की धारा 494 मुस्लिमों पर इसलिए लागू नहीं होताी क्योंकि उन्हें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 के तहत सुरक्षा प्राप्त है। शरीयत अप्लीकेशन एक्ट मुस्लिम पुरुष को चार शादियाँ करने की इजाजत देता है। यह सीधे तौर पर धर्म के आधार पर भेदभाव का मामला है। जो कि संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। इसलिए आईपीसी की धारा 494 को असंवैधानिक करार दे कर निरस्त कर देना चाहिए।

याचिका कर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि मुस्लिमों को प्राप्त इस विशेषाधिकार की वजह से समाज में बलात्कार जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। दौलतमंद और ताकतवर मुस्लिम कई शादियाँ कर रहे हैं जबकि गरीब मुस्लिमों को एक शादी भी नसीब नहीं हो रही, जिससे समाज में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। याचिका में कहा गया है कि अधिनियम 1937 महिलाओं को प्राप्त मौलिक और बुनियादी मानवाधिकारों का लिंग के आधार पर हनन करती है।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने केंद्र सरकार को छह हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। आईपीसी की धारा 494 की वैधता पर सवाल उठाए जाने पर कोर्ट ने अटार्नी जनरल को भी नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र की तरफ से जवाब दाखिल होने के बाद याचिका कर्ता को भी प्रत्युत्तर देने के लिए 2 हफ्ते का समय दिया जाएगा। अगली सुनवाई मई 2023 में होने की उम्मीद है। 

शरीयत कानून : मुस्लिम पर्सनल लॉ भेदभाव करता है, संविधान नहीं

एक मुस्लिम महिला ने शरीयत कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है। महिला ने अपनी याचिका में कहा है कि संपत्ति बँटवारे में उसे पुरुष सदस्यों की तुलना में आधा हिस्सा मिला, जो उसके साथ भेदभाव है। महिला ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान बराबरी का हक देता है, जबकि शरीयत कानून भेदभावपूर्ण है। ऐसे में उसने न्याय की गुहार लगाई।

बुशरा अली नाम की महिला ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में कहा कि उसके परिवार में जब संपत्ति का बँटवारा हुआ तो उसे 7/152 का हिस्सा दिया गया। महिला ने दावा किया कि वहीं पुरुषों को 14/152 का हिस्सा दिया गया, जो उसकी हिस्सेदारी से दोगुना है।

बुशरा अली ने कहा कि भारत का संविधान बराबरी का हक देता है। इसलिए वह संपत्ति का बँटवारा बराबरी के आधार पर चाहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई के बाद प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। बता दें कि मुस्लिमों में सिविल मामलों का निबटारा शरीयत कानून पर आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार होता है। इसमें महिलाओं को कई अधिकारों से महरूम रखा गया है।

बुशरा अली ने शरीयत कानून की धारा-2 को चुनौती देते हुए कहा कि संविधान की धारा-15 का उल्लंघन बताया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्ण मुरारी और संजय करोल ने प्रतिवादी इरफान मोहम्मद और संबंधित को नोटिस जारी किया।

मुस्लिमों के सिविल मामलों को शरीयत कानून के तहत देखा जाता है। इसमें महिलाओं के हक से संबंधित कई तरह की खामियाँ हैं। इनमें पुरुषों को चार शादियाँ, तलाक, तलाक के बाद गुजारा भत्ता, संपत्ति में बराबरी का हक, बच्चे को गोद लेने का मामला, बच्चों की कस्टडी, महिलाओं को वसीयत, दान आदि प्रमुख हैं।

‘हिजाब पहनना इस्लाम में जरूरी मजहबी प्रथा नहीं’: कर्नाटक बुर्का विवाद में HC

हिजाब विवाद को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट में आज (18 फरवरी, 2022) छटवें दिन भी सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता पक्ष के वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। आज भी इस मामले पर फैसले की उम्मीद की जा रही है। आज कोर्ट में बाकी बची 7 याचिकाओं के आधार पर ही सुनवाई हुई। आज की सुनवाई एटॉर्नी जनरल (AG) प्रभुलिंग नवदगी की दलीलों से हुई।

इस दौरान सरकार की तरफ से एडवोकेट जनरल (AG) ने कहा कि हिजाब इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं है। 14 फरवरी से लगातार चीफ जस्टिस ऋतुराज अवस्‍थी, जस्टिस कृष्‍णा एस दीक्षित, जस्टिस जैबुन्निसा मोहियुद्दीन काजी की बड़ी बेंच इस मामले पर सुनवाई कर रही है। इससे पहले कोर्ट में छात्राओं की तरफ ह‍िजाब के पक्ष में दलीलें दी गईं थीं।

एडवोकेट जनरल द्वारा यह कहना कि 'हिजाब इस्लाम का जरुरी हिस्सा नहीं", स्मरण करवाता है आर्गेनाइजर साप्तहिक के पूर्व संपादक प्रो वेद प्रकाश भाटिया(स्व) ने अपने जीवनकाल में अपने प्रतिष्ठित स्तम्भ Cabbages & Kings, जिसमें कई बार उन्होंने लिखा कि "burqa is not an Islamic culture...there many times boys having attractive and charming face were forced to keep in burqa..." लेकिन किसी ने उनके लेख का खंडन तक नहीं किया। प्रमाण के लिए कोई भी व्यक्ति वर्तमान सम्पादक की आज्ञा से कभी भी Organiser Weekly कार्यालय जाकर उन अंकों को पढ़ सकता है।    

मामले में सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए एडवोकेट जनरल ने कहा, “2018 में वर्दी निर्धारित थी। दिसंबर 2021 तक कोई समस्या नहीं आई। छात्राओं के एक समूह जो याचिकाकर्ता भी हैं, उन्होंने प्रिंसिपल से संपर्क किया और जोर देकर कहा कि वे हिजाब पहनकर कॉलेज में आएँगी। 31 दिसंबर से यह घटना तब हुई जब कुछ लड़कियों ने प्रिंसिपल के पास जाकर कहा कि वे हिजाब पहनकर ही कॉलेज में प्रवेश करेंगी। जब यह जिद हुई तो सीडीसी ने जाँच करना चाहा। सीडीसी की अध्यक्षता विधायक ने 01.01.2022 को की।

वहीं कल की सुनवाई में 5 छात्राओं के वकील एएम डार ने कोर्ट से माँग की कि सरकार के आदेश से उन लोगों पर असर पड़ेगा जो हिजाब पहनते हैं। यह असंवैधानिक है।

आज की सुनवाई की खास बातें

कर्नाटक HC ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की
सीनियर एडवोकेट एएम डार ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट की आपत्ति को देखते हुए उन्होंने 5 छात्राओं की ओर से नई याचिका दायर की है। याचिका पर 21 फरवरी को सुनवाई करेगी कोर्ट।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रोफेसर रविवर्मा कुमार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय से लाइव-स्ट्रीमिंग कार्यवाही को बंद करने और निलंबित करने का आग्रह किया। कुमार का कहना है कि लाइव स्ट्रीमिंग उल्टा हो गया है।
कर्नाटक एचसी का कहना है कि लोगों को सुनने दें कि उत्तरदाताओं का क्या रुख है।
चीफ जस्टिस: आप खुद कह रहे हैं कि हिजाब हटाने के लिए कोई रोकथाम या बल नहीं था, अब कुछ विरोधी तत्व उन्हें हिजाब हटाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
वकील : कॉलेज प्रशासन भी इजाजत नहीं दे रहा है।
सीजे: आपने याचिका में जो उल्लेख किया है वह, वह नहीं है जो आप कह रहे हैं
अहमद : इस न्यायालय का आदेश सभी को स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आ रहा है। हर वो संस्था जहाँ पहले हिजाब की अनुमति थी, अब बंद हो रही है।
सीजे: क्या आप सरकारी कॉलेज में पढ़ रहे हैं?
अहमद कहते हैं एक निजी कॉलेज।
सीजे : कॉलेज को पार्टी नहीं बनाया गया है।
जस्टिस दीक्षित : यह कहने का हक कहाँ है कि कॉलेज विरोध कर रहा है। उनका कहना है कि असामाजिक तत्व रोक रहे हैं। उनमें से किसी को भी पार्टी नहीं बनाया गया है। कॉलेज को पार्टी नहीं बनाया गया है।
जस्टिस दीक्षित : एक भी असामाजिक तत्व को पार्टी नहीं बनाया गया है। पार्टी नहीं बनाने के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। इस याचिका पर कैसे विचार किया जा सकता है?
सीजे : बेहतर होगा कि आप उचित याचिका दायर करें। उचित व्यवस्थाएं करें। कॉलेज को पार्टी नहीं बनाया गया है। यह कैसी याचिका है!
अहमद ने कॉलेज को जोड़ने के लिए याचिका में संशोधन की अनुमति माँगी, जिसे कोर्ट ने उन्हें प्रदान किया।
अधिवक्ता कीर्ति सिंह अब एक महिला संघ और एक मुस्लिम महिला द्वारा दायर जनहित याचिका में दलीलें पेश करती हैं।
सिंह: हमने हाई कोर्ट के नियम के मुताबिक डिक्लेरेशन फाइल नहीं किया था, अब हमने फाइल कर दी है और उसी के मुताबिक हमारी सुनवाई हो सकती है।
अधिवक्ता जी आर मोहन अब कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान प्रबंधन संघ के लिए उपस्थित हो रहे हैं।
मोहन : याचिकाकर्ता अल्पसंख्यक संस्थाओं का संघ है जो अनुच्छेद 29 और 30 द्वारा संरक्षित है।
सीजे : क्या याचिकाकर्ता एक पंजीकृत निकाय है?
मोहन : हाँ।
सीजे : सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत?
मोहन : हाँ।
सीजे: फाइलिंग को अधिकृत करने वाला सोसायटी का संकल्प कहाँ है।
मोहन : सभापति स्वयं यह याचिका दाखिल कर रहे हैं।
सीजे : क्या अध्यक्ष अधिकृत है? हमें उपनियम दिखाओ।
मोहन: मैं प्राधिकरण प्रस्तुत करूंगा। हमने पहले भी कई WP दायर किए हैं। यह मुद्दा कभी नहीं आया।
सीजे: यह चौंकाने वाला है, सिर्फ इसलिए कि आपसे पहले नहीं पूछा गया है।
एजी: जैसा कि मैंने समझा है, विवाद तीन व्यापक श्रेणियों में आता है। सबसे पहले, आदेश दिनांक 05.02.2022, मेरा पहला निवेदन यह है कि आदेश शिक्षा अधिनियम के अनुरूप है।
एजी : दूसरा अधिक ठोस तर्क है कि हिजाब एक अनिवार्य हिस्सा है। हमने यह स्टैंड लिया है कि हिजाब पहनना इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा के अंतर्गत नहीं आता है। कर्नाटक के महाधिवक्ता ने कर्नाटक उच्च न्यायालय को बताया।
एजी: तीसरा यह है कि हिजाब पहनने का यह अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (ए) से पता लगाया जा सकता है। सबमिशन है कि यह ऐसा नहीं करता है।
एजी: सबरीमाला और शायरा बानो (ट्रिपल तालक) मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए के अनुसार हिजाब को संवैधानिक नैतिकता और व्यक्तिगत गरिमा की परीक्षा पास करनी चाहिए। यह सकारात्मक प्रस्ताव है जिस पर हम स्वतंत्र रूप से बहस कर रहे हैं।
AG: यदि कोई सीडीसी हिजाब पहनने की अनुमति देता है तो शिक्षा अधिनियम की धारा 131 के तहत हमारे पास पुनरीक्षण शक्तियाँ हैं और यदि कोई आपत्ति है तो राज्य निर्णय ले सकता है। अभी तक के आदेश में हमने सीडीसी को स्वायत्तता दी है।
जस्टिस दीक्षित: आपने ठीक से यह नहीं बताया कि हिजाब पहनना प्रतिबंधित नहीं है। लेकिन ये आदेश आम लोगों, शिक्षकों, सीडीसी के छात्र सदस्यों के लिए हैं, वे इसकी व्याख्या कैसे करेंगे?
CJ: GO में निर्णयों का उल्लेख करने की क्या आवश्यकता थी?
AG: इस मुद्दे को हमने संस्थानों की पूर्ण स्वायत्तता पर छोड़ दिया है। मैं GO में कही गई बातों से आगे नहीं बढ़ सकता। यदि यह संस्थानों को संकेत देता है, तो निश्चित रूप से यह कुछ ऐसा है जिसे संस्थानों को समझना चाहिए।
CJ: हम इन निर्णयों का उल्लेख करने और आपके निष्कर्ष को रिकॉर्ड करने और फिर GO पास करने की आवश्यकता जानना चाहते थे?
AG: एक बेहतर सलाह पर इनसे बचा जा सकता था। लेकिन वह चरण बीत चुका है।
CJ: ऐसा लगता है कि वे आपकी सलाह नहीं लेते हैं। एजी मुस्कराते हैं।
AG: इस आदेश के बाद, रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो देखो राज्य ने हमें बताया है इसलिए हम (संस्थान) यह आदेश पारित कर रहे हैं।
AG का कहना है कि जीओ को समझना होगा कि वह आखिरकार क्या निर्देश देता है और याचिकाकर्ताओं की ओर से यह कहना गलत है कि यह सांप्रदायिक है।
AG: सीपीसी में किसी निष्कर्ष के खिलाफ अपील दायर करने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि संचालन आदेश किसी के पक्ष में है, तो निष्कर्षों को चुनौती देने की कोई गुंजाइश नहीं है।
AG: मुझे नहीं पता कि उच्च स्तरीय कमेटी को लेकर सरकार का क्या मन है।
CJ: क्या GO समय से पहले था? क्योंकि एक तरफ आप कहते हैं कि एक उच्च स्तरीय समिति मामले की जांच कर रही है और दूसरी तरफ आप ऐसा कहते हैं? क्या यह राज्य के विरोधाभासी रुख के बराबर नहीं होगा?
CJ: आपने यह भी कहा है कि राज्य को अभी ड्रेस के संबंध में निर्णय लेना है?
AG: हाँ।
जस्टिस दीक्षित: कम से कम आपको तो कहना चाहिए था कि हमने एक कमेटी बनाने का फैसला किया है। लेकिन आपने ऐसा नहीं कहा।
जस्टिस दीक्षित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को संदर्भित करते हैं जो कहता है कि एक आदेश को उसमें कही गई बातों के आधार पर समझा जाना चाहिए और बाद की दलीलों से इसमें सुधार नहीं हो सकता है।
AG: यह अधिनियम आईसीएसई, सीबीएसई संस्थानों को छोड़कर सभी संस्थानों पर लागू होता है। अधिनियम की धारा 2 (14) पढ़ता है।
AG: अधिनियम की धारा 38 सरकारी पीयू कॉलेजों का ख्याल रखती है।
एडवोकेट जनरल अब रवि वर्मा कुमार के तर्क का जवाब दे रहे हैं कि कॉलेज विकास समिति शिक्षा अधिनियम द्वारा मान्यता प्राप्त प्राधिकरण नहीं है। उन्‍होंने शिक्षा अधिनियम की प्रस्तावना पढ़ी- यह अधिनियम छात्र समुदाय की बेहतरी के लिए है।
AG: चूँकि हम कॉलेज विकास समिति के मुद्दे को संबोधित कर रहे हैं, दिलचस्प बात यह है कि एक सरकारी पीयू कॉलेज के लिए प्रबंध समिति की कोई अवधारणा नहीं है।
एडवोकेट जनरल शिक्षा अधिनियम की धारा 133(2) की बात करते हैं जो राज्य को अवशिष्ट शक्तियाँ प्रदान करता है। निजी कॉलेजों में एक प्रबंध समिति होती है। सरकार द्वारा संचालित पीयू कॉलेजों में, कोई प्रबंध समिति नहीं होती है।
CJ: आपने जो सर्कुलर दिखाया है जो सीडीसी का गठन करता है, एक अवर सचिव द्वारा जारी किया गया है। क्या इसे धारा 133 के तहत आदेश माना जा सकता है?
AG: यह 133 का पता लगाना है।
CJ: यह सरकारी आदेश नहीं है, यह अधिसूचना नहीं है। यह अंडर-सिक्योर द्वारा एक सर्कुलर है।
AG: हमने धारा 133 (2) (सीडीसी के गठन के लिए) का प्रयोग किया है। अगर हमने प्रिंसिपल को दिया होता तो रविवर्मा कुमार कहते कि आपने इसे एक कर्मचारी को दिया है। कृपया सीडीसी के संविधान को देखें, इससे अधिक प्रतिनिधि चरित्र नहीं हो सकता।
AG: इस तरह के परिपत्र सरकार के अनुमोदन से जारी किए जाते हैं।
CJ: क्या वहाँ सरकार की मंजूरी थी?
AG: निश्चित रूप से हाँ। मैं रिकॉर्ड रख सकता हूँ। जहाँ एक विधायक को समिति में नियुक्त किया जाता है, वह सरकार की मंजूरी के बिना नहीं होता।
AG: कृपया अनुच्छेद 25(1) पर आएँ।
CJ: मिस्टर युसूफ का एक तर्क था। भले ही इसे हिजाब पहने हुए ईआरपी के रूप में नहीं माना जाता है, फिर भी इसे पहनना बंद करना अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होगा क्योंकि यह न केवल धर्म की स्वतंत्रता के बारे में है बल्कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बारे में है।
AG: नहीं, हिजाब पहनने की अनुमति नहीं देने की शिकायत राज्य में नहीं आया है। एक सामान्य छात्र से एक प्रतिनिधित्व देने की अपेक्षा की जाती। ड्रेस की बात होती तो मिलोर्ड्स आ जाते.. मैं इसे वहीं छोड़ देता हूँ।

शुक्रवार और रमजान में हिजाब पहनने की छूट मिले

फरवरी 17 को हुई सुनवाई में हिजाब को लेकर लगाई गई एक अन्य याचिका में डॉ. कुलकर्णी ने कोर्ट के सामने कहा कि कृपया शुक्रवार और रमजान के दौरान हिजाब पहनने की अनुमति दें। अधिवक्ता विनोद कुलकर्णी ने कर्नाटक हाईकोर्ट से यह भी कहा था कि यह मुद्दा उन्माद पैदा कर रहा है और मुस्लिम लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।
फरवरी 17 को ही 5 छात्राओं का प्रतिनिधित्व करने वाले सीनियर वकील एएम डार ने कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष कहा कि हिजाब पर सरकार के आदेश से उनके मुवक्किलों पर असर पड़ेगा जो हिजाब पहनते हैं। उन्होंने कहा कि यह आदेश असंवैधानिक है। अदालत ने डार से अपनी वर्तमान याचिका वापस लेने और नई याचिका दायर करने को कहा।
वहीं 5वें दिन की सुनवाई के बीच नई याचिकाएँ आने पर चीफ जस्टिस ने याचिकर्ताओं से कहा कि हम चार याचिकाएँ सुन चुके हैं और 4 बाकी हैं। हमें नहीं पता कि आप इसके लिए और कितना टाइम लेंगे। हम इसके लिए और ज्यादा समय नहीं दे सकते।

बेंच ने ख़ारिज की एक याचिका

बेंच ने एडवोकेट रहमतुल्लाह कोटवाल की याचिका, जनहित याचिका अधिनियम 2018 के तहत न होने के कारण खारिज कर दी। इसके पहले वकील ने बिना पहचान बताए ही दलील शुरू की तो जस्टिस दीक्षित ने उनसे पूछा कि आप इतने महत्वपूर्ण और गंभीर मामले में कोर्ट का समय बर्बाद कर रहे हैं। पहले अपनी पहचान बताओ, तुम हो कौन?

बुधवार को दी गई थीं ये दलीलें

इससे पहले हिजाब मामले पर फरवरी 16 को भी सुनवाई हुई थी। इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से जिरह करते हुए अधिवक्ता रवि वर्मा कुमार ने कहा कि अकेले हिजाब का ही जिक्र क्यों है जब दुपट्टा, चूड़ियाँ, पगड़ी, क्रॉस और बिंदी जैसे सैकड़ों धार्मिक प्रतीक चिन्ह लोगों द्वारा रोजाना पहने जाते हैं।
वकील रवि वर्मा ने कहा कि मैं केवल समाज के सभी वर्गों में धार्मिक प्रतीकों की विविधता को उजागर कर रहा हूँ। सरकार अकेले हिजाब को चुनकर भेदभाव क्यों कर रही है? चूड़ियाँ पहनी जाती हैं? क्या वे धार्मिक प्रतीक नहीं है? कुमार ने कहा, यह केवल उनके धर्म के कारण है कि याचिककर्ता को कक्षा से बाहर भेजा जा रहा है। बिंदी लगाने वाली लड़की को बाहर नहीं भेजा जा रहा, चूड़ी पहने वाली लड़की को भी नहीं। क्रॉस पहनने वाली ईसाई लड़कियों को भी नहीं, केवल इन्हें ही क्यों। यह संविधान के आर्टिकल-15 का उल्लंघन है।