Showing posts with label hijab. Show all posts
Showing posts with label hijab. Show all posts

IAS-IPS, डाॅक्टर… कुछ भी बने मुस्लिम औरत पर रहे हिजाब में ही: खुले बाल को बताया ‘शैतान की रस्सी’, मेकअप लगाने से भी मना किया: सांसद बदरुद्दीन अजमल

असम के मुस्लिम नेता और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने मुस्लिम महिलाओं के पहनावे को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अच्छे पेशों वाली महिलाओं को हिजाब पहनना चाहिए वरना उन्हें कोई मुस्लिम के तौर पर नहीं पहचानेगा। उनके इस बयान पर विवाद हो गया है।
पिछले वर्ष मार्च 16, 2023 को शीर्षक "महिला द्वारा खुले बाल रखना शोक और अशुद्धि की प्रतीक",(देखिए नीचे दिए लिंक को) जिसमे हिन्दू संस्कृति में महिलाओं द्वारा केश(बाल) का खुले रखने के दुष्प्रभाव पर रौशनी डालने का प्रयास किया, लेकिन उसी बात को बदरुद्दीन द्वारा इस्लामिक तरीके से बताया। यानि कहने का तात्पर्य यह कि हिन्दू संस्कृति जिस बात को सत(सत्य) युग से निर्देश दिए जा रहे है।   

AIUDF सुप्रीमो बदरुद्दीन ने यह बयान असम के करीमगंज में एक जनसभा में दिया। उन्होंने कहा कि अच्छे पेशे में लगी महिलाएँ जैसे कि IAS, IPS और डॉक्टरों के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे उनकी मुस्लिम पहचान का पता लगेगा।

उन्होंने कहा, “अगर मुस्लिम महिलाएँ अपने बाल नहीं ढकेंगी या हिजाब नहीं पहनेंगी तो उन्हें मुस्लिम के तौर पर कैसे पहचाना जाएगा?”

उन्होंने बताया कि हिजाब मुस्लिम महिलाओं के लिए एक विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि खुले बाल शैतान की रस्सी होते हैं और महिलाओं का मेकअप लगाना शैतानों वाला काम है।

बदरुद्दीन अजमल ने कहा, “मैं जब बाहर जाता हूँ तो देखता हूँ कि मुस्लिम लडकियाँ हिजाब पहने हुए होती हैं और सर नीचे की तरफ करके आँखे झुका कर चलती हैं। असम में मुस्लिम लड़कियाँ ऐसा नहीं करती, सर के बाल छुपा के रखना इस्लाम में है।”

अजमल ने करीमगंज में एक मस्जिद और कब्रिस्तान का शिलान्यास करने के दौरान यह विवादित बयान दिया। इससे पहले उन्होंने एक बयान में कहा था, “ज्यादातर मुसलमान आपराधिक प्रवृति के पृष्ठभूमि के क्यों हैं? डकैती, बलात्कार, लूट जैसे अपराधों में मुसलमान नंबर वन क्यों हैं? हम जेल जाने में नंबर वन क्यों हैं? क्योंकि ज्यादातर मुस्लिम पढ़ाई नहीं करना चाहते हैं।”

अवलोकन करें:-

महिला द्वारा खुले बाल रखना शोक और अशुद्धि की प्रतीक

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
महिला द्वारा खुले बाल रखना शोक और अशुद्धि की प्रतीक
आजकल महिलाएं फैशन के चलते खुले केश रख कैसा अनर्थ कर रही है, शायद वह पश्चिमी सभ्यता के आगे अपनी ही भारतीय संस्कृति का...

इस मामले में इंडिया टुडे से बातचीत में बदरुद्दीन अजमल ने बाद में अपनी सफाई पेश की थी। उन्होंने कहा था, “मैंने दुनिया भर के मुसलमानों में शिक्षा की कमी देखी है। मुझे बहुत दुख है कि मुस्लिम पढ़ाई नहीं करते, उच्च शिक्षा के लिए नहीं जाते। यहाँ तक कि मैट्रिक की परीक्षा तक पास नहीं कर पाते। इसीलिए वो अपराध की दुनिया में निकल जाते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मैं चाहता हूँ कि मुस्लिम बच्चे ज्यादा से ज्यादा पढ़ाई करें और अच्छे रास्ते पर चलें।”

फ्रांस : हिजाब, नकाब के बाद एक और प्रतिबंध : मुस्लिम लड़कियाँ अबाया पहन कर नहीं जा सकेंगी स्कूल: सरकार ने लगाया बैन

                                                                                                                        साभार: GcShutter
फ्रांस की सरकार ने स्कूल में मुस्लिम लड़कियों के अबाया पहनने पर प्रतिबंध (France to ban muslim abaya dresses in schools) का ऐलान किया। इसको लेकर शिक्षा मंत्री गेब्रियल अट्टल ने रविवार (27 अगस्त, 2023) को कहा है कि किसी भी क्लास रूम में छात्रों को देखकर उनके धर्म की पहचान नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार अबाया पहनना फ्रांस के धर्म निरपेक्ष कानून का उल्लंघन है। फ्रांस में पहले से ही स्कूलों में हेडस्कार्फ और नकाब पहने पर प्रतिबंध लगा हुआ है।

फ्रांस के शिक्षा मंत्री गेब्रियल अट्टल ने टीवी चैनल टीएफ1 को एक इंटरव्यू दिया है। इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा: “मैंने फैसला किया है कि अब स्कूलों में अबाया नहीं पहना जा सकता। जब आप किसी क्लास में जाते हैं तो छात्रों को देखने भर से उनके धर्म की पहचान नहीं होनी चाहिए।”

अट्टल ने यह भी कहा है कि स्कूल में मुस्लिम छात्राओं द्वारा पहने जाने वाले अबाया पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। 4 सितंबर से देशभर में क्लास शुरू हो रहे हैं। इससे पहले ही नियम बनाकर स्कूल के प्रमुखों को इस बारे में जानकारी दे देंगे। अट्टल ने अबाया को धार्मिक पहचान बताते हुए कहा है कि इसे पहनने से फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष कानूनों का उल्लंघन होता है।

इससे पहले साल 2004 में फ्रांस सरकार ने स्कूलों की ‘यूनिफॉर्म’ को लेकर एक कानून बनाया था। इस कानून के तहत स्कूलों में ऐसे किसी भी प्रतीक चिह्न या कपड़े पहनने पर रोक लगा दी गई थी, जिससे छात्रों की धार्मिक पहचान का पता चलता हो। सीधे शब्दों में कहें तो फ्रांस ने स्कूलों में बड़े क्रॉस, यहूदी किप्पा या इस्लामी हेडस्कार्फ पहनने पर रोक लगा दी थी।

साल 2010 से फ्रांस में सार्वजनिक रूप से पूरे चेहरे पर नकाब पहनने पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है। इसके बाद भी मुस्लिम लड़कियाँ स्कूलों में अबाया पहनकर जाती थीं। इसलिए सरकार ने कदम उठाते हुए इस पर बैन का ऐलान किया।

अबाया मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली एक पोशाक है। आमतौर पर यह ढीला-ढाला सा और काले रंग का होता है। इसे सामान्य कपड़ों के ऊपर ही पहना जाता है। इसमें महिलाओं का शरीर कंधे से पैर तक ढका रहता है। केवल हाथ और पैर की उंगलियों सहित उनका सिर दिखाई देता है। ज्यादातर महिलाएँ अपने बालों को ढँकने के लिए इसके साथ स्कार्फ भी पहनती हैं। 

ईरान में हिजाब पहनवाने के लिए फिर से एक्टिव हुई ‘मोरैलिटी पुलिस’, महिलाओं को निर्देश- सिर ढको, ढीले कपड़े पहनो : ‘…क्या तुम्हारे ऊपर बलात्कारी को छोड़ दें’

                                      ईरान में फिर से मोरैलटी पुलिस करेगी पेट्रोलिंग (तस्वीर साभार: BBC)
ईरान में हुए हिजाब विरोधी प्रदर्शन के महीनों बाद अब फिर से वहाँ ‘मोरैलिटी पुलिस (Morality Police)’ पैट्रोलिंग करने लगी है। ईरान के लॉ इन्फोर्समेंट फोर्स के प्रवक्ता सईद मोंटाजेरालमहदी ने रविवार (17 मार्च 2023) को जानकारी दी कि मोरैलिटी पुलिस अब फिर से काम करने लगी है। वो पैदल और गाड़ियों से उन लोगों को पकड़ेंगे जो इस्लामी देश में उस हिसाब से खुद को ढककर नहीं रखते।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, प्रवक्ता ने बताया कि मोरैलटी पुलिस पहले चेतावनी देगी और उसके बाद कानूनी कार्रवाई करेगी। इनसे बचने के लिए ड्रेस कोड का पालन करना जरूरी होगा। जैसे महिलाओं को हेडस्कार्फ के साथ ढीले कपड़े पहनने होंगे। अगर महिलाएँ ऐसे नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती हैं तो उन्हें गिरफ्तार करके री-एड्यूकेशन फैसिलिटी में डाल दिया जाएगा।

10 माह पहले ईरान में मोरैलटी पुलिस द्वारा पिटाई किए जाने के बाद महसा अमीनी की मौत हो गई थी। घटना के चलते पूरे देश भर में प्रदर्शन हुए थे। जिसके कुछ महीनों तक कहीं कोई मौरैलटी पुलिस नहीं दिखाई दी। वहीं हिजाब नियमों का उल्लंघन करने वालों को पकड़ने के लिए कैमरे लगाए गए थे। उनके जरिए निगरानी करके लोगों को चेतावनी दी जा रही थी या फिर जुर्माना लगाया जा रहा था। इसके अलावा कुछ लोगों को कोर्ट में पेश होने के लिए भी कहा गया था।

ईरान में ड्रेस कोड फॉलो करने के लिए नियम इतने सख्त हैं कि अगर कोई कार में बैठे हुए भी इनका उल्लंघन किए दिखता है तो उसकी कार जब्त कर ली जाती है। इसके अलावा कैफे, रेस्टोरेंट, शॉपिंग सेंटर्स आदि पर भी सख्त नजर बनाकर रखी जाती है।

बताया जा रहा है कि इस हफ्ते हिजाब संबंधी कई हाई प्रोफाइल मामले सामने थे। ऐसे में प्रशासन ने एक वीडियो जारी की थी। इसमें पुलिस अधिकारियों के साथ उनकी कैमरा क्रू भी थी। वो महिलाओं के पास जा जाकर हिजाब ठीक करने को कह रहे थे। वीडियो में महिलाओं का चेहरा तक ब्लर नहीं किया गया था। बस एनिमेशन के जरिए बताया जा रहा था कि उनकी पहचान हो गई है और अब बात कानून तक जाएगी।

वीडियो में कहा जा रहा था- या तो अपना हिजाब ठीक करो, वरना वैन में घुसो। महिला से ये भी बोला जा रहा था- “तुम अगर आजादी पर विश्वास रखती हो तो हम तुम पर सारे चोर और बलात्कारियों को छोड़ देते हैं फिर तुम समझोगी की चीजें कैसे काम करती हैं।”

इसी तरह ईरान में हिजाब के खिलाफ बोलने पर एक्टर मोहम्मद सादेगेही को गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने एक महिला के साथ बदसलूकी की तस्वीर पर प्रतिक्रिया दी थी, “अगर मैं ऐसे दृश्य देखूँ तो मैं तो मर्डर कर लूँ। देखते जाओ लोग तुम्हें मार देंगे…।” उनके इसी बयान पर ईरानी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। इससे पहले ईरान में एक एक्ट्रेस अजादेह समादी पर 6 महीने तक सोशल मीडिया न यूज करने के लिए बैन लगाया गया था। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि वो एक थिएटर डायरेक्टर के अंतिम शव यात्रा में बिन हेडस्कार्फ चली थी। 

सऊदी अरब : स्कूली छात्राओं ने हिजाब-बुर्का निकाल कर फेंका, पाँव तले कुचला

बुर्का उतारतीं छात्राएँ (फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट)
सऊदी अरब के केंद्रीय क्षेत्र अल कासिम के एक स्कूल में “होराइजन्स” नामक स्टेज शो के दौरान स्कूली छात्राओं द्वारा अबाया (बुर्का) उतार कर फेंकने के बाद विवाद बढ़ गया है। विवाद को देखते हुए शिक्षा अधिकारियों ने इसकी जाँच करने का वादा किया है।

दरअसल, एक स्कूल के स्टेज शो के एक ऑनलाइन वीडियो में एक दृश्य दिखाया गया, जिसमें स्कूली छात्राओं का एक समूह अपने काले बुर्के को उतारता है और उन पर चलकर हाथों में रोशनी वाली एक गेंद पकड़े हुए अपने सहयोगी की ओर बढ़ती हैं।

विवाद बढ़ने के बाद सऊदी अरब के अधिकारियों ने इसकी जाँच का आदेश दिया है। इसके साथ ही स्कूल समारोहों के कार्यक्रमों की निगरानी करने और उनकी सामग्री को संशोधित करने के लिए एक समिति के गठन का भी आदेश दिया।

अल कासिम के शिक्षा अधिकारियों ने एक बयान में कहा कि इस कदम का उद्देश्य ‘इस्लामी मूल्यों और शिक्षाओं’ के अनुरूप शैक्षिक भूमिका को निर्देशित करना है। बता दें कि यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह शो कब और कहाँ प्रदर्शित किया गया था।

हाल के वर्षों में इस्लामी मुल्क सऊदी अरब ने बाहरी दुनिया से कदम मिलाने के लिए मुल्क में थिएटर और संगीत सहित मनोरंजन के साधनों को मंजूरी दी थी। इसे एक बड़े सामाजिक परिवर्तन के तौर पर देखा गया।

फरवरी 2020 में सऊदी अरब के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक सरकारी एजेंसी के रूप में संगीत आयोग की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य संगीत क्षेत्र में विकास को देखना और संगीत शिक्षा तक सबकी पहुँच प्रदान करना था। पिछले सितंबर में एक सरकारी अधिकारी ने कहा था कि दो साल में संगीत शिक्षा किंडरगार्टन स्तर से पढ़ाया जाने लगेगा।

इतना ही नहीं, अप्रैल 2021 में भारत के दो प्रमुख धर्मग्रंथों- रामायण, महाभारत और आयुर्वेद को भी सऊदी अरब के स्कूलों में पढ़ाए जाने की मंजूरी दी गई थी। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इन ग्रंथों को स्कूली पाठ्यक्रमों में शामिल करने का निर्देश दिया था। उम्मीद है कि जल्दी ही इसे पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाएगा।


क्या हिजाब, गोहत्या और धर्मांतरण पर कानून बदलेगी कर्नाटक की कांग्रेस सरकार, एमनेस्टी की माँग पर खड़गे के मंत्री बेटे प्रियांक खड़गे

कर्नाटक में सरकार बनाते ही कांग्रेस ने अपने वादे के अनुसार मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनानी शुरू कर दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे और कर्नाटक सरकार में राज्यमंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा कि राज्य मे हिजाब पर प्रतिबंध, गोवध प्रतिबंध और धर्मांतरण कानून सहित अन्य मामलों पर विचार किया जाएगा।

स्वतंत्रता मिलने से पूर्व से ही हिन्दू का निरंतर उपहास हो रहा है, लेकिन हिन्दू आज तक अपने दुश्मनों को नहीं पहचान पा रहा या अनदेखा कर रहा है। चुनावी हिन्दुओं के षड्यंत्र में फंस सनातन विरोधियों को वोट देकर, मोदी और योगी की ओर उनकी सहायता करने के लिए देखते हैं। लेकिन फ्री रेवड़ियों के लालच में अपने विरोधियों को वोट दे आते हैं।  

कर्नाटक के सिद्धारमैया सरकार में राज्यमंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा, “हम अपने रुख को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। हम ऐसे किसी भी कार्यकारी आदेश की समीक्षा करेंगे, हम किसी भी विधेयक की समीक्षा करेंगे जो कर्नाटक की आर्थिक नीतियों के प्रतिकूल है। जो राज्य की खराब छवि प्रस्तुत करता है।”

उन्होंने आगे कहा, “कोई भी विधेयक जो आर्थिक गतिविधियों के लिए उपयोग नहीं किया जाता है, कोई भी विधेयक जो रोजगार पैदा नहीं करता है, कोई भी विधेयक जो किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन करता है, कोई भी विधेयक जो असंवैधानिक है उसकी समीक्षा की जाएगी और यदि आवश्यक हुआ तो उसे रद्द किया जाएगा।”

बताते चलें कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते ही मानवाधिकार के नाम पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने अपनी तीन प्रमुख माँगें रखी थीं। उसने कहा था कि कर्नाटक में हिजाब पर प्रतिबंध, धर्मांतरण विरोधी कानून और गोवध कानून का सरकार समीक्षा करेगी।

एमनेस्टी इंडिया ने अपनी पहली माँग में शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के हिजाब पहनने पर लगे प्रतिबंध को हटाने को कहा। उसने कहा, “यह प्रतिबंध मुस्लिम लड़कियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार के बीच चयन करने के लिए मजबूर करता है। इससे समाज में सार्थक रूप से भाग लेने की उनकी क्षमता बाधित होती है।”

अपनी दूसरी माँग में पशु क्रूरता (रोकथाम) अधिनियम 2020 और कर्नाटक धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण विधेयक 2022 के प्रावधानों की समीक्षा करने और उन्हें निरस्त करने के लिए कहा। दूसरे शब्दों में, एमनेस्टी इंडिया ने कर्नाटक में गोहत्या की अनुमति और हिंदू विरोधी ताकतों को राज्य में धर्मांतरण रैकेट (लव जिहाद) चलाने की माँग की है।

एमनेस्टी इंडिया ने अपने ट्वीट में आगे कहा कि गोवध और धर्मांतरण पर बने कानून का दुरुपयोग हो सकता है और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, एमनेस्टी इंडिया ने मुस्लिम विक्रेताओं का बहिष्कार करने वाले हिंदुओं के खिलाफ कार्रवाई का आह्वान किया।

अपनी तीसरी माँग को लेकर एमनेस्टी ने कहा, “राज्य में चुनावों से पहले मुस्लिम के आर्थिक बहिष्कार और उनके खिलाफ हिंसा का आह्वान किया गया था। धर्म-जाति आधारित भेदभाव से प्रेरित घृणा और घृणित अपराधों को समाप्त करने के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करें।” दिलचस्प बात यह है कि ऐसी कई रिपोर्ट आई हैं, जिनमें मुस्लिमों ने हिंदू व्यवसायों का बहिष्कार करने का आह्वान किया है, लेकिन एमनेस्टी ने इसे कभी भी घृणित नहीं कहा।

राज्य में प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामवादी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े बजरंग दल (Bajarang Dal) पर प्रतिबंध को लेकर भी प्रियांक खड़गे ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “कोई भी संगठन- धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक, जो असंतोष और वैमनस्य के बीज बोने जा रहा है… उसे कर्नाटक में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम कानूनी और संवैधानिक रूप से उनसे निपटेंगे – चाहे वह बजरंग दल हो, पीएफआई हो या कोई अन्य संगठन हो। हम उन्हें प्रतिबंधित करने में संकोच नहीं करेंगे, यदि वे कर्नाटक में कानून और व्यवस्था के लिए खतरा बनेंगे।”

दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि अगर वह सत्ता में आएगी तो राज्य में बजरंग दल पर प्रतिबंध लगा देगी। बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की कांग्रेस की घोषणा की देश भर में आलोचना हुई थी। भाजपा ने तो बजरंग दल को बजरंग बली से जोड़ दिया था।

मुस्लिम कैदियों के हिजाब के नाम पर मांगे डोनेशन से मोदी घृणा, कश्मीर पर दुष्प्रचार और भी बहुत कुछ

आईसीएनए एक यूएस-आधारित संगठन है जो सोशल मीडिया पर भारत विरोधी संदेश फैलाता है (फोटो क्रेडिट-: आईसीएनए/ट्विटर/फेसबुक)
इसे संयोग कहे या नियोग या परमपिता परमेश्वर की कृपा कि 2002 से जितना अधिक नरेंद्र मोदी विरोधियों द्वारा विरोध किया जा रहा है, उतनी ही तेजी से विरोधी भंवर में फंस रहे हैं। कुछ समय के लिए तो जनता इनके मकड़जाल में फंस जाती है, लेकिन अगले ही पल उनका षड़यंत्र बेनकाब हो रहा है। अभी रामलीला मैदान, नई दिल्ली में भी नमूना देखा कि किस तरह सनातन को अपमानित करने में इस्लाम की ही नई परिभाषा लिख दी, मदनी की ॐ ही अल्लाह वाली बात पर, कुछ को छोड़कर, किसी भी मुस्लिम विद्वान, मौलवी, इमाम आदि ने गंभीरता से नहीं लिया। अगर यही बात किसी हिन्दू ने बोल दी होती, आग लग लगाई, थी, 'सर तन से जुदा' गैंग सडकों पर आ गया होता। जिन्होंने गंभीरता से लिया वह मुस्लिम ज्ञानी चीख-चीखकर बोल रहे हैं, लेकिन मदनी के समर्थक बात की गहराई को नहीं समझ रहे, जो भविष्य में इस्लाम के विरुद्ध जा सकती है। भारत ही नहीं, विश्व में मोदी और हिन्दू विरोधी सक्रिय हैं। 
क्या आपने फेसबुक (Facebook), इंस्टाग्राम (instagram) या किसी अन्य सोशल मीडिया (Social Media) प्लेटफॉर्म पर एक विज्ञापन देखा है, जहाँ एक संगठन अमेरिका में मुस्लिम कैदियों के लिए डोनेशन माँग रहा है? हमारी टीम के एक सदस्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह विज्ञापन देखा और हमने यह जाँच करने का फैसला किया कि इसके पीछे आखिर है कौन।

टीम के सदस्य भारतीय अदालतों में लंबित मामलों पर जानकारी सर्च कर रहे थे, जिसके बाद उनके सामने इस तरह का विज्ञापन आने लगे। टीम के सदस्य द्वारा सर्च की गई और हाल के कंटेंट का अमेरिका में जेल में बंद अपराधियों या अमेरिका में या भारत के बाहर कहीं भी जेल में बंद मुस्लिमों से कोई लेना-देना नहीं था।

 ‘इस्लामिक सर्कल ऑफ नॉर्थ अमेरिका (ICNA) काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस’ खुद को संयुक्त राज्य अमेरिका से बाहर स्थित एक सामाजिक न्याय/मानवाधिकार संगठन के रूप में पेश करता है। विज्ञापन ने हमारा ध्यान आकर्षित किया, जहाँ उसने अमेरिकी जेलों में बंद मुस्लिम कैदियों के लिए हिजाब खरीदने के लिए पैसे माँगे। यह वह विज्ञापन है जो हमारे सामने आया था।

                                                                           साभार: फेसबुक

ग्राफिक्स में लिखा था, “सलाखों के पीछे मुस्लिम महिलाएँ अपने बालों को ढकने के लिए हिजाब माँग रही हैं। इसमें आगे लिखा था, “यह एक मुस्लिम महिला के रूप में अपनी पहचान को मजबूत करने का एक तरीका है। हमारी मदद करें, उनकी मदद करें।”

जब हमने विज्ञापन पर क्लिक किया, तो यह हमें संगठन के डोनेशन पेज पर ले गया, जिसमें दावा किया गया है कि अमेरिका में जेल की 10 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। संगठन अमेरिका में सलाखों के पीछे मुस्लिमों को ‘मुफ्त धार्मिक सामग्री वितरित करने’ के लिए एक मुस्लिम कैदी सहायता परियोजना (MPSP) चलाता है। वे ‘कुरान, इस्लामी साहित्य, हिजाब, प्रार्थना मैट को जेलों में वितरित करते हैं।’ दिलचस्प बात यह है कि डोनेशन पेज पर वीडियो में एक कैदी ने खुद को ‘नया मुस्लिम’ बताया।

यह संभव है कि संगठन अमेरिकी जेलों में एक धर्मांतरण कार्यक्रम चला रहा हो और दान के माध्यम से एकत्रित धन का इस्तेमाल करके कैदियों को इस्लाम में परिवर्तित कर रहा हो।

डोनेशन कैदियों को इस्लाम-केंद्रित सामग्री देने का आह्वान करता है

फेसबुक एड लाइब्रेरी के अनुसार, डोनेशन एकत्र करने के लिए संगठन के पास भारत में 39 अलग-अलग सेटों में 200 से अधिक सक्रिय विज्ञापन चल रहे हैं। भारत के लिए हालिया जन अभियान 10 फरवरी, 2023 को शुरू हुआ है। विज्ञापनों में धार्मिक पुस्तकें, स्वच्छ जेल प्रार्थना कक्ष, हिजाब, प्रार्थना के लिए कालीन और ईद के भोजन के लिए दान की माँग की गई है। हमें एक भी ऐसा विज्ञापन नहीं मिला जो भारत में चलता हो और उनकी शिक्षा या पुनर्वास के बारे में बात करता हो।
इसका उद्देश्य मुस्लिम कैदियों को और धार्मिक बनाने पर है। कुल मिलाकर अकेले Facebook विज्ञापन लाइब्रेरी में संगठन के 800+ विज्ञापन थे। संगठन ने बिना ज्यादा स्पष्टीकरण के मुसलमानों के जन्मदिन मनाने के लिए धन इकट्ठा करने वाले कार्यक्रम भी चलाए हैं।
                               कई फंडरेजर इसके फेसबुक पेज पर जन्मदिन मनाने के लिए थे (साभार: फेसबुक)

संगठन का मोदी विरोधी अभियान

संगठन का एक और खतरनाक पहलू है। वह अब भारत के आंतरिक मामलों में धीरे-धीरे हस्तक्षेप कर रहा है, जो चिंता पैदा करता है। संगठन अमेरिका में मुस्लिम कैदियों के लिए धन दान करने के लिए भारत के मुसलमानों को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन चला रहा है। वे व्यूअर से सहानुभूति हासिल करने के लिए मोदी विरोधी नैरेटिव का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हमें ट्विटर पर ‘मोदी’ के नाम की चर्चा वाली नौ पोस्ट मिलीं। सबसे हालिया एक बीबीसी डॉक्यूमेंट्री के बारे में था। इसमें भारत सरकार द्वारा डॉक्यूमेंट्री पर लगाए गए प्रतिबंध के बारे में बात की गई है। पोस्ट में, संगठन ने दावा किया कि गुजरात 2002 के दंगों में मुसलमान का नरसंहार किया गया था। बेशक, वे गोधरा में एक ट्रेन को जलाने का कभी जिक्र नहीं करेंगे, जिसके परिणामस्वरूप 59 निर्दोष हिन्दुओं की मौत हो गई, जिसने दंगों को भड़का दिया था।
पुरानी पोस्टों ने इस नैरेटिव को प्रचारित किया था कि अमेरिका में हिंदुत्व फैल रहा है। एक अन्य पोस्ट में, संगठन ने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को निरस्त करने की बात की और इसे ‘कश्मीर का काला दिवस‘ ​​बताया। संगठन ने अक्टूबर 2022 के एक पोस्ट में कश्मीर को आजाद करने की बात कही थी।
संगठन वर्षों से कश्मीर के बारे में दुष्प्रचार कैसे कर रहा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने सोशल मीडिया पोस्ट के लिए स्टॉक इमेज का उपयोग कर रहा है, जिसका कश्मीर या भारत से कोई लेना-देना नहीं है। इस पोस्ट पर एक नज़र डालें। इस पोस्ट में एक इमेज है जिसे istockphoto.com से लिया गया है। यह फोटोग्राफर एड्रियन हिलमैन द्वारा क्लिक किया गया 2011 का शॉट है।
आईसीएनए ने भारत के खिलाफ प्रचार करने के लिए स्टॉक इमेज का इस्तेमाल किया (स्रोत: आईसीएनए का ट्विटर/आईस्टॉकफोटोज)
इसकी वेबसाइटों पर पोस्ट भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बयानों से भरे हुए हैं। उदाहरण के लिए एक पोस्ट में, उन्होंने दंगाइयों के घरों के विध्वंस के बारे में बात की और दावा किया कि यह एक मुस्लिम विरोधी अभियान था। इसने मुस्लिम विरोधी नैरेटिव बनाने के लिए हिंदुओं और हिंदुत्व को दोषी ठहराया।
              आईसीएनए ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में पीएम मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार किया (स्रोत: ट्विटर)

संगठन कौन चलाता है?

डॉ ज़ाहिद बुखारी ICNA CSJ के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक है। वह पाकिस्तान में पैदा हुआ था और अक्सर सोशल मीडिया पर भारत विरोधी बयान साझा करता है। उसने कुख्यात हिंदू-विरोधी प्रोफेसर ऑड्रे ट्रस्चके (Audrey Truschke) की रिपोर्ट भी साझा की है।
राजस्थान में हिंदू दर्जी कन्हैया लाल की जघन्य हत्या के बारे में बात हो या भाजपा के पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के खिलाफ बयान या फिर कथित ‘निर्दोष मुसलमानों’ पर हमला करने के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराने तक, पाकिस्तान में जन्मे बुखारी ने सोशल मीडिया पर हिन्दुओं के खिलाफ सुनियोजित प्रोपेगेंडा फ़ैलाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है।

स्कूल में बुर्का/हिजाब आर्टिकल 25 के तहत यह अधिकार नहीं : कर्नाटक Advocate General


कर्नाटक बुर्का विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि यूनिफॉर्म की अनिवार्यता किसी भी छात्र या छात्रा के धार्मिक/मजहबी अधिकारों का हनन नहीं है। कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता (AG: Advocate General) ने कोर्ट को यह भी बताया कि ऐसे कदम से शैक्षणिक संस्थानों में किसी भी प्रकार के मज़हबी कपड़े पहन कर आने से रोक लगेगी, जिसमें हिजाब भी शामिल है। उच्चतम न्यायालय में यह सुनवाई 21 सितम्बर 2022 को हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये सुनवाई जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच कर रही है। इसी सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) प्रभुलिंग नवदगी ने दलील देते हुए कहा कि हिजाब समर्थक तमाम छात्राएँ इसे स्कूल के बाहर पहन सकती हैं। समान यूनिफॉर्म को कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता ने एकता और अनुशासन के लिए बेहद जरूरी बताते हुए कहा कि इससे पढ़ाई का अच्छा माहौल तैयार होता है।

वहीं हिजाब के समर्थन में बहस कर रहे वकीलों ने आर्टिकल 25 का उल्लेख करते हुए कोर्ट को बताया कि इसे पहनना मुस्लिम छात्राओं का ‘मज़हबी अधिकार’ है। इन्हीं वकीलों ने हिजाब की माँग को भी आर्टिकल 19 के तहत ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ करार दिया।

‘मज़हबी अधिकार’ या ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ वाली दलील के जवाब में कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता ने साल 1958 में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का हवाला देते हुए बताया कि कैसे तब बकरीद में गाय की कुर्बानी को जायज ठहराने की माँग उठाते हुए उसे मजहबी अधिकार बताया गया था, जिसे मुख्य न्यायाधीश सहित 5 जजों की बेंच ने ख़ारिज कर दिया था।

कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता ने अपनी दलील में आगे बताया कि साल 1958 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मौकों पर धार्मिक/मजहबी अधिकारों के स्वतंत्रता की व्याख्या की है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ये बता चुका है कि हर मज़हबी गतिविधि को धार्मिक/मजहबी अधिकारों की स्वतंत्रता के नाम पर लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

महाधिवक्ता ने कहा कि शिक्षा में समानता स्थापित करने के लिए क्लास 10 तक के सभी बच्चों को मुफ्त में यूनिफॉर्म देने का फैसला किया है। इसी मामले में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने दलील देते हुए कहा कि क्या इसी को धार्मिक/मजहबी अधिकारों की स्वतंत्रता कहा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट में ही मुस्लिम नमाज़ और हिन्दू हवन करना शुरू कर दें? उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक/मजहबी अधिकारों को मिलाने का विरोध भी किया।

उडुप्पी के जिस संस्थान से बुर्का विवाद की शुरुआत हुई थी, वहाँ के शिक्षकों ने इसी सुनवाई के दौरान अपने वकील आर वेंकटरमानी के माध्यम से कहा कि स्कूल में धार्मिक/मजहबी प्रतीकों की लड़ाई से वहाँ पढ़ाई का माहौल खराब होता है। अध्यापकों का पक्ष रखते हुए एक अन्य वकील डी शेषाद्रि नायडू ने कहा कि धर्म/मजहब बच्चों के दिल में होना चाहिए और उन्हें धार्मिक/मजहबी विवादों से दूर रह कर सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में 8 दिनों से चल रही यह सुनवाई अब अपने अंतिम दौर में है। इन 8 दिनों में 6 दिनों तक हिजाब समर्थक वकीलों ने अपना पक्ष कोर्ट में रखा था। बाकी 2 दिनों में कर्नाटक सरकार ने अपने पक्ष से सुप्रीम कोर्ट को अवगत करवाया है।

‘हिंदू वेश्याओं की संतान’: यूट्यूबर शाहबाज खान ने कर्नाटक के CM बोम्मई सहित BJP नेताओं को दी गाली, कहा- कु#या के बच्चे

यूट्यूबर शाहबाज खान ने बीजेपी नेताओं को दी गाली
विवादित यूट्यूबर शाहबाज खान का एक वीडियो सामने आया है। इसमें वह कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और राज्य के अन्य वरिष्ठ बीजेपी नेताओं को गाली और धमकी दे रहा है। खुद को मोटिवेशनल स्पीकर बताने वाले खान का यह वीडियो वायरल हो चुका है। इसमें मुख्यमंत्री को निशाना बनाने के लिए उसने गालियों का इस्तेमाल किया है।

उसने शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों के लिए समान ड्रेस कोड से संबंधित कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की है। कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा हिजाब को इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं मानने के हफ्तेभर बाद आए खान के वीडियो में सीएम बोम्मई को धमकी देते हुए उन्हें ‘कु#या का बच्चा’ कहा है। बता दें कि शाहबाज खान को हाल ही में हिजाब विवाद के सिलसिले में विधानसभा के बाहर विरोध करने के लिए गिरफ्तार भी किया गया था। उसे मुख्यमंत्री को गालियाँ और धमकी देने के लिए यूट्यूब समाचार मीडिया आउटलेट ‘AK News’ ने प्लेटफॉर्म दिया था।

वीडियो में देखा जा सकता है कि खान सीएम बोम्मई को ‘बीजेपी का कु#’ बता रहा है और जोर देकर कहता है कि वह मुख्यमंत्री को चप्पल से मारेगा। सैंडल से मारेंगे। सीएम के परिवार के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए शाहबाज खान ने कहा कि मुस्लिम वोटों के कारण बीजेपी के ‘कुत्ते’ सत्ता में आए हैं।

आगे उसने कहा कि वह मुख्यमंत्री और अन्य बीजेपी नेताओं के मुँह पर थूकता है। इसके अलावा शाहबाज खान ने कर्नाटक सरकार को गिरफ्तार करने की चुनौती देते हुए कहा कि वह अकेले ही 5000 पुलिस अधिकारियों से निपट लेगा। शाहबाज ने हिंदुओं के खिलाफ अपने हेट स्पीच में कहा, “हम, मुस्लिम, आपके उलट हज़रत अली के दुआ से पैदा हुए हैं, जो बिना किसी उपाधि के पैदा हुए हैं।” इसके साथ ही उसने दावा किया कि मुस्लिमों ने देश का निर्माण और उस पर 700 सालों तक शासन किया। उसने हिंदुओं को वेश्याओं की संतान (Sons of Prostitutes) बताया।

Youtuber ने हिजाब प्रतिबंध पर हाई कोर्ट के आदेश का विरोध करने के लिए विदेशों, विशेष रूप से पाकिस्तान, संयुक्त राज्य अमेरिका और कुवैत से समर्थन प्राप्त करने के खतरनाक डिटेल्स का भी खुलासा किया। शाहबाज खान ने यह भी कहा कि देश के बाहर के मुस्लिम उससे पूछ रहे थे कि भारतीय मुस्लिम हिजाब प्रतिबंध के खिलाफ चुप क्यों थे। फिर शाहबाज खान ने धमकी देते हुए कहा, “अगर मुस्लिम एकजुट होते हैं, तो परिणाम और भी बुरे होंगे।”

शाहबाज खान ने सिर्फ मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के खिलाफ ही नहीं, बल्कि राज्य के वरिष्ठ भाजपा नेताओं- मैसूर के लोकसभा सांसद प्रताप सिम्हा, बेंगलुरु दक्षिण के सांसद तेजस्वी सूर्या और कर्नाटक के मंत्री ईश्वरप्पा के खिलाफ भी अभद्र टिप्पणी किया। उन्हें ‘कु#यों का बच्चा’ कहते हुए, खान ने धमकी दी कि वह भाजपा नेताओं के घर जाकर उनको चप्पल से मारेगा।

शाहबाज खान ने मैसूर के युवा सांसद पर निशाना साधते हुए कहा, “अरे प्रताप सिम्हा, तुम एक कु#या के बेटे, मैं तुम्हें सैंडल से मारूँगा। मोदी के सामने जो चाहो करो, हम मुस्लिमों के साथ नहीं। हम मुसलमान कब तक चुप रहें?” बता दें कि प्रताप सिम्हा कॉलेजों में हिजाब प्रतिबंध के समर्थन में थे। शाहबाज खान ने आगे कहा कि वह प्रताप सिम्हा के मुँह पर पेशाब करेगा। वीडियो के अंत में शाहबाज खान मुस्लिमों को राज्य सरकार के खिलाफ खड़े होने के लिए उकसा रहा है।

‘गैर मर्द से हाथ मिलाना इस्लाम में गुनाह, बाप ने नहीं सिखाया?’: बुर्के वाली मुस्कान पर बरसे मौलाना

                मौलाना अब्दुल गफ्फार सलाफी (बाएँ) और बुर्का गर्ल मुस्कान खान (फोटो साभार: यूट्यूब)
कर्नाटक (Karnataka) हिजाब (Hijab) विवाद के बीच उडुपी के कॉलेज में ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाने वाली ‘बुर्का गर्ल’ मुस्कान खान (Muskan Khan) को लेकर एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें मौलाना अब्दुल गफ्फार सलाफी ने मुस्कान खान पर बरसते हुए कहा कि मुस्कान को अल्लाह का डर तो है, लेकिन उसके अब्बू ने उसे ये शिक्षा नहीं दी कि किसी भी गैर मर्द से हाथ मिलाना इस्लाम में गुनाह है।

इस्लामिक कॉन्फ्रेंस वीडियो यूट्यूब चैनल के मुताबिक, मौलाना अब्दुल्ल गफ्फार सलाफी ने गैर मर्द से हाथ मिलाने के लिए मुस्कान खान को कड़ी फटकार लगाई। मौलाना ने कहा, “हैदराबाद से एक व्यक्ति मुस्कान से मिलने आया और उसने मुस्कान से हाथ बढ़ाकर मुसाफा (हाथ मिलाया) किया। उस 50 साल के आदमी ने मुस्कान से हाथ मिलाया, उसकी तारीफ की और कहा कि बेटी तुमने हमारा नाम रोशन कर दिया। इसके बाद ने उसके कंधे, कमर पर भी हाथ रखे। लेकिन, इससे मुस्कान को कोई ऐतराज नहीं हुआ। मतलब ये कि वो दीनदार तो है, अल्लाह का डर भी उसे है, वो स्कूल पर्दे में भी जाती है, लेकिन उसके बाप ने उसे ये नहीं सिखाया कि किसी गैर मेहरम (मर्द) से मुसाफा करना जायज नहीं है। मतलब ये हुआ कि उसके बाप ने उसे तालीम तो दी, लेकिन तरबियत नहीं दी।”

मौलाना ने मुस्लिमों को संबोधित करते हुए आगे कहा, “हमारे घर में मोहल्ले के लड़के आते हैं और हमारी बेटी को वो अपनी बहन कहते हैं। हमें बहुत अच्छा लगता है कि वो बहन कहते हैं। लिख लो बहन केवल अपनी सगी बहन होती है। इसके अलावा दुनिया में कोई बहन नहीं होती। फेसबुक, व्हाट्सएप या इंस्टाग्राम पर किसी को बहन बना लो तो भी वो आपकी बहन नहीं है। आपको उससे दूर रहकर अपने घर की लड़कियों को मेहरम कौन है और गैर मेहरम कौन है।”

कुरान में बताया गया है मोबाइल के इस्तेमाल का तरीका

अब्दुल गफ्फार सलाफी के मुताबिक, भले ही आज मोबाइल तकनीक है, लेकिन 1400 साल पहले अल्लाह ने मुस्लिम औरतों को मोबाइल के इस्तेमाल का तरीका बताया था। मौलाना मुताबिक अल्लाह ने कहा था, “ऐ मुस्लिम औरतों अगर तुम्हारे मोबाइल पर किसी गैर मेहरम (मर्द) का कॉल आ जाए तो उससे नरमी से बात मत करना। अन्यथा वो तुमसे उम्मीद लगाने लगेगा, चक्कर चलाने लगेगा। इस्लाम में मोहब्बत केवल एक औरत और मर्द के बीच हो सकती है। अल्लाह गैर नमाजियों को नमाजी बनाए।”

क्या हिजाब की आड़ में लड़के बुर्का इस्तेमाल कर रहे हैं?

कर्नाटक के हिजाब विवाद को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर कई तरह की गलत जानकारियाँ लगातार शेयर की जा रही हैं। इन गलत जानकारियों से लोगों को भड़काने की कोशिश भी हो रही है। ऐसी ही एक वायरल पोस्ट इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर की जा रही है।

सोशल मीडिया पर किया जाने वाला दावा

यह वीडियो इस दावे के साथ वायरल की जा रही है कि कर्नाटक पुलिस ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब प्रतिबंध का विरोध करने वाले मुस्लिमों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए लोग बुर्का पहने हुए थे और बुर्का उतारने पर पता चलता है कि उनमें से 40% पुरुष थे।
कर्नाटक पुलिस की फैक्ट चेक साइट के अनुसार यह वीडियो कर्नाटक की नहीं, बल्कि तेलंगाना की है। घटना 18 अगस्त 2020 की है। वीडियो में दिख रहे व्यक्ति को तेलंगाना से गिरफ्तार किया गया था। वह आंध्र प्रदेश में शराब की तस्करी करने की कोशिश कर रहा था। उसने खुद की पहचान को छिपाने के लिए बुर्का पहन रखा था।
यह घटना कर्नाटक में नहीं बल्कि आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के पंचलिंगाला चेक पोस्ट पर हुई थी। ऐसे में इस वीडियो की सच्चाई जाने बिना लोग इसे खूब शेयर कर रहे हैं और पुलिस की आलोचना कर रहे हैं।
कर्नाटक में चल रहे बुर्का विवाद (Hijab Controversy) पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। सोमवार (21 फरवरी 2022) को हाई कोर्ट में हुई सुनवाई एक बार फिर बिन किसी नतीजे पर पहुँचे टल गई। इस दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट के सामने इस बात को स्पष्ट किया कि उन्होंने अपने 5 फरवरी वाले सरकारी आदेश में हिजाब पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। उन्होंने सिर्फ कॉलेज विकास समितियों को यूनिफॉर्म पर निर्णय लेने का अधिकार दिया है।

बॉलीवुड अदाकारा सोनम कपूर ने सिख पगड़ी को की तुलना हिजाब से की

बॉलीवुड अभिनेत्री सोनम कपूर (Sonam Kapoor) द्वारा सिख पगड़ी पर शेयर की गई एक तस्वीर विवादों का विषय बन गई है। सोनम कपूर ने हिज़ाब और पगड़ी की तुलना करते हुए इंस्टाग्राम पर पगड़ी पहने एक सिख और हिजाब पहनी हुई एक महिला की तस्वीर शेयर की। इस पर विवाद बढ़ने और इसकी आलोचनाओं होने के बाद उन्होंने यह स्टोरी डिलीट कर दी।
                                                 सोनम कपूर द्वारा किया गया इंस्टाग्राम पोस्ट

भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा (Manjinder Singh Sirsa) ने ट्विटर पर सोनम कपूर को टैग करते हुए लिखा, “दस्त-ए-यार यानि कि भगवान का हाथ। ये चॉइस नहीं, बल्कि गुरू गोबिंद सिंह जी का आशीर्वाद और सिख पहचान का अभिन्न अंग है। इस संदर्भ में दस्तर और हिजाब की तुलना गलत और अवांछित है। हर मामले में सिखों की भावानाओं को चोट पहुँचाना बंद करो।”

मनजिंदर सिंह सिरसा ने एक वीडियो में कहा, “सोनम कपूर ने एक बेहद विवादित पोस्ट अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट डाला। ये दिखाया कि जो दस्तार है, इसकी च्वॉइस हो सकती है देश में, लेकिन हिजाब की नहीं है। सोनम कपूर को कहना चाहता हूँ कि 2 धर्मों को आपस में भिड़ाना गलत है। दस्तार सिख के लिए जरूरी है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने ये जो हमें बख्शीश दी है, ये हर सिख के लिए जरूरी है और ये हमारे शरीर का हिस्सा है, कोई पहनावा नहीं है। सब धर्मों की अपनी मान्यताएँ हैं, जो कायम रहनी चाहिए। सोनम कपूर ने ये जो शरारत की है, जो ये जान-बूझ कर लोगों को उकसाया जा रहा है, ये बहुत गलत है। मैं सोनम कपूर को कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा काम कलाकार वाला है। तुम अपना कलाकार वाला काम करो, लेकिन ऐसे मसलों के अंदर जो बड़े संवेदनशील मुद्दे हो सकते हैं उनमें तुम्हारी दखलंदाजी ये दिखाती है कि तुम किसी पार्टी के एजेंडे पर काम कर रही हो। ये गलत है। हिसाब और दस्तार की तुलना की मैं निंदा करता हूँ।”

भारत सरकार के सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने भी सोनम कपूर के तर्क को गलत बताया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “गलत तर्क। सिखों के लिए पगड़ी अनिवार्य है। धर्मनिरपेक्ष भारत में हिजाब का प्रोपोगेंडा चलाया जा रहा है, खासतौर पर इस्लामी एजेंडे के तहत। इसे स्कूलों में मान्यता नहीं दिया जा सकता।”

भारतीय जनता पार्टी दिल्ली के नेता विकास प्रीतम सिन्हा ने लिखा, “मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा और उनके शोषण के मुद्दे पर कभी आती हैं ये बिकिनी ब्रिगेड आगे? ख़ुद भी शिक्षित नहीं हैं इसलिए कपड़ों से ऊपर किसी मुद्दे पर कभी इनका कोई ओपिनियन हो ही नहीं सकता।” उन्होंने कहा कि ऐसी ही जिद और जाहिलियत रही तो आने वाले सालों में भारत में सेक्युलरिज्म इतना बढ़ जाएगा कि ‘पृथ्वी गोल है’ पढ़ाना भी कम्युनल माना जाने लगेगा।

स्वदेशी जागरण मंच के अश्वनी महाजन ने लिखा, “बिलकुल सत्य। कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में साफ़ आदेश दे दिया है। इसलिए इस मामले को अब विराम देना चाहिए।”

उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP व रिटायर्ड सीनियर IPS अधिकारी प्रकाश सिंह ने कहा कि यदि कोई यह नहीं जानता की वह क्या कर रहा है तो उस पर कार्रवाई करना मूर्खता है।

इसी के साथ सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर कई नेटीजेन्स सोनम कपूर को ट्रोल कर रहे हैं।

भारत में इस्लाम को फैलाने के लिए दशकों से ले रहे हैं विदेशों से फंडिंग; स्कूल-कॉलेजों तक पहुँचे कट्टरपंथी समूहों के हाथ

                                       कॉलेजों में इस्लामिक कट्टरपंथ (फोटो साभार: India Today)
जब भारत में चुनाव होते हैं अराजक तत्व किसी न किसी बहाने सडकों पर आकर शांति भंग करने लगते हैं। चाहे CAA का विरोध हो, कृषि कानून हों या अब स्कूलों में हिजाब का मामला। CAA का विरोध करने वाली पार्टियां बताएं कि विश्व में ऐसा कौन-सा देश है, जहाँ ये कानून नहीं है, आखिर क्यों जनता को गुमराह किया गया? 
कर्नाटक हिजाब विवाद (Karnataka Hijab Controversy) ने एक अभूतपूर्व मोड़ ले लिया है। अब पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और जमात-ए-इस्लामी हिंद जैसे कट्टरपंथी इस्लामवादी संगठन इन विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित कर रहे हैं। कट्टरपंथी इस्लामी संगठन मुस्लिम छात्राओं को राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए ड्रेस कोड का उल्लंघन करने और क्लास के अंदर बुर्का पहनने के लिए उकसा रहे हैं।

इससे पहले एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि कैसे कुख्यात कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पीएफाई की छात्र शाखा कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) और प्रतिबंधित आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी हिंद से प्रदर्शन करने वाली कुछ मुस्लिम छात्राएँ लगातार संपर्क में थीं और ये इन संगठनों के कहे अनुसार हिजाब पहनकर क्लास में जा रही थीं। इन छात्राओं ने ये भी बताया था कि कॉलेज में हिजाब पहनना उन्होंने दिसंबर 2021 से ही शुरू किया था।

हाल की घटनाओं से स्पष्ट है कि सीएफआई और जमात जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन न केवल कॉलेज में मुस्लिम छात्राओं का ब्रेनवॉश करने का प्रयास कर रहे हैं, बल्कि ये संगठन युवा मुस्लिम छात्राओं को पढ़ाई से गुमराह कर उन्हें कट्टर बनाने में सफल रहे हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि केरल और कर्नाटक राज्य में कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया और जमात-ए-इस्लामी हिंद, पीएफआई जैसे संगठनों ने अक्सर मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथी बनाने पर जोर दिया है। कट्टरपंथी इस्लामी संगठन केरल की तुलना में कर्नाटक में कम सफल रहा है। वहीं, केरल के युवाओं को पीएफआई गुमराह करने में अधिक सफल रहा है।

PFI, जमात को भारत में इस्लाम और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए विदेशों से फंड मिल रहा है: रिपोर्ट

पिछले साल केरल के एक पत्रकार ने सनसनीखेज खुलासा किया था कि कैसे भारत में इस्लामवाद को बढ़ावा देने के लिए पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन धन जुटा रहे हैं। एक क्लब हाउस चर्चा में केरल के पत्रकार एमपी बशीर ने देश में कट्टरपंथी इस्लाम को आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग के बारे में भी खुलासा किया था।
अपने खुलासे में बशीर ने कहा था कि उन्होंने जमात-ए-इस्लामी हिंद द्वारा लिखे गए एक पत्र को एक्सेस किया था, जिसमें सऊदी अरब में किंग अब्दुल अजीज यूनिवर्सिटी से कट्टरपंथी इस्लामी संगठन को वित्तीय अनुदान बढ़ाने का अनुरोध किया गया था, ताकि वे केरल और भारत में इस्लामी ड्रेस कोड को बढ़ावा दे सकें। उन्होंने आगे कहा था कि जमात ने कुछ मुस्लिम महिला पत्रकारों के हिजाब नहीं पहनने पर भी आपत्ति जताई थी और कहा था कि बशीर को उन्हें हिजाब पहनने के लिए कहना चाहिए।
इसके अलावा, उन्होंने कहा था कि जमात-ए-इस्लामी हिंद ने महिलाओं के लिए इस्लामी ड्रेस कोड (Islamic dress code) को बढ़ावा देने के लिए भारत में एक योजना शुरू की थी और सऊदी अरब के Jeddah इस इस्लामी यूनिवर्सिटी से पिछले लगभग 30 सालों से धन प्राप्त किया था। पुलवामा हमले में नाम आने के बाद केंद्र सरकार ने इस कट्टर इस्लामिक संस्था को फरवरी 2019 में केंद्र सरकार ने बैन कर दिया था।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पीएफआई का हिंसा फैलाने का इतिहास

पीएफआई का हिंसा करने का काफी पुराना इतिहास है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के और हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों सहित देश भर में हुई हिंसा में पीएफआई की भूमिका संदिग्ध पाई गई और पीएफआई के कई सदस्यों को दंगों में शामिल रहने के लिए गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा, पिछले साल नवंबर में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI ने देश के विभिन्न हिस्सों में दंगों और हिंसा के लिए उकसाने के आरोपित किसानों के विरोध को अपना समर्थन दिया था।
अवलोकन करें:-
PFI नेताओं के विदेशों में बार रेस्टोरेंट, ED की छापेमारी में कई संपत्तियों के मिले सबूत
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
PFI नेताओं के विदेशों में बार रेस्टोरेंट, ED की छापेमारी में कई संपत्तियों के मिले सबूत
वर्ष 2019 में नागरिकता कानून के खिलाफ देश भर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में आतंकियों ने भी हिस्सा लिया था। तोड़फोड़, आगजनी, पत्थरबाज़ी और दंगा भड़काने के मक़सद से इंडियन मुजाहिदीन और सिमी से जुड़े कट्टरपंथी आतंकी अपनी पूरी तैयारी के साथ नागरिकता क़ानून के खिलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में शामिल हुए थे। इन प्रदर्शनों के लिए इन संगठनों ने भरपूर फंडिंग भी की थी। यह जानकारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के माध्यम से मिली थी, जिसकी पुष्टि दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने की थी।

कर्नाटक की बुर्के वाली लड़कियों को तालिबान का समर्थन: ‘इस्लाम’ को बताया ‘मुल्क’ से ऊपर

                        हिजाब पहनने पर अड़ी लड़कियों का तालिबान ने किया समर्थन (साभार: ट्रिब्यून इंडिया)
कर्नाटक (Karanataka) के स्कूलों में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब (Hijab) पहनने को लेकर जारी विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँच चुका है। इस मुद्दे पर शांति नोबेल पुरस्कार पाने वाली मलाला यूसुफजई (Malala Yousafzai) के बाद अब तालिबान (Taliban) की भी एंट्री हो गई है। 10 फरवरी 2022 को कट्टरपंथी संगठन तालिबान ने कर्नाटक में हिजाब पहनने वाली मुस्लिम लड़कियों का समर्थन करते हुए ‘इस्लामी मूल्यों’ की रक्षा के लिए डटकर खड़े रहने के लिए उनकी तारीफ की।

ब्रिटेन में आराम की जिंदगी मिलने के बाद अपना असली कट्टरपंथी रंग दिखाने वाली शांति नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफजई (Malala Yousafzai) द्वारा कर्नाटक में जारी हिजाब विवाद (Hijab Controversy) पर बयान देकर फँस गई हैं। सोशल मीडिया पर हिजाब और शिक्षा को लेकर उनके दिए गए पुराने बयान को लेकर लोग ट्रोल करने लगे हैं।

अफगानिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथियों की गोली शिकार बनने के बाद ब्रिटेन में शरण पाने वाली मलाला ने कभी हिजाब को लेकर सवाल उठाया था। अपनी पुस्तक ‘आई एम मलाला’ में उन्होंने हिजाब को गलत और घुटन वाला बताया था। लेखक आनंद रंगनाथन ने मलाला के इस कथन का संदर्भ देते हुए एक ट्वीट किया है।

रंगनाथन ने ट्वीट में लिखा है कि कभी मलाला ने कहा था, “वे (इस्लामिक कट्टरपंथी) महिलाओं को बुर्का पहनने के लिए मजबूर कर रहे थे। बुर्का पहनना एक बड़े कपड़े के शटलकॉक के अंदर चले जाने जैसा है, जिसमें केवल एक ग्रिल है और गर्म दिनों में यह ओवन की तरह हो जाता है। मुझे यह पहनना नहीं था।”

भारत के मामले बयानबाजी करने वाली मलाला से सोशल मीडिया यूजर पूछ रहे हैं कि जिस नॉर्वे की ओर से उन्हें नोबेल सम्मान दिया गया है, उसने साल 2017 में स्कूल और यूनिवर्सिटी में हिजाब पर प्रतिबंध लगाते हुए कानून बनाया था। लोग पूछ रहे हैं कि मलाला नॉर्वे को लेकर कोई बात क्यों नहीं कही। 

अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा किए जा रहे नरसंहार और कब्जे के बावजूद एकदम चुप्पी साधे हुए हैं। तालिबान के अमानवीय हमलों का विरोध करना और उस पर रोना तो छोड़िए एक फुसफुसाहट तक नहीं नजर आ रही है। ये वही मलाला हैं, जिन्हें अक्टूबर 2012 में पाकिस्तान की स्वात घाटी में महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करने पर तालिबान ने गोली मारी थी। गंभीर रूप से घायल हालत में उन्हें पहले पाकिस्तान के आर्मी अस्पताल में ले जाया गया और फिर वहाँ से यूके रेफर किया। वहाँ इलाज के बाद वह चमत्कारिक रूप से ठीक हो गई थीं।

अफगानिस्तान के तालिबानी नेता और उप-प्रवक्ता इनामुल्लाह समांगानी ने ट्वीट किया, “भारतीय मुस्लिम लड़कियों का हिजाब के लिए संघर्ष यह दिखाता है कि हिजाब अरब, ईरानी, ​​मिस्र या पाकिस्तानी संस्कृति नहीं है, बल्कि ‘इस्लामिक मूल्य’ है। इसके लिए विश्व भर में, खासकर ‘सेक्युलर दुनिया’ में मुस्लिम लड़कियाँ कई तरह से अपना बलिदान देती हैं और अपने धार्मिक मूल्य की रक्षा करती हैं।”

इसके साथ ही समांगनी ने कर्नाटक के स्कूल में ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगाने वाली मुस्लिम लड़की ‘मुस्कान’ की तस्वीर को भी ट्विटर पर शेयर किया। बता दें कि तालिबान का यह ट्वीट मुस्लिम लड़कियों के उस बयान के ठीक एक दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके लिए ‘हिजाब पहली प्राथमिकता है और एजुकेशन सेकेंडरी।’

                                                       इमानुल्ला समांगनी का ट्वीट

उधर सलीम जावेद नाम के एक यूजर ने कहा कि विरोध करने वाली मुस्लिम लड़कियाँ दरअसल ‘सेक्युलरिज्म’ के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के तहत धर्मनिरपेक्षता का समर्थन कर रही हैं। इस पर तालिबानी नेता समांगनी जावेद पर भड़क उठे। उन्होंने सलीम को ‘फेक सेक्युलरिस्ट’ और इस्लाम से दुश्मनी दिखाने वाला करार दिया। समांगानी ने इस बात पर जोर दिया कि कर्नाटक में मुस्लिम लड़कियाँ ‘धर्मनिरपेक्षता’ का विरोध कर रही हैं।

                                            इमानुल्ला समांगनी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

बुर्का विवाद पर मुस्लिम लड़की की तारीफ करने के मामले में इनामुल्ला समांगानी का कतर स्थित इस्लामिक अमीरात के आधिकारिक प्रवक्ता और तालिबान के अधिकारी सुहैल शाहीन समेत कई लोगों ने समर्थन किया।

                                                       इमानुल्ला समांगनी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

तालिबान में महिलाओं को नहीं है आजादी

खास बात ये है कि अगस्त 2021 में अफगानिस्तान में हथियारों के दम पर कब्जा करने के साथ ही तालिबान ने अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों का दमन शुरू कर दिया था। तालिबान ने वहाँ बुर्का या हिजाब को महिलाओं के लिए अनिवार्य कर दिया था। इसके अलावा इस्लामिक संगठन ने टीवी पर महिला कलाकारों को भी एक्टिंग से रोक दिया था।
तालिबान के खिलाफ जब कई अफगान महिलाओं ने रंगीन कपड़ों में शरिया लॉ के खिलाफ प्रदर्शन किया तो तालिबान के लड़ाकों ने महिलाओं के घरों पर छापेमारी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। दिलचस्प बात ये है कि तालिबान की तरह ही कथित ‘वाम-उदारवादी’ भी महिलाओं को ढँका हुआ देखना चाहते हैं।

अवलोकन करें:-

PFI नेताओं के विदेशों में बार रेस्टोरेंट, ED की छापेमारी में कई संपत्तियों के मिले सबूत
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
PFI नेताओं के विदेशों में बार रेस्टोरेंट, ED की छापेमारी में कई संपत्तियों के मिले सबूत

कर्नाटक हिजाब विवाद

कर्नाटक के उडुपी जिले के पीयू कॉलेज में हिजाब का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। बाद में इसके विरोध में मुस्लिम महिलाओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर हिजाब को अपना मौलिक अधिकार बताते हुए कक्षाओं में इस पहनने की छूट माँगी। बहरहाल मामला अभी अदालत में है।