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क्या संविधान से खिलवाड़ करना कांग्रेस का मौलिक अधिकार है?

जब कांग्रेस, इनकी समर्थक पार्टियां और इनके शुभचिंतक वर्तमान मोदी सरकार पर भारतीय संविधान का मजाक उड़ाने की बात सुनकर हंसी आती है। सत्ता से बाहर होते ही कांग्रेस और इसके समर्थक दलों को संविधान की याद आ रही है, जबकि सत्ता में रहते अपनी सहयोगी पार्टियों के समर्थन से संविधान को मात्र एक झुनझुना बनाकर कांग्रेस ने इस्तेमाल किया।  
कांग्रेस शुरू से ही देश के संविधान से खिलवाड़ को अपना मौलिक अधिकार समझती रही हैं। कांग्रेस ने तो पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जमाने से ही संविधान का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था, जो आज तक रुका नहीं है। देश में हुए प्रथम चुनाव में ही लोकतंत्र का मजाक उड़ाया। जब उत्तर प्रदेश के रामपुर से लगभग 6000 वोटों से हारे मौलाना आज़ाद को विजयी घोषित करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत को आदेश दिया था। और पंत ने साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर हारे मौलाना आज़ाद को विजयी घोषित करवा दिया था।  
आइए, संविधान दिवस पर देखते हैं ऐसे पांच उदाहरण, जिनसे पता चलता है कि कैसे कांग्रेस हमेशा देश के पवित्र संविधान को ताक पर रखती रही है।

टेलीफोन पर रिपोर्ट लिखवा लगाया राष्ट्रपति शासन
31 जुलाई, 1959 को तत्कालीन नेहरू सरकार ने संविधान की मर्यादाओं को छिन्न-भिन्न करते हुए निर्दलियों के सहयोग से केरल में बनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उन्हें इतनी जल्दी थी कि उन्होंने राज्यपाल की रिपोर्ट के एयर सर्विस से दिल्ली आने तक का भी इंतजार नहीं किया। टेलिफोन पर ही रिपोर्ट लिखवाकर, उसी के आधार पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगवा दिया।   

संविधान या इंदिरा संविधान
नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी तो प्रधानमंत्री रहते हुए संविधान के साथ ऐसी मनमानी करती रहीं कि एक समय इसे ‘Constitution of India’ की जगह ‘Constitution of Indira’ कहा जाने लगा था। 25 और 26 जून, 1975 की मध्यरात्रि को देश पर आपातकाल थोपकर इंदिरा गांधी ने देशवासियों को किस दहशत के साये में जीने को मजबूर किया था, यह हमेशा भारतीय इतिहास के काले पन्ने में दर्ज रहेगा।

न्यायपालिका से आपातकाल की समीक्षा का अधिकार छीना
जेपी मूवमेंट से इंदिरा की सत्ता पहले ही खतरे में आ चुकी थी, ऊपर से 12 जून 1975 को उनके चुनाव को गलत बताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। इसके महज 13 दिन बाद ही उन्होंने न सिर्फ आपातकाल थोपा, बल्कि संविधान में ऐसे संशोधनों का दौर शुरू कर दिया, जो लोकतंत्र की आत्मा पर लगातार चोट कर रहा था। 38वें संशोधन के साथ न्यायपालिका से आपातकाल की समीक्षा का अधिकार छीन लिया था, तो 39वां संशोधन पीएम की अपनी कुर्सी बचाने के लिए कराया।

मौलिक अधिकार छीनने के लिए संशोधन
संविधान, जो लोकतंत्र की आत्मा है, इंदिरा गांधी उसे कुचलने पर आमादा हो चली थीं। उन्होंने 41वें संशोधन के साथ कई नए प्रावधान कराए ही, 42वें संशोधन से उन्होंने देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार छीनने तक का कदम उठा लिया। यह एक ऐसा संशोधन था, जिसने हमारी न्यायपालिका की भूमिका तक को सीमित करने का काम किया था। हम सब जानते हैं नागरिक के रूप में हमारे अधिकारों की रक्षा हमारी न्यायपालिका की प्रमुख जिम्मेदारी है। ये आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी की सरकार थी, जिसने इंदिरा के मनमाने प्रावधानों को रद्द कर संविधान की गरिमा को बचाए रखने का फर्ज निभाया।

100 से अधिक बार लगाया राष्ट्रपति शासन
कांग्रेसी शासन मनमाने तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए भी कुख्यात रहा है। आंकड़े बताते हैं कि आजादी के बाद अलग-अलग राज्यों में अब तक सौ से अधिक बार राष्ट्रपति शासन कांग्रेस या उसके सहयोग से बनी सरकारों के दौरान लगे हैं। इमरजेंसी वाली इंदिरा इस मामले में भी सबसे आगे रही थीं, जिनके शासनकाल के दौरान कुल 49 बार राष्ट्रपति शासन लगाए गए थे।

जगदंबिका पाल को कांग्रेस ने अनैतिक रास्ते से सौंपी सत्ता
वर्ष 1998 में कांग्रेस ने षडयंत्र करके पहले तो उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार गिरा दी। इसके बाद कांग्रेस के आदेश पर तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। हालांकि कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को रद्द कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सदन के भीतर गुप्त मतदान में भाजपा के कल्याण सिंह जीत भी गए।

1989 में बोम्मई को बहुमत साबित करने नहीं दिया गया
कर्नाटक में 1989 में एस आर बोम्मई को बहुमत साबित करने नहीं दिया गया था और कांग्रेस ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया। जिसके बाद 1994 में सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीशों की पीठ ने बोम्मई के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा था- कांग्रेस जब-तब लोकतंत्र की हत्या करती है। जाहिर है यह एक ऐतिहासिक निर्णय था जिसने कांग्रेस को पूरी तरह से नंगा कर दिया था।

हरियाणा में देवीलाल के खिलाफ काग्रेस का षडयंत्र
जीडी तापसे 1980 के दशक में हरियाणा के राज्यपाल थे। उन्होंने कांग्रेस के निर्देश पर हरियाणा में देवीलाल सरकार का एक तरह से अपहरण कर लिया था। उस समय कांग्रेस  को 35 सीटें थीं और लोकदल-भाजपा गठबंधन को 37 सीट। चौधरी देवीलाल ने 6 निर्दलीय, 3 कांग्रेस (जे)  और जनता पार्टी के 1 विधायक का समर्थन जुटा लिया था। लेकिन राजभवन में ही राज्यपाल ने षडयंत्र रचा और भजनलाल को राज्य में सरकार बनाने का निमंत्रण भेज दिया।

राजनीतिज्ञों की तरह व्यवहार कर रहे थे राज्यपाल बूटा सिंह
वर्ष 2005 में बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह ने 22 मई, 2005 की आधी रात को राज्य में विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने का हवाला देते हुए विधानसभा भंग कर दी थी। आरजेडी के पास 91 विधायक थे, जबकि एनडीए के पास 92 अपने विधायक और 10 निर्दलीय विधायकों का समर्थन था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बूटा सिंह के फैसले को असंवैधिक करार दिया था।

कांग्रेस की शह पर राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने रची थी साजिश!
झारखंड के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने वर्ष 2005 के झारखंड चुनावों के बाद त्रिशंकु विधानसभा में शिबू सोरेन की सरकार बनवाई। लेकिन इसके बाद सदन में वे बहुमत साबित करने में असफल रहे। उन्हें नौ दिनों की मुख्यमंत्री पद भी गंवाना पड़ा। बाद में अर्जुन मुंडा की सरकार बनी।

कांग्रेस के षडयंत्र से एक सीट वाले मधु कोड़ा बने मुख्यमंत्री
वर्ष 2006 में झारखंड की भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस ने षडयंत्र किया। पहले निर्दलीय मधु कोड़ा को सरकार से समर्थन वापसी के लिए उकसाया और इसके बाद कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने समर्थन देकर उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया।

अवलोकन करें:-

जवाहर लाल नेहरू : बूथ कैप्चरिंग का मास्टरमाइंड

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जवाहर लाल नेहरू : बूथ कैप्चरिंग का मास्टरमाइंड
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव 
जब कांग्रेस के कार्यकाल में संविधान और लोकतन्त्र की धज्जियाँ उड़ाई गयीं

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जब कांग्रेस के कार्यकाल में संविधान और लोकतन्त्र की धज्जियाँ उड़ाई गयीं

कर्नाटक में राज्यपाल ने बर्खास्त की थी भाजपा सरकार
कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने वर्ष 2009 में बीजेपी सरकार को बर्खास्त कर दिया था। तब केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार थी। कभी यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हंस भारद्वाज की नियुक्त‌ि यूपीए सरकार ने ही की थी। राज्यपाल ने तब बीएस येदियुरप्पा पर गलत तरीके से बहुमत हासिल करने के आरोप लगाते हुए उन्हें दोबारा बहुमत साबित करने को कहा था।

गिरधर गोमांग के ‘अवैध’ वोट से गिरवा दी वाजपेयी सरकार
कांग्रेस संवैधानिक मर्यादाओं के साथ किस तरह खिलवाड़ करती है इसका उदाहरण है 17 अप्रैल 1999 में लोकसभा की कार्यवाही। इस दौरान कांग्रेस के अनैतिक आचरण का गवाह बने थे ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग। ओडिशा का मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने लोकसभा में मतदान किया और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने में कांग्रेस की साजिश को अंजाम तक पहुंचा दिया।

16 वर्षो के ‘लोकतंत्र सेनानी’ आज़म खान की पेंशन पर योगी सरकार ने लगाई रोक

‘भू-माफिया’ घोषित किए जा चुके उत्तर प्रदेश के रामपुर से सांसद आजम खान को ‘लोकतंत्र सेनानी’ के रूप में हर महीने पेंशन मिल रही थी, जिस पर योगी आदित्यनाथ की सरकार ने रोक लगा दी है। आजम खान और उनके ट्रस्ट के नाम पर करोड़ों की संपत्ति और कई अवैध निर्माण व कब्जाई गई जमीनें हैं। उन पर कई आपराधिक मुक़दमे चल रहे हैं। ‘लोकतंत्र सेनानी पेंशन’ के रूप में वो हर माह 20,000 रुपए अलग से उठा रहे थे, जिसे रोक दिया गया है।

ये ही सरकारी लूट के मुद्दे हैं, जिसे विपक्ष को उठाने चाहिए, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस सरकारी लूट की ओर गंभीरता से विचार कर तुरंत बंद करनी चाहिए। आपातकाल में पता नहीं कितने लोग जेल गए और न जाने कितनों को कोपभवन यानि गुमनामी जीवन जीना पड़ा था। जनसेवा के नाम पर किस तरह जनता को लूटा जा रहा है, योगी ने अभी मात्र एक के ऊपर से पर्दा उठाया है। जनसेवक को पेंशन किस आधार पर? जिस दिन ये सरकारी लूट बंद हो गयी सरकारी खजाने में धन का कोई आभाव नहीं होने पाएगा। सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रुका हुआ। क्यों जनसेवा को एक व्यापार बनाया जा रहा है?

इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा 1975 में लगाए गए आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले नेताओं को ‘लोकतंत्र सेनानी’ का दर्जा देकर उन्‍हें मासिक पेंशन दिए जाने का प्रावधान किया गया था, जिसका आजम खान भी जम कर फायदा उठा रहे थे। 2005 में उत्तर प्रदेश की सरकार ने उन्हें ‘लोकतंत्र सेनानी’ घोषित करते हुए उनके लिए पेंशन की व्यवस्था की थी। तब लखनऊ में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की सरकार थी।

शुरुआत में इस पेंशन के तहत 500 रुपए प्रतिमाह मिलते थे लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 20,000 रुपए कर दिया गया। कहा जा रहा है कि कई मुकदमों में उनके आरोपित होने की वजह से यूपी सरकार ने उन्हें मिलने वाली पेंशन पर रोक लगाई है। इमरजेंसी के काल में आजम खान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्र संघ से जुड़े हुए थे और उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार का विरोध किया था।

अब फरवरी 24, 2021 को रामपुर के जिला प्रशासन ने जब ‘लोकतंत्र सेनानियों’ की सूची जारी की तो उसमें आजम खान का नाम शामिल नहीं था। इस सूची में जिले के 35 लोगों के नाम थे। इससे पहले 37 लोगों को ये पेंशन दी जा रही थी। रामपुर के डीएम आंजनेय कुमार सिंह ने कहा कि आपराधिक मुकदमों की वजह से आजम की पेंशन रोकी गई है। सरकार ने इस सम्बन्ध में जानकारी भी माँगी थी।

हाल ही में उनके जौहर ट्रस्ट की 173 एकड़ (70 हेक्टेयर) जमीन यूपी सरकार के नाम दर्ज हो गई थी। राजस्व अभिलेखों में जमीन से जौहर ट्रस्ट का नाम काट कर यूपी सरकार के नाम पर चढ़ा दिया गया था। अखिलेश सरकार में जौहर ट्रस्ट द्वारा खरीदी गई जमीन पर जौहर यूनिवर्सिटी बनी हुई है। इसकी खरीद के दौरान उचित शर्तों का पालन नहीं किया गया। ट्रस्ट की जमीन पर पिछले दस सालों में चैरिटी का कोई कार्य न होने की बात भी सामने आई है।

94 वर्षीय विधवा ने माँगा 25 करोड़ का मुआफजा : ‘आपातकाल छल था, संविधान पर सबसे बड़ा हमला था’

सुप्रीम कोर्ट ने 94 साल की वीरा सरीन की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया है। सरीन ने 1975 में घोषित आपातकाल को ‘पूरी तरह असंवैधानिक’ घोषित करने की गुहार शीर्ष अदालत से लगाई है। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए कहा कि वह इस पहलू पर भी विचार करेगी कि क्या 45 साल बाद आपातकाल लागू करने की वैधानिकता पर विचार करना ‘जरूरी’ या ‘व्यावहारिक’ है।

94 साल की वीरा सरीन चाहती हैं कि चार दशक पहले उनका और उनके बच्चों का जो भी आपातकाल की वजह से नुकसान हुआ, उसकी अब भरपाई हो। सुप्रीम कोर्ट में डाली गई याचिका के अनुसार, तत्कालीन सरकार (इंदिरा सरकार) ने उनके पति और उन पर ‘अनुचित और मनमाने ढंग से डिटेंशन के आदेश’ जारी किए। इसके कारण उन्हें देश छोड़ना पड़ा। सरकार के आदेशों से उनका बिजनेस ठप्प हो गया। वहीं कई मूल्यवान वस्तुओं को अपने कब्जे में ले लिया। इसके लिए उन्होंने अपनी याचिका में 25 करोड़ रुपए के मुआवज़े की माँग की है।

वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे इस मामले की पैरवी कर रहे हैं। न्यायाधीश एसके कौल की अगुवाई वाली पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वह इसे संशोधित करके आगामी शुक्रवार (18 दिसंबर 2020) तक जमा करे। न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी और न्यायाधीश ऋषिकेश रॉय भी इस पीठ का हिस्सा हैं। पीठ ने यह भी कहा कि भले लोगों पर तमाम अत्याचार हुए हैं, लेकिन आपातकाल के सभी पहलुओं का दोबारा ज़िक्र करना सही नहीं होगा। उस दौर के 45 साल गुज़र जाने के बाद उन घावों को दोबारा कुरेदना सही नहीं होगा। पीठ ने स्पष्ट किया है कि वह सिर्फ आपातकाल की संवैधानिक वैधता के पहलू पर विचार करेगी।

हरीश साल्वे ने महिला का पक्ष रखते हुए कहा कि आपातकाल ‘छल’ था और यह संविधान पर ‘सबसे बड़ा हमला’ था क्योंकि महीनों तक मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गये थे। उन्होंने कहा, ‘‘यह हमारे संविधान पर सबसे बड़ा हमला था। यह ऐसा मामला है जिस पर हमारी पीढ़ी को गौर करना होगा। इस पर शीर्ष अदालत को फैसला करने की आवश्यकता है। यह राजनीतिक बहस नहीं है। हम सब जानते हैं कि जेलों में क्या हुआ। हो सकता है कि राहत के लिये हमने बहुत देर कर दी हो लेकिन किसी न किसी को तो यह बताना ही होगा कि जो कुछ किया गया था वह गलत था।’’ 

इस दलील पर न्यायाधीश कौल ने ज़िक्र किया कि 1975 में ऐसा कुछ तो हुआ था जो नहीं होना चाहिए था। साल्वे ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने न्यायालय का दरवाज़ा इसलिए खटखटाया है क्योंकि आपातकाल के दौरान उनके पति हिरासत में थे। इस पर न्यायालय का कहना था कि मामले से संबंधित लोग जीवित नहीं है। जवाब में हरीश साल्वे ने हिटलर के अत्याचारों का हवाला दिया। उनके मुताबिक़, “हिटलर भले आज जीवित नहीं है लेकिन उसके अत्याचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।” 

 साल्वे ने आपातकाल के क्रूर दौर की आलोचना करते हुए कहा, “उन 19 महीनों के दौरान मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था। अगर इतिहास में सुधार नहीं किया गया तो वह खुद को ज़रूर दोहराता है। उस समय सत्ता और शक्ति का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग हुआ था जिससे लोगों के मन में भय पैदा हुआ था। याचिकाकर्ता सिर्फ इस बात से बहुत खुश होगी अगर आपातकाल को ‘असंवैधानिक’ घोषित कर दिया जाए।” 

याचिका में सरीन ने कहा है कि सरकार का यह अत्याचार उनके पति बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने दबाव में आकर दम तोड़ दिया। इसके बाद वह अकेले हर परेशानी को झेलती रहीं और उन कार्रवाइयों को खुद ही सामना किया जो उनके ख़िलाफ़ आपातकाल में शुरू हुई थीं।

आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे--इंदिरा गाँधी

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इमरजेंसी में बंद होने वाले सम्पादक
केवल रतन मलकानी 
Related imageआर.बी.एल.निगम 
आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के कारण आपातकाल के दंश से गुजरना पड़ा। 25-26 जून 1975 की रात को आपातकाल के आदेश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना कि भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था।
प्रेस पर सेंसरशिप की तलवार 
आज मीडिया और विपक्ष खूब शोर मचाता है कि मोदी सरकार व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर पाबन्दी लगाने का प्रयास कर रही है, लेकिन कांग्रेस और इनके समर्थकों ने इमरजेंसी में कितने अत्याचार किये थे, उस पर कोई यह पूछने का साहस तक नहीं कर पाता। 
जून 1975 का महीना था। देश में इमरजेंसी लग चुकी थी। जेपी आंदोलन से डरीं इंदिरा गांधी और उनके सिपहसालारों की टोली अखबार मालिकों और संपादकों को सेंसरशिप से हंटर हांक रही थी। ज्यादातर संपादक साष्टांग दंडवत कर चुके थे। कोई आधा झुका था। कोई लेट चुका था। संजय गांधी सरकार में सीधे तौर पर नहीं कुछ होते हुए भी सब कुछ थे। मां देश की प्रधानमंत्री थीं। बेटा उनके नाम पर कुछ भी करने की हैसियत रखता था। प्रेस को कैसे काबू में रखना है और संपादकों से कैसे अपने पक्ष में मुनादी करवानी है, इसकी प्लानिंग संजय गांधी और उनके हुकुम के गुलाम मंत्री दिन रात कर रहे थे। तीन दिन के भीतर सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को सिर्फ इसलिए योजना आयोग में शंट कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने मां की जगह बेटे की बात न मानकर हुक्म उदूली करने की गुस्ताफी कर दी थी।
अखबारों में क्या छपेगा क्या नहीं यह संपादक नहीं, सेंसर अधिकारी तय करते थे । राज्यों के सूचना विभाग, भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) और जिला-प्रशासन के अधिकारियों को सेंसर-अधिकारी बनाकर अखबारों पर निगरानी रखने का काम दिया गया था। ये अधिकारी संपादकों-पत्रकारों के लिए निर्देश जारी करते थे और इन सेंसर अधिकारियों को ये निर्देश दिल्ली के उच्चाधिकारियों, कांग्रेस नेताओं, ख़ासकर इंदिरा गांधी और उनके छोटे बेटे संजय गांधी से प्राप्त होते थे । इन आदेशों पर अमल करना अनिवार्य था अन्यथा गिरफ्तारी से लेकर प्रेस-बंदी तक हो सकती थी।
वी सी शुक्ला के नाम से डरता था मीडिया 
दिल्ली के अखबारों और मीडिया में रैली की कम कवरेज से इंदिरा गांधी गुजराल से गुस्सा हो गईं और पांच दिन के अंदर उन्हें राजदूत बनाकर मॉस्को भेज दिया गया। इंद्र कुमार गुजराल की जगह पर वीसी शुक्ल को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया। मीडिया उनके नाम से कांपता था। शुक्ल कहते थे कि अब पुरानी आजादी फिर से नहीं मिलने वाली। कुछ अखबारों ने इसके विरोध में संपादकीय की जगह खाली छोड़नी शुरू कर दी। इसपर शुक्ला ने संपादकों की बैठक बुलाकर धमकाते हुए चेतावनी दी कि अगर संपादकीय की जगह खाली छोड़ी तो इसे अपराध माना जाएगा और इसके परिणाम भुगतने के लिए संपादकों को तैयार रहना होगा। यही नहीं, सरकार ने किसी भी खबर को बिना सूचित किए छापने पर प्रतिबंध लगा दिया। मीडिया को खबरों को छापने से पहले सरकारी अधिकारी को दिखाना पड़ता था।
गुजराल की जगह संजय के सबसे खास दरबारी और ढिंढोरची विद्या चरण शुक्ला को सूचना प्रसारण मंत्रालय की कमान सौंप दी गई थी। शुक्ला संजय का हुक्म बजाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। इमरजेंसी के नाम पर कायदे-कानून को अपने जेब में रखने वाले वीसी शुक्ला को संजय गांधी ने कुलदीप नैयर को कंट्रोल करने का टास्क दिया था।
इंदिरा गाँधी के कसीदे पढ़ते सम्पादक 
खुशवंत सिंह जैसे मठाधीश पत्रकार इंदिरा गांधी और संजय गांधी की शान में सजदे कर रहे थे, तब कुलदीप नैयर जैसे फाइटर पत्रकार-संपादक ही थे, जो सलाखों की परवाह किए बगैर चौथे खंभे की बुनियाद थामे बैठे थे। एक तरफ अखबारों का गला घोंटकर घुटने पर लाने की कवायद में जुटी संजय गांधी की सेना, दूसरी तरफ कुलदीप नैयर जैसे चंद पत्रकार। इमरजेंसी पर लिखी उनकी किताब - EMERGENCY RETOLD और ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ में उस दौर की दास्तान दर्ज हैं।
कुलदीप नैयर ने अपनी किताब में लिखा है- मुझे सबसे ज्यादा ठेस यह सुनकर पहुंची थी कि कुछ संपादक इमरजेंसी लगाने के लिए इंदिरा गांधी को बधाई देने पहुंचे थे तो उन्होंने पूछा था कि हमारे ‘नामी’ पत्रकारों को क्या हो गया था क्योंकि एक भी कुत्ता नहीं ‘भौंका’ था।  मैंने कुछ अखबारों और न्यूज एजेंसियों के चक्कर लगाकर 28 जून की सुबह दस बजे प्रेस क्लब में जमा होने को कहा। अगली सुबह मैं वहां पत्रकारों का जमघट देखकर हैरान रह गया था, जिनमें कुछ संपादक भी शामिल थे। बकौल कुलदीप नैयर उस दिन प्रेस क्लब में उनकी तरफ से तैयार सेंसर विरोधी प्रस्ताव पर एन मुखर्जी, आर वाजपेयी, बीएच सिन्हा, राजू नागराजन, एन मणि, वीरेन्द्र कपूर, आनंद वर्धन, बलवीर पुंज, विजय क्रांति, सुभाष किरपेकर, प्रभाष जोशी, वेदप्रताप वैदिक, चांद जोशी समेत 27 पत्रकारों ने दस्तखत किए थे। बाद में इसी प्रस्ताव के बारे में जानने के लिए वीसी शुक्ला ने कुलदीप नैयर को अपने दफ्तर बुलाया था, जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है।
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आपातकाल के दौरान जो पत्रिकाएं छप रही थीं उनमें से अधिकतर पत्रिकाएं आपातकाल के समर्थन में ही अपना पक्ष प्रस्तुत कर रहीं थीं जैसे मासिक पत्रिका ‘आजकल’ ने अपने जून, 1976 के अंक में ऐसी कुछ तस्वीरें छापकर आपातकाल के फायदों को दिखलाया। जिसे देखकर यह साफ हो जाता है कि बड़ी पत्रिकाओं ने सरकार के अंधभक्त होने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. इस अंक में ‘आपातकाल से पहले’….और “अब…”एक शीर्षक दिया गया – जिसमें पत्रिका ने एक बस के पास अस्त-व्यस्त भीड़ को,छात्रों के विरोध चित्र कोकुछ जला दी गयीं बसों के चित्रों को छापा और ‘अब…..’ शीर्षक के अंतर्गत तस्करों की धरपकड़ वाली तस्वीरबस के सामने पंक्ति में खड़े लोगकॉलेज में पढ़ने जा रहे छात्र-छात्राओं की तस्वीरें,परिवार नियोजन से मुस्कुराती महिलाओं की तस्वीरें आदि छापकर” आपातकाल के फायदों की बात प्रस्तुत की । साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी लोकप्रिय पत्रिका भी सेंसरशिप लागू होते ही सरकार के पक्ष मेंछापने लगे थे जैसे चुनाव की घोषणा के बाद  फरवरी, 1977 के अंक में – ‘राजनीतिक शतरंज के पुराने खिलाड़ी और नए मोहरे’ शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कांग्रेस का पलड़ा चुनाव में भारी है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही थी आपातकाल से पहले ‘सरिता’ पत्रिका में कुछ व्यंग्यपूर्ण एवं धारदार लेख प्रकाशित होते रहते थे लेकिन आपातकाल के दौरान इस पत्रिका की वैचारिकता पर भी सेंसरशिप नाम का ग्रहण लग चुका था, हालांकि आपातकाल के दौरान इस पत्रिका ने सम्पादकीय कॉलम लिखना छोड़ दिया था।
सबसे पहले गिरफ्तार होने वाले सम्पादक Motherland के केवल रतन मलकानी 
हालाँकि इमरजेंसी लगते ही, सबसे पहले दैनिक Motherland और साप्ताहिक Organiser के मुख्य संपादक विश्व विख्यात केवल रतन मलकानी को गिरफ्तार किया गया था। Motherland ऑफिस और मलकानी के निवास चारों तरफ से घेर लिया था। उनके बचकर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए थे। लेकिन Motherland साहसिक पत्रकारों ने इमरजेंसी लगने के अगले ही दिन एक पृष्ठ का सप्लीमेंट निकाल गिरफ्तार किये जा चुके विपक्ष नेताओं और पत्रकारों के नाम प्रकाशित कर दिए, 10 पैसे का वह सप्लीमेंट एक-एक रूपए में खूब बिक ही रहा था कि पुलिस हरकत में आ गयी। पुलिस आता देख बेचने वाला ही बचे अख़बार हवा में उड़ा जान बचाकर भागने में सफल तो हो गया, लेकिन उसके बाद से पहाड़ गंज पुलिस ने सरकारी आदेश मिलते Motherland में डेरा डालकर चौकीदार सुन्दर सिंह और सफाई कर्मचारी जौहरी लाल को छोड़, सारा दफ्तर खाली करवा, दैनिक का प्रकाशन रुकवा दिया। सम्पादक प्रो वेद प्रकाश भाटिया आदि का पता पूछने पर इन दोनों कर्मचारियों ने पुलिस के लठ्ठ खाए थे। प्रो भाटिया सूचना मिलते ही अंडरग्राउंड हो गए थे। वैसे कई स्थानों पर पुलिस ने बेकसूरों को बचाने के लिए अपनी नौकरी दॉँव लगा रखी थी।  
Indira-Collageइमरजेंसी लगते ही संजय गांधी सबसे पहले कुलदीप नैयर की गिरफ्तारी क्यों चाहते थे?
सरकार और शुक्ला जैसे मंत्रियों को इतनी ताकत उन बड़े पत्रकारों के समर्थन से भी मिली थी, जो इमरजेंसी लगाने के लिए इंदिरा गांधी को बधाई देने पहुंचे थे। जिस दिन वीसी शुक्ला ने कुलदीप नैयर को गिरफ्तारी का डर दिखाने के लिए बुलाया था, उसी दिन इंडियन एक्सप्रेस में उनका साप्ताहिक कॉलम छपा था- ‘नाट इनफ्फ मिस्टर भुट्टो’। लेख लिखा तो गया था पाकिस्तान के बारे में लेकिन इशारा भारत के हालात की तरफ था। पाकिस्तान में जुल्फीकार अली भुट्टो और फील्ड मार्शल अयूब खान के कार्यकाल की तुलना करते हुए नैयर ने लिखा था- ‘सबसे बुरा कदम उन्होंने लोगों का मुंह बंद करके उठाया है। प्रेस के मुंह पर ताला लगा है और विपक्ष के बयानों को सामने नहीं आने दिया जा रहा है। मामूली सी आलोचना भी बर्दाश्त नहीं की जा रही है।’
चूंकि इमरजेंसी की वजह से सीधे तौर पर इंदिरा सरकार के खिलाफ नहीं लिखा जा सकता था इसलिए कुलदीप नैयर ने चालाकी से पाक के बहाने भारत का हाल बयान किया था। वीसी शुक्ला ने नैयर को कहा कि ‘सरकार में बैठे लोग बेवकूफ नहीं है। कोई भी समझ सकता है कि इमरजेंसी और इंदिरा गांधी की बात की जा रही है।
कुलदीप नैयर ने 10 जुलाई 1975 को लिखा- प्रजातंत्र का उपदेश देने वालों के हाथ खून से रंगे पाए गए।
कुलदीप नैयर ने इमरजेंसी और इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ ऐसा मोर्चा खोल रखा था कि सरकार के सिपहसालार बौखलाए हुए थे। सेंसर को चमका देने के लिए कुलदीप नैयर ने वीसी शुक्ला की धमकी के बाद दो लेख और लिखे। इस बार दोनों लेखों में अमेरिका के बहाने इशारों में भारत की बात की गई। कुलदीप नैयर ने 10 जुलाई 1975 को लिखा- प्रजातंत्र का उपदेश देने वालों के हाथ खून से रंगे पाए गए। राष्ट्रपति निकसन किसी भी दूसरे राष्ट्रपति की तुलना में ज्यादा मतों से जीते थे फिर प्रेस और जनमानस के आगे उन्हें झुकना पड़ा और सत्ता से बाहर होना पड़ा। इस लेख के छपते ही सेंसर अधिकारियों ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को निर्देश दिया कि कुलदीप नैयर या उनके किसी छद्म नाम से कोई भी लेख सेंसर को दिखाए बिना अखबार में नहीं छपना चाहिए। इसी के बाद कुलदीप नैयर की गिरफ्तारी हो गई थी।
गिरफ्तारी के पहले कुलदीप नैयर ने इमरजेंसी के खिलाफ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कड़ी चिट्ठी लिखी थी। कुलदीप नैयर लिखा था-
‘मैडम, किसी अखबार वाले के लिए यह तय करना मुश्किल होता है कि उसे कब मुंह खोलना चाहिए। वह जानता है कि ऐसा करके वह कहीं न कहीं किसी न किसी को नाराज करने का खतरा उठा रहा है। एक आम आदमी की तुलना में सरकार में सच्चाई को छिपाने और इसके प्रकट होने पर भयभीत होने की प्रवृति कहीं ज्यादा होती है। प्रशासन में ऊंचे पदों पर बैठे व्यक्ति यह मानकर चलते हैं कि वे और सिर्फ वे यही बात जानते हैं कि राष्ट्र को कब, कैसे और कितना बताना चाहिए। इसलिए अगर कोई ऐसी खबर छपती है, जिसे वो नहीं बताना चाहते तो उन्हें बहुत गुस्सा आता है। एक स्वतंत्र समाज में इमरजेंसी के बाद आप कई बार कह चुकी हैं कि आप इस धारणा में निष्ठा रखती हैं। प्रेस को जनता को सूचित करने के अपने कर्तव्य का पालन करना पड़ता है। अगर प्रेस सिर्फ सरकारी वक्तव्यों और सूचनाओं का प्रकाशन करता रहेगा तो चूकों, कमियों और गलतियों पर कौन उंगली उठाएगा?’
कुछ अखबार विपक्षी मोर्चे का अभिन्न अंग बन गए थे--शारदा प्रसाद, इंदिरा के सूचना सलाहकार 
कुलदीप नैयर के इस पत्र का जवाब इंदिरा गांधी की तरफ से उनके सूचना सलाहकार शारदा प्रसाद ने दिया। शारदा प्रसाद ने इमरजेंसी के दौरान प्रेस सेंसर को सही ठहराते हुए लिखा- ‘अगर पिछले कुछ हफ्तों से सेंसरशिप लागू की गई है तो इसका कारण कोई व्यक्तिगत या सरकारी अति संवेदनशीलता नहीं है। इसका कारण यह है कि कुछ अखबार विपक्षी मोर्चे का अभिन्न अंग बन गए थे। इन पार्टियों को राष्ट्रीय जीवन को अस्त व्यस्त करने की उनकी योजना को कार्यान्वित करने से रोकना जरुरी हो गया था। प्रेस पर लगाए प्रतिबंधों के बाद पिछले कुछ दिनों में स्थिति में सचमुच सुधार हुआ है। प्रेस की आजादी व्यक्तिगत आजादी का ही हिस्सा है, जिसे किसी भी देश को राष्ट्रीय आपातकाल के समय में अस्थाई रुप से सीमित करना पड़ता है।’
बाद के सालों में इंदिरा के करीबी रहे आरके धवन ने सफाई देते हुए कुलदीप नैयर को कहा था कि संजय गांधी चाहते थे कि सभी बड़े पत्रकारों का मुंह बंद कर दिया जाए। धवन ने नैयर साहब को ये भी बताया था कि एक गोपनीय बैठक में सबसे पहले गिरफ्तारी के लिए उनका ही नाम लिया गया था क्योंकि उन्हें बड़ा पत्रकार माना जाता था। नैयर को गिरफ्तार करने वाले असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर बरार तक ने अपनी बेचारगी जाहिर करते हुए कहा था कि यह गिरफ्तारी मेरी आत्मा पर बोझ बनी रहेगी क्योंकि मैं एक निर्दोष आदमी को गिरफ्तार कर रहा हूं।

आपातकाल लगाने  की वजह

इसकी जड़ में 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। और श्रीमती गांधी के चिर प्रतिद्वंदी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया था।
राजनारायण सिंह की दलील थी कि इन्दिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था। इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। तब कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा था कि इन्दिरा गांधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।
इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गईं। इन्दिरा गांधी ने अदालत के इस निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई।
उस समय आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी। इस दौरान जनता के सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।

सरकार के पास थे असीमित अधिकार


आपातकाल के दौरान सत्ताधारी कांग्रेस आम आदमी की आवाज को कुचलने की निरंकुश कोशिश की। इसका आधार वो प्रावधान था जो धारा-352 के तहत सरकार को असीमित अधिकार देती थी। 
-इंदिरा जब तक चाहें सत्ता में रह सकती थीं।
-लोकसभा-विधानसभा के लिए चुनाव की जरूरत नहीं थी।
-मीडिया और अखबार आजाद नहीं थे
-सरकार कैसा भी कानून पास करा सकती थी।

मीसा-डीआईआर का कहर
मीसा और डीआईआर के तहत देश में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के नायक जय प्रकाश नारायण की किडनी कैद के दौरान खराब हो गई थी । उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं। देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी के सभी सलाखों के पीछे डाल दिए गए। एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गईं। बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिला। 
एक तरफ नेताओं की नई पौध राजनीति सीख रही थी, दूसरी तरफ देश को इंदिरा के बेटे संजय गांधी अपने दोस्त बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता की तिकड़ी के जरिए चला रहे थे। संजय गांधी ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनवाया जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी, जिसने भी इनकार किया उसे जेलों में डाल दिया गया।।

संजय गांधी ने चलाया था पांच सूत्रीय कार्यक्रम

संजय गांधी (फाइल फोटो)एक तरफ देशभर में सरकार के खिलाफ बोलने वालों पर जुल्म हो रहा था तो दूसरी तरफ संजय गांधी ने देश को आगे बढ़ाने के नाम पर पांच सूत्रीय एजेंडे परिवार नियोजन, दहेज प्रथा का खात्मा, वयस्क शिक्षा, पेड़ लगाना, जाति प्रथा उन्मूलन पर काम करना शुरू कर दिया था
बताया जाता है कि सुंदरीकरण के नाम पर संजय गांधी ने एक ही दिन में दिल्ली के तुर्कमान गेट की झुग्गियों को साफ करवा डाला लेकिन पांच सूत्रीय कार्यक्रम में ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। लोगों की जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई। कहा तो ये भी जाता है कि पुलिस बल गांव के गांव घेर लेते थे और पुरुषों को पकड़कर उनकी नसबंदी करा दी जाती थी।

पहले ही बन चुकी थी आपातकाल की योजना

इमरजेंसी के बहुत बाद एक साक्षात्कार में इंदिरा ने कहा था कि उन्हें लगता था कि भारत को शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है। लेकिन, इस शॉक ट्रीटमेंट की योजना 25 जून की रैली से छह महीने पहले ही बन चुकी थी। 8 जनवरी 1975 को सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा को एक चिट्ठी में आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी। चिट्ठी के मुताबिक ये योजना तत्कालीन कानून मंत्री एच आर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ और बांबे कांग्रेस के अध्यक्ष रजनी पटेल के साथ उनकी बैठक में बनी थी।
आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे--इंदिरा गाँधी 
आपातकाल के जरिए इंदिरा गांधी जिस विरोध को शांत करना चाहती थीं, उसी ने 19 महीने में देश का बेड़ागर्क कर दिया। संजय गांधी और उनकी तिकड़ी से लेकर सुरक्षा बल और नौकरशाही सभी निरंकुश हो चुके थे। एक बार इंदिरा गांधी ने कहा था कि आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे, लेकिन 19 महीने में उन्हें गलती और लोगों के गुस्से का एहसास हो गया। 18 जनवरी 1977 को उन्होंने अचानक ही मार्च में लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। 16 मार्च को हुए चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों ही हार गए। 21 मार्च को आपातकाल खत्म हो गया लेकिन अपने पीछे लोकतंत्र का सबसे बड़ा सबक छोड़ गया।
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बॉलीवुड भी नहीं रहा अछूता
आपातकाल के खौफ से बॉलीवुड भी अछूता नहीं रहा इस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म निर्माताओं, गीतकारों और अभिनेताओं से इंदिरा और केंद्र सरकार की प्रशंसा के गीत गाने और इसी तरह की फिल्म बनाने के लिए दबाव डाला गया। मशहूर गायक किशोर कुमार ने जब मना कर दिया तो वीसी शुक्ला ने इसे व्यक्तिगत खुन्नस मानकर पहले तो रेडियो से उनके गानों का प्रसारण बंद करा दिया और फिर उनके घर पर इनकम टैक्स के छापे डलवाए। उन्हें रोज धमकियां दी जाती थी जिस से अंत में परेशान होकर उन्होंने सरकार के आगे हार मान ली। इससे वीसी शुक्ला की हिम्मत और बढ़ गई।
इस खौफ के आतंक में अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का और मशहूर गीतकार गुलजार की फिल्म आंधी पर भी पाबंदी लगा दी गई। किस्सा कुर्सी का के तो सारे प्रिंट जला दिए गए और जगह–जगह प्रिंट को ढूंढने के लिए छापे डाले गए। अमृत नाहटा को जमकर प्रताड़ित किया गया। मनोज कुमार की फिल्म 'रोटी कपडा और मक़ान' के महंगाई पर चर्चित गीत 'हाय तू कहाँ से आयी....' के प्रसारण के अलावा फिल्म में से भी निकलवा दिया था। इस तरह के कारनामों की वजह से कई फिल्म निर्माताओं ने अपने नए प्रोजेक्ट टाल दिए। कुछ ने अपनी फिल्मों का निर्माण धीमा कर दिया। फिल्म धर्मवीर को रिलीज होने में पांच महीने लग गए।
वीसी शुक्ला के बंगले पर फिल्मी सितारों को विशेष कार्यक्रम पेश करने के लिए मजबूर किया जाने लगा और इन कार्यक्रमों में जो मंत्री महोदय के बंगले पर होते उनमें संजय गांधी खासतौर पर मौजूद रहते थे ।

इन्दिरा गाँधी : न्यायालय के आदेश को ठेंगा दिखा आपातकाल घोषित कर बेकसूरों को जेलों में भरा था

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                                                                              चित्र साभार  : जनसत्ता 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज कांग्रेस और कांग्रेस समर्थक पार्टियाँ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लोकतंत्र का गला घोटने, तानाशाही आदि का आरोप लगा कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है, लेकिन ये सभी पार्टियाँ भूल रही हैं कि इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते किस तरह से तानाशाही रवैया अपनाते, न्यायालय, मीडिया और हिन्दुओं पर कितने अत्याचार किये थे। जब चुनाव में धांधली के आरोप में सोशलिस्ट नेता राजनारायण(जनता पार्टी राज में स्वास्थ्य केन्द्रीय मंत्री रहे) ने कोर्ट में पराजित किया और कोर्ट ने आदेश में इंदिरा गाँधी को पदमुक्त किया था, परन्तु इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल घोषित कर विरोधियों को आधी रात से जेलों में भरना शुरू कर दिया था। आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी एवं अन्य नेता और इनके समर्थक किस मुँह से मोदी पर तानाशाह का आरोप लगा रहे हैं। बल्कि इस मुद्दे पर मीडिया को भी निर्भीकता से इन मुद्दों को उठाना चाहिए। विशेषकर, रामनाथ गोयनका पुरस्कार लेने पत्रकारों को। रामनाथ गोयनका ने आपातकाल में तानाशाह प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का मुकाबला किया था। 7 नवम्बर 1966 को गौ-हत्या का विरोध कर रहे निहत्थे साधु-सन्तों पर गोली चलवाकर दिल्ली में पार्लियामेंट स्ट्रीट बेगुनाहों के खून से लाल करवाने वाली तत्कालीन तानाशाह इंदिरा गाँधी ही थी।       
इंदिरा प्रियदर्शनी गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद में हुआ। इंदिरा साल 1966 से 77 और 1980 से 1984 तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। वह जवाहरलाल नेहरू की एक मात्र संतान थीं। इंदिरा ने शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल)(स्मरण हो, इनके चाल-चलन के कारण रविन्द्र नाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन से निकाल दिया था।) और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई की और 1938 में कांग्रेस पार्टी में शामिल हुईं। उन्होंने 1960 में कांग्रेस पार्टी के नेता फिरोज गांधी से निकाह किया। इंदिरा गांधी के दो बच्चे हुए राजीव गांधी और संजय गांधी। इंदिरा गांधी की राजनीति में दिलचस्पी शुरुआत से ही रही। वह बचपन से अपने पिता के साथ राजनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थीं और यात्राएं करती थीं।
1947 में कांग्रेस पार्टी के सत्ता में आते ही इंदिरा की सक्रिय राजनीति में शुरुआत हो गई। वह 1955 में कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की सदस्य बन गईं। वह पहली बार 1964 में राज्यसभा की सदस्य बनीं। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। शास्त्री की सरकार में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का विभाग दिया गया।
कांग्रेस का विभाजन 
1966 में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनाया गया। प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा की राजनीतिक चुनौतियों का दौर शुरू हो गया। इंदिरा के नेतृत्व को मोरारजी देसाई और पार्टी के पुराने नेताओं से चुनौती मिलती रही। राजनीति में देसाई के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इंदिरा को उन्हें उप प्रधानमंत्री तक बनाना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। इंदिरा राजनीतिक चुनौतियों से घबराई नहीं और उन्होंने न्यू कांग्रेस पार्टी के नाम से नए राजनीतिक दल का गठन किया। साल 1971 के आम चुनाव में इंदिरा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। साल 1971 इंदिरा गांधी के लिए बेहम कामयाब रहा। उन्होंने में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर बांग्लादेश बनवा था। इस फैसले ने उनकी छवि आयरन लेडी के रूप में गढ़ी। उन्होंने सबसे पहले बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान ) को एक सरकार के रूप में मान्यता दी।
न्यायालय के आदेश को ठेंगा दिखा आपातकाल घोषित 
1975 में चुनाव में धांधली  करने का दोषी पाए जाने पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया। हालांकि उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट का फैसला मानने से इंकार कर दिया था और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी थी। संजय गांधी भी नहीं चाहते थे कि उनकी मां के हाथ से सत्ता चली जाए। वहीं जय प्रकाश नारायण की अगुवाई में पूरा विपक्ष एकजुट होकर इंदिरा के सामने खड़ा हो गया था। पूरे देश में इंदिरा के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया। सरकार विपक्ष के आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार ने कड़े रुख अपनाया।  अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुलायम सिंह यादव समेत विपक्ष के तमाम नेता जेल में बंद कर दिया था। संजय ने भी खूब मनमानी की। इस मामले में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। राजनीतिक सत्ता अपने हाथ से फिसलते देख उन्होंने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। इस दौरान विरोधी नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाला गया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाई गई। आपातकाल के दौरान सरकार ने जनसँख्या को नियन्त्रित करने के उद्देश्य से नसबंदी का दुरूपयोग किया गया। यहाँ तक की भिखारियों, रिक्शा चालक एवं झल्ली ढोने वालों तक की पकड़-पकड़ कर जबरदस्ती नसबंदी कर दी गयी थी। अध्यापक और सरकारी कर्मचारियों को अपनी वार्षिक वेतन वृद्धि और पदोन्नति लेने की लिए कम से कम दो नसबन्दी के केस लाने के लिए मजबूर किया गया था, और ऐसा न करने पर उनका सुदूर इलाकों में ट्रांसफर कर दिया जाता था। 
फिल्मों एवं गीतों पर पाबन्दी 
चर्चित गायक किशोर कुमार द्वारा किसी कार्यक्रम में फ्री में गीत गाने के कारण, फिल्मों और रेडियो पर उनके गानों पर पाबन्दी लगा दी गयी थी। फिल्म "रोटी,कपडा और मकान" के चर्चित गीत "हाय महँगाई तू कहाँ से आयी...", फिल्में "किस्सा कुर्सी का", "आंधी" आदि फिल्मों पर पाबन्दी लगा दी गयी थी।  
समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं पर Censorship 
Related imageआपातकाल के वक्त देश का चौथा स्तंभ माने जाने वाला मीडिया का भी खूब उत्पीड़न किया गया था। अखबारों पर सेंसेस बैठा दिया गया था। सेंसरशिप के अलावा अखबारों और सामाचार एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नया कानून बनाया । जिसके बाद देशभर में आपत्तिजनक सामाग्री पर रोक लगा दी गई। कानून के बारे में बोलते हुए कहा था कि इसके जरिए संपादकों की स्वतंत्रता की समस्या का हल हो जाएगा। सरकार ने उस वक्त चारों सामाचार एजेंसियों  पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती को खत्म करके उन्हें ‘समाचार’ नामक एजेंसी में तबदील कर दिया था।
आपातकाल में बिना सरकार की इजाजत के बिना कोई प्रकाशित नहीं कर सकता था। प्रमाण के लिए उस समय के Indian Express को देखा जा सकता है। सरकार के विरुद्ध समाचार को सेंसर कर दिया जाता था, संघ समर्थित कई पत्र/पत्रिकाओं जैसे Motherland(अंग्रेजी दैनिक), Organiser और पाञ्चजन्य आदि पर ऐसा अंकुश लगाया गया कि तत्कालीन अत्याचारों के चलते प्रकाशन असम्भव था। 
भाईयों और बहनों राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है। ये शब्द थे उस दौर की सबसे ताकतवर महिला और त्तकालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के।  25 जून 1975 में आधी रात को देशभर में  आपातकाल की घोषणा की गई थी। ये आपातकाल 21 मार्च 1977 तक रहा। ये देश के इतिहास का वो काला अध्याय है जिससे याद कर आज भी लोगों की आंखे नम हो जाती है। कहा जाता है कि आपातकाल लागू होने के बाद लोगों से उनके अधिकार छीन लिए गए थे। 
लोगों के पास नहीं रहे थे अधिकार 
इमरजेंसी के दौरान भारत एक जेल में तबदील हो गया था। नागरिकों के सारे मौलिक अधिकार भी छीन लिए गए थे। नागरिकों के अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि आपातकाल के दौरान नागरिकों को अधिकारों के हनन हुआ था। 
वकीलों और जजो को भी नहीं बख्शा गया 
इस दौरान नागरिकों के साथ भी खूब दुर्व्यवहार किया। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा  करने वालें वकीलों को भी बख्शा नहीं गया और खासकर बार काउंसिल के अध्यक्ष राम जेठमलानी को। उन्हें सबक सिखाने के लिए संसद के कानून द्वारा अटॉर्नी जनरल को इसका अध्यक्ष बना दिया गया बाकी जिन भी 42 जजों ने नजरबंदियों के मुकदमों में न्यायसंगत दिए या देने की कोशिश की उन सभी का तबादला कर दिया गया।  
1977 में जनता ने कांग्रेस को सत्ता से हटाया 
कांग्रेस पार्टी को आपातकाल का नतीजा 1977 के आम चुनावों में भुगतना पड़ा। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और देश में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। यह देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी।
1978 की शुरुआत में इंदिरा ने कांग्रेस (आई) पार्टी बनाई। अक्टूबर 1977 से दिसंबर 1978 के बीच कुछ समय के लिए वह जेल में भी रहीं। इन झटकों के बावजूद वह 1978 में लोकसभा सीट जीत गईं और उनकी पार्टी एक बार फिर से जनता में अपनी पकड़ बनाने लगी। 1980 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो उनकी पार्टी कांग्रेस (आई) बहुमत से जीतकर सत्ता में आई। इंदिरा के पीएम बनने के बाद उनके बेटे संजय गांधी उनके राजनीतिक सलाहकार बने। इसके बाद इंदिरा और संजय के खिलाफ सभी मुकदमों को वापस ले लिया गया। 1980 में संजय गांधी की एक विमान हादसे में मौत हो गई। संजय की मौत के बाद इंदिरा ने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में राजीव गांधी को तैयार करना शुरू किया।
अवलोकन करें:-
इस खण्‍ड में लिखा गया है कि इंदिरा ‘बिस्‍तर में बेहद अच्‍छी थीं’ औरं सेक्‍स में ‘वह फ्रेंच महिलाओं और केरल नायर महिलाओं का मिश्रण थीं।’ किताब में यह भी दावा किया गया है कि वह लेखक (मथाई) से गर्भवती हो गई थीं और गर्भपात कराना पड़ा। कई अपुष्‍ट ऑनलाइन वर्जन में इंदिरा के हवाले से कहा गया कि इंदिरा गाँधी ने एक बार कहा था कि वो किसी हिन्दू के साथ अफेयर तो कर सकती है, लेकिन किसी हिन्दू के साथ शादी नहीं कर सकती।’
इस वेबसाइट का परिचय

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जब हम पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की बात करते हैं, तो कई कांग्रेसी कहते हैं कि वह ....


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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार क्या कांग्रेसी हिन्दू गो मांस की इस तरह दावत के लिए 
नब्बे दशक की शुरुआत में इंदिरा गांधी को पंजाब में बढ़ते अलगाववाद का सामना करना पड़ा। जरनैल सिंह भिंडरवाला पंजाब से अलग खालिस्तान की मांग कर रहा था। उसने अपनी इस मांग के लिए हिंसा का रास्ता चुना था। 1982 में भिंडरावाले अपने गुट के सदस्यों के साथ हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) पर कब्जा कर लिया। 1984 में इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर को मुक्त कराने के लिए सेना को आदेश दिया। सेना स्वर्ण मंदिर में दाखिल हुई और भिंडरावाला को उसके साथियों के साथ मार गिराया। सेना की इस कार्रवाई से सिख समुदाय में असंतोष एवं नाराजगी फैली और इसके पांच महीने बाद इंदिरा गांधी की सुरक्षा में तैनात दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। राजीव 1989 तक देश के पीएम रहे।