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क्यों रह गयी माँ नर्मदा कुंवारी?

कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया लेकिन क्या सचमुच वह गुस्से की आग में चिरकुवांरी बनी रही या फिर प्रेमी शोणभद्र को दंडित करने का यही बेहतर उपाय लगा कि आत्मनिर्वासन की पीड़ा को पीते हुए स्वयं पर ही आघात किया जाए। नर्मदा की प्रेम-कथा लोकगीतों और लोककथाओं में अलग-अलग मिलती है लेकिन हर कथा का अंत कमोबेश वही कि शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह मोड़ लिया और उलटी दिशा में चल पड़ीं। सत्य और कथ्य का मिलन देखिए कि नर्मदा नदी विपरीत दिशा में ही बहती दिखाई देती है।

कथा 1 : नर्मदा और शोण भद्र की शादी होने वाली थी। विवाह मंडप में बैठने से ठीक एन वक्त पर नर्मदा को पता चला कि शोण भद्र की दिलचस्पी उसकी दासी जुहिला(यह आदिवासी नदी मंडला के पास बहती है) में अधिक है। प्रतिष्ठत कुल की नर्मदा यह अपमान सहन ना कर सकी और मंडप छोड़कर उलटी दिशा में चली गई। शोण भद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह भी नर्मदा के पीछे भागा यह गुहार लगाते हुए' लौट आओ नर्मदा'... लेकिन नर्मदा को नहीं लौटना था सो वह नहीं लौटी।
अब आप कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि सचमुच नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की दो प्रमुख नदियों गंगा और गोदावरी से विपरीत दिशा में बहती है यानी पूर्व से पश्चिम की ओर। कहते हैं आज भी नर्मदा एक बिंदू विशेष से शोण भद्र से अलग होती दिखाई पड़ती है। कथा की फलश्रुति यह भी है कि नर्मदा को इसीलिए चिरकुंवारी नदी कहा गया है और ग्रहों के किसी विशेष मेल पर स्वयं गंगा नदी भी यहां स्नान करने आती है। इस नदी को गंगा से भी पवित्र माना गया है।

मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह वर्णित है -‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है।’ एक अन्य प्राचीन ग्रन्थ में सप्त सरिताओं का गुणगान इस तरह है।
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेSस्मिन सन्निधिं कुरु।।
कथा 2 : इस कथा में नर्मदा को रेवा नदी और शोणभद्र को सोनभद्र के नाम से जाना गया है। नद यानी नदी का पुरुष रूप। (ब्रह्मपुत्र भी नदी नहीं 'नद' ही कहा जाता है।) बहरहाल यह कथा बताती है कि राजकुमारी नर्मदा राजा मेखल की पुत्री थी। राजा मेखल ने अपनी अत्यंत रूपसी पुत्री के लिए यह तय किया कि जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प उनकी पुत्री के लिए लाएगा वे अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ संपन्न करेंगे। राजकुमार सोनभद्र गुलबकावली के फूल ले आए अत: उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हुआ।
नर्मदा अब तक सोनभद्र के दर्शन ना कर सकी थी लेकिन उसके रूप, यौवन और पराक्रम की कथाएं सुनकर मन ही मन वह भी उसे चाहने लगी। विवाह होने में कुछ दिन शेष थे लेकिन नर्मदा से रहा ना गया उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों प्रेम संदेश भेजने की सोची। जुहिला को सुझी ठिठोली। उसने राजकुमारी से उसके वस्त्राभूषण मांगे और चल पड़ी राजकुमार से मिलने। सोनभद्र के पास पहुंची तो राजकुमार सोनभद्र उसे ही नर्मदा समझने की भूल कर बैठा। जुहिला की ‍नियत में भी खोट आ गया। राजकुमार के प्रणय-निवेदन को वह ठुकरा ना सकी। इधर नर्मदा का सब्र का बांध टूटने लगा। दासी जुहिला के आने में देरी हुई तो वह स्वयं चल पड़ी सोनभद्र से मिलने।
वहां पहुंचने पर सोनभद्र और जुहिला को साथ देखकर वह अपमान की भीषण आग में जल उठीं। तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी फिर कभी ना लौटने के लिए। सोनभद्र अपनी गलती पर पछताता रहा लेकिन स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक बनी नर्मदा पलट कर नहीं आई।
अब इस कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि जैसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जुहिला (इस नदी को दुषित नदी माना जाता है, पवित्र नदियों में इसे शामिल नहीं किया जाता) का सोनभद्र नद से वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर संगम होता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी और अकेली उल्टी दिशा में बहती दिखाई देती है। रानी और दासी के राजवस्त्र बदलने की कथा इलाहाबाद के पूर्वी भाग में आज भी प्रचलित है।
कथा 3 : कई हजारों वर्ष पहले की बात है। नर्मदा जी नदी बनकर जन्मीं। सोनभद्र नद बनकर जन्मा। दोनों के घर पास थे। दोनों अमरकंट की पहाड़ियों में घुटनों के बल चलते। चिढ़ते-चिढ़ाते। हंसते-रुठते। दोनों का बचपन खत्म हुआ। दोनों किशोर हुए। लगाव और बढ़ने लगा। गुफाओं, पहाड़‍ियों में ऋषि-मुनि व संतों ने डेरे डाले। चारों ओर यज्ञ-पूजन होने लगा। पूरे पर्वत में हवन की पवित्र समिधाओं से वातावरण सुगंधित होने लगा।
इसी पावन माहौल में दोनों जवान हुए। उन दोनों ने कसमें खाई। जीवन भर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ने की। एक-दूसरे को धोखा नहीं देने की।
एक दिन अचानक रास्ते में सोनभद्र ने सामने नर्मदा की सखी जुहिला नदी आ धमकी। सोलह श्रृंगार किए हुए, वन का सौन्दर्य लिए वह भी नवयुवती थी। उसने अपनी अदाओं से सोनभद्र को भी मोह लिया। सोनभद्र अपनी बाल सखी नर्मदा को भूल गया। जुहिला को भी अपनी सखी के प्यार पर डोरे डालते लाज ना आई। नर्मदा ने बहुत कोशिश की सोनभद्र को समझाने की। लेकिन सोनभद्र तो जैसे जुहिला के लिए बावरा हो गया था।
नर्मदा ने किसी ऐसे ही असहनीय क्षण में निर्णय लिया कि ऐसे धोखेबाज के साथ से अच्छा है इसे छोड़कर चल देना। कहते हैं तभी से नर्मदा ने अपनी दिशा बदल ली। सोनभद्र और जुहिला ने नर्मदा को जाते देखा। सोनभद्र को दुख हुआ। बचपन की सखी उसे छोड़कर जा रही थी। उसने पुकारा- 'न...र...म...दा...रूक जाओ, लौट आओ नर्मदा।
लेकिन नर्मदा जी ने हमेशा कुंवारी रहने का प्रण कर लिया। युवावस्था में ही सन्यासिनी बन गई। रास्ते में घनघोर पहाड़ियां आईं। हरे-भरे जंगल आए। पर वह रास्ता बनाती चली गईं। कल-कल छल-छल का शोर करती बढ़ती गईं। मंडला के आदिमजनों के इलाके में पहुंचीं। कहते हैं आज भी नर्मदा की परिक्रमा में कहीं-कहीं नर्मदा का करूण विलाप सुनाई पड़ता है।
नर्मदा ने बंगाल सागर की यात्रा छोड़ी और अरब सागर की ओर दौड़ीं। भौगोलिक तथ्य देखिए कि हमारे देश की सभी बड़ी नदियां बंगाल सागर में मिलती हैं लेकिन गुस्से के कारण नर्मदा अरब सागर में समा गई।
नर्मदा की कथा जनमानस में कई रूपों में प्रचलित है लेकिन चिरकुवांरी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवेदनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी रूप में है लेकिन चाहे-अनचाहे भक्त-गण उनका मानवीयकरण कर ही लेते है। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुंदर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है और वे कह उठते हैं नमामि देवी नर्मदे...
जय मां नर्मदा, जय सनातन धर्म

उत्तर प्रदेश :कोरोना की तीसरी लहर आने से पूर्व योगी एक्शन में ;गाँवों की पंचायतों में ही वैक्सीन और टेस्टिंग के लिए 8000 रैपिड रिस्पॉन्स टीमें गठित

भारत के सबसे बड़े प्रदेश में कोरोना को मात देने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोई कसर नहीं छोड़ रहे और उनके अथक प्रयासों की WHO ने भी प्रशंसा की है। प्रदेश में चाहे ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा हो या वैक्सीन का केंद्र पर आश्रित रहने की बजाए उन्होंने स्वयं उसका प्रबंध करने का प्रयास किया। 
कोरोना वायरस की दूसरी लहर से जारी जंग के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि प्रदेश सरकार कोरोना की थर्ड वेव से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है। ब्लैक फंगस की समस्या से निपटने की योजना के बारे में जानकारी देते हुए सीएम ने कहा कि इसके लिए प्रशिक्षण शुरू कर दिया गया है और उस पर तेजी से कार्य किया जा रहा है। इसके अलावा गाँवों में जो लोग वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं करा सकते हैं, उनके लिए ग्राम पंचायतों में ही टीके की व्यवस्था की जा रही है।

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि गाँवों में कोरोना के फैलाव को रोकने के लिए प्रदेश के 58 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में टीमें सक्रियता से कार्य कर रही है। कोरोना के थर्ड फेज में बच्चों पर इसके अधिक असर होने की बात कही जा रही है, जिसको लेकर सीएम योगी ने पहले से ही तैयार होने की बात कही है। उन्होंने जानकारी दी कि राज्य सरकार ने 5 मई से ही थर्ड वेव की तैयारी शुरू कर दी थी। 16 मई 2021 को नोएडा के दौरे पर पहुँचे मुख्यमंत्री योगी ने ये बातें कही।

मुख्यमंत्री योगी ने ग्रामीण क्षेत्रों के दौरे का ऐलान करते हुए कहा कि गाँवों के लोग कोरोना के हालात से पूरी तरह से वाकिफ हैं। हमने COVID-19 सैंपल टेस्टिंग के लिए लगभग 8000 रैपिड रिस्पांस टीमों का गठन किया है। साथ ही कोरोना वायरस के तीसरे चरण से निपटने के लिए योजनाएँ भी तैयार कर ली गई हैं।

योगी ने प्रदेश में गंगा से निकली लाशों को लेकर कहा कि उन्नाव में गंगा में मिले शवों की सामान्य मौत थी, जिसे डर के कारण श्मशान घाट ले जाने के बजाय लोगों ने उसे गंगा में प्रवाहित कर दिया। सीएम ने बताया कि सभी मृतकों का सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो सके इसके लिए हमने हर ग्राम पंचायतों में 5000 रुपए की राशि दी है।

विशेषज्ञों को किया गलत सिद्ध 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में कोरोना संक्रमण को लेकर विशेषज्ञों के दावों को लेकर कहा कि जो विशेषज्ञ उत्तर प्रदेश में एक लाख केस आने का दावा कर रहे थे, हमने उन्हें गलत साबित कर दिया है। क्योंकि हम जमीन पर काम कर रहे थे। उन्होंने टीकाकरण के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया है, जिसमें से 6 कंपनियों ने बिडिंग की है।

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की मौत के पीछे ‘कांग्रेसी बाबा’ की साज़िश?

गंगा के लिए 112 दिन से उपवास कर रहे स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद यानी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के निधन के मामले में कुछ चौंकाने वाली जानकारियां सामने आ रही हैं। ऋषिकेश के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उनका इलाज करने वाले डॉक्टरों ने कहा है कि प्रोफेसर अग्रवाल अनशन तोड़ने के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन कोई था जो उन्हें अनशन जारी रखने के लिए उकसा रहा था। एम्स के डायरेक्टर डॉक्टर रविकांत ने मीडिया से बातचीत में इसकी पुष्टि की है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि यह दबाव किसका था। एम्स का ये दावा इस मौत को लेकर छिड़े विवाद को नया रंग दे चुका है। 
मातृ सदन संस्था की भूमिका भी सवालों के दायरे में
सूत्रों के मुताबिक एम्स के अधिकारी जिसकी तरफ इशारा कर रहे हैं वो दरअसल उन्हीं के करीबी कुछ बड़े साधु-संत हैं। इसके अलावा मातृ सदन संस्था की भूमिका भी सवालों के दायरे में है। प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को स्वामी सानंद के रूप में 2011 में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दीक्षा दी थी। यह इत्तेफाक है कि स्वरूपानंद और अविमुक्तेश्वरानंद, दोनों ही कांग्रेस के बेहद करीबी माने जाते हैं।
एम्स, ऋषिकेश के निदेशक डॉ. रविकांत ने बताया है कि स्वामी सानंद अपना अनशन खत्म करना चाहते थे। लेकिन कोई उन्हें ऐसा न करने के लिए हिदायत दे रहा था और इसी बारे में उन्हें एसएमएस और फोन किए जा रहे थे। स्वामी सानंद के साथ रहकर इलाज कर रही डॉक्टरों की टीम भी यही बात कह रही है। लेकिन कोई उन्हें फोन और एसएमएस करके अभी और इंतजार करने को कह रहा था। ऐसा कौन कर रहा था, इस सवाल पर डॉ. रविकांत ने चुप्पी साध ली। उन्होंने कहा कि “यह पता करना पुलिस और सरकार का काम है। एक डॉक्टर के तौर पर हमने जो कुछ महसूस किया वो मीडिया के आगे बता दिया।” शुरू से ही माना जा रहा था कि एम्स निदेशक का इशारा मातृ सदन की तरफ है। यह अजीबोगरीब बात है कि एम्स के इस दावे के फौरन बाद हरिद्वार के मातृ सदन ने मौत के लिए उलटा एम्स प्रशासन पर हत्या के आरोप लगाने शुरू कर दिए थे। मातृ सदन में ही रहकर प्रोफेसर जीडी अग्रवाल धरना दे रहे थे और उन्हें कुछ दिन पहले ही एम्स में शिफ्ट किया गया था। स्वामीजी ने दोबारा अस्पताल में भर्ती किए जाने का काफी विरोध किया था। उन्हें अस्पताल तक ले जाने वाले पुलिस वालों को उनकी नाराजगी का भी सामना करना पड़ा था।
कैबिनेट मंत्री नितिन गडकरी, हरिद्वार के डीएम दीपक रावत, एसडीएम मनीष कुमार, कनखल थाने के सीओ और एसएचओ तक पर हत्या की साजिश....?
उधर, मातृ सदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद सरस्वती ने कहा है कि वो एम्स के निदेशक के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करेंगे। हालांकि एम्स के निदेशक ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसी का नाम नहीं लिया था। फिर भी मातृ सदन ने इसे खुद पर आरोप मान लिया। मातृ सदन के पीछे कोई राजनीतिक ताकत है ये इसी बात से पता चलता है कि उन्होंने कैबिनेट मंत्री नितिन गडकरी, हरिद्वार के डीएम दीपक रावत, एसडीएम मनीष कुमार, कनखल थाने के सीओ और एसएचओ तक पर हत्या की साजिश का आरोप जड़ दिया। स्वामी सानंद 22 जून से मातृ सदन में गंगा विधेयक बनाने, गंगा भक्त परिषद के गठन, गंगा और सहायक नदियों पर बन रही पनबिजली परियोजनाओं को रद्द करने की मांग को लेकर अनशन पर थे। इस दौरान वो सिर्फ नींबू पानी, शहद, जल और नमक ले रहे थे। 12 जुलाई को तबीयत बिगड़ने पर प्रशासन ने उन्हें जबरन दून अस्पताल में भर्ती कराया था, जहां से उन्हें एम्स, ऋषिकेश भेज दिया गया। 23 जुलाई को सानंद को एम्स से छुट्टी दे दी गई थी। स्वामी सानंद इसके बाद से मातृ सदन में ही अनशन पर थे। 9 अक्तूबर से उन्होंने जल भी त्याग दिया, जिसके बाद हरिद्वार प्रशासन उन्हें फिर से ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया। जहां एक दिन बाद ही हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई।