Showing posts with label harsimrat kaur. Show all posts
Showing posts with label harsimrat kaur. Show all posts

कांग्रेस सांसद ने दिलजीत दोसांझ पर लगाया खालिस्तानी एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप

क्या विरोधाभास है, जिस कांग्रेस ने खालिस्तान के मुद्दे को उछाला देश को कठिन स्थिति में डाला था, फिर चल रहे किसान आंदोलन के नाम पर दलालों के कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अकाली दल द्वारा प्रायोजित प्रदर्शन में इंदिरा गाँधी के ठोके जाने का गुणगान, खालिस्तान समर्थन के नारे लगने पर पूरी कांग्रेस चुप्पी साधे हुए है, उसी कांग्रेस का सांसद जब गायक दिलजीत पर खालिस्तानी एजेंडे को बढ़ाने का आरोप लगाना बहुत ही हास्यप्रद लगता है?(नीचे पढ़िए किस तरह और कैसे एक संत को कांग्रेस ने आतंकवादी बना दिया था।)  

यही कांग्रेसी सांसद रवनीत सिंह बिट्टू इंदिरा गाँधी की हत्या का गुणगान होने पर अपने मुख्यमंत्री और पार्टी से प्रदर्शन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष समर्थन वापस लेने के लिए क्यों नहीं बोलते? आखिर प्रदर्शन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को ठोके जाने की बात करने वाले कौन लोग हैं? क्या रवनीत सिंह इन नारों का समर्थन करते हैं या विरोध? क्या प्रदर्शन में उठ रहे आपत्तिजनक नारों पर तीनों पार्टियों ने चुप्पी इसलिए साधी हुई है, क्योकि इन नारों में इंदिरा की तरह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ठोके जाने की बात की जा रही है? बिट्टू को एक ही कश्ती में बैठना होगा, दोनों में एक साथ नहीं। क्योकि प्रदर्शन को समर्थन तुम्हारा(रवनीत सिंह) भी है।   
सोशल मीडिया पर कांग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू का एक ट्वीट काफी वायरल हो रहा है। इस ट्वीट में पंजाब के लुधियाना से कांग्रेस सांसद बिट्टू ने सिंगर दिलजीत दोसांझ पर अपने गानों से खालिस्तानी एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। रवनीत सिंह बिट्टू ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से इन दोनों के खिलाफ पंजाब के थानों में केस दर्ज कराने को भी कहा। उसके साथ ही उन्होंने राज्य के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार से इन दोनों के खिलाफ जांच कराने की मांग भी की। ट्विटर पर आज दिलजीत दोसांझ टॉप ट्रेंड कर रहा है, जिसमें यूजर्स बिट्टू के आरोप का जिक्र कर रहे हैं। असल में किसान आंदोलन में खालिस्तान समर्थक नारे लगने के बाद दिलजीत दोसांझ भी चर्चा में आ गए है। दिलजीत दोसांझ किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं।

खालिस्तान मूवमेंट: इंदिरा गांधी ने कैसे जरनैल सिंह भिंडरावाले को एक संत से आतंकवादी बना दिया!

एक समय था जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार को 1984 में सिख विरोधी दंगा के दौरान सामूहिक हत्या मामले में सजा होने की बात सोचना भी अकल्पनीय था। ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका संज्ञान स्वयं हाईकोर्ट ने लिया था कि किस प्रकार सज्जन कुमार को कांग्रेस की ओर से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। जिस प्रकार राजीव गांधी के समय में सज्जन कुमार को संरक्षण प्राप्त था, उसी प्रकार इंदिरा गांधी के समय में खालिस्तान समर्थक आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इंदिरा गांधी ने ही भिंडरावाले को एक संत से आतंकवादी बनाया था। यह खुलासा प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक स्वर्गीय कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा ‘बियॉन्ड द लाइन’ में किया था। उनकी आत्मकथा का कुछ अंश इंडिया टुडे ने प्रकाशित किया है।

इंडिया टुडे में ‘बियॉन्ड द लाइन’ के प्रकाशित अंश के मुताबिक संजय गांधी और जैल सिंह ने मिलकर जरनैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया था, जो शुरू में तो संत था लेकिन बाद में उसके पास इतनी ताकत आ गई कि वह भारतीय कानून को चुनौती देने लगा था। इस आशय का जिक्र नैयर ने अपनी आत्मकथा में किया था। उन्होंने लिखा है “एक बार जब मैं उनसे उनके कमरे में मिला तो पूछा कि आखिर आप इतने सशस्त्र लोगों से क्यों घिरे रहते हैं? उन्होंने उल्टे मुझसे जवाब देने को कहा कि पुलिस हथियार क्यों रखती है? मैंने कहा कि यह तो उसका दायित्व है कि किसी भी अनहोनी को रोके। हमारे इस जवाब पर भिंडरावाले का कहना था कि कभी उन्हें हमें चुनौती देने को कहिए तभी हम उसे दिखा देंगे कि किसके पास अधिकार है।’ सवाल उठता है कि इतनी ताकत भिंडरावाले को मिली कहां से?

दरअसल भिंडरावाले इंदिरा गांधी की देन थी। यह कहानी 1977 से शुरू होती है, जब इंदिरा गांधी पूरे देश में चुनाव हारने के साथ ही पंजाब में भी चुनाव हार गई थी। पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह की कुर्सी चली गई थी। वहां पर प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बन गई थी। उसी समय इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी और जैल सिंह ने मिलकर भिंडरावाले को पैदा किया। यह ज्ञानी जैल सिंह वही हैं, जिसे बाद में इसके एवज में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति बनाया था।

मालूम हो कि इंदिरा गांधी के समय संजय गांधी के पास संविधानेत्तर अधिकार होता था। वैसे ही जैसे मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी के पास अधिकार हुआ करता था। कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब संजय गांधी से इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि किसी मुख्यमंत्री पर अंकुश रखने के लिए उसके ऊपर किसी संत को बैठना चाहिए।

उसी किताब में मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री कमल नाथ ने भी स्वीकार किया था कि अपने काम करने के लिए भिंडरावाले को कांग्रेस पैसे दिया करती थी। उन्होंने कहा था “जब हमने पहली बार भिंडरावाले का इंटरव्यू लिया था तो वह ‘साहसी टाइप’ बिल्कुल नहीं लगा था, हां वह अक्खर लगा था और लगा था कि वह हमारे उद्देश्य पूरा करने में सही साबित होगा। हम उसे अक्सर अपने काम के लिए पैसे दिया करते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा था कि वह आतंकवादी बन जाएगा।”

इस किताब में एक और वाकया का जिक्र है जिससे स्पष्ट होता है कि केंद्रीय मंत्री तक भी भिंडरावाले के सामने कुर्सी पर बैठने का साहस नहीं करते थे। कुलदीप नैयर ने लिखा है “एक दिन मैं भिंडरावाले के साथ एक रूप में बैठा था। उस रूम में एक ही कुर्सी थी जिसपर मै बैठा था, उसी समय केंद्रीय मंत्री स्वरण सिंह वहां आ गए, मुझे अकेले कुर्सी पर बैठा देख वह जमीन पर ही बैठ गए। जब मैंने उन्हें अपनी कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया तो वह बोल उठे कि किसी संत की मौजूदगी में वह जमीन पर ही बैठना उचित समझते हैं।” उसी समय से भिंडरावाले खुद को हर कानून से ऊपर मानता था। उसकी महत्वाकांक्षी इतनी ताकत अर्जित करने की थी ताकि भारत की न तो कोई पुलिस न ही सेना उसे चुनौती देने का साहस जुटा सके।

इंदिरा गांधी किसी दूसरे की सरकार को बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। इसलिए उसने पंजाब में प्रकाश सिह बादल की सरकार को अस्थिर करने के लिए भिंडरावाले को खड़ा किया। जबकि भिंडरावाले की महत्वाकांक्षा किसी से भी अधिक थी। दोनों एक दूसरे का उपयोग करने लगे। भिंडरावाले की राजनीतिक भूमिक 1977 से ही बढ़नी शुरू हुई। जब अकाली दल-जनता पार्टी ने पंजाब विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री जैल सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को हराकर पंजाब की सत्ता में आई। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में बनी सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री जैल सिंह की कारस्तानी के खिलाफ गुरदियाल सिंह आयोग का गठन किया था। उस आयोग ने जैल सिंह को अपनी पावर का दुरुपयोग करने का दोषी भी माना था। इसी कारण जैल सिंह ने संजय गांधी के साथ मिलकर भिंजरावाले का उपयोग करना शुरू कर दिया।

भिंडरावाले को राजनीतिक सुर्खी में आने का पहला मौका 13 अप्रैल 1978 को बैसाखी के दिन तब मिला जब सिखों का एक दस्ता निरंकारियों से भिड़ गया। मालूम हो कि निरंकारी खुद को सिख मानते हैं जबकि सिख निरंकारियों को सिख मानने को तैयार नहीं थे। इस हमले में 16 सिखों की मौत हो गई थी। बस क्या था इसी वाकये को लेकर भिंजरावाले ने अकाली दल के खिलाफ सिखों को भड़काना शुरू कर दिया। जब यह घटना घटी तब मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मुंबई में थे। वहां से आते ही कई पुलिस वालों को निलंबित कर दिया तथा निरंकारी के मुखिया गुरबचन सिंह को गिरफ्तार किया। इतना सब करने के बावजूद सिखों के गुस्सा को शांत नहीं कर पाए। इस घटना का खामियाजा बादल को अगले चुनाव में हार कर चुकाना पड़ा।

यहां से भिंडरावाले का जो दौर शुरू हुआ वह खालसा के नाम पर खालिस्तान की मांग पर जाकर खत्म हुआ। भिंडरावाले को जितनी ताकत मिलती गई उसका संतत्व खत्म होता चला गया। जब तक उसे ताकत मिली तब तक वह पूरे तौर पर आतंकवादी बन गया था और उसी इंदिरा सरकार को ललकारना शुरू कर दिया था। इंदिरा गांधी ने सत्ता के लालच में आतंकवाद का जो पेड़ लगाया था, बाद में उसी के अंत का कारण भी बन गया।

एक संत को शैतान भिंडरावाले किसने और क्यों बनाया, देखिए 

◆ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता की लालच में भिंडरावाले को किया था पैदा

◆ संजय गांधी और पूर्व राष्ट्रपति जैल सिंह ने भिंडरावाले को आगे बढ़ाया

◆ पंजाब की सरकार को गिराने के लिए लिया था भिंडरावाले का साथ

◆ अपने काम को अंजाम देने के लिए भिंडरावाले को दिया जाता था पैसा

◆ स्वर्गीय कुलदीप नैयर की आत्मकथा ‘बियॉन्ड द लाइन’ में हुआ है खुलासा

◆ कांग्रेस के कारण ही भिंडरावाले संत से बन गया ‘शैतान’ आतंकवादी

◆ सिखों की हत्या कराकर सिखों का तारणहार बन बैठा

◆ 13 अप्रैल 1978 को निरंकारियों के साथ सिखों के एक दस्ते की हुई थी भिड़ंत

◆ इस घटना में 16 सिखों की हो गई थी मौत

◆ इसी घटना से भिंडरावाले ने बादल के खिलाफ सिखों को भड़काना शुरू किया था

मोदी मंत्रिमंडल की अमीर महिला सांसद हैं हरसिमरत कौर

Harsimrat Kaur, a rich woman MP of Modi Cabinet, has assets worth Rs 217 crore
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
मोदी सरकार में हरसिमरत कौर बादल को दोबारा मंत्री बनाया गया है। हरसिमरत कौर मोदी मंत्रिमंडल की अमीर महिला सांसद हैं। साल 2019 के हलफनामे के मुताबिक हरसिमरत कौर की कुल संपत्ति 217 करोड़ रुपए की है। हरसिमरत कौर ने पंजाब की बठिंडा लोकसभा सीट से जीत की हैट्रिक लगाई है। वो साल 2009 से बठिंडा संसदीय क्षेत्र से वो लगातार सांसद है। हरसिमरत मोदी सरकार में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री भी रह चुकी हैं। 

संपत्ति 

हरसिमरत कौर की संपत्ति की बात करें, तो उनके अकाउंट में 41 लाख रुपए जमा हैं, जबकि 60 लाख रुपए के बांड, डिबेंचर और कंपनियों के शेयर हैं। हालांकि उन पर पर्सनल लोन भी 25 लाख करोड़ रुपए का है। हरसिमरत कौर के नाम 2 लाख रुपए कीमत के ट्रैक्टर हैं। इसके अलावा हरसिमरत के पास 7 करोड़ की ज्वैलरी है। हरसिमरत कौर के नाम पर सिरसा, गंगानगर राजस्थान समेत कुल 6 जगह 49 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी हैं। इसके अलावा 18 करोड़ रुपए की नॉन एग्रीकल्चर प्रॉपर्टी है। कॉमर्शियल बिल्डिंग 9 करोड़ रुपए की है, जबकि रेजिडेंशियल बिल्डिंग 39 करोड़ रुपए की है।

निजी और राजनीतिक जीवन

हरसिमरत कौर का 25 जुलाई 1966 को दिल्ली के एक सिख परिवार में जन्म हुआ। वो गुड़गांव ट्राइडेंट होटल में निजी ज्वैलरी कारोबार चलाती है साथ ही फैशन डिजाइनर भी हैं। उन्होंने दिल्ली के लारेटो कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ाई की। साथ ही मैट्रिक्यूलेट और ड्रेस डिजाइन में डिप्लोमा भी किया है। हरसिमरत की राजनीति की शुरुआत साल 2009 में हुई। साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल ने हरसिमरत को बठिंडा से कांग्रेस के उम्मीदवार राहींदर सिंह के खिलाफ चुनावी मैदान में उतारा। इस चुनावी जंग में हरसिमरत को फतह हासिल हुई और उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को 120960 वोटों से मात दी थी। 
अवलोकन करें:-

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है। भारत में हर नागरिक को आवाज उठानी चाहिए,...

क्या कौर जैसे करोड़पतियों को पेंशन की आवश्यकता है?
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के एक आव्हान पर देश के करोड़ों लोगों ने एलपीजी सब्सिडी छोड़ दी, परन्तु क्या इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी कौर जैसे करोड़पति जन प्रतिनिधियों से उनको मिलने वाली पेंशन छोड़ने का आव्हान कर सकते हैं, यदि ऐसा होता है देश के खजाने में हर माह करोड़ों की वृद्धि होगी। जिसका देश के विकास में प्रयोग किया जा सकता है। निगम पार्षद से लेकर संसद और मंत्रिमंडल में ऐसे हज़ारों जनप्रतिनिधि हैं, जो अपनी राशि पर अर्जित ब्याज तक नहीं खा सकते, फिर उनको पेंशन की क्या आवश्यकता?