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उत्तराखंड : ‘अकेले में आओ, वरना फेल कर दूँगा’: लड़कियों का यौन शोषण करता शिक्षक नफीस मोहम्मद

                                                                                                                                प्रतीकात्मक चित्र
उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले में नफीस अहमद नामक शिक्षक पर स्कूल की जनजातीय छात्राओं के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगा है। आरोपित शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई न होने से नाराज परिजनों ने स्कूल के बाहर इकट्ठा होकर प्रदर्शन किया। बताया जा रहा है कि आरोपित शिक्षक पर दो महीने पहले भी छेड़छाड़ का आरोप लगा था। लेकिन तब प्रिसिंपल ने कार्रवाई करने की बजाए पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाकर समझौता करा दिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला उधमसिंह नगर जिले के खटीमा में स्थित राजकीय इंटर कॉलेज झनकट का है। यहाँ कई छात्राओं ने इंग्लिश टीचर नफीस मोहम्मद पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया है। छात्राओं के आरोप के बाद उनके परिजनों ने प्रिसिंपल से मुलाकात कर आरोपित नफीस के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा था। हालाँकि इसके बाद भी प्रिसिंपल ने किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं की।

 इससे गुस्साए परिजन और शिक्षक-अभिभावक संघ के सदस्य स्कूल पहुँचे। छात्राओं के परिजनों का आरोप है कि नफीस मोहम्मद आए दिन उनकी बेटियों से छेड़छाड़ करता था। लेकिन इसके बाद भी उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। स्कूल का घेराव करते हुए छात्राओं के परिजनों ने स्कूल में ताला जड़ दिया। हंगामा बढ़ता देख पुलिस प्रशासन और एसडीएम ने मौके पर पहुँचकर मामला शांत कराया। वहीं मौके पर मौजूद थारू जनजाति की 13 छात्राओं ने एसडीएम और एएसआई के सामने अपना पक्ष रखा।

एक पीड़ित लड़की के अभिभावक का कहना है कि नफीस मोहम्मद ने दो महीने पहले भी उनकी बेटी से छेड़छाड़ की थी। लेकिन तब प्रिंसिपल और ग्राम प्रधान ने मिलकर उन पर समझौता करने के लिए दबाव बनाया था। बाद में समझौता हो गया था।

छेड़छाड़ और धर्मांतरण समेत कई तरह के हैं आरोप

पीड़ित छात्राओं की ओर से महिला अभिभावकों ने कोतवाली पुलिस को लिखित शिकायत दी है। इस शिकायत में अंग्रेजी शिक्षक नफीस मोहम्मद पर छेड़छाड़, लड़कियों को अकेले बुलाने, धर्मांतरण, बात न मानने पर फेल करने की धमकी समेत कई तरह के गंभीर आरोप लगाए हैं।
वहीं इस पूरे मामले में एसडीएम रवींद्र सिंह बिष्ट ने आरोपित शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई न होने पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा है कि प्रिंसिपल ने शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर आरोपित शिक्षक नफीस मोहम्मद को सस्पेंड करने के लिए कहा गया है। छेड़छाड़ के मामले को हल्केपन में लेने वाले प्रिंसिपल के खिलाफ यदि शिकायत मिलती है तो उसे भी इस स्कूल से हटाने की कार्रवाई की जाएगी।

’17 साल की उम्र से तुम्हारी बेटी का रेप कर रहा हूँ, जो करना है कर लो’: क्रिकेट कोच महबूब ने कराया हिन्दू लड़की का धर्मांतरण

आरोपित कोच महबूब बुखारी (बाएँ), पीड़िता के माता-पिता (दाएँ) (फोटो साभार: भास्कर)
गुजरात के राजकोट में हिंदू लड़की का बलात्कार और धर्मांतरण के आरोप में महबूब बुखारी नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि महबूब बुखारी क्रिकेट कोचिंग के बहाने 17 साल की उम्र से पीड़िता का बलात्कार कर रहा है। यही नहीं, उसने लड़की का धर्मांतरण कराकर उसका नाम नाजनीन रख दिया था। पीड़िता गत 26 जून से लापता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता का परिवार मूल रूप से भावनगर जिले के तलाजा का रहने वाला है। लेकिन वे लंबे समय से राजकोट में रह रहे हैं। क्रिकेटर बनने का सपना लिए पीड़ित लड़की ने 17 साल की उम्र में महबूब बुखारी नामक व्यक्ति की क्रिकेट कोचिंग जॉइन की थी। जहाँ महबूब ने इउसे अपने प्रेम जाल में फँसा लिया। इसके बाद बीते 4 साल से वह पीड़िता को अपनी हवस का शिकार बना रहा था। पीड़ित लड़की के परिजनों का आरोप है कि उनकी बेटी गत 26 जून को महबूब बुखारी के घर से लापता हुई है।  

‘जय द्वारकाधीश बोलने वाली लड़की लगाती थी अल्लाहु अकबर के नारे’: पीड़ित परिवार

पीड़िता के परिवार ने शिकायत में कहा है “हमारी बेटी कुंडलिया कॉलेज में पढ़ रही है। उसे बचपन से ही क्रिकेट का शौक था। इसलिए हमने क्रिकेट कोच महबूब अंसारी से बात करके उसे कोचिंग भेजना शुरू कर दिया। वह 17 साल की उम्र से क्रिकेट सीखने जा रही है। लेकिन महबूब बुखारी ने कोचिंग में क्रिकेट सिखाने के बजाय नाबालिग बेटी को प्रेम जाल में फँसाया और उसका ब्रेनवॉश कर दिया। महबूब ने उसका नाम बदलकर नाजनीन रख दिया था। ‘जय द्वारिकाधीश’ बोलने वाली हमारी बेटी ने ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगाने लगी। यही नहीं उसने नमाज पढ़ना भी शुरू कर दिया था।”
पीड़ित लड़की के पिता का कहना है उनकी बेटी अब 21 साल की हो चुकी है। घर पर रहने के दौरान वह अक्सर मस्जिद जाकर नमाज पढ़ती थी। परिवार ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की। लेकिन महबूब के दबाव के आगे वह सब करती जा रही थी। जब पीड़ित लड़की के पिता महबूब बुखारी से बात करने गए तो उसने उन्हें हाथ-पैर तोड़ने और जान से मारने की धमकी दी। साथ ही कहा, “मैं तुम्हारी बेटी के साथ तब से बलात्कार कर रहा हूँ जब वह 17 साल की थी। अब तुम जो कर सकते हो कर लो”
महबूब बुखारी की हवस का शिकार हुई पीड़ित हिंदू लड़की के परिजन का कहना है, “मेरी बेटी अक्सर कहती थी कि अब जिंदगी बर्बाद हो गई है। अगर मैं किसी और से शादी करूँगी तो महबूब मुझे मार देगा और अगर मैं महबूब के साथ रही तो वह मेरी जिंदगी नर्क बना देगा। क्रिकेटर बनने का मेरा सपना भी एक तरीके से खत्म हो गया है।” परिजनों का यह भी कहना है कि महबूब के उकसाने और धमकी देने के चलते पीड़ित लड़की ने अपने घर से डेढ़ लाख रुपए के सोने के गहने चुराकर महबूब को दे दिए।
पीड़िता के परिजनों की शिकायत और बयानों के आधार पर मामला दर्ज करते हुए पुलिस ने आरोपित कोच महबूब बुखारी को गिरफ्तार कर किया है। हालाँकि, गत 26 जून से लापता हिंदू लड़की का अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है। पुलिस लगातार उसकी तलाश में जुटी हुई है।

लव जिहाद : गजवा-ए-हिन्द यानी हिंदुस्तान को इस्लामी देश बनाने का मकसद


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
केरल से शुरू होने वाले लव जिहाद के विरुद्ध जब हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा होने वाले समाचार-पत्र एवं साप्ताहिकों में समाचारों के प्रकाशन किये जाने को समस्त छद्दम सेक्युलरिस्ट फिरकापरस्ती का नाम देकर नज़रअंदाज़ करने का काम करते थे, उस समय कोई अन्य पत्र या पत्रिका इन समाचारों को महत्व नहीं देता था। 
2014 में सत्ता परिवर्तन होने से दूसरे मीडिया ने भी इन समाचारों को जगह देनी शुरू की है। जबकि केंद्र में सत्ता पूर्व तक मीडिया भी छद्दम सेक्युलरिस्टों के इशारे पर चल रहा था। 
वैसे इसमें कसूरवार लड़कियां एवं उनके परिवार भी हैं, जो आधुनिकता के नाम पर अपने हिन्दू संस्कारों एवं संस्कृति को धता बताकर लव जिहाद के मकालजल में फंस रहे हैं। विरोध करने वालों को दकियानूसी, सठिया हुआ अथवा फिरकापरस्त कहकर बदनाम किया जाता है। आमिर खान ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि "मेरी बीबी हिन्दू होगी, लेकिन बच्चे मुस्लिम मजहब अपनाएंगे।" (विस्तार से पढ़ने के लिए अगस्त 22, 2010 को लिखा लेख के लिए नीचे दिए लिंक को क्लिक करें) दूसरे, सैफ अली खान ने पहले अमृता सिंह से निकाह किया, बच्चे किये छोड़ दिया और उस बच्ची यानि करीना कपूर से शादी की जिसने अमृता सिंह से शादी करने पर Congratulations Uncle कहा था।  
फिर एक राजनीतिक पार्टी की युवा ईकाई में एक हिन्दू लड़की ने उस मुसलमान से शादी की, जिसके जीवित बीबी से दो बच्चे थे, और इस बात को पार्टी में सभी जानते थे। इस बात को लड़की भी जानती थी, उसके बावजूद अगर लड़की आग में कूदे कसूरवार तो लड़की ही है। जब इस मुद्दे पर मुझसे सहायता मांगने आए, उस लड़के के परिवार एवं मौहल्लेवालों को हिन्दू होने के नाते उस लड़की के साथ खड़े होने की बजाए सख्ती से कहा था, "ऐसी...लड़की को ठोकर मार कर घर से ही नहीं मोहल्ले से भी निकालो। जिसने जानबूझकर बाल-बच्चो और पहली बीबी वाले से शादी की है।" पार्टी आज भी ऐसे लोगों को सिर पर बैठाए हुए है। कहने का मतलब यह है, जब तक परिवार पश्चिमी सभ्यता को त्याग भारतीय संस्कृति को नहीं अपनाएंगे, देश विरोधी इसका लाभ उठाकर अपने "गजवा-ए-हिन्द" के मकसद में कामयाब होते रहेंगे। "गजवा-ए-हिन्द" को दफ़न करने के लिए हमें सर्वप्रथम, देश से गंगा-जमुनी तहजीब, सेक्युलर शब्दों का जनाजा निकाल कर समुद्र से अधिक गहरे गड्डे में दफ़न करना होगा, अन्यथा देश इस आग में जलता रहेगा।  
अभी नागरिकता संशोधक कानून विरोध धरनों और प्रदर्शनों में खुले आम हिन्दुत्व को अपमानित करवाया जा रहा था, और बेशर्म लालची गैर-मुस्लिम कड़कती ठंठ में अपने दूध पीते बच्चों को रात को धरने पर बैठ रहे हैं, चाय बांट रहे हैं, लंगर लगा रहे हैं। जिन-जिन राज्यों में इस तरह के हिन्दू विरोधी नारे लगे थे, वहां की सरकारों ने तुरन्त कार्यवाही क्यों नहीं की? जिन्हें ये बेशर्म नेता गरीब, मजलूम, असहाय और नासमझ कहकर जनता को गुमराह कर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, ये गरीब मजलूम आदि हिन्दुओं की गैर-हाज़िरी में केवल मुस्लिमों की उपस्थिति में क्या षड़यंत्र रचते थे।(विस्तार से पढ़ने के लिए जनवरी 29, 2020 का लिखा ब्लॉग नीचे दिए लिंक को क्लीक करें, जिसे अब तक 1 लाख से अधिक पाठकगण पढ़ चुके हैं। ) जब मीडिया में समाचार आ रहे थे, क्या गैर-मुस्लिम समर्थकों को नहीं मालूम था, जवाब है क्या किसी के पास? किसी भी सदन के लिए होने चुनावों के दौरान हिन्दुओं को इन सत्तारूढ़ दलों को नकारना होगा। इन धरनों और प्रदर्शनों में समर्थन करने वाले लोगो का भी बहिष्कार करना होगा। जिस दिन भारत "गजवा-ए-हिन्द" बन गया, क्या ये समर्थन देने वाले गैर-मुस्लिम बच पाएंगे? सबसे पहली गाज इन बेशर्म लालचियों पर ही गिरेगी। आम नागरिक से अधिक अपमानित होने वाले भी ये ही लोग होंगे।      
आजकल देश में लव जिहाद के जरिए धर्म परिवर्तन कराने का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। इसके तहत हिन्दू लड़कियों को सब्जबाग दिखाकर प्रेम जाल में फंसाकर मुस्लिम बना दिया जा रहा है। वैसे देखने पर यह एक मुस्लिम लड़के से एक हिन्दू लड़की के प्यार और शादी की बात लगती है, लेकिन इस प्यार के पीछे एक गहरी साजिश है। इसमें लव जिहादी गैंग के लड़के बहला-फुसलाकर हिन्दू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसाता है। उत्तर प्रदेश में इन दिनों लव जिहाद के कई मामले सामने आ रहे हैं। ताजा मामला मेरठ का है। यहां एक मुस्लिम युवक दानिश ने हिंदू युवती को हिंदू नाम सोनू से पहले प्रेमजाल में फंसाया। शादी के बाद महिला को पता चला कि सोनू का असली नाम दानिश है और उसने अपना धर्म छिपाकर शादी की है। इसके बावजूद उसने सोनू को ही अपना जीवनसाथी मानकर पूरी तरह उसे अपना लिया। इस दौरान दंपती के दो बच्चे भी हुए। 
ये होता है लव जिहाद
जानकारों को अनुसार हिन्दू लड़की या गैर मुस्लिम लड़कियों को अपने नकली प्यार मे फंसा कर धर्मांतरित करना ही इस जिहाद का मूल उद्देश्य है। इस षडयंत्र के माध्यम से हिंदू महिलाओं को मुस्लिमों की आबादी बढ़ाने के उपयोग के लिए मजबूर किया जाता है। दरअसल यह इस्लामिस्ट कट्टरपंथी जमात भारत को दारुल हरब यानि काफिरों का देश मानता है और इसे दारुल इस्लाम यानि मुसलमानों के देश में परिवर्तित करने की योजना पर काम कर रहा है जिसका एक बड़ा हथियार लव जिहाद भी है।

ऐसे किया जाता है लव जिहाद
ये भी आरोप कई संगठनों की तरफ से लगाए गए कि हाथ में कलावा और सिर पर तिलक लगाकर लव जिहादी दूसरे धर्म का होने का छलावा करते हैं। इन्हें बाइक और पैसा दिया जाता है ताकि ये लड़कियों को अपने जाल में फंसा सके। ये स्कूल-कॉलेज के इर्द-गिर्द मंडराते हैं और इन्हें इसके लिए पैसा भी दिया जाता है। बीते साल कोझीकोड लॉ कॉलेज से जहांगीर रजाक नाम के एक लव जिहादी ने 42 लड़कियों की अकेले ही फंसा लिया और उन सब को मिलाकर एक सेक्स रैकेट चलाने लगा। ऐसी ही एक लड़की थी गीता। दिल्ली की रहने वाली इस लड़की को जैसे ही पता चला कि उसका ब्वॉयफ्रेंड विशाल दरअसल मोहम्मद एजाज है, तो उसने मौत को गले लगा लिया।

आजकल देश में कुछ संगठन इस काम में जोर-शोर से लगे हुए हैं। ये संगठन भावनात्मक रुप से कमजोर हिन्दू लड़कियों को समझाने-बुझाने से लेकर, शरण देने तक और उसके बाद निकाह कराने तक हर स्थिति में उनके साथ खड़े रहने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसे ये लव जिहाद कहते हैं, क्योंकि यह इस्लाम धर्म के प्रसार का इनका अपना तरीका है।
कोर्ट ने माना होता है ‘लव जिहाद’!
केरल में पिछले दस साल के दौरान करीब दस हजार लड़कियों ने धर्म परिवर्तन किया। केरल हाईकोर्ट ने भी आशंका जताई है कि ISIS के इशारे पर लव जिहाद के जरिए लड़कियों को फंसा कर उनका धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। उनका ब्रेनबॉश करके उन्हें आतंकवाद के रास्ते पर भेजा जा रहा है। अब जब सवाल आया कि क्या लव जिहाद होता है भी है या नहीं? लव जिहाद के बारे में लंबी बहस है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यहां तक कि शुरुआत में इसे सिरे से नकारने वाली कांग्रेस ने भी बाद में कहा लव जिहाद होता है।

ओमन चांडी ने रखे थे तथ्य
25 जून 2014 को मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि 2667 युवतियां 2006 से लेकर अब तक प्रेम विवाह के बाद इस्लाम कबूल कर चुकी हैं। वहीं केरला कैथोलिक बिशप काउंसिल ने इससे पहले 2009 में ये आंकड़ा 4500 बताया था। इसके अलावा एक अन्य संस्था ने कर्नाटक में 30 हजार लड़कियों के लव जिहाद की शिकार होने की बात कही थी। अक्टूबर 2009 में तत्कालीन कर्नाटक सरकार ने लव जिहाद को एक गंभीर मुद्दा माना और इसकी CID जांच के आदेश दिए। तत्कालीन डीजीपी जेकब पुनूज ने कहा था जांच में कई मामले आए, लेकिन लड़कियां यही कहती हैं कि वो अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल रही हैं।

केरल हाई कोर्ट ने जताई थी चिंता
9 दिसंबर 2009 को केरल हाइकोर्ट के जस्टिस के टी. शंकरन ने लव जिहाद के मामले में पकड़े गए दो मुस्लिम युवाओं की जमानत पर सुनवाई करते हुए कहा था कि पुलिस रिपोर्ट इस ओर इशारा कर रही है कि 3 से 4 हजार लड़िकयों के साथ इसी तरह के प्रेम संबंधों के मामले पिछले तीन-चार सालों में आ चुके हैं। उन्होंने ये भी बताया था कि जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाने के भी मामले मिलते हैं। ये भी पाया गया है कि धोखे में रखकर इन लड़कियों से ये संबंध बनाए गए। कोर्ट ने कहा था कि हजारों लड़कियों के इस तरह धर्म परिवर्तन की बात सामने आती है, लेकिन ये साबित नहीं हो पा रहा है कि ये ऑर्गेनाइज्ड तरीके से किया गया काम है।

केरल सरकार ने भी जताई थी चिंता
लव जिहाद के अधिकतर मामले केरल और दक्षिण भारत मे सामने आए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी इसके पैर पसारने की खबर आई। हालांकि केरल की कई सरकारों ने (कांग्रेस और सीपीएम दोनों ने) बकायदा इस पर अपने निर्णय भी दे दिए हैं कि अब ऐसी घटनाओं को रोकने मे सरकार भी मदद करेगी। सरकार ने यह भी कहा है कि ऐसे मामलों में हर हिन्दू और गैर मुस्लिम परिवार की पूरी सहायता की जाएगी। इतना ही नहीं केरल सरकार ने ये भी वादा किया था कि ऐसी घटनाओं की जांच सीआईडी द्वारा कराई जाएगी ।

नवभारत टाइम्स के अनुसार दानिश ने उसका जयपुर का एक मकान और गहने बिकवा दिए। इसके बाद काफी समय तक महिला के पैसों से ही मौज-मस्ती करता रहा। पैसा खर्च होने के बाद दानिश विदेश भाग गया।
आसिफ और लकी खान ने नाम बदल हिंदू लड़कियों को फंसाया
उत्तर प्रदेश के कानपुर से भी लव जिहाद के कई मामले सामने आए हैं। शहर के गोविंद नगर में आसिफ शाह ने एक लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसा ब्रेनवाश कर जबरन उसको इस्लाम धर्म कबूलने पर मजबूर किया। जागरण के अनुसार परिजनों को उनकी बेटी चार दिन बाद खराब और मानसिक रूप से अस्थिर हालत में मिली है। पिता ने बताया उसका शारीरिक शोषण भी हुआ है।

वहीं एक अन्य मामला कानपुर के बजरिया थाना का है। यहां लकी खान नाम के एक युवक ने अपना हिंदू नाम बता कर नाबालिक लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसाया और उसकी अश्लील तस्वीरें लेकर इस्लाम कबूलने और निकाह करने के लिए ब्लैकमेल करने लगा। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, लड़की एक मंदिर के बाहर फूल की दुकान लगाती थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात लकी खान नाम के युवक से हुई। उस समय उसने अपना पूरा नाम न बता कर सिर्फ लकी ही बताया था। उसे पता नहीं था कि जिस लड़के को हिंदू समझ दोस्ती की वह असल में मुसलमान है। शिकायत के बाद पुलिस ने लकी खान को गिरफ्तार कर लिया।
शालिनी यादव को बना डाला फिजा फातिमा
पिछले महीने अगस्त में भी कानपुर में यही हुआ है। शालिनी यादव नाम की हिंदू लड़की पहले भागकर मुसलमान फैजल से शादी करती है फिर धर्म बदल कर अपना नाम शालिनी यादव से फिजा फातिमा बन जाती है। कानपुर में यह पहला मामला नहीं है। मुसलमान लड़के यहां 5 हिंदू लड़कियों को अपना शिकार बना चुके हैं। अगर इस पर लगाम नहीं लगाया गया तो यह लव जिहाद कई हिंदू बहन-बेटियों की जिंदगी बर्बाद कर देगा। शालिनी यादव के भाई विकास यादव का कहना है कि फैसल, लव जेहाद गैंग का सरगना है और यही कारण है कि उसने शालिनी को इस्लाम कबूल करा फिजा फातिमा बना डाला। इस शादी पर मुख्यमंत्री के मीडिया एडवाइजर शलभ मणि त्रिपाठी ने कहा कि परीक्षा देने के बहाने निकली कानपुर की शालिनी यादव ने पहले धर्म बदला, फिर फैसल से निकाह कर लिया। सवाल ये कि धर्म बदलने की क्या जरूरत? धर्म शालिनी यादव ने ही क्यूं बदला? फ़ैसल ने क्यूं नहीं? तभी तो कहते हैं, ये लव नहीं, ये है लव जेहाद।

भारत को मुस्लिम देश बनाने के लिए लव जिहाद पर जोर
लव जिहाद या रोमियो जिहाद एक षड्यंत्र है जिसके तहत युवा मुस्लिम लड़के और पुरुष गैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ प्यार का ढोंग करके उनका धर्म-परिवर्तन करते हैं। भारत के संदर्भ में यह अधिकतर हिंदु युवतियों के साथ किया जाता है। केरल हाईकोर्ट के द्वारा दिए एक फैसले में लव जेहाद को सत्य पाया है और अब एक स्टिंग ऑपरेशन में भी इसका खुलासा हुआ है। इस स्टिंग ऑपरेशन में साफ है कि यह एक अंतरराष्ट्रीय साजिश है और पूरी दुनिया को इस्लाम में बदल देने के आह्वान से जुड़ा हुआ है।

अरब देशों से होती है ‘धर्मांतरण और लव जिहाद’ की फंडिंग
पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ यानी PFI और ‘सथ्य सरानी’ जैसे संगठन पूरी तरह से एक व्यवस्थित मशीनरी इस तरह के काम में लगी हुई है। युवा लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराना और उन्हें कट्टरपंथ की ओर धकेलने में इन संगठनों की अहम भूमिका है। इसके लिए अरब देशों से बजाप्ता फंडिंग भी होती है। India today के स्टिंग ऑपरेशन में भी इस बात का खुलासा हुआ है जिसमें PFI के संस्थापक सदस्य और इसके मुखपत्र ‘गल्फ थेजास’ के प्रबंध संपादक अहमद शरीफ ने इस बात को स्वीकार भी किया है कि इसकी फंडिंग अरब देशों से की जाती है और वह हवाला के जरिये रुपये मंगवाता है।

लव जिहाद करने वालों को मदद देता PFI
स्टिंग ऑपरेशन में अहमद शरीफ ने साफ स्वीकार किया कि वह भारत में इस्लामिक स्टेट की स्थापना के छुपे मकसद के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में इस्लामी साम्राज्य की स्थापना उनका मकसद है और इसके लिए वह हर मदद करता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि धर्मांतरण करने वाले या लव जिहाद करने वाले युवकों को उनकी संस्था मदद करती है। कुछ साल पहले केरल सहित पूरे देश में ‘किस ऑफ लव’ कैंपेन हुआ था, इसके आयोजन के पीछे भी PFI का हाथ था। इस कैंपेन में हिस्सा लेने वाले 90 प्रतिशत युवतियां हिंदू थीं और युवक मुस्लिम।

भारत को इस्लामी राज्य बनाने की साजिश
यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा है और इसका एक सिरा गजवा-ए-हिन्द यानी हिंदुस्तान को इस्लामी साम्राज्य का हिस्सा बनाने से जुड़ा हुआ है। गजवा-ए-हिन्द का मतलब होता है इस्लाम की भारत पर विजय। एक जगह जहां मीडिया हिन्दुओं का ध्यान बांटने में लगी है, वही दूसरी ओर यह कोशिशें जोरों पर जारी है कि कैसे हिंदुस्तान को इस्लामी साम्राज्य में तब्दील कर दिया जाए। फर्क सिर्फ यह है इन कोशिशों को सेकुलर चोला पहनाया जा रहा है। यानी जैसे ही इन कट्टरपंथियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने की बात आती है तो तथाकथित सेकुलर जमात इसे अलग ही रंग देने में लग जाता है। जाहिर है यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा है।

हिंदू लड़कियों से ‘लव जिहाद’ यानी इस्लाम की जीत !
काफिरों यानी गैर मुस्लिमों को जीतने के लिए किये जाने वाले युद्ध को “गजवा” कहते हैं और जो इस युद्ध में विजयी रहता है उसे “गाजी” कहते हैं। जब भी किसी आक्रान्ता और आक्रमणकारी के नाम के सामने गाजी लग जाता है, उसका यह मतलब यह मतलब होता है कि निश्चय ही वह हिन्दुओं का व्यापक नर संहार करके इस्लाम के फैलाव में लगा था। दरअसल हिन्दुओं की सबसे बड़ी कमजोरी है कि हम अपने ही धर्म के बारे में बहुत कम जानते हैं और फिर भी अपने को सेकुलर कहते है। पर क्या हम सेकुलर का मतलब भी जानते है ? कभी भी कोई मुस्लिम अपने को सेकुलर नहीं कहेगा चाहे वह नेता हो या आम नागरिक।

वी एस अच्युतानंदन ने जताई थी आशंका
टाइम्स ऑफ इंडिया की 26 जुलाई 2010 को प्रकाशित एक खबर में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीएस अच्यूतानंदन ने भी इस विषय पर चिंता जताई थी। उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा था कि पॉपूलर फ्रंट ऑफ इंडिया और कैंपस फ्रंट जैसे संगठन दूसरे धर्मों की लड़कियों को फुसलाकर उनसे शादी कर इस्लाम कबूल करवाने की साजिश रच रह हैं। 20 वर्षों में केरल का इस्लामीकरण करने का प्लान बना रहे हैं। वो तालिबान के अंदाज में कॉलेजों में हमला कर सकता है।

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अरब देशों से मिलता है पैसा
ऐसा माना जाता है कि लव-जिहाद अभियान अरब देशों द्वारा वित्त पोषित है। एक सऊदी अरब स्थित संगठन, भारतीय भाईचारे के तहत भारत आता है पर ये सब काम हवाला द्वारा चलाया जाता है। हिंदू लड़कियां जो गांवों से शहर के लिए चले गए वो आसान शिकार हो जाते हैं। कहा तो ये भी जाता है कि ऐसे लोग किसी लड़की के पीछे दो से तीन हफ्ते का समय देते हैं और यदि लड़की उनके जाल में नहीं फंसती है, तो वो दूसरे शिकार की तरफ निकल पड़ते हैं। इन बातों की सत्यता के लिए निष्पक्ष जांच और उन जांच नतीजों का सामने आना जरूरी है।

जयपुर से लापता हुआ हिन्दू युवक पीयूष सिंह मोहम्मद अली के नाम से निजामुद्दीन के मरकज में मिला

पियूष-तबलीगी जमात मरकजजयपुर का रहने वाला पीयूष सिंह (Piyush Singh) बीते 20 मार्च को लापता हो गया था। हाल ही में वह​ दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मरकज (Nizamuddin Markaz) में मिला। चौंकाने वाली बात यह है कि यहाँ तबलीगी जमात की लिस्ट में उसका नाम पीयूष सिंह नहीं, बल्कि मोहम्मद अली (Mohammad Ali) पाया गया है।
पीयूष के पिता का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है कि आखिर उसका मरकज पहुँचने के पीछे क्या कारण हो सकता है या फिर वो किन लोगों से मिल रहा था।
पीयूष के पिता का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है कि आखिर उसका मरकज पहुँचने के पीछे क्या कारण हो सकता है या फिर वो किन लोगों से मिल रहा था।
कुछ दिनों से घर पर ही नमाज़ पढ़ने लगा था 
पीयूष के पिता ने कहा कि पिछले कुछ महीनों से उनका बेटा घर पर नमाज पढ़ रहा था और इस्लाम की बातें किया करता था। पिता ने यह भी बताया था कि उनका बेटा किसी से बात नहीं कर रहा था, उसका व्यवहार अजीबोगरीब था और अपने में ही खोया रहता था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि उसके लापता होने के 7 दिन बाद 27 मार्च को पिता अनूप सिंह ने जयपुर के सदर थाना में शिकायत दर्ज कराई थी। सदर थाना एसएचओ राजेंद्र सिंह शेखावत ने इस बात की पुष्टि की है। जयपुर पुलिस की एक टीम पीयूष को बुधवार (मई 20, 2020) को मरकज से वापस लेकर आई।
एक ही है पीयूष और अली का आधार नंबर 
जाँच में पता चला है कि पीयूष का आधार नंबर वही है, जो तबलीगी जमात के सदस्यों की सूची में मोहम्मद अली का है। इस सूची में अली का पता मेरठ दिखा रहा है। 19 अप्रैल को अली उर्फ पीयूष को क्वारंटाइन में रहने की सलाह दी गई थी।
वह दिल्ली के सुल्तानपुरी पुलिस स्टेशन में था। अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि उसके कोरोना जाँच के नमूने तीन बार लिए गए थे और हर बार नकारात्मक नतीजे ही आए।
पुलिस का एक दल दिल्ली गया और बुधवार (मई 20, 2020) को उसे वापस जयपुर ले आया। एसएसओ शेखावत ने बताया कि अली उर्फ़ पीयूष वह वापस नहीं आना चाह रहा था और वहीं रहना चाहता था।
नाम मोहम्मद अली रखने के बारे में एसएचओ ने बताया, “उसने शायद खुद ही इस नाम से अपना पंजीकरण कराया होगा। अगर वह यह चाहता कि उसे रॉबिनहुड के नाम से जाना जाए, तो अधिकारी उसका नाम रॉबिनहुड ही लिखते। वह स्वेच्छा से वहाँ रह रहा था।”
रिपोर्ट्स के अनुसार, पीयूष उर्फ़ मोहम्मद अली के पिता का इस बारे में कुछ और ही कहना है। पीयूष के पिता ने कहा कि उन्हें महज 10 दिन पहले ही इस बात की सूचना मिली कि उनका बेटा मरकज में है।
युवक के पिता ने कहा कि पुलिस के प्रयास द्वारा उसे वापस लाया जा सका। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि दिल्ली मरकज से लौटने के बाद उनके बेटे पीयूष की मानसिक स्थिति अस्थिर है और वह अपने आप में खोया हुआ रहता है, ना ही किसी से बात करता है।
पीयूष उर्फ़ मोहम्मद अली के पिता का कहना है कि उनके बेटे ने बीसीए की पढ़ाई की है और MCA के लिए तैयारी कर रहा है। कुछ समय बाद जब हालात सामान्य होंगे तब वो उससे पूछेंगे कि वो आखिर मरकज पहुँचा कैसे?

मरकज में 21 दिन रहे शख्स का खुलासा : एक ही थाली में 6-7 लोग खाना ही नहीं, सेक्स करना भी सिखाते थे

तबलीगी जमात, कोरोना वायरसतबलीगी जमात का नजामुद्दीन स्थित मरकज यूॅं ही देश में कोरोना वायरस संक्रमण का केंद्र बनकर नहीं उभरा है। वहॉं न केवल सरकार निर्देशों का उल्लंघन कर आयोजन हुए, बल्कि मरकज की दिनचर्या भी कुछ ऐसी थी जिससे संक्रमण फैलना ही था। यहॉं तक कि एक ही थाली में बैठकर 6-7 लोग खाना खाते थे।
यह खुलासा तेलंगाना के एक व्यक्ति ने किया है। वह मरकज में बीते साल नवंबर में 21 दिनों तक ठहरा था। उक्त व्यक्ति ने ‘स्वराज्य’ के स्वाति गोयल शर्मा से बातचीत की। इस दौरान उसने कई चौंकाने वाले दावे किए। यहाँ हम इस व्यक्ति का बदला हुआ नाम ‘जॉनी’ इस्तेमाल करेंगे।
जॉनी शुरू में ईसाई था। धर्मांतरण कर इस्लाम अपना लिया। उसने अपनी प्रेमिका के परिवार को ख़ुश करने के लिए ऐसा किया। एक डॉक्टर ने उसका लिंग-विच्छेद (खतना) किया। उसकी सलाह पर ही जॉनी ने तबलीगी जमात में शामिल होने का फ़ैसला किया। नवंबर में मरकज़ में जाने से पहले वह कई दिनों तक तेलंगाना की विभिन्न मस्जिदों में प्रवास कर चुका था।

उसने बताया कि तबलीगी जमात पूरी दिनचर्या तय करता है। खाने-पीने से लेकर मल-मूत्र त्याग करने तक सब कुछ। यहाँ तक कि सेक्स कैसे करना है, ये भी जमात ही सिखाता था। जॉनी को भी उस ‘ऑर्थोडॉक्स’ संस्था से जुड़ाव हो गया था और वो सब कुछ करता था, जैसे कहा जाए।
हालाँकि, जॉनी को जमातियों के रहन-सहन का तरीका पसंद नहीं आया। उसने कहा कि मरकज़ आज कोरोना वायरस का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बन गया है, ये आश्चर्यचकित करने वाली बात नहीं है। उसने वहाँ के तौर-तरीकों का जिक्र करते हुए बताया कि ये निश्चित है कि अगर वहाँ एक व्यक्ति को कोई ऐसा संक्रमण हुआ तो फिर बाकियों को भी हो ही जाएगा। जॉनी ने बताया:
“वहाँ 4 लोग एक साथ बैठ जाते हैं और एक ही प्लेट में भोजन करते हैं। रोटी, चावल और करी वगैरह भी एक ही प्लेट में खाते थे। यहाँ तक कि हम चम्मच का भी प्रयोग नहीं किया करते थे और साथ ही खाते थे। कभी-कभी 6-7 लोग भी ऐसा ही करते थे। अंदर बाथरूम बहुत कम हैं और सभी को शेयर करना पड़ता है। हालाँकि, एक समय पर मरकज़ में निश्चित लोग ही रहते हैं। लोग वहाँ आते-जाते रहते हैं। कभी-कभी तो वहाँ हज़ार से भी अधिक लोग एक साथ रह रहे होते हैं। इतनी भीड़ होती है कि आप दिन में कभी भी बाथरूम जाएँ, अंदर कोई न कोई होता है और आपको 5-7 मिनट इन्तजार करना ही करना पड़ेगा।”
जॉनी ने बताया कि मरकज़ के बाथरूम को रोज साफ़ किया जाता था लेकिन टॉयलेट्स से हमेशा दुर्गन्ध आती ही रहती थी। इतनी संख्या में लोग उसका प्रयोग करते थे कि ऐसा हेमशा होता था। दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य विभाग की डायरेक्टर डॉक्टर नूतन मांडेजा ने भी कहा था कि मरकज़ में जिस तरह लोग रहते थे, उसी का पारिणाम है कि आज इतनी संख्या में वहाँ से कोरोना मरीज निकले हैं। उन्होंने कहा था कि वाशरूम और बर्तन साझा करने से ऐसा हुआ।
मरकज़ में स्विमिंग पूल की तरह एक पानी का पूल है, जिसे ‘वुडू’ कहते हैं। ये एक प्रक्रिया है, जिसके तहत मुसलमान नमाज़ पढ़ने से पहले अपने हाथ-पाँव और मुँह को धोते हैं। इसके लिए वहाँ के मुसलमान उसी पानी का प्रयोग करते थे, जिससे वायरस का फैलाव हुआ होगा। जॉनी ने अपने परिवार को नहीं बताया था कि वो दिल्ली में है। वो अभी भी कहता है कि जमात जीवन जीने के सही तौर-तरीके सिखाता है। यहाँ तक कि वहाँ अंदर मोबाइल फोन तक निकालना मना है। बाहर भी सेल्फी वगैरह क्लिक करने पर बाकी मुसलमान ताना देते हैं और पूछते हैं कि तुम किस किस्म के मुसलमान हो?
जनवरी में जॉनी को भी सर्दी-बुखार और कफ हो गया था। उसने कोई दवा नहीं ली। वो बताता है कि 20-25 दिन में वो अपने-आप ठीक हो गया। बकौल जॉनी, जमात ने सिखाया है कि डॉक्टरों के पास नहीं जाना चाहिए और अल्लाह में यकीन करना चाहिए। जॉनी कहता है कि वो इन चीजों को पूरी तरह फॉलो नहीं करता, क्योंकि अगर उसकी तबीयत ज्यादा ख़राब हुई तो उसे अस्पताल जाना ही पड़ेगा।(साभार)
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार तबलीगी जमातियों के कोरोना संक्रमित होने के कारण के चर्चा में आने के बाद उनसे संबंधित ....

कश्मीर : मस्जिदों से लगते नारे : हमें हिन्दू औरतें चाहिए

कश्मीरी पंडित, नरसंहार
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 रहते हिन्दुओं का किस तरह उपहास, बलात्कार एवं मान-मर्यादा की क्षति हो रही थी, उसे जानने के लिए 30 वर्ष पीछे जाना पड़ेगा। जिसे जनहित की बात करने छद्दम धर्म-निरपेक्ष अपने वोटबैंक की खातिर अनदेखा करते रहे। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से जिस तरह पत्थरबाजों और आतंकवादियों पर प्रहार हुआ, उससे इन छद्दम धर्म-निरपेक्षों का विचलित होना स्वाभाविक था। शायद इसी कारण सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के सबूत मांग अपने वोटबैंक को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया था। परन्तु हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं की लुटती अस्मिता का किसी ने संज्ञान नहीं लिया। यदि स्थिति विपरीत होती, समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों ने हिन्दुओं पर न जाने कितनी दफाएं लगाकर जेलों में सड़ने के लिए फेंक दिया होता। दुनियां भर के मानवाधिकार कश्मीर पहुँच गए होते, लेकिन ये अत्याचार हिन्दुओं पर हो रहे थे, इसलिए किसी ने सुध नहीं ली, बैठे रहे अफीमचियों की तरह। 
शर्म आती हैं, उन हिन्दू नेताओं और कार्यकर्ताओं पर, जो इतना सबकुछ होते हुए भी अपनी पार्टी का विरोध करने का साहस तक नहीं कर पाए, शायद यही कारण है कि कश्मीर में दुष्टों द्वारा हिन्दू अस्मिता को हनन किया जा रहा था। 
अत्याचार के 30 साल    
कश्मीर घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए 19 जनवरी प्रलय का दिन माना जाता है, क्योंकि वर्ष 1990 में हालात बिगड़ने के कारण इसी तारीख में कश्मीरी पंडित समुदाय ने कश्मीर घाटी से पलायन करना शुरू कर दिया था। मई 1990 तक करीब पाँच लाख कश्मीरी पंडित जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़ कश्मीर से पलायन कर चुके थे, जो स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा पलायन माना जाता है। इसी के चलते हर वर्ष 19 जनवरी को जहां कहीं भी कश्मीरी पंडित रहते हैं, वहाँ वह इस तारीख को ‘होलोकॉस्ट/एक्सोडस डे’ (प्रलय/बड़ी संख्या में पलायन की तारीख) के तौर पर मनाते हैं।
90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं पर हुआ हत्याचार एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जिसे चाहकर भी भुला पाना असंभव है। रातों-रात खुद को बचाने के लिए कश्मीर में अपना घर, संपत्ति छोड़कर भागे लोगों के मन में आज भी उस रात की टीस बाकी है, जब उन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथी का शिकार होते अपनी आँखों के सामने बर्बरता से अपने लोगों को जिंदा जलते-मरते देखा और जिन्हें इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते 30 साल हो गए।

बीते साल 14 नवंबर 2019 को ऐसी ही अनगिनत कहानियों को अपने दिल में समेट कर भारतीय स्तंभकार सुनंदा वशिष्ठ टॉम लैंटॉस एचआर द्वारा आयोजित यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक के लिए वॉशिंगटन डीसी पहुँचीं थीं। हालाँकि वहाँ जाने से पहले ही उन्होंने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दे दी थी कि आयोजन में वह सिर्फ़ कश्मीर से जुड़ी उन कहानियों के बारे में बात करने वाली हैं, जिन्हें लोगों ने कभी नहीं सुना होगा या फिर जिन्हें बताने से हमेशा बचा गया। लेकिन जब उन्होंने वहाँ बोलना शुरू किया और कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की आवाज बनीं… तो मानो जैसे सब सिहर गए।
कश्मीर के हालातों की चश्मदीद, उन्होंने आयोजन में बोलना प्रारंभ किया। इस दौरान घाटी में पसरे इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण उन्होंने कश्मीर की तुलना सीरिया से की। उन्होंने 30 साल पहले का समय याद करते हुए कहा कि उन लोगों ने ISIS के स्तर की दहशत और बर्बता कश्मीर में झेली है। इसलिए उन्हें खुशी है कि आज इस तरह मानवाधिकारों की बैठक यहाँ हो रही हैं, क्योंकि जब मेरे जैसों ने अपने घर और अपनी जिंदगी सब गँवा दी थी, तब पूरा विश्व शांत था।
अपना गुस्सा जाहिर करते हुए सुनंदा वशिष्ठ ने लोगों से पूछा कि आखिर तब मानवाधिकार के वकील कहाँ थे, जब हमारे अधिकार हमसे छीने गए।
“कहाँ थे वो लोग जब 19 जनवरी 1990 की रात घाटी के हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के।”
उस रात की पीड़ा को जाहिर करते हुए सुनंदा ने आगे पूछा, “इंसानियत के रखवाले उस समय कहाँ थे जब मेरे दादाजी रसोई की चाकू और जंग लगी कुल्हाड़ी लेकर हमें मारने के लिए हमारे सामने केवल इसलिए खड़े थे, ताकि वो हमें उस बर्बरता से बचा सकें, जो जिंदा रहने पर हमारा आगे इंतजार कर रही थी।”
बैठक में उन्होंने बताया था कि उनके लोगों को आतंकियों ने उस रात केवल 3 विकल्प दिए थे। या तो वे कश्मीर छोड़कर भाग जाएँ, या फिर धर्मांतरण कर लें या फिर उसी रात मर जाएँ। सुनंदा वशिष्ठ के अनुसार उस रात करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने दहशत में आकर अपनी घर- संपत्ति सब जस का तस छोड़ दिया और खुद को बचाने के लिए वहाँ से भाग निकले।
जब इस्लाम न कबूलने पर डेनियल पर्ल का सिर कलम कर दिया था 
कश्मीर पर बात करते हुए उन्होंने उस अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल को भी याद किया, जिसका मजहब इस्लाम न होने के कारण ISIS ने उसका सिर कलम कर दिया था, लेकिन फिर भी उसके आखिरी शब्द थे- “मेरे पिता एक यहूदी थे, मेरी माता एक यहूदी थी और मैं भी एक यहूदी ही हूँ।”
इस दौरान अपनी तुलना डेनियल पर्ल से करते हुए सुनंदा ने उनके आखिरी शब्दों को अपनी स्थिति बयान करने के लिए इस्तेमाल किया और कहा, “मेरे पिता एक कश्मीरी हैं, मेरी माता कश्मीरी हिंदू हैं और मैं भी एक कश्मीरी हिंदू ही हूँ। ”
19 जनवरी नरसंहार, कश्मीरी पंडितजब मस्जिदों से लगे नारे- ज़लज़ला आ गया है कुफ़्र के मैदान में
इस बैठक में आपबीती सुनाते हुए भारतीय स्तंभकार ने दावा किया कि कश्मीर में उनका और उनके लोगों का पूरा जीवन कट्टरपंथ इस्लाम के कारण बर्बाद कर दिया गया। वे इस दौरान गिरिजा टिक्कू जैसी औरतों का भी जिक्र करती नजर आईं, जिनका अपहरण करके क्रूरता के साथ मार दिया। जिनके साथ सामूहिक बलात्कार हुए और जिन्हें टुकड़ों में काटकर फेंक दिया गया। उन्होंने बीके गंजू जैसे लोगों के बारे में भी बात की। जिन्हें अपने पड़ोसियों पर विश्वास करने के बदले सिर्फ़ विश्वासघात मिला। जिन्हें कंटेनर में ही गोली मार दी गई और उनकी पत्नी को खून से सने चावल (वो भी पति के ही खून से सने) खाने को मजबूर किया गया।
सुनंदा द्वारा यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक में कही गई इन बातों के लिए उन्हें खूब सराहा गया था। स्वयं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनके वीडियो को शेयर कर उन्हें शाबाशी दी थी। उन्होंने लिखा था कि ये वो आवाज है, जो सुनी जानी चाहिए।

30 वर्षों से संघर्षरत कश्मीरी पंडित 
देश-दुनिया में बसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीर में वापसी के लिए 30 साल से आंदोलनरत हैं। उन्होंने सरकार से इस दिशा में सकारात्मक क़दम उठाने की माँग की। कश्मीर समिति दिल्ली के अध्यक्ष समीर चंगू का कहना है कि हमारा तो सबकुछ लुट गया। परिवार-रिश्तेदार और पड़ोसी सब। पीड़ा तो थी ही ज़बरदस्त गुस्सा भी था। लेकिन, हम उनकी तरह जवाब नहीं दे सकते थे। हमने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। हमेशा संविधान के दायरे में रहकर ही बात की।
कश्मीरी समिति दिल्ली का इतिहास कश्मीरी सहायक समिति के तौर पर आज़ादी के कुछ साल बाद का है। एमएन कौल और हृदय नाथ कुंजरू भी इससे जुड़े हुए थे। ऑल इंडिया कश्मीरी समाज इसी संगठन से निकला है। संगठन कोशुर समाचार नाम से मासिक पत्रिका भी निकालता है।
19 जनवरी को जनसंहार के विरोध में हर साल जंतर-मंतर पर होलोकॉस्ट डे मनाया जाता है। दिल्ली-एनसीआर के सैकड़ों कश्मीरी पंडित यहाँ जुटते हैं और अपना दर्द बयाँ करते हैं। वह दुनिया को बताते हैं कि आखिर उस रात धरती का जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ कैसा अत्याचार हुआ।
यह स्मरण रहे कि सन ’65 का युद्ध जम्मू कश्मीर राज्य को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाने के उद्देश्य से लड़ा गया था किंतु पाकिस्तान इस उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया था क्योंकि तब तक कश्मीर में पाकिस्तान परस्ती और अलगाववाद का बीज नहीं बोया जा सका था। इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अगस्त 1965 में अमानुल्लाह खान और मकबूल बट ने पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर में ‘नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ नामक अलगाववादी आतंकी संगठन बनाया था।
इस संगठन ने जून 1966 में मकबूल बट को ट्रेनिंग देकर नियन्त्रण रेखा के इस पार भेजा। छह सप्ताह बाद ही पुलिस से हुई एक मुठभेड़ में मकबूल बट ने सी० आई० डी० सब इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या कर दी। दो वर्ष बाद अगस्त 1968 में मकबूल बट को तत्कालीन सेशन जज नीलकंठ गंजू ने फाँसी की सजा सुनाई। किन्तु उसी वर्ष दिसम्बर में मकबूल बट अपने एक साथी के साथ जेल तोड़कर नियन्त्रण रेखा के उस पार भाग गया। वह 1976 में लौटा और इस बार उसने कुपवाड़ा में बैंक डकैती का असफल प्रयास किया और पकड़ा गया।
डकैती के प्रयास में उसने बैंक मैनेजर की हत्या की जिसके लिए उसे पुनः फाँसी की सजा हुई। मकबूल बट के पकड़े जाने के बाद उसके साथी आतंकवादी इंग्लैंड चले गये जहाँ उन्होंने 1977 में ‘जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (JKLF) नामक संगठन बनाया। इसी संगठन से संबद्ध ‘नेशनल लिबरेशन आर्मी’ ने मकबूल बट को जेल से छुड़ाने के लिए फरवरी 1984 में भारतीय उच्चायुक्त रवीन्द्र म्हात्रे का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी। इस घटना के पश्चात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने तत्काल मकबूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी थी।
मक़बूल भट को फांसी के बाद बदलता परिवेश 
सन 1984 में जिस दिन मकबूल बट को फाँसी दी गई थी उस दिन कश्मीर घाटी के लोगों पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की स्थापना को अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ था। इस संगठन को अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते घाटी के लोगों में अपनी पैठ बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के दो वर्ष पश्चात् सन 1986 में फारुख अब्दुल्लाह को हटाकर गुलाम मोहम्मद शाह जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बनाये गए।
शाह ने अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जम्मू स्थित न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक प्राचीन मन्दिर परिसर के भीतर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी ताकि मुस्लिम कर्मचारी नमाज पढ़ सकें। इस विचित्र निर्णय के विरुद्ध जम्मू के लोग सड़क पर उतर आये जिसके फलस्वरूप दंगे भड़क गये। अनंतनाग में पंडितों पर भीषण अत्याचार किया गया, उन्हें बेरहमी से मारा गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया और उनकी संपत्ति व मकान तोड़ डाले गये। सन 1987 से जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की गतिविधियों में तेजी आई।
बाद के सालों में अलगाववादियों की दुष्प्रचार मशीनरी ने एक सुनियोजित षड्यंत्र रचकर पंडितों के विरुद्ध वैमनस्य फैलाना प्रारंभ कर दिया। यही कारण था कि जिस मकबूल बट को 1984 में कोई जानता नहीं था फरवरी 1989 में उसका ‘शहादत दिवस’ मनाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आये थे। विश्वभर में सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सेज़’ का विरोध चरम पर था जिसकी आग कश्मीर तक भी पहुँची। परिणामस्वरूप 13 फरवरी को श्रीनगर में दंगे हुए जिसमें कश्मीरी पंडितों को बेरहमी से मारा गया।
पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या 
पं० टिकालाल टपलू पेशे से वकील और जम्मू कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष थे। पं० टपलू आरंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे तथा उदारमना व्यक्ति थे। पं० टपलू ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की थी परंतु पैसे कमाने के लिए उन्होंने इस पेशे का कभी दुरुपयोग नहीं किया। वकालत से वे जो कुछ भी कमाते उसे विधवाओं और उनके बच्चों के कल्याण हेतु दान दे देते थे। उन्होंने कई मुस्लिम लड़कियों की शादियाँ भी करवाई थीं। पूरे हब्बाकदल निर्वाचन क्षेत्र में हिन्दू मुसलमान सभी पं टपलू का सम्मान करते थे तथा उन्हें ‘लाला’ अर्थात बड़ा भाई कह कर सम्बोधित करते थे।
उनकी यह छवि अलगाववादी गुटों की आँखों का काँटा थी क्योंकि पं० टिकालाल टपलू उस समय कश्मीरी पंडितों के सर्वमान्य और सबसे बड़े नेता थे। वास्तव में अलगाववादियों को घाटी में अपनी राजनैतिक पैठ बनाने के लिए कश्मीरी पंडितों के समुदाय को हटाना जरुरी था जो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करते। इसीलिए जम्मू कश्मीर लिबेरशन फ्रंट ने पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार के विविध हथकंडे अपनाये। कश्मीर घाटी के कुछ लोकल अखबारों ने पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू समेत कई प्रतिष्ठित पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार सामग्री प्रकाशित करना आरंभ कर दिया था।
आतंकियों ने पं० टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की रणनीति बनाई। पं० टपलू को आभास हो चुका था कि उनकी हत्या का प्रयास हो सकता है इसीलिए उन्होंने अपने परिवार को सुरक्षित दिल्ली पहुँचा दिया और 8 सितम्बर 1989 को कश्मीर लौट आये। चार दिन बाद चिंक्राल मोहल्ले में स्थित उनके आवास पर हमला किया गया। यह हमला उन्हें सचेत करने के लिए था किंतु वे भागे नहीं और डटे रहे। महज दो दिन बाद 14 सितम्बर को सुबह पं० टिकालाल टपलू अपने आवास से बाहर निकले तो उन्होंने पड़ोसी की बच्ची को रोते हुए देखा। पूछने पर उसकी माँ ने बताया कि स्कूल में कोई फंक्शन है और बच्ची के पास पैसे नहीं हैं।
पं० टपलू ने बच्ची को गोद में उठाया, उसे पाँच रुपये दिए और पुचकार कर चुप करा दिया। इसके बाद उन्होंने सड़क पर कुछ कदम ही आगे बढ़ाये होंगे कि आतंकवादियों ने उनकी छाती कलाशनिकोव की गोलियों से छलनी कर दी। सन 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर करने के लिए की गयी यह पहली हत्या थी। पंडितों के सर्वमान्य नेता को मार कर अलगाववादियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि अब कश्मीर घाटी में ‘निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा’ ही चलेगा।
टिकालाल टपलू की हत्या के बाद काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर टाइम्स में एक लेख लिखा और अलगाववादियों से पूछा कि वे आखिर चाहते क्या हैं। अगले दिन इसका जवाब जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने यह लिख कर दिया कि या तो कश्मीरी पंडित भारत राज्य को समर्थन देना बंद करें और अलगाववादी आन्दोलन का साथ दें अथवा कश्मीर छोड़ दें।
पं टपलू की हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गयी। सन 1989 तक पं० नीलकंठ गंजू- जिन्होंने मकबूल बट को फांसी की सजा सुनाई थी- हाई कोर्ट के जज बन चुके थे। वे 4 नवंबर 1989 को दिल्ली से लौटे थे और उसी दिन श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट मार्केट के समीप स्थित उच्च न्यायालय के पास ही आतंकियों ने उन्हें गोली मार दी थी। इस वारदात से डर कर आसपास के दूकानदार और पुलिसकर्मी भाग खड़े हुए और खून से लथपथ जस्टिस गंजू के पास दो घंटे तक कोई नहीं आया।
कुछ दिनों बाद अमिराकदल के पास स्थानीय लड़के जस्टिस गंजू की हत्या का जश्न मनाते दिखाई दिए। आतंकियों ने जस्टिस गंजू से मकबूल बट की फाँसी का प्रतिशोध लिया था। साथ ही मस्जिदों से लगते नारों ने कश्मीर के लोगों को यह भी बता दिया था कि ‘ज़लज़ला आ गया है कुफ़्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गये हैं मैदान में।’ अर्थात अब अलगाववादियों के अंदर भारतीय न्याय, शासन और दंड प्रणाली का भय नहीं रह गया था।
पं० टिकालाल टपलू और जस्टिस गंजू की हत्या के बाद भी कई कश्मीरी पंडितों को मारा गया परन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्लाह कोरा दिलासा मात्र देते रहे और मार्तण्ड सूर्य मन्दिर के भग्नावशेष पर सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते रहे।
मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया का कथित अपहरण 
दिसंबर 8, 1989 को मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वी पी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी।अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के पाँच अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। यासीन मलिक और जेकेएलएफ को आज भी उनके किए की सज़ा नहीं मिल पाई है। हाँ, आज यह खबर आई कि सीबीआई ने वो केस फिर से खोला है।