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क्यों चुना 15 अगस्त का दिन, क्या साजिश रच रहे थे अंग्रेज?

15 august date for Indian Independence15 अगस्त एक ऐसा दिन जिसे समूचा भारत एक त्योहार के तौर पर मनाता है। इस दिन शताब्दियों की गुलामी के बाद देश ने आजाद माहौल में सांस ली। 15 अगस्त 1947 का दिन भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है, जब ब्रिटिश हुकूमत ने देश के संचालन की कमान पूरी तरह से भारतीयों के हाथ में सौंप दी थी लेकिन क्या आप जानते हैं कि शुरुआत में अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने के लिए 15 अगस्त 1947 की बजाय कोई और तारीख चुनी थी लेकिन भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने इसे बदलवा दिया। ऐसा करने के पीछे अलग-अलग वजहें और तर्क बताए जाते हैं। 
जैसाकि सर्वविदित है कि विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता। वैसे भी ब्रिटिश ने 1947 में ही जाना था। फ्रेंच ज्योतिष नोस्त्रेदामस ने अपनी 1555 की भविष्यवाणियों में स्पष्ट कहा है कि "तीन समुद्रों से घिरा हिन्द का 1947 में पहले विभाजन होगा, फिर आज़ाद होगा, परन्तु हिन्द को असली आज़ादी एक अधेड़ उम्र के सख्त प्रशासक के नेतृत्व में नई पार्टी के सत्ता में आने पर 2014 में मिलेगी।"  
जून 1948 में आजाद होने वाला था भारत
इंडिया इंडिपेंडेंस बिल में ब्रिटिश प्रशासन ने भारत को सत्ता सौंपने के लिए 3 जून 1948 का दिन तय किया था। साल 1947 में चुने गए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भी इस बात की घोषणा कर दी थी।

लॉर्ड माउंटबेटन ने किए बदलाव 
साल 1947 में लुई माउंटबेटन को भारत के आखिरी बायसराय के तौर पर नियुक्त किया गया। उन्हें व्यवस्थित ढंग से सत्ता हस्तांतरण करने की जिम्मेदारी सौपी गई थी। इससे पहले वह भारत के पड़ोसी देश म्यांमार के गवर्नर थे। माउंटबेटन के आने के बाद देश के आजादी के समय में बड़ा बदलाव किया गया। उन्होंने भारत की आजादी की तारीख को 3 जून 1948 से बदलवा कर 15 अगस्त 1947 करवा दिया। 

अंतिम वायसराय का निजी फैसला!
लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने आजादी के लिए 15 अगस्त 1947 को क्यों चुना इस पर आज भी जानकारों के बीच बहस देखने को मिलती है। कुछ इतिहासकारों का का मानना है कि भारत को जल्दी आजाद करने के नतीजे पर पहुंचने के बाद माउंटबेटन को ही तारीख चुनने की जिम्मेदारी भी दे दी गई थी और यह उनका निजी फैसला था।

लैरी कॉलिंग और डोमिनिक लैपियर की किताब 'फ्रीडम एट मिड नाइट' में माउंटबेटन ने इस तारीख को चुनने के पीछे का कारण बताया है। वायसराय के अनुसार, 'एक सवाल के जवाब के रूप में मैंने 15 अगस्त का दिन चुना था। मैं लोगों को यह भी दिखाना चाहता था कि सब कुछ मेरे ही नियंत्रण में है। जब मुझसे पूछा गया कि क्या कोई तारीख तय की गई है? तो मेरे दिमाग में अगस्त या सितंबर का महीना आया। इसके बाद मैंने 15 अगस्त की तारीख तय कर दी क्योंकि इसी दिन द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के समर्पण की दूसरी बर्षगांठ भी थी।'
कहा जाता है कि माउंटबेटन की सोच की सुई 15 अगस्त 1947 पर इसलिए भी अटकी क्योंकि उन्हें 15 अगस्त 1945 को जापान के समर्पण की तारीख अच्छी तरह याद थी। उस दौर में माउंटबेटन अलाइस फोर्सेस के कमांडर थे। वह 15 अगस्त को ब्रिटिशों के लिए शुभ मानते थे।
अंग्रेजों को था जिन्ना की मौत डर!
कुछ इतिहासकारों का आजादी के दिन और साल में बदलाव को लेकर एक और तर्क है। इसके अनुसार अंग्रेजों ने जिन्ना के सहारे भारत को बांटने की साजिश रची थी ताकि दोनों देश हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की आग में झुलसते रहें। लोगों का मानना है कि अंग्रेजों को जिन्ना की बीमारी के बारे में पता चल चुका था और उन्हें डर था कि अगर जिन्ना की मौत आजादी की घोषणा से पहले हो गई तो महात्मा गांधी मुस्लिमों को बंटवारे का रास्ता न चुनने के लिए मना लेंगे।

इसी वजह से अंग्रेजी हुकूमत ने 3 जून 1948 के बजाय 15 अगस्त 1947 को ही भारत और पाकिस्तान को आजाद कर दिया। बाद में वही हुआ जिसका अंग्रेजों को डर था आजादी के कुछ महीने बाद ही टीबी की बीमारी से पीड़ित मोहम्मद अली जिन्ना की मौत हो गई। आज भी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के हालात बरकरार हैं।
वास्तव में ब्रिटिश सरकार ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच नफरत के बीज बोने में जिन्ना और मुस्लिम लीग का सहारा लिया। भारत से जाने से पूर्व भारत के बंटवारे को करते समय जिन गुप्त समझौतों, जिन्हें जनमानस से गुप्त रखा गया था, पर शंका व्यक्त की जा रही थी, उसकी परतें अब खुलनी शुरू हो गयी हैं। अगस्त 14 को एक समाचार चैनल पर हो रही चर्चा में यह बात उजागर हुई कि दोनों देश सैन्य बल प्रयोग नहीं करेंगे, लेकिन पाकिस्तान कश्मीर हथियाने के लिए सेना की आड़ में कबीलाइयों से कश्मीर हमला कर समझौते का उल्लंघन किया। दूसरे, अब तक जितने भी इंडो-पाक युद्ध हुए हैं, सभी में पहल पाकिस्तान की तरफ से ही हुई है। यानि पाकिस्तान विभाजन के समय हुए समझौते को तोडा। फिर किस आधार पर भारत द्वारा की जाने वाली कार्यवाही के विरुद्ध विश्व में शिकायत करता रहता है।  
हमारा राष्ट्रीय ध्वज-
हर आजाद देश का अपना एक राष्ट्र ध्वज होता है। हमारे देश का कोई आधिकारिक ध्वज नहीं था। 1906 में लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बने गैर आधिकारिक ध्वज को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया। 1907 में भीकाजी कामा द्वारा फहराया ध्वज भी इसी ध्वज के समान था लेकिन उसकी ऊपरी पट्टी पर कमल का फूल बना था। तीसरा ध्वज 1917 में आया। 1921 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की सभा में गांधी जी को विजयवाडा के एक युवक ने झंडा दिया, जिसमें लाल (केसरिया) और हरा रंग थो, जो हिंदु और मुस्लिम धर्म का प्रतीक था। बाद में अन्य धर्मों के प्रतीक के रूप में गांधी जी ने इसमें सफेद रंग की पट्टी और एक चलता चरखा जुड़वाया। 22 जुलाई 1947 में संविधान सभा ने इस ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज का स्थान दिया और इसमें चरखे की जगह सम्राट अशोक का धर्म चक्र बना दिया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा स्वतंत्र भारत का राष्ट्र ध्वज बन गया।