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संविधान विरोधी माँग, जिन्ना का समर्थन: मुस्लिमों के लिए हो अलग निर्वाचन समूह, संसद में मिले आरक्षण: आकार पटेल

आकार पटेल, मुसलमानमानवतावादी संस्था के रूप में खुद को प्रचारित करने वाले ‘एमनेस्टी इंडिया’ के प्रमुख रह चुके आकार पटेल ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग की है। उन्होंने पाकिस्तान के स्थापना का भी बचाव किया और मुहम्मद अली जिन्ना के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। उन्होंने ट्विटर पर कहा कि मुसलमानों के लिए अब संसद से लेकर अन्य प्रतिनिधित्व समूहों में अपने लिए अलग जगह माँगने का वक्त आ गया है।
आकार पटेल ने विभाजन के असली कारणों को छिपाते हुए दावा किया कि कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व देने से इनकार कर दिया था, इसलिए पाकिस्तान का गठन हुआ। उन्होंने कहा कि अब स्वतंत्र भारत ने जिन्ना के डर को सही साबित कर दिया है। साथ ही आकार पटेल मुसलमानों के लिए अलग इस्लामिक स्टेट की माँग करते हुए इसके लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने से भी नहीं चूके।
मानववादी संस्था को जो मुसलमानों के लिए भारत में कह रहे हैं, क्या वही बात पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को बंद कर उनको भी वहां की असेंबली में उनके उचित स्थान देने की लिए क्या बोलने की हिम्मत दिखा सकते हैं, या फिर भारत में अराजकता फ़ैलाने की हिम्मत दिखा सकते हैं? क्या हिन्दुओं के लिए कोई मानवधिकार नहीं? यह कौन-सा नियम अथवा सिद्धांत है, जो मुसलमानों के हित की सोंचते हैं और विचार करते हैं, हिन्दुओं के लिए नहीं? 
उन्होंने आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात करते हुए कहा की हर एक जनप्रतिनिधियों के समूह में मुसलमानों के लिए एक निश्चित संख्या में सीटें आरक्षित होनी चाहिए। कुछ लोगों ने इसका अर्थ ये भी निकाला की सेना से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक में मुसलमानों को आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये सबसे कम है जो हम मुसलमानों के लिए कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दू राष्ट्र इस माँग को नहीं ठुकरा सकता, क्योंकि ये वैध है।
हिंदुओं के कत्लेआम के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की बात करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना का बचाव करते हुए आकर पटेल ने कहा कि वो दक्षिणी मुंबई में रहने वाले गुजराती थे, जो आम भारतीयों से कहीं ज्यादा शहरी थे। नरेंद्र मोदी को संविधान के खिलाफ काम करने वाला प्रधानमंत्री कहने वाले आकार पटेल इस दौरान ये भी भूल गए कि वो जो कह रहे हैं, उसे संविधान सभा पहले ही ठुकरा चुका है।
मुहम्मद इस्माइल ने कहा था कि मुसलमानों को जब तक अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं मिलता और उन्हें इस तरह का प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तब तक उनके साथ न तो न्याय हो सकता है और न ही वो जगह मिल सकती है, जिसके लिए वो इच्छुक हैं। आरके सिधवा ने तब कहा था अगर वो अब भी ऐसा सोचते हैं तो फिर वो आज भी न सिर्फ टू नेशन थ्योरी में विश्वास रख रहे हैं, बल्कि सांप्रदायिकता को भी बढ़ावा दे रहे हैं।
उन्होंने ये भी बताया था कि ये सिस्टम भारत में क्यों काम नहीं करेगा। उन्होंने कहा था कि छोटे देशों में ये चल सकता है, लेकिन यहाँ नहीं। ये एक ऐसा सिस्टम है जिसे बुद्धिजीवी वर्ग ही समझ सकता है। उन्होंने गिनाया था कि बेल्जियम और स्विट्जरलैंड में कुछ लाख ही जनसंख्या है, जबकि भारत में 40 करोड़ है और यहाँ के संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों में ही लाख तक जनसंख्या होती है।
यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरू भी इस तरह के आरक्षण के खिलाफ थे और उन्होंने कहा था कि एक लोकतंत्र में इस तरह की व्यवस्था इसके विरुद्ध ही हो जाएगी। उन्होंने कहा कि जब एक राजनीतिक लोकतंत्र में ऐसा किया जा रहा है तो इसका अर्थ है कि आप उस अल्पसंख्यक समुदाय को अलग-थलग कर रहे हो। उन्होंने कहा था कि इसका अर्थ यह हुआ कि उनमें हमारा विश्वास नहीं है।
आकार पटेल इससे कोरोना पीड़ित अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गजों के लिए नफ़रत फैला चुके हैं। पटेल के मुताबिक़ यह 3 हस्तियाँ साबित करती हैं कि ‘पैसे से क्लास नहीं आता।’ अपनी विकृत मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए आकार ने तीनों को ‘मिडिल क्लास ऑपोरच्युनिस्ट’ (मध्यमवर्गीय अवसरवादी) भी कहा था। कहा था कि यह छोटे ही रहने वाले हैं, इनकी मानसिकता कुएँ के मेढक जैसी ही है।’

जिन्ना की राह पर असददुद्दीन ओवैसी

पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे और AIMIM के नेता वारिस पठान के 15 करोड़ बनाम 100 करोड़ के बयान से असददुद्दीन ओवैसी की हकीकत सामने आ गई है। ओवैसी से सवाल पूछे जा रहे हैं कि आखिर जिस मंच पर वो मौजूद थे उस मंच से एक लड़की ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे क्यों लगाए? इससे भी बड़ा सवाल ये है कि जब उनकी पार्टी के नेता वारिस पठान 15 करोड़ बनाम 100 करोड़ का विवादित बयान दे रहे थे तो ओवैसी ने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की?
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने शुक्रवार को कहा कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान घृणा की राजनीति हो रही है। पात्रा ने AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी के मंच पर लगे ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ के नारे का जिक्र करते हुए कहा कि पूरे देश में नफरत फैलाने की कोशिश की जा रही है। पात्रा ने सवाल किया कि पाकिस्तान जिन्दाबाद का नारा लगाने वाले से तो माइक छीन लिया गया, लेकिन वारिस पठान के भाषण पर माइक क्यों नहीं छीना गया। उस वक्त भी मंच पर ओवैसी मौजूद थे। जब मंच के पीछे सिखाया जाता है, तो मंच के आगे हकीकत निकल जाती है।
बीजेपी प्रवक्‍ता संबित पात्रा ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत विपक्ष पर हमला करते हुए कहा, ‘ये लोग CAA के नाम पर लोगों में भ्रम फैला रहे हैं।इनके हाथ में संविधान है, लेकिन दिल में वारिस पठान है।’ 
सोशल मीडिया पर ये भी सवाल पूछे जा रहे हैं कि छोटी-छोटी बातों पर बयान और ट्वीट करने वाले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने आखिर वारिस पठान के जहरीले बयान पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी। शाहीन बाग में स्टूडेंट्स की पिटाई के फेक Edited वीडियो पर प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर सरकार से सवाल किए लेकिन वारिस पठान के बयान पर प्रियंका गांधी और राहुल गांधी दोनों चुप हैं। इसके साथ ही तथाकथित सेकुलर पत्रकारों ने भी इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।
ऐसा नहीं है कि असदुद्दीन ओवैसी और AIMIM के नेताओं ने इस तरह के विवास्पाद बयान पहली बार दिए हैं। इससे पहले भी उसके नेता कई मौकों पर जहरीने बयान देकर देश को बांटने की कोशिश की है।
ओवैसी के मंच से लगे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे 
बेंगलुरु में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में हुई रैली में अमूल्या नाम की एक लड़की ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए। इस रैली में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी भी थे। लड़की के ख़िलाफ़ देशद्रोह का केस दर्ज किया गया था। हालांकि AIMIM चीफ़ असदुद्दीन आवैसी ने सफाई देते हुए कहा कि उनका उस लड़की से कोई लेना-देना नहीं है, उसे किसी ने नहीं बुलाया था।
100 करोड़ पर भारी हैं 15 करोड़
AIMIM के नेता वारिस पठान ने कर्नाटक के गुलबर्गा में जनसभा को संबोधित करते हुए बेहद विवादित बयान देते हुए कहा कि हम 15 करोड़ हैं और 100 करोड़ लोगों पर भारी हैं। पूर्व विधायक वारिस पठान ने जहर उलगते हुए कहा कि हमने ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख लिया है। मगर हमको इकट्ठा होकर चलना पड़ेगा। आजादी लेनी पड़ेगी और जो चीज मांगने से नहीं मिलती है, उसको छीन लिया जाता है। हमको कहा जा रहा है कि हमने अपनी मां और बहनों को आगे भेज दिया है। हम कहते हैं कि अभी सिर्फ शेरनियां बाहर निकली हैं, तो आपके पसीने छूट गए। अगर हम सब साथ में आ गए, तो सोच लो क्या होगा। हम 15 करोड़ ही 100 करोड़ लोगों पर भारी हैं। यह बात याद रख लेना।
15 मिनट में हिंदुओं को खत्‍म करने की धमकी 
इससे पहले असदुद्दीन ओवैसी के छोटे भाई और एमआईएम के नेता व विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद के अदीलाबाद के निर्मल इलाके में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था, “अरे हिन्‍दुस्‍तान, हिन्‍दुस्‍तान हम 25 करोड़ हैं न, तुम 100 करोड़ हो न। तुम तो हमारे से इतने ज्‍यादा हो, 15 मिनट के लिये पुलिस को हटा लो, बता देंगे, किसमें कितनी हिम्‍मत है। एक सौ क्‍या, एक हजार क्‍या, एक करोड़ नामर्द मिलकर भी कोशिश कर लें तो एक को भी पैदा नहीं कर सकते। ये लोग हमसे मुकाबला नहीं कर सकते।”
‘हमारे पूर्वजों ने किया 800 सालों तक शासन’ 
जनवरी 2020 को विवादित बयान देते हुए असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि किसी को भी डरने और घबराने की जरूरत नहीं है, हमको इनकी बातों में आने की जरूरत नहीं है। जो लोग पूछ रहे हैं कि मुसलमान के पास क्या है, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि तू मेरे कागज देखना चाहता है। मैंने 800 बरस तक इस मुल्क में हुक्मरानी और जांबाजी की है। ये मुल्क मेरा था, मेरा है और मेरा रहेगा। मेरे अब्बा और दादा ने इस मुल्क को चारमीनार दिया, कुतुब मीनार  दिया, जामा मस्जिद दिया। हिंदुस्तान का पीएम जिस लाल किले पर झंडा फहराता है उसे भी हमारे पूर्वजों ने ही दिया है।
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AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पार्टी के पूर्व विधायक वारिस पठान द्वारा पिछले दिनों दिए गए एक विवादित बयान का विरोध थ....

क्यों चुना 15 अगस्त का दिन, क्या साजिश रच रहे थे अंग्रेज?

15 august date for Indian Independence15 अगस्त एक ऐसा दिन जिसे समूचा भारत एक त्योहार के तौर पर मनाता है। इस दिन शताब्दियों की गुलामी के बाद देश ने आजाद माहौल में सांस ली। 15 अगस्त 1947 का दिन भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है, जब ब्रिटिश हुकूमत ने देश के संचालन की कमान पूरी तरह से भारतीयों के हाथ में सौंप दी थी लेकिन क्या आप जानते हैं कि शुरुआत में अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने के लिए 15 अगस्त 1947 की बजाय कोई और तारीख चुनी थी लेकिन भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने इसे बदलवा दिया। ऐसा करने के पीछे अलग-अलग वजहें और तर्क बताए जाते हैं। 
जैसाकि सर्वविदित है कि विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता। वैसे भी ब्रिटिश ने 1947 में ही जाना था। फ्रेंच ज्योतिष नोस्त्रेदामस ने अपनी 1555 की भविष्यवाणियों में स्पष्ट कहा है कि "तीन समुद्रों से घिरा हिन्द का 1947 में पहले विभाजन होगा, फिर आज़ाद होगा, परन्तु हिन्द को असली आज़ादी एक अधेड़ उम्र के सख्त प्रशासक के नेतृत्व में नई पार्टी के सत्ता में आने पर 2014 में मिलेगी।"  
जून 1948 में आजाद होने वाला था भारत
इंडिया इंडिपेंडेंस बिल में ब्रिटिश प्रशासन ने भारत को सत्ता सौंपने के लिए 3 जून 1948 का दिन तय किया था। साल 1947 में चुने गए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भी इस बात की घोषणा कर दी थी।

लॉर्ड माउंटबेटन ने किए बदलाव 
साल 1947 में लुई माउंटबेटन को भारत के आखिरी बायसराय के तौर पर नियुक्त किया गया। उन्हें व्यवस्थित ढंग से सत्ता हस्तांतरण करने की जिम्मेदारी सौपी गई थी। इससे पहले वह भारत के पड़ोसी देश म्यांमार के गवर्नर थे। माउंटबेटन के आने के बाद देश के आजादी के समय में बड़ा बदलाव किया गया। उन्होंने भारत की आजादी की तारीख को 3 जून 1948 से बदलवा कर 15 अगस्त 1947 करवा दिया। 

अंतिम वायसराय का निजी फैसला!
लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने आजादी के लिए 15 अगस्त 1947 को क्यों चुना इस पर आज भी जानकारों के बीच बहस देखने को मिलती है। कुछ इतिहासकारों का का मानना है कि भारत को जल्दी आजाद करने के नतीजे पर पहुंचने के बाद माउंटबेटन को ही तारीख चुनने की जिम्मेदारी भी दे दी गई थी और यह उनका निजी फैसला था।

लैरी कॉलिंग और डोमिनिक लैपियर की किताब 'फ्रीडम एट मिड नाइट' में माउंटबेटन ने इस तारीख को चुनने के पीछे का कारण बताया है। वायसराय के अनुसार, 'एक सवाल के जवाब के रूप में मैंने 15 अगस्त का दिन चुना था। मैं लोगों को यह भी दिखाना चाहता था कि सब कुछ मेरे ही नियंत्रण में है। जब मुझसे पूछा गया कि क्या कोई तारीख तय की गई है? तो मेरे दिमाग में अगस्त या सितंबर का महीना आया। इसके बाद मैंने 15 अगस्त की तारीख तय कर दी क्योंकि इसी दिन द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के समर्पण की दूसरी बर्षगांठ भी थी।'
कहा जाता है कि माउंटबेटन की सोच की सुई 15 अगस्त 1947 पर इसलिए भी अटकी क्योंकि उन्हें 15 अगस्त 1945 को जापान के समर्पण की तारीख अच्छी तरह याद थी। उस दौर में माउंटबेटन अलाइस फोर्सेस के कमांडर थे। वह 15 अगस्त को ब्रिटिशों के लिए शुभ मानते थे।
अंग्रेजों को था जिन्ना की मौत डर!
कुछ इतिहासकारों का आजादी के दिन और साल में बदलाव को लेकर एक और तर्क है। इसके अनुसार अंग्रेजों ने जिन्ना के सहारे भारत को बांटने की साजिश रची थी ताकि दोनों देश हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की आग में झुलसते रहें। लोगों का मानना है कि अंग्रेजों को जिन्ना की बीमारी के बारे में पता चल चुका था और उन्हें डर था कि अगर जिन्ना की मौत आजादी की घोषणा से पहले हो गई तो महात्मा गांधी मुस्लिमों को बंटवारे का रास्ता न चुनने के लिए मना लेंगे।

इसी वजह से अंग्रेजी हुकूमत ने 3 जून 1948 के बजाय 15 अगस्त 1947 को ही भारत और पाकिस्तान को आजाद कर दिया। बाद में वही हुआ जिसका अंग्रेजों को डर था आजादी के कुछ महीने बाद ही टीबी की बीमारी से पीड़ित मोहम्मद अली जिन्ना की मौत हो गई। आज भी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के हालात बरकरार हैं।
वास्तव में ब्रिटिश सरकार ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच नफरत के बीज बोने में जिन्ना और मुस्लिम लीग का सहारा लिया। भारत से जाने से पूर्व भारत के बंटवारे को करते समय जिन गुप्त समझौतों, जिन्हें जनमानस से गुप्त रखा गया था, पर शंका व्यक्त की जा रही थी, उसकी परतें अब खुलनी शुरू हो गयी हैं। अगस्त 14 को एक समाचार चैनल पर हो रही चर्चा में यह बात उजागर हुई कि दोनों देश सैन्य बल प्रयोग नहीं करेंगे, लेकिन पाकिस्तान कश्मीर हथियाने के लिए सेना की आड़ में कबीलाइयों से कश्मीर हमला कर समझौते का उल्लंघन किया। दूसरे, अब तक जितने भी इंडो-पाक युद्ध हुए हैं, सभी में पहल पाकिस्तान की तरफ से ही हुई है। यानि पाकिस्तान विभाजन के समय हुए समझौते को तोडा। फिर किस आधार पर भारत द्वारा की जाने वाली कार्यवाही के विरुद्ध विश्व में शिकायत करता रहता है।  
हमारा राष्ट्रीय ध्वज-
हर आजाद देश का अपना एक राष्ट्र ध्वज होता है। हमारे देश का कोई आधिकारिक ध्वज नहीं था। 1906 में लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बने गैर आधिकारिक ध्वज को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया। 1907 में भीकाजी कामा द्वारा फहराया ध्वज भी इसी ध्वज के समान था लेकिन उसकी ऊपरी पट्टी पर कमल का फूल बना था। तीसरा ध्वज 1917 में आया। 1921 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की सभा में गांधी जी को विजयवाडा के एक युवक ने झंडा दिया, जिसमें लाल (केसरिया) और हरा रंग थो, जो हिंदु और मुस्लिम धर्म का प्रतीक था। बाद में अन्य धर्मों के प्रतीक के रूप में गांधी जी ने इसमें सफेद रंग की पट्टी और एक चलता चरखा जुड़वाया। 22 जुलाई 1947 में संविधान सभा ने इस ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज का स्थान दिया और इसमें चरखे की जगह सम्राट अशोक का धर्म चक्र बना दिया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा स्वतंत्र भारत का राष्ट्र ध्वज बन गया।