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‘मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं’ : नजमा हेपतुल्ला

Image result for najma heptullaआजादी के बाद से ही भारत में मुस्लिम और कथित बुद्धिजीवी अक्सर अल्पसंख्यकों के अधिकारों का रोना रोते रहे हैं। हालाँकि, संविधान कभी धार्मिक आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव की इजाजत नहीं देता। संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े जाने के बाद तो किसी के धार्मिक अधिकारों पर चर्चा होनी ही नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी यह समय-समय पर चर्चा का विषय बन ही जाता है।
संविधान में अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समता का आश्वासन देता है। लेकिन हम यह देखते आए हैं कि विधि की समता के सामने हर समय कई प्रकार के धार्मिक दुराग्रह खड़े हो जाते हैं। सवाल मुस्लिमों की अल्पसंख्यक बने रहने में रूचि को लेकर है। इसका एक कारण कांग्रेस और वामपंथियों की तुष्टिकरण की नीति रही है। साथ ही अल्पसंख्यक बने रहने में वास्तविक मारा-मारी पीड़ित और शोषित के भाव की है। किसी देश में अल्पसंख्यक होना, उस देश की कृपा और मेहरबानी पर आश्रित होने जैसा भाव देता है। बावजूद इसके भारत में अल्पसंख्यक होना एक अवसर माना जाता रहा है।
पहला सवाल तो देश के मुस्लिमों को खुद से ही करना चाहिए कि क्या वो संविधान लिखे जाने के इतने वर्ष बाद भी स्वयं को संविधान की शर्तों से मंजूर मानते हैं? आज़ादी माँगने वाले मुस्लिम क्या 21वीं सदी के आज़ादी के विचारों से सहमत हैं? हाल ही में नागरिकता संशोधन कानून के बहाने शाहीन बाग़ एवं भारत के अन्य मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जो कुछ चल रहा है, वह किसी से भी छुपा नहीं है। इतना ही नहीं, मुस्लिम बच्चों के दिमाग तक में इतना जहर घोल दिया गया है कि दिन में मोदी के विरुद्ध इतने अभद्र भाषा में नारे लगाते रहते हैं, जिन्हे शब्दों के व्यक्त करना पत्रकारिता के विरुद्ध है। इससे एक बात और स्पष्ट होती है कि इनके दिल-ओ-दिमाग को कितना संकुचित कर दिया गया है। 
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जब धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मौलिक हिस्सा माना गया, तब सुप्रीम कोर्ट ने ये तय किया कि संसद इसे किसी भी तरह से कमजोर करने में सक्षम नहीं है, बल्कि इसे मजबूत बनाने के लिए जरूरी कदम उठा सकती है। लेकिन धर्मनिरपेक्षता शब्द के बावजूद भी भारत का मुसलमान आज भी मुख्यधारा से जुड़ने में इतना असहज क्यों रहता है? इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत का मुसलमान आज भी कई आधारभूत क्षेत्रों में अन्य धर्म के लोगों की तुलना में पिछड़े हुए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि ऐसे उदाहरण हैं, जिसमें मुसलमान आज भी समय से बहुत पीछे खड़ा है। क्यों? 
जब तक स्वयं मुस्लिम अपनी मजहबी कट्टरता के आवरण को नहीं त्याग देते, तब तक इस समाज के पुनर्जागरण की उम्मीद करनी फिजूल है। मुस्लिम समाज को खुद अपनी बुनियादी बदलावों के लिए लक्ष्य बनाने होंगे और समय सीमा तय करनी होगी। इसका सबसे ताजा और सटीक उदाहरण तीन तलाक का गैर कानूनी होना है। सरकार को इस कानून को पारित करने के लिए एक बड़े वोट बैंक से खिलाफत का जोखिम उठाना पड़ा। हाल ही में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने नागरिकता संशोधन कानून को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
मुस्लिमों के पिछड़ेपन में सबसे बड़ा हाथ अगर धार्मिक कट्टरता के बाद किसी का रहा है तो वो कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल ही हैं। नागरिकता संशोधन कानून, यानी CAA और NRC ने एक नई बहस को भी छेड़ दिया है। यह बहस है पूरे देशभर में संविधान के ही भाग-4, अनुच्छेद- 44 (DPSP) में वर्णित यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने की बात। इसमें संविधान निर्माताओं द्वारा नीति-निर्देश दिया गया है कि समान नागरिक कानून (UCC) लागू करना हमारा लक्ष्य होगा।
लेकिन भारत जैसी विविधता वाले देश में UCC को लागू करना कितना आसान हो सकता है? महज तीन तलाक को ही गैर कानूनी घोषित करने पर कई तरह के फतवे और विरोध देखने को मिले। मुस्लिमों के ‘नए राजनीतिक धर्म गुरु’ और AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी जैसे पढ़े-लिखे लोग भी यह कहते हुए देखे गए कि तीन तलाक उनके धर्म का विषय है और सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
जबकि समाज और सभ्यता, दोनों ही राजनीति और धर्म से बाहर आना चाह रही है, ऐसे में अगर धार्मिक अधिकार ही आपके मूल अधिकारों पर भारी पड़ जाए तो आप किसे चुनेंगे? सत्य अपाच्य जरूर है, लेकिन मुस्लिम आज भी खुद को अल्पसंख्यक कहकर अलग किस्म के नशे में मशगूल है। लेकिन बहुत ही कम लोग इस बात से वाकिफ़ हैं कि अल्पसंख्यक होने का मतलब मुस्लिम होने से नहीं है।
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आर.बी. एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एक तरफ कांग्रेस और इसके समर्थक दल देश नागरिक संशोधन कानून के विरुद्ध मुसलमानों में ज....
वर्ष 2014 में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का प्रभार संभालने के तुरंत बाद नजमा हेपतुल्ला ने मुसलमानों के अल्पसंख्यक दर्ज़े को लेकर बयान दिया था कि यह मुस्लिम मामलों का मंत्रालय नहीं बल्कि यह अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय है। नजमा हेपतुल्ला ने जोर देते हुए कहा था कि मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं।
इस बयान के पीछे देश में परम्परागत चली आ रही ‘हिन्दू बहुसंख्यक बनाम मुस्लिम अल्पसंख्यक’ चर्चा की पोल खुल जाती है। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत के संविधान में अल्पसंख्यक वर्ग की परिकल्पना एक खुली श्रेणी के रूप में धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट विभिन्न वर्गों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से की गई है। इसलिए स्पष्ट है कि भारत के संविधान में एक स्थाई अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में सिर्फ मुसलमानों के होने की ही संभावना शून्य है। संविधान में ‘धार्मिक अल्पसंख्यक’ भी कोई नहीं है।
भारत के एक मुसलमान के सामने भी जब गांधी जी ने लगा दिया था पाकिस्तान के सारे हिंदू और सिखों की जान को दांव पर
लियोनार्ड मोसले के अनुसार भारत विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के उपरांत भी महात्मा गांधी ने कहा था- "चाहे पाकिस्तान में समस्त हिन्दू व सिख मार दिए जाएं, पर भारत के एक कमज़ोर मुसलमान बालक की भी रक्षा होगी ।"
स्रोत-(पुस्तक- भारत का राष्ट्रीय आंदोलन: एक विहंगावलोकन, लेखक-मुकेश बरनवाल, डॉ. भावना चौहान)
कांग्रेस का इतिहास मुस्लिम तुष्टीकरण के तमाम उदाहरणों से भरा हुआ है। आज देश में सीएए व एनआरसी की आड़ में जिन मंचों से मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को शह दी जा रही है, उन तमाम मंचों के पीछे जिस बेशर्मी के साथ कांग्रेस पार्टी और उसके तमाम नेता खड़े हैं, वह कोई नई बात नहीं है। आज जिस तरह की भाषा मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर सहित तमाम कांग्रेसी नेता बोल रहे हैं, यह कांग्रेस के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा हैं। वह कांग्रेस ही थी जिसने धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलिरिज्म) शब्द को संविधान में जगह दी, औऱ हमेशा उसकी आड़ में मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को प्रश्रय दिया। जिसका खामियाजा आज तक यह देश भुगत रहा है।
डॉ. अम्बेडकर अपनी पुस्तक "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" में लिखते हैं कि "कांग्रेस ने मुसलमानों को राजनीतिक और अन्य रियायतें देकर उन्हें सहन करने और खुश रखने की नीति अपनाई है। क्योंकि वे समझते हैं कि मुसलमानों के समर्थन के बिना वे अपने मनोवांछित लक्ष्य को नहीं पा सकते। मुझे लगता है कि कांग्रेस ने दो बातें समझीं नहीं हैं। पहली बात यह है कि तुष्टीकरण और समझौते में अंतर होता है, और यह एक महत्वपूर्ण अंतर है। "तुष्टीकरण" का अर्थ है, एक आक्रामक व्यक्ति या समुदाय को मूल्य देकर अपनी ओर करना ; और यह मूल्य होता है उस आक्रमणकारी द्वारा किये गए, निर्दोष लोगों पर, जिनसे वह किसी कारण से अप्रसन्न हो, हत्या, बलात्कार, लूटपाट और आगजनी जैसे अत्याचारों को अनदेखा करना। दूसरी ओर, "समझौता" होता है दो पक्षों के बीच कुछ मर्यादाएं निश्चित कर देना जिनका उल्लंघन कोई भी पक्ष नहीं कर सकता। तुष्टीकरण से आक्रांता की मांगों और आकांक्षाओं पर कोई अंकुश नहीं लगता, समझौते से लगता है।

दूसरी बात, जो कांग्रेस समझ नहीं पाई है, वह यह है कि छूट देने की नीति ने मुस्लिम आक्रामकता को बढ़ावा दिया है; और, अधिक शोचनीय बात यह है कि मुसलमान इन रियायतों का अर्थ लगाते हैं हिंदुओं की पराजित मानसिकता और सामना करने की इच्छा-शक्ति का अभाव। तुष्टीकरण की यह नीति हिंदुओं को उसी भयावह स्थिति में फंसा देगी जिसमें मित्र देश (द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस आदि) हिटलर के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाकर स्वयं को पाते थे".
ये केजरीवाल , ये ममता बनर्जी , ये मायावती , ये अखिलेश , ये राहुल गांधी और यह सारे छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नेता क्या आज वैसा ही आचरण नहीं कर रहे हैं , जैसा कभी गांधी ने 1947 में देश के बंटवारे के समय किया था ? इन्हें देश को चोट पहुंचाने के लिए दाखिल हुए उस एक घुसपैठिए की अपेक्षा सारे हिंदू सिक्ख शरणार्थी नामंजूर हैं जो अपने प्राण बचाकर किसी प्रकार इस देश को अपना घर समझकर यहां आए हैं।
स्रोत-(पुस्तक-डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में मुस्लिम कट्टरवाद, लेखक- एस के अग्रवाल : शास्त्री संदेश )

इस्लाम में आस्था नहीं रखने वाले अल्पसंख्यक पाकिस्तान में नहीं लड़ पाएँगे चुनाव

पाकिस्तान अल्पसंख्यक
पाकिस्तान स्थित मुल्तान बार काउंसिल की बैठक में अल्पसंख्यक विरोधी निर्णय
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जहाँ एक तरफ भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के नाम पर ‘जिन्ना वाली आज़ादी’ के नारे लगते हैं, उसी जिन्ना के पाकिस्तान में ऐसा प्रस्ताव पास किया गया है जिससे वहाँ के अल्पसंख्यकों की स्थिति का अंदाज़ा हो जाता है। पाकिस्तान में एक ऐसा प्रस्ताव पास किया है, जिसके बाद वहाँ ग़ैर-मुस्लिम बार काउंसिल के चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। 
भारत में CAA का विरोध करने वाली कांग्रेस, वामपंथी लॉबी, भीम आर्मी, ओवैसी, समाजवादी पार्टी और मुस्लिम कट्टरपंथी आदि क्यों खामोश हैं? क्या किसी में पाकिस्तान दूतावास पर पाकिस्तान के विरुद्ध प्रदर्शन करने का साहस है? कोई नहीं बोलेगा, क्योकि यह अत्याचार मुस्लिमों द्वारा गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध है। शर्म आनी चाहिए, एक तरफ संविधान की कसम खाते हैं, दूसरी तरफ अपने वोटों की खातिर बेकसूर जनता को दंगों की आग में झोंक, देश में अराजकता फैलाते हैं। मुल्तान बार एसोसिएशन ने ‘तहफूज़-ए-ख़त्म-ए-नबुव्वत’ नामक प्रस्ताव पास किया, जिसमें इस प्रावधान पर मुहर लगाई गई है।
न सिर्फ़ हिन्दू, ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों, बल्कि अहमदिया मुस्लिमों के भी चुनाव में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी गई है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में चेनाब नदी के तट पर स्थित मुल्तान से आई ये ख़बर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे भीषण अत्याचार की एक बानगी भर है। वहाँ हिन्दू लड़कियों के अपहरण और उनका जबरन इस्लामी धर्मान्तरण कराए जाने की ख़बरें अक्सर आती रहती हैं। यूएन ने भी अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर चिंता जताई थी।

पाकिस्तानी मीडिया संस्थान ‘नया दौर’ की ख़बर के अनुसार, मुल्तान के डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन ने फ़ैसला लिया है कि जो भी वकील बार काउंसिल का चुनाव लड़ेगा, उसे एक एफिडेविट देना होगा। इस एफिडेविट के माध्यम से उम्मीदवारों को इस्लाम के प्रति अपनी आस्था की शपथ लेनी होगी। उन्हें इस बात की शपथ लेनी होगी कि वे पैगम्बर मुहम्मद और उनके सिद्धांतों में आस्था रखते हैं। जिस कार्यक्रम में ये प्रस्ताव पास किया गया, उसमें सभी वकीलों को पैगम्बर मुहम्मद पर आधारित पुस्तकें वितरित की गईं।
वैसे यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान में ऐसा कोई प्रस्ताव पास किया गया हो जिसमें अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया गया हो। इससे पहले पाकिस्तान सरकार ने ईशनिंदा क़ानून पास किया था। तब से इस क़ानून का दुरुपयोग कर के अल्पसंख्यकों को फँसाया जा चुका है।
पाकिस्तान के ननकाना साहिब में मुस्लिम भीड़ ने गुरुद्वारे पर हमला कर दिया था। एक पाकिस्तानी युवक ने एक सिख युवती का अपहरण कर के उसका जबरन इस्लामी धर्मान्तरण करा दिया था। बाद में उलटा उसके ही परिजनों ने भीड़ के साथ गुरुद्वारे पर हमला कर दिया।

वारिस पठान का अमित शाह पर वार

Amit Shah and Waris Pathan
वारिस पठान ने अमित शाह के गृह मंत्री बनने पर साधा निशाना 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अमित शाह द्वारा मंत्री पद की शपथ लेने के बाद से छद्दम धर्म-निरपेक्षों की नींद हराम हुई ही थी, कि सुबह होते-होते उनके गृह मंत्री बनने की खबर ने तो रोटी ही हराम कर दी। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी कैबिनेट सज कर तैयार हो गई है। शपथ लिए मंत्रियों को विभागों का बंटवारा भी हो गया है। इस बीच उस राज से भी पर्दा उठ गया कि आखिरी देश की सबसे बड़ी पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे खास सिपहसलार या कहें जिनको भारतीय राजनीति में चाणक्य की उपाधि से नवाजा गया है यानि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को मंत्री परिषद में किस मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलेगी। आखिर उस बात से भी पर्दा उठ गया, अमित शाह अब देश के नए गृह मंत्री होंगे।
अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद उनको लोगों द्वारा लगातार बधाई देने का सिलसिला जारी है। 
इस बीच ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन पार्टी (एआईएमआईएम)  के नेता और मुंबई की बाइकुला सीट से विधायक वारिस पठान ने अमित शाह के गृह मंत्री बनने पर तंज कसा है। वारिस पठान ने बीजेपी द्वार किए गए एक पुराने ट्वीट को लेकर अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर निशाना साधा है।
वारिस पठान ने ट्वीट कर कहा है, ' भारत को बधाई! यह व्यक्ति अमित शाह हमारे नए गृह मंत्री हैं! इस कदम के साथ नरेंद्र मोदी ने अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित समावेशी भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है। बस वाह!' वारिस पठान ने बीजेपी द्वारा 11 अप्रैल  2019 के किए गए उस ट्वीट पर कमेंट किया है जिसमें अमित शाह ने कहा था, 'हम विश्वास दिलाते हैं कि पूरे देश में एनआरसी को क्रियानवित करेंगे। हम हर एक घुसपैठिया को देश से बाहर करेंगे, सिवाए बुद्धा, हिंदू और सिख को छोड़कर।'

मेमन बोले- हर चीज के लिए मोदी नहीं हैं जिम्मेदार

वारिस पठान की इस टिप्पणी पर एनसीपी के नेता माजिद मेमन ने कहा है, 'मैं वारिस पठान के इस बयान से बिल्कुल सहमत नहीं हूं। अमित शाह महत्वपूर्ण नेता हैं और उन्हें बड़े मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जाएगी इसकी पहले से ही आशा थी। हम आलोचना नहीं कर सकते हैं कि मोदी प्रत्येक और सब कुछ हैं। लेकिन उसी समय जब पीएम मोदी ने फिर से चुने जाने के बाद सबका साथ सबका विकास और संविधान को छूआ तो उसी वक्त देश भर में मुस्लिम विरोधी गतिविधियों की कई घटनाएं हुईं। इसे बंद होना चाहिए और नकवी को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।'





Congratulations India! This person @AmitShah is our new Home Minister! With this move @narendramodi has underlined his commitment towards an inclusive India safe for minorities. Just wow!
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि ये बदमाश उकसाने के लिए कर रहे हैं। मेमन ने कहा, 'अगर मैं अमित शाह के घर पर अल्लाह हु अकबर चिल्लाऊँ तो क्या होगा? '
गौरतलब है कि चुनाव नतीजे घोषित होने के उपरांत ही ये उम्मीद लगाई जा रही थी कि क्या अमित शाह नरेंद्र मोदी कैबिनेट में शामिल होंगे या फिर एक और कार्यकाल के लिए संगठन का जिम्मेदारी अध्यक्ष के रूप में निभाएंगे। लेकिन शपथ ग्रहण के दौरान अमित शाह ने कैबिनेट मंत्री की शपथ ली और उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी ने देश के गृह मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी है। हालांकि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे उस समय भी अमित शाह उनकी कैबिनेट में गृह राज्य मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे थे।
गृह मंत्री बने अमित शाह की जिम्मेदारियाँ 
लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को प्रचंड जीत दिलाने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को मोदी सरकार में बड़ी जम्मेदारी दी गई है। शाह को देश का गृह मंत्री बनाया गया है। पहले उन्हें वित्त मंत्रालय का प्रभार सौंपे जाने की चर्चा थी। दृढ़ व्यक्तित्व वाले अमित शाह की राजनीतिक गलियारे में पहचान एक मेहनती और असंभव को संभव बनाने वाले व्यक्ति की रही है। अब चूंकि सरकार में वह शामिल हो गए हैं और उन्हें अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि उनकी वैचारिक दृढ़ता की झलक उनके कामकाज में भी दिखाई देगी। 
सरकार में गृह मंत्री का पद का दूसरे नंबर का माना जाता है। यानि अमित शाह सरकार में प्रधानमंत्री मोदी के बाद रुतबे वाले दूसरे सबसे ताकतवर मंत्री होंगे और जिनके ऊपर आतंरिक एवं सीमा सुरक्षा की जिम्मेदारी होगी। देश पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी भागों में अलग-अलग तरह की समस्याएं हैं जिनसे शाह को निपटना होगा। शाह के सामने पूर्वोत्तर में अवैध घुसपैठ रोकने, कश्मीर में आतंकवाद और दक्षिण भारत के कुछ प्रदेशों में आतंकवादी गुटों के प्रसार पर काबू पाना होगा। एनआरसी और नक्सलवाद से शाह कैसे निपटते हैं इस पर सभी की नजरें रहेंगी। 
अनुच्छेद 370 एवं 35ए : भाजपा ने अपने एजेंडे में अनुच्छेद 35 ए को खत्म करने और अनुच्छेद 370 पर अपने पुराने रुख पर कायम होने की बात कही है। इन दोनों अनुच्छेदों पर अमित शाह का रुख कश्मीर की राजनीति को नया आयाम देगा। जम्मू-कश्मीर की सियासी पार्टियां नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी एवं अलगाववादी गुट धारा 370 के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ होने पर आंदोलन की धमकी देते आए हैं। अनुच्छेद 35ए का मसला सुप्रीम कोर्ट में है। ऐसे में इन संवेदनशील मुद्दों पर शाह का रुख अहम होगा। 
आतंकवाद : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने एजेंडे में आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस अपनाने की बात कही है। कश्मीर में जारी आतंकवाद पर काबू पाना अमित शाह के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। शाह आतंक और आतंकवाद के प्रति कड़ा रुख रखने के लिए जाने जाते हैं। गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी पहले राजनाथ सिंह के पास थी। समझा जाता है कि शाह अपने पूर्ववर्ती सिंह के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाएंगे। हाल के दिनों में आतंकवादी घटनाओं के तार दक्षिण भारत के केरल एवं तमिलनाडु से जुड़ते दिखे हैं। शाह को इस नई मुसीबत से भी निपटना होगा। 
एनआरसी : अमित शाह के सामने दूसरी बड़ी समस्या नेशनल रिजस्टर ऑफ सिटिजनशिप (एनआरसी) को लागू कराने में आ सकती है। असम सहित पूर्वोत्तर के कई राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। हालांकि पिछली सरकार में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इसे लागू करने में किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एनआरसी का विरोध करने में मुखर रही हैं। इस मुद्दे पर अमित शाह यदि आगे बढ़ते हैं तो ममता सरकार के साथ उनका टकराव बढ़ सकता है। अमित शाह अपने चुनाव प्रचार के दौरान एनआरसी को सख्ती से लागू करने और अवैध बांग्लादेश घुसपैठियों को देश से बाहर करने की बात कह चुके हैं। 
नक्सलवाद : देश में नक्सल समस्या अभी भी भीषण बनी हुई है। छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश सहित कई राज्य अभी भी नक्सल समस्या से ग्रसित हैं। लोकसभा चुनाव के पहले चरण से ठीक पहले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले भाजपा विधायक सहित पांच लोगों की मौत हो गई। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में गत एक मई को नक्सलियों ने 15 जवानों को शहीद कर दिया। नक्सल समस्या गंभीर है। इसे दूर करने के लिए शाह को गंभीर प्रयास करने होंगे।