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हिन्दू आत्माओं की डकैती करने वाली करुणा और सद्भावना की मूर्ति मदर टेरेसा

संत वेलेंटाइन प्रेम के मसीहा थे और मदर टेरेसा करुणा और सेवाभाव की मूर्ती! सभ्यता के विस्तार के साथ विश्वभर में हुए कुछ चुनिन्दा और सबसे बड़े घोटालों में ये 2 घोटाले भी सबसे ज्यादा जिक्र किए जाने लायक हैं। इसके पीछे कारण यह है कि सैंट वेलेंटाइन, जो कि नॉन-बिलीवर्स यानी, जीसस में यकीन ना करने वालों का उपचार करने से मना कर दिया करते थे और मदर टेरेसा, जिन्हें चावल के बोरों का माफिया कहा जाना ज्यादा बेहतर होता, जो ‘प्रेयर्स’ के माध्यम से उपचार करने की चमत्कारी शक्ति के कारण ‘मदर टेरेसा’ बना दीं गईं।

लेकिन क्या प्रार्थनाओं से ठीक कर देने की कहानियों को भी आप उसी भाव से देखते हैं जिस भाव से ‘प्रेयर्स’ के जरिए उपचार करने वालों को? ‘प्रार्थना’ और ‘प्रेयर्स’ में चावल के बैग्स का अंतर सबसे प्रमुख है।
आज लोग करवाचौध, रोजे, होली, दीपावली, और भारतीय संस्कृति पर प्रश्नचिन्ह लगाने का कारण है, भारत में पाश्चात्यता का हावी होना, क्योकि भारत की कमान आजादी के बाद भी कुछ ऐसे हाथों में रही, जिनकी आस्था पाश्चात्य शक्तियों में अपने घर से अधिक रही। यदि ऐसा न होता तो आज सेवाभाव के नाम पर मिशनरी उद्देश्यों को दिशा देने वाली नोबल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा के नाम में ‘ग्लैमर’ देखने वाले लोग 35 साल की उम्र में ही अपनी वकालत छोड़कर समाजसेवा शुरू करने वाले बाबा आम्टे के नाम से भी परिचित होते। बाबा आम्टे का दुर्भाग्य यह था कि वे हिन्दू होने के साथ ही भारतीय थे और उन्होंने कभी भी पीड़ितों के कष्टों को जीसस को दी गई यातनाओं से कम बताने का प्रयास नहीं किया। 
पाश्चात्य संस्कृति ने छद्दम सेकुलरिज्म की तर्ज पर देश को छला 
पाखंडी, कुर्सी के भूखे, जनता के प्रेमभाव के दुश्मन छद्दम धर्म-निरपेक्ष सेकुलरिज्म के नाम देश को छलते रहे हैं, जिस कारण पाश्चात्य सभ्यता भारतीय संस्कृति पर हावी हो गयी। भारतीय अपनी संस्कृति भूल गए, अपने तीज-त्योहारों का उपहास करना शुरू कर दिया। वैलेंटाइन डे को ही लीजिए, बेटी अपने पिता से ही पूछती है "Will you be my valentine?" होली, दीपावली, करवाचौथ आदि त्यौहारों पर उंगलियां उठाना। जबकि हिन्दुओं को नहीं मालूम कि हिन्दुओं का वैलेंटाइन तो बसंत पंचमी से शुरू होकर होली पर्व तक रहता है। सम्मानपूर्वक मनाया जाता है। किसी गैर के साथ वैलेंटाइन नहीं किया जाता, यानि रोमांस किसी से विवाह किसी अन्य से, यह भारतीय संस्कृति का अपमान है।  
गंभीरता से देखा जाए तो हमारे त्यौहार समाज को कोई न कोई सन्देश देते हैं। राखी और भाईदूज की भाई एवं बहन कई दिन पूर्व से प्रतीक्षा करते हैं, करवाचौथ और बढमवास की हर सुहागन प्रतीक्षा करती है, उन आदर्शों पर चलने का प्रयास करते हैं, जबकि पाश्चात्य में ऐसा कुछ नहीं। कभी Brothers' Day, sisters' day, fathers' day, mothers' day आदि मनाते हैं, जबकि भारतीय संस्कृति में तो प्रतिदिन इन दिवसों को मनाने की परम्परा है। अपने से बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना। अब बड़ा कोई भी हो। पहले घर में आया अतिथि अगर बड़ा है, उसके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता था। किन्तु पाश्चात्य संस्कृति ने ऐसा प्रभावित किया कि आज कोई नहीं चाहता की उसके घर कोई आये। विपरीत इसके भारतीय संस्कृति में कहावत है "भाग्यवान के घर मेहमान आते, कम्बख्त के घर राक्षस।  परन्तु पाश्चात्य संस्कृति ने सब गोबर-गणेश कर दिया। दूसरे, पहले घर छोटे होते थे, और दिल बड़े और आज घर बड़े दिल उससे भी कहीं अधिक छोटे।बहु ससुराल की परवाह नहीं करती। बहुत हुआ तो घर के वृद्धों को वृद्ध आश्रम में डलवा दिया। यह सब पाश्चात्य संस्कृति की देन है।            

जिस तरह छद्दम सेकुलरिज्म ने देश के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर मुग़ल आक्रांताओं को महान बताकर उनका गुणगान करवाया, ठीक उसी प्रकार मानवता के नाम पर ईसाई मिशनरी को प्रोत्साहन दिया। जिस मदर टेरेसा को इतना महान बताकर प्रस्तुत किया, राष्ट्र को यह भी तो बताइये कि मानवता के नाम किस तरह गरीब लोगों का धर्मांतरण किया जा रहा है। और जो इसका विरोध करता है उसे फिरकापरस्त करार देकर बदनाम किया जाता है। जिससे लगता है हर धर्मांतरण पर इन छद्दम धर्म-निरपेक्षों को कुछ रोटी के टुकड़े मिलते हैं, ऐसी शंका है,अन्यथा सच्चाई बताने वाले को फिरकापरस्त या शांति का दुश्मन करार नहीं किया जाता। 
मदर टेरेसा में चर्च को मानवता की प्राकृतिक आभा के साथ एक कमजोर बूढ़ी औरत मिली, जो ज्यादातर बूढ़ी महिलाओं को प्रेरित करती है। चर्च ऐसी छवि वाली महिला की एक भव्य कहानी के जरिए अपने प्रयास में सफल रहा। टेरेसा के रूप में एक ऐसी छवि का निर्माण किया गया जो जमीन स्तर पर मौजूद ही नहीं थी, इसे शानदार तरीकों से मानवीय भावनों के साथ खिलवाड़ कर तैयार किया गया।
यदि हम मदर टेरेसा से जुड़ी घटनाओं के आधिकारिक संस्करण पर विश्वास करते हैं, जिन मतों पर समाज के व्यापक वर्ग द्वारा भी विश्वास किया जाता है, तो टेरेसा गरीबों की मसीहा थीं। चर्च द्वारा संत की उपाधि भी उन्हें प्राप्त है, हमें बताया गया है कि उन्होंने अपना पूरा प्रयास दलितों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया है। लेकिन उनके जीवन के बारे में कुछ तथ्य हैं, जो उनकी छवि में सेंध लगाते नजर आते हैं और वर्षों से सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं।
‘टेरेसा शोषित और वंचित वर्ग की हितैषी थीं’ – ऐसी तमाम कहानियों के विपरीत तानाशाहों के साथ भी उनके बहुत अच्छे संबंध थे। अपने जीवन के दौरान, उसने अक्सर क्रूर तानाशाहों का समर्थन किया और इस तरह अपने अत्याचार को वैधता का लिबास देने का प्रयास किया। 1971-86 के बीच पुलिस राज्य के रूप में हैती पर शासन करने वाले दुवैलियर के साथ टेरेसा के अच्छे संबंध थे। 1981 में अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने शासन को ‘गरीबों का दोस्त’ बताया, वही शासन जिसके शासकों ने 1986 के विद्रोह के बाद लाखों डॉलर के लिए हैतियों को लूट लिया था।
इतना ही नहीं, उसने कम्युनिस्ट तानाशाह एनवर होक्सा की कब्र पर माल्यार्पण भी किया, जिसने अपने मूल देश अल्बानिया में हिंसक रूप से धर्म का दमन किया था। अपने घर के करीब, टेरेसा ने आपातकाल के क्रूर दौर का समर्थन किया और कहा था, ‘लोग खुश हैं, ज्यादा रोजगार भी हैं। कोई हड़ताल नहीं है।”
जेसुइट पादरी डोनल्ड जे मग्वायर मदर टेरेसा का आध्यात्मिक सलाहकार था। उसने 11 साल के एक लड़के का यौन शोषण किया – एक बार नहीं, हजारों बार। उसके खिलाफ यौन संबंधों के बारे में जब रिपोर्ट आई थी, तब मदर टेरेसा ने सभी आरोपों को असत्य बताया था। 
एक महत्वपूर्ण घटना, जो टेरेसा की व्यक्तिगत निष्ठा के विपरीत जाती है, वह चार्ल्स केटिंग के साथ उनका संबंध है, जो खुद कैथोलिक हैं, जिन्हें बचत और ऋण घोटाले में शामिल होने के लिए यूएसए में धोखाधड़ी, धमकी और साजिश का दोषी ठहराया गया था। इस अपराधी ने कई ग्राहकों के लिए बेकार के ‘जंक बॉन्ड’ खरीदे। उन्होंने 80 के दशक में टेरेसा को एक बड़ी राशि दान की थी और बदले में टेरेसा ने उसकी सजा की सुनवाई के दौरान क्षमादान की अपील की थी।
अभियोजन पक्ष के वकील पॉल टर्नर इस घटना से बहुत प्रभावित नहीं थे। एक पत्र में, उन्होंने कहा, “किसी भी चर्च को खुद को अपराधी की अंतरात्मा की आवाज के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।” इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दिया कि टेरेसा उन मेहनती लोगों को पैसे लौटाए, जो इस फर्जीवाड़े में ठगे गए थे। लेकिन टर्नर को कभी भी उनके पत्र का जवाब नहीं मिला, न ही कभी पैसा वापस मिला।
गरीबों के प्रति मदर टेरेसा के कथित दान के मिथक में भी कई खामियाँ समय-समय पर सामने आईं। मैरी लाउडन और सुसान शील्ड्स जैसे कई स्वयंसेवक इसका सबसे प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्होंने टेरेसा के क्लीनिक में सुविधाओं की गंभीर कमी के खिलाफ बात की है।
टेरेसा की कहानी वास्तव में बहुत ही पेचीदा है। अपने दौर में उनके ‘इलाज’ के तरीकों में स्पष्ट खामियों के बावजूद एक साधारण शहर में एक साधारण अल्बेनियाई परिवार में पैदा हुई अगनेस गोंझा बोयाजिजू विश्व स्तर पर पूजनीय मसीहा बन गई। उनके मिथक भारतीय समाज के व्यापक वर्गों द्वारा माने भी जाते हैं।
ऐसे ही इंसानियत के कुछ मिशनरी मसीहाओं को देखते हुए स्वामी विवेकानंद का भी स्मरण हो आता है, जिन्होंने कहा था कि दरिद्र नारायण का कोई धर्म नहीं होता और भूखे पेट का धर्म तय कर पाना कठिन है। वास्तव में यह औपनिवेशिक दमन के काल में जी रहे गरीब वर्ग की त्रासदी को स्पष्ट अवश्य करता है लेकिन स्वामी विवेकानंद की इन्हीं बातों पर ध्यान दिया जाए तो उन्होंने भूखे पेट और दरिद्र नारायण की भूख का सौदा चावल और कैथोलिक ईसाइयों के साथ करने की भी वकालत नहीं की थी।
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साभार : यूट्यूब आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शीर्षक देख आप सोंचगे...
सवाल मदर टेरेसा जैसों के समाज सेवा के नाम पर की जाने वाली धाँधलियों का भी नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि यदि इनका उद्देश्य गरीब और शोषितों की मदद करना मात्र था, तो फिर इसके लिए उनकी आस्था का सौदा क्यों किया जाता रहा? इसके अलावा, हमारी मुख्यधारा के मीडिया के पास जवाब देने के लिए बहुत कुछ है। इसने लगातार उत्पीड़ितों की एकमात्र आवाज होने का दावा करते हुए टेरेसा की पीठ थपथपाई है।

मदर टेरेसा की वास्तविकता

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डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत
जेएनयू के कई प्रोफेसर ऐसे हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से भारत में विभिन्न राष्ट्रीयताओं की बात करते हुए कश्मीर पर भारत के अधिकार को भी अनुचित और साम्राज्यवादी माना है। इस प्रकार के विचारों को इस विश्वविद्यालय में प्रो. निवेदिता जब अपने विद्यार्थियों के सामने परोसती हैं तो हमारे विद्यार्थी इस पर तालियां बजाते हैं। इस प्रकार की मान्यता रखने वाले लोगों का या बुद्घिजीवियों का मानना यह भी है कि भारत में विदेशी घुसपैठ की समस्या कुछ भी नही है और हिंदू धर्म विश्व का एक क्रूर धर्म है, जो दूसरे धर्मावलंबियों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं करता और उनके भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाता है । स्पष्ट है कि इस धर्म को मिटा देना ही इनकी दृष्टि में उचित है। अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए इन लोगों ने पूर्वोत्तर भारत का धर्मांतरण कराने में तथा बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ कराके आसाम का जनसांख्यिकीय आंकड़ा बिगाडऩे में देश घातक सहायता की है। जिससे देश के कई भागों में विखण्डनकारी शक्तियां बलवती होती जा रही हैं।
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Image may contain: 1 person, smiling1962 ई. में पंडित नेहरू ने लोकसभा में चिंता प्रकट करते हुए कहा था कि-‘असम क्षेत्र में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से भारी संख्या में मुसलमानों का अवैध प्रवेश देश के लिए घातक है।’ पंडित नेहरू जानते थे कि देश का बंटवारा किस आधार पर हुआ था? और अब यदि फिर बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ को जारी रहने दिया गया तो उसके परिणाम क्या होंगे ? दुर्भाग्य रहा इस देश का कि जैसी चिंता नेहरू जी ने इस बांग्लादेशी अवैध घुसपैठ को लेकर संसद में 1962 में की थी वैसी ही चिंता श्रीमती गांधी भी अपने शासनकाल में करती रहीं, पर उनके ही उत्तराधिकारियों राजीव, सोनिया, राहुल के आते-आते पूर्वोत्तर की समस्या की ओर से कांग्रेस ने पूरी तरह आंखें बंद कर लीं। इसके पीछे सोनिया गांधी का आशीर्वाद होना प्रमुख कारण रहा । कांग्रेस की अध्यक्ष होते हुए और उससे पहले कांग्रेस की नेता होते हुए या नेता की पत्नी होते हुए या नेता की पुत्रवधू होते हुए उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में ईसाईकरण की प्रक्रिया को बढ़ाने में सहायता की । सोनिया के आशीर्वाद से इस कार्य को सबसे अधिक मदर टेरेसा ने संपन्न कराया । मदर टेरेसा भारत के लिए एक विषकन्या थी , लेकिन मूर्खों ने उसे " मदर " की उपाधि से सम्मानित कराया ।आज वहां की अधिकांश हिंदू जनसंख्या का धर्मांतरण करके ईसाईकरण कर दिया गया है। सोनिया ने ईसाईकरण की इस प्रक्रिया को समस्या का एक समाधान माना , अर्थात न् हिंदू रहेगा और न कोई समस्या खड़ी होगी ।जब देश स्वतंत्र हुआ था तो उस समय भारत में एंग्लो इंडियन लोगों की संख्या कुल जनसंख्या के आधा प्रतिशत थी । स्मरण रहे कि एंग्लो इंडियन ईसाई न होकर वह लोग माने जाते थे जो अंग्रेजों की भारतीय रखैल महिलाओं से उत्पन्न संतानें थीं । उनको भारत की संसद में स्थाई रूप से सीट दिलाने के लिए दो एंग्लो इंडियन मनोनीत करने की व्यवस्था अंग्रेज जाते-जाते करा गए । जिससे कि उनकी संतति को बाद में भी किसी प्रकार की कोई असुविधा या कष्ट न हो। स्वतंत्र भारत में ईसाइयों की जनसंख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी। आज यह जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या के 4 - 5% हो गई है । इसमें मदर टेरेसा और सोनिया गांधी का विशेष योगदान रहा । अब कई सीटें ऐसी हो चुकी हैं जहां से ईसाई के अतिरिक्त कोई अन्य धर्मावलंबी चुनकर संसद में आ ही नहीं सकता।
पूर्वोत्तर की लगभग 12 सीटों पर ईसाई समुदाय का नियंत्रण हो चुका है । यही कारण है कि पूर्वोत्तर में अलगाववाद की बातें बार-बार सुनने को मिलती हैं।
ईसाई भारत की 1 / 12 भूमि पर अपना वर्चस्व स्थापित कर चुके हैं । इसमें नागालैंड , अरुणाचल प्रदेश , मिजोरम आदि क्षेत्र सम्मिलित है । जिन्हें वह 'ईसालैंड ' बनाने की तैयारी कर रहे हैं। जिस महिला ने यहां पर अलगाववाद को बढ़ावा देने के लिए ईसाईकरण की प्रक्रिया को तेज किया उसी को भारत ने सोनिया की कृपा से भारत रत्न देकर सम्मानित किया ।
भारत के सभी धर्मनिरपेक्ष दलों ने इस बात की अनदेखी की कि मदर टेरेसा पूर्वोत्तर भारत में किस प्रकार हिंदुओं का धर्मांतरण करा रही हैं ? क्योंकि उन्हें वोटों की चिंता थी , देश की चिंता नहीं थी । इस प्रकार सभी सेकुलर पार्टियों के मौन समर्थन के चलते और सोनिया के आशीर्वाद की छत्रछाया में यह 'विषकन्या ' भारत के मिजोरम की 90% जनता को , नागालैंड की 80% , मेघालय की 72% और पहाड़ी क्षेत्रों की तो लगभग 95% जनता को ईसाई बना गई।
हम उसकी करुणा , दया , उदारता , मानवता के गीत गाते रहे और वह भारत के विभाजन की एक नई इबारत लिख गई।
जो लोग मदर टेरेसा को महान मानते हैं उनसे यह प्रश्न किया जा सकता है कि यदि वह महान थी और मानवतावाद में विश्वास रखती थीं तो उन्होंने उन लोगों की ही सहायता या सेवा करने का संकल्प क्यों लिया जो ईसाई बन जाएंगे या बन रहे थे ,? मानवता तो सभी के लिए समान होती है उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि पहले आपके धर्म में कोई व्यक्ति दीक्षित हो और उसके पश्चात आप उसकी सेवा करें ? स्पष्ट है कि वह लालच से देश के हिंदु धर्म के लोगों को तोड़कर अपनी कार्य सिद्धि करना चाहती थीं। जब मदर टेरेसा तथाकथित रूप से मानवता की सेवा करते हुए देश की राष्ट्रीयता की जड़ पर प्रहार कर रही थी तब हमारे किसी भी सेकुलर नेता की नींद नहीं टूटी , अपितु वह शांत रहकर हिंदूद्रोही और भारत द्रोही होने का अपना प्रमाण देता रहा।
मदर टेरेसा के इन्हीं देशद्रोही कार्यों से प्रेरित होकर 13 जनवरी 1997 को चेन्नई में संपन्न हुई ' मिशन इंडिया - 2000 ' कांफ्रेंस में यह तय किया गया था कि -- " हमारा लक्ष्य होगा भारत के कोने कोने में एक लाख चर्च की स्थापना करना और फिर उन चर्चों के द्वारा हिंदुओं को ईसाइयत में दीक्षित करना। "
हमारे कांग्रेसी बंधुओं को गांधी की अहिंसा में, ईसाईयों की प्रेम-शांति की छलपूर्ण बातों में तथा इस्लाम के भाईचारे में अटूट विश्वास है। इसके लिए वह इन सबकी प्रशंसा भी करते हैं, पर हिंदुत्व की वैदिक संस्कृति के ‘मानवतावाद’ और ‘राष्ट्रवाद’ में तनिक भी विश्वास नही है। कितने दु:ख की बात है कि जिस व्यवस्था से वास्तविक शांति देश और विश्व में आ सकती है उसे ये प्रगतिशीलता में बाधक मानते हैं।
ईसाई पादरी पूर्वोत्तर भारत के ईसाईकरण के लिए राख में दवा मिलाकर रोगियों का उपचार करने का नाटक करते रहे हैं। इस दवा को वह रोगी को प्रभु यीशु का उसके लिए प्रसाद कहकर खिलाते हैं, और उसके ठीक होने पर उसे ‘यीशु का चमत्कार’ बताकर धर्मपरिवर्तन के लिए तैयार करते हैं। इस प्रकार के प्रपंचों से गरीब और अशिक्षित लोग इनके जाल में फंस जाते हैं। 1947 में जैसे ही भारत स्वतंत्र हुआ तो तुरंत इसे फिर से अंग्रेजीयत के रंग में रंगने के प्रयास होने लगे । उन प्रयासों को सिरे चढ़ाने के लिए ही मदर टेरेसा भारत में आई और उन्होंने 1948 में ही भारत की नागरिकता लेकर यहां पर ईसाईकरण की प्रक्रिया को बलवती करना आरंभ किया । तब मध्य प्रदेश सरकार ने तो 1956 में इस प्रकार की गतिविधियों को रोकने के लिए विधिवत एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। जिसे डा. भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में गठित किया गया था। उस ‘नियोगी समिति’ ने आदिवासी क्षेत्रों में जाकर विदेशी पादरियों की गतिविधियों का अध्ययन करने के उपरांत अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट किया था कि ईसाई मिशनरी स्थापित करने का एक ढंग है, विदेशी पादरी किसी गांव को चुनकर वहां आ बैठता है। शनै: शनै: वहां के निवासियों से संपर्क करता है। दु:ख दर्द में काम आता है। उन्हें दवाइयां देता है। कुछ गरीबों को नकद रूपया व मक्की चना आदि खाद्यान्न भी दिया जाता है उधार के रूप में। बाद में कहा जाता है कि यदि वह प्रभु यीशु की शरण में आने को तैयार है तो पूरा ऋण माफ कर दिया जाएगा, तथा कुछ और सुविधाएं भी दी जाएंगी। ईसाई धर्म में दीक्षित करते समय नये कपड़े दिये जाते हैं। उन्हें खेती के लिए मुफ्त खाद-बीज आदि दिये जाते हैं। मुफ्त दवा दी जाती है। इस प्रकार लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है। नियोगी समिति ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि 1950 से 54 तक ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, नार्वे, स्वीडन, स्विटजरलैंड से 29.27 करोड़ रूपया भारत में ईसाईकरण के लिए दिया गया है।
आज कांग्रेस की गलतियों से जहां-जहां ईसाईकरण की प्रक्रिया बलवती हुई है, वहीं-वहीं पृथकतावाद की बातें की जा रही हैं। कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी का इस पृथकतावाद को बढ़ावा देने में योगदान रहा है, क्योंकि उन्होंने कांग्रेस को ईसाई मिशनरियों के कार्यों को कभी राष्ट्र विरोधी नही मानने दिया और ‘नियोगी समिति’ के प्रतिवदेन के आधार पर भारत में ईसाईकरण की प्रक्रिया को बाधित न होने देकर उसे राजीव गांधी के शासनकाल में तो सरकार की ओर से लगभग पूर्णत: संरक्षित करा दिया। यद्यपि कई ईसाई विद्वानों ने बाहरी ईसाई मिशनरियों के भारत में अवैध कार्यों की और राष्ट्रद्रोही आचरण की निंदा करते हुए उसे देश के हितों के प्रतिकूल बताने में भी संकोच नही किया है, पर सोनिया ने या उनके पति राजीव गांधी ने इस ओर ध्यान नही दिया। कई दूरदर्शी व राष्ट्रवादी ईसाई पादरियों ने बदली हुई परिस्थितियों में ईसाई समाज को भारत की सांस्कृतिक मूलधारा में समाहित करने के लिए गिरजाघरों आदि के भारतीयकरण का सुझाव दिया है। केरल के प्रसिद्घ ईसाई पत्रकार श्री के.जे. जोसेफ ने कहा था-‘‘अब समय आ गया है कि स्वतंत्र भारत में ईसाई अपने अल्पसंख्यक चरित्र को छोडक़र भारत की मूलधारा के साथ एकात्म होकर इस देश में समरसता स्थापित करें।’’ बंगलौर के युक्यूमेक्सियम क्रिश्चियन सेंटर के डायरेक्टर एम.ए. टामस ने भी लिखा है-‘‘यह खेद की बात है कि दूसरे देश की संस्कृति का भारत में अभी तक आयात किया जा रहा है। मेरा स्पष्ट मत है कि अब विदेशी पादरियों की इस देश में आवश्यकता नही है। उनकी जगह भारतीय पादरी ही सच्चे अर्थों में ईसा की सेवा के आदर्शों को क्रियान्वित कर सकते हैं।’’
26 जनवरी 1980 को मदर टेरेसा को भारत रत्न मिला था । इसे लेकर कुछ लोगों को यह शंका हो सकती है कि उस समय तो सोनिया गांधी का राजनीतिक हस्तक्षेप कुछ भी नहीं था , परंतु सच यह है कि मेनका गांधी से इंदिरा गांधी के संबंध खराब होने के कारण वह अपनी दूसरी पुत्रवधू अर्थात सोनिया के अधिक निकट थीं । जिसका अनुचित लाभ सोनिया ने उठाते हुए मदर टेरेसा को उस समय पर्दे के पीछे रहकर भारत रत्न दिलवाया था।
आज हमें कई स्थानों पर अपने देशभक्त राष्ट्रवादी क्रांतिकारी नेताओं के साथ जब मदर टेरेसा का चित्र लगा दिखाई देता है तो बड़ा कष्ट होता है राष्ट्रवादियों को चाहिए कि इस हिंदूद्रोही और भारतद्रोही भारत रत्न के चित्रों को अपने घरों से या सार्वजनिक स्थानों से हटा दें।