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हिन्दू आत्माओं की डकैती करने वाली करुणा और सद्भावना की मूर्ति मदर टेरेसा

संत वेलेंटाइन प्रेम के मसीहा थे और मदर टेरेसा करुणा और सेवाभाव की मूर्ती! सभ्यता के विस्तार के साथ विश्वभर में हुए कुछ चुनिन्दा और सबसे बड़े घोटालों में ये 2 घोटाले भी सबसे ज्यादा जिक्र किए जाने लायक हैं। इसके पीछे कारण यह है कि सैंट वेलेंटाइन, जो कि नॉन-बिलीवर्स यानी, जीसस में यकीन ना करने वालों का उपचार करने से मना कर दिया करते थे और मदर टेरेसा, जिन्हें चावल के बोरों का माफिया कहा जाना ज्यादा बेहतर होता, जो ‘प्रेयर्स’ के माध्यम से उपचार करने की चमत्कारी शक्ति के कारण ‘मदर टेरेसा’ बना दीं गईं।

लेकिन क्या प्रार्थनाओं से ठीक कर देने की कहानियों को भी आप उसी भाव से देखते हैं जिस भाव से ‘प्रेयर्स’ के जरिए उपचार करने वालों को? ‘प्रार्थना’ और ‘प्रेयर्स’ में चावल के बैग्स का अंतर सबसे प्रमुख है।
आज लोग करवाचौध, रोजे, होली, दीपावली, और भारतीय संस्कृति पर प्रश्नचिन्ह लगाने का कारण है, भारत में पाश्चात्यता का हावी होना, क्योकि भारत की कमान आजादी के बाद भी कुछ ऐसे हाथों में रही, जिनकी आस्था पाश्चात्य शक्तियों में अपने घर से अधिक रही। यदि ऐसा न होता तो आज सेवाभाव के नाम पर मिशनरी उद्देश्यों को दिशा देने वाली नोबल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा के नाम में ‘ग्लैमर’ देखने वाले लोग 35 साल की उम्र में ही अपनी वकालत छोड़कर समाजसेवा शुरू करने वाले बाबा आम्टे के नाम से भी परिचित होते। बाबा आम्टे का दुर्भाग्य यह था कि वे हिन्दू होने के साथ ही भारतीय थे और उन्होंने कभी भी पीड़ितों के कष्टों को जीसस को दी गई यातनाओं से कम बताने का प्रयास नहीं किया। 
पाश्चात्य संस्कृति ने छद्दम सेकुलरिज्म की तर्ज पर देश को छला 
पाखंडी, कुर्सी के भूखे, जनता के प्रेमभाव के दुश्मन छद्दम धर्म-निरपेक्ष सेकुलरिज्म के नाम देश को छलते रहे हैं, जिस कारण पाश्चात्य सभ्यता भारतीय संस्कृति पर हावी हो गयी। भारतीय अपनी संस्कृति भूल गए, अपने तीज-त्योहारों का उपहास करना शुरू कर दिया। वैलेंटाइन डे को ही लीजिए, बेटी अपने पिता से ही पूछती है "Will you be my valentine?" होली, दीपावली, करवाचौथ आदि त्यौहारों पर उंगलियां उठाना। जबकि हिन्दुओं को नहीं मालूम कि हिन्दुओं का वैलेंटाइन तो बसंत पंचमी से शुरू होकर होली पर्व तक रहता है। सम्मानपूर्वक मनाया जाता है। किसी गैर के साथ वैलेंटाइन नहीं किया जाता, यानि रोमांस किसी से विवाह किसी अन्य से, यह भारतीय संस्कृति का अपमान है।  
गंभीरता से देखा जाए तो हमारे त्यौहार समाज को कोई न कोई सन्देश देते हैं। राखी और भाईदूज की भाई एवं बहन कई दिन पूर्व से प्रतीक्षा करते हैं, करवाचौथ और बढमवास की हर सुहागन प्रतीक्षा करती है, उन आदर्शों पर चलने का प्रयास करते हैं, जबकि पाश्चात्य में ऐसा कुछ नहीं। कभी Brothers' Day, sisters' day, fathers' day, mothers' day आदि मनाते हैं, जबकि भारतीय संस्कृति में तो प्रतिदिन इन दिवसों को मनाने की परम्परा है। अपने से बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना। अब बड़ा कोई भी हो। पहले घर में आया अतिथि अगर बड़ा है, उसके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता था। किन्तु पाश्चात्य संस्कृति ने ऐसा प्रभावित किया कि आज कोई नहीं चाहता की उसके घर कोई आये। विपरीत इसके भारतीय संस्कृति में कहावत है "भाग्यवान के घर मेहमान आते, कम्बख्त के घर राक्षस।  परन्तु पाश्चात्य संस्कृति ने सब गोबर-गणेश कर दिया। दूसरे, पहले घर छोटे होते थे, और दिल बड़े और आज घर बड़े दिल उससे भी कहीं अधिक छोटे।बहु ससुराल की परवाह नहीं करती। बहुत हुआ तो घर के वृद्धों को वृद्ध आश्रम में डलवा दिया। यह सब पाश्चात्य संस्कृति की देन है।            

जिस तरह छद्दम सेकुलरिज्म ने देश के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर मुग़ल आक्रांताओं को महान बताकर उनका गुणगान करवाया, ठीक उसी प्रकार मानवता के नाम पर ईसाई मिशनरी को प्रोत्साहन दिया। जिस मदर टेरेसा को इतना महान बताकर प्रस्तुत किया, राष्ट्र को यह भी तो बताइये कि मानवता के नाम किस तरह गरीब लोगों का धर्मांतरण किया जा रहा है। और जो इसका विरोध करता है उसे फिरकापरस्त करार देकर बदनाम किया जाता है। जिससे लगता है हर धर्मांतरण पर इन छद्दम धर्म-निरपेक्षों को कुछ रोटी के टुकड़े मिलते हैं, ऐसी शंका है,अन्यथा सच्चाई बताने वाले को फिरकापरस्त या शांति का दुश्मन करार नहीं किया जाता। 
मदर टेरेसा में चर्च को मानवता की प्राकृतिक आभा के साथ एक कमजोर बूढ़ी औरत मिली, जो ज्यादातर बूढ़ी महिलाओं को प्रेरित करती है। चर्च ऐसी छवि वाली महिला की एक भव्य कहानी के जरिए अपने प्रयास में सफल रहा। टेरेसा के रूप में एक ऐसी छवि का निर्माण किया गया जो जमीन स्तर पर मौजूद ही नहीं थी, इसे शानदार तरीकों से मानवीय भावनों के साथ खिलवाड़ कर तैयार किया गया।
यदि हम मदर टेरेसा से जुड़ी घटनाओं के आधिकारिक संस्करण पर विश्वास करते हैं, जिन मतों पर समाज के व्यापक वर्ग द्वारा भी विश्वास किया जाता है, तो टेरेसा गरीबों की मसीहा थीं। चर्च द्वारा संत की उपाधि भी उन्हें प्राप्त है, हमें बताया गया है कि उन्होंने अपना पूरा प्रयास दलितों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया है। लेकिन उनके जीवन के बारे में कुछ तथ्य हैं, जो उनकी छवि में सेंध लगाते नजर आते हैं और वर्षों से सावधानीपूर्वक तैयार किए गए हैं।
‘टेरेसा शोषित और वंचित वर्ग की हितैषी थीं’ – ऐसी तमाम कहानियों के विपरीत तानाशाहों के साथ भी उनके बहुत अच्छे संबंध थे। अपने जीवन के दौरान, उसने अक्सर क्रूर तानाशाहों का समर्थन किया और इस तरह अपने अत्याचार को वैधता का लिबास देने का प्रयास किया। 1971-86 के बीच पुलिस राज्य के रूप में हैती पर शासन करने वाले दुवैलियर के साथ टेरेसा के अच्छे संबंध थे। 1981 में अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने शासन को ‘गरीबों का दोस्त’ बताया, वही शासन जिसके शासकों ने 1986 के विद्रोह के बाद लाखों डॉलर के लिए हैतियों को लूट लिया था।
इतना ही नहीं, उसने कम्युनिस्ट तानाशाह एनवर होक्सा की कब्र पर माल्यार्पण भी किया, जिसने अपने मूल देश अल्बानिया में हिंसक रूप से धर्म का दमन किया था। अपने घर के करीब, टेरेसा ने आपातकाल के क्रूर दौर का समर्थन किया और कहा था, ‘लोग खुश हैं, ज्यादा रोजगार भी हैं। कोई हड़ताल नहीं है।”
जेसुइट पादरी डोनल्ड जे मग्वायर मदर टेरेसा का आध्यात्मिक सलाहकार था। उसने 11 साल के एक लड़के का यौन शोषण किया – एक बार नहीं, हजारों बार। उसके खिलाफ यौन संबंधों के बारे में जब रिपोर्ट आई थी, तब मदर टेरेसा ने सभी आरोपों को असत्य बताया था। 
एक महत्वपूर्ण घटना, जो टेरेसा की व्यक्तिगत निष्ठा के विपरीत जाती है, वह चार्ल्स केटिंग के साथ उनका संबंध है, जो खुद कैथोलिक हैं, जिन्हें बचत और ऋण घोटाले में शामिल होने के लिए यूएसए में धोखाधड़ी, धमकी और साजिश का दोषी ठहराया गया था। इस अपराधी ने कई ग्राहकों के लिए बेकार के ‘जंक बॉन्ड’ खरीदे। उन्होंने 80 के दशक में टेरेसा को एक बड़ी राशि दान की थी और बदले में टेरेसा ने उसकी सजा की सुनवाई के दौरान क्षमादान की अपील की थी।
अभियोजन पक्ष के वकील पॉल टर्नर इस घटना से बहुत प्रभावित नहीं थे। एक पत्र में, उन्होंने कहा, “किसी भी चर्च को खुद को अपराधी की अंतरात्मा की आवाज के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।” इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दिया कि टेरेसा उन मेहनती लोगों को पैसे लौटाए, जो इस फर्जीवाड़े में ठगे गए थे। लेकिन टर्नर को कभी भी उनके पत्र का जवाब नहीं मिला, न ही कभी पैसा वापस मिला।
गरीबों के प्रति मदर टेरेसा के कथित दान के मिथक में भी कई खामियाँ समय-समय पर सामने आईं। मैरी लाउडन और सुसान शील्ड्स जैसे कई स्वयंसेवक इसका सबसे प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्होंने टेरेसा के क्लीनिक में सुविधाओं की गंभीर कमी के खिलाफ बात की है।
टेरेसा की कहानी वास्तव में बहुत ही पेचीदा है। अपने दौर में उनके ‘इलाज’ के तरीकों में स्पष्ट खामियों के बावजूद एक साधारण शहर में एक साधारण अल्बेनियाई परिवार में पैदा हुई अगनेस गोंझा बोयाजिजू विश्व स्तर पर पूजनीय मसीहा बन गई। उनके मिथक भारतीय समाज के व्यापक वर्गों द्वारा माने भी जाते हैं।
ऐसे ही इंसानियत के कुछ मिशनरी मसीहाओं को देखते हुए स्वामी विवेकानंद का भी स्मरण हो आता है, जिन्होंने कहा था कि दरिद्र नारायण का कोई धर्म नहीं होता और भूखे पेट का धर्म तय कर पाना कठिन है। वास्तव में यह औपनिवेशिक दमन के काल में जी रहे गरीब वर्ग की त्रासदी को स्पष्ट अवश्य करता है लेकिन स्वामी विवेकानंद की इन्हीं बातों पर ध्यान दिया जाए तो उन्होंने भूखे पेट और दरिद्र नारायण की भूख का सौदा चावल और कैथोलिक ईसाइयों के साथ करने की भी वकालत नहीं की थी।
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साभार : यूट्यूब आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शीर्षक देख आप सोंचगे...
सवाल मदर टेरेसा जैसों के समाज सेवा के नाम पर की जाने वाली धाँधलियों का भी नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि यदि इनका उद्देश्य गरीब और शोषितों की मदद करना मात्र था, तो फिर इसके लिए उनकी आस्था का सौदा क्यों किया जाता रहा? इसके अलावा, हमारी मुख्यधारा के मीडिया के पास जवाब देने के लिए बहुत कुछ है। इसने लगातार उत्पीड़ितों की एकमात्र आवाज होने का दावा करते हुए टेरेसा की पीठ थपथपाई है।