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मथुरा और ताजमहल के साथ ही इन 10 जगहों को लेकर भी फंसा है पेंच

 

अभिनय आकाश, उगता भारत 

अयोध्या में बीजेपी के मीडिया प्रभारी ने ताजमहल के 22 कमरों को खोलने को लेकर कोर्ट में याचिका दी है। वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में कुतुब मीनार परिसर में पूजा-पाठ को लेकर हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन भी किया। कुतुबमीनार नहीं विष्णु स्तंभ, शाही ईदगाह की जगह श्रीकृष्ण जन्मभूमि, ताजमहल या तेजो महल देश में इन दिनों मंदिर-मस्जिद को लेकर घमासान मचा है।

देश में एक तरफ अजान और हनुमान चालीसा पर घमासाल है। दूसरी तरफ काशी-मथुरा का नारा बुलंद हो रहा है। इस सब के बीच देश के तीन शहरों में माहौल गर्म है। ज्ञानवापी के साथ-साथ अब ताजमहल और कुतुबमीनार पर भी किचकिच शुरू हो गई है। अयोध्या में बीजेपी के मीडिया प्रभारी ने ताजमहल के 22 कमरों को खोलने को लेकर कोर्ट में याचिका दी है। वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में कुतुबमीनार परिसर में पूजा-पाठ को लेकर हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन भी किया। कुतुबमीनार नहीं विष्णु स्तंभ, शाही ईदगाह की जगह श्रीकृष्ण जन्मभूमि, ताजमहल या तेजो महल देश में इन दिनों मंदिर-मस्जिद को लेकर घमासान मचा है। वैसे आपको बता दें कि भारत में मंदिर और मस्जिद से जुड़ा विवाद कोई नया नहीं है। इमें सबसे ज्यादा चर्चा राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर हुई। लेकिन देश में ऐसे कई विवादित स्थल हैं जिसको लेकर दोनों पक्षों में अलग-अलग राय है। ऐसे में आइए आपको देश के सबसे बड़े मंदिर-मस्जिद विवादों की कहानी बताते हैं। बताते हैं कि कौन से 10 चर्चित मंदर और मस्जिद से जुड़े विवाद हैं, इनकी वजह क्या है और इसका पूरा इतिहास क्या है। 

खत्म हुआ राम लला का वनवास
साल 2019 और 9 नवंबर को भक्तों की आस पर कार्तिक के मास में आखिरकार रामलला का खत्म हुआ था वनवास। सुप्रीम कोर्ट के रामलला के नाम जमीन के हक पर हस्ताक्षर के साथ ही ये तय हो गया था कि अयोध्या में भगवान राम का भव्य और दिव्य मंदिर बनेगा। लेकिन 5 अगस्त 2020 को क्या हिन्दू क्या मुसलमान सभी अपने भगवान अपने इमामे हिन्द के अद्भूत मंदिर के नींव रखे जाने के साक्षी बने। अयोध्या का जिक्र होता है तो साथ ही जिक्र राम मंदिर आंदोलन का भी होता है। जब कारसेवकों ने विवादित ढांचे को 1992 में ढाह दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश का सबसे चर्चित विवाद अब सुलझ चुका है। 

विष्णु स्तंभ- कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद
 राजधानी दिल्ली स्थित कुतुबमीनार परिसर में कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद के ढांचे में लगी मूर्तियों को लेकर एक बार फिर से विवाद गहरा गया है। हिंदू संगठनों नाम बदलने की मांग को लेकर कुतुबमीनार के ठीक सामने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान जय श्रीराम के नारे वहां पर लगाए जा रहे हैं। लोगों की मांग है कि कुतुबमीनार का नाम बदलकर विष्णु स्तंभ कर दिया जाए। विवाद इस बात पर भी है कि कुतुबमीनार के अंदर जगह-जगह देवी-देवताओं की मूर्ति का अवशेष देखने को मिलता है। आरोप है कि मस्जिद परिसर में भगवान की मूर्तियों को जमीन पर रखकर अपमानित किया जा रहा है। कुतुबमीनार परिसर में उल्टी गणेश प्रतिमा पर भी विवाद हो रहा है। संगठनों का कहना है कि मस्जिद में लगी उल्टी मूर्तियों से हिंदू धर्म के लोगों की भावनाओं को काफी ठेस पहुंच रही है इसलिए इन्हें वहां से हटाया जाना चाहिए। कुतुबमीनार की मौजूदा कॉम्पलेक्स, दीवारों, खंभों पर देवी-देवताओं के चित्र और  धार्मिक चिन्ह बने हुए हैं। इनमें भगवान गणेश, विष्णु, यक्ष-यक्षिणी, महावीर और नटराज की आकृतियां भी नजर आएंगी। इसके अलावा यहां भगवान गणेश की एक मूर्ति को लोहे की ग्रिल में कैद करके रखा गया है। कहा जाता है कि ये मूर्ति मंदिर के विध्वंस के बाद बनाई गई मस्जिद की दीवार में लगा दी गई। दावा किया जाता है कि ये मूर्तियां राजा अनंगपाल तोमर के बनाए 27 जैन और हिंदू मंदिरों को तोड़कर लाई गई थीं। कुतुब परिसर के खंभे पर आधे गोल आकार में सूर्य देव की मूर्ति उकेरी गई है। दावा है कि इस्लाम में बुत परस्ती हराम है तो कोई भी इस्लामी शासक ऐसी आकृतियां नहीं बनवाएगा। इसके अलावा कुतुबमीनार परिसर में मंगल कशल, शंख, गदा और पवित्र कमल के चिन्ह भी नजर आ जाएंगे। मस्जिद की शिलालेख पर दावा और कुतुबमीनार परिसर में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां वो प्रमुख वजह है जो हिन्दू संगठनों को यहां पूजा-पाठ की मांग के लिए प्रेरित करती है और कुतुबमीनार के इस विवाद को ऐसे वक्त में हवा दी जा रही है जब आगरा में ताजमहल और काशी में ज्ञानवापी का विवाद पहले से ही चल रहा है। 
ताजमहल-तेजो महल
विश्व के सात अजूबों में से एक ताजमहल पर विवाद कोई नया नहीं है। मुगलों की ओर से देश में शासन के दौरान हिंदू धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने को पूरे विवाद का आधार माना जा रहा है। इस मामले में इतिहासविदों की राय अलग है। लेकिन इस विवाद में नया मोड़ तब आया जब ताजमहल के बंद 22 कमरों का राज बाहर लाने की मांग को लेकर ईलाहबाद हाईकोर्ट में अर्जी दी गई है। दावा किया गया है कि ताजमहल मकबरा नहीं महादेव का मंदिर है। ताजमहल को लेकर बीजेपी नेता की तरफ से दायर याचिका दावा करती है कि अंग्रेजों के जमाने से बंद इन कमरों में हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां, प्राचीन शिवलिंग और शिलालेख मौजूद हो सकते हैं। कोर्ट में दायर इस याचिका में ये भी कहा गया है कि आगरा में जिस जगह अभी ताजमहल है, वहां साल 1212 में राजा परमर्दिदेव ने भगवान शिव का मंदिर बनवाया था, जिसे तेजोमहालय या तेजोमहल का नाम दिया गया था लेकिन शाहजहां ने तेजो महालय को तुड़वाकर इसे मकबरा बना दिया। 
काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद
 काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद परिसर स्थित श्रृंगार गौरी सहित अन्य विग्रहों में दर्शन पूजन और सुरक्षा की मांग को लेकर इन दिनों विवाद गर्माया हुआ है। वाराणसी के कोर्ट में ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ परिसर में श्रृंगार गौरी मंदिर और दूसरे देवी-देवताओं के मंदिरों की स्थिति को लेकर सर्वे करने का निर्देश दिया गया। देवताओं की मूर्ति जिस स्थान पर स्थित है उसे साल भर में एक बार पूजा के लिए खोला जाता है। कोर्ट में पांच महिलाओं ने एक याचिका दायर करके कोर्ट से ऋंगार गौरी मंदिर में रोज पूजा करने की अनुमति दिए जाने की अपील की थी। कहा जाता है कि 11वीं सदी के अंत में विश्वनाथ मंदिर को मोहम्मद गोरी ने लूटा और तुड़वाया था। गोरी के विध्वंस के बाद मंदिर को दोबारा बनवाया गया और 1211 में ये काम गुजरात के एक व्यापारी द्वरा करवाया गया। लेकिन सन 1447 में जौनपुर के सुल्तान द्वारा तोड़वा दिया गया। फिर राजा मान सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निमाण शुरु किया। लेकिन उन्हें ये काम बीच में रोकना पड़ा। 1585 में राजा टोडरमल ने  मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। राजा टोडरमल ने इसकी जिम्मेदारी पंडित नारायण भट्ट को सौंपी। भव्य मंदिर बनवाया गया। 18 अप्रैल को औरंगजेब ने पूरे देश में फैले अपने सभी सूबेदारों को खास फरमान जारी किया। सभी सूबेदार अपनी इच्छा से हिन्दुओं के सभी मंदिरों और पाठशालाओं को गिरा दें। मूर्ति पूजा को पूरी तरह से बंद करवा दें। इस आदेश के बाद 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को खबर दी गई कि काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर को गिरा दिया गया है। विवादित स्थल के भूतल में तहखाना और मस्जिद के गुम्बद के पीछे प्राचीन मंदिर की दीवार का दावा किया जाता है। ज्ञानवापी मस्जिद के बाहर विशालकाय नंदी हैं, जिसका मुख मस्जिद की ओर है। इसके अलावा मस्जिद की दीवारों पर नक्काशियों से देवी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं। स्कंद पुराण में भी इन बातों का वर्णन है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि- शाही ईदगाह
मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद पर कोर्ट ने 19 मई तक फैसला सुरक्षित रख लिया है। लखनऊ की रहने वाली रंजना अग्निहोत्री ने श्री कृष्ण जन्मभूमि की 13.37 एकड़ भूमि के स्वामित्व की मांग को लेकर वाद दायर किया है। इसमें श्री कृष्ण जन्मभूमि में बनी शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की भी मांग की गई है। शाही ईदगाह मस्जिद मथुरा शहर में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर से सटी हुई है। इस स्थल को हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण की जन्मस्थली माना जाता है। जहां भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, वहां पहले वह कारागार हुआ करता थाकहा जाता है कि मुगल शासन औरंगजेब ने 1669 में श्रीकृष्ण मंदिर की भव्यता से चिढ़कर उसे तुड़वा दिया था और इसके एक हिस्से में ईदगाह का निर्माण कराया गया था। इसी ईदगाह को हटाने के लिए कोर्ट में वकील विष्णु जैन और रंजना अग्निहोत्री ने कोर्ट में केस दाखिल किया है।

भोजशाला मंदिर- कमल मौला मस्जिद
मध्‍य प्रदेश के धार जिले में भोजशाला-कमल मौला मस्जिद का विवाद भी काफी पुराना है। वर्तमान समय में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया(एएसआई) इस विवादित जगह की देखरेख करता है। हिंदू पक्ष की तरफ से इसे माता सरस्वती का प्राचीन मंदिर भोजशाला बताया जाता है। जबकि मुस्लिम इसे अपनी इबादतगाह यानी मस्जिद बताते हैं। इसके हक को लेकर दोनों पक्ष कोर्ट में केस लड़ रहे हैं। साल  2013 में बसंत पंचमी के दिन यहां काफी तनाव हुआ था। इस दौरान हुई हिंसा के बाद पुलिस को हवाई फायरिंग करनी पड़ी थी क्‍योंकि हिंदुओं ने जगह छोड़ने से इनकार कर दिया था। इस मंदिर को लेकर दावा किया जाता है कि राजा भोज देवी सरस्वती के उपासक थे। उन्होंने धार में 1034 ईस्वी में भोजशाला के रूप में एक भव्य पाठशाला बनवाकर उनकी प्रतिमा स्थापित की। इतहासकार बातते हैं कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को ध्वस्त कर दिया। बाद में दिलावर खान गौरी ने 1401 ईस्वी में भोजशाला के एक भाग में मस्जिद बनवा दी। 1514 में महमूद शाह खिलजी ने शेष भाग पर भी मस्जिद बनवा दी। ब्रिटिश शासन के वक्त से ही यहां विवाद की स्थिति बनी जो आज तक कायम है। 
चर्चिका देवी मंदिर- बीजा मंडल मस्जिद
मध्यप्रदेश राज्य के विदिशा जिले का एक प्रमुख स्थान है जिसे बीजा मंडल के नाम से जाना जाता है। इतिहारकारों की माने तो बीजा मंडल के नाम से ही विदिशा शहर का नाम भेलसा पड़ा था। इसी भेलसा के अंदर बीजा मंडल नाम की इमारत हैं। जिस पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही अपना दावा करते हैं।  विजय मंदिर सौ गज ऊंचा था और यह तीन सौ मील दूर से दिखाई देता था। इस मंदिर को चर्चिका देवी का मंदिर भी कहा जाता है। इन मंदिरों की स्थापना 10 से 11वीं शताब्दी में हुई है और इनका निर्माण परमार राजाओं द्वारा कराया गया था। जब इस इमारत को लेकर विवाद होने लगा तो इसे जिला प्रशासन ने इसे आर्कियोलॉजी विभाग को सौंप दिया, जिसके बाद इसका नाम बदलकर बीजा मंडल रख दिया गया है। माना जाता है कि 1233-34 में औरंगजेब ने इस बीजा मंडल पर तोपों से हमला करके मंडल को तहस-नहस करा दिया था। औरंगजेब के काल में इस बीजा मंडल की जगह एक विशाल मस्जिद का निर्माण कराया गया था। 

भद्रकाली- जामा मस्जिद
ये कहानी कर्णावती शहर से जुड़ी है जिसे आज अहमदाबाद के नाम से जाना जाता है। गुजरात का ये गौरवशाली नगर अलग-अलग युग में अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा। कभी भद्रा, कभी कर्णावती, कभी राजनगर तो कभी असावल। 9वीं से 14वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में मालवा-राजस्थान के शूरवीर परमार राजाओं का राज था। 14वीं शताब्दी के बाद मुसलिम अक्रांताओं के आक्रमण का दौर शुरू हुआ। कहा जाता है कि इस दौरान कर्णावती के विराट भद्रकाली माता के मंदिर के शिखर को तोड़ दिया गया और उसकी जगह मस्जिद का निर्माण करवाया गया। अहमदाबाद में अभी जो जामा मस्जिद है, उसे अहमद शाह प्रथम ने 1424 में बनवाया था। इस मस्जिद के ज्यादातर खंभे हिन्दू मंदिरों के स्टाइल में  बने हैं। इसके कई खंभों पर कमल के फूल, हाथी, कुंडलित नाग, नर्तकियों, घंटियों आदि की नक्काशी की गई है, जो अक्सर हिंदू मंदिरों में नजर आते हैं। 
अटाला मस्जिद
उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में स्थित अटाला मस्जिद भी विवादों से घिरी रही है। कहा जाता है कि इस मस्जिद का निर्माण 1408 में इब्राहिम शरीकी ने कराया था। लेकिन इसको लेकर दावा है कि इससे भी पहले यहां एक सुंदर नगर था, जिसे कन्नौज के राजा विजयचंद्र ने बसाया था, उन्होंने ही इस अटला देवी मंदिर का भी निर्माण करवाया था, लेकिन इब्राहिम के बर्बरता के चलते यह मंदिर धराशाही हो गया था।
आदीनाथ मंदिर- अदीना मस्जिद
दीना मस्जिद ​पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्थित है। भारत की विशालतम मस्जिदों में से एक यह मस्जिद 1396 ई. में सुल्तान सिकंदर शाह द्वारा डेल्ही सल्तनत के खिलाफ शानदार जीत की खुशी में बनवाई गई थी। माना जाता है कि उसने भगवान शिव के प्राचीन आदिनाथ मंदिर को नष्ट करके उसकी जगह अदीना मस्जिद बनवाई थी। अदीना मस्जिद के कई हिस्सों में हिंदू मंदिरों के स्टाइल की डिजाइन नजर आती हैं।
रुद्र महालय मंदिर- जामी मस्जिद
रुद्र महालय गुजरात गुजरात के राज्य के पाटन जिले के सिद्धपुर गांव में स्थित है। रुद्र महालय प्राचिन गुजरात के भव्य हिन्दू मंदिरो मे से एक था। जिसका विध्वंस किया गया। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, रुद्र महालय मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में गुजरात के शासक सिद्धराज जयसिंह ने कराया था। रुद्र महालय भगवान शिव के एक और स्वरूप रुद्र स्वरूप को अर्पित है। रुद्र महालय की भव्यता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है की सुल्तान अहमद शाह के इतिहासकारों ने इस मंदिर की मूर्तियों की तुलना चीन की मूर्तियों से की है। 1410-1444 के बीच अलाउद्दीन खिलजी ने इस मंदिर के परिसर को नष्ट कर दिया था। अहमदशाह ने वहां पर एक मस्जिद भी बना डाली जो अब जामी मस्जिद के नाम से जानी जाती है।(साभार)

‘कोई औरंगजेब यहाँ आता है तो शिवाजी भी उठ खड़े होते हैं’: काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आक्रांताओं के अत्याचार को किया याद

                                           वाराणसी में गंगा में स्नान कर जल अर्पण करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम मंदिर कॉरिडोर के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहाँ मौजूद साधु-संतों, नेताओं और आम जनता को सम्बोधित करते हुए कहा कि वो हमारे कारीगर, हमारे सिविल इंजीनयरिंग से जुड़े लोग, प्रशासन के लोग, वो परिवार जिनके यहाँ घर थे सभी का मैं अभिनंदन करते हैं। उन्होंने इन सबके साथ यूपी सरकार के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी अभिनंदन करते हुए कहा कि उन्होंने काशी विश्वनाथ धाम परियोजना को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दिया।

उन्होंने याद दिलाया कि कैसे आततायियों ने इस नगरी पर आक्रमण किए, इसे ध्वस्त करने के प्रयास किए! औरंगजेब के अत्याचार, उसके आतंक का इतिहास साक्षी है। उन्होंने कहा कि जिसने सभ्यता को तलवार के बल पर बदलने की कोशिश की, जिसने संस्कृति को कट्टरता से कुचलने की कोशिश की! लेकिन इस देश की मिट्टी बाकी दुनिया से कुछ अलग है। बकौल पीएम मोदी, यहाँ अगर औरंगजेब आता है तो शिवाजी भी उठ खड़े होते हैं! अगर कोई सालार मसूद इधर बढ़ता है तो राजा सुहेलदेव जैसे वीर योद्धा उसे हमारी एकता की ताकत का अहसास करा देते हैं। और अंग्रेजों के दौर में भी, हेस्टिंग का क्या हश्र काशी के लोगों ने किया था, ये तो काशी के लोग जानते ही हैं।

उन्होंने कहा, “काशी शब्दों का विषय नहीं है, संवेदनाओं की सृष्टि है। काशी वो है- जहाँ जागृति ही जीवन है! काशी वो है- जहाँ मृत्यु भी मंगल है! काशी वो है- जहां सत्य ही संस्कार है! काशी वो है- जहाँ प्रेम ही परंपरा है।बनारस वो नगर है जहाँ से जगद्गुरु शंकराचार्य को श्रीडोम राजा की पवित्रता से प्रेरणा मिली, उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बांधने का संकल्प लिया। ये वो जगह है जहाँ भगवान शंकर की प्रेरणा से गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस जैसी अलौकिक रचना की।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “यहीं की धरती सारनाथ में भगवान बुद्ध का बोध संसार के लिए प्रकट हुआ। समाजसुधार के लिए कबीरदास जैसे मनीषी यहाँ प्रकट हुए। समाज को जोड़ने की जरूरत थी तो संत रैदास जी की भक्ति की शक्ति का केंद्र भी ये काशी बनी। काशी अहिंसा, तप की प्रतिमूर्ति चार जैन तीर्थंकरों की धरती है। राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा से लेकर वल्लभाचार्य, रामानंद जी के ज्ञान तक चैतन्य महाप्रभु, समर्थगुरु रामदास से लेकर स्वामी विवेकानंद, मदनमोहन मालवीय तक कितने ही ऋषियों, आचार्यों का संबंध काशी की पवित्र धरती से रहा है।”

मोदी ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज के चरण यहाँ पड़े थे। रानी लक्ष्मी बाई से लेकर चंद्रशेखर आज़ाद तक, कितने ही सेनानियों की कर्मभूमि-जन्मभूमि काशी रही है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद, पंडित रविशंकर, और बिस्मिल्लाह खान जैसी प्रतिभाओं को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इस स्मरण को कहाँ तक ले जाया जाए। पीएम मोदी ने वाराणसी में कहा कि काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण, भारत को एक निर्णायक दिशा देगा, एक उज्जवल भविष्य की तरफ ले जाएगा। ये परिसर, साक्षी है हमारे सामर्थ्य का, हमारे कर्तव्य का। अगर सोच लिया जाए, ठान लिया जाए, तो असंभव कुछ भी नहीं।

बकौल पीएम मोदी, हर भारतवासी की भुजाओं में वो बल है, जो अकल्पनीय को साकार कर देता है। हम तप जानते हैं, तपस्या जानते हैं, देश के लिए दिन रात खपना जानते हैं। चुनौती कितनी ही बड़ी क्यों ना हो, हम भारतीय मिलकर उसे परास्त कर सकते हैं। आज का भारत अपनी खोई हुई विरासत को फिर से सँजो रहा है। यहां काशी में तो माता अन्नपूर्णा खुद विराजती हैं। उन्होंने खुशी जताई कि काशी से चुराई गई माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा, एक शताब्दी के इंतजार के बाद अब फिर से काशी में स्थापित की जा चुकी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लिए जनता जनार्दन ईश्वर का ही रूप है, हर भारतवासी ईश्वर का ही अंश है, इसलिए वो कुछ माँगना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वो अपने लिए नहीं, हमारे देश के लिए तीन संकल्प चाहते हैं- स्वच्छता, सृजन और आत्मनिर्भर भारत के लिए निरंतर प्रयास। उन्होंने कहा कि गुलामी के लंबे कालखंड ने हम भारतीयों का आत्मविश्वास ऐसा तोड़ा कि हम अपने ही सृजन पर विश्वास खो बैठे। पीएम मोदी ने कहा, “आज हजारों वर्ष पुरानी इस काशी से, मैं हर देशवासी का आह्वान करता हूँ- पूरे आत्मविश्वास से सृजन करिए, इनोवेट करिए, इनोवेटिव तरीके से करिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “तीसरा एक संकल्प जो आज हमें लेना है, वो है आत्मनिर्भर भारत के लिए अपने प्रयास बढ़ाने का। ये आजादी का अमृतकाल है। हम आजादी के 75वें साल में हैं। जब भारत सौ साल की आजादी का समारोह बनाएगा, तब का भारत कैसा होगा, इसके लिए हमें अभी से काम करना होगा।

वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम मंदिर का उद्घाटन: जानिए इससे पहले के घटनाक्रम के बारे मेंप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के दौरान वहाँ मौजूद लोगों को सम्बोधित किया। उन्होंने इस दौरान काशी विश्वनाथ धाम मंदिर कॉरिडोर के भव्य स्वरूप को जनता को समर्पित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि अभी मैं बाबा के साथ साथ नगर कोतवाल कालभैरव जी के दर्शन करके भी आ रहा हूँ, देशवासियों के लिए उनका आशीर्वाद लेकर आ रहा हूँ। काशी में कुछ भी खास हो, कुछ भी नया हो, उनसे पूछना आवश्यक है। मैं काशी के कोतवाल के चरणों में भी प्रणाम करता हूँ।

मोदी ने कहा कि हमारे पुराणों में कहा गया है कि जैसे ही कोई काशी में प्रवेश करता है, सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है। भगवान विश्वेश्वर का आशीर्वाद, एक अलौकिक ऊर्जा यहाँ आते ही हमारी अंतर-आत्मा को जागृत कर देती है उन्होंने कहा कि आप यहाँ जब आएंगे तो केवल आस्था के दर्शन नहीं करेंगे। आपको यहाँ अपने अतीत के गौरव का अहसास भी होगा। कैसे प्राचीनता और नवीनता एक साथ सजीव हो रही हैं, कैसे पुरातन की प्रेरणाएँ भविष्य को दिशा दे रही हैं, इसके साक्षात दर्शन विश्वनाथ धाम परिसर में हम कर रहे हैं।
मोदी ने काशी में मौजूद साधु-संतों और लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि विश्वनाथ धाम का ये पूरा नया परिसर एक भव्य भवन भर नहीं है, ये प्रतीक है, हमारे भारत की सनातन संस्कृति का! ये प्रतीक है, हमारी आध्यात्मिक आत्मा का! ये प्रतीक है, भारत की प्राचीनता का, परम्पराओं का! भारत की ऊर्जा का, गतिशीलता का। उन्होंने कहा कि पहले यहाँ जो मंदिर क्षेत्र केवल तीन हजार वर्ग फीट में था, वो अब करीब 5 लाख वर्ग फीट का हो गया है। अब मंदिर और मंदिर परिसर में 50 से 75 हजार श्रद्धालु आ सकते हैं। यानि पहले माँ गंगा का दर्शन-स्नान, और वहाँ से सीधे विश्वनाथ धाम।
मोदी ने कहा, “काशी तो काशी है! काशी तो अविनाशी है। काशी में एक ही सरकार है, जिनके हाथों में डमरू है, उनकी सरकार है। जहां गंगा अपनी धारा बदलकर बहती हों, उस काशी को भला कौन रोक सकता है? आज भगवान शिव का प्रिय दिन सोमवार है। आज विक्रम संवत 2078 मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष दशमी तिथि, एक नया इतिहास रच रही है। हमारा सौभाग्य है कि हम इस तिथि के साक्षी बन रहे हैं। मैं आज अपने हर उस श्रमिक भाई-बहन का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूँ जिसका पसीना इस भव्य परिसर के निर्माण में बहा है। कोरोना के विपरीत काल में भी, उन्होंने यहां पर काम रुकने नहीं दिया। मुझे अभी अपने इन श्रमिक साथियों से मिलने का, उनका आशीर्वाद लेने का सौभाग्य मिला है।”
उन्होंने कहा, “जब मैं बनारस आया था तब एक विश्वास लेकर आया था, विश्वास अपने से ज्यादा बनारस के लोगों पर था। आज हिसाब-किताब का समय नहीं है। तब कुछ ऐसे लोग भी थे जो बनारस के लोगों पर संदेह करते थे कि कैसे होगा, नहीं होगा, ये मोदी जी जैसे बहुत आकर गए। मुझे बहुत आश्चर्य होता था, लेकिन ये जड़ता बनारस की नहीं थी, वो राजनीति थी। लेकिन काशी तो, काशी है। काशी तो अविनाशी है। काशी में एक ही सरकार है। जिनके हाथों में डमरू है, उनकी सरकार है।”
वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम मंदिर कॉरिडोर के उद्घाटन के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व का सबसे लोकप्रिय नेता बताया। उन्होंने ‘नमामि शमीशान निर्वाण रूपं’ के साथ अपनी बात की शुरुआत की। इस अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, यूपी के दोनों उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश धर्म के अलावा राज्यपाल आनंदबेन पटेल भी मौजूद थीं। इस दौरान सीएम योगी ने कहा कि आज माँ गंगा प्रफुल्लित हैं, काशी के कोतवाल भैरव आह्वादित हैं और बाबा विश्वनाथ की कृपा हम पर बरस रही है।
उन्होंने कहा कि ये काशी का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यहाँ से सांसद बना कर भेजा गया। उन्होंने कहा कि सभी संत प्रधानमंत्री नरेंद्र के स्वागत के लिए आह्वादित हैं, क्योंकि हजारों वर्ष की तपस्या आज सच हो रही है। उन्होंने कहा कि 1777-80 के बीच में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बाबा विश्वनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में योगदान दिया, महाराजा रंजीत सिंह ने भी इसके लिए काम किया और आज पूज्य संत जनों ने आज अपनी आँखों से इसे भव्य और दिव्य बनते हुए देखा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ककाशी विश्वनाथ मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद परिसर में पौधारोपण किया। बता दें कि हिन्दू धर्म में वनस्पति को देवी मानते हैं। इसके बाद पीएम मोदी ने उन श्रमजीवियों पर पुष्प वर्षा की, जिनकी मेहनत से काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का निर्माण संपन्न हुआ है। उन श्रमिकों को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं भूले और उनसे बातें की। उन पर फूल बरसाए। साथ ही उनमें से कइयों से बात कर के हालचाल और नाम-पता भी पूछा।
इसके बाद उन्होंने सभी श्रमिकों के साथ बैठ कर फोटो भी खिंचवाई। इस दौरान हर-हर महादेव का उद्घाटन होता था। इस दौरान पुरोहितों ने उन्हें भेंट भी दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी विश्वनाथ धाम मंदिर का एक स्वरूप भी उन्हें भेंट किया।
काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे। गंगा में डुबकी लगाने के बाद उन्होंने कलश में जल भरा, जिसके बाद मंदिर पहुँच कर आचार्यों की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान से काशी विश्वेश्वर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने गंगाजल, बेलपत्र और पुष्प लेकर पूजा-अर्चना की। जहाँ पुरोहित घंटी बजा रहे थे, वहीं पीएम मोदी ने बाबा विश्वनाथ की आरती की। इस दौरान विश्व के कल्याण के लिए भी प्रार्थना की गई।
काशी में भगवा विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में वहाँ के लोगों का भी कम योगदान नहीं है। वहाँ निर्माण के दौरान लगभग 500-600 घर हटाने पड़े, जिसके लिए लोगों ने स्वेच्छा से योगदान दिया और कोई केस-मुकदमा के बिना ही ये कार्य सफल हुआ। इसके उद्घाटन के लिए सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा की पूजा की। इसके बाद वो कपड़े बदल कर कलश में जल लेकर विश्वनाथ मंदिर पहुँचे, जहाँ जलाभिषेक किया।
जलाभिषेक के लिए जाते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुर्ता-धोती पहन रखी थी और एक गमछा रखा हुआ था। इस दौरान डमरू बजाते हुए पुरोहितों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान लगातार भक्ति गाने बज रहे थे और मंत्रोच्चार हो रहा था। इस दौरान सुरक्षा की काफी कड़ी व्यवस्था है और आसपास के सभी ऊँची जगहों पर पुलिस तैनात थी। बाबा विश्वनाथ धाम मंदिर में आचार्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भगवान शिव की पूजा संपन्न कराई।
काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा में डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। इस दौरान पीएम मोदी को लाल वस्त्रों में नदी में डुबकी लगा कर मंत्रोच्चार करते हुए देखा गया। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों में माला और लोटा ले रखा था। इसके बाद पीएम मोदी ने मंदिर में जाकर अंजलि दी। मुख्य मंदिर परिसर में नया गलियारा बनाया गया है, जहाँ दीवारों में भगवा शिव से सम्बंधित श्लोक और इतिहास लिखा हुआ है।
इस दौरान पूरे काशी को सजाया गया है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहाँ उपस्थित थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत उत्तर प्रदेश मत्रिमंडल के कई सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल हैं। कहा जाता है कि काशी में ही भगवान विष्णु ने भी तपस्या की थी, जिसके बाद भगवान शिव के मस्तक हिलाने के कारण उनके कान से जो कर्णिका गिरी, उसे ही मणिकर्णिका कहा गया। काशी में ‘आनंद वन’ भी है, जिसके बारे में भगवान शिव ने कहा था कि ऐसी जगह विश्व में कहीं और नहीं होगी।