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जब टीएन शेषन की ज़िद के कारण प्रणब मुखर्जी को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था

In memory of Seshan: Politicians remember a fair election commissioner -  The Federal
Former President Pranab Mukherjee Still in Deep Coma, but Haemodynamically  Stable: Doctorsराजनीति में प्रणब मुखर्जी से जुड़ी अनगिनत यादें हैं। ऐसा ही एक किस्सा बताते हैं, जब टीएन शेषन की जिद के कारण प्रणब दा की मंत्री की कुर्सी चली गई थी
मई का महीना था और 1991 का साल तब लोकसभा का चुनाव चल रहा था चुनाव के दरम्यान ही 21 मई को तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदूर में कांग्रेस (इ) के अध्यक्ष राजीव गांधी की एक मानव बम द्वारा हत्या कर दी गई इसके बाद आन्ध्र प्रदेश के कांग्रेस (इ) नेता पीवी नरसिंह राव को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया बाद में नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने और पूरे पांच साल सरकार चलाई
नरसिम्हा राव ने अपना मंत्रिमंडल गठित करने के लिए प्रणब मुखर्जी के साथ खूब-सलाह मशविरा किया, लेकिन उन्हें मंत्री नही बनाया प्रणब मुखर्जी को योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाकर संतुष्ट किया गया थालेकिन 1993 की शुरुआत में हर्षद मेहता कांड और प्रतिभूति घोटाला सामने आ गया इस मामले पर खूब सियासी उठा-पटक हुई और इसी उठा-पटक के दौरान वाणिज्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पी. चिदंबरम ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया हालांकि उन पर कोई सीधा आरोप नही था
अब नरसिंह राव ने एक नए वाणिज्य मंत्री की खोज शुरू की डंकल प्रस्ताव और गैट समझौते (जिसके बाद विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया था) जैसे कई बड़े मसले सरकार के सामने पड़े थे उनसे निबटने के लिए एक ऐसे वाणिज्य मंत्री की जरूरत थी, जो आर्थिक मामलों की जानकारी के साथ-साथ राजनीतिक समझदारी भी रखता हो ऐसे में नरसिंह राव की नजर योजना आयोग के उपाध्यक्ष प्रणब मुखर्जी पर पड़ी प्रणब को वाणिज्य मंत्री बनाया गया लेकिन चूँकि वे संसद के किसी भी सदन के सदस्य नही थेइसलिए संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक, उन्हें मंत्री पद की शपथ लेने के दिन से महीने के भीतर संसद के किसी भी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य था
इसी दौरान पश्चिम बंगाल से राज्यसभा का द्विवार्षिक चुनाव होना था उस चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल की विधानसभा में कांग्रेस(इ) की हैसियत इतनी थी कि वह कम से कम अपने एक कैंडिडेट को राज्यसभा भेज सके इसलिए प्रणव मुखर्जी कांग्रेस (इ) के राज्य सभा उम्मीदवार बन गए
लेकिन यहां एक बड़ा विवाद फंस गया उस वक्त देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर टीएन शेषन थेवही टीएन शेषन, जिन्होंने देश के आम आदमी को चुनाव आयोग की ताकत का अहसास कराया था और जिनके नाम से नेताओं की हवाईयां उड़ा करती थीं जो कहते थे कि मैं अपने ब्रेकफास्ट में नेताओं को खाता हूं‘ ढाई बरस पहले दिसंबर 1990 में चंद्रशेखर सरकार ने उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर नियुक्त किया था। टी.एन.शेषन जैसे सख्त प्रशासनिक को चुनाव आयोग में लाने से लगता है, तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर स्वयं कितने सख्त रहे होंगे। 
उस दौर में चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर नरसिम्हा राव सरकार और टीएन शेषन में ठनी हुई थी शेषन का मानना था कि चुनाव आयोग की संवैधानिक हैसियत सुप्रीम कोर्ट और नियंत्रक व महालेखा परीक्षक यानि CAG जैसी है, जिसमें सरकार का कोई दखल नही होता इसलिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए चुनाव आयोग कोई भी कदम उठाने के लिए आज़ाद है
लेकिन सरकार और राजनीतिक दलों को शेषन के इस रुख से परेशानी थी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था शेषन ने भी ऐलान कर दिया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट नहीं कर देता, तब तक इस देश में मैं कोई चुनाव नही होने दूंगा‘ और इसके साथ ही उन्होंने बंगाल की राज्यसभा सीटों का चुनाव स्थगित कर दिया
राज्यसभा चुनाव स्थगित होने से प्रणब मुखर्जी के सामने समस्या खड़ी हो गई मंत्री बने लगभग महीने होने को थे और अब तक उन्हें संसद की सदस्यता मिल नहीं पाई थी लिहाजा मजबूरन प्रणब दा को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा टीएन शेषन की जिद ने अंततः प्रणब दा को मंत्री पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया इस घटना से पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु इतने नाराज हुए कि टीएन शेषन की आलोचना करते-करते भाषा की सारी मर्यादाएं लांघ गए बसु ने शेषन को पागल कुत्ता तक कह दिया
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भारतीय राजनीति के ‘पितामह’ पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अगस्त 31 को निधन हो गया। वो पिछले कई दिनों से बीमार थे ...
कुछ दिनों बाद राज्यसभा चुनाव संपन्न हुए और प्रणब मुखर्जी राज्यसभा पहुँचने में कामयाब रहे उन्हें फिर से वाणिज्य मंत्री बनाया गया उधर सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के कदमों के मामले में उसकी स्वायत्तता और अधिकारों की पुष्टि कर दी, जिससे टीएन शेषन (साथ ही चुनाव आयोग भी) की ताकत में और इजाफा हो गया

कई बार विभाजित हुई कांग्रेस किस आधार पर सबसे पुरानी पार्टी?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
लगभग तीन वर्ष पूर्व टीवी चैनलों और अखबारों ने बताया कि कांग्रेस पार्टी अपना 131वां जन्मदिवस मना रही है।जब एक राष्ट्रीय पार्टी अपनी उम्र और जन्मदिन गलत बताने लग जाए और मीडिया उसे दिखाने भी लग जाए तो हैरानी होना वाजिब है। कांग्रेस पार्टी  कुछ वर्ष पहले टीपू सुल्तान का भी जन्मदिन गलत तारीख को मनाया। ज्यादा हैरानी तब होती है कि जब बुद्धिजीवी वर्ग भी चुपचाप तमाशा देखता है और कांग्रेस के इस महाझूठ पर हां में हां मिला देता है। वर्तमान में जो कांग्रेस है वो गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद और पटेल की कांग्रेस नहीं है। यह इंदिरा गांधी द्वारा कांग्रेस से कई बार अलग होकर बनाई गई कांग्रेस पार्टी है
ज्ञात हो इमरजेंसी के बाद तत्कालीन भारतीय जनसंघ के जनता पार्टी में विलय होने के बाद से आज तक अपना स्थापना दिवस नहीं मनाया, बल्कि जनता पार्टी से अलग होने उपरान्त स्थापित भारतीय जनता पार्टी के गठन दिवस को ही स्थापना दिवस के रूप मनाती है। लेकिन भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को स्मरण करती है। 
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पहली बार इसका जन्म 12 नवंबर 1969 में हुआ जब कांग्रेस पार्टी से इंदिरा गांधी को बर्खास्त कर दिया गया था और उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी कांग्रेस-(रिक्वीजीशन) की स्थापना की थी। नेहरू-पटेल-आजाद की कांग्रेस का चुनाव चिन्ह जोड़ा बैल था। लेकिन जब इंदिरा गांधी ने अलग पार्टी बनाई तो उन्हें यह चिन्ह नहीं मिला। तकनीकी तौर पर उसी दिन से इस पार्टी का रिश्ता पुरानी कांग्रेस से अलग हो गयायह चुनाव चिन्ह कांग्रेस (आर्गनाइजेशन) के पास रहा क्योंकि बड़े-बड़े स्वतंत्रता सेनानी इंदिरा के विरोध में थे। यही वजह है कि इंदिरा गांधी ने गाय-बछड़े को अपना सिम्बल बनाया था. कई लोग यह मानते हैं कि गाय-बछड़ा प्रतीकात्मक रूप से इंदिरा और संजय गांधी थे
Related imageइमरजेंसी के बाद कांग्रेस (आर) का फिर से विभाजन हुआ। 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की तानाशाही नीतियों और प्रवृति की वजह से कांग्रेस (आर) की हार हुई थी। पार्टी नेताओं ने खुल कर इंदिरा का विरोध किया जिससे पार्टी दो फांक में बंट गई। विरोध झेलने में इंदिरा गांधी को परेशानी होती थी इसलिए उन्होंने अलग पार्टी बनाई जिसका नाम रखा कांग्रेस (आई) मतलब इंदिरा कांग्रेस इमरजेंसी के काले कारनामों की वजह से पार्टी का सिम्बल बदनाम हो चुका थाइस वजह से इंदिरा कांग्रेस को फिर से नया चुनाव-चिन्ह लेना पड़ाइस बार इंदिरा ने पंजे के निशान को चुना इंदिरा गांधी एक ऑथोरिटेरियन नेता थीं सरकारी मशीनरी पर उनका पूरी तरह से नियंत्रण था. इलेक्शन कमीशन आज की तरह आजाद नहीं था इसलिए, इंदिरा गांधी ने इलेक्शन कमीशन पर दबाव डाला और कांग्रेस आई का नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस बदलवा दिया। असहाय और लाचार इलेक्शन कमीशन ने स्वीकृति दे दी। 1981 से इंदिरा कांग्रेस का नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस पड़ गया यह एक ऩई पार्टी थी लेकिन नाम पुराना था
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इस हिसाब से वर्तमान कांग्रेस की आयु पहले विभाजन के बाद से 46 वर्ष या फिर दूसरे विभाजन के हिसाब से 37 वर्ष या फिर इंडियन नेशनल कांग्रेस के नामकरण के बाद से 34 साल होनी चाहिए। समझने वाली बात यह है कि महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल की जो कांग्रेस थी वो कई बार टूटी। यहां तक कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस भी कई बार टूटी। कांग्रेस से टूट कर ना ना प्रकार की कांग्रेस की स्थापना हुई। अगर सोनिया-राहुल की कांग्रेस 131 साल पुरानी है तो उन सभी ना ना प्रकार की पार्टियों की आयु भी 131 साल होनी चाहिए। उन्हें भी गांधी-नेहरू-बोस-पटेल-आजाद की पार्टी कहलाने का उतना ही हक है जितना सोनिया-राहुल की कांग्रेस को है। हकीकत तो यह है कि 2015 में यह एक पहेली ही है कि कौन असली कांग्रेस है और कौन नकली कांग्रेस है। यह इसलिए क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर तो कांग्रेस में विभाजन हुआ ही, साथ ही साथ राज्य स्तर पर भी कांग्रेस टूटती और बिखरती रही
आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस पार्टी 1951 में टूटी जब जे. कृपलानी ने इससे अलग होकर किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई और एन जी रंगा ने हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी बनाई। इसी साल कांग्रेस से अलग होकर सौराष्ट्र खेदुत संघ बनी। 1956 में कांग्रेस फिर टूटी जब सी राजगोपालाचारी ने इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई। इसके बाद 1959 में बिहार, राजस्थान, गुजरात और उड़ीसा में भी कांग्रेस पार्टी टूटी। यहां कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेसी नेताओं ने स्वतंत्र पार्टी बनाई। 1964 में के एम जॉर्ज ने केरल-कांग्रेस बनाई। 1966 में उड़ीसा में हरकृष्णा महाताब ने उड़ीसा-जन-कांग्रेस बनाई1967 में कांग्रेस पार्टी से चरण सिंह अलग हुए और भारतीय क्रांति दल बनाया वहीं बंगाल में इसी साल अजय मुखर्जी ने बांग्ला-कांग्रेस का ऐलान कर दियाअगले साल कांग्रेस मणिपुर में बीचोबीच टूटी। 1969 में कांग्रेस पार्टी से बीजू पटनायक और मारी चेन्ना रेड्डी अलग हुए और उत्कल-कांग्रेस और तेलंगाना प्रजा समिति पार्टियां कांग्रेस के विरोध में खड़ी हो गई
1978 में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और गोवा में कांग्रेस पार्टी फिर से टूटी। इस बार इंडियन नेशनल कांग्रेस(उर्स) बनी इन राज्यों में जो लोग कांग्रेस में बचे थे उनमें फिर से 1981 में बंटवारा हुआ। इस बार शरद पवार पार्टी से अलग हो गए और इंडियन नेशनल कांग्रेस सोशलिस्ट बनी इसी साल बिहार में जगजीवन राम ने कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया और उन्होंने जगजीवन-कांग्रेस पार्टी की स्थापना की. 1984 में असम में शरत चंद्र सिन्हा ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली1986 में प्रणब दा ने विभाजन का झंडा बुलंद किया और राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई1988 में शिवाजी गणेशन ने तमिलनाडु में कांग्रेस को तोड़कर टीएमएम पार्टी बनाई इसी तरह 1994 में तिवारी कांग्रेस बनी जिसमें नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, नटवर सिंह शामिल हुए1996 में तो कांग्रेस से टूटकर कई राज्यों में नई पार्टियों को जन्म हुआ इस साल कांग्रेस को विभाजित करने वाले नेताओं में कर्नाटक में बंगरप्पा, अरुणाचल प्रदेश में गेगांग अपंग, तमिलनाडु में मुपनार, मध्यप्रदेश में माधवराव सिंधिया शामिल थे अगले साल यानि 1997 में कांग्रेस बंगाल और तमिलनाडु में फिर से टूटी बंगाल में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई वहीं तमिलनाडु में बी रामामूर्ति ने मक्काल कांग्रेस की स्थापना की
congress1998 में पार्टी गोवा, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र में टूट कर क्रमशः गोवा राजीव कांग्रेस, अरुणाचल कांग्रेस, ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (सेकुलर), महाराष्ट्र विकास अगाढ़ी बनी। इसी तरह 1999 में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी बनी और जम्मू कश्मीर में मुफ्ती सईद ने कांग्रेस से अलग होकर पीडीपी बनाई. फिर, 2000 से अब तक पार्टी तमिलनाडु, पांडिचेरी, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, बंगाल और आंध्रप्रदेश में टूट चुकी है। कांग्रेस के इतिहास पर सोनिया-राहुल की मोनोपॉली नहीं हो सकती है क्योंकि आज जो कांग्रेस पार्टी है वो भी मूल कांग्रेस से अलग होकर ही बनी है। सोनिया-राहुल की कांग्रेस का आजादी दिलाने वाली कांग्रेस से ठीक वैसा ही रिश्ता है जैसे कि नवीन पटनायक का उस कांग्रेस से है। जैसा कि ममता बनर्जी और शरद पवार का आजादी दिलाने वाली कांग्रेस से है। इतिहास के पन्नों को पलटने वाले कांग्रेसी नेताओं को कांग्रेस पार्टी में हुए विभाजन का इतिहास पढ़ना चाहिए और वर्तमान कांग्रेस का चेहरा ढूंढना चाहिए। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी उस तरह से टूटी है जैसे कार का शीशा चकनाचूर हो जाता है। कांग्रेस के नेताओं को यह बताना चाहिए कि इतिहास के थपेड़े में चकनाचूर हुई कांग्रेस नामक शीशे के कांच के किस टुकड़े में सोनिया-राहुल की कांग्रेस का चेहरा दिखाई देता है। जिस कांग्रेस की दुहाई सोनिया-राहुल कांग्रेस के कार्यकर्ता देते हैं वो कांग्रेस कब की खत्म हो चुकी है
बोफोर्स, 2 जी, कोयला, कॉमनवेल्थ, आदर्श आदि जैसे सैकड़ो घोटालों से सुशोभित सोनिया-राहुल पारिवार वाली कांग्रेस पार्टी के नेता जब कहते हैं कि उनकी कांग्रेस पार्टी ने देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाई थी तो हैरानी होती है। आजादी दिलाने वाले महापुरूषों की पार्टी घोटालों वाली पार्टी नहीं हो सकती नेहरू-पटेल-मौलाना आजाद की पार्टी वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टी नहीं हो सकती स्वतंत्रता-सेनानियों की पार्टी किसी की प्राइवेट प्रोपर्टी नहीं हो सकती है। देश को आजादी दिलाने वालों की पार्टी बिना चुनाव के अध्यक्ष चुनने वाली पार्टी नहीं हो सकती। गांधी की पार्टी झूठ बोलने वालों की पार्टी नहीं हो सकती। सोनिया-राहुल की पार्टी वो कांग्रेस है जिसे इंदिरा गांधी ने कांग्रेस से अलग होकर बनाया था लेकिन सोनिया-राहुल और उनके प्रवक्ता खुलेआम झूठ बोलकर लोगों को झांसा देने में लगे है
कांग्रेस पार्टी की रणनीति साफ है। सोनिया-राहुल की कांग्रेस महापुरुषों का नाम लेकर, उनकी तस्वीरें लगाकर, झूठा इतिहास बता कर अपने घोटालों और निकम्मेपन को छिपाना चाहती है। सच्चाई ये है कि वर्तमान कांग्रेस पार्टी गांधी, पटेल, आजाद, तिलक, बोस आदि जैसे महापुरुषों वाली कांग्रेस नहीं है। यह कांग्रेस सोनिया-राहुल की कांग्रेस है जिसमें एक से बढ़कर एक घोटालेबाजों का वर्चस्व है यह सामंती प्रवृति वालों की कांग्रेस है यह पार्टी सोनिया-राहुल की निजी सम्पत्ति है। इस पार्टी की राजनीति सोनिया गांधी के चरणों से शुरू होकर राहुल गांधी की वंदना में खत्म होती है। सोनिया-राहुल की कांग्रेस को न तो आजादी की लड़ाई से कुछ लेना देना है और न ही वो देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों के राजनीतिक वारिस हैं। जिस पार्टी ने स्वतंत्रता संग्राम की विचारधारा को ही दफना दिया उसे स्वतंत्रता संग्राम की विरासत पर बात करने की कोई नैतिक अधिकार नहीं है। सोनिया गांधी कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से ठीक 62 दिन पहले पार्टी की सदस्य बनी थीं। महज 62 दिनों में ही वो पार्टी अध्यक्ष बन गई. यह कीर्तिमान तो स्वयं गांधी और नेहरू नहीं बना सके। यह कांग्रेस पार्टी में व्याप्त एक परिवार के प्रति दासता का परिचायक है। इस हरकत ने एक ही झटके में उन सभी शहीदों को शर्मसार कर दिया जिन्होंने देश में प्रजातंत्र की स्थापना के लिए अपनी जानें दीं। इसलिए, सोनिया-राहुल को स्वतंत्रता संग्राम के बारे बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हैसोनिया-राहुल की कांग्रेस सिर्फ और सिर्फ इंदिरा गांधी की राजनीतिक वारिस है जिसके चेहरे पर इमरजेंसी का स्याह दाग है

सोनिया गाँधी ने प्रधानमन्त्री बनाया, लेकिन अपनी मर्जी से कुछ न कर सका-- डॉ मनमोहन सिंह

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज कांग्रेस The Accidental Prime Minister फिल्म पर जो विवाद खड़ा कर रहे हैं, भूल रहे हैं, कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ‘‘ द कोलिशन इयर्स’’ के उद्घाटन के अवसर पर अपने श्रीमुख से जो कुछ कहा था, संजय बारू द्वारा उपरोक्त पुस्तक में जो लिखा है, लगभग मोहर लगा दी थी। जो केवल किताबी कीड़ों तक ही सीमित था, लेकिन फिल्म के माध्यम से डॉ सिंह के सीने में छुपे दर्द से देश का हर प्राणी अवगत हो जाएगा। कांग्रेस का विरोध फिल्म से नहीं, बल्कि सच्चाई के सार्वजनिक होने से है। कांग्रेस आम जनता को सच्चाई से दूर रखना चाहती है, जो अब तक करती रही है। वास्तव में जनता को भ्रमित कर कांग्रेस इतने वर्ष राज करती रही। कांग्रेस के विरोध से फिल्म और पुस्तक को चर्चित कर दिया। स्मरण हो, सलमान रुश्दी की पुस्तक को बैन कर, न चाहते हुए भी भारत में चोरी से पुस्तक खूब बिकी। वही स्थिति इस फिल्म और पुस्तक के साथ होने जा रही है। मध्य प्रदेश में या दूसरे कांग्रेस शासित राज्य में फिल्म बैन हो सकती है, लेकिन दूसरे राज्यों में यही फिल्म अपने वितरक को भरपूर पैसा देगी।दूसरे यह भी स्मरण होगा कि "A" फिल्मों को देखने 18 से छोटे सोनीपत या साहिबाबाद जाते थे।         
केन्द्र में 2004 से 2014 तक लगातार दो बार संप्रग गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर चुके पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने आज दावा किया कि प्रधानमंत्री बनने के मामले में उनके पास तो कोई विकल्प ही नहीं बचा था तथा पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने यह बात आज यहां तीन मूर्ति सभागार में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ‘‘ द कोलिशन इयर्स’’ के उद्घाटन के अवसर पर कही जो इस दौर में केन्द्र की विभिन्न गठबंधन सरकारों का लेखाजोखा है। डा. सिंह ने पूर्व राष्ट्रपति को प्रतिष्ठित एवं जिंदादिल सांसद एवं कांग्रेस जन के रूप में याद करते हुए कहा कि पार्टी में हर कोई उनसे जटिल एवं मुश्किल मुद्दों के हल की उम्मीद करते थे। मनमोहन ने वर्ष 2004 में अपने प्रधानमंत्री बनने का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में चुना और ‘‘प्रणबजी मेरे बहुत ही प्रतिष्ठित सहयोगी थे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इनके (मुखर्जी के) पास यह शिकायत करने के सभी कारण थे कि मेरे प्रधानमंत्री बनने की तुलना में वह इस पद (प्रधानमंत्री) के लिए अधिक योग्य हैं।… पर वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानते थे कि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था।’’ उनकी इस टिप्पणी पर न केवल मुखर्जी तथा मंच पर बैठे सभी नेता बल्कि श्रोताओं की अग्रिम पंक्ति में बैठी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया सहित सभी श्रोता हंसी में डूब गये। मुखर्जी की पुस्तक के लोकार्पण अवसर पर मुखर्जी, मनमोहन के साथ साथ माकपा नेता सीताराम येचुरी, भाकपा नेता सुधाकर रेड्डी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, द्रमुक नेता कानिमोई मंच पर मौजूद थें। श्रोताओं में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे।
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इस वेबसाइट का परिचय
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बॉलीवुड एक्टर अनुपम खेर और अक्षय खन्ना अभिनीत और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर लिखी गई किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनि...

सिंह ने कहा कि इससे उनके और मुखर्जी के संबंध बेहतरीन हो गये तथा सरकार को एक समन्वित टीम की तरह चलाया जा सका। जिस प्रकार से उन्होंने भारतीय राजनीति के संचालन में महान योगदान दिया है, वह इतिहास में दर्ज होगा। मनमोहन ने मुखर्जी के साथ अपने संबंधों को याद करते हुए कहा कि वह 1970 के दशक से ही उनके साथ काम कर रहे हैं। डा. सिंह ने कहा कि वह दुर्घटनावश राजनीति में आये जबकि मुखर्जी एक कुशल एवं मंझे हुए राजनीतिक नेता हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री रहने के दौरान सरकार को जब भी किसी जटिल मुद्दे का हल निकालना होता था तो मंत्री समूह का गठन किया जाता था और अधिकतर जीओएम की अध्यक्षता उस समय मुखर्जी ही कर रहे होते थे।
पीएम पद के लिए प्रणब मुझसे बेहतर थे: मनमोहन सिंह
मनमोहन की यह टिप्पणी इसलिए महत्व रखती है क्योंकि मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में कहा, ‘‘यह व्यापक उम्मीद थी कि सोनिया गांधी के मना करने के बाद प्रधानमंत्री के लिए मैं ही अगली पंसद रहूंगा। यह उम्मीद संभवत: इस तथ्य पर आधारित थी कि सरकार में मेरे पास व्यापक अनुभव है।’’ मुखर्जी ने यह भी कहा कि जब उन्होंने मनमोहन सरकार में शामिल होने से इंकार कर दिया, सोनिया ने इस में शामिल होने पर बल दिया क्योंकि यह उसके ‘‘कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होगा। साथ ही सिंह को भी सहयोग मिलेगा।’’
प्रणव को प्रधानमन्त्री न बनाना कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल थी  
एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते प्रणव मुख़र्जी को ऱाष्ट्रपति पद पर नामांकित करने पर लिखा था कि "अब कांग्रेस का भविष्य अंधकारमय की ओर अग्रसर हो रहा है।" क्योकि पार्टी में एक वही अनुभवी थे, जो कांग्रेस के लिए अनेकों अवसरों पर संकटमोचन सिद्ध हुए थे। यदि डॉ मनमोहन सिंह के स्थान पर उन्हें प्रधानमन्त्री बना दिया होता, 2014 चुनाव में कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती।और अब जिस हाशिए पर कांग्रेस पहुँच गयी है, वहां से उठाने का वर्तमान किसी भी नेता में साहस नहीं। प्रणव मुख़र्जी को राष्ट्रपति बनाना ही कांग्रेस के लिए "विनाश काले विपरीत बुद्धि" सिद्ध हो गया। प्रणव मुख़र्जी को प्रधानमन्त्री न बनाना कांग्रेस यानि सोनिया की सबसे बड़ी भूल थी।     
उन्होंने पुस्तक लोकार्पण समारोह में कहा कि कांग्रेस स्वयं में एक गठबंधन है क्योंकि यह सभी विचारों को एक मंच पर लाती है। उन्होंने कहा, ‘‘भीतर के साथ साथ बाहर गठबंधन होना कठिन है। किन्तु यह किया गया।’’ मुखर्जी ने कहा कि उन्होंने पुस्तक में गठबंधन वर्षों का उल्लेख किया है और किसी व्यक्तिगत मामलों को शामिल नहीं किया गया। इस अवसर पर माकपा नेता सीताराम येचुरी ने मुखर्जी के साथ अपने लंबे अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत स्वयं में ही एक महागठबंधन है जिसमें बहुलतावादी विचार शामिल हैं। उन्होंने कहा कि संप्रग सरकार के प्रथम कार्यकाल में कई जटिल मुद्दों पर मुखर्जी के साथ उनका विचार विमर्श हुआ और उनके अनुभवों का लाभ उठाया गया।