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AirIndia के कर्मचारियों की करतूत, शाकाहारी बता जैन दंपत्ति को फ्लाइट में खिलाई मछली

एयर इंडिया स्टाफ ने जैन व्यक्ति को परोसा नॉन वेज
एयर इंडिया फ्लाइट में एक जैन दंपत्ति को शाकाहारी बताकर मछली खिलाने का मामला प्रकाश में आया है। आरोप है कि एयर इंडिया के दो मुस्लिम स्टाफ ने जैन पैसेंजर को कहा कि उन्हें जो दिया गया है वो वेज खाना है और वो बिन चिंता के वे इसका आनंद लें। हालाँकि, बाद में किसी अन्य स्टाफ से फिर कन्फर्म पर सामने आया कि उन्हें मछली परोसी गई है। जैन व्यक्ति ने इस घटना की वीडियो यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर समेत कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डाला है जिसके बाद एयर इंडिया ने उनसे इस मामले की जाँच के लिए उनकी टिकेट आदि माँगी है।

इस वीडियो के साथ साझा जानकारी के अनुसार, राघवेंद्रं जैन ने अपने यूट्यूब पर लिखा कि टोक्यों से दिल्ली आने के दौरान उन्होंने AI 307 में सफर किया। इस यात्रा में उन्होंने ग्लूटन फ्री वेज, जैन खाना माँगा था। ये ऑर्डर प्री बुक और कन्फर्म था। लेकिन फातिमा मुन्नी और यमन खान ने उन्हें नॉन वेज खाना वेज बताकर दे दिया। जब उन्होंने ये खोला तो उन्हें मछली की बू आई। वे फातिमा के पास गए। जहाँ फातिमा और यमन दोनों ने वेरीफाई किया कि ये शाकाहारी खाना है और इस बारे में वे कोई चिंता न करें। उन लोगों ने हँस कर यात्री से खाना खाने को कहा।

वह लिखते हैं, “मैंने और मेरी पत्नी ने कुछ निवाले गए पर जैसे ही कोई और स्टाफ सदस्य वहाँ से गुजरा हमने फिर कन्फर्म किया। उन्होंने सूँघकर कहा कि ये तो मछली है और ग्लूटन फ्री खाना बड़ी मुश्किल से शाकाहारी होता है। इसके बाद मैंने कैबिन क्रू से शिकायत करने की कोशिश की। पहली दोषी फातिमा मुन्नी है जिसने हँसकर बात टाली और दूसरा नाम विकास चोपड़ा है जिसने जवाब दिया- अब क्या नाक रगड़ें तुम्हारे सामने। सॉरी बोल तो दिया।”

आगे राघवेंद्र ने लिखा, “वो दिन हमारी जिंदगी का सबसे घटिया दिन था। मेरी पत्नी अब भी उस घटना की वजह से बीमार हैं और हम इमोशनल स्ट्रेस में हैं। हमने तमाम धमकियों के बाद पूरा मामला रिकॉर्ड करने की कोशिश की। यमन खान पूरी फ्लाइट में हमसे वीडियो डिलीट करने को कहता रहा। केवल सुपरवाइजर जोशी मैम ने हमसे संवेदना दिखाई और माफी माँगी।”

इस वीडियो में देख सकते हैं कि कैसे जैन व्यक्ति लगातार फ्लाइट कर्मियों से उनके किए की शिकायत कर रहे हैं मगर वे लोग बार बार दोहरा रहे हैं कि क्या उनको लगता है कि वे ये सब जान कर करेंगे। फातिमा मुन्नी के चेहरे पर किसी तरह का पछतावा नहीं है। जैन आदमी बार बार कहता है, “मेरे पूछने के बाद भी आपने मुझे मीट खिला दिया। मैं जैन हूँ मैंने जिंदगी में नॉनवेज खाया नहीं। मुझे नहीं पता कि नॉन वेज दिखता कैसा है।” वह कहते हैं कि इतनी शिकायत करने के बाद भी फातिमा के चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने बिलकुल गंभीर होकर माफी तक नहीं माँगी। बल्कि जब उन्होंने फातिमा से कहा कि अगर वो खुद मछली खाती हैं तो क्या उन्हें नहीं पता कि मछली कैसी दिखती है। इस पर फातिमा ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वो मछली खाती ही नहीं हैं। 

घटना पर अफसोस जताने की बजाय वो कहती हैं कि वो इस मामले में कंप्लेन करें और शांत बैठे। लेकिन राघवेंद्र कहते हैं, “शिकायत तो मैं करूँगा ही। आपने मेरा धर्म भ्रष्ट किया है। अगर कोई आपका करे आपको भी अच्छा नहीं लगेगा।” इसके बाद यमन खान ने माफी माँगने की बजाय उनसे ये कहना शुरू किया कि वो वीडियो डिलीट करें क्योंकि हवाई जहाज में फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है। जैन पूछते हैं कि नॉन वेज खिलाकर जो संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ वो कुछ नहीं। घटना की वीडियो लेकर नहीं बना सकते क्योंकि एयर इंडिया के नियमो के विरुद्ध है। इस वीडियो के कैप्शन में बताया गया है कि कैसे घटना के बाद राघवेंद्र की पत्नी ने दिन भर में 5 बार उलटी की और वे खुद पूरे दिन में कुछ नहीं खा पाए। उन्हें अब तक घिन आ रही है।

इसाइयों ने खोजा था चर्च के लिए यह अमानवीय तरीका

                                                                                                           साभार; pinterest
परिभाषा के हिसाब से संवाद दोतरफ़ा होता है। मतलब एक पक्ष बोल रहा हो और दूसरा सिर्फ सुने, ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन अगर आप अखबार जैसे माध्यमों से परिचित हैं तो आप जानते होंगे, अखबार की बात तो आप खरीद कर पढ़ते हैं, मगर आपकी बात अखबार तक पहुँचे, ऐसा कम ही होता है। सिर्फ एक पक्ष की सुनी जाती है। ऐसा दो समुदायों के मिलने पे भी होता है।

अक्सर विजेता के गुण-दोष, हारने वाला समुदाय आसानी से अपना लेता है। हारने वालों की शायद ही कोई चीज़ विजेता सीखते हैं। जैसे विजेता रिलिजन की 13 संख्या को अशुभ मानने की परंपरा, या रविवार के अवकाश की परंपरा तो भारत ने आसानी से अपना ली मगर यहाँ की परम्पराएँ शायद ही उधर गई होंगी।

ऐसा ज्ञान-विज्ञान में ही नहीं, संगीत-कला के क्षेत्र में भी होता है। कई बार हारने वालों की चीज़ें हड़प ली जाती हैं। बाद में उन्हें श्रेय देने से भी इनकार कर दिया जाता है। विजेताओं की चीज़ें कैसे आती हैं, उसे देखना हो तो स्लमडॉग मिलियनैर फिल्म के शुरुआत का एक दृश्य याद कीजिए। वहाँ भिखारी बनाने वाला एक गिरोह कुछ बच्चों को गाना गाने पर जाँच के देखता है।

फिल्म का मुख्य किरदार जब अच्छा गाता पाया जाता है तो बहला-फुसला के उसे एक कमरे में ले जाते हैं। वहाँ धोखे से उसे बेहोश करके, चम्मच से उसकी आँखें निकालने वाले होते हैं! गिरोह का इरादा था कि अंधे को गाकर भीख ज्यादा मिलेगी।

संभव है कि उस दृश्य को देख कर ज्यादातर लोग काँप उठे होंगे। अंग्रेजी में जिसे नेल बाइटिंग सिचुएशन कहते हैं, वही कह कर ज्यादातर अख़बारों ने उसका जिक्र किया होगा। विकलांग करके गवाने की भयावह, घृणित परंपरा! ये जो विकलांग करवा कर गाना गवाने की परंपरा है, वो ईसाई रिलिजन से आई है।

आज जैसा आप बच्चों के जन्म, शादी पर, गाने वाले हिजड़ों को देखते हैं, वैसा कुछ होने का जिक्र भी भारतीय ग्रंथों में नहीं आता। भारत के, मतलब हिन्दुओं का पुराना इतिहास देखेंगे तो किसी को विकलांग बना देना ताकि वो गा कर कमा सके, ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा। ये चर्च से आई परंपरा है। होता क्या था कि इस रिलिजन में स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं।

ऐसे में स्त्रियों को चर्च में गाने की इजाजत तो हरगिज़ नहीं दी जा सकती। लेकिन जो क्रिसमस या ऐसे अवसरों पर क्वायर की परिपाटी थी, उसमें गाने के लिए स्त्रियों वाली आवाज भी चाहिए होती थी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए 9 साल की आस-पास की उम्र में बच्चों को अंग-भंग कर के हिजड़ा बनाने की परंपरा शुरू हुई।

फिर इन बंध्याकरण किए बच्चों की लंबी ट्रेनिंग की प्रक्रिया शुरू होती थी। कई बार ये गरीब घरों के बच्चे होते थे। कम से कम खाने का इंतजाम होगा, इसलिए इस घृणित कृत्य के लिए माँ-बाप अपने बच्चे दे देते थे। हालाँकि प्रजनन क्षमता को ख़त्म कर देना अच्छा गायक हो जाने की गारंटी नहीं होती थी।

फिर ये भी था कि इस अमानुषिक कृत्य के बाद बच्चे के जीवित बचने की संभावना भी क्षीण होती थी। जो करीब 10 फीसदी बच्चे जीवित बच पाते, उनकी गाने की क्षमता हो, आवाज अच्छी हो ये भी जरूरी नहीं होता था। इसलिए कुछ भूखमरी से भी मरे ही होंगे।

इस काम के लिए पोप क्लेमेंट (अष्टम) ने 1599 में लिखित इजाज़त दी थी ताकि “कैस्ट्रटी” चर्च में गा पाएँ। पूरे दो सौ अस्सी साल बाद यानी 1878 में, पोप लियो ने, “कैस्ट्रटी” को चर्च में गाने देने से मना कर दिया था। स्त्रियाँ चर्च में ना आ सकें, इसलिए कैस्ट्रटी बनाने का घृणित कार्य चर्च करता रहा। स्त्रियों को चर्च के अन्दर जगह दिए बिना, अपने लिए ऊँचे स्वरमान (pitch) का गायन जुटाने का ये उनका तरीका था।

नहीं ग़लतफ़हमी मत पालिए! 1599-1878 के दौर में पूरे 26 पोप हुए हैं, यानी इस दौर में 26 बार ये आदेश दोहराया गया होगा। इनमें से दो पोप को ब्लेस्ड (Pious IX और Innocent XI) घोषित किया गया है। दो को केनोनाइजेशन (यानी संत घोषित करने की प्रक्रिया का शुरूआती चरण), के लिए जाँचा-परखा जा रहा है।

इनमें से कई प्रसिद्ध भी हुए थे। शायद सबसे प्रसिद्ध कास्ट्रटो 17वीं सदी के अंत का कार्लो ब्रोस्की था, जिसे फरिनेल्ली नाम से प्रसिद्धि मिली। इस पर 1994 में एक फिल्म भी बनी थी। इनकी प्रसिद्धि का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि स्वीडन की रानी क्रिस्टीना इनकी आवाज़ की ऐसी दीवानी थी कि उन्होंने पोलैंड के साथ युद्धविराम करवा दिया था!

दो हफ्ते तक कास्ट्रटो फेर्री आकर गा सके, इसके लिए युद्ध रुका रहा। चर्च अपने क्वायर के लिए ऐसे जबरन बनाए गए हिजड़ों को रख सके, इसके लिए अक्सर न्यू टेस्टामेंट का एक हिस्सा सुनाया जाता है। इस हिस्से के मुताबिक औरतों को सभाओं और चर्च में बोलना नहीं चाहिए (Corinthians 14:34-35 और Timothy 2:11-12)।

सन 1789 के दौर में सिर्फ रोम के चर्च क्वायर में गाने वाले 200 से ज्यादा कैस्ट्रटी थे। इन्हें चर्च ने 19वीं सदी में कहीं जाकर रखना बंद करना शुरू किया। सन 1870 में, पोप के शासित इलाके में कसाई और नाइयों द्वारा इस बर्बर बंध्याकरण को आदेश से बंद कर दिया गया था। 1878 में पोप लियो (13वें) ने नए कैस्ट्रटो को चर्च में काम ना देने का आदेश दिया।

इस तरह 1900 में सिस्टाइन चैपल और यूरोप के दूसरे कैथोलिक क्वायर में गाने वाले सिर्फ 16 कैस्ट्रटी बचे। सन 1903 में पोप पियस दशम के अधिकारिक प्रतिबंध पर ये वैटिकन में बंद हुआ। चर्च के आखरी कैस्ट्रटी अलेस्संद्रो मोरेस्की, की मृत्यु सन 1922 में हुई।

चर्च के गाने की इस अमानुषिक प्रथा की वजह से, इटली में, अंदाजन हर साल तीन से 5000 बच्चों का बंध्याकरण किया जाता था। उनमें से एक प्रतिशत, केवल 1% ही गायक बन पाते थे। इसके कारण ऑपेरा की परम्पराओं में ऐसे रोल लिखे जाते थे, जो कैस्ट्रटो गायक ही कर पाएँ, जैसे हान्डेल का ऑपेरा (operas of Handel)। ऐसे ऑपेरा जब आज मंचित किए जाते हैं, तो कोई स्त्री-पुरुष के कपड़ों में मुख्य किरदार निभाती है। कुछ ऐसे भी हैं (Baroque operas) जो कि इतने मुश्किल हैं, जिन्हें आज किया ही नहीं जाता।

हो सकता है आपको ऑपेरा पसंद हो तो कभी आपने इनका नाम सुना हो, नहीं तो ढूँढने के लिए गूगल है ही।

बाकी क्रिसमस है, जब आप क्वायर सुनेंगे तो इस प्रथा के अमानुषिक, बर्बर और वीभत्स इतिहास को भी याद कर लीजिएगा। मनुष्यता मरी ना हो तो गाने और रोने की आवाज में फर्क जरूर कर पाएँगे! सुन रहा है ना तू… रो रहा हूंँ मैं…

कैसे जन्मे भैरव, क्या जिम्मेदारी सौंपी भगवान शिव ने उन्हें

पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच विवाद छिड़ गया कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है? यह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि सभी देवता घबरा गए। उन्हें डर था कि दोनों देवताओं के बीच युद्ध ना छिड़ जाए और प्रलय ना आ जाए…
सभी देवता घबराकर भगवन शिव के पास चले गए और उनसे समाधान ढूंढ़ने का निवेदन किया। जिसके बाद भगवान शंकर ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें भगवान शिव ने सभी ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि और साथ में विष्णु और ब्रह्मा जी को भी आमंत्रित किया।
इस सभा में निर्णय लिया गया कि सभी देवताओं में भगवान शिव श्रेष्ठ है। इस निर्णय को सभी देवताओं समेत भगवान विष्णु ने भी स्वीकार कर लिया। लेकिन ब्रह्मा ने इस फैसले को मानने से इंकार कर दिया। वे भरी सभा में भगवान शिव का अपमान करने लगे। भगवान शंकर इस तरह से अपना अपमान सह ना सके और उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया।
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महामृत्युंजय मंत्र के देवता महाकाल और तंत्र के देवता श्रीशिव के कोतवाल श्रीभैरव महाराज के विराजमान होने से उज्जय...

भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए। वह श्वान (कुत्ते) पर सवार थे, उनके हाथ में एक दंड था और इसी कारण से भगवान शंकर को ‘दंडाधिपति’ भी कहा गया है। पुराणों के अनुसार भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था।
दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सिर को ही काट दिया।
शिव के कहने पर भैरव ने काशी प्रस्थान किया जहां उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया।
आज भी काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। भैरव अवतार का वाहन काला कुत्ता है। उनके अवतार को महाकाल के नाम से भी जाना जाता है। भैरव जयंती को पाप का दंड मिलने वाला दिवस भी माना जाता है।
अपने स्वरूप से उत्पन्न भैरव को भगवान शंकर ने आशीष दिया कि आज से तुम पृथ्वी पर भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाओगे। तुम्हारा हर रूप धरा पर पुजनीय होगा।
भैरव के आठ रूप
1. असितांग भैरव,
2. चंड भैरव,
3. रूरू भैरव,
4. क्रोध भैरव,
5. उन्मत्त भैरव,
6. कपाल भैरव,
7. भीषण भैरव
8. संहार भैरव।