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TMC में दरार और विरोध से बंगाल की सियासत में निर्णायक मोड़

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ी बाधा कभी मुस्लिम वोट बैंक नहीं रहा, बल्कि उसका एकतरफा ध्रुवीकरण रहा है। जब तक यह वोट बैंक पूरी तरह तृणमूल कांग्रेस के साथ खड़ा था, तब तक मुकाबला असमान था। लेकिन जैसे ही इस ध्रुवीकरण में दरार पड़ती दिख रही हैं, भाजपा के लिए दूसरे राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक स्पेस अपने-आप खुलने लगा है। आज बंगाल में वही स्थिति बनती दिख रही है, जहां भाजपा को जीत के लिए मुस्लिम वोटों की जरूरत नहीं, बल्कि ममता के वोट बैंक के बिखरने की दरकार है। राजनीति का सच यही है कि हर बार जीतने के लिए सबसे ज्यादा वोट पाना जरूरी नहीं होता, कई बार विरोधी के वोट का कटना ही अहम बन जाता है। नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी इसी भूमिका में सामने आ रही हैं। इसके अलावा असदुद्दीन औवेसी भी अलग दम भर रहे हैं। ये दल भले ही सत्ता के दावेदार न हों, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी के परंपरागत वोटों में सेंध लगाकर भाजपा के लिए जीत का रास्ता आसान करने में पूरी तरह सक्षम हैं। 

आज पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में दीदी के नाम से मशहूर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के पिछड़ने की पांच वजह…

एंटी-इंकम्बेंसी का बोझ और ममता की नीतियों से उपजा असंतोष
पश्चिम बंगाल में वर्षों से सत्ता में रहने के कारण ममता बनर्जी की सरकार अब प्रशासनिक थकान का शिकार दिखती है। एक ही नेतृत्व, वही चेहरे और वही शैली, जनता के भीतर असंतोष स्वाभाविक है। यह एंटी-इंकम्बेंसी भाजपा के लिए पहला और मजबूत आधार बनती जा रही है। आज ममता बनर्जी को सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी से मिल रही है। विधायक और नेता सार्वजनिक रूप से बयानबाज़ी कर रहे हैं, जिससे साफ है कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ चुकी है। यह आंतरिक बिखराव भाजपा को स्वाभाविक लाभ पहुंचा रहा है।

मोदी का विकास मॉडल बनाम ममता की तुष्टिकरण की राजनीति
ममता सरकार की एकतरफा तुष्टिकरण नीति ने बहुसंख्यक समाज के साथ-साथ स्वयं अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी सवाल खड़े किए हैं। विकास के बजाय वोट-बैंक की राजनीति ने शासन की विश्वसनीयता को कमजोर किया है, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है। जहां केंद्र में पीएम मोदी की सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग, गरीब कल्याण और डिजिटल गवर्नेंस की बात करती है, वहीं ममता सरकार अक्सर टकराव और विरोध की राजनीति में उलझी दिखती है। विकास बनाम अवरोध की यह लड़ाई भाजपा के पक्ष में जाती दिखाई दे रही है।

महिलाओं के साथ अपराध व कानून-व्यवस्था पर लगातार उठते सवाल
महिलाओं के खिलाफ अपराध, राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात के आरोपों ने राज्य की कानून-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया है। संदेशखाली से लेकर मेडिकल कालेज में गैंगरेप तक कई ऐसे मामले हैं, जो महिला सुरक्षा में ममता सरकार की पूरी पोल खोलते हैं। बल्कि महिलाओं के खिलाफ अपराध में कई जगह तो टीएमसी नेताओं की मिलीभगत भी उजागर हुई है। जब सुरक्षा ही भरोसेमंद न रहे, तो जनता विकल्प तलाशती है। विकल्पों की बात करें तो कांग्रेस पूरी तरह बेदम है और वामपंथी सरकार की करतूतों को बंगाल की जनता पहले ही देख चुकी है। ऐसे में बंगाल की जनता मानने लगी है कि सही विकल्प भाजपा ही है।

भ्रष्टाचार के आकंठ लूट, अब युवा-मध्यम वर्ग का बीजेपी में झुकाव
शिक्षा, भर्ती और प्रशासन से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार के आरोपों ने टीएमसी की नैतिक जमीन हिला दी है। खास बात यह है कि भ्रष्टाचार में ममता सरकार के मंत्रियों की संलिप्तता भी उजागर हुई है। दूसरी ओर पीएम मोदी की ‘भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस’ की छवि बंगाल में भाजपा को नैतिक बढ़त दिला रही है। इस बीच रोजगार, स्टार्टअप और आधुनिक शिक्षा की आकांक्षा रखने वाला युवा वर्ग ममता सरकार से निराश है। पीएम मोदी के नेतृत्व में अवसरों की बात करने वाली भाजपा युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच तेज़ी से अपनी पकड़ बना रही है।

वैकल्पिक नेतृत्व का उभरता भरोसा, राष्ट्रीय विमर्श से कटता बंगाल
सीएम ममता बनर्जी की लगातार केंद्र से टकराव की नीति ने बंगाल को राष्ट्रीय विकास विमर्श से अलग-थलग कर दिया है। इसके उलट भाजपा ‘डबल इंजन सरकार’ का संदेश देकर यह विश्वास दिलाने में सफल हो रही है कि बंगाल भी देश की विकास यात्रा का हिस्सा बन सकता है। ममता बनर्जी की राजनीति अब ‘मैं ही विकल्प हूँ’ के दायरे में सिमटती दिखती है। इसके उलट भाजपा संगठन, नेतृत्व और स्पष्ट रोडमैप के साथ खुद को एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में पेश कर रही है। इन सभी कारकों—एंटी-इंकम्बेंसी, आंतरिक विद्रोह, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास की तुलना ने मिलकर ममता बनर्जी के सिंहासन को डगमगाया है। पीएम मोदी के नेतृत्व में भाजपा इस असंतोष को राजनीतिक परिवर्तन में बदलने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाती दिख रही है।

मुस्लिम वोट बैंक का औजार अब ममता बनर्जी के हाथ से फिसल रहा
दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति में यदि किसी एक स्तंभ ने ममता बनर्जी को पिछले डेढ़ दशक तक सत्ता में टिकाए रखा है, तो वह है मुस्लिम वोट बैंक। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि चुनावी गणित का सबसे स्थापित सच है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग तीस प्रतिशत है और मतदाता सूची में भी यह अनुपात लगभग उतना ही माना जाता है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता का निर्णायक औजार बनते रहे हैं। लेकिन यही औजार अब ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता दिख रहा है। बल्कि यदि यह कहें कि यही औजार अगले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल होगा, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। टीएमसी को इस चुनाव में एंटी इन्कंबेंसी का डर तो सता ही रहा है। इसके साथ ही उसे मुस्लिम वोट बैंक के भी खिसकने का डर लगा रहा है। दरअसल, विधानसभा चुनाव के लिए मुस्लिम वोट बैंक की बाड़ेबंदी चारों ओर से हो रही है, जिसका इस्तेमाल ममता बनर्जी के खिलाफ होगा। इसमें दो मुस्लिम विधायकों और कुछ संगठनों के अलावा असदुद्दीन ओवैसी का पार्टी भी अहम किरदार निभा सकती है।

इतनी सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक, ममता की सबसे मजबूत किले में दरार
पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में लगभग 90 से 100 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इनमें से करीब 40 से 45 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम वोट का रुख सीधे तौर पर हार-जीत तय करता है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने अब तक इन्हीं सीटों को अपनी चुनावी रीढ़ बनाकर रखा है। 2011 से 2021 तक का हर चुनावी परिणाम इस बात की पुष्टि करता है कि मुस्लिम वोटों का लगभग एकतरफा झुकाव टीएमसी की ओर रहा है। लेकिन इस बार ममता बनर्जी अपनी तुष्टिकरण की राजनीति में फंस गई हैं। दरअसल, ममता बनर्जी की राजनीति ने मुस्लिम समाज को अधिकारों से अधिक प्रतीकों में उलझाए रखा। योजनाओं, नारों और बयानों का शोर बहुत रहा, लेकिन जमीनी स्तर पर मुस्लिमों के लिए शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा जैसे मूल प्रश्न जस के तस बने रहे। नतीजा यह हुआ कि वही मुस्लिम समाज, जिसे ममता ने अपनी ढाल बनाया था, अब तृणमूल सरकार से सवाल पूछने लगा है।

हुमायूं से मोनिरुल तक बढ़ती मुसीबत, मुस्लिम राजनीति का नया बिखराव
टीएमसी के भीतर से उठती आवाज़ें इस टूटन की सबसे बड़ी गवाही हैं। पहले हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद के नाम पर शिलान्यास कर ममता को असहज स्थिति में डाला। फिर मोनिरुल इस्लाम ने चुनाव आयुक्त को खुलेआम धमकी देकर राज्य की कानून-व्यवस्था और राजनीतिक संस्कारों पर सवाल खड़े कर दिए। ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि उस अंदरूनी बेचैनी का संकेत हैं, जो अब खुलकर सामने आ रही है। इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी भी ममता के वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में हैं। यही वह जमीन है, जहां ममता बनर्जी का मुस्लिम वोट बैंक टूटता दिख रहा है। हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी, नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट और औवेसी की एआईएमआईएम इसी बिखराव का राजनीतिक रूप हैं। ये दल मुस्लिम समाज के भीतर यह संदेश दे रहे हैं कि ममता बनर्जी ही एकमात्र विकल्प नहीं हैं। यह संदेश भले ही अभी सीमित दिखे, लेकिन चुनाव में सीमित संदेश भी भारी नुकसान कर जाता है।

ISF, AIMIM और JUP की तिकड़ी ममता के वोट बैंक में लगाएगी सैंध
नौशाद सिद्दीकी पहले ही विधानसभा में ममता की नीतियों को चुनौती दे चुके हैं। उनकी पार्टी ISF का प्रभाव दक्षिण बंगाल के कई मुस्लिम बहुल इलाकों में देखा जा रहा है। वहीं हुमायूं कबीर की JUP स्थानीय स्तर पर असंतोष को हवा दे रही है। ओवैसी की पार्टी भी इस बार ज्यादा सीटों पर लड़ने के मूट में है। ऐसे में ये तीनों ताकतें भले ही सत्ता के दावेदार न हों, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का वोट काटने की भूमिका में बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं—खासकर उन सीटों पर जहां जीत का अंतर कम रहा है। भाजपा भले ही मुस्लिम वोटों की बड़ी हिस्सेदारी न पाए, लेकिन उसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि ममता का एकतरफा समर्थन टूटे। त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले में टीएमसी को नुकसान होना तय है और अगले चुनाव में यही होने जा रहा है। इसी को देखते हुए राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि इस बार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सबसे बड़ा झटका विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही बनाए गए वोट बैंक के बिखराव से लगने वाला है।

ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी टीएमसी को मुश्किलें में डालेगी

ममता बनर्जी से मुस्लिम वोट बैंक के छीनने के एक और खिलाड़ी हैं- असदुद्दीन ओवैसी। औवेसी की पार्टी AIMIM पिछले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपने सात उम्मीदवार उतारे थे। एआईएमआईएम के सातों उम्मीदवार ऐसी सीटों से थे, जो मुस्लिम बहुत मानी जाती हैं। ये विधानसभा सीट थीं, ईथर सीट, जलंगी, सागरदिघी, भरतपुर, मालतीपुर, रतुआ और आसनसोल उत्तर। इस बार के चुनाव में भी ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम, टीएमसी की वोट में सेंध लगा सकती है। दरअसल बंगाल में मुस्लिम वोटर्स की संख्या लगभग 30 फीसदी है और ऐसे में इनकी भूमिका अहम हो जाती है। सीटों का सियासी गणित ऐसा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा से पहले 2016 के विधानसभा चुनाव में भी जीत हासिल की थी। तब टीएमसी ने सबसे ज्यादा 211 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।

भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताने का नैरेटिव तोड़ा
ममता बनर्जी की सियासी मुश्किलें अब विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी ही पार्टी की ज़ुबान से बढ़ रही हैं। तृणमूल के विधायक मनोरंजन बापरी का भाजपा कार्यकर्ताओं की “विनम्रता और दरियादिली” की खुलेआम तारीफ करना कोई सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली चेतावनी है। इससे पहले हुमायूं कबीर और मोनिरुल इस्लाम जैसे विधायक अपने बयानों और कृत्यों से मुख्यमंत्री की किरकिरी करा चुके हैं। अब बापरी का यह सार्वजनिक बयान उस नैरेटिव को तोड़ता है, जिसमें भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताया जाता रहा। जब सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही विरोधी की छवि चमकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ रही है।

हरियाणा हार से कांग्रेस चौराहे पर, चार महीने में ही खटाई में ‘I.N.D.I. Alliance', 'खटाखट' का फायदा लेकर अखिलेश यादव ने राहुल को दिखाया आइना


चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात या फिर मतलब और निजी स्वार्थ पर टिकी दोस्ती ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहती। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की 'खटाखट' नौटंकी का सबसे ज्यादा फायदा समाजवादी पार्टी को  मिला लेकिन हरियाणा में कांग्रेस को मिली हार ने 
‘I.N.D.I. Alliance' को ही चौराहे पर ला दिया। अगर कांग्रेस ने 'खटाखट' नौटंकी नहीं की होती कांग्रेस को 30 या 32 से ज्यादा सीटें नहीं भले ही कम हो गयी होती। यही वजह है कि आज हर पार्टी अपने आपको कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास कर रही है। गठबंधन होने के बावजूद राहुल को अपनी रैलियों में राहुल को दूर रखने की कोशिश है। राजनीतिज्ञों का यह भी कहना कि वायनाड से प्रियंका वाड्रा को ही हराने का कांग्रेस में षड़यंत्र चल रहा है, क्योकि अगर प्रियंका जीतती है तो राहुल का महत्व कम हो जाएगा।  

लोकसभा चुनाव में केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए जो इंडी गठबंधन बनाया गया था, वो चार माह बाद ही दो राज्यों में तो छिन्न-भिन्न होने लगा है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के उप चुनाव में इंडी गठबंधन के दल अपनी ढपली, अपने राग पर उतर आए हैं। उप चुनाव की सीटों पर एकजुट होकर लड़ने के लिए इंडिया गठबंधन में सहमति नहीं बन पाई है। इसके चलते गठबंधन की कुछ पार्टियों ने तो एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतार दिए हैं। इन दोनों राज्यों की 16 विधानसभा सीटों पर अगले माह होने जा रहे उप चुनाव में कांग्रेस को इंडी गठबंधन के प्रत्याशियों से भी कड़ी टक्कर मिलेगी। 

हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की खराब स्थिति के साथ सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने गठबंधन को आंखें दिखा दी हैं। अब उपचुनाव को लेकर उन्होंने बड़ा ऐलान कर दिया है कि उनकी पार्टी अकेले ही सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करेगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ बनाया इंडिया गठबंधन राजस्थान में विधानसभा उपचुनाव में टूट गया है। प्रदेश में 7 सीटों पर हो रहे उपचुनाव में कांग्रेस ने अपने सहयोगी आरएलपी और बीएपी के साथ सीटों का बंटवारा नहीं किया है। बीएपी पहले दो सीटों पर उम्मीदवार उतार कर आमने-सामने की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।

उत्तर प्रदेश की सभी 9 सीटों पर समाजवादी पार्टी से प्रत्याशी उतारे
उत्तर प्रदेश की 9 विधानसभा सीटों पर 13 नवंबर को उपचुनाव का मतदान होने वाला है। अखिलेश यादव ने एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि सभी 9 सीटों पर गठबंधन के उम्मीदवार सपा के पार्टी सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबी पोस्ट के जरिए अखिलेश यादव ने उपचुनाव को लेकर अपनी तरफ से उम्मीदवारों के खड़े करने को लेकर ऐलान किया। सपा प्रमुख को इस कारण अहम माना जा रहा है क्योंकि सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और सपा में लंबे समय से खींचतान देखी जा रही है। इस बीच अखिलेश यादव का ऐलान यूपी की राजनीति इंडिया गठबंधन की टायं-टायं फिस्स हो गई है। यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के पहले प्रदेश में हो रहे इस बड़े चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपने-अपने दावे करते दिख रही है। कांग्रेस जहां इंडिया गठबंधन में बराबरी की हिस्सेदारी की मांग और उम्मीद कर रही थी। वहीं, हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की खराब स्थिति के बाद सपा ने गठबंधन में अपनी स्थिति को मजबूत कर दिया।

लोकसभा चुनाव में हार-जीत के प्रतिशत ने बदल दिया माहौल
लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इंडिया एलायंस के तहत साथ-साथ आए थे। हालांकि, दोनों दलों के बीच इससे ठीक पहले हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान खींचतान चरम पर दिखी थी। ऐसे में लोकसभा चुनाव के दौरान सपा ने 63 और कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा। सपा ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, कांग्रेस को मात्र 6 सीटों पर जीत मिली। समाजवादी पार्टी की जीत का प्रतिशत लगभग 59 फीसदी रहा। वहीं, कांग्रेस ने दी गई सीटों के 35 फीसदी पर जीत दर्ज करने में सफलता हासिल की। यूपी विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने 5 सीटों की मांग शुरू कर दी थी, लेकिन सपा इस पर तैयार होती नहीं दिखी।

उत्तर प्रदेश में हार के डर से कांग्रेस ने कदम पहले ही पीछे खींचे
यूपी विधानसभा उपचुनाव के साथ महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं। वहां पर महा विकास अघाड़ी में सीटों के बंटवारे पर आखिरी समय में सहमति बनती दिख रही है। अखिलेश यादव वहां 12 सीटों की डिमांड कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस ने यूपी में मिल रही सीटों पर अपनी कमजोर स्थिति को देखते हुए कदम पीछे खींचने का निर्णय लिया। सपा पहले से महाराष्ट्र में पांच सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है। एमवीए के तीनों सहयोगी दलों कांग्रेस, शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और एनसीपी शरद पवार गुट के बीच 85-85 सीटों पर समझौता हुआ है। ऐसे में सपा के पाले में कितनी सीटें जाएंगी, यह कांग्रेस तय करेगी। राष्ट्रीय स्तर पर सपा से गठबंधन के बावजूद यूपी में कांग्रेस की स्थिति बदतर हो रही है। इसके पीछे यूपी में लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत कम सीटें, हरियाणा में हार और जम्मू-कश्मीर में कमजोर प्रदर्शन को जिम्मेवार ठहराया जा रहा है।

अखिलेश यादव ने राजनीति की शतरंज की बिसात पर राहुल गांधी को दी मात
दरअसल, अखिलेश यादव ने राजनीति की शतरंज की बिसात पर राहुल गांधी को मात दे दी। सपा ने कांग्रेस के लिए गाजियाबाद सदर और अलीगढ़ की खैर विधानसभा सीट छोड़ी थी। तमाम राजनीतिक रणनीतिकार और कांग्रेस पार्टी भी दोनों को ऐसी सीट मान रही थी, जिसे कांग्रेस के लिए जीतना लगभग नामुमकिन है। भाजपा इन सीटों पर लगातार जीत दर्ज करती रही है। इसलिए कांग्रेस ने इन सीटों से चुनाव लड़ने के लिए हाथ खड़े कर दिए। कांग्रेस ने इस प्रकार की स्थिति को देखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए। पिछले दिनों खबर आई कि अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच सीट शेयरिंग को लेकर बातचीत हुई। इसमें कांग्रेस को एक और सीट दिए जाने की भी बात कही गई। लेकिन, दोनों दलों के बीच बात नहीं बनी। इसका असर यूपी चुनाव 2027 में दिखेगा। अगर गठबंधन चलता है तो कांग्रेस उसमें भी आधी सीटों पर दावा कर देगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उपचुनाव में कांग्रेस का कदम पीछे खींचना अखिलेश यादव के गठबंधन पॉलिटिक्स पर असर डाल सकती है।

अखिलेश का मंत्र- गठबंधन नहीं, उप चुनाव में जीतता है ज्यादा जरूरी
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए साफ किया कि बात सीट की नहीं जीत की है। इसके मायने साफ हैं कि उन्हें भी यकीन है कि कांग्रेस यूपी में उप चुनाव जीत नहीं पाएगी। इस रणनीति के तहत ‘इंडिया गठबंधन’ के सभी 9 सीटों पर समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘साइकिल’ के निशान पर चुनाव लड़ेंगे। अखिलेश के बयानों को कांग्रेस अन्य राज्यों में आधार बना सकती है, जहां पर पार्टी का कैडर कुछ खास नहीं है। साथ ही, अखिलेश की चुनौती विधानसभा चुनाव 2027 के दौरान भी बढ़नी तय है। दरअसल, यूपी की 10 सीटों पर उपचुनाव होना है । इसमें मैनपुरी की करहल, कानपुर की सीसामऊ, प्रयागराज की फूलपुर, अंबेडकरनगर की कटेहरी, मिर्जापुर की मझवां, अयोध्या की मिल्कीपुर, गाजियाबाद सदर, अलीगढ़ की खैर, मुजफ्फरनगर की मीरापुर और मुरादाबाद की कुंदरकी सीट शामिल हैं। अयोध्या की मिल्कीपुर सीट को छोड़कर सभी 9 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं।

उपचुनाव में राजस्थान में इंडिया गठबंधन टूटने से प्रत्याशी आमने-सामने
उत्तर प्रदेश की तरह ही राजस्थान के उपचुनाव में भी इंडिया गठबंधन टूट गया है। लोकसभा चुनाव में साथ रहे कांग्रेस और सहयोगी दलों के उम्मीदवार अब उप चुनाव में आमने-सामने आ गए हैं। कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ बनाया इंडिया गठबंधन राजस्थान में विधानसभा उपचुनाव में टूट गया है। प्रदेश में 7 सीटों पर हो रहे उपचुनाव में कांग्रेस ने अपने सहयोगी आरएलपी और बीएपी के साथ सीटों का बंटवारा नहीं कर पाई। आरएलपी ने कांग्रेस के टिकटों की घोषणा होने के बाद गुरुवार को खींवसर में प्रत्याशी की घोषणा कर दी। सींवसर में अब भाजपा, कांग्रेस और बेनीवाल की पत्नी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा।

कांग्रेस से नाता तोड़ बीएपी ने भी उप चुनाव में दो प्रत्याशी उतारे
उधर, भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) पहले दो सीटों पर उम्मीदवार उतार चुकी थी। लोकसभा चुनाव में यह कांग्रेस गठबंधन के साथ थी, लेकिन अब राह बदल ली है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बने इंडिया गठबंधन के तहत कांग्रेस ने नागौर लोकसभा सीट आरएलपी के लिए छोड़ी थी। वहीं, बांसवाड़ा सीट पर बीएपी को समर्थन का ऐलान किया था। इसी तरह बागीदौरा विधानसभा सीट पर बीएपी को समर्थन दिया था। इस उपचुनाव में सीट गठबंधन पर बात नहीं बनी। कांग्रेस ने टिकट वितरण में सांसदों वाली सीट पर उन्हें उम्मीदवार उतारने के लिए अधिकृत किया था। रामगढ़ में दिवंगत विधायक पुत्र को टिकट देना तय था। शेष तीन सीटों सलूंबर, चौरासी और खींवसर पर राज्य के नेताओं को चयन की कमान सौंपी गई थी। खींवसर में प्रदेशाध्यक्ष गोविंद डोटासरा मुख्य भूमिका में रहे। वहीं सलूंबर और चौरासी में नए चेहरों पर दांव खेला गया है।

पंजाब : कांग्रेस के बाद अब AAP में घमासान, मुख्यमंत्री चेहरा घोषित नहीं करने पर भगवंत मान नाराज

पंजाब कांग्रेस में चल रहा सियासी तूफान फिलहाल टल जरूर गया है, लेकिन ख़त्म नहीं हुआ है, क्योकि  पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के बगावती तेवरों ने साफ कर दिया कि आगे चलकर कांग्रेस का चुनावी सफर मुश्किल होने वाला है। उधर आम आदमी पार्टी में भी तूफान आने से पहले के संकेत दिखाई दे रही है, लेकिन अंदर-ही-अंदर सियासी घमासान जारी है। अभी तक मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करने से नाराज भगंवत मान ने पार्टी के कार्यक्रमों से दूरी बना ली है। वहीं उनके समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के लिए मुहिम चला रहे हैं।  

भगवंत मान को आखिरी बार 26 अगस्त को पंजाब में दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में देखा गया था, लेकिन तब से अब तक वह पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए हैं। हकीकत यह है कि प्रमुख अरविंद केजरीवाल भगवंत मान को पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने की बजाए किसी और पार्टी या सामाजिक संगठन से बड़े चेहरे की तलाश में है। दूसरी ओर, पंजाब आप के एक बड़े धड़े का कहना है कि पिछले सात सालों से पार्टी में सबसे सक्रिय रहने वाले भगवंत मान को दरकिनार किया जा रहा है।

भगवंत मान के समर्थक उनको दरकिनार किए जाने से नाराज हैं। समर्थकों का कहना है कि जब पार्टी के पास भगवंत मान जैसा सशक्त उम्मीदवार मौजूद है तो हम दूसरी पार्टियों में मुख्यमंत्री क्यों खोज रहे हैं? यही गलती हमने 2017 में भी की थी। आम आदमी पार्टी के कम से कम 5 से 6 विधायकों ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि भगवंत मान को पंजाब में मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में पेश किया जाना चाहिए। इस मांग को लेकर मान समर्थकों ने पंजाब विधानसभा में आम आदमी पार्टी के नेता विपक्ष हरपाल सिंह चीमा के सरकारी घर के बाहर प्रदर्शन किया था। 

फिलहाल भगवंत मान शांत हैं, लेकिन उन्‍होंने पंजाब के नए मुख्‍यमंत्री चन्‍नी को बधाई देकर राजनीतिक गलियारे में हलचल जरूर तेज कर दी है। वो खुद खुलकर नहीं बोल रहे हैं, लेकिन अपने समर्थकों के माध्यम से पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। पार्टी के एक सीनियर विधायक ने कहा कि यह ठीक है कि मान पार्टी में ही बहुत लोगों को नाराज करके बैठे हैं लेकिन उनके बिना भी बात नहीं बनेगी। ऐसे में अगर पार्टी किसी दूसरे को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाती है, तो मान शांत नहीं बैठ सकते हैं और आम आदमी पार्टी की पंजाब ईकाई में सियासी उठा-पटक देखने को मिल सकता है।