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“हँस के लिया पाकिस्तान कहने वाले सुनो ! “—-“नही मिलेगा हिंदुस्तान, जाना होगा पाकिस्तान"

श्यामसुंदर पोद्दार, उगता भारत              31जनवरी को सावरकर के घर की  तलाशी ली गयी। उनके 10 हज़ार पत्र पुलिस जब्त करके ले गई। 1 फ़रवरी 1948 से लेकर 5 फ़रवरी तक समस्त देश में हिन्दु महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का भीषण  दौर चला। जिस पर तनिक भी संदेह हुआ अथवा किसी कांग्रेसी को किसी साधारण व्यक्ति से अपना बैर चुकाना था तो उसको हिन्दूसभाई बनाकर बंदी बनवा दिया। इस प्रकार 25 हज़ार लोगों  को जबरन जेल में ठूँस दिया गया। उनमें बहुत से तो समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया।

हिन्दु महासभा के सर्वोच्च नेता व भारतीय राष्ट्रीय सेना के रूपकार वीर सावरकर जी को बिना किसी  कारण के 5 फ़रवरी 1947 को मुँह अंधेरे पुलिस की गाड़ी आई और पुलिस अधिकारी ने सावरकर जी से कहा “बम्बई  पब्लिक सिक्योरिटी मेजर्स ऐक्ट में आपको बंदी बनाया जा रहा है। इसके  पहले ४ फ़रवरी की रात्रि एक डॉक्टर ने आकर उनका निरीक्षण -परीक्षण किया तथा बता दिया कि सावरकर सब प्रकार से स्वस्थ हैं। जबकि विगत एक वर्ष से सावरकर क्षीण ज्वर व हृदय की पीड़ा से ग्रस्त थे। जिस समय डॉक्टर उनका निरीक्षण कर रहा था उस समय भी उनको ज्वर था। यह क़ानून तो नेहरू के उन गुंडों पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के 17,000 चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। 5 फ़रवरी 1948 से 23 मार्च 1948 तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के १७००० चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। ५ फ़रवरी १९४८ से २३ मार्च १९४८ तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
अंत में  11 मार्च 1948 को दिल्ली के मजिस्ट्रेट के आदेश से गाँधी वध षडयंत्र  में सावरकर को प्रमुख बता कर  उन्हें पुनः आर्थर रोड कारागार में लाया गया। उनकी ज़मानत की प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई। हाँ, उनके वकील श्री  देवधर को इस बात में सफलता  मिली कि उनकी पत्नी व पुत्र उनसे भेंट कर सकते हैं। उनके प्रयत्न से सावरकर अपने पुत्र को अपने घर के संचालन हेतु ” पावर आफ अटर्नी” देने में सफ़ल रहे।
“I want blood of Savarkar”: जवाहरलाल नेहरू 
24 मई 1948 सावरकर को दिल्ली लाया गया तथा लाल क़िले में अन्य अभियुक्तों के साथ बंदी बना कर रखा गया। सावरकर की ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त सम्पति महाराष्ट्र के गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने वापस करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि सावरकर ने पहले से भी गम्भीर अपराध किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में डॉक्टर अम्बेडकर को गाँधी हत्या में झूठा फंसाने का प्रतिवाद किया। नेहरू ने डॉक्टर अम्बेडकर से कहा “I want blood of Savarkar”। डॉक्टर अम्बेडकर ने नेहरू को जवाब दिया कि तुम सावरकर का बाल बाँका भी नही कर सकते। डॉक्टर अम्बेडकर ने सावरकर के वकील से मिलकर कहा कि घबराओ नही, नेहरू ने सावरकर को झूठा फँसाया है। राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर भी 4 फ़रवरी 1948 को प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे तो इन 25 हज़ार क़ैद किये गये कार्यकर्ताओं में बहुसंख्यक हिन्दू महासभा के थे, पर राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के भी कम नही थे। जिनमें से  बाद में बहुत से छोड़ दिए गए। पर 500 स्वयंसेवकों को फिर भी बंदी बना कर रखा। संघ ने पटेल के कहे अनुसार अपना संविधान बनाने पर संघ पर से प्रतिबंध हटा दिया गया। पर हिन्दु महासभा के प्रति 1952 के चुनाव तक नेहरू -पटेल का शख़्त रवैया रहा। हिन्दु महासभा के सावरकर के अलावा सभी के सभी सर्वोच्च नेता यथा महंत दिग्विजयनाथ,आशुतोष लाहिरी,प्रोफ़ेसर  राम सिंह देशपांडे, निर्मल चंद् चटर्जी अन्य सारे ज़ैल में डाल दिए गए। क़ानून उनके पक्ष में था इसलिए वे अदालत से छूट जाते, पर उन्हें फिर गिरफ़्तार कर लिया जाता। हिन्दु महासभा के कार्य कर्ताओं पर सरकार लाठी चार्ज करती। वे मिठाइयाँ बाँट रहे थे । सरकार के देश विभाजन जैसे ग़द्दारी पूर्ण कार्य का प्रतिवाद करने को वे घृणा फैला रहे थे। संघ का सामूहिक गीत पाठ भी अपराध था।

नेहरू के समान पटेल भी हिन्दू महासभा के मामले में समान दोषी हैं। पटेल नेहरू के हिन्दु महासभा पर किये जा रहे अत्याचारों में इसलिए साथ दे रहे थे क्योंकि नेहरू तो टेम्परेरी प्रधानमन्त्री था। बाद में तो पटेल को ही होना था। कांग्रेस अध्यक्ष जो चुना जायेगा, वही कांग्रेस का प्रधानमंत्री बनेगा। नेहरू कॉंग्रेस का बहुत छोटा सा नेता था। उससे बड़े सरदार पटेल तो थे डॉक्टर राजेंद्र  प्रसाद,आचार्य कृपलानी नेहरू से कांग्रेस में बहुत बड़ा क़द रखते थे। अंग्रेजों ने गाँधी से साफ़ साफ़ कह दिया कि हम पटेल के हाथ में सत्ता नही देंगे, नेहरू के हाथ में देंगे। इस बात का खुलासा गाँधी ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के सम्पादक के एक प्रश्न के उत्तर में दिया था। एक मात्र नेहरू ही हमारे कैम्प  में अंग्रेजों का आदमी था ।(Nehru was the only Englishman in our camp). यदि राजगोपलाचारी पटेल की मृत्यु पर यह नही कहते पटेल को तो प्रधान मन्त्री बनना था। यानी नेहरू अस्थायी प्रधानमन्त्री था।
पटेल ने गाँधी वध के 28 दिन बाद नेहरू को 27 फरवरी 1948 के लिखे पत्र में लिखा कि इस कांड में सिर्फ़ दस आदमी संलिप्त हैं जिनमें से 8 पकड़ लिये गये हैं और 2 भागे हुवे हैं। तब पटेल से सवाल पूछता हूँ कि 25,000 हिन्दु महासभा व संघ के कार्यकर्ताओं को 1951 तक जेल में बंदी बना कर क्यों रखा? पटेल ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एरिक्वेस्ट वे दिल्ली में हिन्दु महासभा की कार्यकारिणिकी सभा बुलाना चाहते हैं। पटेल ने मना कर दिया। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 4 मई 1948 को पटेल को लिखे पत्र में सावरकर के बारे में लिखा कि ऐसा न हो , उनको मत विरोध के चलते दंडित किया जा रहा हो ? पटेल ने इसके उत्तर में 6 मई 1948 को जवाब दिया कि ऐसा कभी भी नही होगा। मैं स्वयं इस केस को देख रहा हूँ। मैंने साफ़ – साफ़ आदेश दे दिया है। सावरकर का गाँधी हत्या मामले में निष्कलंक बरी हो जाना व जज अतमाचरण का यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। नेहरू-पटेल के मुँह पर ज़बरदस्त तमाचा है। नेहरू यही शांत नही हुए। सावरकर के लाल क़िला से निकलने को देखने के लिये ३ लाख हिंदू लाल क़िले पर इकट्ठे हो गए। नेहरू ने मजिस्ट्रेट के आदेश से लालक़िले के बाहर जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया ?

इतना ही नही कुछ घंटो बाद “Punjab Public Security Majors Act”उन पर लागू करके तीन मास तक उनके दिल्ली मे प्रवेश व निवास पर प्रतिबंध लगा दिया।गुपचुप  तरीक़े से रेल में सावरकर जी को बैठा कर नेहरू सरकार ने उन्हें बम्बई पहुँचाया।
उनके घर से निकलने पर  प्रतिबन्ध लगा दिया। कुछ समय बाद पंजाब पब्लिक सिक्यरिटी मेजर्स ऐक्ट लगा कर तीन महीने के लिये दिल्ली में रहने व प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। नेहरू सरकार गुप-चुप तरीक़े से रेल द्वारा इन्हें बम्बई पहुँचाई। 1949 कलकत्ता में  सम्पन्न हुए हिन्दू महासभा सम्मेलन में उमड़े जनसैलाब को देखकर नेहरू घबड़ा गया। 1950 में झूठा आरोप हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध भड़काने के आरोप में बन्दी बना लिये गये। बेल में सरकार ने शर्त लगा दी कि आप राजनीति नही कर सकते। ब्रिटिश भारत में भी राजनीति करने पर प्रतिबंध। स्वाधीन भारत में भी प्रतिबंध। यही है नेहरू का गणतंत्र ? 1952 के चुनाव के कुछ महीना पहले  यह प्रतिबंध हटा। नाथूराम गोडसे सुभाष वादी था। इसलिए जिस समाचार पत्र का वह संचालन करता था उसका नाम अग्रणी था means Forward। वह पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे जुर्म प्रकाशित करता था। नेहरू-पटेल सरकार ने प्रेस सेन्सरसिप ऐक्ट कड़ाई से लागू कर रखा था, ताकि पाकिस्तान में चल रहे हिंदुओं का नरसंहार हिंदुस्तान के समाचार पत्रों में प्रकाशित न हो सके। नाथूराम गोडसे गाँधी को मारने दिल्ली नही आया था, उसके समाचार पत्र पर मोरारजी देसाई ने बड़ी पेनल्टी लगा दी थी। उसी की शिकायत गृहमंत्री से करने आया था। बाद में दिल्ली में पाकिस्तान से आये हिन्दुओं की हालत देख कर विचलित हो गया। उस हालत का एक मात्र ज़िम्मेदार गाँधी को मानकर गाँधी को मार डाला।     
नेहरू हिन्दु महासभा के साथ इतना करने पर भी कांग्रेस की जीत के प्रति आश्वस्त नही थे। जिन्ना ने स्पष्ट घोषणा कर दी थी कि हिन्दु मुसलमानों की अदला बदली करो। हमारे पाकिस्तान में हम हिन्दुओं को रहने नही देंगे। नही करोगे तो नोवाखाली की तरह क़त्ले आम करेंगे । उसने जिन्ना की घोषणा अनसुनी कर दी। जिन्ना हिंदुओं का क़त्ले आम पाकिस्तान में आराम से करे हिंदुस्तान में प्रेस सेन्सर शिप लागू कर दी। जिन्ना ने 20 लाख हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। पाकिस्तान लगभग हिन्दु शून्य कर डाला। नेहरू-पटेल का 1952 में अपनी हिन्दु महासभा के सामने हार से भयभीत थे वे जानते थे कि 1945 में हिन्दु महासभा को 14 प्रतिशत वोट मिले थे जो कांग्रेस के हिंदुओं के साथ विश्वासघात के बाद हिन्दु महासभा को ही मिलने हैं।
इतना ही नही, भारत का विभाजन कराके पाकिस्तान बनाने वाली मुस्लिम लीग के नेता जिन्होंने ग्रेट कलकत्ता किलिंग, नोवाखाली हिन्दु किलिंग पंजाब उत्तर प्रदेस बम्बई हिन्दू किलिंग किया बची हुई मुस्लिम लीग को कांग्रेस में मिला दिया। उनके नेताओं को केंद्रीय मंत्री, राज्यों में मंत्री , गवर्नर और राजदूत बनाया।(साभार)

बाबा साहेब ने कहा था- धारा 370 भारत के साथ विश्‍वासघात

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
संविधान निर्माता और भारत के पहले कानून मंत्री बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अनुच्‍छेद 370 के धुर विरोधी थे। उन्‍होंने इसका मसौदा तैयार करने से इनकार कर दिया था। आंबेडकर के मना करने के बाद शेख अब्‍दुल्‍ला नेहरू के पास पहुंचे और प्रधानमंत्री के निर्देश पर गोपालस्‍वामी अयंगर ने मसौदा तैयार किया था। 5 और 6 अगस्त 2019 की तारीख में स्वतंत्र भारत का नया इतिहास लिख दिया गया, जब संसद के दोनों सदनों ने अनुच्छेद को समाप्त ही किया बल्कि इस समस्या पर अपना जीवन को बलिदान करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की। 17 अक्टूबर 1949 को संविधान में राष्ट्रपति के आदेश से जोड़े गये अनुच्छेद 370 को उसी तरीके से खत्म कर दिया गया।
अब्‍दुल्‍ला को लिखा पत्र
Related imageअब्‍दुल्‍ला को अनुच्‍छेद 370 पर लिखे पत्र में आंबेडकर ने कहा था कि आप चाहते हैं कि भारत जम्‍मू-कश्‍मीर की सीमा की रक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज सप्‍लाई करे। साथ ही कश्‍मीर को भारत के समान अधिकार मिले, लेकिन आप चाहते हैं कि कश्‍मीर में भारत को सीमित शक्तियां मिलें। ऐसा प्रस्‍ताव भारत के साथ विश्‍वासघात होगा, जिसे कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्‍वीकार नहीं करूंगा।
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पटेल को नहीं किया था सूचित
नेहरू ने पटेल को सूचित किए बिना ही शेख अब्‍दुल्‍ला के साथ अनुच्‍छेद 370 के मसौदे को अंतिम रूप दिया। संविधान सभा की चर्चा में मसौदे को पारित करवाने की जिम्‍मेदारी गापालस्‍वामी अयंगर को मिली। लेकिन प्रस्‍ताव को सभ में मौजूद सदस्‍यों द्वारा फाड़ दिया गया। उस समय प्रधानमंत्री नेहरू अमेरिका में थे। सरदार और अब्‍दुल्‍ला के रिश्‍ते ठीक नहीं थे। ऐसे में अयंगर ने मदद के लिए वल्‍लभभाई पटेल को रुख किया। उन्‍होंने पटेल से कहा कि यह मामला नेहरू के अहम से जुड़ा है, नेहरू ने शेख को उनके अनुसार ही फैसले लेने को कहा है। लिहाजा, वल्‍लभभाई पटेल ने मसौदे को स्‍वीकृति दे दी।
हुआ था भारी विरोध
हालांकि, जब पटेल ने कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में मसौदे को पेश किया तो सभी ने इसका भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बताया। यहां तक कि भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने भी इसका विरोध किया था।
कौन थे गोपालस्‍वामी अयंगर
Image result for गोपालस्‍वामी अयंगरगोपालस्‍वामी अयंगर का जन्‍म 31 मार्च 1882 को तमिलनाडु में हुआ था। 1905 में वह मद्रास सिविल सेवा में शामिल हुआ और डिप्‍टी कलेक्‍टर और राजस्‍व बोर्ड के सदस्‍य सहित कई पदों पर रहे। वह संविधान सभा सदस्‍य भी थे। इसके साथ ही वह उस प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख भी थे जिसने कश्‍मीर पर लगातार विवाद में संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत का प्रतिनिधित्‍व किया। अयंगर को 1937 में दीवान बहादुर की उपाधि से सम्‍मानित किया गया था। यह एक ब्रिटिश वायसराय द्वारा दिया गया सर्वोच्‍च खिताब थे। 1941 में, उन्‍होंने किंग जॉर्ज षष्‍टम से नाइटहुड प्राप्‍त किया। वह जम्‍मू-कश्‍मीर के महाराज हरि सिंह के दीवान भी रहे। 10 फरवरी, 1953 को उनका देहातं हो गया।
संयुक्‍त राष्‍ट्र पहुंचा जम्‍मू-कश्‍मीर का मामला
यह माउंटबेटन थे, जिन्‍होंने नेहरू को जम्‍मू-कश्‍मीर के मुद्दे को संयुक्‍त राष्‍ट्र में ले जाने के लिए राजी किया था। इसलिए तो पाकिस्‍तान बार-बार कहता है कि कश्‍मीर विवाद को भारत ही संयुक्‍त राष्‍ट्र लेकर गया था। गौरतलब है कि गृह मंत्री शाह ने राज्यसभा में कहा कि हम वही तरीका अपना रहे हैं जो 1952 व 1962 में कांग्रेस ने अपनाया था। तत्कालीन कांग्रेस सरकारों ने अधिसूचना के माध्यम से ही इस अनुच्छेद में संशोधन किए थे। सपा के प्रो. राम गोपाल यादव ने इस पर शाह से पूछा था कि क्या बगैर संविधान संशोधन विधेयक लाए संविधान में संशोधन हो सकता हो सकता है? इस पर शाह ने उक्त स्पष्टीकरण दिया।
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जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने के भारत के फैसले से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। पाकिस्तान ने अगस्त 6 को ही भारत ...

हमारी मूर्तियों को फिजुलखर्जी बताने वाले माफी मांगें-- सरदार पटेल की मूर्ति पर मायावती

BSP supremo Mayawatiगुजरात में देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण होने के बाद सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती ने बुधवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से माफी की मांग की। बता दें कि गुजरात में सरदार सरोवर बांध के समीप बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का मायावती ने कहा, 'देश के लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि भाजपा यदि वास्तव में सरदार पटेल को पसंद करती है तो उसने गुजरात में जहां वह इतने सालों से सत्ता में है, इससे पहले उनकी विशालकाय मूर्ति स्थापित क्यों नहीं कराई।'अनावरण किया। इसके साथ ही यह प्रतिमा अब दुनिया की सबसे ऊंची स्टैच्यू बन गई है।
मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश में जब उनकी सरकार थी तो उनकी सरकार ने दलित नेताओं की मूर्तियों का निर्माण कराया था जिसे लेकर उनकी और उनकी सरकार की काफी आलोचना की गई। मायावती ने अपने एक बयान में कहा, 'भाजपा और आरएसएस के उन सभी लोगों को बहुजन समाज से माफी मांगने चाहिए जिन्होंने बाबा साहब अंबेडकर जैसे नेताओं की मूर्तियां स्थापित करने पर इसे फिजूलखर्जी करार दिया था।' 
मायावती शायद यह भूल रही हैं, कि "हाथी" उनका चुनाव चिन्ह है। दूसरे सरकार ने सरदार पटेल की मूर्ति बनवाई है, आपने तो अपनी और कांशी राम की, जिन्हे चुनावों में ढकने पर कितना सरकारी धन खर्च होता है, कभी सोंचा, जबकि सरदार पटेल की मूर्ति को किसी भी चुनाव में ढकने की जरुरत नहीं पड़ेगी।  
बसपा सुप्रीमो ने पटेल की 143वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि दलित नेता बाबा साहब अंबेडकर की तरह सरदार पटेल भी राष्ट्रवादी नेता थे और उनका काफी सम्मान था। मायावती ने पटेल की मूर्ति का नाम अंग्रेजी में रखने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी नाम पटेल के अनुयायियों को हमेशा परेशान करेगा।
पटेल की यह मूर्ति 300 इंजीनियरों एवं करीब 3000 मजदूरों की अथक परिश्रम का परिणाम है। यह मूर्ति करीब 3000 करोड़ रुपए की लागत से 42 महीनों में बनकर तैयार हुई है। इसकी ऊंचाई अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी है। सरकार इस स्थान को पर्यटन केंद्र के रूप में भी विकसित कर रही है। 

मोदी ने देश को समर्पित किया 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी'

Statue of Unity & PM Modiप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज  (31 अक्टूबर)  आजाद भारत के पहले गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 143वीं जयंती पर उनकी प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का अनावरण किया। यह स्टैच्यू दुनिया में सबसे ऊंची है। इसकी ऊंचाई  182 मीटर (597 फीट) है। ऊंचाई में यह अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी (93 मीटर) का दुगना है। जबकि रियो डी जेनेरियो के क्राइस्ट द रिडीमर टावर से चार गुना ऊंचा है। इसको बनाने में कुल  2,989 करोड़ रुपए खर्च किए गए। इस स्मारक के लिए 6 लाख ग्रामीणों ने मूर्ति स्थापना के लिए लोहा दान किया। इसके लिए 5000 मीट्रिक टन लोहे का जमा किया गया। इस प्रतिमा को बनाने का जिम्‍मा प्रख्यात मूर्तिकार पद्म भूषण राम वनजी सुतार को दिया गया था। यह अहमदाबाद से 200 किमी दूर जनजाति जिले नर्मदा के सरदार सरोवर डैम के निकट बनाया गया है। यह मूर्ति पटेल को श्रद्धांजलि है। 
इस स्टैच्यू के निर्माण में 25,000 टन लोहे और 90,000 टन सीमेंट का इस्तेमाल किया गया है। मूर्ति को 7 किमी दूर से देखा जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए पैदल रास्ता, फोर लेन हाईवे की सुविधा है। पास में ही 52 कमरों का श्रेष्ठ भारत भवन थ्री स्टार होटल है। एल एंड टी के अधिकारी ने बताया कि यह कंस्ट्रक्शन चार चरणों में पूरा हुआ। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के अनावरण के बाद पीएम मोदी ने कहा कि आज के दिन इतिहास कभी नहीं भूला पाएगा। साथ ही उन्होंने सरदार बल्लभभाई पटेल के बारे में विस्तार से देशवासियों को बताई। 
143 साल पहले गुजरात की धरती पर एक सामान्य परिवार में एक बालक का जन्म हुआ जिसकी किस्मत में असामान्य कामयाबियां लिखी हुई थीं। समय चक्र के साथ वो बालक जवानी की दहलीज पर पहुंचा जिस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। उस शख्स की जिंदगी में पग पग पर संघर्ष ने दस्तक दी। उसने ठान लिया था कि उसकी खुद की जिंदगी में भले ही कष्ट हों लेकिन भारत को अंग्रेजों की गुलामी से निजात दिलाना है। उस शख्स का नाम था सरदार वल्लभ भाई  पटेल। 
मोहनदास करमचंद गांधी यानि महात्मा गांधी के विचारों का वल्लभभाई पटेल पर जबरदस्त असर पड़ा। वल्लभ भाई पटेल की जिंदगी का सिर्फ एक ही मिशन बन गया कि देश के उन लोगों के साथ उठ खड़ा होना है जिनके तन पर कपड़े नहीं थे, जिन्हें दो वक्त का भोजन नसीब नहीं होता था। जिन लोगों को बात बात पर अंग्रेजों की प्रताड़ना सहनी पड़ती थी। अंग्रेजों के खिलाफ कांग्रेस के अलावा कई विचारधाराएं जगह बना रही थीं जिनका रास्ता गांधी के आदर्शों से अलग था। तमाम तरह के अंतर्विरोधों के बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। 1920-30 का दशक न केवल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ बल्कि वल्लभ भाई पटेल को देश और दुनिया ने अलग शख्सियत के तौर पर देखा।
ब्रिटिश सरकार के लगान प्रणाली से गुजरात के किसानों की कमर टूट चुकी थी। वल्लभ भाई पटेल से ये सब देखा नहीं गया और उन्होंने फैसला किया कि अब तो आर पार की लड़ाई लड़नी ही होगी। 1928 में उन्हें अहम कामयाबी मिली जब अंग्रेजों ने लगान की दर में कमी कर दी और वल्लभ भाई पटेल के नाम के साथ सरदार जुड़ गया। वल्लभ भाई पटेल की इस लड़ाई को बारदोली सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है।
पटेल की कुशल रणनीति और फौलादी इरादों का हर कोई कायल था। महिलाओं ने उन्हें प्यार से सरदार बुलाना शुरू कर दिया। अंग्रेजों के खिलाफ समय के साथ संघर्ष और तेज हो गया और 15 अगस्त 1947 को वो दिन आया जब भारत अंग्रेजो की 250 साल की गुलामी के चोले को उतार कर फेंक चुका था। लेकिन अंग्रेजों ने जो चाल चली उसमें भारत जल रहा था। भारत एक देश होते भी सैकड़ों रियासतों में बंटा हुआ था। अंग्रेजों की कोशिश थी कि भारत आजाद होते हुए भी अखंड न रहे। लेकिन सरदार पटेल ने तय कर लिया था कि खुली हवा में सांस ले रहा भारत एकता की डोर में बंधकर दुनिया को दिखा देगा कि वो सिर्फ संघर्ष ही नहीं कर सकता है बल्कि देश को दिशा भी दे सकता है।
सरदार पटेल की नीति के आगे ज्यादातर रियासतों ने खुद को भारतीय संघ में विलय कर दिया। लेकिन हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर और काठियावाड़ की रियासतें भारत माता की शरीर में कांटों की तरह चुभ रही थीं। लेकिन सरदार पटेल की नीति के आगे स्वतंत्रता का सपना देख रहे हैदराबाद के निजाम और काठियावाड़ के शासक को झुकना पड़ा। उनके प्रयासों से भारत का मौजूदा नक्शा हम सबके सामने है और तिरंगा शान से लहरा रहा है।
पीएम के भाषण की ये हैं 10 बड़ी बातें-

  1. आज जब धरती से लेकर आसमान तक सरदार साहब का अभिषेक हो रहा है, तब भारत ने न सिर्फ अपने लिए एक नया इतिहास रचा है, बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा का गगनचुम्बी आधार भी रखा है। दुनिया की ये सबसे उंची प्रतिमा पूरी दुनिया और हमारी भावी पीढ़ियों को सरदार साहब के साहस, सामर्थ्य और संकल्प की याद दिलाती रहेगी।
  2. ये प्रतिमा, सरदार पटेल के उसी प्रण, प्रतिभा, पुरुषार्थ और परमार्थ की भावना का प्रकटीकरण है। ये प्रतिमा भारत के अस्तित्व पर सवाल उठाने वालों को ये याद दिलाने के लिए है कि ये राष्ट्र शाश्वत था, शाश्वत है और शाश्वत रहेगा। सरदार साहब के दर्शन करने आने वाले टूरिस्ट सरदार सरोवर डैम, सतपुड़ा और विंध्य के पर्वतों के दर्शन भी कर पाएंगे।
  3. सरदार साहब ने संकल्प न लिया होता, तो आज गीर के शेर को देखने के लिए, सोमनाथ में पूजा करने के लिए और हैदराबाद चार मीनार को देखने के लिए हमें वीज़ा लेना पड़ता। सरदार साहब का संकल्प न होता, तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक की सीधी ट्रेन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कच्छ से कोहिमा तक, करगिल से कन्याकुमारी तक आज अगर बेरोकटोक हम जा पा रहे हैं तो ये सरदार साहब की वजह से, उनके संकल्प से ही संभव हो पाया है।
  4. सरदार साहब के इसी संवाद से, एकीकरण की शक्ति को समझते हुए उन्होंने अपने राज्यों का विलय कर दिया। देखते ही देखते, भारत एक हो गया। सरदार साहब के आह्वान पर देश के सैकड़ों रजवाड़ों ने त्याग की मिसाल कायम की थी। हमें इस त्याग को भी कभी नहीं भूलना चाहिए।
  5. सरदार पटेल ने 5 जुलाई, 1947 को रियासतों को संबोधित करते हुए कहा था कि विदेशी आक्रांताओं के सामने हमारे आपसी झगड़े, आपसी दुश्मनी, वैर का भाव, हमारी हार की बड़ी वजह थी। अब हमें इस गलती को नहीं दोहराना है और न ही दोबारा किसी का गुलाम होना है।
  6. हमारे इंजीनियरिंग और तकनीकि सामर्थ्य का भी प्रतीक है। बीते करीब साढ़े तीन वर्षों में हर रोज़ कामगारों ने, शिल्पकारों ने मिशन मोड पर काम किया है। राम सुतार जी की अगुवाई में देश के अद्भुत शिल्पकारों की टीम ने कला के इस गौरवशाली स्मारक को पूरा किया है।
  7. सरदार पटेल का ये स्मारक उनके प्रति करोड़ों भारतीयों के सम्मान, हमारे सामर्थ्य, का प्रतीक तो है ही, ये देश की अर्थव्यवस्था, रोज़गार निर्माण का भी महत्वपूर्ण स्थान होने वाला है। इससे हज़ारों आदिवासी बहन-भाइयों को हर वर्ष सीधा रोज़गार मिलने वाला है।
  8. कई बार तो मैं हैरान रह जाता हूं, जब देश में ही कुछ लोग हमारी इस मुहिम को राजनीति से जोड़कर देखते हैं। सरदार पटेल जैसे महापुरुषों, देश के सपूतों की प्रशंसा करने के लिए भी हमारी आलोचना होने लगती है। ऐसा अनुभव कराया जाता है मानो हमने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है।
  9. हमारी जिम्मेदारी है कि हम देश को बांटने की हर तरह की कोशिश का पुरजोर जवाब दें। इसलिए हमें हर तरह से सतर्क रहना है। समाज के तौर पर एकजुट रहना है। आज देश के लिए सोचने वाले युवाओं की शक्ति हमारे पास है। देश के विकास के लिए, यही एक रास्ता है, जिसको लेकर हमें आगे बढ़ना है। देश की एकता, अखंडता और सार्वभौमिकता को बनाए रखना, एक ऐसा दायित्व है, जो सरदार साहब हमें देकर गए हैं।
  10. हम देश के हर बेघर को पक्का घर देने की भगीरथ योजना पर काम कर रहे हैं।  हमने उन 18 हजार गावों तक बिजली पहुंचाई है, जहां आजादी के इतने वर्षों के बाद भी बिजली नहीं पहुंची थी।  हमारी सरकार सौभाग्य योजना के तहत देश के हर घर तक बिजली कनेक्शन पहुंचाने के लिए काम कर रही है। देश के हर गांव को सड़क से जोड़ने, डिजिटल कनेक्टिविटी से जोड़ने का काम भी तेज गति से किया जा रहा है। देश में आज हर घर में गैस कनेक्शन पहुंचाने के प्रयास के साथ ही देश के हर घर में शौचालय की सुविधा पहुंचाने पर काम हो रहा है।