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‘अमित शाह को अंबेडकर से नफरत, संसद में की घृणित बात’: ‘खतना’ वीडियो वायरल कर रहे कांग्रेस नेता और दलाल पत्रकार; आखिर fake news फ़ैलाने वालों को दण्डित क्यों नहीं करती सरकार?

आखिर fake news फ़ैलाने वालों पर सख्ती से पेश क्यों नहीं सरकार? संभल के दंगे और नूपुर शर्मा हादसों से मोदी सरकार कब सबक लेगी? आखिर ये 56 इंची सीना किस काम का? fake news फैलाने वाले तो अपनी तिजोरी भर लेते हैं, लेकिन मरती बेगुनाह जनता है? अगर तीसरी बार सत्ता में आने के बाद भी ऐसी दूषित मानसिकता वालों पर सरकार कोई कार्यवाही नहीं कर सकती, क्या फायदा बीजेपी को वोट देने का? नारी शक्ति की बात करने वाली बीजेपी नूपुर शर्मा के बचाव में क्यों नहीं आयी? अगर बीजेपी सच्चाई को सामने ले आयी होती किसी कन्हैया को अपनी जिंदगी से हाथ नहीं धोना पड़ता और न ही किसी 'सिर से तन जुदा' करने वालों के होंसले बुलंद होते। जिस दिन से सरकार इन पर कार्यवाही शुरू कर देगी देश में दंगे-फसादों पर लगाम लग जाएगी।वरना सोरोस का पैसा खेल खेलता रहेगा और जनता त्रस्त होती रहेगी।      

देश की संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के भाषण के क्लिप के एक हिस्से को काटकर कांग्रेसी और विरोधी दल सरकार को बदनाम करने का प्रयास कर रहे हैं। यह पहली बार नहीं है कि कांग्रेस ऐसा कर रही है। जब-जब कांग्रेस मुद्दाविहीन होती है तो इसी तरह के फेक न्यूज फैलाकर सरकार को बदनाम करने का प्रयास करती है। ये काम सिर्फ कांग्रेसी या विपक्षी नेता ही नहीं, बल्कि कुछ दरबारी पत्रकार भी बखूबी करते हैं।

दरअसल, राज्यसभा में संविधान पर बहस के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मंगलवार(17 दिसंबर 2024) को डॉक्टर भीरामराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वालों को आड़े हाथों लिया था। अपने लगभग 90 मिनट के स्पीच में अमित शाह ने कांग्रेस और उसके नेताओं को अंबेडकर के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं कांग्रेस द्वारा की गई हरकतों को देश के सामने रखा था। इसके बाद कांग्रेस चिढ़ गई।

अपनी चिढ़ ने कांग्रेस और उसके नेताओं द्वारा दरबारी पत्रकारों ने अमित शाह के भाषण के हिस्से को शेयर करके सरकार को बदनाम करना शुरू कर दिया। कांग्रेस ने X अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “‘अभी एक फैशन हो गया है- अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर.. इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।’ अमित शाह ने बेहद घृणित बात की है।”

कांग्रेस ने अपनी पोस्ट में आगे लिखा, “इस बात से जाहिर होता है कि BJP और RSS के नेताओं के मन में बाबा साहेब अंबेडकर जी को लेकर बहुत नफरत है। नफरत ऐसी कि उनके नाम तक से इनको चिढ़ है। ये वही लोग हैं जिनके पूर्वज बाबा साहेब के पुतले फूँकते थे, जो ख़ुद बाबा साहेब के दिए संविधान को बदलने की बात करते थे। जब जनता ने इन्हें सबक सिखाया तो अब इन्हें बाबा साहेब का नाम लेने वालों से चिढ़ हो गई है। शर्मनाक! अमित शाह को इसके लिए देश से माफी माँगनी चाहिए।”

यही बात कांग्रेस नेता जयराम और सुप्रिया श्रीनेत सहित तमाम नेताओं ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में शेयर की है। इन नेता ने सिर्फ अमित शाह को ही नहीं, बल्कि बाबा साहेब के नाम पर भाजपा और RSS को भी बदनाम करने की कोशिश की है। रणविजय सिंह, ममता त्रिपाठी आदि कई कथित पत्रकारों ने भी अमित शाह के भाषण के आधे-अधूरे क्लिप को वायरल किया।

डॉक्टर लक्ष्मण यादव नाम के एक कथित बुद्धिजीवी ने इस अधूरे क्लिप को वायरल करते हुए लिखा, “अमित शाह को अगर गोडसे, गोलवलकर, सावरकर से फुरसत मिल गई होती और अंबेडकर को पढ़ लिए होते, अंबेडकर को जान लिए होते, अम्बेडकर की भारतीय समाज में मौजूदगी और अहमियत देख लिए होते, तो शायद ऐसा कभी न बोलते।”

उन्होंने आगे लिखा, “डॉ. अंबेडकर ने करोड़ों वंचितों, शोषितों, मजलूमों, महिलाओं को उस जगह से निकाला है, जो नरक से बदतर जीवन जीने को मजबूर थे. उनके लिए स्वर्ग और स्वर दोनों दिया है बाबा साहब ने।”

दरअसल, ये सारा फेक न्यूज एक षडयंत्र के तहत वायरल किया जा रहा है, ताकि अमित शाह, भाजपा और संघ को दलित-वंचित विरोधी साबित किया जा सके। वहीं, कांग्रेस नेता अपने पूर्वजों की करतूतों को छिपाने और वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक लाभ लेने के लिए अब फेक न्यूज जैसे गैर-कानूनी काम करने लगे हैं।

नूपुर शर्मा की तरह अमित शाह के भाषण के जिस हिस्से को विरोधियों द्वारा साझा किया जा रहा है, वह सही, लेकिन उसका संदर्भ क्या है उसे विरोधी छिपा गए। इससे अमित शाह का बयान एकतरफा दिखने लगा, जबकि हकीकत इसके विपरीत है। अमित शाह ने अंबेडकर के साथ कॉन्ग्रेस के नेताओं के दुर्व्यवहार को उन्होंने उजागर किया था।

अमित शाह ने अपने भाषण में कहा, “अभी यह फैशन चल गया है अंबेडकर अंबेडकर अंबेडकर……. इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों का स्वर्ग मिल जाता। हमें आनंद है कि ये अंबेडकर का नाम लेते हैं, लेकिन अंबेडकर जी के प्रति आपका भाव क्या है ये मैं बताता हूँ।” इसके बाद अमित शाह कांग्रेस और पंडित नेहरू की पोल खोलकर रख देते हैं।

अमित शाह ने आगे कहा, “अंबेडकर जी ने देश की पहली कैबिनेट से इस्तीफा क्यों दे दिया? अंबेडकर जी ने कई बार कहा कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के साथ हुए व्यवहार से मैं असंतुष्ट हूँ। सरकार की विदेश नीति से मैं असहमत हूँ और आर्टिकल 370 से मैं असहमत हूँ। इसलिए वे छोड़ना चाहते थे। उन्हें आश्वासन दिया गया, लेकिन वो पूरा नहीं हुआ और नजरअंदाज किए जाने के कारण इस्तीफा दे दिया।”

केंद्रीय गृहमंत्री ने आगे बताया, “श्री बीसी रॉय ने पत्र लिखा कि अंबेडकर और राजा जी जैसे लोग मंत्रिमंडल छोड़ेंगे तो क्या होगा। तो उनको नेहरू जी ने जवाब में लिखा- राजाजी के जाने से थोड़ा-बहुत नुकसान तो होगा, लेकिन अंबेडकर के जाने से मंत्रिमंडल कमजोर नहीं होगा।” अमित शाह ने आगे कहा कि कांग्रेस जिसका विरोध करती रही है, उसका वोट के लिए नाम लेना कितना उचित है। अंबेडकर जी मानने वाले पर्याप्त संख्या में आ गए हैं, इसलिए आप अंबेडकर अंबेडकर कर रहे हो।”

इस तरह, केंद्रीय मंत्री अमित शाह के पूरे भाषण को सुना जाए तो वो साफ तौर पर बता रहे हैं कि जिस अंबेडकर का नाम अब कांग्रेस जप रही है, उन्हीं अंबेडकर को उसने कितना जलील किया है। हालाँकि, अपने राजनीतिक फायदे के लिए कन्ग्रेस, उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गाँधी, जयराम रमेश, सुप्रिया श्रीनेत और उनके दरबारी पत्रकार आधे-अधूरे क्लिप को चलाकर फेक न्यूज फैला रहे हैं।

“हँस के लिया पाकिस्तान कहने वाले सुनो ! “—-“नही मिलेगा हिंदुस्तान, जाना होगा पाकिस्तान"

श्यामसुंदर पोद्दार, उगता भारत              31जनवरी को सावरकर के घर की  तलाशी ली गयी। उनके 10 हज़ार पत्र पुलिस जब्त करके ले गई। 1 फ़रवरी 1948 से लेकर 5 फ़रवरी तक समस्त देश में हिन्दु महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का भीषण  दौर चला। जिस पर तनिक भी संदेह हुआ अथवा किसी कांग्रेसी को किसी साधारण व्यक्ति से अपना बैर चुकाना था तो उसको हिन्दूसभाई बनाकर बंदी बनवा दिया। इस प्रकार 25 हज़ार लोगों  को जबरन जेल में ठूँस दिया गया। उनमें बहुत से तो समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया।

हिन्दु महासभा के सर्वोच्च नेता व भारतीय राष्ट्रीय सेना के रूपकार वीर सावरकर जी को बिना किसी  कारण के 5 फ़रवरी 1947 को मुँह अंधेरे पुलिस की गाड़ी आई और पुलिस अधिकारी ने सावरकर जी से कहा “बम्बई  पब्लिक सिक्योरिटी मेजर्स ऐक्ट में आपको बंदी बनाया जा रहा है। इसके  पहले ४ फ़रवरी की रात्रि एक डॉक्टर ने आकर उनका निरीक्षण -परीक्षण किया तथा बता दिया कि सावरकर सब प्रकार से स्वस्थ हैं। जबकि विगत एक वर्ष से सावरकर क्षीण ज्वर व हृदय की पीड़ा से ग्रस्त थे। जिस समय डॉक्टर उनका निरीक्षण कर रहा था उस समय भी उनको ज्वर था। यह क़ानून तो नेहरू के उन गुंडों पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के 17,000 चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। 5 फ़रवरी 1948 से 23 मार्च 1948 तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के १७००० चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। ५ फ़रवरी १९४८ से २३ मार्च १९४८ तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
अंत में  11 मार्च 1948 को दिल्ली के मजिस्ट्रेट के आदेश से गाँधी वध षडयंत्र  में सावरकर को प्रमुख बता कर  उन्हें पुनः आर्थर रोड कारागार में लाया गया। उनकी ज़मानत की प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई। हाँ, उनके वकील श्री  देवधर को इस बात में सफलता  मिली कि उनकी पत्नी व पुत्र उनसे भेंट कर सकते हैं। उनके प्रयत्न से सावरकर अपने पुत्र को अपने घर के संचालन हेतु ” पावर आफ अटर्नी” देने में सफ़ल रहे।
“I want blood of Savarkar”: जवाहरलाल नेहरू 
24 मई 1948 सावरकर को दिल्ली लाया गया तथा लाल क़िले में अन्य अभियुक्तों के साथ बंदी बना कर रखा गया। सावरकर की ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त सम्पति महाराष्ट्र के गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने वापस करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि सावरकर ने पहले से भी गम्भीर अपराध किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में डॉक्टर अम्बेडकर को गाँधी हत्या में झूठा फंसाने का प्रतिवाद किया। नेहरू ने डॉक्टर अम्बेडकर से कहा “I want blood of Savarkar”। डॉक्टर अम्बेडकर ने नेहरू को जवाब दिया कि तुम सावरकर का बाल बाँका भी नही कर सकते। डॉक्टर अम्बेडकर ने सावरकर के वकील से मिलकर कहा कि घबराओ नही, नेहरू ने सावरकर को झूठा फँसाया है। राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर भी 4 फ़रवरी 1948 को प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे तो इन 25 हज़ार क़ैद किये गये कार्यकर्ताओं में बहुसंख्यक हिन्दू महासभा के थे, पर राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के भी कम नही थे। जिनमें से  बाद में बहुत से छोड़ दिए गए। पर 500 स्वयंसेवकों को फिर भी बंदी बना कर रखा। संघ ने पटेल के कहे अनुसार अपना संविधान बनाने पर संघ पर से प्रतिबंध हटा दिया गया। पर हिन्दु महासभा के प्रति 1952 के चुनाव तक नेहरू -पटेल का शख़्त रवैया रहा। हिन्दु महासभा के सावरकर के अलावा सभी के सभी सर्वोच्च नेता यथा महंत दिग्विजयनाथ,आशुतोष लाहिरी,प्रोफ़ेसर  राम सिंह देशपांडे, निर्मल चंद् चटर्जी अन्य सारे ज़ैल में डाल दिए गए। क़ानून उनके पक्ष में था इसलिए वे अदालत से छूट जाते, पर उन्हें फिर गिरफ़्तार कर लिया जाता। हिन्दु महासभा के कार्य कर्ताओं पर सरकार लाठी चार्ज करती। वे मिठाइयाँ बाँट रहे थे । सरकार के देश विभाजन जैसे ग़द्दारी पूर्ण कार्य का प्रतिवाद करने को वे घृणा फैला रहे थे। संघ का सामूहिक गीत पाठ भी अपराध था।

नेहरू के समान पटेल भी हिन्दू महासभा के मामले में समान दोषी हैं। पटेल नेहरू के हिन्दु महासभा पर किये जा रहे अत्याचारों में इसलिए साथ दे रहे थे क्योंकि नेहरू तो टेम्परेरी प्रधानमन्त्री था। बाद में तो पटेल को ही होना था। कांग्रेस अध्यक्ष जो चुना जायेगा, वही कांग्रेस का प्रधानमंत्री बनेगा। नेहरू कॉंग्रेस का बहुत छोटा सा नेता था। उससे बड़े सरदार पटेल तो थे डॉक्टर राजेंद्र  प्रसाद,आचार्य कृपलानी नेहरू से कांग्रेस में बहुत बड़ा क़द रखते थे। अंग्रेजों ने गाँधी से साफ़ साफ़ कह दिया कि हम पटेल के हाथ में सत्ता नही देंगे, नेहरू के हाथ में देंगे। इस बात का खुलासा गाँधी ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के सम्पादक के एक प्रश्न के उत्तर में दिया था। एक मात्र नेहरू ही हमारे कैम्प  में अंग्रेजों का आदमी था ।(Nehru was the only Englishman in our camp). यदि राजगोपलाचारी पटेल की मृत्यु पर यह नही कहते पटेल को तो प्रधान मन्त्री बनना था। यानी नेहरू अस्थायी प्रधानमन्त्री था।
पटेल ने गाँधी वध के 28 दिन बाद नेहरू को 27 फरवरी 1948 के लिखे पत्र में लिखा कि इस कांड में सिर्फ़ दस आदमी संलिप्त हैं जिनमें से 8 पकड़ लिये गये हैं और 2 भागे हुवे हैं। तब पटेल से सवाल पूछता हूँ कि 25,000 हिन्दु महासभा व संघ के कार्यकर्ताओं को 1951 तक जेल में बंदी बना कर क्यों रखा? पटेल ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एरिक्वेस्ट वे दिल्ली में हिन्दु महासभा की कार्यकारिणिकी सभा बुलाना चाहते हैं। पटेल ने मना कर दिया। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 4 मई 1948 को पटेल को लिखे पत्र में सावरकर के बारे में लिखा कि ऐसा न हो , उनको मत विरोध के चलते दंडित किया जा रहा हो ? पटेल ने इसके उत्तर में 6 मई 1948 को जवाब दिया कि ऐसा कभी भी नही होगा। मैं स्वयं इस केस को देख रहा हूँ। मैंने साफ़ – साफ़ आदेश दे दिया है। सावरकर का गाँधी हत्या मामले में निष्कलंक बरी हो जाना व जज अतमाचरण का यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। नेहरू-पटेल के मुँह पर ज़बरदस्त तमाचा है। नेहरू यही शांत नही हुए। सावरकर के लाल क़िला से निकलने को देखने के लिये ३ लाख हिंदू लाल क़िले पर इकट्ठे हो गए। नेहरू ने मजिस्ट्रेट के आदेश से लालक़िले के बाहर जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया ?

इतना ही नही कुछ घंटो बाद “Punjab Public Security Majors Act”उन पर लागू करके तीन मास तक उनके दिल्ली मे प्रवेश व निवास पर प्रतिबंध लगा दिया।गुपचुप  तरीक़े से रेल में सावरकर जी को बैठा कर नेहरू सरकार ने उन्हें बम्बई पहुँचाया।
उनके घर से निकलने पर  प्रतिबन्ध लगा दिया। कुछ समय बाद पंजाब पब्लिक सिक्यरिटी मेजर्स ऐक्ट लगा कर तीन महीने के लिये दिल्ली में रहने व प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। नेहरू सरकार गुप-चुप तरीक़े से रेल द्वारा इन्हें बम्बई पहुँचाई। 1949 कलकत्ता में  सम्पन्न हुए हिन्दू महासभा सम्मेलन में उमड़े जनसैलाब को देखकर नेहरू घबड़ा गया। 1950 में झूठा आरोप हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध भड़काने के आरोप में बन्दी बना लिये गये। बेल में सरकार ने शर्त लगा दी कि आप राजनीति नही कर सकते। ब्रिटिश भारत में भी राजनीति करने पर प्रतिबंध। स्वाधीन भारत में भी प्रतिबंध। यही है नेहरू का गणतंत्र ? 1952 के चुनाव के कुछ महीना पहले  यह प्रतिबंध हटा। नाथूराम गोडसे सुभाष वादी था। इसलिए जिस समाचार पत्र का वह संचालन करता था उसका नाम अग्रणी था means Forward। वह पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे जुर्म प्रकाशित करता था। नेहरू-पटेल सरकार ने प्रेस सेन्सरसिप ऐक्ट कड़ाई से लागू कर रखा था, ताकि पाकिस्तान में चल रहे हिंदुओं का नरसंहार हिंदुस्तान के समाचार पत्रों में प्रकाशित न हो सके। नाथूराम गोडसे गाँधी को मारने दिल्ली नही आया था, उसके समाचार पत्र पर मोरारजी देसाई ने बड़ी पेनल्टी लगा दी थी। उसी की शिकायत गृहमंत्री से करने आया था। बाद में दिल्ली में पाकिस्तान से आये हिन्दुओं की हालत देख कर विचलित हो गया। उस हालत का एक मात्र ज़िम्मेदार गाँधी को मानकर गाँधी को मार डाला।     
नेहरू हिन्दु महासभा के साथ इतना करने पर भी कांग्रेस की जीत के प्रति आश्वस्त नही थे। जिन्ना ने स्पष्ट घोषणा कर दी थी कि हिन्दु मुसलमानों की अदला बदली करो। हमारे पाकिस्तान में हम हिन्दुओं को रहने नही देंगे। नही करोगे तो नोवाखाली की तरह क़त्ले आम करेंगे । उसने जिन्ना की घोषणा अनसुनी कर दी। जिन्ना हिंदुओं का क़त्ले आम पाकिस्तान में आराम से करे हिंदुस्तान में प्रेस सेन्सर शिप लागू कर दी। जिन्ना ने 20 लाख हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। पाकिस्तान लगभग हिन्दु शून्य कर डाला। नेहरू-पटेल का 1952 में अपनी हिन्दु महासभा के सामने हार से भयभीत थे वे जानते थे कि 1945 में हिन्दु महासभा को 14 प्रतिशत वोट मिले थे जो कांग्रेस के हिंदुओं के साथ विश्वासघात के बाद हिन्दु महासभा को ही मिलने हैं।
इतना ही नही, भारत का विभाजन कराके पाकिस्तान बनाने वाली मुस्लिम लीग के नेता जिन्होंने ग्रेट कलकत्ता किलिंग, नोवाखाली हिन्दु किलिंग पंजाब उत्तर प्रदेस बम्बई हिन्दू किलिंग किया बची हुई मुस्लिम लीग को कांग्रेस में मिला दिया। उनके नेताओं को केंद्रीय मंत्री, राज्यों में मंत्री , गवर्नर और राजदूत बनाया।(साभार)

जब अंबेडकर ने गाँधी के लिए कहा था- बगल में छुरी मुँह में राम, ‘हत्या’ को देश के लिए बताया था ‘अच्छा’: आज सवाल पर कालीचरण महाराज गिरफ्तार

महात्मा गाँधी पर अपमानजनक टिप्पणी करने के बाद महाराज कालीचरण को आज (दिसंबर 30, 2021) खजुराहो से मध्य प्रदेश सरकार और पुलिस को सूचित किये बिना गिरफ्तार कर लिया गया है। जो बहुत ही निंदनीय और आपत्तिजनक है। अगर गाँधी भक्तो को महाराज कालीचरण द्वारा गाँधी के विरुद्ध कहे शब्दों से इतना ऐतराज है, फिर क्यों नहीं नाथूराम गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को सार्वजनिक किया जाता, ताकि जनता को मालूम हो कि गोडसे सही था या गाँधी। आखिर कब तक महात्मा गाँधी की हिन्दू विरोधी नीतियों को छुपाया जाता रहेगा? जनता को भी पक्ष एवं विपक्ष नेताओं से पूछना चाहिए कि "गोडसे के बयानों को अपने घोषणा पत्र के साथ घर-घर वितरित किये जाते? पब्लिक अड्रेस सिस्टम से सुनाये गोडसे के बयानों को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने प्रतिबंधित किया था, जिसे गोडसे के भ्राता विजय गोडसे ने अपनी आजीवन सजा पूरी करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से उस प्रतिबन्ध हटवाया था।" 

इस गिरफ्तारी के बाद कुछ लोग जगह-जगह पर इसका विरोध कर रहे हैं। इस लिस्ट में डॉ आनंद रंगनाथन का भी नाम शामिल है।

डॉ आनंद रंगनाथन ने इस गिरफ्तारी पर अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर डॉ अंबेडकर के विचार पेश किए हैं जहाँ डॉ अंबेडकर गाँधी के व्यवहार में ‘चालाकी’ की बात करते हैं। साथ ही ‘बगल में छूरी मुँह में राम’ वाली कहावत का उदाहरण देकर गाँधी को महात्मा मानने से इनकार कर कहते हैं कि उनके लिए गाँधी सिर्फ मोहन दास करमचंद गाँधी हैं। वह गाँधी की राजनीति को भारतीय इतिहास की राजनीति की सबसे बेईमान राजनीति बताते हैं और राजनीति में से नैतिकता खत्म करवाने का जिम्मेदार भी गाँधी को बताते हैं।

उक्त बातें डॉ अंबेडकर ने गाँधी को ‘महात्मा’ बुलाए जाने के संबंध में कही थीं। इसके अलावा उन्होंने 8 फरवरी 1948 को अंबेडकर ने अपनी पत्नी सविता अंबेडकर को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में वो अपनी पत्नी सविता को समझा रहे थे कि वो उनसे सहमत हैं कि गाँधी की मौत इस तरह नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने अपने इस पत्र में ये भी साफ कहा था कि उनका अस्तित्व गौतम बुद्ध के अलावा किसी से प्रेरित नहीं है।

इस पत्र में उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि महापुरुष अपने देश की महान सेवा करते हैं। लेकिन एक समय आता है जब वे अपने देश की प्रगति में एक बाधा भी बन जाते हैं।” इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि गाँधी इस देश के लिए एक पॉजिटिव खतरा थे। उन्होंने सभी स्वतंत्र विचारों का गला घोंट दिया। वह कांग्रेस को साथ पकड़े हुए थे, जो समाज में सभी बुरे और स्वार्थी तत्वों का मिश्रण है और जो किसी सामाजिक और नैतिक सिद्धांत को लेकर सहमति नहीं देते केवल गाँधी की चापलूसी के अलावा। ये निकाय देश को चलाने में बिलकुल सही नहीं है।

इसी पत्र के अंत में डॉ अंबेडकर ने कहा, “जैसा कि बाइबल में लिखा है कि कई बार कुछ अच्छी चीज किसी बुरी चीज से ही बाहर आती हैं। मुझे लगता है कि गाँधी की मौत से भी कुछ अच्छा ही होगा। ये लोगों को महान व्यक्ति के बंधन से मुक्त करेगा। यह उन्हें अपने लिए सोचने पर मजबूर करेगा कि उनके फायदे में क्या है।”

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क्या गाँधी वध की वास्तविकता जगजाहिर हो पाएगी?
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित सभी जानका

उल्लेखनीय है कि कालीचरण महाराज पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित ‘धर्म संसद’ में महात्मा गाँधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा था। इसको लेकर उन पर रायपुर और महाराष्ट्र के पुणे में मामला दर्ज किया गया था। अपने खिलाफ केस दर्ज होने के बाद कालीचरण महाराज ने YouTube चैनल के जरिए स्पष्टीकरण दिया था। इसमें कहा था कि उन्हें महात्मा गाँधी के लिए कहे गए अपशब्दों का कोई पश्चाताप नहीं है। उन्होंने पूछा था कि महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं के लिए किया ही क्या है? उन्होंने बताया कि किस तरह 14 वोट प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को मिले, लेकिन शून्य वोट वाले जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बना कर उन्होंने वंशवाद फैलाया।

कितनी पीढ़ियों तक जारी रहेगा शिक्षा और नौकरी में आरक्षण? सुप्रीम कोर्ट मराठा रिजर्वेशन पर

अक्सर चुनावों में संविधान की दुहाई देने वाले आरक्षण की बोली लगाते नज़र आते हैं, जो इस बात को साबित करता है कि संविधान संविधान न होकर जनता को बहलाने का कोई छुनछुना हो। डॉ भीमराव आंबेडकर की दुहाई देने वाले आरक्षण की किस मुंह से बात करते हैं? 

इन छद्दम अम्बेदकारियों को यह भी मालूम होना चाहिए कि केवल 10 वर्ष के लिए आरक्षण मांगने वाले आंबेडकर ने इसका दुरूपयोग होता देख इसे समाप्त करने की मांग की थी, जो आज तक किसी भी सरकार ने पूरी नहीं की और न ही कर सकती है, क्योकि पार्टी कोई भी हो आरक्षण को सबने वोट-हथियार बना रखा है। दूसरे, जब संविधान समान अधिकार की बात करता है, फिर आरक्षण के नाम पर नौटंकी करना क्या संविधान का अपमान नहीं?
शिक्षा और नौकरी में कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण जारी रहेगा? इस सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने मराठा रिजर्वेशन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जानना चाहा। 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने मार्च 19, 2021 को इस पर सुनवाई की।

जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि आरक्षण पर कैपिंग रखने के मंडल कमेटी के फैसले पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है। इस दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि कितनी पीढ़ियों तक शिक्षा और नौकरी में ये आरक्षण जारी रहेगा। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि यदि 50% आरक्षण हटा दिया जाए तो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिलने वाला समानता का अधिकार तो प्रभावित नहीं होगा।

5 जजों की संवैधानिक पीठ में न्यायाधीश अशोक भूषण, एल नागेश्वर राव, एस अब्दुल नजीर, हेमंत गुप्ता और एस.रवीन्द्र भट्ट शामिल हैं। ये पीठ महाराष्ट्र राज्य आरक्षण अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है। इसके तहत मराठा के लिए 16% आरक्षण किया गया था।

मंडल फैसले पर दोबारा विचार हो: मुकुल रोहतगी

अदालत में आरक्षण कानून के पक्ष में बहस करते हुए रोहतगी ने मंडल जजमेंट के कई आयामों पर बात की। उन्होंने कहा कि 10% आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण देने वाले केंद्र सरकार के फैसले ने 50% कैप को भंग कर दिया। उन्होंने कहा कि कई कारणों से मंडल कमेटी के फैसले पर दोबारा से गौर करने की जरूरत है, जिसे 1931 की जनगणना पर आधारित तैयार किया गया था, लेकिन आज जनसंख्या 135 करोड़ पहुँच गई है।

कोर्ट ने रोहतगी की दलीलों पर सवाल पूछा, “अगर आरक्षण पर कोई कैप नहीं रहेगी, तो समानता की कोई बात ही नहीं रह जाएगी। घूम-फिरकर फिर उसी चीज से निपटना होगा। इससे जो नई असमानता पैदा होगी, उस पर आपका क्या कहना है? हम इसे (आरक्षण को) आखिर कितनी पीढ़ियों तक जारी रखने वाले हैं?”

पीठ ने यह भी कहा कि आजादी के 70 साल बीत चुके हैं, और राज्यों को कई लाभकारी योजनाएँ चल रही हैं, और ‘क्या हम स्वीकार कर सकते हैं कि कोई विकास नहीं हुआ है, कोई भी पिछड़ी जाति आगे नहीं बढ़ी है?’

इस पर रोहतगी ने कहा, “हम बिल्कुल आगे बढ़े हैं। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि देश में आज पिछड़ी श्रेणियों की संख्या 50 से घटकर 20 फीसदी हो गई है। मैं ये नहीं कह रहा कि पिछले नियम ख़राब थे। मैं बस ये कह रहा कि देश की आबादी काफी बढ़ चुकी है और मुमकिन है कि पिछड़े वर्ग की आबादी भी बढ़ गई। इसलिए आरक्षण के नियमों पर दोबारा विचार की ज़रूरत है।”

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने 8 मार्च को भी सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी करके पूछा था कि क्या आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से ज़्यादा बढ़ाया जाना चाहिए? इसका मकसद दो सवालों के जवाब तलाशने हैं। पहला, क्या इंद्रा साहनी जजमेंट (मंडल कमीशन केस) पर पुनर्विचार की जरूरत है? 1992 के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50% तय की थी। दूसरा, क्या 102वाँ संवैधानिक संशोधन राज्यों की विधायी क्षमता को प्रभावित करता है। यानी, क्या राज्य अपनी तरफ से किसी वर्ग को पिछड़ा घोषित कर आरक्षण दे सकते हैं या 102वें संशोधन के तहत अब यह अधिकार केवल संसद को है?

क्या है मराठा आरक्षण ?

साल 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने पढ़ाई और नौकरी में मराठा आरक्षण को 16% कर दिया था। 2019 में बॉम्बे उच्च-न्यायालय ने मराठा आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन आरक्षण को घटा कर नौकरी में 13 प्रतिशत और उच्च शिक्षा में 12 प्रतिशत कर दिया।बॉम्बे हाईकोर्ट की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि यह आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले में दिए गए फैसले का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि मराठा आरक्षण 2020-21 में लागू नहीं होगा।