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अरविंद केजरीवाल का बायो-केमिकल डीकंपोजर कहाँ गया? पराली से कोयला बनाने वाली तकनीक कहाँ है? 2020 को बताया था प्रदूषण का आखिरी साल

                                                                                                   साभार: फेसबुक/AAP/The Hindu
आज जब पंजाब में पराली जलाने की घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं और दिल्ली प्रदूषण के खतरनाक स्तर से जूझ रहा है, AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल के तमाम दावे और वादे भी धरे के धरे दिख रहे हैं। इसे समझने के लिए हमें चलना होगा 3 साल पहले, लेकिन फ़िलहाल जानते हैं कि दिल्ली में प्रदूषण की मौजूदा स्थिति क्या है। पंजाब में पराली जलाने की घटनाएँ इस साल 17,000 के पार हो गई हैं और रविवार (5 नवंबर, 2023) को ऐसी 3230 घटनाएँ हुई हैं।

ये एक दिन में इस बार सबसे ज़्यादा संख्या है। साफ़ अर्थ है कि ये घटनाएँ जारी रहेंगी और इस पर लगाम नहीं लगने वाला। सोचिए, 4 नवंबर को पराली जलाने की 1360 गतिविधियाँ सामने आई थीं और अगले ही दिन संख्या लगभग ढाई गुना बढ़ गई। वहीं 2022 की बात करें तो उस साल इसी दिन, यानी 5 नवंबर को ही पंजाब में पराली जलाने की 2817 घटनाएँ सामने आई थीं। ताज़ा घटनाओं की बात करें तो संगरूर, जो कि मुख्यमंत्री भगवंत मान का गृह जिला भी है, वो 551 के साथ टॉप पर रहा।

अब चलते हैं 2 साल पहले, सितंबर 2021 में। तब AAP ने यूट्यूब पर एक वीडियो डाला था, जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते दिख रहे हैं कि जब किसान अक्टूबर महीने में धान की फसल काटता है तो उसके बाद उसके तने नीचे रह जाते हैं, जिन्हें पराली कहते हैं। उन्होंने कहा था कि दोष सरकारों का है, किसानों का नहीं है, जो किसान अपने खेतों को जलाएगा उस पर जुर्माना लगाए की बजाए सरकारों को समाधान देना चाहिए।

इसके बाद अरविंद केजरीवाल इस वीडियो में कहते हैं कि पिछले साल दिल्ली सरकार ने समाधान निकाला, पूसा इंस्टिट्यूट ने एक बायो डीकंपोजर बनाया, उसे हमने दिल्ली में टेस्ट किया और 39 गाँवों में 1935 एकड़ में इसका छिड़काव किया गया और सामने आया कि इससे धान के डंठल गल जाते हैं, उन्हें काटना नहीं पड़ता है, जलाना नहीं पड़ता। केजरीवाल ने शानदार नतीजे का दावा करते हुए कहा था कि खुद केंद्र सरकार की एजेंसी ने इसकी तारीफ़ की है और 90% ने कहा कि 15-20 दिनों में उनकी पराली जल गई और अगले फसल के लिए खेत तैयार हो गई।

बकौल अरविंद केजरीवाल, इससे खेत की मिट्टी की उर्वरा क्षमता भी बढ़ गई। जब केजरीवाल बोल रहे होते हैं, इस वीडियो में चलाया गया कि कैसे ये कथित बायो डीकंपोजर काम कर रहा है। केजरीवाल ने तभी प्रदूषण की मुक्ति की बात करते हुए कहा था कि जब दिली में ये हो सकता है तो अन्य राज्यों में भी हो सकता है। ये अलग बात है कि पंजाब में भी उन्हीं की सरकार है लेकिन तब भी पराली जलाने के आँकड़े खतरनाक तरीके से बढ़ते ही चले जा रहे हैं।

इतना ही नहीं, यही सब ड्रामा आज से 3 साल पहले, यानी नवंबर 2020 में भी हुआ था। तब भी अरविंद केजरीवाल ने पराली जलाने का सस्ता और आसान समाधान देने की बात करते हुए कहा था कि अभी तक की सरकारें पराली जलाने को लेकर सिर्फ बहाना मार रही थीं। तब उन्होंने प्रदूषण के लिए पंजाब में पराली जलाने को जिम्मेदार बताया था, लेकिन अब उनकी पार्टी के लोग यूपी-हरियाणा को इसका जिम्मेदार बताते हुए कह रहे कि पंजाब की घटनाओं का यहाँ कोई असर ही नहीं हो रहा है।

अरविंद केजरीवाल ने तो यहाँ तक कह दिया था कि ये आखिरी साल है जब दिल्ली प्रदूषण को झेल रहा है। इसके बाद 2021 बीत गया, 2022 बीत गया और अब 2023 भी बीत रहा है, लेकिन प्रदूषण घटने की बजाए बढ़ता ही चला जा रहा है, AQI 999 के स्तर पर पहुँच गया है और इससे ज़्यादा तो मापा भी नहीं जा सकता। केजरीवाल का वो ‘आखिरी साल‘ आखिर खत्म नहीं हुआ अभी तक? या फिर वो स्वर्ग के कोई देवता हैं, जिनके लिए दिन और रात पृथ्वी पर दिन-रात की अवधि के हजारों गुना अधिक होते हैं?

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 3 साल पहले दावा किया था कि सिर्फ 20 लाख रुपए में पूरी दिल्ली की पराली को गलाया जा सकता है। इसमें तो वो बजट का भी बहाना नहीं दे सकते हैं। उस समय भी गोपाल राय ही पर्यावरण मंत्री थे, जो अब हैं। डीकंपोजर के छिड़काव के समय बड़े-बड़े दावों में वो भी शामिल थे। कहाँ है आज वो डीकंपोजर? दिल्ली की पूरी पराली 20 लाख रुपए में खाद क्यों नहीं बन रही? ये फॉर्मूला उनकी पार्टी पंजाब में क्यों नहीं अपना रही?

अरविंद केजरीवाल ने अलग-अलग कार्यक्रमों में इस ‘बायोकेमिकल सलूशन’ की बात करते हुए बताया था कि ये बहुत सस्ता है और दिल्ली की तरह पंजाब में भी ये किया जा सकता है, वो लोग क्यों नहीं कर रहे? आज अरविंद केजरीवाल खुद से पूछें कि वो पंजाब में उनकी ही सरकार ये क्यों नहीं कर रही? एक रैली में उन्होंने इसी तरह दावा किया था कि पंजाब में कई फैक्ट्रियाँ लगाई जा सकती हैं जो पराली से कोयला बनाएँगे और इससे किसानों को 1000 रुपए प्रति एकड़ पैसे मिलेंगे सो अलग।

उन्होंने यहाँ तक दावा किया था कि पराली काट कर ले जाने के लिए भी कंपनियाँ आएँगी, इसमें किसानों का पैसा या मेहनत नहीं लगेगी। इसी तरह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने पंजाब की तत्कालीन सरकार पर हमला बोला था। तब वहाँ कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे और कॉन्ग्रेस सत्ता में थी। तब केजरीवाल ने एक टाइमलाइन माँगते हुए कहा था कि दिल्ली की जनता सरकारों से स्पेसिफिक टाइमलाइन चाहती है कि आप कब पराली जलाना शुरू करेंगे और किसानों को मशीनें उपलब्ध कराएँगे।

इसी तरह एक और रैली में उन्होंने हरियाणा सरकार पर हमला बोला था। मीडिया से बात करते हुए भी उन्होंने पराली से कोयला बनाने की बात कही थी और कहा था कि कई फैक्ट्रियाँ किसानों की पराली खरीदने के लिए तैयार हैं। केजरीवाल का वो बायोकेमिकल सलूशन कहाँ है? कम बजट वाला आसान समाधान कहाँ है? है तो सिर्फ प्रदूषण और पराली से उठता धुआँ। कल वो टाइमलाइन माँगते थे, आज उनके पास इस समस्या के लिए टाइम ही नहीं है।


दिवाली के ‘पटाखों’ से पहले ही दमघोंटू हो गई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि पटाखे नहीं पराली है प्रदूषण की बड़ी वजह
(साभार: दैनिक जागरण)
कुछ वर्षों से आभास हो रहा है कि मौसम विभाग और National Green Tribunal(केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) कोहरा/fog का नाम शायद भूल गया है। जैसे ही श्राद्ध प्रारम्भ होते हैं, प्रदुषण नाम की महामारी दीवाली पर ग्रहण बन छा जाती है। हिन्दू संस्कृति के अनुसार हर त्यौहार किसी न किसी मौसम आने का संकेत देता है, लेकिन जब से हिन्दू विरोधियों ने जरुरत से ज्यादा सिर उठाना शुरू किया है, कभी होली पर, कभी करवा चौथ तो कभी दिवाली पर ज्ञान वाचक बन आ जाते हैं। लगभग 4 दशक पूर्व तक LPG आने से पहले हर घर में चूल्हा जलता था, कभी प्रदुषण का रोना नहीं रोया गया। फिर आज क्यों? क्या यह हिन्दुओं पर प्रहार नहीं? इस प्रश्न का जवाब हर हिन्दू विरोधियों के साथ-साथ नेताओं और पार्टियों को भी देना होगा। प्रदुषण के पीछे कौन-सा राज छुपा है? कोरोना के समय हुए लॉक डाउन में आसमान एकदम साफ दिखना शुरू हो गया था। कैसे? केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस पर चिंतन करने की जरुरत है। 

पराली आज पहली बार नहीं जल रही, लेकिन हिन्दू त्यौहारों पर कोहरा का नाम नहीं, पराली से हो रहे प्रदुषण का रोना रोकर दिवाली पर जलने वाली आतिशबाज़ी पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है, परन्तु आतिशबाज़ी नहीं जलने के बावजूद भी प्रदुषण दिवाली के अगले दिन कहीं अधिक होता है, क्यों? आतिशबाज़ी न जलने से इस उद्योग को कितनी हानि हो रही है, किसी नेता अथवा पार्टी ने कभी सोंचने की जहमत नहीं फ़रमाई। जिस कारण लोगों के रोजगार भी प्रभावित हो रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है, लघु उद्योग निम्न स्तर पर जा रहा है।  
ठंड का मौसम आते ही देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण बड़ी समस्या बनकर उभरता है। दिल्ली में स्मॉग छा जाने से लोगों को साँस लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किसानों द्वारा पराली जलाया जाना इसकी सबसे बड़ी वजह है। इसी क्रम में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बुलेटिन जारी किया है। बुलेटिन के अनुसार, दिल्ली का समग्र वायु गुणवत्ता सूचकांक नवंबर 3 को ‘बहुत खराब’ श्रेणी में रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 3 को राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स AQI 314 रहा, जिसमें पीएम 10 और पीएम 2.5 मुख्य प्रदूषक रहे। इससे पहले नवंबर 2 को यह आँकड़ा 303 से कुछ डिग्री अधिक था। नवंबर 3 को दिल्ली ही नहीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गुरुग्राम, गाजियाबाद, फरीदाबाद, बुलंदशहर और नोएडा समेत कई हिस्सों में AQI ‘बहुत खराब’ दर्ज किया गया। सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (सफर) के अनुसार, नवंबर 4 यानि दीपावली से हवा की गुणवत्ता और खराब होने की आशंका है।

माना जा रहा है कि एक्यूआई नवंबर 4 को ‘बेहद खराब’ श्रेणी के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच सकता है। पराली जलाने के कारण दिल्ली में पीएम 2.5 में भारी बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसके अलावा, प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान नवंबर 3 के लगभग 8% से बढ़कर नवंबर 4 को अनुमानित 20% हो सकता है। हवा के उत्तर-पश्चिमी दिशा में हुए बदलाव को इसका कारण माना जा रहा है।

दिल्ली के उत्तर-पश्चिम से आने वाली हवाएँ पराली जलाए जाने वाली हॉटस्पॉट पंजाब और हरियाणा से प्रदूषक हवाएँ लाती हैं। SAFAR के पूर्वानुमान में कहा गया है कि नवंबर 5 और 6 को प्रदूषण में पराली का शेयर 35 से 45 फीसदी तक पहुँच सकता है। ऐसे में पटाखों के कारण दिल्ली में हवा की गुणवत्ता का सूचकांक 4 से 6 नवंबर के बीच ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुँच सकता है।

हाल ही में पटाखों पर प्रतिबंध पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पटाखे अस्थायी मुद्दा हैं, जबकि पराली जलाना मुख्य मुद्दा है। यह स्वीकार करते हुए कि अदालत को इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला, जस्टिस एमआर शाह और एएस बोपन्ना की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वे दीवाली की छुट्टी के बाद इस मुद्दे को सुनवाई के लिए उठाएँगे।

राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए बच्चों का इस्तेमाल करते अरविन्द केजरीवाल, दिल्ली मुख्यमंत्री

अरविंद केजरीवाल
फिर से बच्चों का इस्तेमाल कर रहे केजरीवाल (फोटो साभार: ANI)
दिल्ली की हवा गुणवत्ता इंडेक्स ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में पहुॅंच गया है। सर्दियों के साथ ही दिल्ली का गैस चेंबर में बदल जाना रूटीन जैसा हो गया है। लेकिन, यहॉं रहने वाले लोगों की मजबूरी दोहरी है। दमघोंटू हवा में सॉंस लेने को मजबूर लोगों के लिए दिल्ली की आप सरकार की राजनीति घुटन बढ़ाने वाली है।
हवा की गुणवत्ता बेहद खराब होने के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम एवं नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने नवम्बर 1 को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जन स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा की। पॉंच नवंबर तक सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी। दिल्ली सरकार ने भी प्रदूषण की वजह से राजधानी के सभी स्कूलों को पॉंच नवंबर तक बंद कर दिया है। ऐसा बीते साल भी हुआ था। लेकिन, पिछली सर्दी से इस सर्दी के बीच जो चीज नहीं हुआ, वह है प्रदूषण रोकने के लिए जिन कदमों को उठाने की घोषणा आप सरकार की ओर से हुई थी उस पर अमल नहीं किया गया।
हरियाणा, पंजाब और दिल्ली से सटे राज्यों में पराली का जलना एवं दीपावली पर आतिशबाज़ी का छोड़ना कोई नई बात नहीं। लेकिन अब कुछ ही वर्षों से पराली और दीपावली पर आतिशबाज़ी से हो रहे प्रदुषण को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। लगभग एक दशक से अधिक पूर्व तक श्राद्ध समाप्त होते ही हम अपने युवा दिनों में आतिशबाज़ी छोड़ते थे,और दीपावली के दिन समस्त मौहल्ला और पास में जितने भी हिन्दू मौहल्ला थे, सारी रात आतिशबाज़ी होती थी, कोई प्रदुषण नहीं था। लेकिन जब से हिन्दू-विरोधियों ने हिन्दू त्यौहारों का विरोध शुरू किया है, तब से कुछ ज्यादा ही शोर मच रहा है। पहले इतनी प्रश्न यह है कि क्या कारण है कि कुछ वर्षों से प्रदुषण हो रहा है, आखिर कौन है इसका जिम्मेदार?



दिल्ली के मुख्यमंत्री पहले दिन से ही प्रदूषण का ठीकरा दीवाली की आतिशबाजी और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने पर फोड़ने की फिराक में लगे थे। हद तो यह है कि अपने इस राजनीतिक पैंतरे में अब उन्होंने दिल्ली के स्कूली बच्चों को भी शामिल कर लिया है। नवम्बर 1 को केजरीवाल ने स्कूली बच्चों से कहा कि पंजाब और हरियाणा में जल रही पराली के कारण प्रदूषण हो रहा है। उन्होंने बच्चों से कहा, “कृप्या कैप्टन अंकल और खट्टर अंकल को पत्र लिखें और कहें कि कृप्या हमारी सेहत का ध्यान रखें।”
कहॉं तो दिल्ली सरकार के जिम्मे हवा की गुणवत्ता को सुधारना था ताकि बच्चे अपने फेफड़े में जहर न भरें। लेकिन, उलटे उनका राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है। वैसा यह पहला मौका नहीं है जब केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया है। इस साल की शुरुआत में स्कूली बच्चों और उनके अभिभावकों को संबोधित करते हुए उन्होंने मोदी को वोट नहीं देने की अपील की थी। उन्होंने कहा था, “यदि आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं, तो उन लोगों के लिए वोट करें जो आपके बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। और यदि आप अपने बच्चों से प्यार नहीं करते हैं, तो मोदीजी को वोट दें।” केजरीवाल की ‘बच्चा पॉलिटिक्स’ सियासत में उनकी एंट्री से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने अपने बच्चों की कसम खाई थी कि न कॉन्ग्रेस को समर्थन देंगे और ना उससे लेंगे। लेकिन, 2013 में उन्होंने कॉन्ग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। इस बार भी लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस के साथ वे गठबंधन को लेकर कितने सक्रिय थे यह सबने देखा।
दिलचस्प यह भी है कि बीते साल जब दिल्ली की हवा बिगड़ गई थी तब केजरीवाल परिवार के साथ प्राइवेट ट्रिप पर दुबई चले गए थे। इस बार, ऐसे माहौल में भी वे टिके हुए हैं, क्योंकि चुनाव बस चौखट पर ही हैं। यही कारण है कि पराली पर उनके बयान को खारिज करते हुए पंजाब के मंत्री एसएस धर्मसोत ने कहा, “केजरीवाल की बात छोड़िए। जब वे पंजाब में प्रचार कर रहे थे तो कहा था कि एक बूॅंद पानी बाहर नहीं जाने देंगे। दो घंटे बाद हरियाणा में कहा कि पानी पर दोनों राज्यों का हक है। आखिर में दिल्ली में कहते हैं कि पानी पर सबका हक।”
केजरीवाल की इस सियासत को हर कोई बखूबी समझने लगा है। इसलिए, जितनी तेजी से वे चढ़े, उतनी ही तेजी से आप का प्रदर्शन गिर रहा है। पर असल सवाल यह है कि सियासत के फेर में कितना गिरेंगे
केजरीवाल?