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अगर दलित-जाट-तमिल कोई नहीं है हिंदू…नोमानी बताओ कि शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पठान और पासमांदा मुस्लिम हैं? अगर मुस्लिम है तो एक ही मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? मौलाना सज्जाद नोमानी खुले में कर रहा भारतीयों को तोड़ने का प्रयास: सनातनियों से करता है घृणा, तालिबानियों को भेजता है सलाम

                                                   सज्जाद नोमानी (फोटो साभार - यूट्यूब/)
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का एक विवादित बयान की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रही है। वायरल हो रही एक वीडियो क्लिप में वह दावा करते हैं कि भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। किसी भी परिस्थिति में हिंदुओं को बहुसंख्यक नहीं माना जा सकता।

नोमानी जिस तरह हिन्दुओं को विभाजित करने की कोशिश कर रहा है उसके जवाब में हिन्दुओं को भी इन कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि जब शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पासमांदा आदि दूसरे फिरके मुस्लिम हैं तो एक मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? क्यों नहीं एक ही कब्रिस्तान में मुर्दे को दफ़न किया जा सकता? इस कट्टरपंथी को मालूम है कि हिन्दू को जाति बांटकर विभाजित किया जा सकता है, लेकिन इन कट्टरपंथियों अपनी मुस्लिम कौम से सभी फिरकों को एक ही मस्जिद में नमाज पढ़ने और सभी के मुर्दे एक ही कब्रिस्तान में दफ़न होने चाहिए।

 

इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कुछ कालनेमि हिन्दू भी प्रोग्राम में शामिल थे,  क्योकि उनकी पार्टियों को इनके वोट चाहिए। वीडियो में देखिए कितनी मुस्लिम महिलाएं हिजाब, नकाब या बुर्के हैं। दूसरे, क्या शिया, सुन्नी और वहाबी आदि पचासों फिरकों के लिए अलग मस्जिद और कब्रिस्तान के लिए जगह क्या land jihad नहीं?               

मौलाना नोमानी ने अपने इस दावे के पीछे तर्क देते हुए देश के कई बड़े सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को हिंदू धर्म के दायरे से बाहर आते हैं। उन्होंने कहा, सिख, ईसाई और बौद्ध ये तो हिंदू हैं ही नहीं। इनके अलावा अनुसूचित जाति (SC), जाट और जनजातीय लोग भी हिंदू नहीं हैं। न ही तमिलनाडु के लोग और लिंगायत खुद को हिंदू मानते हैं। 

भाषण में नोमानी की दिखी हिंदू घृणा

अपने भाषण में नोमानी ने केवल सामाजिक वर्गीकरण ही नहीं किया, बल्कि देश की राजनीति और मुस्लिम समुदाय के रुख पर भी गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की। उन्होंने कहा “हमने हिंदुओं को ‘सेकुलर’ (धर्मनिरपेक्ष) और ‘फासिस्ट’ (फासीवादी) श्रेणियों में बाँट दिया। हम राजनीतिक समर्थन के लिए सेकुलर हिंदुओं पर निर्भर रहे, लेकिन इन समूहों ने आखिरकार देश की कमान उन लोगों के हाथों में सौंप दी जिन्हें हम फासिस्ट हिंदू कहते हैं। दोनों ने ही मिलकर हमारे मकसद को नुकसान पहुँचाया।”

 सज्जान नोमानी का यह भाषण 2 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ के समापन सत्र के दौरान दिया गया था।

यह कार्यक्रम इस मीडिया हाउस की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में रखा गया था। इस कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार शामिल थे।

मौलाना नोमानी ने जोर देकर कहा कि उनका यह बयान हवा-हवाई नहीं है, बल्कि देश भर में धार्मिक, जातिगत और आदिवासी पहचानों पर किए गए उनके तीन दशकों के सफर और शोध पर आधारित है।

पहले भी उगल चुका है हिंदुओं के लिए जहर

 हिंदुओं को तोड़ने और हिंदुओं को बाँटने की बात करने वाला सज्जाद नोमानी का ये पहला विवादित बयान नहीं है। ये वही सज्जाद नोमानी है जिसे तालिबान के आने पर खुशी हुई थी और जो बच्चियों की शिक्षा का विरोधी रहा है।

साल 2023 में नोमानी की वीडियो सामने आई थी। अपनी वीडियो में वह कहता सुनाई पड़ रहे थे, “पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।”

इतना ही नहीं साल 2021 में तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तब सज्जाद नोमानी ने भारत में इसका स्वागत किया था। मौलाना सज्जाद नोमानी ने तालिबान की तारीफों के पुल बाँधते हुए तालिबानियों को सलाम भेजा था।

सज्जाद नोमानी की हिंदू घृणा  और भारत को तोड़ने का प्रयास

अजीब बात है कि एक तरफ सज्जाद नोमानी खुलकर भारत के हिंदुओं के विरुद्ध अपनी घृणा जाहिर करता है, उन्हें बाँटने की बात करता है, उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता है। दूसरी तरफ खुलकर तालिबान के लिए अपना समर्थन देता है, इस्लामी कट्टरपंथ की पैरवी करता है, बच्चियों की पढ़ाई को हराम बताता है, बड़े-बड़े नेता, लेखक, विचारक उसके भाषणों को सुनते हैं और स्वरा भास्कर जैसे लोग तो मुस्लिमों के बीच राजनीति करने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे सरेंडर कर देते हैं। लेकिन फिर भी भारत के लिबरल उसे बुद्धिजीवी मानकर इतना बड़ा मंच देते हैं। उसे सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं।

कहना गलत नहीं है कि जिन ‘सेकुलर हिंदुओं’ ने कभी अपनी उदारता दिखाने के लिए नोमानी को ‘महान स्कॉलर’ के रूप में स्थापित किया, आज वही स्कॉलर मंचों से खुलेआम हिंदुओं के अस्तित्व और उनकी जनसांख्यिकीको चुनौती दे रहे हैं। आज मंच से खुलेआम इवकी नफरत जगजाहिर हो रही है।

नोमानी का यह दावा कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक नहीं हैं और जो खुद को हिंदू मानते हैं वो असल में अलग-अलग पहचानों में बंटे हैं… कोई साधारण बयान नहीं है।

ये हिंदुओं के लिए ही सीखने का समय है कि जब हम खुद को राजनीति जाति और क्षेत्रो में खुद को बाँटते हैं, तभी नोमानी जैसे लोग इसी कमजोरी को पकड़कर हम पर चोट करते हैं। खुलकर हम भारतीयों को तोड़ने का प्रयास करते हैं और ये संदेश देते हैं कि देश में हिंदू आबादी बहुसंख्यक नहीं है और जो लोग खुद को हिंदू मानते हैं वो अलग हैं। इसका सीधा उद्देश्य बहुसंख्यक समाज के भीतर एक ऐसा हीनभावना और भ्रम पैदा करना है जिससे वे अपनी सामूहिक ताकत को भूल जाएँ और कट्टरपंथी ताकतों का गजवा-ए-हिंद का रास्ता आसान हो सके।

बंगाल में बीजेपी सरकार बनने से बांग्लादेश क्यों परेशान? क्यों बाड़बंदी से डरा बांग्लादेश?

बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद बौखलाया बांग्लादेश, डर के मारे दे रहा भड़काऊ बयान (प्रतीकात्मक फोटो साभार: AI-ChatGPT)

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनते ही पड़ोसी देश बांग्लादेश में बौखलाहट साफ नजर आ रही है। कहीं बंगाल की नई सरकार के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, तो कहीं कट्टरपंथी मौलाना राज्य के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को खुलेआम जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। ना केवल कट्टरपंथी मौलाना बल्कि बांग्लादेश की सरकार में अहम पदों पर बैठे लोग भी इससे बौखलाहट में हैं।

इसके पीछे वजह केवल सरकार बदलना और एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी का आना नहीं है बल्कि उस पूरी वैचारिकी का बदलाव है जो इस सत्ता परिवर्तन से बंगाल में होने जा रहा है। भारत की खुली सीमा बांग्लादेश घुसपैठियों के लिए एक प्रवेश द्वार की तरह काम कर रही थी। ममता बनर्जी ने इसे बंद करने का विरोध कर रहीं थी लेकिन अब हालात बदल गए हैं। शुभेंदु अधिकारी ने बाड़बंदी को प्राथमिकता दी है और यही नकेल कट्टरपंथियों की बेचैनी को बढ़ाती जा रही है।

शुभेंदु सरकार का BSF को बाड़बंदी को दी जमीन, ममता सरकार ने अटकाकर रखी

बंगाल में सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने पहले ही कैबिनेट फैसलों में भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी। नई सरकार ने फैसला लिया कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर जिन इलाकों में अब तक बाड़बंदी नहीं हो सकी थी, वहाँ के लिए जरूरी जमीन 45 दिनों के भीतर BSF को सौंप दी जाएगी।

शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि उनकी सरकार सीमा सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी। राज्य सरकार के इस फैसले से सीमा पर बाड़बंदी पूरी होने के बाद डेमोग्राफी बदलने की साजिश के तहत घुसपैठ, मवेशियों की तस्करी और गैरकानूनी नेटवर्क पर रोक लगेगी।

तब जमीन ममता बनर्जी की TMC सरकार के कार्यकाल में अटका हुआ था। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुँचा था, तब हाई कोर्ट ने तत्कालीन ममता सरकार को फटकारा BSF को तय जमीन न देने के लिए फटकारा था और सरकार के अधिकारी पर ₹25 हजार का जुर्माना भी लगाया था।

बाड़बंदी के फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी, तारिक रहमान के एडवाइजर का बयान

शुभेंदु सरकार के इस फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी बढ़ गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेशी मामलों के सलाहकार (एडवाइजर) हुमायूं कबीर ने इस फैसले पर कहा कि बांग्लादेश को ‘काँटेदार तार’ से डराया नहीं जा सकता। इसके साथ ही बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) को अलर्ट पर रखे जाने की भी खबर सामने आई है।

यानी जिस फैसले को पश्चिम बंगाल की नई BJP सरकार सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित से जोड़कर देख रही है, उसी फैसले ने बांग्लादेश में राजनीतिक और कट्टरपंथी हलकों की बेचैनी बढ़ा दी है।

बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन और कट्टरपंथियों के भड़काऊ बयान

बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच भी खलबली मची है। ये कट्टरपंथी सड़कों पर उतरकर बंगाल की नई सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं कई मौलाना भी खुलकर बंगाल की BJP सरकार और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलते दिखाई दे रहे हैं।

एक वायरल वीडियो में बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन ‘इंसाफ कायमकारी छात्र श्रमिक जनता’ से जुड़े मौलाना ने हिंदू घृणा में कहा, “अगर भारत के 40 करोड़ मुस्लिम गुस्से में आ गए तो हिंदू नहीं बचेंगे।” उसने पाकिस्तान की मदद से भारत पर हमला करने और ‘तीन घंटे में कब्जा’ करने जैसे बयान भी दिए। वीडियो में उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का नाम लेकर धमकी दी।

शुभेंदु अधिकारी को बॉर्डर पर गाड़ने की धमकी

एक और वीडियो सामने आया, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को सीमा पर दफन करने की धमकी जारी कर रहा है। यह वीडियो ‘द इंकलाब’ नाम से फेसबुक पेज से प्रसारित किया जा रहा है। हालाँकि, पुलिस इस वीडियो की पुष्टि के लिए जाँच कर रही है।

उधर, बांग्लादेश का मौलाना इनायतुल्लाह अब्बासी कहता है कि अगर बंगाल में मुस्लिम सुरक्षित नहीं है, तो बांग्लादेश में भी हिंदुओं को सुरक्षित नहीं रहने दिया जाएगा। वह बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार को भारत के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने की चेतावनी देने के लिए भड़का रहा है।

बंगाल में ‘पोरिबर्तन’ की जमीनी हकीकत, सीमापार के गोरख धंधे होंगे अब बंद

पश्चिम बंगाल में BJP की बढ़ती राजनीतिक ताकत और चुनावी सफलता के बाद बांग्लादेश की बौखलाहट साफ दिख रही है। बंगाल की करीब 2200 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से लगती है और इसका एक हिस्सा खुला हुआ था। वर्षों से यह इलाका अवैध घुसपैठ, पशु तस्करी, नकली नोटों के नेटवर्क तथा कट्टरपंथी गतिविधियों का हब बना हुआ था।

पश्चिम बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति के कारण सीमा सुरक्षा को लेकर ममता बनर्जी की सरकार में कठोर कदम नहीं उठाए गए। वोट बैंक की राजनीति के चलते अवैध घुसपैठियों को संरक्षण मिलता रहा और धीरे-धीरे कई सीमावर्ती जिलों की जनसांख्यिकी तक प्रभावित हुई। यहाँ तक बातें सामने आईं कि बांग्लादेश की और से किए अवैध कामों को तुष्टिकरण की राजनीति में डूबी सरकार की ‘ममता’ मिली हुई थी।

अवलोकन करें:-

बंगाल : मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को बॉर्डर पर दफन करने की धमकी, बांग्लादेश का मौलाना बोला- मु

अब जैसे-जैसे बीजेपी का प्रभाव बढ़ रहा है तो वैसे-वैसे उन तत्वों में घबराहट दिख रही है जो सीमा पार से चलने वाले अवैध कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पर निर्भर थे। बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठनों और वहाँ के मजहबी नेताओं और सरकारी अधिकारियों की प्रतिक्रियाओं को इसे से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है। उन्हें डर है कि यदि बंगाल में सख्त प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है तो अब तक जिन अवैध गतिविधियों को संरक्षण मिला हुआ था उन पर अंकुश लग सकता है।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज से गूंजेगी संसद; धधकाई राष्ट्रप्रेम की ज्वाला, पर इस्लामवादियों ने नहीं किया कबूल: नेहरू ने हटवाए माँ दुर्गा की स्तुति वाले छंद, ‘वंदे मातरम के 150 साल’ पर संसद में बेनकाब होगा लिबरल गैंग

आज हर बीतते दिन के साथ भारत का वह धूमिल इतिहास सामने आने लगा है, जिसे मुस्लिम वोटबैंक और मुस्लिम कट्टरपंथियों के क़दमों में घुटने टेक चुके नेताओं और उनकी पार्टियों ने जनता के सामने नहीं आने दिया। इन मुस्लिम वोट के भूखे नेताओं ने उस राष्ट्रीय गीत को ही खंडित करने में कोई हिचक नहीं दिखाई, जिसने स्वतंत्रता सेनानियों को एक ऊर्जा दी थी। जो नेता और पार्टियां अपने राष्ट्रीय गीत को ही खंडित कर दे क्या उनसे देशप्रेम की उम्मीद की जा सकती है और करनी भी नहीं चाहिए। 

याद हो कुछ समय जब भगवा ध्वज पर विवाद होने पर TimesNow नवभारत पर एंकर सुशांत सिन्हा ने भगवा ध्वज के राष्ट्रीय झंडे पर खुलकर प्रकाश डालते हुए बताया था कि जब सामने स्वतंत्रता दिखनी शुरू होने पर राष्ट्रीय ध्वज पर चर्चा में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमे कई सुझाव भी आए। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने 1906 में भगवा झंडे का सुझाव दिया जिसे स्वीकार भी कर लिया गया था। लेकिन कट्टरपंथी महात्मा गाँधी के पास गए और नेहरू का सुझाया भगवा ध्वज को नज़रअंदाज़ कर आखिर में विवश होकर तिरंगा रखा गया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (8 दिसंबर 2025) को लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ पर ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत करने जा रहे हैं। यह पहला अवसर है जब संसद में इस गीत के इतिहास, उसके महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर इतने व्यापक स्तर पर चर्चा होगी।

सरकार इस बहस को विशेष रूप से युवाओं तक वंदे मातरम् के संदेश को पहुँचाने का अवसर मान रही है। यह वही गीत है, जिसने स्वतंत्रता की अलख जगाई और भारतीय स्वाभिमान की नींव रखी।

संसद में ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत

 लोकसभा की कार्यसूची में सोमवार (8 दिसंबर 2025) को ‘राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा’ शामिल की गई है और इसके लिए दस घंटे का समय निर्धारित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बहस की शुरुआत करेंगे और उनके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने विचार रखेंगे।

विपक्ष की ओर से कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी वाड्रा और सांसद गौरव गोगोई को इस बहस में हिस्सा लेने के लिए चुना है। वहीं राज्यसभा में मंगलवार (9 दिसंबर 2025) को गृह मंत्री अमित शाह इस बहस का नेतृत्व करेंगे और उनके बाद स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा बोलेंगे। यह चर्चा उस समय हो रही है, जब हाल ही में चुनाव सुधारों और एसआईआर को लेकर संसद में कई बार गतिरोध देखने को मिला था।

वंदे मातरम् की रचना: साहित्य से राष्ट्रगीत बनने की यात्रा

वंदे मातरम् की रचना बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में 1882 में उन्होंने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।

यह गीत केवल कविता नहीं था, बल्कि माँ और मातृभूमि दोनों की आराधना का एक अद्भुत संगम था। इसमें भारत की धरती, प्रकृति और संस्कृति को देवी रूप में प्रस्तुत किया गया। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, तब वंदे मातरम् एक साधारण गीत से आगे बढ़कर आंदोलन की आवाज बन गया। स्कूलों, कॉलेजों, जनसभाओं और रैलियों में युवा इसे गाते थे और ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष को नई ऊर्जा देते थे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार संगीत में ढालकर जनता के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और अनेक नेताओं ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना दिया। उस समय यह गीत हर भारतीय के हृदय में साहस और प्रेरणा की अग्नि जलाने वाला एक मन्त्र बन चुका था।

अंग्रेजों का भय और प्रतिबंध

ब्रिटिश सरकार इस गीत को विद्रोह और स्वतंत्रता की भावना बढ़ाने वाला मानती थी। इसलिए 1910 के बाद प्रशासन ने स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् बोलने या गाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

छात्रों को स्कूलों से निकाला गया, नेताओं को जेल भेजा गया और कई लोगों को सजाएँ दी गईं, लेकिन फिर भी इस गीत की आवाज को दबाया नहीं जा सका। प्रतिबंध जितना कड़ा होता गया, वंदे मातरम् उतनी ही ताकत के साथ जनमानस में गूँजता रहा।

विदेशों में भारतीय पहचान का प्रतीक

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का पहला तिरंगा फहराया और उस तिरंगे पर वंदे मातरम् लिखा हुआ था। यह वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्वभर में भारत की आजादी और अस्मिता का प्रतीक बन गया।

मुस्लिम लीग ने किया विरोध और नेहरू ने की काँट-छाँट

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है।

नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ। नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कट्टरपंथियों ने हमेशा ही खड़ा किया विवाद

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।
बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”
यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

आज का वंदे मातरम्: भावना, पहचान और राष्ट्रगौरव

150 वर्ष बीत जाने के बाद भी वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है। यह राष्ट्रगौरव, समर्पण और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह गीत धर्म या राजनीति की सीमाओं में कैद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज है।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में संसद में होने वाली यह चर्चा केवल इतिहास याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का क्षण है कि राष्ट्र के प्रति प्रेम ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दुओं को शाहबाज़ शरीफ द्वारा दिवाली की बधाई देने पर भड़के कट्टरपंथी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोमवार (20 अक्टूबर 2025) को X पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर दीपावली की बधाई दी। इस संदेश में उन्होंने शांति, करुणा और सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। वो पाकिस्तान जहाँ हिंदू प्रताड़ित है, महिलाएँ असुरक्षित हैं और सनातन के धार्मिक स्थलों को तोड़ा जा रहा है, वहाँ के प्रधानमंत्री की बातें सोशल मीडिया यूजर्स को हजम नहीं हुईं और उन्होंने शहबाज को आड़े हाथों ले लिया।

शहबाज शरीफ ने क्या कहा?

शहबाज ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “दीपावली के शुभ अवसर पर, मैं पाकिस्तान और दुनिया भर में हमारे हिंदू समुदाय को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।” उन्होंने आगे लिखा, “जैसे दीपावली के प्रकाश से घर और दिल रोशन होते हैं, यह त्योहार अंधकार को दूर करे, सद्भावना बढ़ाए और हम सभी को शांति, करुणा और साझा समृद्धि के भविष्य की ओर मार्गदर्शन करे।”

शहबाज ने आगे लिखा, “दीपावली की भावना, जो अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और निराशा पर आशा का प्रतीक है, हमें हमारे समाजों के सामने आने वाली चुनौतियों, असहिष्णुता से लेकर असमानता तक को पार करने के लिए सामूहिक संकल्प लेने की प्रेरणा देती है। आइए हम सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि हर नागरिक, चाहे किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि का हो, शांति से जीवन यापन कर सके और प्रगति में योगदान दे सके।”

सीधे वॉट्सऐप ही कर दो: यूजर्स ने शहजाब को लगाई लताड़

पाकिस्तान में हिंदुओं पर हमले और उनकी प्रताड़ना को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने शहजाब शरीफ को जमकर लताड़ लगाई है। एक X यूजर ने उनके बधाई संदेश पर जवाब देते हुए लिखा, “सीधे पाकिस्तान के हिंदुओं को वॉट्सऐप (पर ही मेसेज) कर दो। वहाँ बमुश्किल ही हिंदू बचे हैं।”

पत्रकार आदित्य राज कौल ने भी शहबाज को जमकर लताड़ा। उन्होंने X पर लिखा, “पहलगाम में हिंदुओं को मारने के बाद अब उन्हें दिवाली की बधाई दे रहे हैं। शर्मनाक है पाकिस्तान। उन्होंने पाकिस्तान में हिंदू, ईसाई और सिख समुदाय को लगातार मार डाला और जबरन धर्म बदलवाया। अहमदियों पर भी हर हफ्ते हमला होता है। दुनिया का सबसे खराब और आतंक पसंद देश।”

अधिकारी और लेखक प्रणव महाजन ने शहबाज को जवाब देते हुए लिखा, “इतना लंबा संदेश देखकर अच्छा लगा लेकिन शब्द खाली लग रहे हैं। एक इंसान की असली पहचान ये होती है कि उसके कहने और करने में कितना अंतर है। आपके मामले में ये अंतर तो धरती और सूरज के बीच की दूरी से भी ज्यादा है।”

उन्होंने आगे लिखा, “आप ‘अंधकार पर उजाला’ की बात करते हैं लेकिन आपके शासन में पाकिस्तान के हिंदू घरों की रोशनी लगातार बुझती जा रही है। जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिरों का अपमान, हिंदू लड़कियों का अपहरण हो रहा है।”

पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचारों का कुचक्र

बँटवारे के बाद से ही पाकिस्तान में हिंदुओं पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक भेदभाव से लेकर उनके धार्मिक अधिकारों को भी आतंकिस्तान में छीना जा रहा है। पिछले हफ्ते की ही बात है जब पाकिस्तान में एक नाबालिग हिंदू का जबरन अपहरण किया गया, उसका धर्म बदलवाया गया और उसका पाकिस्तान के एक ड्रग्स तस्कर से निकाह करवा दिया गया। यह ड्रग तस्कर पहले से ही शादीशुदा था और 7 बच्चों को अब्बू था।

सिंध क्षेत्र की एक हिंदू अधिकार कार्यकर्ता ने दावा किया कि यह ऐसा इस क्षेत्र में एक महीने के भीतर चौथा मामला था। ऐसी घटनाएं जिन्हें सुनकर लोग सिहर जाएँ पाकिस्तान में आए दिन होती रहती हैं। हिंदू लड़कियों को निशाना बना जा रहा है और पुलिस ऐसे मामले में कार्रवाई तो छोड़िए शिकायत दर्ज करने तक की जहमत नहीं उठाती है।

पाकिस्तान के अत्याचारों की दास्तां ऐसी ही कि लगता नहीं है कि कोई आदमी ऐसा कृत्य कर भी सकता है। पाकिस्तान से भागकर भारत आए एक परिवार ने बताया था कि उन्हें काफिर कहा जाता था और तिलक लगाकर बाहर निकलने में भी डर लगता था। परिवार ने बताया कि जब में पाकिस्तान में थे तो एक हिंदू लड़के की मुस्लिम से लड़ाई हो गई तो मामले को धर्म पर लाया गया, उसके साथ मारपीट की गई और हिंदू लड़के के हाथ-पैरों के नाखून तक भीड़ ने उखाड़ लिए।

हिंदुओं का अपहरण, महिलाओं का रेप-जबरन धर्मांतरण और निकाह उस पाकिस्तान में आम चीजें हो गई हैं जिसका प्रधानमंत्री दीपावली पर शांति का संदेश दे रहा है। इस साल के मार्च में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि किस तरह पाकिस्तान में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं।

केंद्र सरकार ने कहा था, “पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ अत्याचार की खबरें आई हैं, जिनमें हिंदू भी शामिल हैं। धमकी, अपहरण, उत्पीड़न, जबरन धर्मांतरण और जबरन विवाह जैसी घटनाएँ सामने आई हैं, जो उन्हें पलायन करने के लिए मजबूर करती हैं।”

इसके अलावा हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमले और मंदिरों का अपमान भी आम बात हो गई है। मंदिरों को तोड़ने, उनकी संपत्ति हड़पने और पूजा की जगहों को बंद करने जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं। पाकिस्तान में हिंदू परिवार अक्सर शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय में अवसरों से वंचित तक रह जाते हैं।

यूरोपियन टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में ईसाइयों, हिंदुओं और अहमदिया मुसलमानों समेत सभी अल्पसंख्यकों पर मानवाधिकार हनन लगातार बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान की तथाकथित लोकतांत्रिक संस्थाएँ पूरी तरह से कमजोर हो गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अहमदिया मुसलमानों को हत्याओं, मनमानी गिरफ्तारियों और यहाँ तक कि उनके पूजा स्थलों और कब्रिस्तानों को अपवित्र करने का सामना करना पड़ा है।

मध्य प्रदेश : रीवा में सड़क पर मिला गाय का कटा सिर, अकबरी बेगम बोली- ‘100 रूपए में होती है गो मांस की होम डिलीवरी’: मोहम्मद इस्माइल समेत 2 लोग पकड़े गए

                                    मध्य प्रदेश के रीवा में मिला गाय का कटा सिर (फोटो साभार -फाइल फोटो )
मध्य प्रदेश के रीवा में शनिवार (27 सितंबर 2025) देर रात बिछिया थाना क्षेत्र के लक्ष्मण बाग मोहल्ले में एक अजीब और डराने वाली घटना सामने आई है। मोहल्लेवासियों को बीच सड़क पर एक गाय का कटा हुआ सिर मिला।

सुबह होते ही गुस्साए लोगों ने सिर सड़क पर रखकर चक्का जाम कर दिया और आरोपितों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग उठाई। स्थानीय लोगों का कहना है कि 27 सितंबर की रात दो अज्ञात व्यक्ति पहले इलाके में रेकी करते दिखाई दिए थे।

कुछ लोगों ने बताया कि वे संदिग्ध रात में मोहल्ले के आस-पास घूमते हुए देखे गए थे। सुबह मोहल्ले में घूमने वाली गाय गायब पाई गई और बाद में उसका कटा हुआ सिर मिला। जिसके बाद लोगों ने कार्रवाई की माँग करते हुए सड़क पर गाय का कटा हुआ सिर रख कर सड़क जाम कर दिया।

स्थानीयों लोगों ने बताया कि इलाके में कई बार ऐसी घटनाएँ हुई हैं, इसलिए लोग पहले से ही सतर्क थे और संदिग्ध गतिविधि पर ध्यान दे रहे थे। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि रात में मोहल्ले में घूमते हुए लोगों को देखा गया और बाद में CCTV फुटेज चेक करने पर कुछ अज्ञात शख्स संदिग्ध लग रहे थे।

एक वीडियो में तो गाय संदिग्धों से डरकर भागती हुई नजर आ रही हैं, जिसे स्थानीय निवासी विशाल सिंह परिहार ने ऑपइंडिया के साथ साझा की।

पुलिस की कार्रवाई

पुलिस ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है और आरोपितों की तलाश में जुटी है। ऑपइंडिया के पास मौजूद मामले की FIR कॉपी के मुताबिक, घटना वाले दिन ही अज्ञात आरोपितों के खिलाफ बीएनएस की धारा 196(2), 299 और 365, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(1) और मध्य प्रदेश गोवंश वध प्रतिषेध नियम 2004 की धारा 6/9 के तहत FIR दर्ज की गई है।

रीवा के मुख्य पुलिस अधीक्षक राजीव पाठक ने मौके का जायजा लिया और लोगों को आश्वासन दिया कि दोषियों के खिलाफ कड़ी और जल्द कार्रवाई की जाएगी। पुलिस सीसीटीवी फुटेज की जाँच कर रही है ताकि आरोपितों की पहचान की जा सके।

बिछिया थाने की एसएचओ, मनिधा उपाध्याय ने बताया कि पुलिस लगातार आरोपितों की तलाश कर रही है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने लोगों से सहयोग करने और शांति बनाए रखने की अपील की है। इस बीच, पुलिस ने मामले में दो लोगों मोहम्मद इस्माइल और एक नाबालिग को हिरासत में लिया है।

विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय नेता बालकृष्ण द्विवेदी ने कहा, “हमारी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। अगर प्रशासन ने आरोपितों को जल्दी गिरफ्तार नहीं किया तो बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा।”

घटना के बाद एक स्थानीय महिला अकबरी बेगम ने बताया कि उनके झोपड़ियों तक 100-200 रुपए में गोमांस पहुँचाया जाता है। पुलिस फिलहाल मामला दर्ज कर CCTV फुटेज, स्थानीय बयानों और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर जाँच कर रही है। 

अहमदाबाद क्रैश में भी इस्लामी कट्टरपंथी ढूंढ लाए गाजा का विक्टिम कार्ड, पीड़ितों के प्रति संवेदना जताने के बजाय चलाया एजेंडा: जिस जज ने स्टे दिया उससे क्यों नहीं सवालों-जवाब किये जाते?

                                      अहमदाबाद प्लेन क्रैश के बाद की भयवह तस्वीरें (साभार- CISF)
गुरुवार (12 जून 2025) को अहमदाबाद में हुए भीषण प्लेन क्रैश में 265 लोगों ने अपनी जान गँवा दी। कई अन्य लोग घायल भी हैं जिनका अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है। इस दुर्घटना के बाद देश ही नहीं दुनिया भर के लोग शोक व्यक्त कर रहे हैं, पर इसी बीच देश के ‘लिबरल समुदाय’ के कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस आपदा को अपने लिए ‘अवसर’ में तब्दील करने की कोशिश कर रहे हैं। यह कोशिश भी देश के अंदर के लोगों के लिए नहीं बल्कि गाजा के लोगों के लिए ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने की है।
जबकि सोशल मीडिया पर इस दुर्घटना के पीछे तुर्किश कंपनी पर शक किया जा रहा है, जिस पर कोई भी नेशनल चैनल अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं, क्यों? जिस जज ने भारत सरकार ने तुर्कीश कंपनी के कॉन्ट्रेक्ट पर स्टे लगाया उस पर कार्यवाही की मांग की जा रही है। जिस जज ने स्टे दिया उससे क्यों नहीं सवालों-जवाब किये जाते? आखिर किस दबाव में आकर उसने स्टे दिया था? केंद्र सरकार और मुख्य न्यायाधीश को गंभीरता से जज से पूछना चाहिए। इस बात की भी जाँच होनी चाहिए कि क्या जज किसी Deep State या टूलकिट का हिस्सा है?      

साभार सोशल मीडिया
आखिर भारत देश के जज, कब तक आतंकियों को स्पेशल ट्रीटमेंट देकर बचाते रहेंगे। पुकार करो, शंखनाद करो कि तुर्की की कंपनी सेलेबी एविएशन (Celebi Aviation) की सहायक कंपनी सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड भारत के 9 हवाई अड्डों पर उच्च सुरक्षा वाले कार्यों में सम्मिलित थी, सूत्रों के अनुसार उन 9 में एक ये अहमदाबाद का हवाई अड्डा भी सम्मिलित है। ऑपरेशन सिंदूर के समय तुर्की द्वारा पाकिस्तान का साथ देने के कारण भारत सरकार ने सेलेबी की सेवाएं समाप्त कर दी थीं... लेकिन माननीय न्यायालय के आदेश के कारण उसकी सेवाएं पुनः स्वीकृत कर दी गईं थी। तो यहां पर सम्पूर्ण दायित्व मान न्यायालय का ही बनता है

इस लिबरल समुदाय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अहमदाबाद प्लेन क्रैश को भी गाजा के लोगों से तुलना करनी शुरू कर दी। मुस्लिम समुदाय के कई लोग लिख रहे हैं कि अगर अहमदाबाद के विमान दुर्घटना पर लोग इतनी संवेदना जाताई रही है तो गाजा के लिए यह संवेदना क्यों नहीं है।

इस ‘विक्टिम कार्ड’ के पैंतरे को खेलने के चक्कर में लोगों ने बॉलीवुड के अभिनेताओं को भी नहीं बख्शा। बॉलीवुड के कई सितारों ने प्लेन क्रैश दुर्घटना पर शोक व्यक्त किया और पीड़ित परिवारों को साहस रखने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट साझा की। बॉलीवुड के अभिनेता शाहरुख खान ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपनी संवेदना प्रकट की तो इस पर कुछ यूजर्स गाजा के लिए विक्टिम कार्ड खेलने से नहीं चूके।

यूजर्स ने शाहरुख को इस बात का ताना दिया कि उन्होंने अहमदाबाद प्लेन क्रैश की संवेदना की तरह गाजा के लोगों के लिए कुछ क्यों नहीं लिखा।

इस प्लेन क्रैश में अभिनेता विक्रांत मेसी के चचेरे भाई की भी मौत हुई है। इस घटना पर शाहरुख खान के साथ-साथ सलमान खान, अनुपम खेर, सुनील शेट्टी, आमिर खान के प्रोडक्शन हाउस, अक्षय कुमार, अजय देवगन, अनुष्का शर्मा, रितेश देशमुख, सोनू सूद, परिणीति चोपड़ा, सारा अली खान, अल्लू अर्जुन, सोनाक्षी सिन्हा, करिश्मा कपूर, अभिषेक बच्चन, जूनियर NTR, आलिया भट्ट, करण जौहर समेत कई सितारों ने संवेदना प्रकट की है।

एक पाकिस्तानी नागरिक ने लिखा कि अहमदाबाद की दुर्घटना पर पाकिस्तानियों को दुख है, लेकिन इससे पहले गाजा के विषय पर भारतीयों ने जश्न मनाया था।

असल में तो इस ‘उदारवादी समुदाय’ को अपना प्रोपेगेंडा चलाने के लिए सिर्फ एक सहारे की आवश्यकता होती है। प्लेन क्रैश में मरे किसी भी व्यक्ति की जात-पात धर्म से किसी को कोई मतलब नहीं रहा। अन्य लोगों ने सिर्फ पीड़ितों की मदद और मृतकों के परिवार के लिए दुख जताया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोगों ने यहाँ पर भी गाजा के लिए विक्टिम कार्ड का पैंतरा खोज ही लिया। एक दुर्घटना को दो देशों के बीच की अनबन से कैसे जोड़ा जा सकता है, यह भला कोई इन जैसे यूजर्स से सीखे।

लोगों की मौत पर हँसने की प्रतिक्रिया

बात यहीं पर खत्म भी नहीं होती, दुर्घटना के बाद जब कई मीडिया हाउसेज ने इस बात की जानकारी अपने सोशल मीडिया पेज पर दी तो वहाँ पर भी सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ही जश्न मनाने और हँसने वाली प्रतिक्रियाएँ दीं। इन प्रतिक्रियाओं पर भी लोगों का आक्रोश सामने आया है।

मदद के लिए गायब, बस जवाब माँगना आता है

आतंकी हमला हो, प्राकृतिक आपदा हो या अब विमान दुर्घटना, एक परेशान करने वाला पैटर्न ये है कि जब असल में आम जनता की मदद करने या एकजुटता दिखाने की बात आती है तो इन ‘लिबरल’ वामपंथियों और उनके इस्लामी कट्टरपंथी साथी गायब हो जाते हैं। ये तब अपना फन उठाते हैं जब घटना को अवसर के रूप में इस्तेमाल करना हो- वो भी एकता या सहानुभूति के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए।
इस प्लेन क्रैश के बाद भी इन लिबरल्स ने लोगों की मदद करने नाम पर चुप्पी साध ली। न तो कोई रक्तदान करने के लिए सामने आया, न ही किसी ने पीड़ितों या मृतकों की सुध लेने की कोशिश की, रेस्क्यू के लिए भी इनमें से कोई सामने नहीं दिखा, न ही अस्पताल में परेशान भटक रहे परिजनों को ढाँढस बंधाने के लिए कोई दिखा। लेकिन सरकार से दुर्घटना पर जवाब माँगना ये लिबरल कतई नहीं भूले। सैकड़ों लोग अपनी जान बचाने की जिद्दोजहद कर रहे थे तब मदद के लिए वे लोग सामने आए जिन्हें ये ‘उदारवादी’ समुदाय गालियाँ देता है। ये है- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिन्हें ये लिबरल्स राजनीतिक लाभ के भूखे लगते हैं, वे कार्यकर्ता बिना किसी लाग लपेट के घटना के आधे घंटे के भीतर पीड़ितों की मदद के लिए पहुँच गए।
इस मदद के एवज में RSS कार्यकर्ताओं ने किसी तरह की नुमाइश या स्वयं को महान बताने की चेष्ठा नहीं की, बस चुपचाप लोगों का सहारा बने रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस/RSS) ने अहमदाबाद में ही नहीं बल्कि अपनी स्थापना से बाद से आज तक कई आपदाओं और संकटों के दौरान पीड़ितों की मदद की है। कई सामाजिक सेवा कार्य भी किए हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास शामिल हैं। आरएसएस ने विभिन्न आपदाओं और आपात स्थितियों के दौरान पीड़ितों को आश्रय, भोजन, कपड़े और चिकित्सा सहायता प्रदान की है।

संकटकाल में ढाल बन कर खड़े रहे RSS कार्यकर्ता

देश में आई आपदाओं और संकटकाल के समय RSS कार्यकर्ता जी जान से सेवा में जुटते हैं और लोगों के लिए संकट के सामने ढाल बनकर कड़े रहते हैं। इनमें 1971 का ओडिशा चक्रवात, 1977 का आंध्र प्रदेश चक्रवात, 2004 का हिंद महासागर भूकंप और 2004 का सुमात्रा-अंडमान भूकंप समेत कई अन्य विपदाएँ शामिल हैं।
युद्ध और संघर्षों की बात करें तो आरएसएस ने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1999 के कारगिल युद्ध के साथ कश्मीर में आतंकवाद के कारण प्रभावित लोगों की कई बार मदद की है। इसके अलावा आरएसएस ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान सिख समुदाय के लोगों की मदद की। 1971 में आए ओडिशा चक्रवात को याद करें तो उस समय आरएसएस कार्यकर्ताओं ने चक्रवात पीड़ितों को भोजन, पानी, कपड़े और चिकित्सा सहायता प्रदान की थी।
इसके बाद 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी में भी कार्यकर्ताओं ने पीड़ितों को चिकित्सा सहायता दिलाई। साथ ही त्रासदी के पीड़ितों के पुनर्वास में भी मदद की। इसके बाद 1999 में कारगिल युद्ध के समय भी आरएसएस ने युद्ध से प्रभावित परिवारों की मदद करने के साथ बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक जरूरतों को पूरा किया।
गुजरात में 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में सैकड़ों लोगों की जान गई। इस दौरान भी आरएसएस कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और भूकंप पीड़ितों को आश्रय, भोजन, कपड़े और चिकित्सा सहायता समेत अन्य जरूरतों का प्रबंधन किया। यही नहीं, 2004 में अंडमान के सुमात्रा में आए भूकंप और सुनामी में भी कार्यकर्ताओं ने पीड़ितों के लिए राहत कार्यों में जी जान से जुटे और उनके भी पुनर्वास में मदद की।
इसके अलावा 2020 में कोरोना महामारी, 2023 में दिल्ली में आई बाढ़ या फिर कोई अन्य परेशानी हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी लाठी और मजबूत कंधों के साथ हर पल लोगों की हरसंभव मदद के लिए खड़ा रहा है।
असल में इन लिबरल्स और उदारवादी लोगों को हर मुद्दे पर सिर्फ अपना हित साधना आता है। लोगों की परेशानी से इन्हें कभी कोई मतलब नहीं होता। राजनीतिक लाभ के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं। फिर अगर कोई इस समुदाय को बेपर्दा करने की कोशिश करे तो पूरी जमात ‘देशभक्ति’ का दावा ठोकने लगती है। इससे परे किसी विपदा के समय खुद तो कभी मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाते लेकिन दूसरे लोगों की मदद को प्रोपेगेंडा बताने से भी नहीं चूकते।

मध्य प्रदेश : चैंपियंस ट्रॉफी में भारत की जीत का जश्न मना रहे लोगों पर अल्लाह-हू-अकबर और नारा-ए-तकबीर चिल्लाती भीड़ ने कर दिया हमला: महू में आगजनी-पत्थरबाजी के बाद बुलानी पड़ी सेना; जेहादियों के आकाओं को भी गिरफ्तार करो

                                         इंदौर में कई जगह आगजनी भी हुई (साभार: Nai Dunia)
मध्य प्रदेश के इंदौर में चैंपियंस ट्रॉफी का जश्न मनाते लोगों पर मस्जिद से निकली मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया। रमजान में मस्जिद में मौजूद लोगों ने चैंपियंस ट्रॉफी का जश्न मनाने वालों पर पथराव किया। इंदौर के कुछ इलाकों में कई गाड़ियों में आग लगाई गई। इस घटना के कई वीडियो भी वायरल हुए हैं।

जेहादियों को भटका, गरीब और नादान बताने वाले हिन्दू विरोधी छद्दम सेक्युलरिस्ट्स कहाँ है? इन पाखंडियों से पूछो भारत की जीत का जश्न भारत में नहीं मनेगा फिर कहाँ मनेगा? इन भटके, गरीब और नादान लोगों के पास पेट्रोल बम के लिए पेट्रोल के पैसे किसने दिए? पत्थर किसने सप्लाई किये और पत्थरबाज़ी के पैसे किसने दिए? जब तक इनके आकाओं को नहीं गिरफ्तार जेलों में डाला जाएगा जेहादी काबू में नहीं आएंगे। और अगर कोई कोर्ट इनकी गिरफ़्तारी पर प्रश्नचिन्ह लगा जेल से बाहर करती है उन जजों से उसी वक़्त पूछा जाए कि जब इसी तरह की पत्थरबाज़ी और पेट्रोल बमों का इस्तेमाल होने की स्थिति में क्या निर्णय लोगे? जब तक तमाम अदालतें इन जेहादियों और इनके आकाओं के साथ सख्ती से पेश नहीं आएँगी हिंसा रुकेगी नहीं।         

रविवार(9 मार्च, 2025) को भारत ने न्यूजीलैंड को 4 विकेट से हरा चैंपियंस ट्रॉफी जीत ली थी। इसके बाद पूरे देश में जश्न का माहौल था। इंदौर में भी युवा इसका जश्न मना रहे थे। उन्होंने बाइक पर बैठ कर इंदौर के अलग-अलग इलाकों में जुलूस निकाला।

जब यह सभी इंदौर के महू शहर में जामा मस्जिद रोड पर पहुँचे तो मस्जिद के सामने विवाद हो गया। एक वायरल वीडियो में दिखता है कि जुलूस के यहाँ पहुँचते ही मस्जिद से मुस्लिम भीड़ निकल आती है। इसके बाद शोर मचने लगता है। इस दौरान जुलूस में शामिल लोग टीम की जीत पर नारे लगा रहे होते हैं।

कुछ ही देर में यहाँ जुलूस पर हमला हो जाता है। वायरल वीडियो में अल्लाह-हू-अकबर और नारा-ए-तकबीर के शोर भी सुनाई पड़ते हैं। इसके बाद लोग इधर उधर भागते हैं और पथराव होने लगता है। एक और वीडियो में दिखाई पड़ता है कि अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाती भीड़ एक स्कूटी तोड़ रही है।

इसके बाद यह पथराव जामा मस्जिद के अलावा पत्ती बाजार, सब्जी मार्केट, गफ्फार होटल समेत कई इलाके हिंसा की चपेट में आ गए। यहाँ भारतीय क्रिकेट टीम के फैन्स पर जम कर पथराव हुआ। इस पथराव के बाद दंगाई भीड़ ने कई गाड़ियों में आग भी लगा दी।

पेट्रोल बम भी चलाए जाने की सूचना है। दंगाई भीड़ ने कई जगह काफी गाड़ियाँ तोड़ी भी हैं। पथराव-आगजनी के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। दंगे की सूचना के बाद पुलिस मौके पर पहुँची और स्थिति को नियंत्रित किया। पुलिस के साथ ही फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ भी शहर में अलग-अलग जगह भेजी गईं।

इंदौर ग्रामीण एसपी हितिका वत्सल ने इस घटना के बारे में कहा, “इंडिया न्यूजीलैंड मैच के बाद जुलूस निकल रहे थे, इसमें मस्जिद के बाहर पटाखे चले तो विवाद हो गया। इसके बाद दो पक्षों के बीच पथराव हो गया। पुलिस बल अब मौजूद है। स्थिति नियंत्रण में है। अभी कुछ लोगों को चिन्हित किया गया है। रात को ही उनको पकड़ा गया है।”

एसपी ने अपील की कि लोग अफवाह ना फैलाएँ और उन पर विश्वास भी करें। एसपी वत्सल के अनुसार, 3 लोग इस पथराव में घायल हुए हैं। पुलिस ने घटना के बाद महू में लाठीचार्ज भी किया है। 300 से अधिक पुलिसवाले यहाँ तैनात किए गए हैं।

महू, भारतीय सेना का भी एक प्रमुख केंद्र है। इसके चलते प्रशासन ने सेना की भी त्वरित कार्यवाही बल (QRT) की 8 टुकडियां भी बुला लीं। सेना ने भी शहर में फ्लैग मार्च किया। पथराव करने वालों कड़ी कार्रवाई की माँग कई संगठनों ने की है।

कांग्रेस ने 39 साल पहले शरिया के लिए रौंदा संविधान; राहुल गांधी बताएं- हिंदुस्तान संविधान से चलेगा या शरिया से ?


हिंदुस्तान संविधान से चलेगा या शरिया से? यह एक बड़ा सवाल भारतीय समाज के सामने उठ खड़ा हुआ है। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ते के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एतराज जताया है। बोर्ड ने सर्वोच्च अदालत के फैसले पर कहा कि यह ‘शरिया’ (इस्लामी कानून) के खिलाफ है। सर्वोच्च अदालत ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को इद्दत की अवधि के बाद गुजारा भत्ता मांगने की अनुमति दी है। लेकिन भारतीय मुसलमान इसे मानने के लिए तैयार नहीं है। वे अपनी सुविधा के अनुसार कभी संविधान तो कभी शरिया मानना चाहते हैं। वे शरिया के अनुसार चार शादियां करना चाहते हैं, वे तलाक के बाद महिलाओं को गुजारा भत्ता नहीं देना चाहते। शरिया में पत्थर मारकर मौत की सजा देना भी शामिल है, लेकिन वे इसकी चर्चा तक नहीं करते। इन दिनों संविधान की किताब हमेशा साथ लेकर चलने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अब अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए कि भारतीय मुसलमान जो संविधान को नहीं मानना चाहते तो उनसे क्या कहेंगे।

तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भी भरण-पोषण पाने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक फैसले में कहा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के अनुसार पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार रखती हैं। इसके लिए वह याचिका दायर कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला मोहम्मद अब्दुल समद नामक मुस्लिम युवक की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा है कि उसका यह निर्णय हर धर्म की महिला पर लागू होगा। इसी को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शरीयत के खिलाफ बता रहा है।

AIMPLB ने कहा-सुप्रीम कोर्ट का फैसला शाहबानो केस जैसा
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की रविवार (14 जुलाई) को हुई कार्यसमिति की बैठक में आठ प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। यह जानकारी बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने दी। बैठक के बाद AIMPLB ने बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शाहबानो केस जैसा बताया और कहा कि ये फैसला शरीयत कानून में मतभेद पैदा करने वाला है। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को मजहब के मुताबिक ज़िंदगी जीने का अधिकार है। इसके साथ ही AIMPLB ने उत्तराखंड के UCC को धार्मिक आजादी के खिलाफ बताते हुए उसे भी चुनौती देने का ऐलान किया। बोर्ड ने कहा कि यह संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता का भी हनन करता है। बोर्ड का कहना कहा कि गुजारा भत्ता वास्तव में मुस्लिम महिलाओं के लिए भीख है। जब पति ने महिला से रिश्ता ही खत्म कर लिया, तो वह उससे गुजारा-भत्ता के रूप में भीख क्यों मांगे।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुस्लिम महिलाओं के हित में नहींः AIMPLB
AIMPLB के प्रवक्ता डॉ क़ासिम रसूल इलियास ने बताया कि बोर्ड की वर्किंग कमेटी में 5 महिलाओं समेत 51 मेंबर हैं। इसकी मीटिंग में पहला resolution सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट पर पास किया गया। इसमें कहा गया है कि निकाह एक पवित्र बंधन होता है लेकिन हम अपने मज़हब के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारे ये हमारा पर्सनल राइट है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये आदेश महिलाओं के हित में है लेकिन हमें लगता है कि ये महिलाओं के हित में नहीं है।

पुरुष को गुजारा भत्ता देना है तो वह तलाक क्यों देगाः AIMPLB
इलियास ने बताया कि इस्लाम तलाक को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करता है। अगर तलाक के बाद भी पुरुष को गुजारा भत्ता देना है तो वह तलाक क्यों देगा? और अगर रिश्ते में कड़वाहट आ गई है तो इसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा? हम कानूनी समिति से सलाह-मशविरा करके इस फैसले को वापस लेने के बारे में विचार विमर्श करेंगे। हम अपनी लीगल कमेटी से कंसल्ट करके इसे रोलबैक कराने पर विचार करेंगे।

उत्तराखंड में यूसीसी को देंगे चुनौती
सैयद कासिम इलियास ने कहा कि उत्तराखंड के यूसीसी कानून को चुनौती दी जाएगी। उन्होंने कहा कि विविधता हमारे देश की पहचान है, जिसे हमारे संविधान ने संरक्षित रखा है। यूसीसी इस विविधता को खत्म करने का प्रयास है। यूसीसी न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि हमारी धार्मिक स्वतंत्रता के भी खिलाफ है। उत्तराखंड में पारित यूसीसी सभी के लिए परेशानी का कारण बन रही है। हमने उत्तराखंड में यूसीसी को चुनौती देने का फैसला किया है। हमारी कानूनी समिति तैयारी में जुटी है।

शरिया नहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट को मानते हैं भारतीय मुसलमान
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय मुसलमान खुद शरिया को नहीं मानते हैं। वे अंग्रेजों द्वारा बनाए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अप्लीकेशन एक्ट 1937 को मानते हैं। यह मुसलमानों के बीच विवाह, गोद लेने, विरासत, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने के लिए इस्लामी कानून को मान्यता देता है। मुस्लिमों में निकाह (विवाह) को एक अनुबंध माना जाता है, जो संतानोत्पतत्ति और बच्चों को वैध बनाने के लिए होता है। इसीलिए मुस्लिम शादियों में निकाहनामा (विवाह अनुबंध) की व्यवस्था है। इसमें महर का जिक्र भी होता है। महर वह धनराशि है जो विवाह के समय वर या वर का पिता, कन्या को देता है। एक महर तत्काल होती है, जो महिला को विवाह के वक्त ही मिल जाती है। दूसरी महर निकाह के वक्त तय कर दी जाती है, जो तलाक या पति की मृत्यु के वक्त मिलती है।

शरीयत में तलाक के बाद भरण-पोषण का अधिकार नहीं
आमतौर पर शरीयत में तलाक के बाद महिलाओं को इद्दत तक गुजारा-भत्ता पाने और महर (मेहर) के अलावा गुजारा-भत्ता पाने का सामान्य अधिकार नहीं है। इद्दत सामान्यतौर पर तलाक या पति की मृत्यु के बाद तीन माह तक की अवधि होती है। हालांकि, तलाक के वक्त अगर कोई महिला गर्भवती है तो बच्चे के पैदा होने तक का खर्च पति उठाएगा। इसके बाद अगर मां बच्चे को दूध पिलाती है तो केवल बच्चे का खर्च पिता देगा। बाकी तलाकशुदा लड़की के लिए केवल पिता और भाई जिम्मेदार होते हैं।

सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मांग सकती थीं अधिकार
हालांकि, साल 1986 के पहले तक सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मुस्लिम महिला भरण-पोषण का अधिकार मांग सकती थी. सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने का अधिकार सभी धर्मों की महिलाओं के पास था और मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, 1985 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इसकी पुष्टि भी की थी।

शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना नजीर
शाहबानो इंदौर की रहने वाली एक महिला थी। साल 1975 में शाह बानो के पति मोहम्मद अहमद खान ने उसे तलाक दे दिया। शाहबानो और उसके 5 बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। उस समय शाहबानो की उम्र 59 साल की थी। शाहबानो ने अदालत से न्याय की मांग की । हालांकि उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने दलील दी कि तीन तलाक के बाद इद्दत की मुद्दत तक ही तलाकशुदा महिला की देखरेख की जिम्मेदारी उसके पति की होती है। तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का कोई प्रावधान नहीं है। मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा था। लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। पांच जजों की संविधान पीठ ने 23 अप्रैल 1985 को मुस्लिम पर्सनल लॉ बॉर्ड के आदेश के खिलाफ जाते हुए शाहबानो के पति को आदेश दिया कि वो अपने बच्चों को गुजारा भत्ता दे।

मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेके
सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो मामले में फैसला आने के बाद भारतीय मुसलमानों ने विरोध करना शुरू कर दिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेक दिए थे। मुस्लिम तुष्टिकरण में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून 1986 सदन में पेश किया। शाहबानो मामले में राजीव गांधी की सरकार के द्वारा उठाए गए कदम को लेकर देश भर में सरकार के खिलाफ एक माहौल देखने को मिला।

कांग्रेस ने 39 साल पहले शरिया के लिए रौंदा संविधान
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता का अधिकार दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बड़ी राहत और मानवीय संवेदनाओं वाला बताते हुए भाजपा ने कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया है। भाजपा सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. सुधांशु त्रिवेदी ने शाह बानो केस याद दिलाते हुए कहा कि 39 साल पहले राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने शरिया के लिए संविधान को रौंदा था। उन्होंने कहा कि 1985 में संविधान पर बहुत बड़ा खतरा आया था, जब शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक गरीब मुस्लिम महिला को भत्ता देने के लिए आया था। तब उसे शरिया के विरुद्ध मानकर राजीव गांधी के नेतृत्व में चल रही तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को रौंदकर संविधान के ऊपर शरिया को कर दिया था। तब संविधान खतरे में था। यह हमें फिर याद दिलाता है कि जब-जब यह सत्ता में आए, अनेक बार संविधान को खतरे में डाला।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019
इसके बाद मोदी सरकार ने साल 2019 में मुस्लिम महिलाओं के हक की रक्षा के लिए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019 लाया। इसके तहत अगर किसी मुस्लिम महिला को पति ने तलाक कहकर तलाक दे दिया है, तो वह भरण-पोषण भत्ता मांग सकती है। यही नहीं, इस अधिनियम के तहत अगर कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप में या किसी भी दूसरे तरीके से तलाक की घोषणा करता है तो वह शून्य और अवैध माना जाएगा। हालांकि, तलाकशुदा मुस्लिम महिला के पास यह अधिकार है कि वह इस अधिनियम को माने या फिर किसी अन्य कानून या परंपरा में उपलब्ध दूसरे विकल्प का चुनाव करे।

पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले की 3 बड़ी बातें
1. SC का फैसला शरिया कानून के खिलाफ
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरियत के खिलाफ बताया है। AIMPLB के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला शरिया कानून से कॉन्फ्लिक्ट करता है। उन्होंने कहा कि मुसलमान शरिया कानून का पाबंद है। वो ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकता जो शरिया से कॉन्फ्लिक्ट करता हो. उन्होंने कहा कि संविधान के आर्टिकल 25 में हमें अपने मजहब के अनुसार जिंदगी गुजारने की आजादी दी गई है, ये हमारा मौलिक अधिकार है. वहीं AIMPLB की एग्जीक्यूटिव मेंबर मुनीसा ने भी SC के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा है कि यह महिलाओं के हक में नहीं है।

2. महिलाओं के लिए मुसीबत साबित होगा फैसला
AIMPLB का कहना है कि सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं को कोई फायदा नहीं होगा बल्कि ये फैसला उनके लिए एक नई मुसीबत पैदा कर देगा। बोर्ड का कहना है कि अगर किसी शख्स को तलाक के बावजूद आजीवन पत्नी का खर्चा उठाना पड़ेगा तो फिर वो तलाक क्यों देगा? बोर्ड के प्रवक्ता ने दावा किया है कि इससे मुस्लिम महिलाओं को आजीवन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. उनका पति उन्हें तलाक न देकर आजीवन परेशान करता रहेगा।

3. फैसले के खिलाफ लड़ेंगे कानूनी लड़ाई
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में तय किया गया है कि गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। बैठक में वर्किंग कमेटी ने बोर्ड को अथॉरिटी दी है कि लीगल कमेटी से बात कर इस फैसले को रोलबैक करने की दिशा में काम किया जाए. बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा है कि हमने ये महसूस किया है कि देश में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल है और मुसलमानों के लिए शरिया लॉ है। कोर्ट का ये फैसला शरियत से कॉन्फ्लिक्ट करता है लिहाजा हम पूरी कोशिश करेंगे कि इस फैसले को रोलबैक किया जाए।