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कांग्रेस के मुखपत्र National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा, उस बांग्लादेश के ‘निष्पक्ष चुनाव’ की दे रहा दुहाई जहाँ विपक्ष को बोलने की आजादी तक नहीं

     National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा (साभार: National Herald/TheDailyStar)
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद पूरे देश में हिंसा फैली, जो आज भी जारी है खासकर हिंदुओं के खिलाफ। फिर शेख हसीना की सरकार गिरने के लगभग 1.5 साल बाद बांग्लादेश में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में भी हिंसा की कई खबरें सामने आईं। इसके बावजूद कांग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ का मानना है कि ‘भारत को बांग्लादेश से सीखने की जरूरत है।’

दरअसल, खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ बताने वाले सौरभ सेन ने नेशनल हेराल्ड के लिए एक आर्टिकल लिखा है। इस आर्टिकल को सौरभ सेन ने स्वीडन के मीडिया आउटलेट ‘नेत्र न्यूज’ के ऑडिट के हवाले से लिखा है, जो दावा कर रहा है कि बांग्लादेश में आम चुनाव 2026 में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और उन दावों को खारिज किया जो बांग्लादेश के विपक्षी दल कहते आ रहे हैं कि चुनाव में धाँधली हुई है।

अगर भारत में हुए प्रथम चुनाव से लेकर चर्चा की जाए कांग्रेस के कार्यकाल में ही सबसे ज्यादा धांधलियां सामने आएँगी। जहाँ हारे हुए कांग्रेस उम्मीदवार को कांग्रेस सुप्रीमो के आदेश पर जीता हुआ घोषित कर दिया जाता था। 

कांग्रेस  की आवाज बनकर नैरेटिव गढ़ने वाले ‘नेशनल हेराल्ड’ ने राहुल गाँधी के ही स्वर में अपनी बात रखी है। आर्टिकल में भारत के चुनाव आयोग पर सवाल उठाए गए, सरकार पर तंज कसा गया और यहाँ तक कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास न होने का ठीकरा भी सरकार पर ही फोड़ डाला।

नेशनल हेराल्ड के आर्टिकल की हेडलाइन- बांग्लादेश में हुए ‘ऑडिट’ से भारत के लिए सबक, से ही भारत-विरोधी स्वर गूँज रहे हैं। यहाँ लेखक सौरभ सेन दावा करते हैं कि बांग्लादेश तो भारत से कहीं आगे और बेहतर देश है और भारत को उससे कुछ सीखना चाहिए, जबकि हकीकत से इससे कहीं परे है। यहाँ खासतौर से हाल ही में बांग्लादेश के आम चुनाव 2026 को ‘पारदर्शी’ बताने का दावा कर भारत को सबक लेनी की बात कही जा रही है।

यहाँ नेशनल हेराल्ड उस देश के चुनावों में ‘पारदर्शी’ की बात कर रहा है, जहाँ कई सालों तक सत्ता में रही शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ को ही चुनाव लड़ने से रोका गया। पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं बांग्लादेश में हाल ही में हुए चुनाव पर कई सवाल खड़े हुए, जब चुनावों में हिंसा और हेराफेरी की खबरे सामने आईं।

सच: बांग्लादेश में चुनावी हिंसा और भारत में सख्त नियम

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में लिखा- भारत का चुनाव आयोग चाहे तो चुनाव और नतीजों की जाँच को और ज्यादा पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद बना सकता है।

जबकि सच क्या है, यह सबके सामने आ चुका है। कैसे बांग्लादेश में चुनावों में हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। कहीं मतदान केंद्र पर बम धमाका हुआ, तो कहीं गोलीबारी हुई, कई मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों की आपसी झड़प में माहौल गरमाया। मानवाधिकार संगठन ओधिकार के अनुसार, 13 फरवरी से 28 फरवरी के बीच 104 हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 10 लोगों की मौत हुई और 476 से ज्यादा लोग घायल हुए।

अभी बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में कितने बम पकडे गए, अगर नहीं पकडे जाते मतदान के दौरान क्या होता जनता देखती रही है।  

रही पारदर्शी की बात, तो बांग्लादेश चुनावों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी BNP के नेताओं ने ही वोटिंग प्रक्रिया में ‘हेराफेरी‘ के आरोप लगाए। ऐसे ही चुनावों से पहले हवा बनाने वाली जमात-ए-इस्लामी ने भी यही आरोप लगाए।

तो यहाँ भारत को क्या सीखने की जरूरत है? वोटिंग प्रक्रिया में हेराफेरी या मतदाताओं पर हिंसा? क्योंकि हाल ही में बंगाल चुनाव देख लीजिए। पिछले बंगाल चुनाव 2021 में मिली सभी शिकायतों का चुनाव आयोग ने हल ढूँढा। भारत के चुनाव आयोग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। जिस बंगाल में साल 2021 के चुनाव परिणामों के बाद हिंसा फैली, उससे सबक लेकर चुनाव आयोग ने मतदान के दौरान देशभर से आए भारी सुरक्षाबल को तैनात किया।

यानी अगर कोई प्रदेश हिंसा के लिए जाना भी जा रहा है, तो चुनाव आयोग अपनी तरफ से कायदे-कानून बनाने में कमी नहीं कर रहा है। जहाँ नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में बैलट पेपर पर हुए चुनावों की वाहवाही करते नहीं थक रहा है, वहीं भारत में EVM से ‘पारदर्शिता’ के साथ चुनाव संपन्न हो रहे हैं। और अब तो चुनाव आयोग EVM से छेड़छाड़ की घटना पर भी सख्त हो गया है।

तो इससे पता लगता है कि भारत का चुनाव आयोग चाहता नहीं, करके दिखाता है कि कैसे भारत में चुनाव पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद होते हैं।

सच: बांग्लादेश में ‘नाम’ का महिला आरक्षण और भारत में महिला आरक्षण पर सरकार ‘गंभीर’

आर्टिकल में यह भी लिखा गया, “भारत में बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में तेजी से पेश किया। पार्टी को पता था कि उसके पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है, फिर भी उसने ऐसा किया। इसका मकसद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी के चुनावों से पहले महिलाओं के बीच अपनी छवि मजबूत करना था।”

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

ये जो नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में महिलाओं के आरक्षण पर बात करता है, क्या इन्होंने कभी बांग्लादेश में महिालओं के हालात पर मुद्दा उठाया है। बांग्लादेश में महिलाओं की हालत क्या है? यह सबको पता है। आए दिन गैंगरेप की घटनाएँ और मारपीट की घटनाओं से साफ पता लगता है कि बांग्लादेश में महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता है।

खासकर हिंदू महिलाएँ, जो घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें घर में भी सुरक्षित नहीं छोड़ते हैं। महिलाओं को आरक्षण देने वाला बांग्लादेश ही है, जिसे महिला का शक्ति रूप ‘माँ दुर्गा’ की पूजा से दिक्कत है। हर साल दुर्गा पूजा में हिंसा की खबरें सामने आती हैं, कहीं देवी की मूर्ति तोड़ी जाती है, कहीं पत्थरबाजी होती है।

और बांग्लादेश में महिला आरक्षण पर बात करने वाला नेशनल हेराल्ड कांग्रेस की ही आवाज है, जिसने भारत की संसद में महिला आरक्षण कानून का विरोध किया। तो कहना बिल्कुल शोा नहीं देता कि भारत को यह सीखने की जरूरत है कि महिलाओं का कैसे सम्मान करना है?

‘नेशनल हेराल्ड’ चलाने वाली कांग्रेस को बांग्लादेश से ‘प्रेम’, पर भारत का ‘विरोध’

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में भारत को बांग्लादेश से जो भी सीख लेने की बात कही, वह सीख अगर भारत ने ले ली तो उसकी भी हालत बांग्लादेश जैसी ही होगी। वही बांग्लादेश, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है, विरोध प्रदर्शनों को बल से दबाया जाता है, विपक्षी दलों को प्रतिबंध कर दिया जाता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं।
एक ओर कांग्रेस है, जो संसद में रोजाना लोकतंत्र और संविधान की बात कर लगातार सरकार पर हमलावर रहती है, और दूसरी ओर उसी का मुखपत्र जो लोकतंत्र के नाम पर डूबे हुए बांग्लादेश से भारत को सबक लेने की सीख दे रहा है। असल में कांग्रेस सिर्फ भारत-विरोधी बात करना जानती है, चाहे उसे भारत से कमतर देश से ही क्यों न भारत की तुलना करनी पड़े।
कांग्रेस पार्टी बुद्धीजीवी बनकर अपने समाचार पत्र में महिलाओं के आरक्षम की बात करती है, लेकिन जब महिलाओं के अधिकारों की बात आती है तो पीछे हट जाती है। इसका ताजा उदाहरण लोकसभा में देखने को मिला, जब सरकार महिला आरक्षण कानून लेकर आई और कांग्रेस ने इसका जमकर विरोध किया।
कांग्रेस को नहीं बोलना चाहिए कि भारत को क्या और किससे सीखने की जरूरत है। ये वही लोग हैं जो वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, EVM की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन बैलेट पेपर की निष्पक्षता उन्हें अच्छी लगती है। ये वही लोग हैं, जो भारत के हित में एक बात कहने में हिचकते हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की वाहवाही करते नहीं थकते।

कांग्रेस मुखपत्र के लिए काम करने वाली संजुक्ता बसु को राहुल गाँधी के लिए आर्टिकल लिखने के लिए बोले 3000 रूपए , दिए बस 1000 रूपए

कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड (National Herald) ने अपनी पूर्व संपादकीय सलाहकार संजुक्ता बसु (Sanjukta Basu) को कथित तौर पर राहुल गाँधी के पक्ष में लेख लिखने के लिए 3000 रुपए का भुगतान करने का वादा किया था। लेकिन उन्हें केवल 1000 रुपए प्रति लेख का ही भुगतान किया गया।

संजुक्ता बसु ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर खुद इसकी जानकारी दी है। उन्होंने दावा किया कि उनकी पब्लिक इमेज से भले से लोगों को ऐसा लगता है कि वह लाखों रुपए कमा रही हैं। लेकिन यह सच नहीं है। उन्होंने खुलासा किया कि वह नेशनल हेराल्ड में एक संपादकीय सलाहकार थी। लेकिन राहुल गाँधी के समर्थन में लेख लिखने के लिए उन्हें कभी लाखों रुपए नहीं दिए गए। बल्कि उन्हें 3000 रुपए देने का वादा करके केवल 1000 रुपए थमा दिए गए। पूरे पैसे भी कभी नहीं दिए गए।

उन्होंने 6 मार्च 2023 को ट्वीट किया, “यह बेहद चौंकाने वाला है कि मैंने कभी भी पैसे न दिए जाने के बारे में खुलकर नहीं बोला है। मेरी पब्लिक इमेज से भले ही ट्रोल्स को ऐसा लगता हो कि मैं लाखों कमा रही हूँ। नेशनल हेराल्ड ने मुझे राहुल गाँधी के समर्थन में लेख लिखने के लिए लाखों रुपए दिए हो। लेकिन उन्होंने तो मुझे पूरे पैसे भी नहीं दिए। 3000 रुपए का वादा करके केवल 1000 रुपए का ही भुगतान किया।”

इसके बाद उन्होंने लिखा, “लेकिन जो चीज मुझे जीवंत महसूस कराती है, जो मुझे मेरा MOJO देती है। वह मेरी पब्लिक इमेज है। मुझे इससे बहुत प्यार है। मैं इसके लिए ही पैदा हुई थी। मैं देखने और सुनने के लिए पैदा हुई थी। लेकिन जो चीजें मैं करती हूँ, लिखती हूँ, कहती हूँ, जरूरी नहीं कि उसके लिए पैसा ही मिले।” इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर यूजर्स के सवालों का जवाब देने के लिए भी कई ट्वीट किए।

नेशनल हेराल्ड द एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इसका स्वामित्व राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी के स्वामित्व वाली कंपनी यंग इंडियंन के पास है। ‘नेशनल हेराल्ड’ की स्थापना 1937 में हुई थी। AJL तब उर्दू में ‘कौमी आवाज़’ और हिंदी में ‘नवजीवन’ नामक अख़बार निकालता था। नेहरू के लेख इसमें अक्सर आया करते थे। अंग्रेज सरकार ने इसे 1942 में बैन कर दिया था। नेहरू स्वतंत्रता के बाद इसके बोर्ड के अध्यक्ष पद से तो हट गए, लेकिन अख़बार कांग्रेस से ही चलता रहा।

1963 में इसके सिल्वर जुबली कार्यक्रम में नेहरू ने सन्देश जारी किया। 2016 में इसे फिर से डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में लॉन्च किया गया।

‘Divine Intervention’: CDS जनरल बिपिन रावत के हैलीकॉप्टर क्रैश के बाद कांग्रेसी न्यूज़ एडिटर का ट्वीट वायरल, फिर किया डिलीट

                    अश्लीन मैथ्यू के ट्वीट पर बवाल, CDS बिपिन रावत के अपमान का आरोप (फाइल फोटो)
कांग्रेस के ‘नेशनल हेराल्ड’ की न्यूज़ एडिटर अश्लीन मैथ्यू ने CDS (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) जनरल बिपिन रावत के हैलीकॉप्टर क्रैश के बाद ‘Divine Intervention’ लिख कर एक ट्वीट किया। हालाँकि, विरोध होने के बाद उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर लिया है। बता दें कि तमिलनाडु में कुन्नूर और ऊटी के पास हुई भारतीय वायुसेना के Mi-17V5 चॉपर क्रैश हो गया, जिससे उसमें सवार 14 में से 13 लोगों की मौत हो गई है। सभी शव इतनी बुरी तरह झुलस गए हैं कि उनकी पहचान मुश्किल है, इसीलिए DNA टेस्ट का सहारा लिया जा रहा है। इस दुर्घटना में बिपिन रावत के भी निधन की पुष्टि हुई है।

‘नेशनल हेराल्ड’ को कांग्रेस पार्टी का मुखपत्र भी कहा जाता है। ट्वीट पर बवाल होने के बाद अश्लीन मैथ्यू ने सफाई दी, “मेरे ट्वीट को लेकर एक अभियान चलाया जा रहा है। इसका ताज़ा हादसे से कोई लेनादेना नहीं है। फिर भी, अगर इससे किसी को दुःख पहुँचा है तो मैं माफ़ी माँगती हूँ।” इस पर लोग आक्रोशित नजर आए और उन्होंने उनकी माफ़ी को मानने से इनकार कर दिया। लोगों ने सलाह दी कि कुछ अच्छा नहीं बोल सकतीं तो वो अपना मुँह चुप ही रखें।

गगन भारद्वाज नामक ट्विटर यूजर ने ‘शौर्य’ फिल्म से केके मेनन की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “दुश्मन सिर्फ बॉर्डर के उस पार नहीं होता, घर के अंदर भी होता है। दीमक बन कर जीते हैं।” वहीं ‘दूरदर्शन’ के पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की पत्रकार।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “चिंता मत करो, ‘कर्मा’ तुम्हारा भी हिसाब करेगा।”

एक अन्य यूजर ने उन्हें सलाह दी, “याद रखना चाहिए कि दूसरों की मौत पर जश्न मनाने वाले भी अमर नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि वो नहीं जानते हों कि वो भी कभी मरेंगे।”

इस घटना के बाद पूरे देश में गम का माहौल है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद महाराष्ट्र राजभवन के दरबार हॉल का उद्घाटन करने मुंबई जाने वाले थे, लेकिन अब उनका ये दौरा रद्द हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली ‘कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS)’ की बैठक भी हुई है। विंग कमांडर पृथ्वी सिंह चौहान उस हैलीकॉप्टर के पायलट थे। CDS वेलिंग्टन स्थित डिफेंस स्टाफ कॉलेज जा रहे थे। इस दुर्घटना में उनके अलावा उनकी पत्नी मधुलिका रावत का भी निधन हो गया।

कांग्रेस के टूलकिट प्रोपेगंडा फैलाने में 5 ‘दोस्त’ मीडिया संस्थान, बॉलीवुड से मदद

सोशल मीडिया पर एक ‘टूलकिट’ वायरल हुआ, जिसके बारे में बताया गया कि ये कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने नेताओं को दी गई निर्देशावली है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हिन्दुत्व, कुम्भ और देश को बदनाम करने का पूरा खाका है। इस टूलकिट’ का एक हिस्सा ऐसा भी है, जिस पर ज्यादा बात नहीं हुई। इसमें उन मीडिया संस्थानों के बारे में बताया गया है, जिनकी मदद लेकर कांग्रेस नेताओं को प्रोपेगंडा फैलाना है। इन कठिन परिस्थितियों में सरकार से कन्धा मिलाकर चलने की बजाए अपने ही देश की सरकार को अपमानित करने का षड़यंत्र रच रहे हैं। 
ऑक्सीजन की कमी का शोर भारत ही नहीं, विश्व ने देखा, विश्व तो भारत की सहायतार्थ खड़ा हो गया, लेकिन जयचन्द ऑक्सीजन की कमी करते रहे, और जब ऑक्सीजन की ऑडिट करने की बात होते ही, एकदम कहां से कमी पूरी हो गयी, यह लाशों पर सियासत करने वालों से जनता को पूछना होगा। अब कोई हॉस्पिटल भी नहीं बोलता कि 'हमारे पास इतने ही घंटे की ऑक्सीजन बची है।' यूँ तो जिसे देखो यही कहता नज़र आता है कि मोदी सरकार ने मीडिया को अपनी मुठ्ठी में कर रखा है, परन्तु उसी मीडिया ने उसी मोदी सरकार द्वारा ऑक्सीजन देने के बावजूद कहाँ जा रही है, इस समस्या की जड़ में जाने की कोशिश तक नहीं की, क्यों? लेकिन अपवादों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने ब्रह्मात्र यानि "ऑक्सीजन ऑडिट" का प्रयोग कर समस्त विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया।     

मेजर सुरेंद्र पुनिआ का ट्वीट उस कड़वी सच्चाई को सार्वजनिक करने का प्रयास कर रहा है, जिसे कुर्सी के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियों ने कभी नहीं पढ़ाया, विपरीत इसके आतताई मुग़लों को महान पढ़ाया गया। अब जब देश अपनी खोई संस्कृति एवं सम्मान को प्राप्त कर रहा है, जयचंदों के वंशज अपना सिर उठा, आपदा में अवसर खोज रहे हैं। 

टूलकिट के इस हिस्से में बताया गया है कि ‘द प्रिंट’, ‘द वायर’, ‘द क्विंट’ और ‘आउटलुक’ जैसे मीडिया संस्थानों में कोविड-19 को लेकर जो भी लेख प्रकाशित होते हैं, उन्हें शेयर किया जाए और वायरल किया जाए। ऐसे मीडिया भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को बदनाम करने के लिए किस हद तक गिरते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। इन संस्थानों ने महाराष्ट्र और केरल की सरकारों के खिलाफ कुछ नहीं लिखा, जहाँ कोरोना सबसे ज्यादा बेकाबू है।

इस ‘टूलकिट’ में कांग्रेस नेताओं को निर्देश दिया गया है कि वो इन मीडिया संस्थानों में लिखे कोरोना सम्बंधित लेखों को खूब प्रचारित करें और उन्हें हाइलाइट करें। दो मीडिया संस्थान ऐसे भी हैं, जिन्हें इनसे भी ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। इसमें लिखा है कि अगर कोई स्टोरी अन्य मीडिया संस्थानों में प्रकाशित नहीं होती है तो उन्हें ‘कारवाँ’ या पार्टी के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ को भेजा जाए। यानी, कांग्रेस की साँठगाँठ से इन मीडिया संस्थानों में नकारात्मक लेख प्रकाशित किए जा रहे थे।

इस ‘टूलकिट’ के एक पॉइंट में ‘समान विचारधारा’ वाले बॉलीवुड सेलेब्स से मदद लेने की बात भी की गई है। उनसे ट्वीट्स, मीम्स, कॉमिक वीडियोज और कार्टून्स के अलावा अन्य ऐसे वायरल पोस्ट्स को शेयर करवाने की बात की गई है, जिसमें मोदी सरकार को निशाना बनाया गया हो। समय-समय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर कुछ ‘कॉम्स सेन्स सलाह’ देने का भी निर्देश दिया गया है। ऐसा दिखाने को कहा गया है, जैसे मोदी सरकार और इसके मंत्रीगण मूर्ख हों।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि बिगाड़ने के लिए किस तरह से विदेशी मीडिया के साथ हाथ मिलाया गया था, वो भी देखिए। भारत में विदेशी मीडिया संस्थानों के कॉरेस्पोंडेंट्स के माध्यम से पीएम मोदी को सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। विदेशी मीडिया में लेख लिखने वाले भारतीय प्रोपेगंडा पत्रकारों को पॉइंट्स दिए गए, ताकि वो मोदी सरकार को बदनाम कर सकें। स्थानीय पत्रकारों को जलती चिताओं और लाशों की तस्वीरें देकर रिपोर्ट बनवा उसे वायरल करवाने की भी साजिश थी।

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने दावा किया है कि ये ‘टूलकिट’ सौम्या वर्मा ने तैयार किया है। वो प्रोफेसर राजीव गौड़ा के दफ्तर में कार्यरत हैं। MV राजीव गौड़ा कांग्रेस के सांसद रहे हैं और यूपीए काल में कई संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे हैं। कर्नाटक कांग्रेस कमिटी ने उन्हें प्रवक्ता और घोषणापत्र समिति का अध्यक्ष बनाया था। फ़िलहाल वो IIM बेंगलुरु में प्रोफेसर हैं। कांग्रेस की विचारधारा को फैलाने के लिए वो कई ऑनलाइन कार्यक्रम चलाते हैं।

क्या JNU की पूर्व छात्रा सौम्या वर्मा ने तैयार किया है Toolkit 

सोशल मीडिया पर मई 18 को एक दस्तावेज जम कर शेयर किया गया, जिसके बारे में लोगों ने दावा किया कि ये ‘कांग्रेस का टूलकिट’ है। इसमें कुम्भ मेला को बदनाम करने, ईद का महिमामंडन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल करने और जलती चिताओं व लाशों की तस्वीरें शेयर कर भारत बदनाम करने का खाका था। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने दावा किया है कि ये ‘टूलकिट’ सौम्या वर्मा ने तैयार किया है।

सौम्या वर्मा का LinkedIn प्रोफ़ाइल खँगाला तो पता चला कि वो प्रोफेसर राजीव गौड़ा के दफ्तर में कार्यरत हैं। 

सौम्या वर्मा ने इंस्टाग्राम पर अपना पता दिल्ली दिया है। संबित पात्रा द्वारा शेयर किए गए कंटेंट के अनुसार, 6 पन्नों वाले कांग्रेस के ‘टूलकिट’ को उन्होंने ही ‘माइक्रोसॉफ्ट वर्ड 2019’ एप का प्रयोग कर के बनाया है। उन्होंने कुछ तस्वीरें भी शेयर की, जिसमें सौम्या वर्मा कांग्रेस नेताओं के साथ दिख रही हैं। संबित पात्रा ने लिखा, “क्या सोनिया व राहुल गाँधी कोई प्रतिक्रिया देंगे? दस्तावेज की ‘प्रॉपर्टीज’ से ही साफ़ है कि इसका ऑथर कौन है।”

लोकसभा चुनाव 2019 के समय भी सौम्या वर्मा का नाम सामने आया था। वो उन युवाओं में शामिल थीं, जिन्होंने कांग्रेस का घोषणापत्र तैयार किया था। उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक किया है। इसके बाद उन्होंने JNU से इतिहास में मास्टर्स की डिग्री ली। सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करते समय उनके मन में राजनीति से जुड़ने की इच्छा जागी। वो सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के स्नातक छात्रों को पढ़ाती भी थीं।

उन्होंने सिविल सर्विसेज की परीक्षा तो उत्तीर्ण नहीं की, लेकिन राजनीति व राजनीतिक नीतियों के प्रति उनके मन में खासी जागरूकता आई। राजीव् गौड़ा से प्रभावित होकर वो राजनीतिक रिसर्च में रुचि लेने लगीं। ‘द प्रिंट’ से बातचीत में उन्होंने बताया था कि अब वो पर्यावरण व उससे जुड़ी नीतियों में दक्ष होना चाहती हैं। राजीव गौड़ा के दफ्तर में उन्हें ‘डिप्टी हेड ऑफ रिसर्च’ का पद दिया गया।

सौम्या वर्मा ने शशि थरूर और सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के अंतर्गत काम करते हुए आंतरिक सुरक्षा, पर्यावरण और संस्थागत सुधारों को लेकर रिपोर्ट तैयार की थी। ‘कांग्रेस के टूलकिट’ के अनुसार, भाजपा कुम्भ पर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए ईद का नाम ले सकती है लेकिन हमें दोनों त्योहारों की तुलना वाले ‘जाल’ में फँसने से बचना है। स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि ईद को लेकर एकदम से चुप्पी साध ली जाए और जहाँ भी ईद को लेकर बात हो उस पोस्ट या ट्वीट से खुद को अलग किया जाए।

नेशनल हेराल्ड ने तबलीगी जमात का बचाव करते हुए हिन्दुओं के खिलाफ कीं भौंडी टिप्पणी

कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ में असिस्टेंट प्रोफेसर विकास वाजपेयी द्वारा लिखा एक लेख प्रकाशित किया है। इसमें तबलीगी जमात को उसके सारे अपराधों से मुक्त करते हुए, राजनीतिक पार्टियों पर उन्हें बदनाम करने और अपनी नाकामियों का ठीकरा तबलीगी जमात के सिर फोड़ने का आरोप लगाया गया है।
सिर्फ यहीं न रुक कर लेखक हिन्दू समुदाय पर भी हमला करने से नहीं चूका, इस पूरे लेख के दौरान जहाँ वह अपनी हिन्दूफ़ोबिक मानसिकता का भौंडा प्रदर्शन करता नजर आता है वहीं इस्लामिक मिशनरी संगठन का बचाव करता दिखता है।
यह आर्टिकल वुहान वायरस संक्रमण के लिए पूरी तरह से सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, दावा करता नजर आता है कि इसके लिए निजामुद्दीन मरकज में हुए तबलीगी जमात कार्यक्रम को दोषी ठहराना अन्याय होगा। यह कहने की जरूरत नहीं कि हालाँकि इस आर्टिकल की हेडलाइन “तबलीगी जमात पर पैदा किया गया उन्माद, उल्टा पड़ा” है लेकिन यह आर्टिकल कहीं भी इस हेडलाइन के पक्ष में सही तर्क प्रस्तुत करता नजर नहीं आता।
लेखक ने इस तथ्य को रेखांकित करना जरूरी नहीं समझा कि जमातियों ने स्वास्थ्य कर्मियों से बिलकुल भी सहयोग नहीं किया और कुछ जगहों पर वे महिला स्टॉफ तथा नर्सों के प्रति यौनिक हमलावर की भूमिका में देखे गए। वो नखरे दिखाते और इस कोरोना वायरस को फैलाने की मंशा से थूकते भी देखे गए। सरकारी दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए एक बड़ी भारी संख्या में इकट्ठे होना इनके आपराधिक कारगुजारियों की फेहरिश्त में पहली कड़ी ही थी। जमातियों की क्रियाविधि तबसे बदतर ही होती गई है।
लेख में दावा किया गया- तबलीगी जमात पर दोषारोपण करना जितना आसान है कि उसने 13 मार्च से 15 मार्च के बीच मरकज में धार्मिक कार्यक्रम क्यों आयोजित किया, उतना ही आसान है यह भूल जाना कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने 13 मार्च को ऑन रिकॉर्ड यह कहा था कि देश में कोरोना वायरस न ही हेल्थ इमरजेंसी है न ही राष्ट्रीय इमरजेंसी। मरकज में शामिल होने वालों पर आरोप लगाना आसान है कि उन्होंने 15 मार्च के बाद जलसे को छोड़ा क्यों नहीं, और यह भूल जाना और भी आसान है कि उस समय सरकार कितने अलग-अलग प्रकार की दुविधा भरी भाषा में बोल रही थी, कितनी अव्यवस्था का माहौल था।
लेखक ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार पर हमला करने के लिए बराबर मौके तलाशे लेकिन तबलीगी जमात की घृणात्मक कारगुजारियों पर चुप्पी साध गया।
इस पूरे लेख में लेखक ‘गोदी मीडिया’ और ‘गोबर पॉलिटिक्स’ कहते नहीं अघाता, हालाँकि, एक बार भी उसके मुँह से यह न फूटा कि ऑथॉरिटीज से बचने के लिए तबलीगी जमात के लोगों से जो कुछ भी बन सकता था, उन्होंने वो सब किया। यह बड़ा उलझाने वाला है कि किस प्रकार लेखक हिन्दू समुदाय पर भौंड़े कमेंट करते हुए भी इस्लामिक मिशनरी संगठन के सारे पापों को धोता हुआ नजर आता है। लेखक के कट्टर साम्प्रदायिक वर्ल्ड व्यू का उदाहरण इस बात से मिलता है कि वह इस पूरे मामले में हिन्दू समुदाय को भी घसीट लाता है जिससे हिन्दू समुदाय का कोई संबंध ही नहीं। ऐसा लगता है कि पंथनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए मुस्लिम कट्टरपंथियों का बचाव करने के साथ-साथ हिन्दू समाज को जलील करना अनिवार्य शर्त है।
लेख दावा करता है कि वहाँ ‘बेहद कमी’ है PPE की, जबकि सरकार लगातार स्पष्टीकरण देती घूम रही कि अभी वर्तमान में किसी भी मेडिकल उपकरण आदि की कोई कमी नहीं है। वो लिखता है, “कैसे हमने सोच लिया कि तबलीगी जमात के लोग और माइग्रेंट खुद से सरकार के सामने आएंगे जबकि उन्हें अस्पताल में और बीमार हो जाने का भय हो? उन्हें सरकारी एजेंसियों ने जिस तरह से विलेन के रूप में पेश किया है इसके बाद तो दूसरों को भी इनकी चिंता होना शुरू हो गई है।”
माइग्रेंट्स ने कभी भी खुद को सरकारी एजेंसियों से छुपाने की कोशिश नहीं की। सच तो यह है कि वे बड़ी मुश्किल में हैं इसलिए वो हर जगह खुद से सामने आए, जिनकी सहायता में राज्य और केंद्र सभी सरकारों ने वो सभी प्रकार की सहायता उन्हें मुहैया कराई जिसकी उन्हें जरूरत थी। इस प्रकार से जमातियों को माइग्रेंट्स के साथ एक खाने में रखना बदनीयती के अलावा कुछ नहीं समझा जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त जमाती सरकारी एजेंसियों से भी सहयोग नहीं कर रहे। जमातियों के कारनामों के लिए सरकार और मीडिया को दोषी ठहराना, जानबूझकर साजिशन इस्लामिक मिशनरी संगठन के साम्प्रदायिक विचारों से हमारा ध्यान हटाने भर की कोशिश है। निज़ामुद्दीन मरकज का मौलाना साद लगातार यह संदेश देता रहा कि वुहान कोरोना वायरस इस्लाम के खिलाफ साजिश है और सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत के समय शारीरिक निकटता की जरुरत पर बल देता रहा। जाहिल मौलाना सिखाता रहा कि यदि 70,000 देवदूत मिलकर मुस्लिमों को नहीं बचा सकते तो फिर डॉक्टर क्या बचाएंगे?
इस स्थिति में सरकार और मीडिया को दोषी ठहराना सफेद झूठ के सिवाय कुछ नहीं। लेखक यह भी दावा करता है- अगर आधिकारिक आँकड़ों पर भरोसा किया जाए तो कोरोना महामारी के चलते आई आपदा में भारत अभी उन देशों से बहुत पीछे है जो इस महामारी से बेहाल हैं जबकि भारत की आबादी कोरोना महामारी से बर्बाद बेहाल हुए देशों की अपेक्षा कहीं ज्यादा है, सिवाय चीन के अपवाद को छोड़कर। हालाँकि, किसी देश में मरीजों को दोषी नहीं ठहराया गया जैसे कि भारत में हो रहा। यहाँ लेखक बड़ी चालाकी से दक्षिण कोरिया का नाम भूल जाता है जिसने एक ईसाई ग्रुप को कोरोना वायरस संक्रमण के लिए दोषी ठहराया है।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (अप्रैल 13, 2020) को तबलीगी जमात से संबंधित मीडिया कवरेज को लेकर दा....
तबलीगी जमात का टाइम बम पूरे देश में तब फटा जब मार्च के आखिरी हफ्ते में मरकज निजामुद्दीन और उसके आसपास के इलाकों से कोरोना वायरस के लक्षण वाले करीब 200 लोगों को दिल्ली के अलग अलग अस्पतालों में भर्ती करवाया गया। जिसके बाद मरकज के आसपास का इलाका दिल्ली पुलिस ने सील कर दिया। जल्दी ही पूरे देश से तबलीगी जमात से जुड़े हुए कोरोना संक्रमण के मरीज सामने आने लगे और देश इस जमात के कारण फैले संक्रमण से आतंकित होने लगा। लेकिन इसके बाद भी मीडिया का एक हिस्सा और राजनीतिक धड़ा कुतर्कों का सहारा लेते हुए इस्लामिक मिशनरी संगठन के पापों को धोने में लिप्त है। वहीं नेशनल हेराल्ड जैसों को लगता है कि आगे की राह हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाने से ही तय होने वाली हैं।

नेशनल हेराल्ड मामले में हाईकोर्ट ने खारिज कीं सोनिया और राहुल गांधी की याचिकाएं

Image result for सोनिया राहुलपेट्रोल-डीजल पर छाई मंहगाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार से लड़ रही कांग्रेस पार्टी को सितम्बर 10 को एक बड़ा झटका लगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें उन्होंने 2011-12 के अपने कर निर्धारण की फाइल दोबारा खोले जाने को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट और न्यायमूर्ति एके चावला की पीठ ने कहा कि याचिकाएं खारिज की जाती हैं। पीठ ने कांग्रेस नेता ऑस्कर फर्नांडीस की याचिका भी खारिज कर दी। उन्होंने भी 2011-12 के अपने कर निर्धारण की फाइल दोबारा खोले जाने को चुनौती दी थी 
बहुचर्चित नेशनल हेराल्‍ड केस में कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी को कोर्ट से राहत नहीं मिली। यानी यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की जांच आयकर अधिकारियों द्वारा की जाएगी। दरअसल इस कंपनी में सोनिया और राहुल गांधी मुख्‍य शेयरधारक हैं. दिल्‍ली हाई कोर्ट ने कहा कि आपको जांच का सामना करना होगा. ये पूरा मासला एसोसिएटेड जर्नल्‍स लिमिटेड से जुड़ा है। यह नेशनल हेराल्‍ड समेत तीन अखबारों की प्रकाशक कंपनी है।
हाईकोर्ट ने तीनों की याचिकाओं पर 16 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आयकर विभाग ने उस समय दलील दी थी कि राहुल गांधी के 2011-12 के आयकर निर्धारण की फाइल दोबारा इसलिए खोली गई क्योंकि इसमें महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए थे। अदालत ने मौखिक रूप से कहा था कि आयकर विभाग अदालती फैसले की घोषणा होने तक सोनिया, राहुल और फर्नांडीस के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम न उठाए 
सोनिया गांधी की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने कहा था कि वह अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के मौखिक बयान पर विश्वास रखते हैं। मेहता ने कहा था कि कांग्रेस नेताओं ने आयकर विभाग पर दुर्भावनापूर्ण तरीके से कार्रवाई करने का आरोप लगाया, लेकिन इस संबंध में कुछ ठोस पेश नहीं किया 
क्या हैं आरोप
कांग्रेस नेताओं के खिलाफ आयकर संबंधी मामले बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा नेशनल हेराल्ड मामले में एक निचली अदालत के समक्ष दायर की गई निजी आपराधिक शिकायत पर जांच से निकले हैं।शिकायत में सोनिया, राहुल और अन्य पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने नेशनल हेराल्ड से संबद्ध कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को कांग्रेस द्वारा दिए गए 90.25 करोड़ रुपये के कर्ज की वसूली के अधिकार महज 50 लाख रुपये के भुगतान में यंग इंडिया को दिए जाने की साजिश रची
 
गौरतलब है कि बीजेपी नेता सुब्रमण्‍यन स्वामी ने सोनिया, राहुल और दूसरों पर नेशनल हेराल्ड मामले में वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाया है। बीजेपी के प्रवक्‍ता संबित पात्रा ने इसको कांग्रेस के लिए ‘बड़ा झटका’ करार दिया. वहीं कांग्रेस ने कहा कि ये पार्टी के लिए झटका नहीं है। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि कोर्ट ने आयकर आकलन अधिकारियों के समक्ष आपत्तियों को दर्ज कराने की अनुमति प्रदान की है।