उमर खालिद को पत्र लिखने वाले कट्टरपंथी ज़ोहरान ममदानी हिम्मत है तो नारा लगा "Washinton/America तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह", फिर देख तमाशा

लोकतंत्र में हर चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होता, कई बार वह भविष्य की चेतावनी भी होता है। न्यूयॉर्क जैसे शहर का मेयर बनना केवल एक नगर निगम पद नहीं है, यह वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला में प्रवेश का टिकट होता है। यही वजह है कि जोहरान ममदानी का सत्ता में आना केवल अमेरिका की आंतरिक घटना नहीं रह गया, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया में राजनीतिक चिंता का विषय बन गया है।
भारत की न्यायपालिका पर कटघरे में खड़ा करने वाले न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान क्वामे ममदानी का दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद को लिखे पत्र का अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए, वरना वह दिन दूर नहीं जब यही कट्टरपंथी अमेरिका को पाकिस्तान या बांग्लादेश बनाने का मौका नहीं चुकेगा। भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसे गंभीरता से लेकर ट्रम्प को लिखना चाहिए। मोदी और ट्रम्प को ममदानी के इस पत्र को हल्के में नहीं लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए।   

अमेरिका के सबसे बड़े और प्रभावशाली शहर न्यूयॉर्क की मेयर की कुर्सी पर बैठते ही जोहरान क्वामे ममदानी ने ऐसा कदम उठाया है, जो न केवल विवादास्पद है, बल्कि भारत के लिए सीधी चुनौती जैसा लगता है। 1 जनवरी को शपथ लेने के ठीक अगले दिन उनका एक हैंडरिटन पत्र सामने आया, जो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद विवादित कार्यकर्ता उमर खालिद के नाम लिखा गया था। इस पत्र ने भारत में आग की तरह फैलते गुस्से को और भड़का दिया है। कई लोग इसे ममदानी की भारत विरोधी मानसिकता का खुला प्रमाण बता रहे हैं।

जोहरान ममदानी खुद को प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहता है, लेकिन उसके पहले ही कदम से साफ लगता है कि उसकी प्राथमिकता में सेलेक्टेड चीजे हैं। यानी उसके मुद्दे बहुत सोच-विचार के चुने हुए हैं, खासकर जो मुस्लिम पहचान और कथित इस्लामी पीड़ितों से जुड़े हों।

ममदानी के मेयर बनने के बाद ही क्यों सामने आया उमर खालिद को लिखा पत्र?

कोई भी नया निर्वाचित नेता आम तौर पर शहर की समस्याओं से शुरुआत करता है। अपने शहर की आवास, ट्रांसपोर्ट, अपराध, शिक्षा से जुड़ी समस्या। लेकिन ममदानी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि ममदानी ने सत्ता संभालते ही भारत से जुड़े एक अत्यंत विवादित मुद्दे या यूँ समझें कि आतंकवादी को चुना। वो है दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद।

यह कोई संयोग नहीं था। यह एक सोचा-समझा राजनीतिक संकेत था। जोहरान ममदानी जानता था कि उमर खालिद का नाम भारत में किस तरह ध्रुवीकरण पैदा करता है। UAPA जैसे कानून, देशद्रोह के आरोप, दंगे, हिंसाये सब ऐसे विषय हैं जिन पर भारत की न्यायिक प्रक्रिया बेहद संवेदनशील है। इसके बावजूद एक अमेरिकी मेयर का इस मुद्दे पर टिप्पणी करना साफ बताता है कि उसका मकसद ‘मानवाधिकारट से ज्यादा ‘वैश्विक पहचान’ बनाना था।

यह कहानी सिर्फ वामपंथ की नहीं, बल्कि उस वैचारिक इस्लामी राजनीति की है, जो अब लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर घुसपैठ कर रही है।

वामपंथी या इस्लामी… ममदानी की असली पहचान क्या?

जोहरान ममदानी खुद को वामपंथी कहता है। लेकिन दुनिया जानती है कि आधुनिक वामपंथ अब केवल आर्थिक असमानता की लड़ाई नहीं रह गया। यह पहचान की राजनीति में तब्दील हो चुका है, जहाँ धर्म, जाति और नस्ल को हथियार बनाया जाता है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि अगर ममदानी सिर्फ वामपंथी है, तो उसकी संवेदनशीलता बार-बार केवल इस्लामी मुद्दों पर ही क्यों दिखती है? अगर वो मानवाधिकारों का पैरोकार है, तो चीन के उइगर, पाकिस्तान के बलूच, बांग्लादेश के हिंदुओं पर उसकी आवाज़ क्यों खामोश रहती है? यही सेलेक्टिव नैतिकता ही असली समस्या है।

कुरान हाथ में लेकर शपथ को मानें उसका राजनीतिक संदेश

अमेरिका में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर शपथ लेना कानूनी रूप से गलत नहीं है। लेकिन राजनीति में प्रतीक कभी मासूम नहीं होते। ममदानी द्वारा कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेना सिर्फ निजी आस्था नहीं था, बल्कि वह एक सांस्कृतिक संदेश था। यह संदेश न्यूयॉर्क के मतदाताओं से ज्यादा वैश्विक इस्लामी राजनीति के लिए था कि सत्ता के केंद्रों में ‘हमारा आदमी’ पहुँच चुका है।

यही वह बिंदु है जहाँ मजहब निजी नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक हथियार बन जाता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममदानी ने हाल ही में एक पत्र लिखकर खालिद के अम्मी-अब्बू को सौंपा। पत्र में लिखा है, “प्रिय उमर, मैं अक्सर तुम्हारे कड़वाहट न अपनाने वाले शब्दों के बारे में सोचता हूँ। तुम्हारे माता-पिता से मिलकर खुशी हुई। हम सभी तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं।”

यह छोटा पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भारतीय मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहा है। सवाल यह है कि न्यूयॉर्क के मेयर को भारत के आंतरिक मामलों में इतनी दिलचस्पी क्यों? पद संभालते ही शहर की समस्याओं क्राइम, हाउसिंग, ट्रैफिक की बजाय दिल्ली जेल के एक कैदी को पत्र लिखना क्या संयोग है या सोचा-समझा प्रोपेगेंडा?

UAPA केस में मुख्य साजिशकर्ता है उमर खालिद

उमर खालिद का मामला कोई साधारण नहीं है। पूर्व जेएनयू छात्र खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों की साजिश के लिए गिरफ्तार किया गया। उन पर यूएपीए जैसे सख्त कानून लगे, जिसमें देशद्रोह और आतंकवादी गतिविधियों के आरोप हैं। सरकार के पास सबूत हैं कि दंगे भड़काने में उनकी भूमिका थी। पाँच साल से ज्यादा जेल में हैं, ट्रायल शुरू नहीं हुआ। उनके समर्थक इसे राजनीतिक बदला बताते हैं। हालाँकि वो ऐसे व्यक्ति सैयद कासिम रसूल इलियास का बेटा है,जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़ा हुआ था।

भारत पर क्यों साध रहा निशाना?

भारत आज उभरती वैश्विक शक्ति है। भारत का लोकतंत्र, उसकी न्यायपालिका और उसके कानून अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी नैरेटिव के लिए असहज हैं। फिर UAPA जैसे कानून इसीलिए भी निशाने पर रहते हैं क्योंकि वे ‘पीड़ित’ और ‘अल्पसंख्यक’ की उस कहानी को तोड़ते हैं, जिसे वैश्विक मंच पर बेचा जाता है।
ऐसे में ममदानी का भारत पर फोकस इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत को ‘असहिष्णु’ दिखाओ, उसकी संस्थाओं पर सवाल उठाओ और फिर खुद को नैतिक ऊँचाई पर खड़ा करो।

भारत और हिंदुओं को पहले भी बनाता रहा है निशाना

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उसके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। वो न सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ आग उगलता रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधता रहा है। उसने पीएम मोदी को युद्ध अपराधी तक कहा था, वो भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही। वो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बता चुका है।

न्यूयॉर्क से आगे की तैयारी?

यह मानना भोलापन होगा कि ममदानी सिर्फ मेयर बनकर संतुष्ट हो जाएगा। न्यूयॉर्क अमेरिकी राजनीति की सीढ़ी है, मंज़िल नहीं। इतिहास गवाह है कि जो न्यूयॉर्क जीतता है, वह राष्ट्रीय राजनीति की दहलीज़ पर पहुँच जाता है। आज वो भारत पर बोल रहे हैं, कल वो अमेरिका की विदेश नीति पर प्रभाव डालना चाहेगा। भले ही आज वो ‘मानवाधिकार’ की बात कर रहा है, लेकिन कल उसकी बोली इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव से अलग ही जहरीली हो चुकी होगी।
कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ममदानी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोट बैंक को मजबूत करके। अमेरिका में मुस्लिम नेता जैसे इल्हान उमर, रशीदा तलीब पहले से हैं और ममदानी उन कट्टरपंथियों का नेक्स्ट जेन वर्जन लगते हैं।

मेयर बनते ही पत्र का सामने आना कोई साधारण बात नहीं

जोहरान ममदानी का पत्र अकेला नहीं। ठीक इसी समय आठ अमेरिकी सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर खालिद को बेल और निष्पक्ष ट्रायल की माँग की। ये सांसद डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव विंग से हैं, जो अक्सर भारत पर मानवाधिकार के नाम पर दबाव बनाते हैं। खालिद के पैरेंट्स की इनसे मुलाकात भी हुई थी।
ममदानी और इन सांसदों के पत्र की टाइमिंग संदेह पैदा करता है। क्या यह संयोग है कि मेयर बनते ही ममदानी ने यह कदम उठाया? विश्लेषक इसे खुद को मुस्लिम दुनिया में हीरो बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

क्या ममदानी वाकई भारत के लिए बन सकता है खतरा?

भारत के लिए तो जरूर चिंता की बात है। एक विदेशी मेयर का भारत के कानूनी मामलों में दखल खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो गंभीर आरोपों में जेल में है, विदेशी हस्तक्षेप जैसा लगता है। न्यूयॉर्क के बदलते डेमोग्राफिक्स, बढ़ते मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोटर ने उसे जिताया, लेकिन इससे अमेरिका में इस्लामी राजनीतिक ताकतें मजबूत हो रही हैं। अगर ममदानी आगे बढ़े, तो भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
भारत को, अमेरिका को और दुनिया को यह समझना होगा कि आज की राजनीति में सबसे खतरनाक चीज बंदूक नहीं, बल्कि नैरेटिव है। और जो नेता सत्ता में आते ही नैरेटिव युद्ध शुरू कर देता है, वह सिर्फ एक शहर का मेयर नहीं रह जाता, वह एक वैश्विक एजेंडा बन जाता है।


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