केजरीवाल की रेक्यूजल माँग को जस्टिस शर्मा ने किया खारिज (साभार: TOI)
सीबीआई और ED पर ऊँगली उठाने वाले जब जजों पर ऊँगली उठाने लग जाएं समझ जाना चाहिए ऐसी मानसिकता वाले नेता और उनकी पार्टी देश को किस मझधार में डुबेने जा रहे हैं। इनको देश या समाज से कोई लेना-देना नहीं बल्कि भ्रष्टाचार कर अपने परिवार और आने वाली पीढ़ियों के लिए धन अर्जित करना है।
यह मामला दिल्ली की शराब नीति (एक्साइज पॉलिसी) केस से जुड़ा है। इसमें अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरिपतों ने कहा था कि जस्टिस शर्मा पहले भी उनके खिलाफ फैसले दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें इस केस की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जज के बच्चों का नाम केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में है, जिससे ‘हितों का टकराव’ हो सकता है।
जस्टिस शर्मा ने मामले को कहा ‘कैच-22’
जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में केजरीवाल की इन सभी आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने साफ कहा कि केवल आरोप लगाने से यह साबित नहीं होता कि जज पक्षपाती है। उन्होंने कहा कि कानून के आधार पर ही फैसला होगा, किसी की बनाई कहानी या धारणा के आधार पर नहीं।
उन्होंने इस स्थिति को ‘कैच-22‘ बताया। इसका मतलब है कि चाहे वह केस से हटें या न हटें, दोनी ही स्थिति में सवाल उठेंगे। जज ने कहा कि यह स्थिति केजरीवाल के लिए ‘विन-विन’ है। अगर उन्हें राहत नहीं मिलती, तो वे कह सकते हैं कि पहले से ही ऐसा होने वाला था। और अगर राहत मिलती है, तो वे कह सकते हैं कि कोर्ट दबाव में आ गया।
जस्टिस के कदम से न्यायपालिका की छवि को होता नुकसान
जस्टिस शर्मा ने कहा कि अगर वह इस केस से खुद को अलग कर लेतीं, तो इससे लोगों में गलत संदेश जाता कि जज किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करना न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुँचाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि उनके सामने सबसे आसान रास्ता यह था कि बिना सुनवाई के ही खुद को केस से अलग कर लें। लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि यह सिर्फ उनका नहीं, बल्कि पूरे न्यायपालिका का सवाल था। उन्होंने 34 साल के अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने बिना किसी दबाव या आरोप से प्रभावित हुए फैसला लिया है।
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