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'22 दिन में मार दूँगा PM मोदी को’: प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने वाला अमन बक्सर से गिरफ्तार, पूछताछ में बताया- विदेश से मिला था काम


आरएसएस प्रचारक से लेकर गुजरात मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री से भारत के प्रधानमंत्री बनने बाद भी नरेंद्र मोदी के जानी दुश्मनों में कोई कमी नहीं आयी। लेकिन देवी-देवताओं का सुरक्षा कवच सभी के होंसले पस्त कर रहा है। काम को अंजाम देने से पहले ही कानून के हत्ते चढ़ जाता है।  

बिहार के बक्सर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक खतरनाक साजिश का खुलासा हुआ। खुफिया एजेंसियों की सूचना पर पुलिस ने छापेमारी कर एक युवक अमन तिवारी को गिरफ्तार किया है।

आरोपित अमन तिवारी कथित तौर पर PM मोदी को नुकसान पहुँचाने की योजना बना रहा था। पुलिस इस मामले में विदेशी कनेक्शन की भी जाँच कर रही है। उसने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को ईमेल भेजकर भारी रकम की माँग की थी।

आरोपित अमन तिवारी ने दावा किया था कि वह 22 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपनी साजिश को अंजाम दे सकता है। कार्रवाई में युवक के पास से मोबाइल, लैपटॉप और कई डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं।

पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वह किन-किन लोगों के संपर्क में था। बरामद किए गए सभी उपकरणों को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया गया है। मुख्य आरोपित अमन तिवारी से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने दो और लोगों को हिरासत में लिया है।

इन सभी के बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन को खंगाला जा रहा है। पुलिस यह सुनिश्चित करना चाहती है कि इस नेटवर्क के पीछे कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन तो नहीं है। फिलहाल मामले की गहराई से जांच जारी है।

बांग्लादेश तख्तापलट में CIA का था हाथ, हसीना की पीठ में छुरा घोंपने वाला था आर्मी चीफ वकार: ‘इंशाअल्लाह बांग्लादेश’ में पूर्व गृह मंत्री का दावा, बोले- अभिमन्यु की तरह घिरी थीं शेख हसीना

                                 बांग्लादेश में सत्ता के तख्तापल्ट में CIA का हाथ होने का दावा
बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापल्ट के बाद से कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे। इसमें सैन्य हस्तक्षेप से लेकर अमेरिकी की खुफिया एजेंसी CIA की भूमिका तक की अलग-अलग जगहों पर चर्चा की जा रही थी। अब एक किताब में यह दावा किया गया है कि दरअसल शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के पीछे CIA का हाथ था।

न्यूज18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के दौर में गृह मंत्री रहे असदुज्जमाँ खान कमाल ने इस तख्तापलट को ‘CIA की सटीक साजिश’ बताते हुए देश के सेना प्रमुख और हसीना के रिश्तेदार वकर-उज-जमाँ पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। असदुज्जमाँ खान ने दावा किया है कि वकार-उज-जमाँ CIA की जेब में है और उन्होंने हसीना की पीठ में छुरा घोंप दिया है।

यह चौंकाने वाला खुलासा दीप हलदर, जयदीप मजूमदार और साहिदुल हसन खोकन द्वारा लिखित और जगरनॉट द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन’ में किया गया है। हालाँकि, यह पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है।

                                                        इंशाअल्लाह बांग्लादेश पुस्तक

पुस्तक में असदुज्जमाँ खान के हवाले से लिखा गया है, “यह हसीना को उखाड़ फेंकने के लिए लंबे समय से रची गई CIA की एक सटीक साजिश थी। हमें नहीं पता था कि वकार पर CIA का हाथ था।” कुछ समय पहले तक बांग्लादेश के दूसरे सबसे ताकतवर शख्स रहे असदुज्जमाँ खान ने बताया है, “हमें नहीं पता था कि जनरल वकार-उज-जमाँ CIA के पे-रोल पर हैं।”

असदुज्जमाँ ने बताया कि उनके देश की प्राथमिक रक्षा खुफिया एजेंसी, बांग्लादेश के सैन्य खुफिया महानिदेशालय और साथ ही बांग्लादेश की प्रमुख नागरिक खुफिया एजेंसी, राष्ट्रीय सुरक्षा खुफिया ने प्रधानमंत्री हसीना को यह चेतावनी नहीं दी थी कि वकार ने उन्हें धोखा देने का मन बना लिया है। साथ ही, उन्होंने शक जताया है कि इस साजिश में में शीर्ष अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।

क्यों किया CIA ने तख्तापलट?

असदुज्जमाँ खान ने दावा किया है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) दक्षिण एशिया में मजबूत नेतृत्व नहीं चाहती। उनका कहना है कि अमेरिका ऐसे देशों में कमजोर सरकारें देखना पसंद करता है ताकि अपने हितों को आसानी से साध सके। जब उनसे पूछा गया कि CIA के सहयोग से बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन करने से अमेरिका को क्या फायदा होगा।

उन्होंने कहा, “इसके दो कारण हैं। पहला, दक्षिण एशिया में बहुत ज्यादा शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष न हों। नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और शेख हसीना जैसे मजबूत नेता अगर उपमहाद्वीप पर राज करें, तो CIA के लिए अपने हित साधना मुश्किल हो जाता है। अमेरिकी रणनीति हमेशा कमज़ोर सरकारों के साथ काम करने की रही है।” खान ने यह भी दावा किया कि इसके पीछे एक तात्कालिक कारण सेंट मार्टिन द्वीप था।

उनका कहना है कि भारतीय प्रेस अब इस पर रिपोर्ट कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हमें बहुत पहले ही आगाह कर दिया था कि अमेरिका उन्हें सत्ता से बाहर करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि वह सेंट मार्टिन द्वीप पर अपना नियंत्रण चाहता है।

सेंट मार्टिन द्वीप क्यों चाहता है अमेरिका?

सेंट मार्टिन द्वीप को लेकर पहले शेख हसीना खुद भी ऐसा ही दावा कर चुकी हैं। हसीना ने सत्ता गँवाने से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि अगर वह इस द्वीप को अमेरिकियों को सौंप दें तो वह बिना किसी समस्या के सत्ता में बनी रह सकती हैं।

भौगोलिक दृष्टि से सेंट मार्टिन द्वीप की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दुनिया के किसी भी हिस्से से समुद्री मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। यह एक प्रमुख जलमार्ग होने के साथ-साथ रणनीतिक रूप से भी अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। बंगाल की खाड़ी के उत्तर-पूर्वी हिस्से में, बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा के करीब स्थित 7.3 किलोमीटर लंबा यह द्वीप समुद्र तल से लगभग 3.6 मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ है।

माना जाता है कि लगभग 5,000 वर्ष पहले यह टेकनाफ प्रायद्वीप का हिस्सा था लेकिन धीरे-धीरे समुद्र में डूब गया। करीब 450 वर्ष पूर्व इसका दक्षिणी भाग फिर से उभरा और अगले 100 वर्षों में उत्तरी और शेष भाग भी समुद्र से ऊपर उठ आए। वर्ष 1900 में ब्रिटिश भारत ने भूमि सर्वेक्षण के दौरान इस द्वीप को अपने नियंत्रण में ले लिया और इसे चटगाँव के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर मार्टिन के नाम पर सेंट मार्टिन द्वीप कहा गया।

इस द्वीप से बंगाल की खाड़ी और आस-पास के समुद्री इलाकों पर नजर रखी जा सकती है, जिससे यह बांग्लादेश के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बन जाता है। दक्षिण एशिया के परिप्रेक्ष्य में भी यह द्वीप जियो-पॉलिटिक्स में शक्ति संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। बंगाल की खाड़ी स्वयं दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक सेतु की तरह कार्य करती है और व्यापारिक मार्गों के माध्यम से क्षेत्रीय देशों के बीच संबंधों को मजबूत बनाती है।

किसी आकस्मिक युद्ध की स्थिति में भी यहाँ से संपर्क और संचालन स्थापित करना आसान होता है, यही कारण है कि शक्तिशाली देश इस द्वीप की ओर आकर्षित हैं। व्यापारिक और सामरिक हितों के कारण चीन और अमेरिका दोनों ही इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं जबकि भारत के लिए भी सेंट मार्टिन द्वीप का रणनीतिक महत्व अत्यधिक है। अमेरिका की रुचि का मुख्य कारण यह है कि यदि उसे इस द्वीप पर प्रभाव जमाने का अवसर मिलता है, तो वह यहाँ से पूरे क्षेत्र, विशेष रूप से चीन और भारत पर निगरानी रख सकता है।

अभिमन्यु की तरह घिर गई थीं शेख हसीना

दीप हलदर ने का कहना है कि यह खुलासा बांग्लादेश को और बेचैन कर सकता है। उनका कहना है कि जनरल वकार को हसीना ने अपने पद से हटने से ठीक पहले नियुक्त किया था। उन्होंने कहा, “पिछले साल और इस साल भी NCP (नेशनल सिटिजन्स पार्टी) के नेताओं द्वारा लगातार यह बयान दिया जाता रहा कि जनरल वेकर भारत के एजेंट हैं। अब यह बड़ा खुलासा हुआ है, जिससे यह सवाल उठता है कि वकार किसकी तरफदारी कर रहे हैं।”

असदुज्जमाँ खान ने अपनी बात को समझाने के लिए महाभारत का हवाला भी दिया है। उन्होंने कहा, “जैसे अभिमन्यु को चारों तरफ से घेर लिया गया और फिर युद्ध में अपने ही हाथों ढेर कर दिया गया, वैसे ही वकार ने हसीना को गिराने के लिए बांग्लादेश की कट्टरपंथी ताकतों से हाथ मिला लिया। जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश ने इससे पहले भी सभी कट्टरपंथी ताकतों को एक साथ लाया था।”

यह भी दावा किया गया है कि पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) जमात के साथ मिलकर काम कर रही थी। उन्होंने कहा, “कुछ ISI-प्रशिक्षित लोग जमात में घुसपैठ कर चुके थे और जून के अंत में पुलिसकर्मियों की हत्या में उनकी अहम भूमिका थी।”

उन्होंने दावा किया कि जब अराजकता फैली तो उन्हें शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने बताया कि ISI-प्रशिक्षित लोग जमात में घुसपैठ कर चुके हैं और छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए हैं। उन्होंने कहा कि वह तत्कालीन प्रधानमंत्री हसीना के पास गए थे लेकिन उन्होंने उन्हें बताया गया कि सेना प्रमुख ने हसीना को आश्वासन दिया है कि वह आंदोलनकारी छात्रों की बढ़ती भीड़ को सँभाल लेंगे।

असदुज्जमाँ ने 4 अगस्त 2024 से पहले वाली शाम को हुई बैठक को लेकर कहा, “शेख हसीना के सामने वकार ने मुझसे कहा कि सड़कों पर हो रही हिंसा के कारण लोगों का पुलिस पर से भरोसा उठ गया है और बेहतर होगा कि सेना ही प्रवेश द्वारों पर आंदोलनकारियों को रोके। वकार ने कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। वह यह सुनिश्चित करेंगे कि सेना किसी को भी प्रधानमंत्री आवास के पास न आने दे।”

असदुज्जमाँ ने कहा कि इस बैठक के अगले दिन क्या हुआ यह सब जानते हैं। दरअसल, हिंसक प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने हसीना के आवास पर धावा बोल दिया था और हजारों की संख्या में लोग उनके आवास में दाखिल हो गए थे जिसके कारण उन्हें देश छोड़कर भारत आने को मजबूर होना पड़ा।

बांग्लादेश अब बनेगा पाकिस्तान, शेख हसीना राजनीति में नहीं लौटेंगी: तख्तापलट के बाद बोले शेख हसीना के बेटे – ‘अब देश हमारी समस्या नहीं’; CIA और जमाते इस्लामी का खेल

     शेख हसीना (बाएँ) और उनके बेटे सजीब वाजेद (चित्र साभार: Dhaka Tribune & Wikimedia Commons)
बांग्लादेश में तख्ता पलट होने से मोदी सरकार को अति सतर्क रहने की जरुरत है। कल तक बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नरेंद्र मोदी के साये से भी दूर रहने की बात बोलती थी वही ममता आज मोदी की हर बात मानने को तैयार है। स्पष्ट संकेत दे रही है, मामला जरुरत से ज्यादा गंभीर है। विपक्ष, जमायते इस्लामी, चीन, ISI और CIA आदि की हर गतिविधि पर भारत सरकार को गिद्ध की नज़र रखने की भी जरुरत है। 

राहुल गाँधी ने एक बार कहा था कि देश में kerosene फैला हुआ है बस माजिस दिखाने की जरुरत है आदि आदि। समय आ गया है कि राहुल के इस बयान को अति गंभीरता से लिया जाए अन्यथा नहीं। जिस तरह शेख हसीना कट्टरपंथियों पर नकेल डाल देश को प्रगति की राह पर ले जा रही थी, वहां के विपक्ष को यह रास नहीं आया और चुनाव का लगभग बहिष्कार ही कर दिया था। जबकि भारत में विपक्ष ने narrative चलाया कि 'मोदी आया तो संविधान बदल दिया जाएगा; देश में फिर दुबारा चुनाव नहीं होंगे", आदि आदि। बांग्लादेश और भारत के विपक्ष के प्रचार में समानता देखनी होगी। जिस तरह भारत में हुई प्रगति से विपक्ष ने जनता को गुमराह किया उसी तरह बांग्लादेश में भी हुआ। जिस तरह बांग्लादेश विपक्ष देश विरोधियों के हाथ की कठपुतली बन आग से खेल बांग्लादेश कोही जला दिया, ठीक उसी तरह मोदी विरोधी विदेशी ताकतों ने भी चुनावो में खूब पैसा खर्च किया। जिसकी सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा हुई थी।      

शेख हसीना के undergarments लहराता 
उपद्रवी 
बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट किए जाने के बाद भी हिंसा नहीं रुकी है। बांग्लादेश में आवामी लीग के नेता और हिन्दू निशाने पर लिए जा रहे हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना देश छोड़ कर भारत आ गई हैं। इस बीच उनके पुत्र सजीब वाजेद ने कहा है कि उनकी माँ इन सब से दुखी हैं। वाजेद ने कहा है कि बांग्लादेश के लोगों ने जो किया है, वह भुगतना अब उनकी जिम्मेदारी है।

Wion को दिए इंटरव्यू में वाजेद ने कहा, “बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह डरावना है। बांग्लादेश में अराजकता है, कानून का कोई राज नहीं है। भीड़ सड़कों पर घूम रही है, घरों, कारखानों में तोड़फोड़ कर रही है और मैंने जो

बंगबंधु मुजीब की मेटल पुतला भी तोड़ दिया 
सुना है उसके अनुसार वे अल्पसंख्यकों पर हमला कर रहे हैं। हमलावर अल्पसंख्यकों और हिंदू मंदिरों पर हमला कर रहे हैं। इसलिए बांग्लादेश सही में अराजकता की स्थिति में है।”

वाजेद ने बताया कि शेख हसीना सही हालत में हैं लेकिन काफी दुखी हैं। उन्होंने बताया कि शेख हसीना ने बांग्लादेश में काफी विकास किया जिसके उत्तर में उन्हें यह भुगतना पड़ा है। वाजेद ने चिंता जताई है कि बांग्लादेश अब दूसरा पाकिस्तान बन जाएगा। उन्होंने शेख हसीना की राजनीति में वापसी को भी नकार दिया है। उन्होंने बताया कि शेख हसीना अब 77 वर्ष की हैं और उनका वापस देश की राजनीति में लौटने का कोई विचार नहीं है।

वाजेद ने कहा बांग्लादेश के लोगों ने अपने नेता चुन लिए हैं और वहीं उन्हें मिलेंगे। वाजेद ने खुद के भी राजनीति में आने के कयासों पर रोक लगा दी। उन्होंने बताया कि उनकी भविष्य में ऐसी कोई योजना नहीं है। वाजेद ने कहा कि उनका परिवार तीन बार सैन्य तख्तापलट झेल चुका है। उन्होंने कहा कि उनका परिवार बांग्लादेश को बचाते बचाते थक चुका है और अब बांग्लादेश के लोग खुद ही यह काम करें। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश अब उनकी समस्या नहीं है।

वाजेद ने कहा कि बांग्लादेश के लोग कृतघ्न हैं। उन्होंने बांग्लादेश में शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियाँ तोड़े जाने पर रोष जताया। उन्होंने कहा कि शेख हसीना ने बांग्लादेश को एक विफल देश से एशिया में बढ़ता हुआ देश बनाया और उनका कार्यकाल बांग्लादेश के लिए स्वर्णिम काल माना जाएगा।

वाजेद ने इन सब के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना भी की है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने हर मुद्दे पर बांग्लादेश की आलोचना की है और अब वह बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को मारे जाते हुए देखेंगे। उन्होंने कहा कि यही यह लोग चाहते थे। उन्होंने शेख हसीना के भविष्य को लेकर भी बात की।

उन्होंने बताया कि अब शेख हसीना अपने पोते-पोतियों के साथ वक्त बिताएँगी। वह अब कुछ दिन अपने बेटे-बेटी और बहन पास रहेंगी। वाजेद ने बांग्लादेश अंतरिम सरकार को लेकर चिंता जताई और कहा कि यह सरकार कहीं दिख नहीं रही और कुछ कर भी नहीं पा रही है।

वाजेद ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो भी जारी किया। उन्होंने कहा कि जितना ही सरकार इस्लामी प्रदर्शनकारियों के सामने झुकती गई, उतना ही वह आगे बढ़ते गए। उन्होंने बांग्लादेश में चुनावों के गड़बड़ होने के आरोप खारिज कर दिए। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में अब जो कुछ होगा वहां के लोगों की जिम्मेदारी है।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में जुलाई महीने से ही आरक्षण खत्म करने की माँग को लेकर प्रदर्शन चल रहे थे। इस प्रदर्शन को इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाइजैक कर लिया और इसके बाद भारी हिंसा हुई। यह हिंसा अगस्त में और बढ़ गई और प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। शेख हसीना सोमवार (5 अगस्त, 2024) को ढाका छोड़ कर भारत आ गईं। वर्तमान में वह भारत में हैं। उनके कुछ दिन भारत में रह कर आगे ब्रिटेन जाएँगी।

sheikh hasina son sajeeb wazed says bangladesh people ungrateful her mother will not return to politics

तुर्की का NATO में रहने का क्या औचित्य है? उसे अब NATO से बाहर कर देना ही तर्कसंगत होगा

सुभाष चन्द्र 

तुर्की ने दो दिन पहले इज़रायल को धमकी दी है कि वह फिलिस्तीन के समर्थन में इजराइल में घुस कर हमला करेगा जैसे वह लीबिया और Nagorno-Karabakh में घुसा
था। इस पर इजराइल के विदेश मंत्री Israel Katz ने अपने सभी diplomats को निर्देश दिया है कि वे NATO सदस्यों से तुर्की की निंदा करने को कहें और तुर्की को NATO से बाहर करने की मांग की है

अब सवाल यह पैदा होता है कि आखिर तुर्की का NATO में रहने का क्या औचित्य है जब अमेरिका और यूरोप के अधिकांश देश हमास के मामले में इजराइल के साथ खड़े हैं तुर्की को 1951 में NATO में शामिल किया गया उसकी ही मांग पर तुर्की ने सोवियत संघ से मिलिट्री टकराव में बचाव के लिए NATO से सुरक्षा की गारंटी मांगी थी और तब मई, 1951 में CIA और US Military के गहन विचार के बाद तुर्की को NATO में शामिल किया गया था

अब सोवियत संघ 25 दिसंबर 1991 में ख़त्म होने के बाद तुर्की का NATO में शामिल होने का कारण समाप्त हो गया क्योंकि सोविएत संघ के बाद  उसमे से निकले सबसे देश रूस के साथ तुर्की के गहरे संबंध हैं और तुर्की के विकास के लिए रूस और तुर्की के बीच समझौते भी हो रखे हैं और रूस अमेरिका का दुश्मन देश है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इसी तरह अमेरिका  के एक अन्य शत्रु देश चीन के साथ भी तुर्की के घनिष्ठ संबंध हैं संबंध तो तुर्की के अमेरिका के परम शत्रु देश उत्तरी कोरिया से भी हैं कल को रूस, चीन और उत्तर कोरिया अमेरिका पर हमला करते हैं तो तुर्की अमेरिका का साथ देने के लिए कदापि आगे नहीं आएगा और इसलिए तुर्की का NATO में रहना औचित्यहीन है 

NATO का article 5 कहता है कि किसी सदस्य देश पर आक्रमण सभी सदस्यों पर आक्रमण समझा जाएगा और सभी NATO देश पीड़ित देश का साथ देंगे लेकिन जहां तक मैंने पढ़ा है NATO का कोई Article यह नहीं कहता कि यदि कोई सदस्य देश किसी अन्य सदस्य देश या किसी और गैर NATO देश पर हमला करता है तो भी सभी NATO सदस्य देश उसका साथ देने के लिए बाध्य होंगे 

तुर्की का ईरान के साथ भी कोई सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं है बल्कि इस्लामिक देशों पर अपना प्रभुत्व कायम करने का Proxy Conflict है और शायद इसलिए तुर्की अब इजराइल से पंगा लेना चाहता है क्योंकि ईरान के पोषित हमास के अलावा  हिज़्बुल्लाह और हूतियों को भी इज़राइल ने ठोका है और तुर्की इस बहाने ईरान का वर्चस्व इस युद्ध में ख़त्म करना चाहता है ईरान अमेरिका से सीधा टकराव से बचता है और तुर्की तो अमेरिका से उलझने की हिम्मत ही नहीं कर सकता

तुर्की इजरायल पर पहले हमला करने की धमकी दे रहा है और NATO के Article 5 को ध्यान में रख ही इजरायल तुर्की पर Self Defence में भी पहले हमला नहीं करेगा, हालांकि मुझे शंका है कि तुर्की इज़रायल संभावित युद्ध में NATO देश तुर्की का साथ देंगे और NATO में विभाजन हो सकता है

तुर्की भी इज़रायल में सोच समझ कर घुसेगा क्योंकि इजराइल को अमेरिकी कानून के अनुसार  अमेरिका का प्रमुख गैर NATO मित्र का दर्जा दिया गया है इसके अनुसार इजराइल जैसे मित्र देश defence और security cooperation के लिए विशेष लाभ के अधिकारी हैं इसलिए तुर्की ने यदि इजराइल में घुसने की कोशिश की तो बुरी बीतेंगी और यह कदम उसके लिए ट्रंप के आने के बाद तो बहुत भारी पड़ेगा अबकी बार ट्रंप के कार्यकाल में तुर्की NATO से बाहर हो सकता है और पूरा इस्लामिक विश्व पर खतरा पैदा होगा

RAW को भी पूछना चाहिए कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA, फोर्ड फाउंडेशन और केजरीवाल में क्या है कनेक्शन?


दिल्ली शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल गिरफ्तार हो चुके हैं। अब RAW को भी केजरीवाल से पूछताछ करनी चाहिए। भारत में पाकिस्तानी गुप्तचरों पर तो चर्चा होती रहती है, लेकिन RAW और KGB दलालों के बारे में पूछताछ जरुरी है। आम आदमी पार्टी पर खालिस्तान समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं। इसका ताजा सबूत हाल ही में देखने को मिला जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा आंख का आपरेशन कराने ब्रिटेन पहुंचे और वहां पहुंचते ही उन्होंने खालिस्तान समर्थक ब्रिटिश सांसद प्रीत गिल से मुलाकात की। यह भी किसी से छुपा नहीं है भारत में खालिस्तान आंदोलन को अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA हवा देती रही है। अमेरिका जिस तरह से खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू का बचाव करती है उससे भी साफ है कि पन्नू उसका एसेट है। क्या भारत में भी अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एसेट हैं। केजरीवाल जब एक सरकारी कर्मचारी थे उसी समय से अपने एनजीओ के लिए फोर्ड फाउंडेशन से फंडिंग लेते रहे। फोर्ड फाउंडेशन को CIA फंडिंग करती है। ऐसे में सवाल उठता है कि CIA, फोर्ड फाउंडेशन और केजरीवाल के बीच कोई कनेक्शन है क्या? केजरीवाल के आवास से ईडी अधिकारियों से जुड़े दस्तावेज बरामद होना क्या इस ओर इशारा कर रही है कि भारत के खिलाफ कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश रची जा रही है। 

फोर्ड फाउंडेशन को फंड करती है CIA
अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के डिक्लासीफाइड दस्तावेज के अनुसार, फोर्ड फाउंडेशन की परियोजनाओं के वित्तपोषण में CIA उनका भागीदार था। परियोजनाएं राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक युद्ध में शामिल हैं।

CIA, फोर्ड फाउंडेशन और मैग्सेसे पुरस्कार के बीच संबंध के सबूत
अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के कई दस्तावेज हैं, जो स्पष्ट रूप से CIA, फोर्ड फाउंडेशन और मैग्सेसे पुरस्कार के बीच संबंध दिखाते हैं।

केजरीवाल के एनजीओ की फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन से
जनवरी 2000 में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने एक एनजीओ ‘संपूर्ण परिवर्तन’ उर्फ ​​’परिवर्तन’ शुरू किया। इसकी शुरुआत ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ की मदद से की गई थी लेकिन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल को फंडिंग कौन कर रहा था? फंडिंग कर रहा था फोर्ड फाउंडेशन और डीप स्टेट एजेंट जार्ज सोरोस!

केजरीवाल जब सरकारी कर्मचारी थे तभी से मिल रही फंडिंग
वर्ष 2002 में, फोर्ड फाउंडेशन ने केजरीवाल के वित्त पोषित एनजीओ ‘संपूर्ण परिवर्तन’ उर्फ ​​’परिवर्तन’ को सीधे फंड देना शुरू कर दिया। कृपया ध्यान दें कि वह उस समय भी एक सरकारी कर्मचारी थे!

केजरीवाल अशोका ‘फेलो’ बने, फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन से
वर्ष 2004 में अरविंद केजरीवाल अशोका ‘फेलो’ बने। क्या आप जानते हैं कि अशोका में फेलोशिप का वित्तपोषण कौन करता है? यहां भी फोर्ड फाउंडेशन ही फंडिंग करता है।

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार की फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन से
अरविंद केजरीवाल को 2006 में इमरजेंट लीडरशिप की श्रेणी में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। आप यह जान कर चौंक जाएंगे कि इस पुरस्कार के लिए फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन ही करता है।

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एल रामदास AAP से जुड़े
वर्ष 2004 में, एडमिरल लक्ष्मीनारायण रामदास, पीवीएसएम, एवीएसएम, वीआरसी, वीएसएम (सेवानिवृत्त), पूर्व नौसेना प्रमुख को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। बाद में एल रामदास AAP के आंतरिक लोकपाल बने!

एल रामदास की बेटी फोर्ड फाउंडेशन में सलाहकार
रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एल रामदास की बेटी कविता रामदास, फोर्ड फाउंडेशन के अध्यक्ष की वरिष्ठ सलाहकार हैं और पहले कई वर्षों तक भारत में फोर्ड फाउंडेशन के देश प्रतिनिधि के रूप में काम कर चुकी हैं। उन्होंने जार्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के साथ भी काम किया है!

केजरीवाल Aid Sathi चुने गए
केजरीवाल को 2006 में एड-इंडिया एनजीओ द्वारा Aid Sathi के रूप में चुना गया था। Aid Sathi को बिना किसी विशिष्ट परियोजना के धन, प्रचार और समर्थन प्राप्त होता है!
फिर, इस एनजीओ को फोर्ड फाउंडेशन से भी फंड मिलता है!

मेधा पाटकर को AID-इंडिया फंडिंग
मेधा पाटकर को भी AID-इंडिया फंडिंग कर रही थी। केजरीवाल उसके काम को बढ़ावा देने में भी पूरी तरह शामिल थे। एक समय गुजरात में मेधा पाटकर को आम आदमी पार्टी की मुख्यमंत्री चेहरा बनाने की भी बात चल रही थी वहीं मेधा पाटकर ने भी आम आदमी पार्टी का खुलकर समर्थन किया है।

CIA ने कैसे दुनियाभर में सरकारों को सत्ता से बेदखल किया, देश में कौन बनते हैं इसके एजेंट, भारत के खिलाफ किस तरह साजिश रचती है एजेंसी


अमेरिका और पश्चिमों देश भारत के खिलाफ लगातार एजेंडा चला रहे हैं और यह उजागर भी होता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की छवि धूमिल करने के लिए इसी महीने हंगर इंडेक्स जारी किया गया था जिसमें भारत की स्थिति बहुत ही खराब दिखाई गई थी। इस सूची में भारत को अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल व म्यांमार से भी खराब स्थिति में बताया गया। ग्‍लोबल हंगर इंडेक्‍स दो यूरोपियन एनजीओ Concern Worldwide और Welthungerhilfe ने मिलकर जारी किया था। इससे पता चलता है कि अमेरिका और यूरोपीय देश मोदी और भारत के खिलाफ किन-किन तरीकों से साजिश रच रही हैं। जो देश भारत से अनाज मांगकर अपने लोगों का पेट भर रहे हैं वे भी इस सूची में भारत से अच्छे बताए गए हैं। एक तरफ IMF कह रहा है कि भारत 2028 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा वहीं हंगर इंडेक्स में भारत पिछड़ता जा रहा है। 
ज्ञात हो जब मोदी अमेरिका या किसी भी अन्य देश जाते हैं, विरोधी प्रदर्शन करते हैं, इस रपट से स्पष्ट होता है कि यह सब जमावड़ा CIA द्वारा किया जाता है। अपने युवा दिनों से दिल्ली में इतने अधिक प्रदर्शन देखे, लेकिन प्रदर्शनकारी संसद या राष्ट्रपति भवन तक जाते नहीं देखा, लेकिन 'निर्भय कांड' में प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन के द्वार झंझोड़ती है, बिजली के खम्बों पर चढ़ रहे एवं रही हैं। जिसे लोग जनता का ग़ुस्सा समझ रहे थे, लेकिन सीआईए की हरकत सामने आने से जनता को समझ जाना चाहिए कि यह ड्रामा किसके चंदे से हुआ? यानि हंगामा करने वाले जनहितैषी नहीं, बल्कि अमेरिका के टुकड़ों पर पलने वाले जनविरोधी हैं। यही कारण है कि मोदी सरकार विदेशी चंदा मिलने वाले एनजीओ पर लगाम लगा रही है।  

वहीं कुछ ही दिन पहले अमेरिकी कंपनी गैलप ने दुनिया के सबसे सुरक्षित देशों का सर्वे किया और एक सूची जारी की। गैलप के सर्वे के मुताबिक पाकिस्तान भारत से ज्यादा सुरक्षित देश है। पता नहीं इस सर्वे को कैसे बनाया गया है। जहां पाकिस्तान खुद आतंकवाद की गोद में पल रहा है वह भारत से ज्यादा सुरक्षित देश कैसे हो सकता है। आश्चर्य की बात है कि गैलप लॉ एंड ऑर्डर इंडेक्स के इस सर्वे में 121 देशों की सूची में भारत 60वें नंबर पर है। वहीं पाकिस्तान इस सूची में 42वें नंबर पर है। भारत के खिलाफ अमेरिका का यह एजेंडा कोई नई बात नहीं है। अमेरिका ने ही ISRO के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन को फंसाने की साजिश रची थी। क्योंकि नंबी नारायण क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहे थे और अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत क्रायोजेनिक इंजन बनाने में सफल हो जाए।

ट्विटर यूजर Agenda Buster ने CIA के काम करने के तरीकों पर एक ट्वीट की एक श्रृंखला प्रकाशित की है। यह स्टोरी उसी पर आधारित है। उन्होंने लिखा है- कैसे CIA (एजेंसी) दुनिया भर में निर्वाचित सरकार को सत्ता से बेदखल कर देती है। इसके लिए आपको युद्ध और शीत युद्ध के बीच अंतर, एजेंसी और उसके बारे में कि वे कैसे काम करती है, “मानव संपत्ति” (Human Asset) क्या है, 5 तरीके जिनके द्वारा एजेंसी दुनिया भर में गैर-मित्र सरकार को हटाती है, भारत के लिए एजेंसी की क्या योजना है, यह समझने की जरूरत है।

युद्ध की शैली पूरी तरह से बदल गई, अब शीत युद्ध का जमाना
अगर आपको लगता है कि लड़ाकू जेट और टैंक से देश जीते जाते हैं तो आप पूरी तरह गलत हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युद्ध की शैली पूरी तरह से बदल गई है। दुनिया आज युद्ध से शीत युद्ध की ओर बढ़ गया है। देश पर राजनीतिक दलों और कुछ अभिजात वर्ग का शासन है। यदि आप उन्हें नियंत्रित कर लेते हैं, तो आप पूरे देश को नियंत्रित कर लेते हैं। शीत युद्ध एक राजनीतिक युद्ध है जहां आप कंपनी पर कब्जा नहीं करते हैं, आप उस देश के कुछ प्रभावशाली लोगों को नियंत्रित करते हैं और उन्हें अपने लाभ की नीति के लिए उपयोग करते हैं। जबकि युद्ध इसके ठीक उलट होता है। युद्ध दो देशों के बीच एक गंभीर युद्ध है जहां रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह घातक हथियारों का उपयोग किया जाता है।

लगभग 160 देश अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के नियंत्रण में

1950 के बाद, अमेरिका और सोवियत संघ दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों के रूप में उभरे और इसके साथ ही शीत युद्ध के युग की शुरुआत हुई। दोनों देशों ने दूसरे देशों पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया। उनकी ओर से उनकी गुप्त एजेंसियां ​​यह काम कर रही थीं। अमेरिका की CIA (Agency) और रूस की ओर KGB काम कर रही थी। 1992 के बाद, सोवियत संघ का विघटन हो गया और वह कई देशों में बंट गया और इसके बाद अमेरिका दुनिया का निर्विवाद राजा बन गया। एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी कहती है कि आज दुनिया के लगभग 160 देश अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के नियंत्रण में हैं औक उनके प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, प्रमुख मंत्री, मीडिया सभी अमेरिका द्वारा तय किए गए हैं।

अमेरिका पूरी दुनिया को कैसे नियंत्रित करता है?

अमेरिका पूरी दुनिया को कैसे नियंत्रित करता है? इस काम को अंजाम देने के लिए 4 छोटी टीमें हैं। एजेंसी: जो कि परिचालन भाग की देखभाल करते हैं। रिसर्च इंस्टिट्यूट : सामरिक भाग की देखभाल करती है। एनजीओ: वित्तीय हिस्सा देखती है। मानव संपत्ति: वे वास्तव में एजेंसी के निर्देशों के अनुसार क्षेत्र में काम करते हैं। वे मूल निवासी हैं। इन्हें अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए एजेंसी द्वारा तैयार किया जाता है। इसे समझने के लिए ह्यूमन एसेट्स को समझना बहुत जरूरी है। इस तरह से देखें तो एजेंसी की भारतीय मानव संपत्ति भारतीय ही होगी। वे इनमें से हो सकते हैं- भारतीय नेता, वकीलों, न्यायाधीश, पत्रकार, कार्यकर्ता, बॉलीवुड, प्रोफ़ेसर, आपराधिक या कोई अन्य। ये एजेंसी द्वारा चुने गए और तैयार किए गए होते हैं। उनका काम भारत में रहना है लेकिन अमेरिका के लिए काम करना है।

जो अमेरिका की पैरवी करते हैं, वे होते हैं CIA के Human assets

90 के दशक तक, भारत केजीबी के नियंत्रण में था और हर क्षेत्र में केजीबी की बहुत सारी मानव संपत्ति थी, लेकिन 1992 के बाद, एजेंसी ने कब्जा कर लिया और अब भारत में बहुत सारे Human assets काम कर रहे हैं। अब यहां सवाल उठता है कि वे कौन हैं? पता करने की कोशिश करें। जिन्हें अमेरिका, अमेरिकी मीडिया, अमेरिकी एनजीओ द्वारा प्रचारित किया जाता है और जो अमेरिका की पैरवी करते हैं। ये बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे “किसी भी प्रतिकूल सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एजेंसी के 5 तरीके को उस क्षेत्र में क्रियान्वित करते हैं। इसके लिए टूल किट अमेरिकी अनुसंधान संगठन द्वारा तैयार किया जाता है। एजेंसी द्वारा व्यवस्थित किया जाता है। अमेरिकी एनजीओ द्वारा भारतीय एनजीओ को वित्तपोषित किया जाता है। और Human assets फील्ड पर टूलकिट निष्पादित करते हैं। Human assets का कार्य: अमेरिकी वैश्विक नीतियों का समर्थन करने के लिए। यूएनओ में अमेरिका का समर्थन करें। अनुकूल नीतियां बनाएं, अमेरिकी कंपनियों के पक्ष में अदालती निर्णय एवं लाभ। खुद की कंपनी के विकास और विकास को रोकने के लिए। अपनी सभ्यता को नष्ट करने के लिए। अगर कोई पीएम या राष्ट्रपति अमेरिका की बात नहीं सुनते हैं तो वे उन्हें हटा देते हैं।

इन 5 तरीकों से सरकार बदलने का खेल करती है CIA

ऐसे 5 तरीके हैं जिनके द्वारा एजेंसी पीएम को हटाती है और सरकार बदलती है। विपक्ष को फंडिंगः यदि सत्तारूढ़ दल उनका समर्थन नहीं करता है तो वे विपक्षी दलों को धन देते हैं, उन्हें अपने मीडिया के माध्यम से प्रचार करते हैं, उन्हें स्टार बनाते हैं, उनका खर्च वहन करते हैं। एजेंसी ने कई देशों में इसका इस्तेमाल किया। उदाहरण के लिए, 1963 वियतनाम: जनरल डोंग वान मिन्ह ने राष्ट्रपति न्गो दीन्ह को हटा दिया जो अमेरिका के अनुरूप नहीं थे। उन्हें अमेरिका द्वारा वित्त पोषित किया गया था। ब्राजील, ग्वाटेमाला और कई देशों में समान मामले हैं। अमेरिकी राज्य विभाग इसके लिए मुख्य एजेंसी है। वर्तमान भारतीय CM में से कुछ को भी अमेरिका द्वारा वित्त पोषित किया गया है।

एजेंसी हत्या करवाने से भी बाज नहीं आती

एजेंसी हत्या करवाने से भी बाज नहीं आती है। यदि विपक्षी दल सत्तारूढ़ सरकार को गिराने में विफल रहता है या यदि कोई विपक्ष और एक दल का शासन नहीं है तो अमित्र नेता को एजेंसी द्वारा मार दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए 1961 में कांगो में पैट्रिस लुंबा पहले पीएम थे। वे कट्टर राष्ट्रवादी और ईमानदार थे। उन्होंने बेल्जियम के एक उपनिवेश से कांगो को एक स्वतंत्र गणराज्य में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह सोवियत संघ के करीब थे। बेल्जियम आयोग की 2001 की रिपोर्ट में लुमुम्बा को मारने के लिए अमेरिका और बेल्जियम की साजिशों का वर्णन किया गया है। उनमें से एजेंसी ने उसे जहर देने का प्रयास किया था।

अर्थव्यवस्था को नष्ट करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती

सरकार को उखाड़ फेंकने का तीसरा तरीका उनकी अर्थव्यवस्था को नष्ट करना है। लोग अपने आप सड़कों पर आ जाएंगे और सरकार बदल देंगे। इसके दो तरीके हैं। खुले ऑपरेशन – जहां अमेरिका ने रूस, उत्तर कोरिया, ईरान के साथ अब प्रतिबंध लगाए हैं और दूसरा गुप्त संचालन : उनका एनजीओ कार्यकर्ता, प्रदर्शनकारी यह काम करते हैं। विकास कार्यों का विरोध, धरना, बंद का आयोजन। कुछ लोगों का कहना है कि चीनी अर्थव्यवस्था को नष्ट करने के लिए कोविड भी एजेंसी का उपकरण था।

अन्य प्रसिद्ध मामले:1970 में चिली। साल्वाडोर अलेंदे ने 1970 में चिली के राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल की, उन्होंने तांबे की खदानों का राष्ट्रीयकरण किया। इससे अमेरिका नाराज हो गया और रिचर्ड निक्सन ने अलेंदे को उखाड़ फेंकने का आदेश दिया और कहा कि ‘उनकी अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दो’। और दो साल के भीतर महंगाई बढ़कर 200 फीसदी हो गई। राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 13 प्रतिशत को पार कर गया। एक बार आईबी ने कहा था, एनजीओ के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था हर साल 3% कम हो जाती है।

मीडिया पर कब्जा, मीडिया के जरिये प्रोपेगेंडा फैलाना

चौथा तरीका है मीडिया द्वारा सरकार विरोधी प्रचार करना। यह कार्य उनके पत्रकार, सोशल मीडिया प्रभावितों और फैक्ट चेकर मानव संपत्ति द्वारा निष्पादित किया जाता है। सरकार विरोधी दुष्प्रचार लेख लगाए गए। लगभग सभी प्रमुख मीडिया अमेरिका द्वारा नियंत्रित होते हैं। फर्जी सोशल मीडिया हैंडल बनाए गए, प्रभावशाली सोशल मीडिया हैंडल को काम पर रखा गया, उनका चौबीसों घंटे काम सरकार और पीएम को गाली देना है।
उनका एजेंडा है-1. जनता की राय बदलना है। 2. सरकार विरोधी बयानबाजी करना है। भारत में यह कार्य IPSMF (IPS Media Foundation) द्वारा किया जाता है। इसका बैंगलोर स्थित एनजीओ जो भारतीय मीडिया को फंड करता है। एजेंसी ने इस रणनीति का इस्तेमाल अपने स्वयं के राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए भी किया। यही काम भारत में मोदी के साथ भी किया जा रहा है।

अराजकता पैदा करनाः धरना, हड़ताल, गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करना

अंतिम तरीका देश में अराजकता, सड़क पर विरोध, धरना, हड़ताल, गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करना है। ईरान में 1953 का प्रसिद्ध मामला जब उन्होंने प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग को हटा दिया जिन्होंने ईरान के तेल क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की थी। इमरान खान ने यह भी दावा किया कि चीन से करीबी होने के कारण अमेरिका ने उन्हें हटाया। 2014 में यूक्रेन में विक्टर यानुकोविच को हटाया गया जो कि पुतिन के करीबी थे और यूरोपीय संघ के समझौते के लिए सहमत नहीं थे। उसके खिलाफ एक बहुत बड़ा अभियान चलाया गया था और उसे हटा दिया गया था। और अमेरिका ने यूक्रेन को विनाश की धकेला। तो ऐसे 5 तरीके हैं जिनके द्वारा एजेंसी उन देशों में सरकारों को सत्ता से बेदखल करने का षडयंत्र रचते हैं जहां सरकार उनके अनुकूल नहीं होती। आप अब तक समझ ही गए होंगे कि इस समय अमेरिका के लिए नरेंद्र मोदी सरकार अनुकूल नहीं है। और वे उसे हटाने के लिए कुछ भी करेंगे।

मोदी सरकार को सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका रच रहा है साजिशें, CIA पूरी ताकत से जुटा, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया फैला रहा प्रोपेगेंडा


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस तरह से नया भारत अपने पौराणिक वैभव के साथ विज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ आगे बढ़ रहा है वह दुनिया के कुछ देशों को नागवार गुजर रहा है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका को अलग मिर्ची लगी हुई है क्योंकि नया भारत उसकी हां में हां नहीं मिला रहा है बल्कि उसे आंख भी दिखा रहा है। अमेरिका से हथियार खरीदने की जगह भारत ने रूस को चुना, इससे वह तिलमिलाया हुआ है। उसकी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि आज वह सरकार में किसी मंत्री या नेता को ‘खरीद’ भी नहीं पा रह है। जैसा कि वह कांग्रेस के शासन काल में किया करता था। 

जैसा कि उसने 1994 में इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायण पर जासूसी का आरोप लगवाकर किया था। उस वक्त नंबी नारायण के नेतृत्व में भारत क्रायोजेनिक बनाने के अंतिम चरण में पहुंच गया था। 1994 में नंबी पर आरोप लगाया गया कि जिस क्रायोजेनिक इंजन तकनीक पर वो काम कर रहे थे, उसकी तकनीक उन्होंने लीक करा दी है। नारायणन समेत तीन साइंटिस्ट गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर आरोप लगा कि वो ये तकनीक पाकिस्तान को बेच रहे थे। हालांकि ये आरोप बाद में खारिज हो गया। पुलिस को लाख कोशिश के बाद भी कुछ ऐसा नहीं मिला, जिसे आपत्तिजनक कहा जा सके। अमेरिका अपनी चाल में सफल रहा था और भारत अपने अंतरिक्ष अभियान में 15-20 साल पीछे चला गया। 

इसी तरह आज भारत UPI पेमेंट सिस्टम दुनिया में धूम मचा रहा है और इससे अमेरिकी कंपनी वीजा मास्टरकार्ड व्यापक नुकसान होने वाला है। पीएम मोदी के नेतृत्व में नया भारत जिस तरह से मजबूत हो रहा है वह अमेरिका नहीं सुहा रहा है और अब वह मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए साजिशें रच रहा है। इसके लिए वह देश के विपक्षी दलों, देशविरोधी गतिविधियों में शामिल तत्वों, लेफ्ट-लिबरल गैंग, खान मार्केट गैंग और अर्बन नक्सलियों को हर तरह से मदद पहुंचा रहा है।

इस संबंध में दडायरेक्टरीचडॉटकॉम ने एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें मोदी शासन के खिलाफ अमेरिका साजिश का पर्दाफाश किया गया है। लेख में कहा गया है कि मोदी शासन को सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका पूरी ताकत से मेहनत कर रहा है। इसके लिए हिलेरी-ओबामा भी इस साजिश का हिस्सा हैं जो कि बाइडन के पीछे की वास्तविक शक्ति हैं। पीएम मोदी के साथ समस्या यह नहीं है कि वह एक हिंदू राष्ट्रवादी हैं, बल्कि यह है कि उन्हें खरीदा नहीं जा सकता। अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA जिन्हें खरीद नहीं पाता उनसे घृणा करती है। यहां यह याद रखने की बात है कि कैसे CIA ने भारत के क्रायोजेनिक इंजन के विकास को बर्बाद कर दिया? नंबी नारायणन और अन्य को खरीदा नहीं जा सकता था – इसलिए उन्होंने कांग्रेस में शक्तिशाली भारतीय राजनेताओं के साथ मिलकर इसरो वैज्ञानिकों को बदनाम करने के लिए महिला जासूस का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने अब इसरो के वैज्ञानिकों को बरी कर दिया है – लेकिन बहुमूल्य समय नष्ट हो गया और वैज्ञानिकों की एक पीढ़ी को काम करने से रोक दिया गया।

विक्टोरिया नुलैंडः यूएस डीप स्टेट का शासन परिवर्तन एजेंट

ओबामा हिलेरी कैबल (The Obama Hillary Cabal) आर्म्स, फार्मा और ऑयल लॉबी को नियंत्रित करती है और इसमें 3 महिलाएं हैं: सुसान राइस, सामंथा पावर और विक्टोरिया नुलैंड। विक्टोरिया को यूएस डीप स्टेट के शासन परिवर्तन एजेंट के रूप में जाना जाता है। 2013 में यूक्रेन में EUROMAIDAN विरोध प्रदर्शन के पीछे विक्टोरिया का ही हाथ था। आप देख सकते हैं कि वह किसी देश के लिए कितनी खतरनाक रूप से काम कर सकती है। मार्च 2022 में दिल्ली की अपनी यात्रा पर, वह खुले तौर पर LeLi गिरोह, पत्रिकाओं, जनहित याचिका कार्यकर्ताओं से मिलीं और तमिलनाडु राज्य के नेताओं के साथ गुप्त बैठकें कीं। कोई आश्चर्य नहीं कि पप्पू और डीएमके यूनियन ऑफ स्टेट्स मॉडल की बात कर रहे हैं। इस तरह आने वाले दिनों में कुछ नए नैरेटिव सामने आएं तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

विक्टोरिया नुलैंड की भारता यात्रा का मकसद

विक्टोरिया नुलैंड की यात्रा के दौरान मुख्य उद्देश्य “थोरियम”(THORIUM) थी, तमिलनाडु का अर्थ थोरियम और थोरियम का अर्थ तमिलनाडु है। सीआईए भारत में एजेंटों को नहीं खोना चाहती। वही नूलैंड भारत में है जो हमें रूस के खिलाफ अमेरिका का समर्थन करने के लिए कह रही है। और भारत में रहते हुए वह कई सीएए विरोधी समूहों / लोगों से मिली – क्यों? उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की वकील करुणा नंदी के साथ काफी समय बिताया। अब करुणा को यह कहने के लिए जाना जाता है कि “तीन तलाक पसंद की स्वतंत्रता है। अगर कोई हिंदू पुरुष अपनी पत्नी से कह सकता है कि “मैं तुम्हें तलाक देना चाहता हूं” तो एक मुसलमान को तीन तलाक कहने का अधिकार क्यों नहीं। सचमुच? मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार तीन तलाक का अंत तलाक में होता है। इसके साथ ही वह सीएए के खिलाफ रही हैं और किसान आंदोलन का समर्थन किया है। वह उन प्रभावशाली लोगों से मिल रही हैं जो पीएम मोदी के खिलाफ हैं ताकि आवश्यक धन CIA द्वारा उन तक पहुंचाया जा सके।

फोर्ड फाउंडेशन को वित्त पोषित करता है CIA, केजरीवाल हैं फोर्ड फाउंडेशन अवार्डी 

दिल्ली और पंजाब में अब अरविंद केजरीवाल के रूप में CIA द्वारा वित्त पोषित फोर्ड फाउंडेशन अवार्डी के पार्टी की सरकारें हैं। विक्टोरिया नुलैंड के बाद, भारत की यात्रा करने वाली संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी की प्रशासक सामंथा पावर हैं। इस बार टारगेट हमारी सबसे बड़ी ताकत होगी- फूड। एनजीओ/आंदोलनजीवी द्वारा खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े विरोध की उम्मीद है। कैबल चाहता है कि इस खाद्य श्रृंखला को तोड़ा जाए। ऐसा वे शास्त्री जी के समय से कई बार कर चुके हैं।

दिल्ली और पंजाब में अब अरविंद केजरीवाल के रूप में CIA द्वारा वित्त पोषित फोर्ड फाउंडेशन अवार्डी के पार्टी की सरकारें हैं। विक्टोरिया नुलैंड के बाद, भारत की यात्रा करने वाली संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी की प्रशासक सामंथा पावर हैं। इस बार टारगेट हमारी सबसे बड़ी ताकत होगी- फूड। एनजीओ/आंदोलनजीवी द्वारा खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े विरोध की उम्मीद है। कैबल चाहता है कि इस खाद्य श्रृंखला को तोड़ा जाए। ऐसा वे शास्त्री जी के समय से कई बार कर चुके हैं।

भारत के खिलाफ प्रतिबंध: वीजा से इनकार। यह आर्म्स लॉबी की सक्रियता है। विदेश मंत्री जयशंकर के शब्दों ने उनके जख्मों पर नमक छिड़क दिया है… भारतीयों को वीजा क्लियर करने में अमेरिका को 800 दिन लग रहे हैं जबकि चीनियों को वीजा क्लियर करने में 2 दिन लग रहे हैं। कैबल की नापाक साजिशें के तहत सबसे पहले WHO ने 4 भारतीय फार्मा कंपनियों का लाइसेंस रद्द कर दिया। इसके साथ ही डब्ल्यूएचओ ने भारत के फार्मास्यूटिकल्स द्वारा बनाए गए 4 खांसी और ठंडे सिरप पर अलर्ट जारी किया। इसे गंभीर गुर्दे की खराबी और गाम्बिया में बच्चों के बीच 66 मौतों से जोड़ दिया गया। डब्ल्यूएचओ के हवाले से रायटर ने खबर दी कि कंपनी और नियामक अधिकारियों के साथ आगे की जांच की जा रही है।

इसके बाद ओएनजीसी और बीपीसीएल को मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका में कुछ परियोजनाओं से बाहर करने के लिए मजबूर करने वाली तेल लॉबी हो सकती है। मुंबई में नए अमेरिकी महावाणिज्यदूत हैंकी, एक विशेषज्ञ हैं जो मिस्र में हुए आंदोलन के पीछे मुख्य ताकतों में से एक थे। वह ‘द नूलैंड स्कूल ऑफ रिजीम चेंज’ का छात्र है।

यूक्रेन में EUROMAIDAN विरोध प्रदर्शन

यह विरोध यूक्रेन सरकार के अचानक निर्णय बदले जाने के बाद हुआ। इसके तहत यूक्रेन ने यूरोपीय संघ-यूक्रेन एसोसिएशन समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किया और रूस के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने को चुना। CIA को यह मंजूर नहीं था। फरवरी 2014 में यूक्रेनी राजधानी में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच घातक संघर्ष, निर्वाचित राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को हटाने और यूक्रेनी सरकार को उखाड़ फेंकने में परिणत हुआ। तत्काल यूक्रेन में अमेरिकी समर्थक राष्ट्रपति थे और हंटर बाइडेन (वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति के बेटे) यूक्रेन में जा पहुंचे और व्यवसायों को तोड़ दिया या उनमें भागीदार बन गए। ये नूलैंड और अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े कारोबारी थे।

क्यों अमेरिका व कुछ देश नरेंद्र मोदी से नफरत करते हैं?

एनसीबी ने अब तक लगभग 8 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 80000 किलोग्राम नशीली दवाओं को नष्ट कर दिया है। जिन लोगों ने 8 लाख करोड़ रुपये की ड्रग्स खो दी, क्या वे मोदी से नफरत नहीं करेंगे?

ईडी अब तक भ्रष्टों के पास से 1,20,000 करोड़ रुपये का काला धन जब्त कर चुका है। क्या काला धन गंवाने वाले मोदी से नफरत नहीं करेंगे?

मोदी ने फाइजर और मॉडर्न से कोरोना वैक्सीन आयात नहीं किया। उन्होंने स्वदेशी टीके विकसित करने में मदद की और भारत से फाइजर के अपेक्षित व्यवसाय को नष्ट कर दिया। मोदी योग, आयुर्वेद, स्वच्छता और निवारक इलाज पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। क्या यह अंतरराष्ट्रीय फार्मा लॉबी मोदी से नफरत नहीं करेगी?

मोदी ने हथियारों के सौदागरों से ख़रीदना बंद कर दिया और सीधे फ़्रांस से राफेल ख़रीद लिया। मोदी ने भारत में रक्षा उपकरण बनाना शुरू किया और रक्षा खरीद कम की। क्या बेहद ताकतवर अंतरराष्ट्रीय रक्षा लॉबी मोदी से नफरत नहीं करेगी?

मोदी ने मध्य पूर्व से महंगा तेल खरीदना बंद कर दिया और रूस से भारी मात्रा में रियायती दर पर खरीदना शुरू कर दिया। क्या यह मध्य पूर्व का तेल माफिया मोदी से नफरत नहीं करेगा?

मोदी भारत की सड़ी-गली व्यवस्था को साफ कर रहे हैं। 75 साल से हमारा खून चूस रहे भ्रष्टाचारी मोदी के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। वे मोदी को रोकने के लिए कुछ भी करेंगे। दुनिया 3 शक्तिशाली लॉबी द्वारा शासित है – डिफेंस लॉबी, ऑयल लॉबी और फार्मा लॉबी। मोदी इन तीनों लॉबी के खिलाफ एक साथ जंग छेड़ रहे हैं। अब आप समझ सकते हैं कि ये लोग मोदी से इतनी नफरत क्यों करते हैं।

मोदी सरकार 2024 में भी चुनाव जीतेगी और ये भ्रष्ट लोग समाप्त हो जाएंगे। मोदी के पास एक ही ताकत है और वो है भारत की जनता। उसके साथ खड़े हो जाओ।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया, NYT लगातार चला रहा मोदी विरोध का प्रोपेगेंडा

पीएम मोदी को सत्ता हटाने की साजिश रच रहा पश्चिमी मीडिया भारत की छवि खराब करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता है, फिर चाहे वह कोविड काल हो, किसान आंदोलन हो, चीन के साथ सीमा विवाद हो या फिर भारत में होने वाले कोई दंगे हों। अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स (NYT) भारत की छवि करने वाले मीडिया संगठनों में सबसे आगे है। इसका सबसे बड़ा सबूत 1 जुलाई 2021 को तब देखने को मिला जब NYT ने जॉब रिक्रूटमेंट पोस्ट निकाली। दिल्ली में साउथ एशिया बिजनेस संवाददाता के लिए नौकरी निकाली गई थी। इसमें नौकरी के लिए शर्तें बेहद आपत्तिजनक थी। पत्रकारों के लिए आवेदन में ‘एंटी इंडिया’ सोच होना, ‘हिंदू विरोधी’ सोच होना और ‘एंटी मोदी’ होना भी जरूरी था। अब इससे साफ हो जाता है कि NYT का भारत के प्रति नजरिया क्या है और किस एजेंडे को वह आगे बढ़ा रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स का मोदी विरोध कोई नई बात नहीं है। वह पहले भी अपने लेख में कह चुका है कि पीएम नरेंद्र मोदी से भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को खतरा है। न्यूयॉर्क टाइम्स NRC के विरोध में रिपोर्ट छापता है, न्यूयॉर्क टाइम्स लेख लिखकर कहता है कि भारत हिंदू राष्ट्र बनने के करीब पहुंच रहा है? अनुच्छेद 370 की समाप्ति को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स में रिपोर्ट छपती है कि कश्मीर में हजारों मुस्लिम हिरासत में हैं। ये वही न्यूयॉर्क टाइम्स है, जो भारत के मिशन मंगलयान का पहले मजाक उड़ाता है और फिर मिशन सफल होने पर माफी मांग चुका है। सोचिए ऐसा क्यों था कि 14 फरवरी 2019 को पुलवामा हमले को न्यूयॉर्क टाइम्स ने आतंकवादी हमले की बजाए सिर्फ विस्फोट बताया था? न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया कि पुलवामा में आतंकवादी हमला नहीं, ब्लास्ट हुआ।