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तू किसका बिस्तर गर्म करती है… रं* सेक्स कर मजा ले : भीम आर्मी के चंद्रशेखर उर्फ रावण की गंदी जुबान

चन्द्रशेखर रावण भीम आर्मी
काजल हिन्दुस्तानी (बाएँ) और भीम आर्मी प्रमुख रावण (दाएँ)
जनता भी किन भ्रष्ट और घिनौनी सोंच वालों को अपना नेता मान बैठती है, जिनके दिल में महिलाओं के लेशमात्र भी सम्मान नहीं। आखिर कौन हैं वो लोग जो ऐसे महिला विरोधियों को नेता बना देश में दलितों के नाम पर अराजकता फ़ैलाने का प्रयास कर रहे हैं। 
भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर उर्फ रावण के कुछ पुराने ट्वीट सामने आए हैं। इनमें से हरेक में एक बात कॉमन है। वह महिलाओं को भद्दी गालियॉं दे रहा है। रावण की गंदी जुबान की शिकार हुईं ये सभी महिलाएँ पत्रकार और वीडियो ब्लॉगर हैं।
खुद को दलितों का स्वयंभू मसीहा बताने वाला रावण केवल उन्हीं मामलों पर अपनी जुबान खोलता है जब आरोपित सर्वण होते हैं। जब दलितों की बस्ती पर हमला करने वाले समुदाय विशेष के होते हैं तो वह जय भीम-जय मीम की खोल में छिप जाता है।
ऐसे रावण की महिलाओं के प्रति भाषा को दर्शाते कुछ ट्वीट के स्क्रीनशॉट एक यूजर ने शेयर किए हैं और लिखा है, “भीम आर्मी प्रमुख और उनकी शुद्ध भाषा।”
भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर रावण द्वारा किए गए ये सभी ट्वीट वर्ष 2018 के हैं। वीडियो ब्लॉगर काजल हिंदुस्तानी के खिलाफ भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर रावण ने बेहद ही आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए लिखा है – “तू सेक्स कर के मजा ले, चु*यापन मत कर रं*।”
काजल ने चंद्रशेखर के इन ट्वीट को आज शेयर करते हुए लिखा है, “तथाकथित दलित ठेकेदार भीम आर्मी चीफ की असलियत, खुद को महिलाओं का हितैषी बताने वाला ये दलितों का ठेकेदार बना फिर रहा है, आज इसके घटियापन का सबूत दे रही हूँ। अगर आपको अपनी बहन-बेटियों की इज़्ज़त की थोड़ी सी भी परवाह है तो इन ‘जय भीम जय मीम’ के दलालों को फ़ॉलो करना बंद कर दीजिए।”
View image on TwitterView image on Twitterकाजल द्वारा भीम आर्मी प्रमुख के ट्वीट शेयर करने के बाद चंद्रशेखर ने अपने ये ट्वीट डिलीट तो कर दिए लेकिन उनके ये स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया में खूब घूम रहे हैं। चन्द्रशेखर द्वारा इन ट्वीट में इस्तेमाल की गई भाषा बेहद असभ्य और निम्नस्तरीय हैं, जिन्हें कि आप इन स्क्रीनशॉट्स में देख सकते हैं –
संजीव नेवार ने भी काजल के ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा है, “यह भीम आर्मी चीफ की असलियत है। यदि यह दूर की महिलाओं के लिए उनकी मानसिकता हो, तो अपने आसपास के लोगों की स्थिति की कल्पना करें। यदि ऐसे लोग किसी समूह या व्यक्ति द्वारा समर्थित हैं, तो यह स्पष्ट है कि ये लोग कौन हैं।”

रावण की हरकत के बाद काजल सिंगला ने यूपी पुलिस और यूपी के पुलिस महानिदेशक ( DGP) को टैग करते हुए लिखा, “आप सभी से निवेदन है की ऐसे असामाजिक तत्वों के ख़िलाफ़ अविलम्ब कारवाई करे।”

इन ट्वीट के चर्चा में आने के बाद फिलहाल सराहनपुर पुलिस ने साइबर सेल को चंद्रशेखर के खिलाफ कार्रवाई करने के आदेश दे दिए हैं।

ब्लड डिसऑर्डर से पीड़ित चंद्रशेखर आजाद ने क्यों किया रक्तदान?

चंद्रशेखर आजाद रावण रक्तदान
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज देश में दगाबाज़ नेताओं की कोई कमी नहीं। जनसेवा का स्वांग रचने वाले दलित नेता चंद्रशेखर को इतना भी मालूम कि उसका दान किया खून किसी के जीवन को जोखिम में भी डाल सकता है। क्या ऐसे ढोंगी नेता जनहितैषी हो सकते हैं?
हाल ही में एक्टिविस्ट प्रेरणा थिरुवाईपट्टी ने स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स दिल्ली को पत्र लिख कर ‘भीम आर्मी’ के मुखिया चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ ‘रावण’ द्वारा हाल ही में किए गए रक्तदान की जाँच कराने को कहा था। प्रेरणा ‘ऑल इंडिया दलित यूथ एसोसिएशन’ की सदस्य हैं। उन्होंने दावा किया था कि आजाद ख़ून की एक ऐसी बीमारी से पीड़ित हैं, जिससे उन्हें रक्तदान नहीं करना चाहिए था। अब एम्स ने प्रेरणा को लिखित में बताया है कि चंद्रशेखर आजाद ने रक्तदान के समय बीमारी होने की कोई बात नहीं बताई थी।
यहाँ तक कि चंद्रशेखर आजाद के डॉक्टर हरजीत भट्टी ने भी इस बारे में एम्स प्रशासन को कुछ नहीं बताया। एम्स दिल्ली ने बताया है कि चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ रावण और डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी जैसे लोगों ने रक्तदान अभियान में स्वेच्छा से आकर ब्लड डोनेट किया। आजाद ने जानकारी दी कि उन्होंने पिछली बार 6 महीने पहले रक्तदान किया था और वो ऐसी किसी भी बीमारी से पीड़ित नहीं है, जिससे उनका ख़ून लेने वाले को कोई नुकसान पहुँचे।
एम्स ने इस पत्र में बताया है कि जब सोशल मीडिया पर इसे लेकर हंगामा हुआ कि चंद्रशेखर आजाद पॉलिसाइथीमिया से पीड़ित है। उनका ओपीडी कार्ड भी सोशल मीडिया पर हाइलाइट किया गया। इसके बाद एम्स ने उनके ख़ून को डिस्कार्ड कर दिया, अर्थात किसी अन्य व्यक्ति को वो ख़ून नहीं चढ़ाया जाएगा। अब लोग जवाब माँग रहे हैं कि चंद्रशेखर आजाद ने 6 महीने पहले कहाँ और किसे ब्लड डोनेट किया था?
प्रेरणा ने पिछले महीने ही एम्स और स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिख कर इस बीमारी के बारे में आगाह किया था। उन्होंने सोशल मीडिया में चंद्रशेखर का रक्तदान करते हुए फोटोज देख कर ये पत्र लिखा था। प्रेरणा द्वारा जाँच की माँग के बाद डॉक्टर प्रशांत शर्मा ने इस ओर ध्यान दिलाया था कि ऐसी बीमारी से पीड़ित लोगों को रक्तदान नहीं करना चाहिए। उन्होंने ट्विटर पर बताया कि ऐसा कर के आजाद ने दूसरे की ज़िंदगी दाँव पर लगा दी है।

उन्होने आजाद के ब्लड डिसऑर्डर की बात करते हुए कहा था कि उनका रक्तदान पब्लिसिटी स्टंट से ज्यादा कुछ भी नहीं था। उन्होंने आजाद का डॉक्टर होने के नाते डॉक्टर भट्टी को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। जबकि अदालत में जमानत के लिए डॉक्टर भट्टी ने ही इस बीमारी के बारे में बताया था। न तो रक्तदान के समय डिक्लेरेशन में ये डाला गया और न ही भट्टी ने आजाद को रक्तदान करने से रोका।
डॉक्टर भट्टी वही डॉक्टर हैं, जिन्हें न्यूज़लॉन्ड्री और बरखा दत्त जैसों ने लोगों को गुमराह करने के लिए एम्स का प्रतिनिधि बना कर पेश कर दिया था। वो एम्स में कार्यरत नहीं हैं लेकिन एम्स के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के हेड रहे हैं। जेएनयू हिंसा के समय उन्होंने बयान दिया था कि एबीवीपी के छात्रों के घाव दिखावटी हैं जबकि वामपंथी छात्रों को सही में चोट लगी है और वो घायल हुए हैं।
डॉ हरजीत सिंह भट्टी कॉन्ग्रेस पार्टी के अखिल भारतीय चिकित्सा सेल के राष्ट्रीय संयोजक हैं। पिछले साल फरवरी में उन्हें कॉन्ग्रेस पार्टी में इस पद पर नियुक्त किया गया था। भट्टी सिर्फ कॉन्ग्रेस पार्टी ही नहीं बल्कि भीम आर्मी के भी काफी नजदीकी हैं। वह न केवल आजाद के डॉक्टर हैं, बल्कि वो उनके समर्थक भी हैं, क्योंकि उन्हें हैशटैग #AzaadiForAzad के साथ ट्वीट पोस्ट करते हुए देखा गया है।

दिल्ली हिंसाः भीम आर्मी समर्थकों की ओर से हुआ था पहली बार पथराव

दिल्ली हिंसा (फाइल फोटो)
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भीम आर्मी ने सीएए के विरोध में 23 फरवरी को भारत बंद का आह्वान किया था। बंद के दौरान समर्थक जगह-जगह झंडे व भड़काऊ भाषण देते घूम रहे थे। हिंसा की शुरुआत भीम आर्मी के समर्थकों की ओर से हुई थी। पहली बार पथराव उन्हीं की ओर से किया गया था।
ये खुलासा दिल्ली पुलिस और स्पेशल ब्रांच की जांच में हुआ है। इसके अलावा भीम आर्मी के समर्थकों ने मालवीय नगर में हौजरानी में हंगामा करने का प्रयास किया था। पुलिस ने समय रहते हुए माहौल को संभाल लिया था। 
Violence in delhiदिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने एक बजे ट्वीट कर समर्थकों को दोपहर करीब तीन बजे मौजपुर चौक पहुंचने को कहा था। यहां पर कपिल मिश्रा भाषण दे रहे थे। उस समय भीम आर्मी के 15 से 20 समर्थक वहां से गुजरने लगे। 
ये चांद बाग से जोरबाग जा रहे थे। ये समर्थक नारे लगा रहे थे और कपिल मिश्रा के समर्थकों को देखकर हूटिंग करने लगे थे। इस पर दोनों पक्षों में हाथापाई हो गई थी।
मारपीट के बाद भीम आर्मी समर्थक वहां से चले गए। कुछ देर बाद वह फिर वापस आए और मिश्रा समर्थकों पर पथराव शुरू कर दिया। इसके बाद दोनों पक्षों में पथराव हुआ और दिल्ली में हिंसा बढ़ती चली गई।
Violence in delhi
स्पेशल ब्रांच के अधिकारी ने बताया कि 23 फरवरी को भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण बंगलूरू में था। पुलिस भीम आर्मी व उसके प्रमुख की भूमिका की जांच कर रही है।
आखिर, भीम आर्मी ने जिस दिन दिल्ली में बंद का आह्वान किया था उस दिन ही हिंसा क्यों हुई? इस बात को लेकर दिल्ली पुलिस की कई यूनिटें जांच कर रही हैं कि हिंसा फैलाने में भीम आर्मी की क्या और कहां तक भूमिका है। 
दक्षिण जिले के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि हौजरानी के गांधी पार्क में कई दिनों से शांतिपूर्वक धरना चल रहा था। भीम आर्मी के बंद वाले दिन प्रदर्शनकारियों ने हौजरानी में जुलूस निकाला और मैक्स अस्पताल के सामने सड़क बंद करने की कोशिश की थी। पुलिस को हल्का बल प्रयोग कर प्रदर्शनकारियों को वहां से खदेड़ना पड़ा था।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली पुलिस ने गुरुवार (फरवरी 27, 2020) को हिन्दू विरोधी दंगों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्.....

बहुजन राजनीती में उफान; उभरते नेताओं की भरती तिजोरियाँ

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जिस वामपंथ को जिग्नेश अपने साथ रखे हुए, क्या कभी इनसे पूछा
कि
"आपकी पार्टी में दलित या अनुसूचित जाति के कितने
लोग पदाधिकारी हैं?"
बहुजन राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां अनेक प्रश्न उठने लगे हैं। एक तरफ उपेक्षित, अनुसूचित एवं अति पिछड़े समुदायों में असमान विकास दिख रहा है। दूसरी ओर उनमें एक शिक्षित, प्रभावी एवं शक्तिशाली समुदाय उभर रहा है। वहीं उनका बहुलांश अभी भी उपेक्षा का शिकार है। ऐसे में बहुजन राजनीति को अपनी भाषा से ऐसे बहुस्तरीय बहुजन मानसिकता को संबोधित करना होगा। ऐसा नहीं होने से बहुजन राजनीति में तरह-तरह के मुद्दे, भाषा एवं विमर्श से परिपूर्ण अनेक प्रकार के नेतृत्व के उभार भी संभावना है।
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जब किसी अनुसूचित को जाति के नाम से पुकारना अपराध है,
फिर " किस आधार पर चंद्रशेखर रावण जाति का प्रचार करते हैं,
क्या यही संविधान में लिखा है? यह देश में दोगली नीति क्यों?"
कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में उत्तर भारत में 'दलित-बहुजन राजनीति ने प्रभावी सफलता हासिल की, किंतु इसी प्रक्रिया में अनुसूचित जातियों में भी बहुस्तरीय एवं असमान विकास हुआ है। ऐसे में पिछले दशक से ही मायावती के समक्ष यह संकट आ खड़ा हुआ था कि कैसे इस बहुस्तरीय एवं बहुभेदी अनुसूचित जाति को एक भाषा एवं एक प्रकार के विमर्श से जोड़कर रखा जाए। कांशीराम के समक्ष अनेक जातियों एवं अस्मिताओं में बंटे अनुसूचित एवं बहुजन समाज को इकट्ठा करने की चुनौती थी, जिसके लिए उन्होंने अनेक बहुजन जातीय अस्मिताओं को सम्मान व स्थान देते हुए एक राजनीतिक भाषा विकसित की, जो उत्तर भारत और खासकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में सफल भी हुई। फिर भी अनुसूचित समूहों में नव-आकांक्षी संस्तर विशेषकर युवा वर्ग जो स्मार्टफोन और मोटरबाइक से लेकर शिक्षा और नौकरी की शक्ति से लबरेज हो रहा था, वह जनमत निर्माता एवं नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में उभरने लगा। इनमें से अधिकांश तो मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन राजनीति से जुड़े रहे, मगर तमाम लोगों में इस राजनीति के प्रति नाराजगी भी बढ़ी।
बहरहाल, यह नाराजगी अपनों की नाराजगी है। लिहाजा हमें यह समझना होगा। नाराज होकर भी अंतत: उनके बहुलांश का समर्थन चुनावों में बसपा के नेतृत्व वाली बहुजन राजनीति के ही पक्ष में जाने की संभावना बहुजन समाज के लोगों से होने वाली बातचीत में साफ झलकती है। हालांकि अन्य सामाजिक समूहों की ही तरह अनुसूचित सामाजिक समूहों के राजनीतिक मत में भी अनेक धुरी, ध्रुव एवं राजनीतिक पक्षधरता बनने एवं विकसित होने की संभावना सदैव रहती है।
मायावती जिन्हे वोट हर वर्ग के चाहिए, "लेकिन सवर्ण जाति के लिए क्या बोलती हैं?" शायद जनता भूली नहीं होगी।
शर्म आती है उन सवर्णों पर जो कुर्सी और तिजोरी की खातिर बहुजन पार्टी में जाकर मायावती की जी-हज़ूरी
करते हैं?
पिछले दिनों बहुजन राजनीति में अनेक दमनकारी घटनाओं का विरोध करने के क्रम में जिग्नेश मेवाणी और चंद्रशेखर जैसे युवा नेता की तरह उभरे। मूल रूप से सिविल सोसाइटी, एनजीओ आंदोलन से निकलकर आए इन नेताओं के पास अपने समाज के प्रभावी आधिपत्यशाली समूह, जो स्थानीय समाज में दलितों के साथ व्यवहार को लेकर सवालों में रहते हैं, के विरुद्ध एक आक्रामक भाषा है। कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में उभरे बहुजन आंदोलन के शुरुआती दौर में भी बसपा के पास समाज के आधिपत्यशाली समूहों के विरुद्ध विद्रोह की भाषा थी, जिसके आधार पर बहुजन समाज की उनके पक्ष में गोलबंदी की शुरुआत हुई थी। इसमें ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया जैसे सामाजिक समूहों को अपने से अलग मनुवादी सामाजिक समूह माना गया था। मगर जैसे-जैसे बहुजन राजनीति का विस्तार होता गया तो बसपा को ऐसी भाषा की जरूरत हुई जिसमें अनेक संस्तरों में बंटा बहुजन समाज जगह पा सके। फिर और ज्यादा फैलाव होने के बाद उन्हें सवर्णों और अन्य प्रभावी जातियों को भी स्वयं से जोड़ने की जरूरत महसूस हुई। फिर बहुजन से सर्वजन की यात्रा शुरू हुई। ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया छोड़ की जगह ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा जैसे नारों ने ले ली।
लेकिन बसपा की इस बहुजन से सर्वजन की यात्रा के क्रम में अनुसूचित समूहों का एक बड़ा वर्ग जो आज भी राजनीति में अदृश्य सामाजिक समूह की तरह जीवित है, छूटने लगा। दूसरी ओर बहुजन समाज के प्रभावी समूहों को लगने लगा कि राजनीति एवं राज्य केंद्रित परियोजनाओं का हमारा हिस्सा बसपा एवं बहनजी सवर्णों व मुस्लिमों को दे रही हैं। कई बार सियासी आंदोलन की केंद्रीयता बढ़ने से बहुजन आंदोलन में अनुसूचित जातियों के सामाजिक मुद्दे, उत्पीड़न के सवाल बसपा के एजेंडे में गौण होते गए।
बहुजन आंदोलन के सामाजिक प्रोजेक्ट के इसी निर्वात में से उप्र भीम आर्मी एवं चंद्रशेखर जैसे स्वर का उभार हुआ। ज्ञातव्य है कि बसपा सामाजिक आंदोलनों से ही उभरकर आई और कांशीराम के नेतृत्व में अपनी शुरुआती अवस्था में सामाजिक आंदोलन एवं सियासी सत्ता प्राप्ति की लड़ाई दोनों को साथ लेकर चल रही थी। यहां प्रश्न है कि जिग्नेश मेवाणी एवं चंद्रशेखर जैसे युवा नेतृत्व के उभार का बसपा की राजनीति एवं बहुजन आंदोलन पर क्या असर पड़ेगा? एक तो मायावती को इन स्वरों को अपने में समाहित करना होगा। एक ऐसी भाषा विकसित करनी होगी, जिसमें बहुजन आंदोलन का सामाजिक अर्थ मुखर होकर सामने आए। चंद्रशेखर ने जेल से छूटने के बाद मायावती से खून का रिश्ता घोषित किया है, जिसे मायावती ने नकार दिया। मायावती शायद यह जानती हैं कि उनके करीब आकर चंद्रशेखर उनकी प्रतीकात्मक शक्ति को धीरे-धीरे सोख सकते हैं। उनसे दूरी बनाकर उनके असर को निष्प्रभावी करना मायावती की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
चंद्रशेखर ने अपने नाम के साथ लगा 'रावण उपनाम हटा दिया। ऐसा उन्होंने इसलिए भी किया, क्योंकि उन्हें भान हुआ कि उपेक्षित समूहों में तमाम लोग रामायण के रावण की प्रतीक छवि को आत्मसात नही करेगें। कबीर पंथ, रविदास पंथ, शिवनारायणी पंथ में विश्वास करने वाली अधिकांश बहुजन जनता राममय तो नहीं है, पर उन्हें रावण भी स्वीकार्य नहीं। यह चंद्रशेखर की बहुजन समाज के एक बड़े हिस्से को लामबंद करने की आगामी रणनीति का हिस्सा है। मायावती को लगता है कि चंद्रशेखर एक ओर मुझसे करीबी रिश्ता घोषित कर रहा है, हमारा समर्थन कर रहा है, दूसरी तरफ भीम आर्मी को मजबूत करने की बात कर रहा है। साथ ही अनुसूचित समूहों में अपने अभियान को गति भी देना चाहता है। शायद यही पहलू मायावती के मन में स्वयं के प्रति चंद्रशेखर की सियासी ईमानदारी को लेकर संदेह पैदा कर रहा है।
चंद्रशेखर ने आगामी चुनावों में भाजपा को हराने एवं गठबंधन को समर्थन देने की घोषणा की है। देखना है कि यह किस रूप में मूर्तरूप लेता है। क्या वह भीम आर्मी को मजबूत करते हुए भी गैर भाजपाई दल से जुड़ेंगे? क्या वह इमरान मसूद से व्यक्तिगत संबंधों के कारण जिग्नेश की तरह कांग्रेस से जुड़ पाएंगे? या मायावती उन्हें बसपा की राजनीति में जगह देंगी? या वह आगामी चुनाव में बिना किसी सियासी दल का हिस्सा हुए अपनी राजनीतिक पक्षधरता तय करेगें? इनके उत्तर झलक तो रहे हैं, पर अभी स्पष्ट नही हुए हैं।