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कांग्रेस शासन में हिंदुओं के खिलाफ लाए 7 काले कानून!

                                                                                                                     साभार: सोशल मीडिया  
आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता को केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि वैचारिक वर्चस्व स्थापित करने का औजार भी बना लिया। देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को उसकी अपनी आस्था, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के प्रति अपराधबोध से भरने की एक सुनियोजित राजनीति दशकों तक चलती रही। सेक्युलरिज्म के नाम पर ऐसा वातावरण और कानून बनाए गए, जिनमें हिन्दू यदि अपने अधिकारों, मंदिरों या सांस्कृतिक अस्मिता की बात करे तो उसे संकीर्ण और साम्प्रदायिक ठहराया जाए, जबकि तुष्टिकरण की राजनीति को प्रगतिशीलता का प्रमाणपत्र दिया जाता रहा। हिन्दू कोड बिल से लेकर वक्फ कानून, शाहबानो प्रकरण से लेकर वोट बैंक आधारित नीतियों तक, कांग्रेस ने बार-बार ऐसा संदेश देने की कोशिश की कि इस देश में बहुसंख्यक होना ही मानो अपराध है। यही कारण है कि दशकों तक हिन्दू समाज को ‘सहन करो, झुको और चुप रहो’ की मानसिकता में ढालने का प्रयास किया गया।

मोदी सरकार ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जरिए एक नई पहचान दी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी ने 80 और 90 के दशक में इस वैचारिक खेल की परतें खोलनी शुरू कीं। हिन्दू समाज को यह एहसास कराया गया कि सहिष्णुता और आत्मसमर्पण एक ही नहीं होते। सनातन परंपरा क्षमा सिखाती है, लेकिन आत्महीनता नहीं। कांग्रेस ने जहां जाति, क्षेत्र और तुष्टिकरण के जरिए हिंदुओं को खांचों में बांटने की राजनीति की, वहीं मोदी सरकार ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के माध्यम से उन्हें एक साझा पहचान देने की पुरजोर कोशिशें की हैं। आज एक ओर ओबीसी, जातीय जनगणना और विभाजनकारी विमर्श के जरिए हिन्दू समाज को बांटने की कांग्रेस और विपक्ष की राजनीति है, तो दूसरी ओर सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय एकता, सबका विकास और सभ्यतागत गौरव को पुनर्स्थापित करने का सफल प्रयास है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE)

लागू हुआ : 1 अप्रैल 2010
आरटीई में मदरसों और मुस्लिम शिक्षण संस्थानों को छूट
इस कानून के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया। निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान भी जोड़ा गया। लेकिन कांग्रेस सरकार की पक्षपातपूर्ण मंशा की पोल तब खुल गई, जब पता चला कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों, मदरसों को कई प्रावधानों से छूट दी गई, जबकि 
हिन्दू प्रबंधित निजी स्कूलों पर अधिक नियामकीय बोझ डाला गया। इस कानून को लेकर आज भी “समान नियम बनाम विशेष छूट” की बहस जारी है।
                                                                                     साभार : सोशल मीडिया 
फॉरेन कॉन्ट्रीबूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए)
लागू हुआ :2010
गैर हिंदू धार्मिक एवं गैर-सरकारी संगठनों को अप्रत्यक्ष लाभ
एफसीआरए का उद्देश्य विदेशी चंदे के नियमन को मजबूत करना था। लेकिन वास्तविकात में इस कानून का इस्तेमाल चयनात्मक तरीके से किया गया और कुछ गैर 
हिन्दू धार्मिक एवं गैर-सरकारी संगठनों को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। दरअसल, यह कानून विदेशी फंडिंग की निगरानी और गैरकानूनी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए होना चाहिए था। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। बाद में मोदी सरकार ने इसमें कई संशोधन कर नियमों को और कड़ा किया और इसे सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता से जोड़ा।
वक्फ अधिनियम संशोधन
लागू हुआ : 1995
वक्फ बोर्डों को आंख मूंदकर अत्यधिक अधिकार दिए गए
कांग्रेस सरकार ने वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए नया वक्फ कानून लागू किया। इससे वक्फ संपत्तियों पर कब्जे को भी बढ़ावा मिला। आलोचकों ने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्डों को अत्यधिक अधिकार दिए गए, जिससे संपत्ति विवादों में सामान्य नागरिकों के लिए कानूनी जटिलताएं बढ़ीं। बाद के वर्षों में कई राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने मांग उठाई कि वक्फ कानूनों में अधिक पारदर्शिता और न्यायिक संतुलन होना चाहिए।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम
लागू हुआ : 1992
मुसलमानों के धार्मिक और भाषाई अधिकारों की रक्षा करना
आजादी के बाद वक्फ की संपत्ति और उसके रखरखाव के लिए वक्फ एक्ट-1954 बनाया गया था। कोई भी ऐसी चल या अचल संपत्ति वक्फ की हो सकती है, जिसे इस्लाम को मानने वाला कोई भी व्यक्ति धार्मिक कार्यों के लिए दान कर दे। 1995 में वक्फ कानून में संशोधन करते हुए वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियां दे दी गईं। आज इसी शक्ति की वजह वक्फ और मुसलमान समुदाय देशभर में लैंड जिहाद चला रहा है। कानून कहता है कि यदि वक्फ बोर्ड किसी संपत्ति पर अपना दावा कर दे, तो उसे उसकी संपत्ति माना जाएगा। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कई उदाहरणों में से यह एक बड़ा कानून था। कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को वैधानिक दर्जा देने के लिए यह कानून बनाया। इसका उद्देश्य केवल मुसलमानों के धार्मिक और भाषाई अधिकारों की रक्षा करना था। स्वाभाविक रूप से आलोचकों का कहना था कि संविधान पहले से सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, इसलिए अलग आयोग बनाना पहचान-आधारित राजनीति को बढ़ावा देता है। विरोधियों ने यह भी कहा कि बहुसंख्यक समुदाय की शिकायतों के लिए समान स्तर की संस्थागत व्यवस्था नहीं बनाई गई।

पूजा स्थल अधिनियम
लागू हुआ : 1991
हिंदू धार्मिक स्थलों पर ऐतिहासिक दावों के कानूनी रास्ते सीमित किए

राम मंदिर आंदोलन की तरह अन्य आंदोलन न हों, इसी मंशा से पूजा स्थल कानून लाया गया था। पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार द्वारा लाए गए इस कानून में यह प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बदला नहीं जाएगा। अयोध्या विवाद को इससे बाहर रखा गया था। दरअसल, हकीकत यह थी कि इससे अयोध्या को तो भारी दबाव के चलते अलग रख दिया गया। लेकिन इस कानून की आड़ में काशी और मथुरा जैसे अन्य हज़ारों विवादित हिन्दू धार्मिक स्थलों पर ऐतिहासिक दावों के कानूनी रास्ते सीमित कर दिए गए। दरअसल इस कानून के माध्यम से हिंदू पक्ष की मांगों को स्थायी रूप से रोकने का कुत्सित प्रयास किया गया।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट धारा- 2
यह धारा कहती है कि 15 अगस्त 1947 में मौजूद किसी धार्मिक स्थल में बदलाव के विषय में यदि कोई याचिका कोर्ट में पेंडिंग है तो उसे बंद कर दिया जाएगा।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 3
इस धारा के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से किसी दूसरे धर्म में बदलने की अनुमति नहीं है। इसके साथ ही यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि एक धर्म के पूजा स्थल को दूसरे धर्म के रूप में ना बदला जाए या फिर एक ही धर्म के अलग खंड में भी ना बदला जाए।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 4 (1)
इस कानून की धारा 4(1) कहती है कि 15 अगस्त 1947 को एक पूजा स्थल का चरित्र जैसा था उसे वैसा ही बरकरार रखा जाएगा।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 4 (2)
धारा- 4 (2) के अनुसार यह उन मुकदमों और कानूनी कार्यवाहियों को रोकने की बात करता है जो प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट के लागू होने की तारीख पर पेंडिंग थे।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 5
धारा- 5 में प्रावधान है कि यह एक्ट रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले और इससे संबंधित किसी भी मुकदमे, अपील या कार्यवाही पर लागू नहीं करेगा।

आर्टिकल 25- धर्म परिवर्तन को मान्यता
वर्ष 1950 में संविधान में आर्टिकल 25 शामिल किया गया। इसमें धर्म परिवर्तन को मान्यता दी गई। इससे सबसे ज्यादा नुकसान हिंदुओं को हुआ क्योंकि हिन्दू धर्म के लोगों का ही सबसे अधिक धर्म परिवर्तन कराया गया। भारत के संविधान में धर्मांतरण को लेकर कोई स्पष्ट अनुच्छेद नहीं है। अनुच्छेद 25 से लेकर 28 के बीच धार्मिक स्वतंत्रता का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि अपनी स्वेच्छा से भारत के हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार-प्रसार करने की आजादी है।

आर्टिकल 28 – हिंदुओं से धार्मिक शिक्षा का हक छीना
जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेजों की ही तरह आजादी के बाद भी दबाना जारी रखा। आर्टिकल 28 के जरिये हिंदुओं की धार्मिक शिक्षा का अधिकार ही छीन लिया गया। एक तरफ हिंदूओं से धार्मिक शिक्षा का अधिकार छीना गया वहीं दूसरी तरफ आर्टिकल 30 के तहत मुसलमान और अल्पसंख्यक धार्मिक शिक्षा ले सकते हैं।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम
लागू हुआ : 1986
चुनाव हारने के डर से कानूनी व्यवस्था में गहरा विरोधाभास पैदा किया
यह कानून भारतीय राजनीति और कानूनी इतिहास में एक अत्यंत संवेदनशील और विवादास्पद मोड़ था, जिसने धर्मनिरपेक्षता और समानता की बहस को पूरी तरह बदल दिया। 1985 के शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि एक बुजुर्ग तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से जीवनभर भरण-पोषण पाने की हकदार है, जो कि देश का एक धर्मनिरपेक्ष और सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होने वाला कानून था। हालांकि, इस फैसले का कट्टरपंथी मुस्लिम मौलवियों और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कड़ा विरोध किया और इसे शरिया कानून व मुस्लिम पर्सनल लॉ में सीधा हस्तक्षेप माना। चुनाव हारने के डर और मुस्लिम रूढ़िवादी नेतृत्व के भारी दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में पूर्ण बहुमत का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले को उलटने के लिए यह विशेष कानून पारित कर दिया। यह कानून मुस्लिमों (विशेषकर मुस्लिम पुरुषों और रूढ़िवादी वर्ग) के फेवर (पक्ष) में इस प्रकार था क्योंकि इसने शरीयत के इस सिद्धांत को कानूनी मान्यता दे दी कि एक मुस्लिम पति की जिम्मेदारी तलाक के बाद केवल 90 दिनों की ‘इद्दत अवधि’ तक ही सीमित है, और उसके बाद वह अपनी बेसहारा पत्नी को वित्तीय सहायता देने के कानूनी दायित्व से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। इसने मुस्लिम समाज के पारंपरिक ढांचे और उनके व्यक्तिगत कानूनों की स्वायत्तता को धर्मनिरपेक्ष अदालतों के हस्तक्षेप से बचा लिया, जिसे मुस्लिम नेतृत्व ने अपनी धार्मिक स्वतंत्रता की जीत के रूप में देखा। इसके विपरीत, यह कदम हिंदुओं और अन्य समुदायों के लिए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण इसलिए प्रतीत हुआ क्योंकि इसने देश की कानूनी व्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास पैदा कर दिया। जहां एक तरफ हिंदू, ईसाई या सिख पुरुषों पर देश का धर्मनिरपेक्ष कानून (CrPC 125) लागू होता था, जिसके तहत यदि वे अपनी पत्नी को तलाक देते हैं तो उन्हें पत्नी के पुनर्विवाह न करने तक जीवनभर आर्थिक भरण-पोषण (Alimony) देना अनिवार्य है, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम पुरुषों को इस नए कानून के माध्यम से उस सामान्य नागरिक दायित्व से विशेष छूट दे दी गई। आलोचकों, हिंदू संगठनों और कई कानूनी विचारकों ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति का चरम उदाहरण माना, जहां एक ही अपराध या नागरिक परिस्थिति (तलाक के बाद महिला की लाचारी) के लिए दो अलग-अलग धर्मों के नागरिकों के साथ कानूनन अलग व्यवहार किया गया।

हिंदू कोड बिल
लागू हुआ : 1955
केवल हिंदुओं पर कानून लागू, मुस्लिमों को बख्श दिया
स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार ने हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक सुधार के नाम पर हिंदू कोड बिल 1955-56 लागू किया। यह कानून विवाह, उत्तराधिकार, गोद लेने और संपत्ति अधिकारों के बारे में थे। इसके तहत हिंदू मैरिज एक्ट 1955, हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956, हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956, हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट 1956 को शामिल किया गया। इन कानूनों में यह पूरी तरह साफ था कि सरकार ने केवल हिंदू समाज में हस्तक्षेप किया, जबकि समान नागरिक संहिता की दिशा में अन्य धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को नहीं छुआ गया। इसी कारण कई राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर “असमान सुधार” कहा।

हिंदू कोड बिल पर राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था नेहरू का विरोध
आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने पहली लोकसभा में 1955-56 में हिंदू कोड बिल्स पास किए। इस बिल को लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच राजनीतिक मतभेद उत्पन्न हो गया था। अक्टूबर 1947 में संविधान सभा में अंबेडकर ने इसका मसौदा पेश किया। नेहरू ने उसका समर्थन किया। इसके तहत सभी हिंदुओं के लिए एक नियम संहिता बनाई जानी थी। तब गृह मंत्री सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जो हिंदू महासभा से संबंधित थे, कांग्रेसी नेता पंडित मदन मोहन मालवीय ने हिंदू कोड बिल का पुरज़ोर तरीके से विरोध किया था। कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया ने बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया कि आनेवाले चुनावों में इस बिल का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया था कि यह बिल हिंदू संस्कृति को टुकड़ों में बांट देगा। ऑल इंडिया हिंदू वीमेन कांफ्रेंस की अध्यक्ष जानकी बाई जोशी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखते हुए कहा था कि प्रस्तावित विधेयक संस्कार विवाह को संविदात्मक बनाकर हिंदुओं की परिवार व्यवस्था को ही नष्ट कर रहा है। 

हिंदू दर्शन, कला और संस्कृति को सीखने का केंद्र थे मंदिर
मंदिर हमेशा से ही हिंदू सभ्यता और संस्कृति के केंद्र रहे थे। हमारी सभ्यता इन्हीं मंदिरों की वजह से फलती-फूलती रही। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं थे। बल्कि, हिंदू दर्शन, कला और संस्कृति को सीखने का केंद्र थे। सभी राजाओं ने अपने समय में मंदिरों का निर्माण किया। और, ये मंदिर ही मुगल और अंग्रेजों के समय विरोध का भी केंद्र बने। मुगलों ने मंदिरों को तोड़ने की कोशिशें की, लेकिन उस पर नियंत्रण नहीं कर सके। समय-समय पर ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजों ने भी ऐसा ही करना चाहा। लेकिन, वो नाकाम रहे। 1863 में अंग्रेजों ने एक एक्ट लाकर हिंदू मंदिरों को स्वतंत्र कर दिया। जिसके चलते मंदिर स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकों की जगह बन गए।

हिम्मत है तो सैयदा घुसपैठिया बन बांग्लादेश में रहकर दिखाए ; ‘यहाँ रह सकते हैं बांग्लादेशी’: कांग्रेस सरकार में योजना आयोग की सदस्य रहीं सैयदा हमीद घुसपैठियों के समर्थन में उतरीं, कहा- अल्लाह ने इंसानों के लिए बनाई है धरती

                                                    सैयदा हमीद बनीं घुसपैठियों को नई पैरोकार

भारत में घुसपैठियों के नए-नए पैरोकार सामने आ रहे हैं। खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाली सैयदा हमीद का कहना है कि बांग्लादेशियों को भारत में रहने का पूरा हक है। सैयदा इससे पहले मनमोहन सिंह सरकार के समय योजना आयोग की सदस्य रही थीं। सैयदा का यह बयान उनके असम दौरे के समय आया है। असम सरकार इन दिनों सरकारी जमीनों से अवैध कब्जा हटाने और बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को वापस भेजने की कोशिशों में जुटी हुई है।

सैयदा हमीद पूरे वामपंथी गिरोह के साथ असम दौरे पर पहुँची हैं। इस दौरे पर उनके साथ जाने-माने वामपंथी प्रशांत भूषण, हर्ष मंदर, जवाहर सरकार और अन्य लोग शामिल हैं। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि असम सरकार ने वहाँ के मुसलमानों पर आफत ला दी है और उन्हें बांग्लादेशी कहकर निशाना बनाया जा रहा है।

सैयदा ने कहा, “अगर वे (घुसपैठिए) बांग्लादेशी भी हैं तो इसमें गलत क्या है? बांग्लादेशी भी इंसान हैं। धरती इतनी बड़ी है, बांग्लादेशी यहाँ भी रह सकते हैं।” उन्होंने यह भी दावा किया कि यह कहना कि अवैध घुसपैठिए असली नागरिकों का हक छीन रहे हैं, बहुत ही परेशान करने वाली बात है। सैयदा ने इसे भ्रामक है और इंसानियत के लिए पूरी तरह नुकसानदायक बताया है।

सैयदा हमीद ने आगे कहा, “अल्लाह ने यह धरती इंसानों के लिए बनाई है, हैवानों के लिए नहीं। अगर कोई इंसान जमीन पर खड़ा है और उसे वहाँ से खदेड़ा जाता है, तो यह मुसलमानों के लिए कयामत जैसा है।” उन्होंने यह भी कहा कि सबको मिलकर गंगा-जमुनी तहजीब और भारत की मिली-जुली संस्कृति के लिए खड़ा होना होगा।

सैयदा हमीद ने एक और जहाँ यह माना कि असम सरकार बांग्लादेश से आए अवैध लोगों को वापस भेज रही है। वहीं, प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि भारत के मुसलमानों को बांग्लादेश भेजा जा रहा है। उन्होंने कहा, “यह साफ है कि हिमंता बिस्वा सरमा की अगुवाई वाली असम सरकार हर तरह की गैरकानूनी हरकत कर रही है। खासकर नागरिकों को जबरन बांग्लादेश और देश से बाहर धकेल रही है, उनको जमीन से बेदखल कर रही है और उनके घर गिरा रही है।”

यह टीम असम नागरिक सम्मेलन नामक एक मंच के निमंत्रण पर असम आई थी। इस मंच के सदस्य और राज्यसभा सांसद अजीत कुमार भुइयां का कहना है कि वे बाहर से जानी-मानी हस्तियों को बुलाते हैं ताकि वे ताजा हालात पर अपनी राय दे सकें।

इस टीम के दौरे को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि जमतीय द्वारा उनका इस्तीफा माँगे जाने के बाद दिल्ली से आई एक टीम असम में डेरा डाले हुए है। उन्होंने कहा, “इस टीम में हर्ष मंदर, वजाहत हबीबुल्लाह, फैयाज शाहीन, प्रशांत भूषण और जवाहर सरकार शामिल हैं।”

सरमा ने आगे कहा कि इस टीम एक ही मकसद है कि किसी तरह कानूनी तौर पर की जा रही बेदखली को तथाकथित ‘मानवीय संकट’ बताकर बदनाम किया जाए। उन्होंने कहा, “यह अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ हमारी लड़ाई को कमजोर करने की सोची-समझी कोशिश है। हम सतर्क हैं और मजबूती से खड़े हैं, कोई भी प्रोपेगेंडा या दबाव हमें अपनी जमीन और संस्कृति की रक्षा करने से रोक नहीं पाएगा।”

‘इज्जत से समझौता’ कर कांग्रेस सरकार में महिलाओं को मिलती थी नौकरी: असम CM सरमा का दावा, विरोध पर कहा- जाकर जाँच कमीशन का गला पकड़ो


असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने आरोप लगाया है कि राज्य में कांग्रेस के शासनकाल में महिलाओं को सरकारी नौकरी पाने के लिए ‘इज्जत से समझौता’ करना पड़ता था। उनके इस बयान पर कांग्रेस  बौखला गई है। वहीं मुख्यमंत्री सरमा ने कहा है कि उन्होंने सिर्फ तथ्यों के आधार पर बात कही है।

असम में वर्तमान में पंचायत चुनावों के लिए प्रचार चल रहा है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा इसके लिए चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। उन्होंने इसी दौरान एक रैली में पूर्ववर्ती कांग्रेस  सरकार पर यह आरोप जड़े। उन्होंने एक जाँच आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि कांग्रेस सरकार के दौरान महिलाओं को राज्य में नौकरी के लिए अपने ‘सम्मान से समझौता’ करना पड़ता था।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बताया कि कांग्रेस सरकार में नौकरियों में हुई गड़बड़ी को लेकर बनाए गए जस्टिस बिप्लब शर्मा जाँच आयोग के सामने एक पीड़िता ने अपने बयान में यह सभी बातें बताई थीं। उन्होंने कहा था कि यह गड़बड़ियाँ असम लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 2013-14 में हुई थी।

मुख्यमंत्री सरमा ने यह भी इस दौरान कहा कि जब से राज्य में भाजपा सत्ता में आई है, तब से यह स्थिति बदल गई है और अब नौकरियों में गड़बड़ियाँ बंद हो गई हैं। हिमंता बिस्वा के इस बयान को कांग्रेस ने बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास किया। कांग्रेस ने दावा किया किया कि यह राज्य की महिलाओं का अपमान है।

वहीं मुख्यमंत्री सरमा ने इसका जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि रैली में कही गई सारी बातें उन्होंने जस्टिस बिप्लब शर्मा जाँच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर कही थीं। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस को अधिक समस्या है तो वह जस्टिस शर्मा से जाकर प्रश्न पूछ सकती है। उन्होंने यह जवाब असम कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा के आरोपों के बाद दिया।

 2016 से पहले 15 वर्ष तक लगातार असम में कांग्रेस की सरकार रही थी। इस दौरान कांग्रेस नेता तरुण गोगोई राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे। उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे। उनकी सरकार पर नौकरियों में 2013-14 में गड़बड़ी का आरोप लगा था। भाजपा ने सत्ता में आने के बाद इसको लेकर दो जाँच कमीशन बनाए थे।

रिपोर्ट में पता चला था कि इस दौरान अभ्यर्थियों के नम्बर बढ़ाए गए थे, उत्तर पुस्तिकाओं में छेड़छाड़ हुई थी। इसके अलावा और भी कई गड़बड़ियाँ पाई गईं थी। यह रिपोर्ट फरवरी, 2025 में असम विधानसभा में रखी गई थी। अब इसी में आए एक बयान को लेकर बवाल मचा है।

बीबीसी और सिविल सोसायटी को नहीं दिखते भारत में अंग्रेजों और कांग्रेसियों के राज में हुए सांप्रदायिक दंगे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पिछले 22 सालों से प्रोपेगेंडा किया जा रहा है। पहले देश की दरबारी-वामपंथी मीडिया, एनजीओ और सिविल सोसायटी ने गुजरात दंगों के मामले में अभियान चलाया। उसका कारण है, साबरमती ट्रेन में 26 रामभक्तों को जिन्दा जलाए के आक्रोश में हुए दंगे में उन्होंने किसी बेकसूर को नहीं पकड़ा, यही कारण है कि उनका निरंतर विरोध किया जा रहा है। मनगढ़ंत और झूठे आरोपों के आधार पर उन्हें दोषी करार देने के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन हर बार सत्य की जीत हुई। जब प्रधानमंत्री मोदी एक मजबूत वैश्विक नेता के रूप में उभरने लगे तो उन्हें इससे परेशानी होने लगी। 

प्रधानमंत्री मोदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने के लिए सीधे विदेशियों की शरण में पहुंच गए और बीबीसी की प्रोपेगेंडा डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से उनकी छवि खराब करने की कोशिश में लग गए। इसके लिए उन्होंने वहीं पुराने गुजरात दंगे को आधार बनाया, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बोलने के लिए उनके पास कोई मुद्दा नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 2002 का गुजरात दंगा एकमात्र ऐसा दंगा है, जिसमें जान-माल का काफी नुकसान हुआ? क्या देश में इससे पहले और बाद में कोई दंगा नहीं हुआ ? अब इन सवालों का जवाब भारत में अंग्रेजों और कांग्रेस के शासन के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों से मिल सकता है, जो काफी हैरान करने वाले हैं। 

भारत में अंग्रेजों के शासन के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगे

1893 में बॉम्बे का सांप्रदायिक दंगा :  दंगों में 100 से ज्यादा लोगों की हत्या की गई थी और 800 व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुए थे। 

1921 में मोपला हिन्दू नरसंहार : केरल में लगभग 6 महीनों तक हिन्दुओं का नरसंहार चलता रहा था, जिसमें 10,000 से भी अधिक जानें गईं। राज्य में ‘जिहादी नरसंहार’ की पहली वारदात थी। वामपंथी इतिहासकारों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह बताकर इस पर पर्दा डलाने की कोशिश की।

1924 में कोहाट का दंगा : आधिकारिक तौर पर कुल 115 लोग हताहत हुए थे। इनमें 12 मरे थे, 13 घायब हुए थे और 86 को चोट आई थी। मुस्लिम सुमदाय के लोगों ने हिन्दुओं को काट डाला। हिंदुओं के घरों को लूटा और आग में झोंक दिया।

1946 में नोआखली का सांप्रदायिक दंगा : एक सप्ताह से भी अधिक समय तक चले नोआखली के दंगों में 5000 हिन्दुओं के मारे जाने की बात कही जाती है, लेकिन आँकड़ा इससे कहीं ज्यादा है। इस दंगे में 20 हजार से अधिक घायल हो गए थे। 1 लाख से अधिक बेघर हो गए थे। इसे ग्रेट कलकत्ता किलिंग भी कहा जाता है।

1947 में विभाजन की घोषणा और दंगे : विभाजन की घोषणा होने के बाद हुए दंगे में अनुमानित रूप में 10 लाख लोग मारे गए थे हालांकि एक अनुमान के मुताबिक 20 लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे। जबकि अनुमानित रूप में 75 हजार से 1 लाख महिलाओं का अपहरण, बलात्कार या हत्याएं हुई थीं। 

1947 का विभाजन और विस्थापन : विभाजन से 1.4 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे। 10 किलोमीटर लंबी लाइन में लाखों लोग देशों की सीमा को पार हुए उस पार गए या इस पार आए। महज 60 दिनों में एक स्‍थान पर सालों से रहने वाले को अपना घर बार, जमीन, दुकानें, जायदाद, संपत्‍ति, खेती किसानी छोड़कर हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तान से हिंदुस्‍तान आना पड़ा।

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद हुए इतिहास के सबसे बड़े मानव पलायन और लाखों लोगों के संहार की बेहद कड़वी यादें शायद ही कभी छोड़ेंगी। एक अनुमान के अनुसार इन दंगों में 10 से लेकर 15 लाख के बीच लोग मारे गए थे। इस नरसंहार के पीछ अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति थी। आजादी के बाद कांग्रेस भी अंग्रेजों की नीति पर चलती रही और देश में दंगों का सिलसिला जारी रहा। लेकिन बीबीसी को ये सब दिखाई नहीं देता है। 

कांग्रेस के राज में हुए सांप्रदायिक दंगे

गाँधी हत्या के बाद चितपावन ब्राह्मणों का भयंकर नरसंहार : स्वतंत्र भारत ने सबसे पहला अति भयंकर दंगा 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद हुए  चितपावन ब्राह्मणों का नरसंहार, जिसका आज तक कोई राजनीतिक पार्टी नाम तक नहीं लेती। और दंगों का सब झुनझुना बजाते रहते हैं, फिर इस भयंकर नरसंहार पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं?  

1980 में मुरादाबाद का साम्प्रदायिक दंगा : इस दंगों में 1500 से अधिक लोग मारे गए थे। उस समय उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और वी.पी. सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे।

1983 में असम के नेली का सांप्रदायिक दंगा : इस दंगें में 1819 से अधिक लोग मारे गए थे। उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। बाद में राजीव गांधी की सरकार ने 240 से अधिक अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट वापस ले ली थी।

1984 में देशव्यापी सिख विरोधी दंगा :  सिर्फ दिल्ली में 2733 से ज्यादा लोग मारे गए थे। देशभर में मरने वाले सिखों का आंकड़ा तीन हजार से ऊपर था।

1985 में अहमदाबाद का साम्प्रदायिक दंगा : इस दंगे में 300 से अधिक लोग मारे गए। उस समय एम.एस. सोलंकी मुख्यमंत्री थे और राज्य में कांग्रेस की सरकार थी।

1986 में अहमदाबाद का सांप्रदायिक दंगा : इस दंगे में 59 लोग मारे गए। कांग्रेस सरकार ने किसी भी राजधर्म का पालन नहीं किया।

1989 में भागलपुर का साम्प्रदायिक दंगा : इस दंगे में 1161 लोग मारे गए थे। उस समय बिहार में कांग्रेस की सरकार सत्ता में थी और मुख्यमंत्री एस.एन. सिन्हा थे।

1992 में सूरत का सांप्रदायिक दंगा : इस साम्प्रदायिक दंगे में 175 से अधिक लोग मारे गए। उस समय कांग्रेस की सरकार थी।

1993 में बॉम्बे का साम्प्रदायिक दंगा :  इस दंगे में 872 लोगों की मौत हुई। सुधाकर नायक के नेतृत्व में उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी।

2013 में मुजफ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा : इस दंगे में 62 से ज्यादा लोगों की हत्या हुई थी। इन दंगों के कारण 50,000 परिवार विस्थापित हुए थे। उस समय केंद्र में कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी।