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भारत की 18 वीं लोकसभा के कुल 543 सदस्यों में से 46% आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों को लालची जनता ने पहुंचाकर अहित कर लिया; ये देश की रक्षा करेंगे या अपने अपराधों की?

डॉ राकेश कुमार आर्य

यह बहुत ही चिंता का विषय है कि  हैं। पिछली लोकसभा में ऐसे सांसदों की संख्या 43% थी। जब राजनीति में शुचिता और अपराधियों के राजनीतिकरण की प्रक्रिया पर रह – रहकर चर्चाएं की जा रही हों और प्रत्येक राजनीतिक दल इस बात के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त कर रहा हो कि वह राजनीति में शुचिता का पक्षधर है, तब आपराधिक पृष्ठभूमि के जनप्रतिनिधियों के रहते उनके ये दावे कैसे साकार रूप लेंगे ? राजनीति में अपराधियों का होना या अपराधियों में राजनीति का होना, अब यह दोनों बातें चिंतन मंथन का विषय हो चुकी हैं । यदि राजनीतिक दलों के लोगों की गहराई से पड़ताल की जाए तो पता चलता है कि कई लोगों में राजनीति पहले होती है। अपराध बाद में होता है। वे अपराध को इसलिए स्वीकार करते हैं कि इससे मतदाताओं में डर पैदा कर वे जनप्रतिनिधि बनने में सफल हो जाएंगे। कई बार इसलिए भी वह राजनीति में रहकर अपराध को अपनाते हैं कि ऐसा करने से नौकरशाही उनके दबाव में आकर काम करेगी। जिससे वह लोगों की समस्याओं का समाधान करने में सफल होंगे । जिसका लाभ उन्हें चुनाव में मिलेगा। इस प्रकार की प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक दल के कार्यकर्ताओं में देखने को मिलती है। जो लोग अपराध के संसार से अपने आप को दूर रखते हैं, छल कपट या इसी प्रकार के घटिया हथकंडों को अपनाने से अपने आप को बचाते हैं, उन भद्र पुरुषों को कभी भी सत्ता के गलियारे उपलब्ध नहीं होते। यदि हो भी जाते हैं तो वह उन गलियारों में अधिक देर टिक नहीं पाते । उन्हें राजनीति धक्का मारकर बाहर भगा देती है। इससे भी दुख की बात यह है कि जब वह सत्ता के गलियारों से बाहर धकियाये जाते हैं तो बाहर खड़ी जनता भी उनका उपहास करती है। कितनी विडंबना है कि जिनकी देश को आवश्यकता है, उन्हें धकियाया जाता है और जो स्वयं जनता जनार्दन को धकियाकर या लतियाकर आगे बढ़ते हैं, उनको फूलमालाएं डाली जाती हैं। क्या बाबा छाप संविधान में ऐसा कहीं लिखा है ?

लेखक संपादक उगता भारत,सुप्रसिद्ध
इतिहासकार और
भारत को समझो अभियान समिति
के राष्ट्रीय प्रणेता
जिन आपराधिक मानसिकता के लोगों से समाज के लोगों को बचाने के लिए राजनीति का आविष्कार किया गया, यदि वही राजनीति इतनी पापिन हो जाए कि जनसामान्य के अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का संरक्षण करने लगे तो सामान्य लोगों के अधिकारों का इस पर क्या प्रभाव पड़ता होगा ? यह बात हम बहुत गंभीरता के साथ कह रहे हैं कि आज की राजनीति समाज की हत्यारिन बन चुकी है। जब किसी एक राजनीतिक दल का बाहुबली या धनबली चुनाव मैदान में उतरता है तो दूसरा राजनीतिक दल उससे भी बड़े बाहुबली को मैदान में उतारता है। इसमें जनता का दोष कम और राजनीति का दोष अधिक है। क्योंकि जनता के लोग तो केवल वोट डालने के लिए आते हैं। उन्हें यह विकल्प नहीं दिया जाता कि इन बदमाशों के सामने कोई भद्रपुरुष भी मैदान में है। विकल्पहीनता की स्थिति में मतदाता कई बार इन बाहुबलियों में से सबसे बड़े बाहुबली को अपने लिए जनप्रतिनिधि बनाकर विधानमंडलों में भेज देते हैं।

इनमें से अधिकांश बाहुबली ऐसे होते हैं जिन्हें संवैधानिक कानून की बारीकियों का कोई ज्ञान नहीं होता। ऐसे लोगों से आप जनप्रतिनिधि के रूप में देश चलाने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं ?
अब जबकि देश के लोगों से 46% जनप्रतिनिधि आपराधिक पृष्ठभूमि के चुनाव में जितवा लिये गए हों तो समझा जा सकता है कि ये जनप्रतिनिधि संसद को किस प्रकार की मानसिकता से समझेंगे और उसमें कैसा आचरण करेंगे ? चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण करने वाली सचेतक संस्था एसोसिएसन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की एक रिपोर्ट हमें बताती है कि वर्ष 2019 में चुने गए सांसदों में जहां 233 अर्थात 43% ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने की बात स्वीकार की थी, वहीं 18 वीं लोकसभा के लिए 251 सांसदों ने आपराधिक मामले दर्ज होने की बात स्वीकार की है। जब देश आजादी के अमृत महोत्सव को मना रहा हो, तब इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों का आपराधिक पृष्ठभूमि वाला होना बहुत ही चिंताजनक स्थिति पैदा करता है।
लोगों ने आम आदमी पार्टी के केजरीवाल को इस दृष्टि से देखना आरंभ किया था कि वह राजनीति में शुचिता उत्पन्न करेंगे। परन्तु उन्होंने भ्रष्टाचार के सभी कीर्तिमानों को ध्वस्त करने का कीर्तिमान बनाया है । अब उन्हें भी जेल से बेल मिल गई है। बाहर आकर अब वह कौन से गुल खिलाएंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा, परन्तु इतना अवश्य है कि वह भोलीभाली जनता की नजरों में धूल झोंकने का प्रयास अवश करेंगे। जिसे सारी राजनीति बेशर्मी से देखती रहेगी । यदि केजरीवाल की नौटंकी को रोकने का प्रयास भी किया गया तो सारी राजनीतिक पार्टियां जनता की नजरों में धूल झोंक रहे केजरीवाल से भी आगे जाकर धूल झोंकने का काम करके उन्हें रोकने का प्रयास करेंगी । कहने का अभिप्राय है कि संवैधानिक और नैतिक नियमों या परंपराओं या लोकतांत्रिक मूल्यों का सहारा न लेकर अलोकतांत्रिक व सर्वथा त्याज्य और निंदनीय उपायों का सहारा लेकर राजनीति जनता की नजरों में धूल झोंकने के केजरीवाल के काले कृत्यों का सामना करेगी।
बात स्पष्ट है कि जो स्वयं कुशासन का प्रतीक बन चुके हों या कुशासन की क्रूर नीतियों में आकंठ डूब चुके हों, उनसे सुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? भारत में राजनीति एक सामाजिक तपस्या का नाम है। यह धर्म की सहधर्मिणी के रूप में काम करती है अर्थात सिक्के के एक पहलू का नाम यदि धर्म है तो दूसरे पहलू का नाम राष्ट्रनीति है। राष्ट्रनीति धर्म की अपेक्षा स्थूल है, परंतु 24 घंटे धर्म के अनुकूल आचरण करने से अत्यंत पवित्र हो जाती है। राजनीति की इस पवित्रम अवस्था की खोज भारत के बीते 75 वर्षों से हम करते चले आ रहे हैं। जितना ही हम आगे बढ़ते जा रहे हैं, उतना ही राजनीति के आदर्श और राष्ट्र नीति का धर्म हमसे पीछे छूटता जा रहा है। आज सारी राजनीति के लिए यह बात बहुत विचारणीय है कि हम कहां के लिए चले थे और कहां आकर खड़े हो गए हैं ?

कांग्रेस की नीति फूट डालो राज करो, बन गई है टुकड़े-टुकड़े गैंग की लीडर-- नरेंद्र मोदी, लोक सभा में

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने 7 फरवरी को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी का सत्ता में आने की इच्छा खत्म हो चुकी है। लेकिन जब कुछ मिलने वाला नहीं है तो कम से कम बिगाड़ तो दो। इस फिलॉसफी पर कांग्रेस आज चल रही है। विभाजनकारी मानसिकता उनके डीएनए में घुस गई। अंग्रेज चले गए, लेकिन बांटो और राज करो की नीति को कांग्रेस ने अपना चरित्र बना लिया है। इसलिए ही आज कांग्रेस टुकड़े टुकड़े गैंग की लीडर बन गई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि देश की जनता आपको पहचान गई है, कुछ लोग पहले पहचान गए, कुछ लोग अब पहचान रहे हैं और कुछ लोग आने वाले समय में पहचानने वाले हैं। पिछली बार 1988 में त्रिपुरा में वहां की जनता ने आपको वोट दिया था, करीब 34 साल पहले। नागालैंड के लोगों ने आखिरी बार 1998 में कांग्रेस के लिए वोट किया था, करीब 24 साल हो गए। ओडिशा ने 1995 में आपके लिए वोट किया था, सिर्फ 27 साल हुए आपको वहां एंट्री नहीं मिली। गोवा में 1994 में पूर्ण बहुमत के साथ आप जीते थे, 28 साल से गोवा ने आपको स्वीकार नहीं किया। यूपी, गुजरात, बिहार ने आखिरी बार 1985 में कांग्रेस के लिए वोट किया था, करीब 37 साल पहले। पिछली बार पश्चिम बंगाल के लोगों ने करीब 50 साल पहले 1972 में आपको पसंद किया था

लोकसभा में उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी पराजय के बाद भी कांग्रेस का अहंकार नहीं टूटा है। उन्होंने एक शायरी भी सुनाई-
वो जब दिन को रात कहें
तो तुरंत मान जाओ
नहीं मानोगे तो वो दिन में नकाब ओढ़ लेंगे
जरूरत हुई तो हकीकत को थोड़ा बहुत मरोड़ लेंगे
वो मगरूर है.. खुद की समझ पर बेइंतहा
उन्हें आइना मत दिखाओ
वो आइने को भी तोड़ देंगे

लोकसभा में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के बयान पर उन्होंने कहा कि ये कैसे लोग हैं जो भारत के उद्योगपतियों को कोरोना का वेरिएंट बता रहे हैं। जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते हैं, वो इतिहास में खो जाते हैं। 60 से 80 के दशक में क्या नैरेटिव होता था? कांग्रेस के साथ रहकर सुख भोगने वाले लोग पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी की सरकार को क्या कहते थे? कहते थे कि ये तो टाटा बिड़ला की सरकार है। अब आप भी उसी भाषा को बोल रहे हैं।

महंगाई के मामले पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कांग्रेस के आखिरी पांच सालों में देश को डबल डिजिट महंगाई की मार झेलनी पड़ी। सरकार ने खुद माना था कि महंगाई उनके कंट्रोल से बाहर है। 2011 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने बेशर्मी से कह दिया कि महंगाई को कम करने के लिए किसी अलादीन के जादू की उम्मीद न करें। उन्‍होंने कहा कि पी चिदंबरम इन दिनों अखबारों में अर्थव्यवस्था पर लेख लिख रहे हैं। चिदंबरम जी ने 2012 में कहा था कि लोगों को 15 की पानी की बोतल और 20 रूपये की आइस्क्रीम खरीदने में तकलीफ नहीं होती, लेकिन गेहूं-चावल पर एक रुपये बढ़ जाए तो चिंता होती है। उन्होंने कहा कि कोरोना के बावजूद महंगाई इस बार 5.2 प्रतिशथ रही है।

महंगाई के मामले पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहाकि कांग्रेस के आखिरी पांच सालों में देश को डबल डिजिट महंगाई की मार झेलनी पड़ी। सरकार ने खुद माना था कि महंगाई उनके कंट्रोल से बाहर है। 2011 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने बेशर्मी से कह दिया कि महंगाई को कम करने के लिए किसी अलादीन के जादू की उम्मीद न करें। उन्‍होंने कहा कि पी चिदंबरम इन दिनों अखबारों में अर्थव्यवस्था पर लेख लिख रहे हैं। चिदंबरम जी ने 2012 में कहा था कि लोगों को 15 की पानी की बोतल और 20 रूपये की आइस्क्रीम खरीदने में तकलीफ नहीं होती, लेकिन गेहूं-चावल पर एक रुपये बढ़ जाए तो चिंता होती है। उन्होंने कहा कि कोरोना के बावजूद महंगाई इस बार 5.2 प्रतिशथ रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने गरीबी हटाओ नारे के कारण कई चुनाव जीते लेकिन ऐसा करने में असफल रहे। महंगाई पर उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले से अपने भाषण में मंहगाई पर हाथ खड़े कर दिए थे। नेहरू ने कहा था कभी-कभी कोरिया में लड़ाई भी हमें प्रभावित करती हैं और इससे वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं और यह हमारे कंट्रोल से भी बाहर हो जाती हैं। वो आगे कहते हैं कि अगर अमेरिका में भी कुछ हो जाता है तो उसका असर वस्तुओं की कीमतों पर पड़ जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ लोगों को मेक इन इंडिया से दिक्कत है, क्योंकि उनके लिए इसका मतलब है कि भ्रष्टाचार नहीं होगा, वे पैसा नहीं जुटा पाएंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन्होंने 50 वर्षों तक देश की सरकारें चलाई, मेक इन इंडिया को लेकर उनका क्या रवैया था। इसके लिए सिर्फ डिफेंस सेक्टर को हम देखें तो सारी बातें समझ आती हैं कि वो क्या करते थे, कैसे करते थे, क्यों करते थे और किसके लिए करते थे।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ लोगों को मेक इन इंडिया से दिक्कत है, क्योंकि उनके लिए इसका मतलब है कि भ्रष्टाचार नहीं होगा, वे पैसा नहीं जुटा पाएंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन्होंने 50 वर्षों तक देश की सरकारें चलाई, मेक इन इंडिया को लेकर उनका क्या रवैया था। इसके लिए सिर्फ डिफेंस सेक्टर को हम देखें तो सारी बातें समझ आती हैं कि वो क्या करते थे, कैसे करते थे, क्यों करते थे और किसके लिए करते थे।

आतंकी संगठन SFJ का ऐलान : 1 फरवरी को संसद पर कब्जा, ‘खालिस्तानी’ झंडा फहराने वाले को 2.5 करोड़ रुपए

                       खालिस्तानी संगठन SFJ ने आगामी 1 फरवरी को संसद पर कब्ज़ा करने की धमकी दी है
गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसान आन्दोलनकारियों के लाल किले पर उपद्रव के बाद अब प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने आगामी 1 फरवरी को संसद पर कब्ज़ा और घेराव की धमकी दी है। इतना ही नहीं, खालिस्तानी संगठन SFJ ने लाल किले पर झंडा फहराने वाले व्यक्ति को $350,000 इनाम देने का भी एलान किया है। SFJ ने कनाडा से सात मिनट का एक वीडियो जारी करते हुए लाल किले पर ‘खालिस्तानी’ झंडा फहराने की बात भी स्वीकार की है।

1 फरवरी को संसद में बजट भी पेश किया जाना है। इस दौरान सभी लोगों की निगाहें समाचार चैनल्स पर रहेंगी। ऐसे में इसी दिन को संसद घेराव के लिए चुना गया है।

राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मौके पर ‘किसान’ दंगाइयों ने ऐतिहासिक लाल किले पर सिखों के धार्मिक झंडे निशान साहब को फहरा दिया और राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा का अपमान भी किया। पूरे दिन ये तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया और समाचार चैनल्स पर छाई रहीं।

यही नहीं, दंगाइयों ने राम मंदिर और केदारनाथ मंदिर को निशाना बनाते हुए राम मंदिर की झाँकी के कुछ हिस्सों को तोड़ दिया। दंगाइयों ने अयोध्या श्रीराम मंदिर की झाँकी के लिए बनाए गए राम मंदिर के गुम्बद को निशाना बनाकर उसे तोड़ दिया। ये दोनों झाँकी कल गणतंत्र दिवस की परेड में दिखाई गई थीं।

गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में हुई हिंसा में एक्शन लेते हुए दिल्ली पुलिस ने करीब 200 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया है। इन पर हिंसा करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप लगा है।

मंगलवार को हुए इन ‘किसान दंगों’ में अब तक कुल 22 FIR दर्ज की जा चुकी हैं। पुलिस ने कहा कि वे सत्यापन करने के बाद गिरफ्तारी कर रहे हैं। दंगों में 230 से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है।

राष्ट्रीय राजधानी में लाल किले और किसान विरोध स्थलों पर कई स्थानों पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। मंगलवार के दिन ट्रैक्टर परेड के लिए निर्धारित मार्ग से दूर, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने सीमाओं पर बैरिकेड्स को तोड़ दिया और पुलिस के साथ भिड़ गए। उन्होंने कई जगहों से दिल्ली में प्रवेश किया और गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर धावा बोल दिया।