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ट्रंप और मोदी विरोधियों के समर्थक और नारों में कोई फर्क नहीं; डोनाल्ड ट्रंप ही नहीं जीते, अमेरिका ने आस्तीन के सांपों और उस मानसिकता को भी हराया जो हिंदू-भारतीय पहचान को कर रहा था टारगेट

भारत में संविधान का मजाक बनाने में हरकत में रहे नरेंद्र मोदी विरोधियों को जनता ने पहचानने की भूल करना ही सबसे भयंकर गलती की। मोदी भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री और अमेरिका को बार-बार मोदी को वीसा नहीं देने के लिए लिखना ही देश का अपमान था। समय बड़ा बलवान होता है, प्रधानमंत्री बनने पर सबसे पहला निमंत्रण अमेरिका ने दिया नहीं बल्कि उन सभी विरोधियों को करारा जवाब था। प्रधानमंत्री बनने पर मोदी का पहले विदेशी दौरा अमेरिका का ही था।   
कल (7 नवंबर) डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद लिखा था कि ट्रम्प की जीत ने अमेरिका में पल रहे भारत विरोधियों, विशेषकर भारतीय विपक्ष को करारा जवाब है। ट्रम्प और मोदी विरोधियों और उनके नारों में कोई फर्क नहीं होना अपने आपमें सबसे बड़ा सबूत है इनका देश विरोधी ताकतों की कठपुतली होने का। काश कमला हैरिस जीत गयी होती, भारत में सारे आन्दोलनजीवियों को ऑक्सीजन मिल गयी होती। आज मुस्लिम कट्टरपंथियों और विपक्ष में हड़कंप मच गया है। टीवी चर्चों में इनके चेहरे और बौखलाहट देखते बनती थी। जिस तरह भारत में लोक सभा चुनावों में 'संविधान खतरे में', 'लोकतंत्र खतरे में', 'फिर दुबारा चुनाव नहीं होंगे' और हिटलर आदि नारे लगे थे वही नारे अमेरिका में भी लगे। मतलब दोनों देशों में विपक्ष देश विरोधी ताकतों की गुलाम बनी हुई थी। यानि जिसे देश से प्रेम नहीं जनता से क्या होगा? अगर भारत में जनता 'खटाखट' के नाम पर लालची और भिखमंगों की तरह दुम हिलाते हुए नहीं भागते विपक्ष सिकड़ा हुआ होता। 
भारत में जिन घुसपैठियों को विपक्ष अपना समर्थन दे रहा है, अमेरिका में भी यही मुद्दा चुनाव में गर्म रहा और जनता में सरकार द्वारा घुसपैठियों को संरक्षण देना भी कमला हैरिस की हार का मुख्य कारण बना। यह कमला हैरिस की हार नहीं बल्कि विश्व में राष्ट्र विरोधियों की हार है। जो पार्टी या पार्टियां देश विरोधियों के हाथ कठपुतली बन नाचते हो उन पर विश्वास करना जनता की सबसे बड़ी भयंकर भूल होगी, अगर वर्तमान पीढ़ी ने होश से काम नहीं लिया आने वाली पीढ़ियां ही तुम्हे पानी पी-पी कर कोसेगी। भारत से लेकर अमेरिका तक विपक्ष के एक ही समर्थक और नारों में समानता अपने आपमें ही सारे सबूत दे रहे हैं।     
ट्रम्प की जीत से अमेरिका में पल रहे ट्रम्प लू और पुन्नू आदि भी अब सोंच समझकर भारत के विरुद्ध कोई बात बोलेंगे। यह अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जीत नहीं वास्तव में भारत की सबसे बड़ी जीत है। बांग्लादेश और कनाडा में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध पूरे विश्व में बोलने वाले डोनाल्ड ट्रम्प है। अभी भी समय रहते भारतीयों खासतौर पर सनातनियों को इन आस्तीन के सांपों के फन को कुचलने एकजुट हों। कोई ताकत भारत को बांग्लादेश नहीं बना पायेगी। उन सबकी कमर टूट गयी है।         
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका के पावरसेंटर से एक भारतवंशी बाहर हो गई हैं। इस भारतवंशी का नाम कमला हैरिस है। ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनावों में उन्हें 270 इलेक्टोरल वोट पाकर करारी हार दी। मतलब साफ है कि इस बार अमेरिकी जनता ट्रंप के साथ थी। हालाँकि, कमला के सत्ता से बाहर होने का मतलब ये नहीं है कि उनके जाने से भारतीयों की दखल अमेरिकी राजनीति में खत्म हो गई हो।

ट्रंप ने अपनी जीत से पहले ही ये सुनिश्चित कर दिया था कि भारतीयों की भागीदारी उनके कार्यकाल में भी बनी रहे। दरअसल, उन्होंने अपनी सरकार में जिन्हें उपराष्ट्रपति चुना है वो जेडी वेंस है और वेंस की पत्नी उषा चिलुकुरी एक भारतीय हैं।

वामपंथियों के निशाने पर उषा चिलुकुरी

जेडी के उपराष्ट्रपति बनने के बाद उषा चिलुकुरी अमेरिका की द्वितीय महिला होंगी। इन चुनावों से पहले जब जेडी वेंस के नाम का ऐलान हुआ था तब वामपंथियों ने सोशल मीडिया पर उषा को बहुत ट्रोल किया था। उन्हें उनके हिंदू होने के कारण सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया था। उन्हें गालियाँ दी गई थीं। उनकी और जेडी की शादी पर सवाल उठाए गए थे। कहा गया था कि ये सब सिर्फ हिंदू वोट पाने के लिए किया गया है। हालाँकि अब इन सबपर विराम है। चारों ओर अगर किस्से हैं तो सिर्फ इसके कैसे उषा के आने से जेडी वेंस की जिंदगी बदली।

भारत से कैसे जुड़े जेडी वेंस

आपको जानकर हैरानी होगी कि वेंस की सफलता में उषा का बड़ा हाथ रहा है और आज JD वेंस भी अपने स्पष्ट विचारों के लिए जाने जाते हैं। उषा से उनकी मुलाकात येल यूनिवर्सिटी में पढ़ने के दौरान हुई थी। इसके बाद दोनों में प्रेम सबंध हो गए 2014 में दोनों ने शादी कर ली। दिलचस्प बात ये है कि जेडी वेंस और उषा की शादी हिंदू पंडित द्वारा तमिल रीति-रिवाज ही कराई गई थी। इसके बाद जेडी वेंस भारत और भारतीयों से, उनकी संस्कृति से स्वत: जुड़ते गए। आज उनकी छवि भारत के समर्थक के तौर पर जानी चाती है। उन्होंने 2022 में रिपब्लिकन पार्टी से चुनाव लड़के सांसद पद हासिल किया था और 2024 में वह उपराष्ट्रपति पद के लिए चुने गए।
भारतीय लोगों का उनसे लगाव उनके भारतीय कनेक्शन यानी उषा के कारण अधिक है। पेशे से सफल वकील उषा भले अमेरिका में जन्मीं लेकिन उनकी जड़े भारत की है। उनके माता-पिता का नाता भारत के आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले से है। 1980 के दशक में अमेरिका जाने के बाद भी उषा के परिवार ने अपने धर्म को नहीं छोड़ा और बेटी को संस्कृति से जोड़े रखा।

अमेरिका में भारतीयों का रुतबा

अमेरिका में हुए चुनाव सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की जीत या जेडी वेंस के उपराष्ट्रपति बनने को लेकर नहीं हैं। अमेरिका के लोगों ने ट्रंप को राष्ट्रपति बनाकर उस सोच भी हराया है जो हिंदुओं को और भारतीयों को अपना निशाना बनाते हैं। इसके अलावा ये यह भी बताता है कि अमेरिका की आबादी में भले ही भारतवंशी कम हैं लेकिन उनका प्रभाव बहुत ज्यादा है। कारण दो हैं। राजनीति और बिजनेस।
अमेरिका की बड़ी-बड़ी कंपनियों में टॉप पोस्ट पर कई भारतीयों का बोलबाला रहा है। फिर चाहे माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ के तौर पर चुने गए सत्या नडेला हों, गूगल के सीईओ रहे सुंदर पिचई हों, हॉटमेल के सहसंस्थापक सबीर भाटिया हों। इन सभी नामों के कारण भारत हमेशा से अमेरिका में अपनी शीर्ष जगह पाता रहा है। रही बात वामपंथियों की तो उन्हें उस व्यक्ति से समस्या है जिसकी जड़ें हिंदुत्व से जुड़ी हों। उषा अकेली नहीं है जिन्हें निशाना बनाया गया।
तुलसी गबार्ड को भी इससे पहले उनकी हिंदू पहचान के कारण निशाना बनाया जा चुका है। 2020 में तुलसी गबार्ड ने अमेरिकी कॉन्ग्रेस की सदस्य चुने जाने के बाद सोशल मीडिया पर कहा भी था कि कॉन्ग्रेस के लिए जब भी वो चुनावी तैयारी करती हैं या राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल होती हैं, तब-तब उन्हें हिंदूफोबिया का अनुभव होता है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में नेता और मीडिया न सिर्फ इसे बर्दास्त करते हैं, बल्कि इसे बढ़ावा भी देते हैं।