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ईरान-अमेरिका की ‘इस्लामाबाद शांति वार्ता’ फेल, शिया मुल्क को धमका US लौटे जेडी वेंस


जैसी अटकलें लगाई जा रही थी ठीक वही हुआ। दरअसल आतंकी पाकिस्तान को पैसा चाहिए था और डोनाल्ड ट्रम्प ने आतंकिस्तान ने नस पकड़ कर बलि का बकरा बना दिया और इस खेल में परदे के पीछे चीन सफल रहा। शांति वार्ता के फेल होने के असार उस समय नज़र आ गयी थी जब पाकिस्तान ने अपनी फौज और टैंक सऊदी अरब भेजने शुरू कर दिए थे। भारत में मोदी विरोधी विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में लगा रहा। आतंकिस्तान मुल्क ने एक डाकिए का काम कर कटोरे में डॉलर ले रहा था। मालूम हो, पाकिस्तान के दोगले रवैये की वजह से कई मुस्लिम देशों ने अपने यहां रह रहे पाकिस्तानियों को मुल्क छोड़ने के बोल दिया है। उनके हर तरह के-गोल्डन वीसा आदि- वीसा रद्द कर दिए हैं।

      

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति को लेकर चली लंबी बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। यह बातचीत 21 घंटे से ज्यादा समय तक चली लेकिन दोनों देशों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका।

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत खत्म होने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि इस दौरान कई अहम मुद्दों पर गंभीर चर्चा जरूर हुई। उन्होंने इसे ‘अच्छी बात’ बताया लेकिन साफ किया कि कोई समझौता नहीं हो पाना ‘बुरी खबर’ है।

वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपनी शर्तें और सीमाएँ पहले ही स्पष्ट कर दी थीं और कुछ मुद्दों पर लचीलापन भी दिखाने को तैयार था। इसके बावजूद ईरान ने प्रस्तावित शर्तों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी समझौते के लिए यह जरूरी है कि ईरान यह वादा करे कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

बातचीत के बाद वह अपनी टीम के साथ अमेरिका लौट गए। वेंस ने बताया कि ईरान के साथ 21 घंटे तक चली लंबी बातचीत के दौरान वे लगातार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हर पल की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा कि ‘हॉटलाइन’ के जरिए दोनों के बीच दर्जनों बार बातचीत हुई। यानी पूरी बैठक के दौरान अमेरिकी नेतृत्व लगातार संपर्क में था और हर फैसले पर नजर रखी जा रही थी।

वेंस ने कहा, “बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते तक नहीं पहुँच पाए हैं। मेरा मानना है कि यह अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है। हम बिना किसी समझौते के ही अमेरिका लौट रहे हैं क्योंकि उन्होंने हमारी शर्तें मानने से इनकार कर दिया।”

वहीं, ईरान की तरफ से भी इस बातचीत के खत्म होने की पुष्टि की गई है। ईरानी न्यूज एजेंसी ‘तस्नीम’ के अनुसार, अमेरिका की शर्तें जरूरत से ज्यादा सख्त थीं जिस कारण समझौते का रास्ता नहीं निकल सका।

ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया कि हवाले हॉर्मुज स्ट्रेट को लेकर जरूरत से ज्यादा सख्त माँगें कर रहा है। फार्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका बातचीत के जरिए वह हासिल करना चाहता है जो वह 40 दिन चले युद्ध में नहीं कर सका। इसके लिए जहाजों का बीमा, तेल टैंकरों की सुरक्षा और अन्य सैन्य व आर्थिक तरीकों का सहारा लिया जा रहा है। ईरान का कहना है कि हॉर्मुज स्ट्रेट के अलावा भी कई मुद्दों पर अमेरिका की माँगे ईरान के लिए स्वीकार्य नहीं हैं।

बच्चों की तस्वीरें, गुलाब और मृतकों के जूते…. मिनाब में मारे गए स्कूली छात्रों की यादें लेकर पाकिस्तान पहुँचा ईरानी दल

                  मृतक बच्चों की तस्वीरें लेकर पाकिस्तान पहुँचे ईरानी दल (साभार : X_ @mb_ghalibaf)
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए शनिवार (11 अप्रैल 2026) को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ता होगी। इस बैठक के लिए ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) देर रात पाकिस्तान पहुँचे। जेडी वेंस भी अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ इस्लामाबाद पहुँच चुके हैं।

ईरानी स्पीकर गालिबाफ ने इस्लामाबाद पहुँचते ही सोशल मीडिया पर एक भावुक तस्वीर शेयर की। गालिबाफ ने ‘मिनाब-168’ लिखकर दुनिया को उस जख्म की याद दिलाई, जब 28 फरवरी को एक स्कूल पर हुए हमले में 168 बच्चों और स्टाफ की मौत हो गई थी।

पाकिस्तानी आतंकियों की तरह हमास, हिजबुल और अन्य आतंकवादी संगठन अलग से अपना कोई ठिकाना बनाने की बजाए स्कूलों, कॉलेज, हॉस्पिटल और मॉल आदि में ही अपना ठिकाना बनाते हैं ताकि उन पर होने वाले हमलों में छात्र, मरीज और आम नागरिकों के मरने पर उनको मोहरा बनाकर victim card खेल सहानुभूति बटोरी जा जाके। और यही सीख ईरान की दी हुई है। इसका नमूना भारत में भी देखने को मिलता है। कश्मीर में होती पत्थरबाज़ी में बच्चों और महिलाओं को आगे रखना और वैसे भी जहां-जहां दंगे होते हैं वहां बच्चे और महिलाओं को ही आगे रखा जाता है। शंका है मृतक बच्चों की तस्वीरों और जूतों का बातचीत पर कोई असर पड़ने वाला है। 

सरकारों को आतंकी संगठनों द्वारा स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और मॉल में बने आतंकी ठिकानों को बंद करना होगा अन्यथा बेकसूर अकाल मौत मरते रहेंगे।       

ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जान-बूझकर स्कूल को निशाना बनाया, जबकि अमेरिका इसे मिलिट्री बेस पर किया गया हमला बताता है। ईरान ने इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में भी उठाया है और हमले के जिम्मेदार अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।

‘ईरान को अमेरिका पर भरोसा नहीं’

इस्लामाबाद पहुँचने के बाद गालिबाफ ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे शांति के लिए ‘अच्छी नीयत’ के साथ आए हैं, लेकिन उन्हें अमेरिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। उन्होंने पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका ने हमेशा समझौतों का उल्लंघन किया है। गालिबाफ के साथ इस डेलिगेशन में विदेश मंत्री और रक्षा परिषद के सचिव जैसे कई बड़े अधिकारी शामिल हैं, जो आज अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की टीम के साथ आमने-सामने बैठेंगे।

नाइजीरिया में हो रहे ईसाइयों के नरसंहार के लिए इस्लामी कट्टरपंथी जिम्मेदार: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ; पत्नी से जुड़े विवाद में घिरे जेडी वेंस भी समर्थन में


अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पत्नी उषा वेंस के धर्म को लेकर दिए विवादास्पद बयानों के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक पोस्ट शेयर की है। इस पोस्ट में ट्रंप ने लिखा है, “नाइजीरिया में ईसाई धर्म पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। वहाँ हजारों ईसाइयों की हत्या की जा रही है। इन नरसंहारों के पीछे कट्टरपंथी इस्लामी समूह जिम्मेदार हैं।”

ट्रंप ने आगे लिखा है, “लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है, जब ईसाइयों या किसी भी समुदाय के लोगों की इस तरह हत्या होती है (सिर्फ नाइजीरिया में 3,100, जबकि दुनिया भर में 4,476 मौतें), तो हमें कार्रवाई करनी ही होगी। संयुक्त राज्य अमेरिका चुप नहीं रह सकता जब नाइजीरिया और कई अन्य देशों में ऐसे अत्याचार हो रहे हैं। हम दुनिया भर में अपने महान ईसाई समुदाय की रक्षा करने के लिए तैयार, इच्छुक और सक्षम हैं।”

राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया, “नाइजीरिया के एक गाँव में आतंकी हमला हुआ था, जिसमें करीब 20 ईसाई मारे गए। साल 2024 दुनियाभर में धर्म के नाम पर मारे गए लोगों में 70 प्रतिशत लोग ईसाई थे और नाइजीरिया निवासी थे। इस नरसंहार के लिए बोको हराम, इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस (ISWAP) और फुलानी उग्रवादी चरवाहे जिम्मेदार हैं।”

जेडी वेंस ने ईसाईयों की रक्षा को लेकर लिखी गई ट्रंप की यह पोस्ट ऐसे समय में शेयर की है, जब वे खुद अपनी हिंदू पत्नी के ईसाई धर्म अपनाने की इच्छा जता रहे हैं और लगातार आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं।

‘मेरी आलोचना करने वाले दिखा रहे नफरत’: हिंदू पत्नी को ईसाई बनाने की इच्छा रखकर घिरे अमेरिकी राष्ट्रपति जेडी वेंस, सफाई में बोले- वो नहीं बदलेगी धर्म

                              अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पत्नी उषा वेंस के साथ (फोटो साभार: न्यूज 18)

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने अपनी हिंदू पत्नी उषा वेंस के ईसाई मजहब अपनाने की इच्छा जताई थी। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भारी आलोचना शुरू हो गई, जिसमें कई लोगों ने कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी के हिंदू धर्म का अपमान किया है। इसके बाद अब इस मामले में जेडी वेंस ने प्रतिक्रिया दी है।

जेडी वेंस ने शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को अपनी पत्नी उषा वेंस के धर्म को लेकर दिए गए बयान पर बचाव करते हुए कहा कि उनकी पत्नी क्रिश्चियन नहीं हैं और उनका धर्म बदलने का कोई इरादा भी नहीं है। वेंस ने इस मुद्दे पर हुई आलोचना को घृणित बताया और आरोप लगाया कि यह ‘ईसाई-विरोधी पूर्वाग्रह (anti-Christian bigotry)’ से प्रेरित है।

जेडी वेंस ने कहा- चाहता हूँ वह मेरे नजरिए को समझें

वेंस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर स्पष्टीकरण देते हुए लिखा, “वह क्रिश्चियन नहीं हैं और धर्म परिवर्तन की कोई योजना भी नहीं है। लेकिन जैसे हर इंटरफेथ (मिश्रित धर्म) शादी में होता है, मैं भी चाहता हूँ कि एक दिन वह मेरे नजरिए को समझें, फिर भी मैं उन्हें प्यार करता रहूँगा, उनका साथ दूँगा और हम जीवन और आस्था पर बात करते रहेंगे, क्योंकि वह मेरी पत्नी हैं।”

वेंस ने यह भी बताया कि उषा ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने उन्हें सालों पहले दोबारा अपने धर्म से जुड़ने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने कहा, “मेरी पत्नी मेरे जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद हैं। उन्होंने ही मुझे अपने धर्म और विश्वास से दोबारा जोड़ने में मदद की।”

अंत में वेंस ने लिखा, “इस तरह की पोस्ट ईसाई-विरोधी कट्टरता को बढ़ावा देती हैं। हाँ, ईसाइयों की भी अपनी मान्यताएँ होती हैं और हाँ, इन मान्यताओं के कई परिणाम होते हैं, जिनमें से एक यह है कि हम उन्हें दूसरों के साथ साझा करना चाहते हैं। यह बिल्कुल सामान्य बात है, और जो कोई भी आपको इसके विपरीत बता रहा है, उसका कोई न कोई एजेंडा जरूर है।”

दरअसल, मिसिसिपी विश्वविद्यालय में Turning Point USA के एक कार्यक्रम के दौरान वेंस ने कहा था कि वे चाहते हैं कि उनकी पत्नी उषा, जो एक हिंदू परिवार से हैं, भविष्य में ईसाई मजहब को अपनाएँ। उन्होंने कहा था, “अधिकतर रविवार वह मेरे साथ चर्च आती हैं। क्या मैं चाहता हूँ कि किसी दिन उन्हें भी वही अनुभव हो जो मुझे चर्च में हुआ था? हाँ, मैं वास्तव में चाहता हूँ।”

ट्रंप और मोदी विरोधियों के समर्थक और नारों में कोई फर्क नहीं; डोनाल्ड ट्रंप ही नहीं जीते, अमेरिका ने आस्तीन के सांपों और उस मानसिकता को भी हराया जो हिंदू-भारतीय पहचान को कर रहा था टारगेट

भारत में संविधान का मजाक बनाने में हरकत में रहे नरेंद्र मोदी विरोधियों को जनता ने पहचानने की भूल करना ही सबसे भयंकर गलती की। मोदी भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री और अमेरिका को बार-बार मोदी को वीसा नहीं देने के लिए लिखना ही देश का अपमान था। समय बड़ा बलवान होता है, प्रधानमंत्री बनने पर सबसे पहला निमंत्रण अमेरिका ने दिया नहीं बल्कि उन सभी विरोधियों को करारा जवाब था। प्रधानमंत्री बनने पर मोदी का पहले विदेशी दौरा अमेरिका का ही था।   
कल (7 नवंबर) डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद लिखा था कि ट्रम्प की जीत ने अमेरिका में पल रहे भारत विरोधियों, विशेषकर भारतीय विपक्ष को करारा जवाब है। ट्रम्प और मोदी विरोधियों और उनके नारों में कोई फर्क नहीं होना अपने आपमें सबसे बड़ा सबूत है इनका देश विरोधी ताकतों की कठपुतली होने का। काश कमला हैरिस जीत गयी होती, भारत में सारे आन्दोलनजीवियों को ऑक्सीजन मिल गयी होती। आज मुस्लिम कट्टरपंथियों और विपक्ष में हड़कंप मच गया है। टीवी चर्चों में इनके चेहरे और बौखलाहट देखते बनती थी। जिस तरह भारत में लोक सभा चुनावों में 'संविधान खतरे में', 'लोकतंत्र खतरे में', 'फिर दुबारा चुनाव नहीं होंगे' और हिटलर आदि नारे लगे थे वही नारे अमेरिका में भी लगे। मतलब दोनों देशों में विपक्ष देश विरोधी ताकतों की गुलाम बनी हुई थी। यानि जिसे देश से प्रेम नहीं जनता से क्या होगा? अगर भारत में जनता 'खटाखट' के नाम पर लालची और भिखमंगों की तरह दुम हिलाते हुए नहीं भागते विपक्ष सिकड़ा हुआ होता। 
भारत में जिन घुसपैठियों को विपक्ष अपना समर्थन दे रहा है, अमेरिका में भी यही मुद्दा चुनाव में गर्म रहा और जनता में सरकार द्वारा घुसपैठियों को संरक्षण देना भी कमला हैरिस की हार का मुख्य कारण बना। यह कमला हैरिस की हार नहीं बल्कि विश्व में राष्ट्र विरोधियों की हार है। जो पार्टी या पार्टियां देश विरोधियों के हाथ कठपुतली बन नाचते हो उन पर विश्वास करना जनता की सबसे बड़ी भयंकर भूल होगी, अगर वर्तमान पीढ़ी ने होश से काम नहीं लिया आने वाली पीढ़ियां ही तुम्हे पानी पी-पी कर कोसेगी। भारत से लेकर अमेरिका तक विपक्ष के एक ही समर्थक और नारों में समानता अपने आपमें ही सारे सबूत दे रहे हैं।     
ट्रम्प की जीत से अमेरिका में पल रहे ट्रम्प लू और पुन्नू आदि भी अब सोंच समझकर भारत के विरुद्ध कोई बात बोलेंगे। यह अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जीत नहीं वास्तव में भारत की सबसे बड़ी जीत है। बांग्लादेश और कनाडा में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध पूरे विश्व में बोलने वाले डोनाल्ड ट्रम्प है। अभी भी समय रहते भारतीयों खासतौर पर सनातनियों को इन आस्तीन के सांपों के फन को कुचलने एकजुट हों। कोई ताकत भारत को बांग्लादेश नहीं बना पायेगी। उन सबकी कमर टूट गयी है।         
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका के पावरसेंटर से एक भारतवंशी बाहर हो गई हैं। इस भारतवंशी का नाम कमला हैरिस है। ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनावों में उन्हें 270 इलेक्टोरल वोट पाकर करारी हार दी। मतलब साफ है कि इस बार अमेरिकी जनता ट्रंप के साथ थी। हालाँकि, कमला के सत्ता से बाहर होने का मतलब ये नहीं है कि उनके जाने से भारतीयों की दखल अमेरिकी राजनीति में खत्म हो गई हो।

ट्रंप ने अपनी जीत से पहले ही ये सुनिश्चित कर दिया था कि भारतीयों की भागीदारी उनके कार्यकाल में भी बनी रहे। दरअसल, उन्होंने अपनी सरकार में जिन्हें उपराष्ट्रपति चुना है वो जेडी वेंस है और वेंस की पत्नी उषा चिलुकुरी एक भारतीय हैं।

वामपंथियों के निशाने पर उषा चिलुकुरी

जेडी के उपराष्ट्रपति बनने के बाद उषा चिलुकुरी अमेरिका की द्वितीय महिला होंगी। इन चुनावों से पहले जब जेडी वेंस के नाम का ऐलान हुआ था तब वामपंथियों ने सोशल मीडिया पर उषा को बहुत ट्रोल किया था। उन्हें उनके हिंदू होने के कारण सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया था। उन्हें गालियाँ दी गई थीं। उनकी और जेडी की शादी पर सवाल उठाए गए थे। कहा गया था कि ये सब सिर्फ हिंदू वोट पाने के लिए किया गया है। हालाँकि अब इन सबपर विराम है। चारों ओर अगर किस्से हैं तो सिर्फ इसके कैसे उषा के आने से जेडी वेंस की जिंदगी बदली।

भारत से कैसे जुड़े जेडी वेंस

आपको जानकर हैरानी होगी कि वेंस की सफलता में उषा का बड़ा हाथ रहा है और आज JD वेंस भी अपने स्पष्ट विचारों के लिए जाने जाते हैं। उषा से उनकी मुलाकात येल यूनिवर्सिटी में पढ़ने के दौरान हुई थी। इसके बाद दोनों में प्रेम सबंध हो गए 2014 में दोनों ने शादी कर ली। दिलचस्प बात ये है कि जेडी वेंस और उषा की शादी हिंदू पंडित द्वारा तमिल रीति-रिवाज ही कराई गई थी। इसके बाद जेडी वेंस भारत और भारतीयों से, उनकी संस्कृति से स्वत: जुड़ते गए। आज उनकी छवि भारत के समर्थक के तौर पर जानी चाती है। उन्होंने 2022 में रिपब्लिकन पार्टी से चुनाव लड़के सांसद पद हासिल किया था और 2024 में वह उपराष्ट्रपति पद के लिए चुने गए।
भारतीय लोगों का उनसे लगाव उनके भारतीय कनेक्शन यानी उषा के कारण अधिक है। पेशे से सफल वकील उषा भले अमेरिका में जन्मीं लेकिन उनकी जड़े भारत की है। उनके माता-पिता का नाता भारत के आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले से है। 1980 के दशक में अमेरिका जाने के बाद भी उषा के परिवार ने अपने धर्म को नहीं छोड़ा और बेटी को संस्कृति से जोड़े रखा।

अमेरिका में भारतीयों का रुतबा

अमेरिका में हुए चुनाव सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की जीत या जेडी वेंस के उपराष्ट्रपति बनने को लेकर नहीं हैं। अमेरिका के लोगों ने ट्रंप को राष्ट्रपति बनाकर उस सोच भी हराया है जो हिंदुओं को और भारतीयों को अपना निशाना बनाते हैं। इसके अलावा ये यह भी बताता है कि अमेरिका की आबादी में भले ही भारतवंशी कम हैं लेकिन उनका प्रभाव बहुत ज्यादा है। कारण दो हैं। राजनीति और बिजनेस।
अमेरिका की बड़ी-बड़ी कंपनियों में टॉप पोस्ट पर कई भारतीयों का बोलबाला रहा है। फिर चाहे माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ के तौर पर चुने गए सत्या नडेला हों, गूगल के सीईओ रहे सुंदर पिचई हों, हॉटमेल के सहसंस्थापक सबीर भाटिया हों। इन सभी नामों के कारण भारत हमेशा से अमेरिका में अपनी शीर्ष जगह पाता रहा है। रही बात वामपंथियों की तो उन्हें उस व्यक्ति से समस्या है जिसकी जड़ें हिंदुत्व से जुड़ी हों। उषा अकेली नहीं है जिन्हें निशाना बनाया गया।
तुलसी गबार्ड को भी इससे पहले उनकी हिंदू पहचान के कारण निशाना बनाया जा चुका है। 2020 में तुलसी गबार्ड ने अमेरिकी कॉन्ग्रेस की सदस्य चुने जाने के बाद सोशल मीडिया पर कहा भी था कि कॉन्ग्रेस के लिए जब भी वो चुनावी तैयारी करती हैं या राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल होती हैं, तब-तब उन्हें हिंदूफोबिया का अनुभव होता है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में नेता और मीडिया न सिर्फ इसे बर्दास्त करते हैं, बल्कि इसे बढ़ावा भी देते हैं।