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नर्मदा नदी के हर पत्थर में हैं शिव, आखिर क्यों?


प्राचीनकाल में नर्मदा नदी ने बहुत वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा। नर्मदाजी ने कहा‌:- ’ब्रह्मा जी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजी के समान कर दीजिए। ब्रह्माजी ने मुस्कराते हुए कहा - ’यदि कोई दूसरा देवता भगवान शिव की बराबरी कर ले, कोई दूसरा पुरुष भगवान विष्णु के समान हो जाए, कोई दूसरी नारी पार्वतीजी की समानता कर ले और कोई दूसरी नगरी काशीपुरी की बराबरी कर सके तो कोई दूसरी नदी भी गंगा के समान हो सकती है। ब्रह्माजी की बात सुनकर नर्मदा उनके वरदान का त्याग करके काशी चली गयीं और वहां पिलपिलातीर्थ में शिवलिंग की स्थापना करके तप करने लगीं।
भगवान शंकर उन पर बहुत प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा। नर्मदा ने कहा - ’भगवन्! तुच्छ वर मांगने से क्या लाभ? बस आपके चरण कमलों में मेरी भक्ति बनी रहे। नर्मदा की बात सुनकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हो गए और बोले - ’नर्मदे! तुम्हारे तट पर जितने भी प्रस्तरखण्ड (पत्थर) हैं, वे सब मेरे वर से शिवलिंगरूप हो जाएंगे। गंगा में स्नान करने पर शीघ्र ही पाप का नाश होता है, यमुना सात दिन के स्नान से और सरस्वती तीन दिन के स्नान से सब पापों का नाश करती हैं परन्तु तुम दर्शनमात्र से सम्पूर्ण पापों का निवारण करने वाली होगी। तुमने जो नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की है, वह पुण्य और मोक्ष देने वाला होगा। भगवान शंकर उसी शिवलिंग में लीन हो गए। इतनी पवित्रता पाकर नर्मदा भी प्रसन्न हो गयीं। इसलिए कहा जाता है ‘नर्मदा का हर कंकर शिव शंकर है..

महाराष्ट्र : कोपेश्वर मंदिर, जहाँ शांत हुआ था शिव का क्रोध


अपने आपको हिन्दू कहने वाले नेताओं और पार्टियों ने अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए तुष्टिकरण करते भारतीय संस्कृति और इतिहास से खिलवाड़ कर भारतीयों को उनके वास्तविक इतिहास से अज्ञान बना दिया। 2014 चुनावों के बाद से समय ने जो करवट बदली, इन सभी पाखंडियों ने चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया है। वास्तविक इतिहास के पृष्ठ धीरे-धीरे खुलने हो चुके हैं, जिनसे जनता को दूर रखा हुआ था। 
यह किसी 3D फ़िल्म का चित्र नहीं बल्कि हमारे प्राचीन मंदिर परिसर का एक हिस्सा है, प्रत्येक वर्ष में एक या दो बार ऐसा होता है जब चंद्रमा इस मंडप के एकदम बीच में आता है । हैरान करने वाली बात है कि ऐसा केवल कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही होता है।

ऐसे हज़ारों चमत्कारी मंदिर हैं, जिन्हें प्रकाश में लाने का समय आ गया है। 31 दिसम्बर 2023 की सुबह Zee News पर एक महिला ज्योतिष ने अयोध्या में जीणोद्धार हो रहे राम मन्दिर के विषय पर संक्षेप में जो अति महत्वपूर्ण बात कही, देखना है Zee News ही उस बात को कितना प्रसारित करता है या अपनी TRP के मकड़जाल में फंस छद्दम धर्म-निरपेक्ष बन जायेगा। भावार्थ यह है कि अयोध्या में राम मन्दिर नहीं बन रहा है, बल्कि भारत विश्व गुरु बनने तेजी से बढ़ेगा। 
कोपेश्वर मंदिर का इतिहास व वास्तुकला
कहते हैं भारत का प्राचीन नाम अखंड भारत था, ये बिल्कुल सही बात है। इसका प्रमाण आज भी देखा जा सकता है। आज भी प्राचीन समय की कई ऐसी सरंचना देखी जा सकती है, जो इस बात का प्रमाण देती है कि भारत से श्रेष्ठ न कोई था और न कोई रहेगा। इन संरचनाओं को देखकर आज भी शोधकर्ता यही सोचते हैं कि आखिर कैसे इतनी जटिल वास्तुकला से ये संरचना बनाई गई है, जबकि हजारों साल पहले मशीन का तो जमाना ही नहीं था, सिर्फ हाथ से ही कारीगरी की जाती थी।
इसका जीता जागता प्रमाण है- महाराष्ट्र के कोल्हापुर के समीप खिद्रापुर में स्थित कोपेश्वर मंदिर। जी हां, इस मंदिर की वास्तुकला कोई साधारण डिजाइन नहीं है बल्कि इसमें कई रहस्य छिपे हैं, जो आज भी रहस्य ही बने हुए है। इन्हें देखने पर आपको 3D फिल्मों की याद आ जाएगी, जैसे लग रहा हो कोई सीन बस करीब से होकर गुजरा हो। इसकी भव्यता आज भी किसी मामले में कम नहीं हुई है। 
खिद्रापुर का कोपेश्वर मंदिर चालुक्य वंश की उत्कृष्ट वास्तुकला को दर्शाती है। यह मंदिर चालुक्यों द्वारा बनाए बाकी इमारतों की तरह प्रसिद्ध तो नहीं हो पाया लेकिन इसकी वास्तुकला ही इसे देखने पर मजबूर कर देती है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमा पर स्थित यह मंदिर 12वीं शाताब्दी (1109-78 ईस्वी के बीच) में शैलाहार वंश के राजा गंधारादित्य द्वारा बनवाया गया था। कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।
मंदिर परिसर में आपको कई शिलालेख (करीब 12) दिख जाएंगे, जो प्राचीन इतिहास से रूबरू करवाते हैं। हालांकि, अब इसमें से सिर्फ कुछ ही शिलालेख (शायद 2 या 3) बचे हैं, जिनकी स्थिति अभी भी ठीक है। इनमें कुछ राजाओं और उनके अधिकारियों के नाम अंकित है। एक (संस्कृत - देवनागरी) को छोड़ बाकी सभी शिलालेख कन्नड़ भाषा में लिखित हैं। मंदिर में स्थित दो शिवलिंग है, इनमें एक भगवान शिव और दूसरा भगवान विष्णु को समर्पित है। मंदिर का ऊपरी छत खुला है, जिससे सूर्य की किरणें हर रोज महादेव का सूर्याभिषेक करती हैं।
कोपेश्वर मंदिर के निर्माण को लेकर विभिन्न मत 
मंदिर के निर्माण को लेकर कई विभिन्न मत है, जिसमें 7वीं शाताब्दी में बादामी चालुक्य वंश के राजाओं, 9वीं शाताब्दी में कल्याणी चालुक्य वंश के राजाओं, 12वीं शाताब्दी में शैलहार वंश के राजाओं ने करवाया था। मंदिर में स्थित एक शिलालेख के मुताबिक, इस मंदिर का पुनरुद्धार 1204 ईस्वी में देवगिरी के यादव राजाओं ने करवाई थी।
कोपेश्वर मंदिर पर औरंगजेब का आक्रमण 
इतिहास की मानें तो 1702 ईस्वी में मुगल शासक औरंगजेब ने कोपेश्वर मंदिर पर आक्रमण किया था, जिसका प्रमाण मंदिर परिसर के खंडित भागों को देखने से मिलता है। इनमें से अधिकतर प्रतिमाओं से मुख और हाथ खंडित नजर आते हैं।
कोपेश्वर मंदिर को लेकर पौराणिक कथा 
कोपेश्वर मंदिर को लेकर एक पौराणिक किवदंती भी प्रचलित है। किवदंती के अनुसार, जब माता सती ने अग्नि कुंड में कूद कर अपनी देह का त्याग किया था, तब शिव जी अत्यंत क्रोधित हो गए थे और माता सती के जलते हुए शरीर को लेकर नृत्य करने लगे थे। ऐसे में विष्णु जी को उनका क्रोध शांत करने के लिए पृथ्वी पर आना पड़ा था। यह वही जगह है, जहां महादेव का क्रोध शांत हुआ था, ...
महाराष्ट्र का सबसे अमीर मंदिर है कोपेश्वर मंदिर
कहा जाता है कि यह मंदिर महाराष्ट्र का सबसे अमीर मंदिर है। इस मंदिर में उपयोग किया जाने वाला पत्थर कठोर बेसाल्ट चट्टान है, जो सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में पाई जाती है। यह चट्टान मंदिर से 100 किमी के अंदर में ही स्थित है, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि पंच गंगा और कृष्णा नदियों के माध्यम से पत्थर को यहां लाया गया होगा। क्योंकि प्राचीन समय में हमारे अखंड भारत में जलमार्ग का उपयोग किया जाता था। 
कोपेश्वर मंदिर में दर्शन करने का समय - सुबह 05:00 बजे से रात 09:00 तक।

नटराज : शिव कलाओं का आधार



नटराज शिवजी का एक नाम है उस रूप में जिस में वह सबसे उत्तम नर्तक हैं। नटराज शिव का स्वरूप न सिर्फ उनके संपूर्ण काल एवं स्थान को ही दर्शाता है; अपितु यह भी बिना किसी संशय स्थापित करता है कि ब्रह्माण्ड में स्थित सारा जीवन, उनकी गति कंपन तथा ब्रह्माण्ड से परे शून्य की नि:शब्दता सभी कुछ एक शिव में ही निहित है। नटराज दो शब्दों के समावेश से बना है – नट (अर्थात कला) और राज। इस स्वरूप में शिव कलाओं के आधार हैं। शिव का तांडव नृत्य प्रसिद्ध है।
शिव के दो स्वरूप:
शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं। पहला उनके क्रोध का परिचायक, प्रलयकारी रौद्र तांडव तथा दूसरा आनंद प्रदान करने वाला आनंद तांडव। पर ज्यादातर लोग तांडव शब्द को शिव के क्रोध का पर्याय ही मानते हैं। रौद्र तांडव करने वाले शिव रुद्र कहे जाते हैं, आनंद तांडव करने वाले शिव नटराज। प्राचीन आचार्यों के मतानुसार शिव के आनन्द तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विलय हो जाता है। शिव का नटराज स्वरूप भी उनके अन्य स्वरूपों की ही भांति मनमोहक तथा उसकी अनेक व्याख्याएँ हैं।
नटराज शिव की प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति के चार भुजाएँ हैं, उनके चारों ओर अग्नि के घेरें हैं। उनका एक पाँव से उन्होंने एक बौने(अकश्मा) को दबा रखा है, एवं दूसरा पाँव नृत्य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। उन्होंने अपने पहले दाहिने हाथ में (जो कि ऊपर की ओर उठा हुआ है) डमरु पकड़ा हुआ है। डमरू की आवाज सृजन का प्रतीक है। इस प्रकार यहाँ शिव की सृजनात्मक शक्ति का द्योतक है। ऊपर की ओर उठे हुए उनके दूसरे हाथ में अग्नि है। यहाँ अग्नि विनाश का प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि शिव ही एक हाथ से सृजन करतें हैं तथा दूसरे हाथ से विलय। उनका दूसरा दाहिना हाथ अभय (या आशीष) मुद्रा में उठा हुआ है जो कि हमें बुराईयों से रक्षा करता है।
उठा हुआ पांव मोक्ष का द्योतक है। उनका दूसरा बाया हाथ उनके उठे हुए पांव की ओर इंगित करता है। इसका अर्थ यह है कि शिव मोक्ष के मार्ग का सुझाव करते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही मोक्ष है। उनके पांव के नीचे कुचला हुआ बौना दानव अज्ञान का प्रतीक है जो कि शिव द्वारा नष्ट किया जाता है। शिव अज्ञान का विनाश करते हैं। चारों ओर उठ रही आग की लपटें इस ब्रह्माण्ड की प्रतीक हैं। उनके शरीर पर से लहराते सर्प कुण्डलिनी शक्ति के द्योतक हैं। उनकी संपूर्ण आकृति ॐ कार स्वरूप जैसी दिखती है। यह इस बात को इंगित करता है कि ॐ शिव में ही निहित है।
वह ताण्डव नृत्य करते हें जिससे विश्व का संहार होता है।
'नटराज' शिव के 'तांडव नृत्य' का प्रतीक है।
चिदंबरम के गोपुर में तांडव के 108 रूप अंकित किए गये हैं। इस मूर्ति के एक एक अवयव, एक एक रेखा को वाचा प्राप्त है।
नटराज
डमरू से हमारी वर्णमाला प्रकट होती है।
चारों वाणी (परा, पश्यंती, मध्यमा, वैखरी) तथा 84 लाख योनियों के सर्जक शिव हैं।
शिव के दूसरे हाथ में स्थित अग्नि मलिनता दूर करती है।
तीसरा हाथ 'अभय मुद्रा' दर्शाती है। ऊपर उठा हाथ कहता है - ' मुक्ति की कामना हो तो माया मोह से दूर होकर ऊंचा उठो।
'प्रभामंडल' प्रकृति का प्रतीक है।
नटराज का यह नृत्य विश्व की पांच महान् क्रियाओं का निर्देशक है - सृष्टि, स्थिति, प्रलय, तिरोभाव (अदृश्य, अंतर्हित) और अनुग्रह।
नटराज की मूर्ति में धर्म, शास्त्र और कला का अनूठा संगम है।
जब भगवान शिव ने राधिका का रूप धर रास किया.....
एक बार की बात है 'नटराज' भगवान शिव के तांडव नृत्य में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवगण कैलाश पर्वत पर उपस्थित हुए। जगज्जननी माता गौरी वहां दिव्य रत्नसिंहासन पर आसीन होकर अपनी अध्यक्षता में तांडव का आयोजन कराने के लिए उपस्थित थीं। देवर्षि नारद भी उस नृत्य कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए लोकों का परिभ्रमण करते हुए वहां आ पहुंचे थे। थोड़ी देर में भगवान शिव ने भावविभोर होकर तांडव नृत्य प्रारंभ कर दिया।
समस्त देवगण और देवियां भी उस नृत्य में सहयोगी बनकर विभिन्न प्रकार के वाद्य बजाने लगे। वीणा वादिनी मां सरस्वती वीणा वादन करने लगीं, विष्णु भगवान मृदंग बजाने लगे, देवराज इन्द्र वंशी बजाने लगे, ब्रह्माजी हाथ से ताल देने लगे और लक्ष्मीजी गायन करने लगीं। अन्य देवगण, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, उरग, पन्नग, सिद्ध, अप्सराएं, विद्याधर आदि भाव-विह्वल होकर भगवान शिव के चतुर्दिक खड़े होकर उनकी स्तुति में तल्लीन हो गए।
भगवान शिव ने उस प्रदोषकाल में उन समस्त दिव्य विभूतियों के समक्ष अत्यंत अद्भुत, लोक विस्मयकारी तांडव नृत्य का प्रदर्शन किया। उनके अंग-संचालन-कौशल, मुद्रा-लाघव, चरण, कटि, भुजा, ग्रीवा के उन्मत्त किंतु सुनिश्चित विलोल-हिल्लोल के प्रभाव से सभी के मन और नेत्र दोनों एकदम चंचल हो उठे।
सभी ने नटराज भगवान शंकरजी के उस नृत्य की सराहना की। भगवती महाकाली तो उन पर अत्यंत ही प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने शिवजी से कहा- 'भगवन्‌! आज आपके इस नृत्य से मुझे बड़ा आनंद हुआ है, मैं चाहती हूं कि आप आज मुझसे कोई वर प्राप्त करें।'
उनकी बातें सुनकर लोकहितकारी आशुतोष भगवान शिव ने नारदजी की प्रेरणा से कहा- 'हे देवी! इस तांडव नृत्य के जिस आनंद से आप, देवगण तथा अन्य दिव्य योनियों के प्राणी विह्वल हो रहे हैं, उस आनंद से पृथ्वी के सारे प्राणी वंचित रह जाते हैं। हमारे भक्तों को भी यह सुख प्राप्त नहीं हो पाता अत: आप ऐसा करिए कि पृथ्वी के प्राणियों को भी इसका दर्शन प्राप्त हो सके किंतु मैं अब तांडव से विरत होकर केवल 'रास' करना चाहता हूं।'
भगवान शिव की बात सुनकर तत्क्षण भगवती महाकाली ने समस्त देवताओं को विभिन्न रूपों में पृथ्वी पर अवतार लेने का आदेश दिया। स्वयं वे भगवान श्यामसुंदर श्रीकृष्ण का अवतार लेकर वृंदावन धाम में पधारीं। भगवान श्री शिवजी ने ब्रज में श्रीराधा के रूप में अवतार ग्रहण किया। यहां इन दोनों ने मिलकर देवदुर्लभ, अलौकिक रास नृत्य का आयोजन किया।
भगवान शिव की 'नटराज' उपाधि यहां भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त हुई। पृथ्वी के चराचर प्राणी इस रास के अवलोकन से आनंद-विभोर हो उठे और भगवान शिव की इच्छा पूरी हुई।
नटराज स्त्रोत:
भगवान शिव का नटराज स्वरूप अधिकांश संगीतकार, कलाकार, नृतक और गायक पूजते हैं। शिव अपने नटराज स्वरूप में इतने लीन होते हैं कि उनसे अपनी कला के लिए आशीष सहजता से मांगा जा सकता है। वे उस समय अपनी समस्त कलाओं की दिव्य अभिव्यक्ति कर रहे होते हैं। अगर आप भी किसी न किसी कला से जुड़े हैं तो प्रति सोमवार इस स्तुति का सस्वर पाठ करना न भूलें...
सत सृष्टि तांडव रचयिता
नटराज राज नमो नमः..
हेआद्य गुरु शंकर पिता
नटराज राज नमो नमः...
गंभीर नाद मृदंगना
धबके उरे ब्रह्मांडना
नित होत नाद प्रचंडना
नटराज राज नमो नमः...
शिर ज्ञान गंगा चंद्रमा
चिद्ब्रह्म ज्योति ललाट मां
विषनाग माला कंठ मां
नटराज राज नमो नमः...
तवशक्ति वामांगे स्थिता
हे चंद्रिका अपराजिता
चंहु वेद गाए संहिता
नटराज राज नमोः...।
🙏हर-हर महादेव🙏

देवों के देव शिव के त्रिशूल का महत्व !


शिव का त्रिशूल जीवन के तीन मूल पहलुओं को दर्शाता है। योग परंपरा में उसे रुद्र, हर और सदाशिव कहा जाता है। ये जीवन के तीन मूल आयाम हैं, जिन्हें कई रूपों में दर्शाया गया है। उन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना भी कहा जा सकता है। ये तीनों प्राणमय कोष यानि मानव तंत्र के ऊर्जा शरीर में मौजूद तीन मूलभूत नाड़ियां हैं – बाईं, दाहिनी और मध्य। नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है। तीन मूलभूत नाड़ियों से 72,000 नाड़ियां निकलती हैं। इन नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं होता। यानी अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें नहीं खोज सकते। लेकिन जैसे-जैसे आप अधिक सजग होते हैं, आप देख सकते हैं कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह तय रास्तों से गुजर रही है। प्राण या ऊर्जा 72,000 विभिन्न रास्तों से होकर गुजरती है। इड़ा और पिंगला जीवन के बुनियादी द्वैत के प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का नाम देते हैं। या आप इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित कह सकते हैं, या यह आपके दो पहलू तर्क-बुद्धि और सहज-ज्ञान हो सकते हैं।

हर की पौड़ी पर शिव आराधना करते 
जीवन की रचना भी इसी के आधार पर होती है। इन दोनों गुणों के बिना, जीवन ऐसा नहीं होता, जैसा अभी है। सृजन से पहले की अवस्था में सब कुछ मौलिक रूप में होता है। उस अवस्था में द्वैत नहीं होता। लेकिन जैसे ही सृजन होता है, उसमें द्वैतता आ जाती है। पुरुषोचित और स्त्रियोचित का मतलब लिंग भेद से – या फिर शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री होने से – नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद कुछ खास गुणों से है। प्रकृति के कुछ गुणों को पुरुषोचित माना गया है और कुछ अन्य गुणों को स्त्रियोचित। आप भले ही पुरुष हों, लेकिन यदि आपकी इड़ा नाड़ी अधिक सक्रिय है, तो आपके अंदर स्त्रियोचित गुण हावी हो सकते हैं। आप भले ही स्त्री हों, मगर यदि आपकी पिंगला अधिक सक्रिय है तो आपमें पुरुषोचित गुण हावी हो सकते हैं। अगर आप इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बना पाते हैं तो दुनिया में आप प्रभावशाली हो सकते हैं। इससे आप जीवन के सभी पहलुओं को अच्छी तरह संभाल सकते हैं। अधिकतर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं, मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे अहम पहलू है। 
अवलोकन करें:-

शनिदेव का हनुमान और शिव जी के साथ सम्बन्ध


शनिदेव निष्पक्ष दण्डाधिकारी है। चाहे देव हों या असुर, मनुष्य हो या पशु सबको उनके कर्मो के आधार पर यह दण्ड देते हैं।
एक बार शनि ने शिव को भी नहीं छोड़ा :
कैलाश पर्वत पर एक दिन शिवजी विराजमान थे तभी शनिदेव उनके दर्शन करने आ गये।
अपने गुरु को प्रणाम करके शनिदेव ने बताया कि महादेव मुझे क्षमा करें , कल मैं आपकी राशि में प्रवेश करने वाला हूँ और मेरी वक्र दृष्टि से आप बच नहीं पायेंगे।
शिवजी जानकर हैरान हो गये कि उनका शिष्य अपने कर्म दंड के लिये उन्हें भी नहीं छोड़ रहा।
शिव जी ने शनिदेव से पूछा कि कितने समय तक उनको शनिदेव की वक्र दृष्टि का सामना करना पड़ेगा।
शनिदेव बोले कि उनकी दृष्टि कल सवा पहर तक रहेगी।
अगले दिन चिंतित महादेव सुबह ही धरती लोक पर चले गये और शनि से बचने के लिये हाथी का वेश बनाकर इधर उधर छिपते रहे।
जब दिन ढला गया तो पुनः शिव वेश में कैलाश आ गये। शिवजी मन ही मन खुश हो रहे थे कि उन्होंने आज शनिदेव को अच्छे से चकमा दे दिया।
शाम को शनि देव उनसे पुनः मिलने कैलाश आये।
शिवजी ने शनिदेव से कहा कि आज आपकी वक्र दृष्टि से तो बच गये हैं।
यह सुनकर शनि मुस्कुराये और बोले कि यह मेरी ही दृष्टि का प्रभाव था कि आज पूरे दिन आप हाथी बनकर धरती पर फिर रहे थे। आपको पशु योनि झेलनी पड़ी यह भी मेरा ही प्रभाव था।
यह सुनकर महादेव को शनि और भी प्यारे लगने लगे और कैलाश पर शनि देव के जयकारे लगने लगे।
हम मनुष्यों में शनिदेव का भय है क्योंकि यह मनुष्यों के अच्छे बुरे कर्मो का फल देते हैं।
कलियुग में पाप चरम पर है अत: हमारे द्वारा पाप भी अधिक होते है और शनिदेव इसका भुगतान करने आ जाते है। पर ऐसे शनिदेव भी ऐसे दो व्यक्तियों से भय खाते हैं।
धार्मिक शस्त्रों के अनुसार शनिदेव एक तो शिव के ग्यारवें अवतार हनुमानजी से डरते हैं और दूसरे ऋषि पिप्लाद से।
हनुमानजी की तरह ही ऋषि पिप्लाद को भी भगवान शिव का अवतार माना जाता है। ऋषि पिप्लाद के जन्म लेते ही शनिदेव की उन पर दशा पड़ गयी और इसी कारण उन्हें बचपन में ही अनाथ होना पड़ा।
यह बात उन्हें जब पता चली तो उन्हें शनिदेव पर अत्यधिक क्रोध आया और उन्होंने प्रतिशोध लेने की भावना से ब्रह्मा जी की पूजा और तपस्या की। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा ।
पिप्लाद ने शनि को सबक सिखाने के लिये ब्रह्मदंड मांग लिया और शनिदेव को खोजने लगे।
एक पीपल के पेड़ पर उन्हें शनिदेव दिखाई दिये और उन्होंने आव देखा ना ताव सीधे उन्हें पैर पर हमला कर दिया। इसकी कारण शनि अपंग हो गये। उन्होंने शनि को ही उनकी करनी का दंड दे दिया। इसी कारण शनि आज भी पिप्लाद से भय खाते हैं।
पिप्लाद का जन्म पीपल के वृक्ष के नीचे हुआ था और उन्होंने इसी पीपल के पेड़ के नीचे ब्रह्माजी की तपस्या की और इसी पीपल के पत्ते भी खाये।
अत: उनके जीवन पर पीपल के वृक्ष का अधिक प्रभाव रहा है। शनिवार शनि और हनुमान जो दोनों का वार है और पीपल का वृक्ष पिप्लाद की याद दिलाता है अत: इस दिन पीपल की पूजा करने से शनि का प्रकोप कम हो जाता है ।
सार

इस कथा का सार है कि मनुष्य को बुरे कर्मों से डरना चाहिए, लेकिन लोग बुरे कर्मों का त्याग न करके दंडाधिकारी का डर मन में रखते हैं और उस डर के कारण वे डर और पाप दोनों का फल भोगते हैं। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अब्दुल की याचिका ख़ारिज कर, कहा- ‘गाय बेहद पवित्र, गौहत्या करने वाले नरक में सड़ते हैं’: गोवंश को संरक्षित राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए

उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच (Allahabad High Court) ने 3 मार्च 2023 को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि देश में गोहत्या रोकने (Ban on Cow Slaughter) के लिए केंद्र सरकार को प्रभावी कदम उठाना चाहिए। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने गाय को संरक्षित राष्ट्रीय पशु घोषित करने की जरूरत बताई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति शमीम अहमद की एकल पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि गाय की महिमा वैदिक काल से चली आ रही है। इसके साथ ही न्यायमूर्ति शमीम ने बाराबंकी के देवा थाना क्षेत्र के मोहम्मद अब्दुल खलीक की याचिका खारिज कर दी। खलीक को पुलिस ने गोवंश के मांस के साथ गिरफ्तार किया था और उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश गोवध निवारण कानून के तहत आरोप था।

कोर्ट ने कहा, “आशा है कि केंद्र सरकार देश में गोहत्या रोकने के लिए उचित निर्णय लेगी और इसे संरक्षित राष्ट्रीय जीव घोषित करेगी।” कोर्ट ने आगे कहा, “गाय को हिंदू धर्म में सभी जानवरों में सबसे पवित्र माना गया है। इसे कामधेनु या दिव्य गाय और सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाली के रूप में जाना जाता है।”

न्यायमूर्ति शमीम ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में हिन्दुओं की वर्षो से चल रही गाय हत्या पर प्रतिबन्ध लगाए जाने की मांग को एक नई ऊर्जा प्रदान कर सरकार को इस गंभीर मुद्दे पर मंथन करने को विवश कर दिया है।  

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाय को भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा बताते हुए कहा, “हम एक धर्मनिरपेक्ष देश में रह रहे हैं और सभी धर्मों के लिए सम्मान होना चाहिए। हिंदू धर्म का यह मत है कि गाय दैवीय और प्राकृतिक भलाई की प्रतिनिधि है। इसलिए इसकी रक्षा और पूजा की जानी चाहिए।”

पुराणों और महाभारत आदि ग्रंथों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा, “पुराण कहते हैं कि गायों के दान/उपहार से अधिक धार्मिक और कुछ भी नहीं है। भगवान राम के विवाह में भी गायों को उपहार के रूप में दिया गया था। महाभारत में भीष्म पितामह का मानना है कि गाय जीवन भर मानव को दूध प्रदान करके एक सरोगेट माँ के रूप में कार्य करती है। इसलिए वह वास्तव में दुनिया की माँ है।”

गाय के महत्व को बताते हुए हाईकोर्ट ने आगे कहा, “किंवदंतियों में यह भी कहा गया है कि ब्रह्मा ने एक ही समय में पुजारियों और गायों को जीवन दिया, ताकि पुजारी धार्मिक ग्रंथों का पाठ कर सकें और गाय अनुष्ठानों के लिए प्रसाद के रूप में घी दे सकें।” कोर्ट ने कहा कि गाय के चारों पैरों को चार वेद कहा गया है।

कोर्ट ने आगे कहा, “जो कोई भी गायों को मारता है या दूसरों को मारने की अनुमति देता है, माना जाता है कि उसे तब तक नरक में सड़ता रहेगा जब तक कि उसके शरीर पर बाल हैं। इसी तरह बैल को भगवान शिव के वाहन के रूप में दर्शाया गया है। यह नर मवेशियों के सम्मान का प्रतीक है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि गाय को अन्य देवताओं के साथ भी जोड़ा गया है, विशेष रूप से भगवान शिव, भगवान इंद्र, भगवान कृष्ण और देवी (कई के मातृ गुणों के कारण) के साथ। कोर्ट ने कहा कि हिंदू धर्म में गाय को सबसे पवित्र जानवर माना गया है। कोर्ट ने कहा कि गोवंश का वैदिक काल से लेकर मनुस्मृति, महाभारत, रामायण में वर्णित धार्मिक महत्व के साथ ही व्यापक अर्थिक महत्व भी है। गाय से मिलने वाले पदार्थों से पंचगव्य तक बनता है।

इसके पहले सितंबर 2021 में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाय को संरक्षित राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव दिया था। उस वक्त विश्व हिंदू परिषद ने स्वागत किया था। वीएचपी (VHP) के अंतराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा था कि गाय सदियों से गाय इस देश की प्राणवायु की तरह रही है। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को न्यायाधीश के सुझाव का पालन करते हुए गोहत्या पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

शारदापीठ- जहाँ गिरा था देवी सती का दायाँ हाँथ


1947 में जब भारत आजाद हुआ था तब जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल था 2,22,236 वर्ग किलोमीटर जिसमें से चीन और पाकिस्तान ने मिलकर लगभग आधे जम्मू-कश्मीर पर कब्ज़ा किया हुआ है और भारत वर्ष के पास केवल 1,02,387 वर्ग किलोमीटर कश्मीर भूमि शेष है।

जम्मू-कश्मीर के जो भाग आज हमारे पास नहीं हैं उनमें से गिलगिट, बाल्टिस्तान, बजारत, चिल्लास, हाजीपीर आदि हिस्से पर पाकिस्तान का सीधा शासन है और मुज़फ्फराबाद, मीरपुर, कोटली और छंब आदि इलाके हालांकि स्वायत्त शासन में हैं परंतु ये इलाके भी पाक के नियंत्रण में हैं।

पाक नियंत्रण वाले इसी कश्मीर के मुज़फ्फराबाद जिले की सीमा के किनारे से पवित्र "कृष्ण-गंगा" नदी बहती है। कृष्ण-गंगा नदी वही है जिसमें समुद्र मंथन के पश्चात् शेष बचे अमृत को असुरों से छिपाकर रखा गया था और उसी के बाद ब्रह्मा जी ने उसके किनारे माँ शारदा का मंदिर बनाकर उन्हें वहां स्थापित किया था। 

जिस दिन से माँ शारदा वहां विराजमान हुई उस दिन से ही सारा कश्मीर "नमस्ते शारदादेवी कश्मीरपुरवासिनी / त्वामहंप्रार्थये नित्यम् विदादानम च देहि में" कहते हुये उनकी आराधना करता रहा है और उन कश्मीरियों पर माँ शारदा की ऐसी कृपा हुई कि आष्टांग योग और आष्टांग हृदय लिखने वाले वाग्भट वहीं जन्में,नीलमत पुराण वहीं रची गई,चरक संहिता, शिव-पुराण, कल्हण की राजतरंगिणी, सारंगदेव की संगीत रत्नकार सबके सब अद्वितीय ग्रन्थ वहीं रचे गये, उस कश्मीर में जो रामकथा लिखी गई उसमें मक्केश्वर महादेव का वर्णन सर्व-प्रथम स्पष्ट रूप से आया। शैव-दार्शनिकों की लंबी परंपरा कश्मीर से ही शुरू हुई। चिकित्सा, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, दर्शन, विधि, न्यायशास्त्र, पाककला, चित्रकला और भवनशिल्प विधाओं का भी प्रसिद्ध केंद्र था कश्मीर क्योंकि उसपर माँ शारदा का साक्षात आशीर्वाद था। ह्वेनसांग के अपने यात्रा विवरण में लिखा है शारदा पीठ के पास उसने ऐसे-ऐसे विद्वान् देखे जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई इतना भी विद्वान् हो सकता है। शारदापीठ के पास ही एक बहुत बड़ा विद्यापीठ भी था जहाँ दुनिया भर से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे।

माँ शारदा के उस पवित्र पीठ में न जाने कितने सहस्त्र वर्षों से हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन एक विशाल मेला लगता था जहाँ भारत के कोने-कोने से वाग्देवी सरस्वती के उपासक साधना करने आते थे। भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि को शारदा अष्टमी इसीलिये कहा जाता था। शारदा तीर्थ श्रीनगर से लगभग सवा सौ किलोमीटर की दूरी पर बसा है और वहां के लोग तो पैदल माँ के दर्शन करने जाया करते थे। 

शास्त्रों में एक बड़ी रोचक कथा मिलती है कि कथित निम्न जाति के एक व्यक्ति को भगवान शिव की उपासना से एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम उस दम्पति ने शांडलि रखा। शांडलि बड़े प्रतिभावान था। उनसे जलन भाव रखने के कारण कुछ लोगों ने उनका यज्ञोपवित संस्कार करने से मना कर दिया। निराश शांडलि को ऋषि वशिष्ठ ने माँ शारदा के दर्शन करने की सलाह दी और उनके सलाह पर जब वो वहां पहुँचे तो माँ ने उन्हें दर्शन दिया उन्हें नाम दिया ऋषि शांडिल्य। आज हिन्दुओं के अंदर हरेक जाति में शांडिल्य गोत्र पाया जाता है।

हिन्दू धर्म का मंडन करने निकले शंकराचार्य जब शारदापीठ पहुँचे थे तो वहां उन्हें माँ ने दर्शन दिया था और हिन्दू जाति को बचाने का आशीर्वाद भी। उन्हीं माँ शारदा की कृपा से कश्मीर के शासक जैनुल-आबेदीन का मन बदल गया था जब वो उनके दर्शनों के लिये वहां गया था और उसने कश्मीर में अपने बाप सिकंदर द्वारा किये हर पाप का प्रायश्चित किया। इतिहास की किताबों में आता है कि माँ शारदा की उपासना में वो इतना लीन हो जाता था कि उसे दुनिया की कोई खबर न होती थी।

भारत के कई हिस्सों में जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो बटु को कहा जाता है कि तू शारदा पीठ जाकर ज्ञानार्जन कर और सांकेतिक रूप से वो बटुक शारदापीठ की दिशा में सात कदम आगे पढ़ता है और फिर कुछ समय पश्चात् इस आशय से सात कदम पीछे आता है कि अब उसकी शिक्षा पूर्ण हो गई है और वो विद्वान् बनकर वहां से लौट आ रहा है। 

एक समय था जब ये सांकेतिक संस्कार एक दिन वास्तविकता में बदलता था क्योंकि वो बटुक शिक्षा ग्रहण करने वहीं जाता था मगर आज दुर्भाग्य से हमारी "माँ शारदा" हमारे पास नहीं है और हम उनके पास जायें ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है तो शायद अब यज्ञोपवीत की ये रस्म सांकेतिक ही रह जायेगी सदा के लिये।

हमको शारदापीठ की मुक्ति चाहिये, हमको शारदा पीठ तक जाना है, हमें दुनिया को बताना है कि "केवल शारदा संस्कृति ही कश्मीरियत" है और इसलिये शारदापीठ पर भारत का पूर्ण नियंत्रण हो ऐसी मांग उठाइये और जब तक ये नहीं होता कम से कम तब तक करतारपुर साहिब कॉरिडोर की तर्ज़ पर "शारदादेवी कॉरिडोर" अविलम्ब आरंभ हो इसकी मांग कीजिये।

उत्तर प्रदेश : मेढक मन्दिर के नाम से चर्चित देवों के देव महादेव का मन्दिर


भगवान शिव सबके प्रिय है चाहे भूत पीशाच ही क्यों न हो, वे हमेशा सर्पों से घिरे रहते हैं। 
उनके मंदिर में नंदी भी विराजमान रहते हैं। लेकिन दुनिया का एक ऐसा इकलौता मंदिर भी है जहां भगवान शिव के साथ मेंढक का भी वास है।
जी हां, शिव जी का एक मंदिर ऐसा भी है, जिसकी रक्षा बरसाती मेंढक करता है। हैरानी की बात ये है कि इस मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा करने की सख्त मनाही है और मंदिर के आस पास रहने वाले लोग भी श्री हरी विष्णु की आराधना करने से कतराते है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के ओयल गाँव में है ये मंदिर और इस मंदिर की खासियत ये है कि मंदिर के बाहर एक विशालकाय मेढ़क की मूर्ति बनी हुई है।
गांव के लोंगों का मानना है कि ये मूर्ति कोई आम मूर्ति नहीं है बल्कि भगवान शिव की रक्षा करने वाली मूर्ति है। इस मंदिर में रोजाना भगवान शिव के साथ साथ इस बरसाती मेढ़क की भी पूजा होती है। यहां पर लोग पूजा करने के लिए दूर से भी आते है।
इस मंदिर के बारे में वैसे तो कई सारी मान्यताएं है कि इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति इस मेढ़क पर सवार है जो कि देखने में बहुत ही वास्तविक लगती है।
इस अद्भुत मंदिर के चर्चे काफी दूर दूर तक है। इसके दर्शन करने से गांव वालों के दुख दूर हो जाते है. ऐसा गांव वालों का मानना है।
इस मंदिर में भगवान शिव का मंदिर होने के बावजूद इस मंदिर को शिव मंदिर के नाम से कोई नहीं जानता है। जीं हां इस मंदिर को मेढ़क मंदिर के नाम से जाना है। इस वजह से ही इस मंदिर को खास कहा जाता है।
इस मंदिर को पूजने वाले लोग शिव को पूजते है क्योंकि वो शिव को अपना आराध्य मानते है। तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु संरचना अपनी विशेष शैली के कारण मनमोह लेती है।
इसी कारण ये मंदिर औरों से अलग है। इस मंदिर को वास्तु को ध्यान में रखते हुए स्थापित किया गया है।

भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों होती है?


शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। 
वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं।
शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र:
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है।
सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
कब लांघ सकते हैं
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है, लेकिन ‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
अवलोकन करें:-
‘ॐ नमः शिवाय’ बोलने का महत्व
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‘ॐ नमः शिवाय’ बोलने का महत्व
ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है सत्यम शिवम् सुन्दरम, सत्यम शिवम्
किस ओर से परिक्रमा करे
भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।(पौराणिक कथाओं पर आधारित)