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कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे प्रियांक खरगे ने गुजरात और असम के लोगों के खिलाफ की नस्लवादी टिप्पणी, कहा- इन राज्यों में नहीं है कोई ‘प्रतिभा’ और ‘इकोसिस्टम’

आखिर कांग्रेस कब तक भेदभाव कर जनता को गुमराह करती रहेगी? क्या कांग्रेस को मिट्टी में मिलाने का समय आ गया है? बाप मल्लिकार्जुन सनातन के विरुद्ध बोलता है तो बेटा प्रियांक राज्यों के विरुद्ध। क्या इस तरह की जहरीली मानसिकता से कांग्रेस को एकजुट रख सकती है या देश को तोड़ने का षड़यंत्र कर रही है? क्या इस तरह की जहरीली विभाजनकारी बोली बोलकर गाँधी परिवार के प्रति अपनी अंधभक्ति दिखाई जा रही है?  
गुजरात और असम में स्थापित सेमीकंडक्टर संयंत्र इस साल के अंत तक सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन शुरू कर देंगे। कांग्रेस इसे नहीं पचा पा रही है। कर्नाटक के ग्रामीण विकास मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने एक बार फिर इन संयंत्रों पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि भाजपा ने कर्नाटक से ये संयंत्र ‘छीन’ लिए हैं। इन संयंत्रों का वे पहले भी विरोध कर चुके हैं। रविवार(अक्टूबर 26) को उन्होंने नस्लवादी टिप्पणी की और कहा कि गुजरात और असम में सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए कोई ‘प्रतिभा’ नहीं है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र प्रियांक खड़गे ने सवाल उठाया कि क्या इन राज्यों में प्रतिभाओं का भंडार है? उन्होंने मोदी सरकार पर कर्नाटक से सेमीकंडक्टर निवेश हटाने का आरोप लगाया। शनिवार(अक्टूबर 25) को बेंगलुरु में पत्रकारों को संबोधित करते हुए, खड़गे ने केंद्र से उद्योगों को गुजरात और असम की ओर कथित तौर पर ‘ठेलने’ को लेकर स्पष्टीकरण माँगा। उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक या तमिलनाडु को प्राथमिकता देने के बावजूद उद्योगपतियों को वहाँ भेजा जा रहा है।

खड़गे ने कहा, “सेमीकंडक्टर उद्योग जब बेंगलुरु आना चाहते हैं, तो असम और गुजरात क्यों जा रहे हैं? मैंने यह मुद्दा पहले भी उठाया है। कर्नाटक में आने वाला सारा निवेश केंद्र सरकार गुजरात जाने के लिए मजबूर कर रही है। गुजरात में क्या है? क्या वहाँ प्रतिभा है? असम में क्या है? क्या वहाँ प्रतिभा है?” उन्होंने आगे कहा, “जब उद्योगपति आवेदन दे रहे हैं कि वे कर्नाटक या तमिलनाडु आना चाहते हैं, तो उन्हें गुजरात क्यों भेजा जा रहा है?”

खड़गे की टिप्पणियों को अपमानजनक और विभाजनकारी करार देते हुए निंदा की गई है। असम के मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस पर असम से नफरत करने का आरोप लगाया। उन्होंने एक्स पर लिखा, “कांग्रेस हमेशा से असम की प्रगति से नफरत करती रही है। जब भी राज्य एक कदम आगे बढ़ता है, कांग्रेस उसे पीछे खींचने की कोशिश करती है!” उन्होंने इसे हर मेहनती असमिया युवा का घोर अपमान बताया।

असम बीजेपी के एक अन्य नेता और मंत्री पीयूष हजारिका ने कहा कि खड़गे की टिप्पणी आश्चर्यजनक नहीं है, और यही कांग्रेस का असली चेहरा है। उन्होंने कहा, “एक ऐसी पार्टी जिसने हमेशा असम और पूर्वोत्तर को हीन माना है, हमारी क्षमता को नजरअंदाज किया है और हमारे विकास में बाधा डाली है। इस क्षेत्र के प्रति उनका तिरस्कार इतिहास में गहराई तक समाया हुआ है और आज उनके शब्द इसकी पुष्टि ही करते हैं।”

हजारिका ने यह भी याद दिलाया कि खड़गे के पिता मल्लिकार्जुन खड़गे ने असम के महानतम नेताओं में से एक डॉ. भूपेन हजारिका को भारत रत्न दिए जाने का विरोध किया था। इससे पता चलता है कि खरगे परिवार में असम विरोधी भावनाएँ अंदर तक समाई हुई हैं।

यह पहली बार नहीं है जब खड़गे ने भारत के उभरते सेमीकंडक्टर उद्योग को कुछ राज्यों स्थापित करने के बजाए, देशभर में लगाए जाने का विरोध किया हो। पिछले साल सितंबर में, उन्होंने कहा कि स्किल का कोई इकोसिस्टम नहीं होने के बावजूद गुजरात को 4 और असम को 1 सेमीकंडक्टर इकाइयाँ मिलीं।

उन्होंने ट्वीट किया था, “पाँच सेमीकंडक्टर निर्माण इकाइयाँ, जिनमें से चार गुजरात में और एक असम में हैं, लेकिन वहाँ स्किल का कोई इकोसिस्टम नहीं है। उनके पास अनुसंधान का कोई परिस्थिति की तंत्र नहीं है। उनके पास इनक्यूबेशन का कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है। उनके पास नवाचारों का कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है…जब चिप डिज़ाइनिंग की 70% प्रतिभा कर्नाटक में है, तो मुझे समझ नहीं आता कि सरकार राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्हें दूसरे राज्य में क्यों धकेलना चाहती है। यह अनुचित है।”

इस पोस्ट पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर असम के विकास का विरोध करने का आरोप लगाया।

सरमा ने X पर लिखा, “एक बार फिर, कांग्रेस असम के विकास का विरोध करके अपना असली रंग दिखा रही है। कर्नाटक के मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे प्रियांक खरगे ने दावा किया है कि असम को सेमीकंडक्टर उद्योग स्थापित करने का कोई अधिकार नहीं है! मैं असम के कांग्रेस नेताओं से आग्रह करता हूँ कि वे इस विभाजनकारी सोच को खारिज करें और असम के उचित विकास और प्रगति के लिए खड़े हों।”

गौरतलब है कि देश में कई कंपनियाँ अपने सेमीकंडक्टर संयंत्र विकसित कर रही हैं। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स गुजरात के धोलेरा में एक चिप निर्माण इकाई स्थापित कर रही है। कंपनी असम के जगीरोड में एक सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण सुविधा भी स्थापित कर रही है।

इसके अलावा, माइक्रोन टेक्नोलॉजी गुजरात के साणंद में एक सेमीकंडक्टर इकाई स्थापित कर रही है, सीजी पावर गुजरात के साणंद में एक इकाई स्थापित कर रही है, केन्स सेमीकॉन भी साणंद में एक संयंत्र स्थापित कर रही है, और एचसीएल, फॉक्सकॉन के साथ साझेदारी कर उत्तर प्रदेश के जेवर में एक सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित करने की योजना बना रही है।

सेमीकंडटर संयंत्र केवल गुजरात और असम में स्थापित नहीं किए जा रहे हैं, बल्कि ये महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भी स्थापित किए जा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस नेता असम और गुजरात को ही टारगेट क्यों कर रहे हैं, ये ध्यान देने वाली बात है।

कर्नाटक कांग्रेस में नाटक: ढाई साल के फॉर्मूले पर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार आमने-सामने, उधर बेटे को मुख्यमंत्री बनाने को खरगे का ‘मास्टर प्लान’


कर्नाटक में कांग्रेस का नाटक राजस्थान की राह पर चल निकला है। सरकार के खिलाफ कांग्रेस के विधायकों में ही असंतोष लगातार बढ़ रहा है। विधायक दो धड़ों में बंट गए हैं और इसके चलते जनता के काम नहीं हो पा रहे हैं। दरअसल, गहलोत-पायलट की तरह कर्नाटक में भी ढाई साल के फार्मूले को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी 
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार आमने-सामने आ गए हैं। इस राजनीतिक संग्राम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि राजस्थान में जहां मल्लिकार्जुन खरगे लड़ाई को खत्म कराने के लिए हाईकमान के दूत बनकर आए थे, वहीं कर्नाटक में उनकी तमन्ना है कि कांग्रेसियों के बीच की यह लड़ाई और तेज हो जाए। सियासत की यह अदावत इतनी बढ़ जाए कि उसमें खरगे के पुत्र को मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता निकल आए। पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स मानते हैं कि खरगे अपने बेटे प्रियांक खरगे को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में लाना चाहते हैं, इसलिए वो सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच लड़ाई को अपरोक्ष रूप से बढ़ाए रखना चाहते हैं।

विवाद की जड़ कांग्रेस हाईकमान का ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला

बेंगलुरु के नंदी हिल्स में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जुलाई के शुरू में बयान देकर सरकार के अंदर चल रहे तूफान को शांत करने की असफल कोशिश थी। सीएम को सार्वजनिक तौर पर सफाई इसलिए देनी पड़ी, क्योंकि कर्नाटक की सियासत में पिछले कई दिनों से चर्चा है कि प्रदेश कांग्रेस दो खेमों में बंट गई है। इस बंटवारे का सेंटर पॉइंट कोई और नहीं, बल्कि खुद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ही हैं। दोनों पार्टी लीडर्स के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान चल रही है। विवाद की जड़ ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला बताया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ये कहकर दोनों खेमों को शांत कर दिया है कि फैसला हाईकमान करेंगे। 

बिहार में चुनाव का डर, मुख्यंमंत्री बदला तो पार्टी में कलह बढ़ेगी
कर्नाटक के सियासी हलकों में इसकी भी पुरजोर चर्चा है कि ढाई साल नवंबर में पूरे हो रहे हैं। उसी वक्त बिहार में विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस को डर है कि मुख्यमंत्री बदलने से पार्टी में कलह बढ़ सकती है। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान शायद ही इतना बड़ा फैसला ले। लेकिन अगर मुख्यमंत्री नहीं बदला गया तो भी पार्टी में मतभेद सड़क पर आ सकते हैं। शिवकुमार का गुट दबाव बना रहा है, इसलिए कांग्रेस की स्थिति इधर गिरे तो कुआं, उधर गिरे से खाई वाली हो रही है। दरअसल, काफी समय से कई नेता सिद्धारमैया के खिलाफ बयान दे रहे हैं। ये बयानबाजी नवंबर में होने वाले कैबिनेट फेरबदल को लेकर है। नाराज विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करने की कोशिश हो रही है। कई विधायक आखिरी चुनाव लड़ रहे हैं। वे मंत्री बनना चाहते हैं। इसलिए बयानबाजी कर मंत्रियों को निशाना बना रहे हैं।‘

चुनाव के बाद भी हुई थी सिद्धारमैया और डीके के बीच मुख्यमंत्री बनने की जंग

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कर्नाटक की राजनीति में सब कुछ ठीक चल रहा है? पार्टी के बड़े लीडर अलग-अलग राह पर हैं? क्या ढाई साल का फॉर्मूला असल में लागू होगा? इन सवालों का जवाब जानने के लिए सबसे पहले समझते हैं कि विवाद कहां से शुरू हुआ। दरअसल, जो ढाई साल का फॉर्मूला कभी समाधान बना था, वही अब कांग्रेस हाईकमान के लिए चुनौती बनता जा रहा है। मई 2023 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 224 में से 135 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी। इससे देशभर में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को कुछ ऑक्सीजन मिली थी। जीत के बाद सरकार बनाने की बारी आई तो स्थिति राजस्थान जैसी बन गई। यहां भी दो प्रमुख नेता मुख्यमंत्री पद के रूप में सामने आए। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री बनने की जंग चली। लेकिन राहुल गांधी ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बना दिया। वे पहले भी 5 साल तक मुख्यमंत्री रह चुके थे। डीके शिवकुमार डिप्टी सीएम बनाए गए। वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं। संगठन में उनकी पकड़ और चुनाव प्रचार में भूमिका को जीत की बड़ी वजह माना गया।

अशोक गहलोत की तरह सिद्धारमैया के भी अड़ने से पेंच फंसा

यह माना जाता है कि 2023 में सरकार बनने के वक्त कांग्रेस आलाकमान, सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर सहमति बनी थी। पहले ढाई साल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया रहेंगे। इसके बाद ये कुर्सी डीके शिवकुमार संभालेंगे। शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा, लेकिन कुछ ही महीनों बाद सरकार में मतभेद उभरने लगे। अब दोनों के समर्थक खुलकर सामने आने लगे हैं, क्योंकि अब ये ढाई साल की समय सीमा नजदीक है। लिहाज दोनों नेताओं के बीच शीत-युद्ध के साथ -साथ समर्थक विधायक के आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो चुके हैं। हालांकि, इस फॉर्मूले को लेकर कभी कोई ऑफिशियल ऐलान नहीं हुआ। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने कभी भी इसे पूरी तरह नकारा भी नहीं। माना गया कि यह फार्मूला राजस्थान का है, वहां लागू नहीं हुआ, लेकिन कर्नाटक में कराएंगे। लेकिन गहलोत की तरह सिद्धारमैया के अड़ने से पेंच फंस गया है।

सीएम बदलने के वादे से मुकरने के लिए मशहूर है कांग्रेस हाईकमान

अब डिप्टी मुख्यमंत्री शिवकुमार का खेमा इस फॉर्मूले को पक्का वादा मान रहा है। उनका कहना है कि अब नेतृत्व परिवर्तन होना ही चाहिए। दरअसल, कांग्रेस ने जब कर्नाटक में सरकार बनाई, तब सिद्धारमैया ने उम्र का हवाला देकर पहले दो साल की मांग की थी। शिवकुमार ने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने राजस्थान और छत्तीसगढ़ का उदाहरण दिया, जहां ऐसे वादे पूरे नहीं हुए। शिवकुमार चाहते थे कि उन्हें पहला कार्यकाल मिले, चाहे वो दो साल का हो या तीन साल का। वहीं सिद्धारमैया के समर्थक इसे तब की सिर्फ एक राजनीतिक जरूरत बताते हैं, जो अब बदल चुकी है। दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर फैसले जटिल होते हैं। राहुल गांधी की लीडरशिप में केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका अहम होती है। सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं को ही देख लीजिए। इन्हें वादा तो मिला, लेकिन पद नहीं। अब ये फॉर्मूला सिर्फ समझौता नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव बन गया है। वे कहते हैं, ‘शिवकुमार के समर्थक इसे वादे की पूर्ति मानते हैं, न कि बगावत। इससे आलाकमान पर दबाव बढ़ गया है। एक पक्ष का समर्थन करने पर दूसरा नाराज हो सकता है। 

कांग्रेस के विधायकों ने अपनी ही सरकार में बताया भ्रष्टाचार-कुशासन
कर्नाटक के रामनगर से विधायक इकबाल हुसैन ने सबसे पहले नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि अगले दो-तीन महीने में डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बन सकते हैं। उन्होंने ये भी दावा किया कि 138 में से 100 से ज्यादा विधायक शिवकुमार के साथ हैं। ये मांग किसी की निजी महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि कांग्रेस के भविष्य और संगठन की मजबूती के लिए है। हुसैन ने कहा कि 2023 की जीत शिवकुमार की मेहनत और रणनीति का नतीजा थी। अब उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस बयान से सिद्धारमैया खेमे में हलचल मच गई। इसी बीच कांग्रेस विधायक बीआर पाटिल का एक ऑडियो क्लिप वायरल हुआ। वे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर तीखा हमला करते हुए कहते हैं, सिद्धारमैया किस्मत से मुख्यमंत्री बने हैं। मैंने ही उन्हें सोनिया गांधी से मिलवाया था। उनके ग्रह अच्छे थे, इसलिए सीएम बन गए। पार्टी में उनका कोई गॉडफादर नहीं है। इतना ही नहीं पाटिल ने कांग्रेस सरकार के आवास विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकारी आवास उन्हीं को मिले, जिन्होंने मोटी घूस दी।

सिद्धारमैया की लकी लॉटरी निकली, शिवकुमार की सेफ स्ट्रैटजी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस विधायक बीआर पाटिल ने कांग्रेस के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला से मिलकर सिद्धारमैया के खिलाफ सबूत भी सौंपे हैं। कई अन्य विधायकों ने भी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। कागवाड के विधायक राजू कागे ने विकास कार्यों में देरी और फंड न मिलने पर नाराजगी जताई। उन्होंने यहां तक आरोप लगाए कि कुछ मंत्रियों में इतना घमंड है कि वो मिलने तक को तैयार नहीं होते। वोटर्स को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने विधायक पद से इस्तीफे की चेतावनी भी दी है। सिद्धारमैया ने इन आरोपों पर बोलती बंद है। उन्होंने डिफेंसिव रुख अपनाया है। बीआर पाटिल के ‘लकी लॉटरी’ वाले बयान पर तंज कसते हुए बोले- हां, मैं मुख्यमंत्री हूं, इसलिए भाग्यशाली हूं। अगर उन्होंने ऐसा कहा है, तो मैं क्या करूं? उधर डी.के. शिवकुमार ने सेफ स्ट्रैटजी अपनाई। नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे विधायकों से शिवकुमार ने अनुशासन की बात कही। दरअसल, शिवकुमार का ये रुख कांग्रेस आलाकमान को संदेश देने की कोशिश है कि वो अनुशासित नेता हैं। वहीं, उनके समर्थक पर्दे के पीछे से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में जुटे हैं।

कर्नाटक : सुधीर चौधरी ने पूछा ‘सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए क्यों’ तो दर्ज हुई FIR: मंत्री प्रियांक खड़गे ने दी धमकी, मोहम्मद ज़ुबैर की स्व-घोषित ‘फैक्ट चेक’ ने किया गुमराह

                                     प्रियांक खरगे, सुधीर चौधरी और फेक न्यूज पेडलर मोहम्मद जुबैर
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार एक नए विवाद में फँस गई है। इसकी शुरुआत 8 सितंबर 2023 को हुई, जब भाजपा नेता तेजस्वी सूर्या और केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक अखबार में छपे विज्ञापन की कटिंग शेयर की। इस विज्ञापन में कर्नाटक सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही योजना के बारे में जानकारी दी गई थी।

इस विज्ञापन को देखकर ये लगता है कि इसे सरकार ने नहीं, बल्कि एआर-रहीम ट्रस्ट नाम के किसी निजी संगठन की ओर से दिया गया था। इसे कर्नाटक अल्पसंख्यक विकास निगम लिमिटेड की ओर से जारी किया गया है। इस विज्ञापन को लेकर ही कर्नाटक की कांग्रेस सरकार सवालों के घेरे में आ गई है।

केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर द्वारा साझा किए गए विज्ञापन में बताया गया है कि कर्नाटक सरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को टैक्सी, ऑटो और मालवाहक वाहन खरीदने के लिए 50 प्रतिशत की सब्सिडी दे रही है। बता दें कि स्वावलंबी सारथी योजना पिछले महीने कर्नाटक सरकार के आवास एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमीर अहमद खान ने शुरू की थी।

केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि यह योजना विशेष रूप से गैर-हिंदुओं के लिए है। यहाँ तक ​​कि आर्थिक रूप से गरीब हिंदू समुदायों को भी इससे बाहर रखा गया है। मंत्री ने इसे खुलेआम भेदभाव और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया है।

चंद्रशेखर ने कहा कि इसी पार्टी के नेता विदेश जाकर देश के संविधान के खतरे में होने की बात करते हैं। उन्होंने इसे ‘राज्य प्रायोजित धर्मांतरण प्रलोभन’ कहा। उन्होंने इस योजना को ‘कर्नाटक में राहुल गाँधी की कांग्रेस द्वारा कुछ समुदायों को रिश्वत देने की बेशर्म नीति और तुष्टिकरण की राजनीति का उदाहरण बताया।

                                                   एआर-रहीम ट्रस्ट द्वारा दिया गया विज्ञापन

चन्द्रशेखर ने कहा, “सभी कन्नडिगाओं के लिए निर्धारित सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करके एक समुदाय को बेशर्मी से रिश्वत देकर भेदभाव और संविधान की धारा 14 का उल्लंघन किया जा रहा है। धर्मांतरण के लिए राज्य-प्रायोजित प्रलोभन है ये। यह यूपीए/I.N.D.I गठबंधन के वंशवादियों की तुष्टिकरण और भ्रष्ट राजनीति है।”

8 सितंबर को ही AltNews के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने राजीव चंद्रशेखर और तेजस्वी सूर्या की पोस्ट का ‘फैक्ट चेक’ करने की कोशिश की। यहाँ ध्यान रखना जरूरी है कि AltNews और मोहम्मद जुबैर ऑफिशियली खबरों के ‘फैक्ट चेक’ के लिए कर्नाटक सरकार के साथ साझेदारी कर रही है। यह जानकारी कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे दे चुके हैं।

मोहम्मद जुबैर ने राजीव चन्द्रशेखर और तेजस्वी सूर्या के पोस्ट का फैक्ट चेक करने के चक्कर में कुछ दावे भी किए, जिसमें-

1-जुबैर ने दावा किया कि दोनों नेता इस योजना का सांप्रदायिकरण कर रहे हैं और यह योजना एससी/एसटी के लिए भी उपलब्ध है।
2- इस योजना में SC/ST को 75% या अधिकतम 4 लाख तक की सब्सिडी राशि मिल सकती है।
3- अल्पसंख्यक 50% या अधिकतम 3 लाख तक की सब्सिडी राशि के लिए पात्र हैं।
3- भाजपा के तहत भी ऐसी ही योजना थी, इसलिए चंद्रशेखर और सूर्या गलत सूचना फैला रहे थे।

चूँकि जुबैर को अपने हिसाब से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपना एजेंडा चलाने की पुरानी आदत है, उसने इस मामले में भी ऐसा ही किया। उसने अपनी बात साबित करने के लिए 2 स्क्रीनशॉट्स शेयर किए। जुबैर ने ‘डिस्ट्रिक्टइंफो‘ वेबसाइट के स्क्रीनशॉट्स को आधिकारिक जानकारी के तौर पर शेयर किया, जबकि वो वेबसाइट निजी है, जिसका सरकार से कोई लेना देना ही नहीं है।

डिस्ट्रिक्ट इंफो वेबसाइट का अबाउट अस सेक्शन, जो ये बताता है कि वेबसाइट थर्ड पार्टी से मिली जानकारियाँ साझा करती है।

जुबैर ने जिस आर्टिकल का इस्तेमाल अपने फैक्ट चेक में किया, वो 19 अगस्त 2023 को पब्लिश हुआ था, कर्नाटक सरकार के सत्ता में आने के ठीक बाद। ये अलग बात है कि उस दिन उस वेबसाइट के एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से एयर फ्रायर और इंडक्शन पर इस्तेमाल होने वाले बर्तनों के विज्ञापन वाले अमेजन के लिंक पोस्ट कर रहा था। उस वेबसाइट के सोशल मीडिया पर महिलाओं के कपड़े और जूतों से जुड़े लिंक भी पोस्ट किए जाते हैं।

                        डिस्ट्रिक्ट्स इंफो के सोशल मीडिया हैंडल पर अमेजन के सामानों की मार्केटिंग

वैसे, ये वेबसाइट देखने में बिल्कुल साफ है कि वो कोई भरोसेमंद वेबसाइट नहीं है, जिसका इस्तेमाल फैक्ट चेक में किया जाए। हालाँकि जो जानकारी वेबसाइट पर है, वो पूरी तरह से गलत भी नहीं है।

कांग्रेस सरकार के बजट के अनुसार, वास्तव में इस योजना की घोषणा सरकार ने की थी। हालाँकि महत्वपूर्ण बात ये है कि उक्त वेबसाइट और मोहम्मद जुबैर ने शायद जानबूझकर पूरी बात नहीं रखी और पाठकों को ये पता करने के लिए कि क्या सही है, उन्हीं पर छोड़ दिया।

जुबैर ने इन बातों को पाठकों के विवेक पर छोड़ा

जब कोई व्यक्ति ‘स्वावलंबी सारथी योजना’ के बारे में सर्च करता है, तो वह केएमडी – कर्नाटक अल्पसंख्यक विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर पहुँचता है। इस सरकारी वेबसाइट पर भी इस योजना के बारे में जानकारी दी गई है कि ये सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए है।
                            कर्नाटक सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर योजना के बारे में जानकारी
                                                योजना का लाभ पाने की शर्तों की जानकारी
वेबसाइट स्पष्ट रूप से कहती है कि इस योजना के लिए आवेदन करने के लिए आवेदक को धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित होना चाहिए। यह योजना अल्पसंख्यक विभाग से जुड़ी है, और चल रही है, जैसा कि “ऑनलाइन आवेदन करें” बटन से साफ पता चला है।
अब, कोई यह तर्क दे सकता है कि चूँकि यह अल्पसंख्यक विभाग की वेबसाइट है, इसलिए यह केवल अल्पसंख्यकों से जुड़ी जानकारी ही देगी। ऐसे में हमने समाज कल्याण विभाग की वेबसाइट को भी देखा और ये जानने की कोशिश की कि क्या ये योजना एससी/एसटी वर्ग के लोगों के लिए भी चल रही है, जैसा कि कर्नाटक सरकार ने अपने बजट में घोषणा की थी?
उस वेबसाइट पर ‘स्वावलंबी सारथी योजना’ नाम की कोई योजना नहीं दिखी और न ही उसके लिए आवेदन करने की कोई जगह मिली। जब ऑपइंडिया ने समाज कल्याण विभाग से बात की तो हमें साफ तौर पर बताया गया है कि इस योजना का लाभ सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को ही मिलेगा। एससी/एसटी समुदाय के लोगों को नहीं।
हालाँकि, यह सच है कि कर्नाटक सरकार ने अपने बजट में अल्पसंख्यकों और एससी/एसटी समुदाय के लिए इस योजना की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक की जानकारी से ऐसा लगता है कि यह योजना अभी तक सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए शुरू की गई है, एससी/एसटी समुदाय के लिए नहीं। यह स्पष्ट है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय इस योजना का लाभ तभी प्राप्त कर सकता है, जब इस बारे में सरकार अधिसूचना जारी करे। फिलहाल तो ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है।
इस योजना को लेकर आजतक के पत्रकार सुधीर चौधरी ने 12 सितंबर को एक शो किया था। इस शो में उन्होंने अंबेडकर विकास निगम के प्रमुख पी नागेश के हवाले से बताया था कि यह योजना अभी एससी/एसटी समुदाय के लिए लागू नहीं है। हालाँकि इसे इन समुदायों के लिए शुरू करने पर चर्चा चल रही है। उन्होंने पुष्टि की थी कि ये योजना अभी तक एससी/एसटी वर्ग के लोगों के लिए अधिसूचित नहीं की गई है।
जब मोहम्मद जुबैर अमेजन के विज्ञापनों को शेयर करने वाली एक ‘ऐरी-गैरी’ वेबसाइट पर भरोसा कर रहे था, तब भी इस बात की पूरी जानकारी मौजूद थी कि कर्नाटक सरकार ने इस योजना की घोषणा तो अल्पसंख्यकों के साथ ही एससी/एसटी वर्ग के लिए भी की थी। इसे लागू भी कर दिया गया, लेकिन सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए। एससी/एसटी के लिए इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।
इस बीच एक अन्य ट्वीट में मोहम्मद जुबैर ने एक और भ्रामक दावा किया। जुबैर ने ट्वीट किया, ”बीजेपी सरकार में भी ऐसी ही एक योजना थी। यहाँ अल्पसंख्यक विभाग @DOMGOK के कुछ पुराने ट्वीट हैं, ‘प्रत्येक लाभार्थी को वाहन की कीमत 33% सब्सिडी मिलेगी, जिसमें ऑटो रिक्शा/टैक्सी/माल गाड़ी खरीदने के लिए अधिकतम 2.5 लाख रुपये दिए जाएँगे’।”
                                                                  जुबैर का ट्वीट
ज़ुबैर ने फिर से चालाकी से सेलेक्टिव जानकारी साझा की, ताकि इस मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट न हो।
हालाँकि, यह भी सच है कि ऐसी ही एक योजना भाजपा सरकार में भी चल रही थी। ये जानकारी कर्नाटक के अल्पसंख्यक विभाग द्वारा 2021-2022 में दी गई थी, जिसमें बताया गया है कि 31 मार्च 2022 तक वाहनों की खरीद के लिए कितनी सब्सिडी दी गई थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, अल्पसंख्यक विभाग द्वारा 1,333 वाहनों पर सब्सिडी दी गई थी।
                                                   सरकारी वेबसाइट पर मौजूद जानकारी
हालाँकि, जुबैर द्वारा डाले गए स्क्रीनशॉट भ्रम पैदा करने वाले थे, क्योंकि भाजपा सरकार ने 2022 में इस योजना को होल्ड (रोक) पर रख दिया था।
जुबैर ने जो स्क्रीनशॉट शेयर किए, उनमें से एक कर्नाटक के अल्पसंख्यक मामलों के विभाग का जवाब था। ये जवाब 17 अक्टूबर 2022 को दिया गया था। इसमें विभाग ने लिखा था, “प्रत्येक लाभार्थी को वाहन मूल्य पर 33% सब्सिडी मिलेगी, अधिकतम रु 2.5 लाख रुपए। अगर ऑटो रिक्शा/टैक्सी/माल गाड़ी बैंक लोन पर खरीदा जा रहा है तो उसके लिए बैंक का पत्र भी जमा करना होगा। (1/1)”
कोई भी व्यक्ति ध्यान देगा कि अगर किसी ट्वीट में 1/1 लिखा है, तो इसका मतलब है कि जवाब अभी अधूरा है और वो दूसरे ट्वीट में आ रहा है। कम से कम असली फैक्ट चेकर तो इस बात पर ध्यान देगा ही। चूँकि अगले ट्वीट में पूरा मामला साफ हो जाता, इसलिए जुबैर ने सिर्फ अपने काम का अधूरा ट्वीट ही लगाया।
मोहम्मद जुबैर ने जिस दूसरे ट्वीट को ‘जानबूझकर’ छोड़ा, उसमें साफ लिखा है कि ये योजना अब बंद हो चुकी है। ये सभी ट्वीट्स अब भी विभाग के सोशल मीडिया हैंडल पर मौजूद हैं।
जुबैर ने दिसंबर 2022 का एक और स्क्रीनशॉट शेयर किया था। ये भी दो हिस्सों में है, लेकिन उसने जानबूझकर पहला हिस्सा ही शेयर किया है।
इस ट्वीट में भी साफ लिखा है कि ये योजना लागू की जाएगी। इसका जवाब दिसंबर माह में दिया गया है। इस बात से ये साफ है कि ट्वीट के समय ये योजना बंद थी, चल नहीं रही थी।
अब ये सब कुछ पूरी तरह से साफ है कि किस तरह से जुबैर ने KMDC के जवाबी ट्वीट का महज एक हिस्सा ही शेयर किया, दूसरे को छोड़ दिया (जिसमें साफ साफ लिखा है कि ये योजना उस समय बंद थी)। लोग गुमराह ही रहें, इसलिए उसने एक और स्क्रीनशॉट शेयर कर दिया।
इन सब तथ्यों के आधार पर ये बात साफ है कि जब मई 2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार आई, तब ये योजना बंद थी। ऐसे में ये कांग्रेस सरकार की ही योजना है, जिसके बारे में सरकार ने पूरी योजना बनाई और बजट में इसकी घोषणा की। बजट में घोषणा के समय ये कहा गया था कि इस योजना का लाभ एससी/एसटी समुदाय को भी मिलेगा, लेकिन अब तक ये सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए ही चलाई जा रही है।
ऐसे में ये भी संभव है कि कर्नाटक सरकार की अन्य योजनाएँ जो एससी/एसटी/ओबीसी के लिए भी चल रही हैं, उनका भी हश्र ‘स्वावलंबी सारथी योजना’ की तरह ही हुआ हो।
उदाहरण के लिए, कर्नाटक सरकार की एक और योजना है, जिसे ऐरावत योजना कहा जाता है। इस योजना के तहत एससी/एसटी समुदाय के ग्रामीण युवाओं को सब्सिडी वाली गाड़ियाँ पाने की सुविधा देने के लिए ओला और उबेर के साथ पार्टनरशिप की गई है। हालाँकि, ये योजना स्वावलंबी सारथी योजना के बराबर नहीं है, जो सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए थी, बल्कि ये योजना एससी/एसडी समुदाय के ग्रामीण युवाओं के लिए है।

आजतक के सुधीर चौधरी के खिलाफ FIR और जुबैर का फेक न्यूज

जब जुबैर ने भ्रामक जानकारी फैलाना शुरू कर दिया तो प्रियांक खड़गे, जो जुबैर को ‘चीफ’ कहना पसंद करते हैं, ने सुधीर चौधरी को कानूनी परिणाम भुगतने की धमकी दी। इसके बाद उनके के खिलाफ रिपोर्टिंग करने के लिए एफआईआर दर्ज करा दी गई।
सुधीर चौधरी ने एक शो किया था, जिसमें उन्होंने इस योजना के बारे में बताया था कि कैसे इसे हिंदुओं के लिए नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए लागू किया जा रहा है। वीडियो सामने आते ही हिंदू विरोधी बयान देने वाले प्रियांक खड़गे ने ट्वीट किया कि सुधीर गलत सूचना फैला रहे हैं और वह एंकर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।
रात 11:36 बजे मोहम्मद जुबैर ने सबसे पहले ट्वीट किया था कि सुधीर चौधरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

इन सबके बीच, सुधीर चौधरी ने एक और शो किया, जिसमें उन्होंने ये बातें साफ कीं।

1-बजट में कांग्रेस सरकार ने घोषणा की थी कि यह योजना अल्पसंख्यकों और एससी/एसटी समुदायों के लिए उपलब्ध होगी
2-अखबार और कांग्रेस सरकार की अपनी वेबसाइट के विज्ञापन से साबित होता है कि इस योजना के लिए पात्रता की आवश्यकता यह है कि व्यक्ति अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित होना चाहिए।
3-एससी/एसटी समुदाय के लिए योजना की पात्रता अभी तक अधिसूचित नहीं की गई है।
4-इस बात की पुष्टि अंबेडकर विकास निगम के प्रबंध निदेशक ने आजतक से की है।
5-साफ है कि यह योजना सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए लागू है।
यहाँ ये ध्यान देने लायक बात है कि असल चीजों को अभी तक मोहम्मद जुबैर ने ट्वीट नहीं किया है, जबकि सुधीर चौधरी जब शो कर रहे थे, तब यही जुबैर लगातार ट्वीट पर ट्वीट कर रहा था।
स्व-घोषित फैक्ट चेकर जुबैर ने इन मामले में अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं किया। सच्चाई ये है कि उसका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है। इस पूरे मामले में आगे चलकर यह संभव है कि कर्नाटक सरकार अपनी घोषणा पर अमल करते हुए एससी/एसटी वर्ग के लिए भी योजना को अधिसूचित कर दे, लेकिन अभी तथ्य यही है कि ये योजना सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए लागू है।
साफ है कि इस मामले में सुधीर चौधरी हों या अन्य मीडिया हाउस, उन्होंने कोई फेक न्यूज नहीं फैलाया है। फिर भी कर्नाटक सरकार ने सच्चाई को स्वीकार करने की जगह उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने जैसी कार्रवाई की है।
चूँकि कर्नाटक सरकार की ये योजना अगर एससी/एसटी वर्ग के लिए लागू होती तो वो इसका नोटिफिकेशन सार्वजनिक करते, न कि जुबैर के फर्जी फैक्ट चेक की आड़ में सुधीर चौधरी पर एफआईआर दर्ज करते।
ऐसे में साफ है कि सुधीर चौधरी पर एफआईआर सिर्फ इसलिए की गई है कि अगर कोई सच्चाई बताने का प्रयास करेगा और इससे कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की असलियत बाहर आएगी, तो वो बच नहीं पाएगा। उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी। उसे प्रताड़ित किया जाएगा।
मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में नुपूर जे शर्मा द्वारा लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।(साभार)

क्या हिजाब, गोहत्या और धर्मांतरण पर कानून बदलेगी कर्नाटक की कांग्रेस सरकार, एमनेस्टी की माँग पर खड़गे के मंत्री बेटे प्रियांक खड़गे

कर्नाटक में सरकार बनाते ही कांग्रेस ने अपने वादे के अनुसार मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनानी शुरू कर दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे और कर्नाटक सरकार में राज्यमंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा कि राज्य मे हिजाब पर प्रतिबंध, गोवध प्रतिबंध और धर्मांतरण कानून सहित अन्य मामलों पर विचार किया जाएगा।

स्वतंत्रता मिलने से पूर्व से ही हिन्दू का निरंतर उपहास हो रहा है, लेकिन हिन्दू आज तक अपने दुश्मनों को नहीं पहचान पा रहा या अनदेखा कर रहा है। चुनावी हिन्दुओं के षड्यंत्र में फंस सनातन विरोधियों को वोट देकर, मोदी और योगी की ओर उनकी सहायता करने के लिए देखते हैं। लेकिन फ्री रेवड़ियों के लालच में अपने विरोधियों को वोट दे आते हैं।  

कर्नाटक के सिद्धारमैया सरकार में राज्यमंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा, “हम अपने रुख को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। हम ऐसे किसी भी कार्यकारी आदेश की समीक्षा करेंगे, हम किसी भी विधेयक की समीक्षा करेंगे जो कर्नाटक की आर्थिक नीतियों के प्रतिकूल है। जो राज्य की खराब छवि प्रस्तुत करता है।”

उन्होंने आगे कहा, “कोई भी विधेयक जो आर्थिक गतिविधियों के लिए उपयोग नहीं किया जाता है, कोई भी विधेयक जो रोजगार पैदा नहीं करता है, कोई भी विधेयक जो किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन करता है, कोई भी विधेयक जो असंवैधानिक है उसकी समीक्षा की जाएगी और यदि आवश्यक हुआ तो उसे रद्द किया जाएगा।”

बताते चलें कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते ही मानवाधिकार के नाम पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने अपनी तीन प्रमुख माँगें रखी थीं। उसने कहा था कि कर्नाटक में हिजाब पर प्रतिबंध, धर्मांतरण विरोधी कानून और गोवध कानून का सरकार समीक्षा करेगी।

एमनेस्टी इंडिया ने अपनी पहली माँग में शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के हिजाब पहनने पर लगे प्रतिबंध को हटाने को कहा। उसने कहा, “यह प्रतिबंध मुस्लिम लड़कियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार के बीच चयन करने के लिए मजबूर करता है। इससे समाज में सार्थक रूप से भाग लेने की उनकी क्षमता बाधित होती है।”

अपनी दूसरी माँग में पशु क्रूरता (रोकथाम) अधिनियम 2020 और कर्नाटक धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण विधेयक 2022 के प्रावधानों की समीक्षा करने और उन्हें निरस्त करने के लिए कहा। दूसरे शब्दों में, एमनेस्टी इंडिया ने कर्नाटक में गोहत्या की अनुमति और हिंदू विरोधी ताकतों को राज्य में धर्मांतरण रैकेट (लव जिहाद) चलाने की माँग की है।

एमनेस्टी इंडिया ने अपने ट्वीट में आगे कहा कि गोवध और धर्मांतरण पर बने कानून का दुरुपयोग हो सकता है और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, एमनेस्टी इंडिया ने मुस्लिम विक्रेताओं का बहिष्कार करने वाले हिंदुओं के खिलाफ कार्रवाई का आह्वान किया।

अपनी तीसरी माँग को लेकर एमनेस्टी ने कहा, “राज्य में चुनावों से पहले मुस्लिम के आर्थिक बहिष्कार और उनके खिलाफ हिंसा का आह्वान किया गया था। धर्म-जाति आधारित भेदभाव से प्रेरित घृणा और घृणित अपराधों को समाप्त करने के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करें।” दिलचस्प बात यह है कि ऐसी कई रिपोर्ट आई हैं, जिनमें मुस्लिमों ने हिंदू व्यवसायों का बहिष्कार करने का आह्वान किया है, लेकिन एमनेस्टी ने इसे कभी भी घृणित नहीं कहा।

राज्य में प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामवादी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े बजरंग दल (Bajarang Dal) पर प्रतिबंध को लेकर भी प्रियांक खड़गे ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “कोई भी संगठन- धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक, जो असंतोष और वैमनस्य के बीज बोने जा रहा है… उसे कर्नाटक में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम कानूनी और संवैधानिक रूप से उनसे निपटेंगे – चाहे वह बजरंग दल हो, पीएफआई हो या कोई अन्य संगठन हो। हम उन्हें प्रतिबंधित करने में संकोच नहीं करेंगे, यदि वे कर्नाटक में कानून और व्यवस्था के लिए खतरा बनेंगे।”

दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि अगर वह सत्ता में आएगी तो राज्य में बजरंग दल पर प्रतिबंध लगा देगी। बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की कांग्रेस की घोषणा की देश भर में आलोचना हुई थी। भाजपा ने तो बजरंग दल को बजरंग बली से जोड़ दिया था।