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धर्मांतरण के खिलाफ छत्तीसगढ़ में भी आएगा कानून, 10 साल की सजा-लाखों के जुर्माने का प्रावधान: कई नियमों से कट्टरपंथियों पर कसी जाएगी नकेल

                                                                                                                   साभार : Grok & Canva
मौलाना मदनी जैसे कट्टरपंथियों की जिहाद आदि की धमकियों से डराने की कोशिश नहीं कर रहे  है उसका कारण है कि इनके द्वारा जो धर्मांतरण का नंगा नाच खेला जा रहा था उस पर लगाम लगनी शुरू हो गयी है। भारत का मुसलमान अगर इस मुगालते में जी रहा है कि ये हमारी दिक्कतों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं साथ दो, उन्हें मालूम होना चाहिए कि इन धमकियों का विदेशों में क्या असर हो रहा है उसे समझना होगा। जिहाद की बात बोलने वाले मदनी ने एक बार Al Falah University के आतंकी डॉक्टरों के खिलाफ एक लब्ज नहीं बोलना साबित करता है कि जो कुछ हो रहा है इन कट्टरपंथियों के इशारे पर हो रहा है। 
कल(29 नवंबर) को Republic Bharat पर अपने शो "पूछता है भारत" में एंकर ऐश्वर्य कपूर ने बताया कि विदेशों में उसके बहुत पुराने डॉक्टर दोस्त बताते है कि "डॉक्टरों की इन हरकतों से मरीजों ने हमारे पास आना बंद कर दिया है", कपूर की इस बात का शो में शामिल "गरीब नवाज़" के अंसार रज़ा आदि और भी मुस्लिम भागियों के बीच ये बात कही। मदनी जैसे कट्टरपंथी मुसलमानों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। देखिए वीडियो:-     
इतना ही नहीं News18 की एंकर रुबिका लियाकत के शो "गूंज" की वीडियो देखिए:-   
            
छत्तीसगढ़ सरकार आने वाले शीतकालीन सत्र में एक नया धर्मांतरण निषेध कानून लाने वाली है। सरकार यह कदम इसलिए उठा रही है क्योंकि बस्तर, जशपुर और रायगढ़ जैसे जनजातीय इलाकों में काफी समय से धर्मांतरण को लेकर विवाद और तनाव बढ़ रहा है। कई बार हालात इतने खराब हुए कि पुलिस और प्रशासन को दखल देना पड़ा। अभी राज्य में मध्य प्रदेश का पुराना कानून लागू है, जिसमें धर्म बदलने से पहले DM की अनुमति लेनी होती है। लेकिन सरकार का मानना है कि यह कानून अब पर्याप्त नहीं है और इसे मजबूत करने की जरूरत है।

नए कानून का उद्देश्य साफ है- कोई भी व्यक्ति बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया के धर्म नहीं बदल सकेगा। अगर किसी को डर दिखाकर, लालच देकर, दबाव डालकर या धोखे से धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान होगा। सरकार चाहती है कि हर धर्मांतरण की जानकारी कानूनी रूप से दर्ज हो, ताकि आगे किसी तरह का विवाद न हो और जनजातीय इलाकों में शांति बनी रहे। यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करेगा, लेकिन जबरन या अवैध धर्मांतरण पर सख्त रोक लगाएगा।

नए कानून में क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं?

सरकार के नए ड्राफ्ट में सबसे बड़ी बात यह है कि अब धर्म बदलना पहले की तरह आसान नहीं होगा। किसी भी व्यक्ति को धर्म बदलने से पहले पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। उसे तय समय पर जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित जानकारी देनी होगी, ताकि सरकार को पता रहे कि धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से हो रहा है या किसी दबाव में। अगर कोई व्यक्ति बिना जानकारी दिए धर्म बदल लेता है, तो ऐसे धर्मांतरण को मान्य नहीं माना जाएगा। यानी कागजों पर वह धर्म परिवर्तन वैध नहीं होगा।

इसके साथ ही ड्राफ्ट में यह भी साफ कहा गया है कि अगर किसी ने किसी को लालच देकर, डर दिखाकर, धमकाकर या धोखा देकर धर्म बदलवाने की कोशिश की, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में जेल की सजा भी हो सकती है और भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि जब तक प्रक्रिया को मजबूत और सख्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाना मुश्किल है।

एक और अहम मुद्दा ‘शादी के बहाने धर्म परिवर्तन कराना’, जिसे कई राज्यों में लव जिहाद कहा जाता है। नए कानून में छत्तीसगढ़ भी इस तरह के मामलों पर सख्ती बढ़ा सकता है। अगर कोई व्यक्ति केवल शादी करवाने के मकसद से धर्म परिवर्तन करवाता है या किसी को ऐसा करने पर मजबूर करता है, तो ऐसी शादी को कोर्ट अवैध घोषित कर सकेगी। यानी सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन की कोशिश अब गंभीर अपराध माना जा सकता है।

इस कानून का मकसद यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए। हर व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म अपनाने का अधिकार रहेगा, लेकिन यह अधिकार कानून के दायरे में रहकर ही मिलेगा। नए प्रावधान यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी व्यक्ति दबाव, धोखे या लालच का शिकार न बने। सरकार का मानना है कि इससे खासकर जनजातीय इलाकों में फैल रहा तनाव कम होगा, वहाँ होने वाले झगड़े और सामाजिक विभाजन थमेगा और समाज में स्थिरता बनी रहेगी।

भारत के किन राज्यों में पहले से लागू है धर्मांतरण विरोधी कानून?

भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून की शुरुआत बहुत पहले ओडिशा से हुई। ओडिशा ने 1967 में पहला कानून बनाया था, जिसमें जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाने पर सजा का प्रावधान रखा गया। इसके एक साल बाद मध्य प्रदेश ने भी ऐसा ही कानून लागू किया। समय बीतने के साथ, अलग-अलग राज्यों ने महसूस किया कि धर्मांतरण के मामलों में नए तरीके सामने आ रहे हैं, इसलिए उन्होंने कानूनों को और सख्त बनाना शुरू किया।

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान ने अपने कानूनों में और कड़े नियम जोड़े हैं। इन राज्यों का साफ कहना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को डर दिखाकर, पैसा या नौकरी का लालच देकर, या शादी का झाँसा देकर धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश करता है, तो यह एक गंभीर अपराध माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषी को 3 साल से लेकर 10 साल तक जेल हो सकती है। इसके साथ ही लाखों रुपए का जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

अधिकतर राज्यों में यह अपराध गैर-जमानती है। इसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के भी आरोपित को गिरफ्तार कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती। अगर पीड़ित व्यक्ति नाबालिग हो, महिला हो, या अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) समुदाय से हो, तो सजा और अधिक कड़ी कर दी जाती है, क्योंकि ये वर्ग ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।

कई राज्यों में तो स्वेच्छा से, यानी अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन पर भी नियम बहुत साफ हैं। जिसे खुद से धर्म परिवर्तन करवाना है, उसे पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को 30 से 60 दिन पहले लिखित रूप से बताना होता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि अधिकारियों को पता रहे कि धर्म परिवर्तन पूरी तरह अपनी इच्छा से किया जा रहा है और इसके पीछे कोई दबाव या लालच नहीं है।

इन सभी कानूनों का मुख्य उद्देश्य एक ही है कि लोगों को सुरक्षा देना, उन्हें धोखे से बचाना और धार्मिक स्वतंत्रता को सही अर्थों में सुरक्षित रखना।

अवैध धर्मांतरण का गलत इस्तेमाल कैसे होता है?

धर्मांतरण को लेकर सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है जब इसे किसी योजना के तहत, संगठित तरीके से किया जाता है। खासकर तब, जब कमजोर या सरल-सहज लोगों को निशाना बनाया जाता है। कई जगहों पर देखा गया है कि कुछ समूह धीरे-धीरे किसी इलाके में बड़ी संख्या में लोगों का धर्म बदलवाते हैं।

इसका असर सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रहता। इससे उस क्षेत्र की जनसंख्या का संतुलन बदलने लगता है। जब किसी एक समुदाय की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो स्थानीय राजनीति, पंचायतों के फैसले, प्रशासनिक ढाँचा और सामाजिक माहौल पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। कई बार यह बदलाव वहाँ रहने वाले पुराने समुदायों के लिए चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर देता है।

दूसरा बड़ा नुकसान तब होता है जब बाहरी या संगठित समूह जनजातीय समुदायों को उनकी अपनी परंपराओं, देवी-देवताओं और जीवनशैली से दूर करने की कोशिश करते हैं। जनजातीय समाज की अपनी विशिष्ट पहचान होती है, और जब उन्हें तेजी से किसी नए मजहब की ओर मोड़ा जाता है, तो समाज में विभाजन बढ़ता है। कई गाँवों में परिवार आपस में बँट जाते हैं, त्यौहार अलग-अलग हो जाते हैं और सामाजिक रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है।

कुछ मामलों में ऐसे धर्मांतरित व्यक्तियों का इस्तेमाल संगठन अपने प्रचार, अपनी संख्या बढ़ाने या गलत गतिविधियों के लिए भी करते हैं। कमजोर या भावनात्मक रूप से टूटे लोगों को प्रभावित करना आसान होता है और ऐसे लोग अनजाने में कट्टरपंथी सोच के शिकार बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी इस खतरे को समझ चुका है। कोर्ट ने साफ कहा है कि जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाना देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है। इसलिए कई राज्य सरकारें कानूनों को और सख्त कर रही हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति दबाव, डर, दिखावे या चालाकी से लोगों का धर्म परिवर्तन ना करवा सके। सरकारों का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर धर्म परिवर्तन साफ, सुरक्षित और पूरी तरह अपनी इच्छा से हो, न कि किसी चाल या दबाव का नतीजा।

तमिलनाडु : विधानसभा में संविधान और राष्ट्रगान का अपमान: राज्यपाल ने बिना संबोधन किया वॉकआउट, स्टालिन सरकार की हो रही किरकिरी

आज जॉर्ज सोरोस की कठपुतली बना विपक्ष देश के राष्ट्रगान तक का अपमान करने पर उतर आया है। क्या ऐसे विपक्ष से देश की एकता और अखंडता की कल्पना की जा सकती है? तमिलनाडु मुख्यमंत्री देश को बताएं कि क्या राज्य का गीत राष्ट्रगान से अधिक महत्वपूर्ण है? जब राष्ट्र ही नहीं होगा राज्य कहाँ से होगा? क्या ऐसी सरकार का सत्ता में बने रहने का अधिकार है? आखिर देश विरोधी ताकतों की कब तक कठपुतली बन अराजकता का माहौल बनाया जाता रहेगा?          
तमिलनाडु विधानसभा में एक बार फिर राष्ट्रगान का अपमान किया गया है। राष्ट्रगान के अपमान से नाराज तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि अभिभाषण दिए बिना सदन से वॉकआउट कर गए। आज, 6 जनवरी को तमिलनाडु विधानसभा के इस साल के पहले सत्र की शुरुआत हुई। लेकिन परंपरा के अनुसार सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान से ना कर राज्य गीत ‘तमिल थाई वाजथु’ के गायन से हुआ। राज्यपाल ने सदन को उसके संवैधानिक कर्तव्य की याद दिलाते हुए राष्ट्रगान की बात कही, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। इससे नाराज राज्यपाल बिना अभिभाषण दिए सदन से चले गए।

राजभवन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि आज तमिलनाडु विधानसभा में एक बार फिर भारत के संविधान और राष्ट्रगान का अपमान किया गया। राष्ट्रगान का सम्मान करना हमारे संविधान में निहित पहले मौलिक कर्तव्य में से एक है। राज्यपाल के अभिभाषण के आरंभ और अंत में इसे सभी राज्य विधानसभाओं में गाया जाता है। आज सदन में राज्यपाल के आगमन पर केवल तमिल थाई वाज़्थु गाया गया। राज्यपाल ने सदन को सम्मानपूर्वक उसके संवैधानिक कर्तव्य की याद दिलाई और स्पीकर के साथ सदन के नेता मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से जोरदार अपील की, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया। संविधान और राष्ट्रगान के प्रति इस तरह के निर्लज्ज अनादर के कारण राज्यपाल गहरी पीड़ा में सदन से चले गए।

तमिलनाडु विधानसभा में राष्ट्रगान के अपमान का मामला सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है। लोग राष्ट्रगान ना गाने पर हैरानी जता रहे हैं। इससे स्टालिन सरकार की किरकिरी हो रही है।