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मुस्लिम समाज को हथियार ट्रेनिंग का मामला : क्यों बयान से पलटे शिया धर्मगुरु कल्बे जवाद

maulana kalbe jawwadमुसलमानों के लिए कैंप और एससी, एसटी समाज के लोगों के लिए हथियारों के मुद्दे पर दिए गए बयान से शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद पलट गए हैं। उन्होंने कहा कि वो वकील महमूद प्राचा से कह चुके हैं कि इन समाज से जुड़े लोगों के लिए जिस कार्यक्रम की बात वो कर रहे थे उसे टाल दें। सवाल ये है कि जब भारत में इस तरह की वारदातों को रोकने के लिए आईपीसी में तमाम धाराएं हैं तो क्या ये सिर्फ बीजेपी सरकार को घेरे में करने के लिए किया जा रहा है? 
वकील महमूद प्राचा ने कहा था कि वो ऐसे कार्यक्रम की शुरुआत करने जा रहे हैं जिसमें दलित, मुस्लिम और समाज के दूसरे पीड़ित वर्गों के लिए हथियार मुहैया कराने के लिए अभियान चलाएंगे। इस संबंध में कल्बे जवाद ने कहा कि इस समाज से जुड़े लोगों को यह जानकारी नहीं है कि हथियार की खरीद के लिए किस तरह से फॉर्म भरे जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्रचा को इस बात का शायद ज्ञान नहीं कि हथियार रखने वाला फॉर्म की परवाह नहीं करता। क्या भारत को प्रचा कश्मीर बनाना चाहते हैं? 
कल्बे जवाद ने कहा कि मीडिया ने उन्हें गलत तरह से पेश किया है। यह कहा गया था कि कैंपों में हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाएगी। यह पूरी तरह से गलत है। जबकि टीवी चैनल उन्हें ऐसी बात कहने का वीडियो दिखा रहे हैं, फिर भी यह कहना कि "मैंने ऐसा नहीं कहा", उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शायद किसी कानूनी शिकंजे से बचने के लिए शिया धर्मगुरु अपने बयान से पलटी मार रहे हैं। अब जब सरकार उनकी गतिविधियों पर नज़र रखे, तब कोई यह न कहे कि मुसलमानों को शक की निगाह से देखा जा रहा है। क्योकि ऐसे ही लोगों की गलत बयानबाज़ी के कारण बेगुनाह भी शक के दायरे में आ जाते हैं। अब मुस्लिम समाज को ही ऐसे लोगों के विरुद्ध बुलंद करनी चाहिए।   
कल्बे ने आगे कहा कि हमने इस संबंध कार्यक्रम स्थगित करने के लिए कहा है। हमें यह देखना होगा कि मॉब लिंचिंग के संदर्भ में सरकार कोई फैसला लेगी या नहीं लेगी। हम लोग सभी नेताओं से मॉब लिंचिंग के संबंध में कानून बनाने के लिए मिलेंगे।
जुलाई 20 को प्राचा ने कहा था कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 26 जुलाई को मुस्लिम, एससी, एसटी समाज को हथियार मुहैया कराने के लिए कैंप लगाएंगे। उन्होंने इसके लिए मॉब लिंचिंग और सोनभद्र की घटना का हवाला दिया था। कैंप में लोगों को यह बताना था कि लाइसेंसी हथियारों को हासिल करने के लिए किस तरह से फॉर्म भरना है। किसी को हथियारों की ट्रेनिंग देने की बात नहीं थी। ये बात अलग है कि सरकार को मॉब लिंचिंग के संबंध में कानून लेकर आना चाहिए।
कल्बे जवाद ने कहा कि अगर मॉब लिंचिंग के संदर्भ में सरकार कड़े कानून के साथ आती है तो इससे बेहतर विकल्प और क्या हो सकता है। सरकार को इस संबंध कार्रवाई करने के लिए मौका देना चाहिए। बता दें कि 19 जुलाई को बिहार के छपरा में तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। दरअसल लोगों को यह संदेह था कि आरोपी पशु तस्करी में शामिल हैं। इससे पहले 2 जुलाई को बिहार के वैशाली में एक अज्ञात शख्स को इसी तरह मार दिया गया था। 18 जून को झारखंड के खरसावां जिले में तबरेज अंसारी को चोरी के शक में भीड़ ने पीट पीटकर मारा डाला था।
प्रचा और मुस्लिम धर्मगुरुओं बताएं क्या समाजवादी पार्टी के विधायक का कैराना के मुसलमानों से हिन्दुओं की दुकान से कोई सामान न खरीदने देने का बयान साम्प्रदायिकता से प्रेरित नहीं? और जब हिन्दुओं की प्रतिक्रिया होगी, उस स्थिति में मुसलमानों की क्या स्थिति होगी, सोंचा? यानि पहले तो आग लगा दो, फिर कहो कि मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है, यह कौन-सी दोगली नीति खेली जा रही है?
देखिए वीडियो :-
सवाल ये है कि महमूद प्राचा और मुस्लिम धर्मगुरुओं का इस तरह के बयान के पीछे का मकसद क्या है। जानकार कहते हैं दरअसल हाल के दिनों में जिस तरह से मॉब लिंचिंग की घटनाएं सामने आई हैं उसके बाद उन्हें लगता है कि बीजेपी शासित सरकारों में मुस्लिम तबका सुरक्षित नहीं हैं। लेकिन वो लोग भूल जाते हैं कि इस तरह की घटनाएं सिर्फ बीजेपी शासित राज्यों में नहीं हो रही है। कांग्रेस शासित राज्यों खासतौर से मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी इस तरह की वारदातें हुई हैं। ऐसे में सिर्फ बीजेपी को घेरने की वजह से ये संदेश जाता कि मुस्लिम समाज से जुड़े हुए कुछ लोग राजनीतिक ए़जेंडे के तहत बयान दे रहे हैं।
केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकारों को इन दोनों बातों का संज्ञान लेकर किसी अनहोनी को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे, अन्यथा फिर #moblynching, #intolerance, #awardvapsi और #not in my name आदि गैंग सक्रिय होकर सौहार्द बिगाड़ने में लामबंद हो जाएंगे।   

आखिर बंगाल में हिन्दुओं का दमन कब तक ?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
पश्चिम बंगाल में जारी सियासी हिंसा को लेकर अब बीजेपी की सहयोगी जेडीयू भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ दंगल में कूद पड़ी है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि बंगाल से बिहारियों को भगाया जा रहा है। पार्टी ने एक विवादित टिप्पणी ये भी कर दी है कि बंगाल को मिनी-पाकिस्तान बनाया जा रहा है। क्योकि जिस तरह बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल में दमन किया जा रहा है, देश के लिए चिन्ता की बता है। जिसे देख सन्देह होता है कि क्या पश्चिम बंगाल दूसरा पाकिस्तान बनने की राह पर है? ये सवाल इसलिए मौजू है, क्योंकि बीते कई सालों से बंगाल की राजनीति यही संकेत दे रही है। 
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार इस तरीके के काम कर रही है, जो उनकी हिन्दू विरोधी मानसिकता को ही उजागर कर रही है। आखिर कब तक हिन्दुओं का दमन होता रहेगा और समस्त छद्दम समाजवादी और धर्म-निरपेक्ष मुँह में दही जमाये बैठे रहेंगे। क्या हिन्दू इनको वोट नहीं देता? क्या हिन्दू का खून खून नहीं? क्या हिन्दू प्रताड़ित होकर भी इनको वोट देता रहेगा?
नेता कब छद्दमवाद का नकाब उतारेंगे?
आखिर कब हमारे नेता अपने चेहरे से छद्दमवाद का नकाब उतार वास्तविकता को स्वीकारेंगे? नेताओं को तुष्टिकरण त्याग वास्तविक समाजवाद और धर्म-निरपेक्षता को धरती पर लाना होगा। बहुत हो गयी हिन्दू-मुस्लिम, जात-पात की राजनीती। ये छद्दमवाद और तुष्टिकरण इनको कुछ समय के लिए कुर्सी तो दिला सकती है, लेकिन स्थायी रूप से नहीं। जहाँ तक हिन्दुओं के साम्प्रदायिक होने की बात है, साम्प्रदायिक तो हमारे कानून और नीतियाँ है। 
आरक्षण के नाम पर भेदभाव
एक तरफ नेता समाजवाद और एकजुटता की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ आरक्षण के नाम पर भेदभाव। जब संविधान सबको बराबरी का अधिकार दे रहा है, फिर यह निर्वाचन क्षेत्र मुस्लिम के लिए और ये क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए, क्या है ये तमाशा? क्या इस तरह देश की जनता भ्रमित नहीं किया जा रहा? फिर जब ये कानून बनाया फिर मुस्लिम एवं अनुसूचित जाति को असुरक्षित क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए क्यों टिकट दिए जाते हैं, यह बात केवल चुनावों तक ही सीमित नहीं है, नौकरियों में भी यही हाल है। क्या यह दोगली नीति नहीं? जब डॉ भीम राव आंबेडकर ने आरक्षण के लिए केवल 10 वर्ष माँगे थे, परन्तु इसका दुरूपयोग होता देख, इसे समाप्त करने के लिए भी कहा था, जो नहीं मानी क्योकि आरक्षण समाप्त होने पर नेता अपनी राजनितिक न रोटियाँ सेक पातीं और और न ही किसी को मालपुए खाने को मिलते। देश में साम्प्रदायिक की असली जड़ तुष्टिकरण और आरक्षण है।इस मुद्दे पर समस्त पार्टियों को एक साथ बैठ कर गम्भीरता से मन्थन करना होगा। ताकि हमारा संविधान उस सम्मान को प्राप्त करे, जिसका वह अधिकारी है।     
जेडीयू ने बहुत देर से अपनी आंखें खोली
जेडीयू ने बहुत देर से अपनी आंखें खोली हैं। इस काम का श्रीगणेश तो पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही हो गया था, लेकिन उस समय सभी तुष्टिकरण के पुजारी बने रहे। कितनी बार 24-परगना में हिन्दुओं पर हमले और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ खंडित की जा चुकी हैं। लेकिन कोई नहीं बोला। उस समय मीडिया भी हिन्दुओं पर हो हमलों के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं कर रही थी। 
जिस प्रकार से ममता बनर्जी अपनी राजनीति कर रही हैं, उससे एक बात तो स्पष्ट दिखाई देती है कि वह केवल मुस्लिमों को ही लुभाने में लगी हैं और वो हिंदुओं के धार्मिक कार्यक्रमों और परंपराओं को भी निशाना बना रही हैं।
जिस प्रकार से ममता बनर्जी अपनी राजनीति कर रही हैं, उससे एक बात तो स्पष्ट दिखाई देती है कि वह केवल मुस्लिमों को ही लुभाने में लगी हैं और वो हिंदुओं के धार्मिक कार्यक्रमों और परंपराओं को भी निशाना बना रही हैं।
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बंगाल को मिनी-पाकिस्तान बना रही हैं ममता- जेडीयू 
खबरों के मुताबिक जेडीयू की ओर से पश्चिम बंगाल की सियासी हालात को लेकर एक बेहद विवादित टिप्पणी की गई है। पार्टी के प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा है कि 'ममता बनर्जी बंगाल को मिनी-पाकिस्तान बना रही हैं।' उन्होंने दावा किया है कि राज्य से बिहार के लोगों को भगाया जा रहा है और वहां लगातार हत्याएं हो रही हैं। जेडीयू ने तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और ममता बनर्जी से गुजारिश की है कि वो पश्चिम बंगाल को मिनी-पाकिस्तान बनने से रोकें।
प. बंगाल में कुछ दिन पहले दंगे हुए जिनमे हिन्दुओं के घरों एवं मंदिरों पर देसी बमों से हमला किया गया | सेक्युलर जमात के नेताओं और मीडिया एजेंसियों ने तो हमेशा की तरह इस मामले पर अपने आँख, कान और मुँह बंद कर लिए क्योंकि हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार का विरोध करना इस जमात के उसूलों के खिलाफ है | जी न्यूज़ ने इस मुद्दे पर रिपोर्ट बनायी तथा देश की जनता को प. बंगाल में हो रही हिंदुओं की दुर्दशा के बारे में बताया | भाजपा ने भी इस मुद्दे पर प. बंगाल सरकार को घेरने की कोशिश की तथा दोषियों को सजा देने के लिए दवाब बनाने की कोशिश की | हालाँकि ममता बेनर्जी अपनी वोट बैंक की राजनीति के कारण कभी भी इन दंगाइयों पर कोई कार्यवाही नहीं करने वाली | लेकिन इस बार ममता बेनर्जी ने लोकतंत्र की हत्या करते हुए जी न्यूज़ के पत्रकारों पर ही गैर-जमानती धाराओं के तहत केस कर दिया | इस काम से एक तरफ तो ममता बेनर्जी ने दंगाइयों को संरक्षण दिया वहीँ दूसरी ओर सच को सामने लाने वाली रिपोर्ट को दबाने के लिए जी न्यूज के पत्रकारों पर दवाब डालने की कोशिश की |
Image result for ममता राज में हिन्दुओं पर हमलेयह एक बड़ा सत्य है कि प. बंगाल की वर्तमान सरकार स्पष्ट बहुमत होने की वजह से आराम के साथ अपना कार्यकाल पूरा करेगी | लोकल पुलिस यदि चाहे तो भी राज्य सरकार के मर्जी के बिना ऐसे मामलों में दोषियों पर कोई कार्रवाही नहीं कर सकती | फिर ऐसे में क्या कदम उठाये जा सकते हैं जिस से कि हिंदुओं पर होने वाले इस अत्याचार को रोक जा सके ? क्या अब प. बंगाल के ऐसे कुछ क्षेत्रों में शांति एवं कानून बनाये रखने के लिए सेना की सहायता लेना ही एक मात्र विकल्प बचा है ? क्या अब जम्मू कश्मीर एवं उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों की तरह प. बंगाल में भी ऐसे सभी संवेदनशील क्षेत्रों में AFSPA लगाना ही एक तरीका रह गया है?
बंगाल में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों की न किसी अरविन्द केजरीवाल, न राहुल, न अखिलेश और न ही किसी तेजस्वी को चिन्ता नहीं, वोट हिन्दू का भी चाहिए। इतना ही इन अत्याचारों पर कोई #metoo, #not in my name, #awardvapsi, #moblynching, #intolerance आदि किसी गैंग को होश नहीं और न ही जरुरत, क्योकि अत्याचार हो रहे थे/हैं हिन्दुओं पर।     
ममता 'बाहरी' लोगों पर लगाती हैं हिंसा का इल्जाम 
ममता बनर्जी सार्वजनिक तौर पर कह चुकी हैं कि बीजेपी बिहार जैसे राज्यों से लोगों को बुलाकर वहां अशांति फैलाने की कोशिश कर रही है। उनका दावा है कि राज्य में जो लोग 'जय श्रीराम' की नारेबाजी करते हैं, वो बाहर से आकर राज्य में तनाव पैदा करना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को सार्वजनिक तौर पर देख लेने तक की धमकी दी हुई है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक हिंसा में भारी बढ़ोतरी हो गई है। हालात ऐसे बने हैं कि केंद्र ने राज्य को कानून-व्यवस्था को लेकर एडवाइजरी भी दी है और वहां के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट भी सौंपी है।
जेडीयू का ये बयान ऐसे समय मे आया है, जब ममता बनर्जी, नीतीश कुमार को बिहार के बाहर जेडीयू के अकेले चुनाव लड़ने को लेकर बधाई दे चुकी हैं। जून 10 को उन्होंने ट्वीट करके नीतीश से कहा था, "मैंने नीतीश जी का बिहार के बाहर एनडीए के साथ गठबंधन नहीं करने का बयान देखा है। मैं उन्हें बधाई देना चाहती हूं। उन्हें धन्यवाद देती हूं।"

But the most alarming and dangerous fact is that the WB police remained inactive and far away from the spots and as the videos will prove, residents are alleging that police did not respond or take calls and stayed out in their rooms.


The Goons from Minority community came, slaughtered and was given a safe haven to escape.. The entire nation needs to know how dirty a politics of Appeasement Mamta Govt is playing in Bengal. @BJP4India @narendramodi @AmitShah @BJP4Bengal @KailashOnline @DilipGhoshBJP pic.twitter.com/feUTwQg4rG
बंगाल में भाजपा से विवाद के बीच ममता बनर्जी ने फेसबुक और टि्वटर की DP बदली, लिखा 'जय हिंद, जय बांग्ला'टि्वटर और फेसबुक पर अपनी डिस्पले पिक्चर भी बदले 
भारतीय जनता पार्टी (BJP) कार्यकर्ताओं के ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने पर भड़कीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे टि्वटर और फेसबुक पर अपनी डिस्पले पिक्चर (डीपी) रविवार रात को बदल दी. ममता समेत तृणमूल के अन्य नेताओं की डीपी में अब ‘जय हिंद, जंय बांग्ला’ नजर आ रहा है. इससे पहले दिन में, एक विस्तृत फेसबुक पोस्ट में बनर्जी ने भाजपा पर धर्म को राजनीति के साथ मिलाने का आरोप लगाया और लोगों से किसी भी तरह की अराजकता और अशांति को रोकने का आग्रह किया. इस बीच तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा पीएम नरेंद्र मोदी को ‘जय हिंद जय बांग्ला’ लिखा पोस्टकार्ड भेजने की भी खबरें आई हैं. भाजपा समर्थकों द्वारा ममता बनर्जी को ‘जयश्री राम’ लिखा पोस्टकार्ड भेजे जाने के जवाब में तृणमूल कार्यकर्ता पीएम मोदी को पोस्टकार्ड भेज रहे हैं.
महात्मा गांधी, क्रांतिकारी नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, मातंगिनी हाजरा, नोबेल पुरस्कार विजेता कवि रवींद्रनाथ टैगोर, और कवि काजी नजरूल इस्लाम की तस्वीरों के साथ तृणमूल के आधिकारिक टि्वटर और फेसबुक अकाउंट की डीपी भी बदलकर ‘जय हिंद, जय बांग्ला’ कर दी गई. 19वीं सदी के बंगाल के पुनर्जागरण के अगुआ जैसे कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर, राजा राम मोहन राय, धार्मिक और सामाजिक विचारक स्वामी विवेकानंद और भारतीय संविधान के जनक बी. आर. अम्बेडकर भी डीपी का हिस्सा हैं.

हिन्दुओं की परंपरा ममता को क्यों लगती है गुंडागर्दी!
रामनवमी में हिंदुओं द्वारा शस्त्र जुलूस निकालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन ममता बनर्जी ने सवाल खड़ा करते हुए कहा, “क्या भगवान राम ने किसी से हथियारों और तलवार के साथ रैली करने को कहा था? ममता बनर्जी से क्या ये नहीं पूछा जाना चाहिए कि मोहर्रम के दौरान जब मुस्लिम समुदाय खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन करते हैं तो क्या उन्हें मोहम्मद साहब ने कहा था कि हथियारों का प्रदर्शन करे?

ममता राज में समरसता का पर्व रामनवमी भी टीएमसी की सांप्रदायिक राजनीति का शिकार हो गई। गाड़ियों में भरकर आए मुस्लिमों ने तांडव किया और रानीगंज में हिंदुओं की कई दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। आसनसोल में तो मस्जिद से राम नवमी यात्रा पर हमला कर दिया गया, जैसे ही मस्जिद के पास से राम नवमी की यात्रा निकली, नारे बाजी करते हुए मस्जिद से यात्रा पर हमला कर दिया गया, देसी बम भी फेंके गए, मस्जिद से हमले के लिए पहले से ही तैयारी की गयी थी, इस हमले में बंगाल पुलिस के एक पुलिस अफसर का हाथ भी उड़ गया, उनके हाथ पास मस्जिद से फेंका गया बम गिरा। 
रामनवमी में ममता राज में हिंदुओं पर जुल्म
बीते कई सालों से पश्चिम बंगाल में हिंदुओं को दोयम दर्जा का मान लिया गया है। दरअसल ऐसा पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने रामनवमी को लेकर जहर उगला है। पिछले साल भी कोर्ट के आदेश से रामनवमी की पूजा हो सकी थी, वरना ममता बनर्जी ने तो इस पर बैन ही लगा दिय़ा था।

इस्लामिक स्टडीज से एमए हैं ममता बनर्जी
ममता बैनर्जी के पास कई अकेडमिक डिग्री हैं। वे हिस्ट्री से ग्रेजएुट हैं। उन्होंने एलएलबी के साथ इस्लामिक स्टडीज में एमए किया हुआ है। अब सवाल यह उठता है कि ममता बनर्जी जो कि मूल रूप से खुद को बंगाली ब्राह्मण परिवार की बताती हैं, उन्होंने इस्लामिक स्टडीज से एम ए क्यों किया है? हालांकि ये उनका विशेषाधिकार है कि वह क्या पहने, क्या पढ़ें या क्या खाएं, लेकिन ममता बनर्जी की हरकतें हिंदुओं के मन में कुछ संशय जरूर पैदा कर रहा है।

ममता के धर्म परिवर्तन की खबरों का खंडन नहीं
व्हाट्सएप और सोशल साइट पर आजकल एक मैसेज वायरल हो रहा है। लिखा है- ‘क्या ममता बनर्जी का असली नाम मुमताज मासामा खातून है। क्या वो मुस्लिम हैं और क्या वे जानबूझकर हिंदुओं के विरूद्ध काम कर रही हैं? दरअसल उनका हिंदी से बेहतर उर्दू बोलना, हिंदुओं के विरूद्ध किए गए कई कार्य, माथे पर कभी बिंदी नहीं लगाने… जैसी कई बातें हैं जो ये बताती हैं कि वह इस्लाम के अधिक करीब हैं। खबरें तो ये हैं कि उन्होंने 1976 में ही अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है और उन्होंने कभी इस बात का जोरदार तरीके से खंडन भी नहीं किया है।

मुस्लिम मौलानाओं को दिया सरकारी अनुदान
ममता सरकार 2013 से पहले 30 हजार मुस्लिम इमामों और 15 हजार मुअज्जिनों को क्रमश: 2500 और 1500 रुपये का स्टाइपेंड यानी जीविका भत्ता देती थी। वहीं हिंदू पुरोहितों ने जब ये स्टाइपेंड मांगा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। हालांकि हाईकोर्ट ने इसे फिजूलखर्जी करार देते हुए इस फैसले पर रोक लगा दी है।

पश्चिम बंगाल के 8000 गांवों में एक भी हिन्दू नहीं
पश्चिम बंगाल के 38,000 गांवों में 8000 गांव ऐसे हैं जहां एक भी हिन्दू नहीं रहता। या तो उन्हें वहां से भगा दिया गया है या फिर उनका धर्म परिवर्तन करवा दिया गया है। बंगाल के तीन जिले जहां पर मुस्लिमों की जनसंख्या बहुमत में हैं, वे जिले हैं मुर्शिदाबाद जहां 47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिन्दू, मालदा 20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिन्दू, और उत्तरी दिनाजपुर 15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिन्दू। दरअसल बंगलादेश से आए घुसपैठिए प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के मुसलमानों से हाथ मिलाकर गांवों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं और हिन्दू डर के मारे अपना घर-बार छोड़कर शहरों में आकर बस रहे हैं।

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अश्वनी मिश्र, बशीरहाट-बादुरिया से लौटकर प. बंगाल में सत्ता की आंखें बंद हैं और मजहबी उन्मादियों ने हिन्दुओं पर हिं.....

बंगाल में लगातार बढ़ती जा रही मुस्लिम आबादी
पश्चिम बंगाल में 1951 की जनसंख्या के हिसाब से 2011 में हिंदुओं की जनसंख्या में भारी कमी आई है। 2011 की जनगणना ने खतरनाक जनसंख्यिकीय तथ्यों को उजागर किया है। जब अखिल स्तर पर भारत की हिन्दू आबादी 0.7 प्रतिशत कम हुई है तो वहीं सिर्फ बंगाल में ही हिन्दुओं की आबादी में 1.94 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो कि बहुत ज्यादा है। राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की आबादी में 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि सिर्फ बंगाल में मुसलमानों की आबादी 1.77 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो राष्ट्रीय स्तर से भी कहीं दुगनी दर से बढ़ी है।


क्या गिरिराज सिंह को हरा सकेंगे कन्हैया कुमार?

Quaint Media, Quaint Media consultant pvt ltd, Quaint Media archives, Quaint Media pvt ltd archives, Live Bihar, Live Indiaगुजरात के विधायक और दलित नेता जिग्नेश मेवानी बेगूसराय पहुंच गए हैं। उनका कहना है कि “भात-दाल-चोखा खाएंगे, कन्हैया कुमार को जीताएंगे।” सिर्फ मेवानी ही नहीं देश के कई हिस्सों से लोग कन्हैया को जीताने के लिए बेगूसराय पहुंच रहे हैं। शबाना आज़मी और स्वरा भास्कर तो समर्थन दे ही रही हैं, सम्भव है, #metoo, #awardvapsi, #notinmyname, #moblynching, #intolerance आदि गैंग भी समर्थन में आ जाए, कोई बड़ी बात नहीं। महज चंद घंटों में ही क्राउड फंडिंग के जरिए कन्हैया को 30 लाख रुपये भी मिल गए हैं। मतलब माहौल बनने लगा है। खबरें बनने लगी हैं। लेकिन इन सबके बीच सवाल यही है कि क्या कन्हैया चुनाव जीतने की हैसियत में हैं? इसका उत्तर जानने के लिए हमें बेगूसराय और बिहार के मौजूदा हालात पर गौर करना होगा।   
बिहार में इस बार का चुनाव बीते चुनावों से अलग है। वोटों का विभाजन सीधे तौर पर दो धड़ों – एनडीए और महागठबंधन – के बीच होने जा रहा है। सूबे में लंबे समय बाद लालू यादव ने गैर बीजेपी वोटों में विभाजन को रोकने के लिए सभी को एक सूत्र में पिरो दिया है। पूरे प्रदेश में कुछ सीटें ही ऐसी हैं जहां किसी ताकतवर नेता के मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। बांका और बेगूसराय ऐसी ही दो सीटें हैं। बीजेपी ने बांका की सीट जेडीयू को सौंप दी। जिसकी वजह से पुतुल कुमारी ने बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला लिया। वो दिग्विजय सिंह की पत्नी हैं और उनके निधन के बाद वहां से चुनाव जीत चुकी हैं। इस बार भी उनके मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। इस त्रिकोणीय मुकाबले पर चर्चा फिर कभी होगी। अभी हम अपनी चर्चा को बेगूसराय और कन्हैया कुमार पर ही केंद्रित रखते हैं।
कन्हैया युवा नेता हैं। भाषण अच्छा दे लेते हैं। जेएनयू से पढ़े लिखे हैं। और जाति से भूमिहार हैं। बेगूसराय में करीब पौने पांच लाख भूमिहार मतदाता हैं। इसलिए कन्हैया के चुनाव लड़ने से वहां माहौल अच्छा बनेगा। इतना ही नहीं, जिस तरह बेगूसराय में जिग्नेश मेवानी जैसे लोग इकट्टठा हो रहे हैं उससे माहौल और रोचक होगा। हल्ला होगा। नाच-गाना होगा। भाषणबाजी होगी। अच्छे विजुअल बनेंगे। टीवी के लिए रोचक खबरें बनेंगी।
लेकिन माहौल बनने से क्या कन्हैया चुनाव जीत जाएंगे? इसका सीधा जवाब है - नहीं जीतेंगे। बेगूसराय के सभी समीकरण उनके खिलाफ हैं। तो फिर इस त्रिकोणीय मुकाबले में कौन जीतेगा? वो जीतेगा जिसे कन्हैया कम नुकसान पहुंचाएंगे। अगर बीजेपी के वोट में सेंध ज्यादा लगी और भूमिहार पूरी तरह से कन्हैया के समर्थन में चले गए तो फिर गिरिराज हार जाएंगे और अगर गैर बीजेपी वोटों में विभाजन ज्यादा हुआ और मुसलमान भी दो हिस्सों में बंटे तो फिर गिरिराज जीत जाएंगे।
अब सवाल उठता है कि आखिर कन्हैया किन परिस्थितियों में चुनाव जीत जाते? कन्हैया तब जीतते जब लड़ाई सिर्फ गिरिराज सिंह से होती। उन्हें महागठबंधन का साझा उम्मीदवार बनाया गया होता। उस स्थिति में गिरिराज को हराया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं होने पर कन्हैया को चाहिए था कि महागठबंधन के लिए काम करते। अपनी सियासी जमीन तैयार करते। लेकिन उन्होंने और उनके संगठन ने हड़बड़ी में चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया।
कन्हैया का दावा है कि उनकी लड़ाई गिरिराज सिंह से है। नरेंद्र मोदी और बीजेपी से है। यह बेतुकी बात है। उनकी लड़ाई गिरिराज सिंह के साथ तो है ही, लेकिन अब उनकी लड़ाई तेजस्वी यादव से भी है। बल्कि पहली लड़ाई तो तेजस्वी यादव से ही है। महागठबंधन के सभी वोटों को अपनी तरफ किए बगैर कन्हैया जीत हासिल नहीं कर सकते। अगर कन्हैया को जीतना है तो सबसे पहले उन्हें तेजस्वी को हराना होगा। बेगूसराय से महागठबंधन को खत्म करना होगा। सभी गैर बीजेपी वोटों को अपनी तरफ करना होगा।
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आखिरकार वह गैंग बाहर आ ही गया, जिसका इन्तजार था। समझ नहीं आ रहा था कि #metoo#not in my name, #intolerance#mob lynching, #award vapsi आदि गैंग कहाँ है, चुनावों की बिसात बिछ चुकी है, लेकिन ये गैंग पता नहीं कहाँ है? चलो देर आए, दुरुस्त आए। अपनी औकात दिखाने आ ही गए। इस गैंग को केवल सिक्के का एक ही पहलु दिखता है, दूसरा नहीं। जब तक ये गैंग सक्रीय रहेगा, भारत देश में सौहार्द रह ही नहीं सकता। इस गैंग को इस वीडियो को देख माफ़ी माँगनी चाहिए:


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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आखिरकार वह गैंग बाहर आ ही गया, जिसका इन्तजार था। समझ नहीं आ रहा था कि #metoo, #not in my name, #intoleran...

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लोकसभा चुनाव आने वाले हैं और इस बीच लोग अपने पसंदीदा कैंडिडेट को पूरा सपोर्ट कर रहे हैं. ऐसे में कई सेलेब्स ट्रोलर्....

बेगूसराय में करीब पौने पांच लाख भूमिहार मतदाता हैं। डेढ़ लाख यादव और ढाई लाख मुसलमान है। जीत के लिए कन्हैया को बड़ी संख्या में भूमिहार वोटों के साथ यादव और मुसलमान वोट भी चाहिए। अब आप ही सोचिए कि क्या ऐसा होने जा रहा है? क्या मुसलमान और यादव महागठबंधन को छोड़ कर, तेजस्वी यादव को छोड़ कर कन्हैया के पक्ष में मतदान करेंगे? क्या सच में ऐसा होगा कि बेगूसराय में गिरिराज और तेजस्वी दोनों ही हार जाएंगे और जीत कन्हैया की होगी? मेरी समझ से ऐसा नहीं होने जा रहा। ऐसा हुआ तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।