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असम विधानसभा में UCC विधेयक, बहुविवाह पर रोक, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य


असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े एक बड़े मुद्दे पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विधानसभा में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश कर दिया है।

सोमवार (25 मई 2026) को विधानसभा में पेश किए गए ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026’ बिल के जरिए सरकार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बहुविवाह और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढाँचे में लाना चाहती है।

हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी और पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों को इस कानून से बाहर रखा गया है। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद UCC लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा।

सरकार का दावा है कि यह कानून महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करेगा। खास बात यह है कि बिल में पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से परिभाषित करते हुए उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

साथ ही बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगाने और सभी विवाह तथा तलाक का पंजीकरण जरूरी करने की बात कही गई है।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड और क्यों है इसकी चर्चा?

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब ऐसा कानून है जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। अभी भारत में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। उदाहरण के लिए हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट आदि।

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करने की बात कही गई है। हालाँकि स्वतंत्रता के बाद से अब तक केंद्र स्तर पर पूरे देश में UCC लागू नहीं हो सका। असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले BJP ने अपने घोषणा पत्र में UCC लागू करने का वादा किया था।

असम UCC बिल में क्या-क्या बड़े प्रावधान हैं?

असम सरकार द्वारा पेश किए गए विधेयक में कई अहम बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा प्रावधान बहुविवाह पर प्रतिबंध है। यानी अब किसी भी समुदाय में एक से अधिक शादी की अनुमति नहीं होगी। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।

विधेयक में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है। यह प्रावधान मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुरूप है, लेकिन अब इसे सभी समुदायों पर समान रूप से लागू करने की कोशिश की जा रही है। बिल के अनुसार, सभी विवाहों और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा।

यानी केवल धार्मिक रीति-रिवाजों से शादी करने के अलावा उसका कानूनी रजिस्ट्रेशन भी जरूरी होगा। सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और विवादों की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहेगा। विधेयक उत्तराधिकार यानी संपत्ति के बंटवारे के लिए भी समान नियम लागू करने की बात करता है।

सरकार का दावा है कि इससे संपत्ति के हस्तांतरण में पारदर्शिता आएगी और महिलाओं को परिवार की संपत्ति में अधिक सुरक्षा मिलेगी। सबसे चर्चित प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। पहली बार किसी कानून में लिव-इन संबंधों के लिए अलग कानूनी ढाँचा तैयार किया गया है।

इसके तहत शादी किए बिना साथ रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। सरकार का कहना है कि इससे ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों को कानूनी पहचान और सुरक्षा मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप पर कानून क्यों बना रही है सरकार?

असम UCC बिल का सबसे नया और बहस वाला हिस्सा लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी नियमन है। सरकार का तर्क है कि समाज में ऐसे संबंधों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इनके लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं होने के कारण कई बार महिलाएँ और बच्चे असुरक्षित रह जाते हैं।

यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक किसी साथी के साथ रहकर बाद में उसे छोड़ देता है, तो मौजूदा व्यवस्था में पीड़ित पक्ष के लिए कानूनी लड़ाई जटिल हो जाती है। सरकार का कहना है कि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से ऐसे संबंधों का रिकॉर्ड रहेगा और जरूरत पड़ने पर महिला अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेगी।

बिल में यह भी कहा गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान माना जाएगा। इससे उत्तराधिकार और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने की कोशिश होगी। हालाँकि अभी तक विधेयक के विस्तृत नियम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि रजिस्ट्रेशन कितने दिनों के भीतर कराना होगा, रजिस्ट्रेशन न कराने पर क्या सजा होगी, किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी और सत्यापन की प्रक्रिया क्या होगी। इन बिंदुओं पर विधानसभा में चर्चा और अंतिम अधिसूचना के बाद स्थिति साफ हो सकती है।

विधेयक यह भी स्पष्ट करता है कि यदि किसी लिव-इन रिलेशनशिप में कोई साथी पहले से विवाहित है या नाबालिग है, तो ऐसे संबंध का पंजीकरण नहीं किया जाएगा।

किन लोगों को UCC से रखा गया है बाहर?

असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सरकार ने इस बिल में कुछ महत्वपूर्ण छूट भी दी है। विधेयक के अनुसार राज्य की अनुसूचित जनजातियों यानी शेड्युल्ड ट्राइब्स (Scheduled Tribes) पर यह कानून लागू नहीं होगा। इसमें पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों की जनजातियाँ शामिल हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, असम की लगभग 12.45 प्रतिशत आबादी जनजातीय समुदायों से आती है। सरकार का कहना है कि इन समुदायों की पारंपरिक सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए उन्हें UCC से बाहर रखा गया है।

इसके अलावा बिल में कहा गया है कि धार्मिक और पारंपरिक रस्मों के अनुसार विवाह करने की स्वतंत्रता बनी रहेगी। यानी लोग अपने धर्म और समुदाय की परंपराओं के अनुसार शादी कर सकेंगे, लेकिन उसका कानूनी पंजीकरण जरूरी होगा।

BJP ने अपने चुनावी वादे में भी स्पष्ट किया था कि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों को UCC से छूट दी जाएगी। इससे सरकार जनजातीय संगठनों की आशंकाओं को कम करना चाहती है।

उत्तराखंड और गुजरात के UCC से कितना अलग है असम मॉडल?

उत्तराखंड देश का पहला राज्य था जिसने 2024 में UCC कानून पारित किया और जनवरी 2025 से उसे लागू भी कर दिया। उत्तराखंड UCC में भी लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया गया था। वहाँ किसी जोड़े को साथ रहने के एक महीने के भीतर अपना संबंध पंजीकृत कराना होता है।

यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो तीन महीने तक की जेल, 10 हजार रुपए तक जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान रखा गया है। उत्तराखंड कानून में रजिस्ट्रार को यह अधिकार भी दिया गया कि यदि कोई साथी 21 वर्ष से कम उम्र का है, तो उसके माता-पिता को जानकारी दी जाए। इसके अलावा संबंध समाप्त होने की सूचना पुलिस को देने का प्रावधान भी था।

इनमें से कुछ प्रावधानों को लेकर निजता के अधिकार पर सवाल उठे थे। बाद में उत्तराखंड सरकार ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर कुछ नियमों में बदलाव की जानकारी दी। उदाहरण के लिए आधार कार्ड और सामुदायिक प्रमाणपत्र की अनिवार्यता हटाई गई तथा गर्भावस्था की सूचना देने वाला नियम भी समाप्त किया गया।

गुजरात ने मार्च 2026 में अपना UCC बिल पारित किया। वहाँ भी लिव-इन रिलेशनशिप को ‘विवाह जैसी प्रकृति वाला संबंध’ बताया गया और लगभग उत्तराखंड जैसे प्रावधान रखे गए।

असम का मॉडल कई मामलों में उत्तराखंड और गुजरात से प्रेरित माना जा रहा है, लेकिन इसमें जनजातीय समुदायों को स्पष्ट छूट देकर स्थानीय सामाजिक संरचना को ध्यान में रखने की कोशिश की गई है।

असम में UCC लागू होने से क्या बदल सकता है?

यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो असम में पारिवारिक और व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक समान कानूनी ढाँचा बनने से प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अधिक स्पष्ट हो सकती हैं।
सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं को संपत्ति और वैवाहिक अधिकारों के मामलों में अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी। बहुविवाह पर रोक लगने से एकल विवाह व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलेगी।
लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण से ऐसे संबंधों में रहने वाले लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों, को कानूनी पहचान मिल सकती है। इससे भविष्य में उत्तराधिकार, भरण-पोषण और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा विवाह और तलाक के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से सरकारी रिकॉर्ड अधिक व्यवस्थित होंगे और कानूनी मामलों में प्रमाण जुटाना आसान हो सकता है। असम सरकार इसे सामाजिक सुधार और कानूनी समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।
अब विधानसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा और मतदान होना है। यदि बिल पारित होता है, तो असम देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहाँ समान नागरिक संहिता को जमीन पर लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।

भारत में शरिया नहीं चल सकता, जिसे जाना हो पाकिस्तान जाए, कोई नहीं रोकेगा, वहां पूरा शरिया मिलेगा मुस्लिमों को; अब देश नहीं टूटेगा; AIMPLB पर महिला आयोग कार्रवाई करे

सुभाष चन्द्र

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का हनन कहा है और कहा कि यह फैसला शरीयत से मतभेद पैदा करता है और गुजारा भत्ता महिलाओं के लिए “भीख” है। अगर तलाकशुदा महिला को गुजाराभत्ता मांगना भीख है तो हज के लिए सब्सिडी भीख नहीं? 

सबसे बड़ी बात है कि AIMPLB की सदस्य प्रो.मुनिसा बुशरा आबिदी ने महिला होते हुए गुजारे भत्ते को भीख बताते हुए कहा कि “जब महिला अपने पति से सारे रिश्ते ख़त्म कर चुकी है तो उसके सामने भीख मांगने क्यों जाए? उसकी जगह वह खुद से कुछ काम-धंधा कर सकती है

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चर्चित YouTuber 
“पति-भाई भी उसका गुजारा उठा सकते हैं”, वह उस पति की बात कर रही है जिसने तलाक दे दिया और भाई पर जिम्मेदारी क्यों? यहाँ बुशरा का दोगलापन साफ नज़र आ रहा है जो इसे बताना पड़ेगा कि "पति-भाई" से क्या मतलब है? क्या महिला पति को भाई बनाए या भाई को पति बनाए? इस रिश्ते को खुलकर बताना होगा। जब पति ने तलाक दे दिया, और उससे गुजरा भत्ता लेने को भीख बता रही तो "पति-भाई" से क्या मतलब है?

मुस्लिम बोर्ड की महिला आबिदी का बयान अत्यंत शर्मनाक है वह भूल गई, गुजारा भत्ता पाना  जैसे किसी भी तलाकशुदा महिला का अधिकार होता है वैसे मुस्लिम महिला का भी है लेकिन बोर्ड का और खासकर महिला सदस्य का ऐसे अधिकार को “भीख” कहना मुस्लिम महिलाओं का घोर अपमान है और इस तरह के अपमान के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग को संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए

मोहतरमा आबिदी और पर्सनल लॉ बोर्ड की ऐसी सोच की वजह से ही मुस्लिम पुरुषों को बढ़ावा मिलता है आए दिन महिलाओं को तलाक देकर बार बार शादी करने के लिए मैडम आबिदी, तलाक में महिला अपने पति से सारे रिश्ते ख़त्म नहीं करती, बल्कि उसका शौहर उसे तलाक देकर उससे अपने रिश्ते ख़त्म  करता है और उसके लिए उसे गुजारा भत्ता देना लाजमी है महिला तलाक नहीं देती, बल्कि मुस्लिम महिला तो “खुला” देती है जिसे शौहर माने या न माने

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो के फैसले के बाद भी उत्पात मचाया था और अब फिर वह तकरार के रास्ते पर है लेकिन शाहबानो के समय राजीव गांधी झुक गए थे लेकिन अब बोर्ड को पता है कि जिस मोदी ने ट्रिपल तलाक ख़त्म कर दिया वह उनके दबाव में नहीं आना वाला चाहे मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक से मुक्ति पाने के बाद भी मोदी को वोट नहीं दिया लेकिन मोदी ने समाज के हित में वह काम किया एक साधू की तरह और अब यह मुस्लिम महिलाओं की मूर्खता थी जो उन्होंने मोदी के उपकार को नहीं समझा

सबसे बड़ी बात यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठन Civil Laws के मामले में तो संविधान की दुहाई देकर शरिया के अनुसार चलने की बात करते हैं लेकिन जब मामला Criminal Laws का होता है तो उसमे शरिया के अनुसार फैसले नहीं चाहता शरिया की याद महिलाओं के अधिकार के समय ही क्यों आती है? अगर शौहर ने गलती से भी तलाक दे दिया तो बीबी को हलाला करना है, क्यों? शौहर को क्यों नहीं? इससे बड़ा दोगलापन नहीं हो सकता यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं है कि सब कुछ आपकी मर्जी से हो

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठन जिस तरह चल रहे हैं उसे देख कर लगता है वे देश तोड़ने की फ़िराक में हैं लेकिन देश तो अब नहीं टूटेगा और उन्हें अगर शरिया ही चाहिए तो उसके लिए मुस्लिम पाकिस्तान ले चुके हैं और शरिया के लिए वे वहां जा सकते हैं। भारत में न्याय से और संविधान से ही शासन चलेगा

   

जब पाकिस्तान बना था उस वक्त पाकिस्तान और उसके पूर्वी पाकिस्तान की आबादी कुल मिला कर 7.5 करोड़ थी और भारत में मुसलमान 3.5 करोड़ थे पाकिस्तान और बांग्लादेश की आबादी आज 42 करोड़ है यानी 6 गुना बढ़ी है जबकि भारत में मुसलमान 8 गुना बढ़ कर 20 से 25 करोड़ हैं, यानी गांधी और नेहरू का एक और पाकिस्तान बनाने का सपना सच करने की फ़िराक में हैं भारत के मुस्लिम 

ये मुसलमानों को सोचना होगा वो चाहते क्या है?

कांग्रेस और इंडी ठगबंधन के सभी “खलीफा” महिलाओं के गुजारा भत्ते पर खामोश हैं

ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति के बाद भी मोदी को वोट न देने वाली मुस्लिम औरतों को अब कुछ समझ आया ? सुप्रीम कोर्ट ने नए फैसले में मोदी के कानून में ही उन्हें गुजारा भत्ते के अधिकार दिए हैं

सुभाष चन्द्र

वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने शाहबानो केस में CrPc के section 125 मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ के बाद अपने शौहर से गुजारा  भत्ता लेने का अधिकार दिया था। उस बेंच में जज थे - चीफ जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़, जस्टिस रंगनाथ मिश्रा, जस्टिस डी ए देसाई, जस्टिस ओ चिनप्पा रेड्डी और जस्टिस E S Vekkataramaiah इस फैसले में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के फैसले की पुष्टि की गई थी और मौहम्मद अहमद खान को अपनी पत्नी शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए गए थे फैसले में कहा गया था मुस्लिम पर्सनल लॉ के रहते हुए भी तलाकशुदा औरत को CrPc के section 125 में गुजारा भाता लेने का अधिकार है

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चर्चित YouTuber 

लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मुस्लिम संगठनों के दबाव में और मुस्लिम तुष्टिकरण की खातिर संसद में बिल पास करा कर वह आदेश रद्द कर दिया और मुस्लिम औरतें फिर अपनी पतियों की रहमोकरम पर सड़कों पर आ गई लेकिन 30 साल बाद नरेंद्र मोदी ने उन्हें ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति दिलाई और रात के अंधेरे में छोटी छोटी बात पर बच्चों के साथ घर से निकाले जाने से छुटकारा दिलाया लेकिन वे औरतें सब भूल गई और मोदी को 2024 के इलेक्शन में तबियत से उसे हटाने के लिए वोट दिया।  

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने के निर्णय से मुस्लिम कट्टरपंथियों में बड़ी जबरदस्त खलबली मच गयी है। उनके द्वारा इसे इस्लाम पर हमला बताया जा रहा है। जुलाई 11 को टीवी परिचर्चाओं में सहभागी बने मौलानाओं को पहली बार जलील होते देखा। सबसे बड़ी बात News18 पर एंकर लुबिका लियाकत द्वारा उस तस्लीम रहमानी को, जिसके कारण निर्दोष नूपुर शर्मा को 'सर तन से जुदा' गैंग की वजह से गुमनामी जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ा, मुंह काला करने को बोल दिया। नीचे देखिए वीडियो। 

हो सकता है कि ये कट्टरपंथी जितना ज्यादा इस मुद्दे को उछलेंगे, उतना ही इस्लाम के लिए नुकसानदेह होने वाला है। इन परिचर्चाओं में एक बात मुखर हुई की निकाह एक contract है, लेकिन ये नहीं बता रहे कि contract for what? हलाला? आने वाले समय में यही contract for what गरमाने वाला है। दूसरे, इन परिचर्चाओं में एक बात और सामने आयी कि 'जब कोई पुरुष चोरी करता है, जेब काटता है, क़त्ल करता है आदि अपराध करने पर कोर्ट को क्यों जाते हैं, तब शरीयत कहाँ चली जाती है? औरतों के अधिकारों पर ही शरीयत क्यों जरुरी हो जाती है?  

    

जुलाई 10 को भी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस B V Nagarathna  और जस्टिस Augustine George Masih की पीठ ने एक बार फिर section 125 में मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता पाने के अधिकार को सही कहा और यह भी कहा कि यदि किसी महिला की अर्जी Section 125 में लंबित है तो वह The Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 के अंतर्गत भी अपना अधिकार मांग सकती है

इसी क़ानून में ट्रिपल तलाक़ देने वाले को 3 साल की सजा का प्रावधान किया गया था जिसके खिलाफ बड़े बड़े मौलाना लड़ते रहे हैं 

जुलाई 10 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी तेलंगाना हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक मुस्लिम द्वारा लड़ा गया था और हाई कोर्ट ने उसे अपनी तलाकशुदा पत्नी को 10 हजार रूपए महीने गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है  

ऐसे में अब सवाल उठता है कि जो नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम महिलाओं के लिए किया, वह उनके ही हित में था लेकिन कुल मिला कर औरतों समेत 98% मुसलमानों ने मोदी को हटाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया और कांग्रेस के तलुए चाटने लगे जिसने शाहबानो केस से लेकर अभी तक मुस्लिम महिलाओं का साथ नहीं दिया 2024 लोक सभा चुनाव में कुछेक मुस्लिम महिलाओं को बीजेपी को वोट देने के कारण तलाक का सामना करना पड़ा। 

आज भी कांग्रेस जुलाई 10 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद से रद्द कराने के लिए हल्ला ठोकेगी अब देखते हैं मुस्लिम संगठनों ने जिस तरह शाहबानो के फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, अब कितना उत्पात करते हैं 

वैसे तो जो आचरण मुस्लिम महिलाओं ने मोदी के लिए दिखाया है, अब मोदी की तरफ से उनके लिए कुछ भी करना फिर से धोखा खाना होगा क्योंकि ये महिलाएं और मुस्लिम पुरुष किसी हाल में मोदी का समर्थन नहीं करेंगे

कौन है आयशा उमर जिसके कारण टूटा सानिया मिर्जा का निकाह?

                           क्या आयशा उमर (बीच में) के कारण हुआ शोएब मलिक-सानिया मिर्जा का तलाक
आयशा उमर (Ayesha Omar) एक पाकिस्तानी मॉडल-एक्ट्रेस। सानिया मिर्जा और शोएब मलिक के तलाक की जिम्मेदार बताई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि इनके लिए ही शोएब (Shoaib Malik) ने सानिया (Sania Mirza) को धोखा दिया।

सानिया विवाद कोई नया नहीं। पाकिस्तानी क्रिकेटर पहले भारतीय महिला को सब्जबाग दिखा उनको रिझाते हैं, उनके यौवन का भरपूर आनंद लेकर छोड़ देना कोई नई बात नहीं, एक लम्बी सूची बन सकती है। गलती सानिया की है, जो ज़ीनत अमन और रीना रॉय(मुस्लिम होने के बावजूद इस्लामीकरण कर आएशा नाम रखा गया) आदि के कटु अनुभवों से भी कुछ नहीं सीख पायीं। पाकिस्तानियों के सब्जबाग के मकड़जाल में फंसने से पहले हर भारतीय महिला को इन धोखेबाज पाकिस्तानियों को अपने शरीर का आनंद देने के लिए एक बार नहीं लाख बार सोंच होगा। 

शोएब और आयशा की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में चर्चा में बनी हुई हैं। हालाँकि ये बोल्ड फोटोशूट एक मैगजीन के लिए हुआ था। लेकिन रिर्पोटों की माने तो इसी दौरान दोनों करीब आए थे।

पिछले साल शोएब और आयशा उमर साथ नजर आए थे। दोनों ने एक मैगजीन के लिए फोटोशूट कराया था, जिसमें ये दोनों काफी करीब दिखे। ये फोटोशूट स्विमिंग पूल में हुआ। उस समय भी दोनों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई थीं। हैदर नाम के एक यूजर ने लिखा था, “शोएब मलिक ठीक है, लेकिन मुझे आयशा उमर से बहुत उम्मीदें थीं, आप इसके लिए क्यों राजी होंगी?”

शोएब मलिक ने भी इस फोटोशूट को अपने इंस्टाग्राम पर 8 अक्टूबर 2021 को शेयर किया था।

इसके अलावा इन दोनों के कई और फोटोशूट भी वायरल हुए थे। इन फोटो को देखने के बाद पिछले साल से ही सोशल मीडिया पर आयशा उमर और शोएब मलिक के निकाह की चर्चा शुरू हो गई थी। एक यूजर्स ने तो यहाँ तक लिख दिया था, “शोएब मलिक, आयशा उमर के साथ दूसरे निकाह के हकदार हैं।”

आयशा उमर के बाद शोएब ने एक और पाकिस्तानी एक्ट्रेस के साथ बोल्ड फोटोशूट कराया था। इस अभिनेत्री का नाम हनिया आमिर है। हनिया के साथ कराया गया फोटोशूट भी काफी वायरल हुआ था।

सानिया मिर्जा, शोएब मलिक और तलाक

सानिया मिर्जा और शोएब मलिक (Sania Mirza and Shoaib Malik) के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा, इसकी भनक मीडिया को किसी सूत्र से नहीं लगी थी बल्कि खुद सानिया मिर्जा की इंस्टाग्राम स्टोरी से इन अटकलों को बल मिला था। इसमें उन्होंने पूछा था टूटे हुए दिल कहाँ जाते हैं? फिर उन्होंने खुद ही जवाब देते हुए लिखा था कि वो अल्लाह को ढूँढने जाते हैं।
                                         सानिया मिर्जा के ‘टूटे दिल’ वाला पोस्ट
इस पोस्ट को बाद में डिलीट कर दिया गया। इसके बाद सानिया मिर्जा ने अपने बेटे के साथ एक फोटो डाली। कैप्शन में लिखा – “ऐसे लम्हे, जो सबसे मुश्किल दिनों में राहत देते हैं, उससे निकल पाने की शक्ति देते हैं।” वहीं, पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के एक बेहद करीबी शख्स ने इनसाइडस्पोर्ट नाम की वेबसाइट को बताया है कि सानिया मिर्जा और उनके शौहर काफी समय से अलग रह रहे थे। अब औपचारिक रूप से दोनों ने तलाक ले लिया है।

सऊदी अरब : ‘तलाक नहीं दिया तो नंगी होकर सड़क पर निकल जाऊँगी’

प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: saudiexpat
सऊदी अरब से तलाक का एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है। एक महिला ने शौहर को धमकी देते हुए कहा कि यदि उसने तलाक न दिया तो वह नंगी होकर सड़क पर निकल जाएगी। आखिरकार शौहर को घुटने टेकने पड़े और दोनों का तलाक हो गया।

गल्फ न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार बीवी की धमकी के बाद शौहर के पास उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था। हालाँकि तलाक के बाद भी शौहर शरिया अदालत गया। वहाँ उसने तलाक को अपनी मर्जी के खिलाफ बताते हुए रद्द करने की माँग की। लेकिन शरिया कोर्ट ने शौहर की दलीलों को अनसुना कर दिया। कोर्ट के मुताबिक तलाक के लिए शरिया कानून के तहत सभी औपचारिकता पूरी हो चुकी थी।

इसी सप्ताह सऊदी अरब में ही एक अन्य केस में एक शौहर ने अपनी बीवी को इसलिए तलाक दे दिया था क्योंकि वो निकाह से पहले सिगरेट पीती थी। अपने वकील के माध्यम से पीड़िता ने बताया था कि निकाह के बाद उसने सिगरेट पीना छोड़ दिया था। इसके बाद भी उसके शौहर ने यह कह कर तलाक ले लिया था कि क्या गारंटी ये भविष्य में सिगरेट नहीं पिएगी। इस मामले में कोर्ट ने महिला को पति से पहले लिए गए रुपए लौटाने का भी आदेश दिया था। इसी तरह एक अन्य मामले में सऊदी अरब में शौहर ने निकाह के तीन महीने बाद ही बीवी को तलाक ​दे दिया था। रिपोर्टों बताया गया था कि एक विवाद के बाद बीवी ने शौहर को व्हाट्सएप पर ब्लॉक कर दिया, जिसके बाद उसने उसे तलाक दे दिया।

सऊदी अरब में बढ़े तलाक के मामले

पिछले कुछ समय में सऊदी अरब में तलाक के मामलों में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। वहाँ के सांख्यिकी प्राधिकरण द्वारा जारी आँकड़ों के मुताबिक सऊदी अरब में हर घंटे तलाक के 7 केस सामने आ रहे हैं। खुद सऊदी सरकार ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है कि पिछले एक दशक में वहाँ तलाक के मामलों में 60 प्रतिशत बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। सऊदी सरकार ने तलाक के मामलों में पीड़िताओं की आर्थिक मदद के लिए के लिए कुछ विशेष कदम भी उठाए हैं।