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महिला सशक्तीकरण के नाम पर बीजेपी को सत्ता पाने की लालसा तो कर्नाटक में 6 लाख सरकारी कर्मचारियों को वेतन के लाले

                                 सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका (AI फोटो साभार: Dall-E)
एक तरफ राज्यों में होने वाले चुनावों में सत्ता पाने के लिए बीजेपी महिला सशक्तिकरण बिल से महिलाओं को लुभाने में लगी है तो कर्नाटक में सरकारी कर्मचारी अपने वेतन के लिए तरस रहे हैं। ये फ्री की रेवड़ियों से कितना नुकसान हो रहा है जिसे विपक्ष की राज्य सरकारों में साफ-साफ देखा जा सकता है। ये वही मुफ्त की रेवड़ियां है जिनके लिए अरविन्द केजरीवाल का सभी पार्टियों ने विरोध जिन दुष्परिणामों को बता किया था, लेकिन सत्ता पाने की लालसा में उसी मकड़जाल में सभी पार्टियां फंस गयीं। बीजेपी शासित राज्यों में दुष्प्रभाव इसलिए नहीं दिख रहा कि केंद्र में भी बीजेपी सरकार है। दूसरे, बीजेपी जानती थी कि महिला बिल पास नहीं होगा उसके बावजूद बिल पेश करना क्या महिला वोट लेने का लालच नहीं? वर्तमान में आरक्षित करने में क्यों दर्द हो रहा है? जिस चुनाव में जिस पार्टी ने फ्री की रेवड़ियों को बंद करने की बात कही उसी पार्टी का सूपड़ा साफ होना तय है, चाहे बीजेपी ही क्यों न हो। 

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मुफ्त रेवड़ियों के वादे किए, लेकिन सत्ता में आने के दो साल बाद भी यह बोझ आम आदमी की झेल रहा है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका हुआ है। हालात यह है कि लाखों कर्मचारी अप्रैल का आधा महीना गुजरने के बाद भी मार्च 2026 के वेतन का इंतजार कर रहे हैं।

मामला सीधे तौर पर राज्य के करीब 6 लाख कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें हर महीने की तरह अप्रैल के पहले हफ्ते में वेतन मिल जाना चाहिए था। लेकिन इस बार 10 अप्रैल तक भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समस्या एक-दो विभाग तक सीमित नहीं है। शिक्षा, राजस्व, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के कर्मचारी इस देरी से प्रभावित हुए हैं। यानी पूरा प्रशासनिक ढाँचा ही इसकी चपेट में आ गया है।

सरकारी कर्मचारियों को वेतन न मिलने की वजह?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस देरी की दो बड़ी वजहें सामने आ रही हैं। पहली- फंड की कमी और दूसरी- ट्रेजरी और प्रोसेसिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें। अधिकारियों का कहना है कि वित्तीय वर्ष खत्म होने के समय भुगतान का दबाव बढ़ जाता है, जिससे देरी हो जाती है।

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। राज्य की कांग्रेस सरकार पर पर आरोप सामने आए हैं कि सरकार ने करीब 6000 करोड़ रूपए की रकम अपनी गारंटी स्कीम्स, खासकर ‘गृहलक्ष्मी योजना’ की ओर डायवर्ट की है, जिससे वेतन भुगतान पर असर पड़ा।

वहीं राज्य के वित्तीय विभाग के अधिकारियों से एक और अहम बात सामने आई है। कई जगह ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDOs) ने समय पर बिल प्रोसेस नहीं किए, जिसकी वजह से भुगतान और अटक गया। यानी समस्या सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढिलाई की भी है।

वेतन में देरी का असर?

हालाँकि, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि हर साल मार्च-अप्रैल के दौरान 2-3 दिन की देरी सामान्य मानी जाती है, लेकिन इस बार 10 दिन से ज्यादा देरी हो चुकी है, जो असामान्य है। यही वजह है कि कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है।

जमीनी स्तर पर इसका सीधा असर दिख रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि सैलरी न मिलने से EMI, बच्चों की फीस, किराया और रोजमर्रा के खर्च प्रभावित हो रहे हैं। कई लोगों को उधार लेने की नौबत आ गई है।

कुल मिलाकर, यह सिर्फ वेतन में देरी का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक तरफ सरकार की गारंटी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, दूसरी तरफ 6 लाख कर्मचारियों की सैलरी समय पर नहीं देना प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर चिंता बढ़ाने वाला संकेत है।

राज्य में जीत को कांग्रेस ने किए थे ‘रेवड़ी’ वादे

2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने पाँच गारंटी दी थी। इन्हें ‘रेवड़ी’ कहा गया था। कांग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देगी। इसे गृह ज्योति योजना का नाम दिया गया था। इसके अलावा गृह लक्ष्मी नाम की योजना का भी एक वादा किया गया था। इसके अंतर्गत कांग्रेस ने वादा किया था कि वह राज्य की महिलाओं को 2000 रूपए प्रतिमाह देगी।

कांग्रेस ने कर्नाटक की आर्थिक स्थिति और मुफ्त सुविधाओं के वादों से अर्थव्यस्था पर पड़ने वाले बोझ को दरकिनार करते हुए हर परिवार को 10 किलो अनाज देने का भी वादा किया था, इसे अन्न भाग्य योजना का नाम दिया गया था। कांग्रेस ने राज्य में महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का भी वादा किया था। इसके अलावा राज्य के बेरोजगार युवाओं को भी 1500 रूपए देने की बात कही गई थी। इनमें से कुछ योजनाएँ पूरी तरह से लागू कर दी गई हैं तो कुछ को आंशिक रूप से लागू किया गया है।

कांग्रेस के इन ‘रेवड़ी’ वादों का असर अब राज्य के खजाने पर दिख रहा है और वह राजस्व बढ़ाने के लिए नई-नई जुगत भिड़ा रही है। वह राज्य की आम जनता को अब नए कर और बढ़े करों से लादना चाह रही है। साथ ही वह कमाई के नए जुगाड़ भी लगा रही है। सरकारी कर्मचारियों का लटका वेतन भी इसी का असर है।

डीजल-पेट्रोल के बाद पानी और बसों के किराए बढ़ाने की तैयारी

इससे पहले भी कांग्रेस सरकार ने अपना खजाना भरने के लिए जनता पर बोझ डाला है। राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे। कांग्रेस सरकार ने राज्य में पेट्रोल और डीजल पर सेल्स टैक्स बढ़ाया था। इसके अंतर्गत पेट्रोल और डीजल के दाम राज्य क्रमशः 3 रूपए और 3.50 रूपए बढ़ गए थे। इसको लेकर कॉन्ग्रेस सरकार की खूब आलोचना हुई थी। यह निर्णय लोकसभा चुनाव के आने के तुरंत बाद लिया गया था।

पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने से भी कांग्रेस सरकार का खजाना पूरा नहीं पड़ा कि फिर कांग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु में पानी आपूर्ति के दाम बढ़ाने का ऐलान कर दिया था। उपमुख्यमंत्री शिवकुमार का दावा है कि बेंगलुरु का जल आपूर्ति विभाग अपना बिजली का बिल और कर्मचारियों की तन्ख्वाह तक नहीं दे पा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि कावेरी नदी से पानी लेने वाले बाशिंदों के लिए पानी की कीमतें 40% बढ़ाए जाने की तैयारी की।

कर्नाटक : कांग्रेस सरकार की ‘खटाखट’ लुभावनी योजनाओं ने कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कर दिया बर्बाद


कर्नाटक की आर्थिक हालत दो साल में बिगड़ गई है। साल 2023 में बीजेपी सरकार के समय सरप्लस बजट था, लेकिन अब कांग्रेस के राज में राज्य कर्ज में डूब रहा है, वित्तीय घाटा बढ़ रहा है और विकास परियोजनाओं के लिए पैसा कम हो रहा है।

कम्पट्रोलर और ऑडिटर जनरल (CAG) ने 31 मार्च 2024 के लिए अपनी हालिया स्टेट फाइनेंस ऑडिट रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच ‘गारंटी’ योजनाएँ, जो बड़े धूमधाम से शुरू की गई थीं, राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रही हैं।

CAG की रिपोर्ट ने चिंता जताई

इस हफ्ते कर्नाटक विधानसभा में पेश की गई CAG रिपोर्ट में कांग्रेस सरकार की पाँच कल्याणकारी योजनाओं गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, अन्न भाग्य, शक्ति, और युवा निधि के प्रभाव का पहला सरकारी ऑडिट किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन गारंटी योजनाओं के लिए 2023-24 में 36,538 करोड़ रुपए का बजट रखा गया था, जो राज्य के कुल राजस्व खर्च का 15% है।

इसका असर साफ दिख रहा है। पिछले साल कर्नाटक की आय में सिर्फ 1.86% की बढ़ोतरी हुई, जबकि इन योजनाओं की वजह से खर्च 12.54% बढ़ गया। इस असंतुलन से राज्य को 9,271 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ, जो 2022-23 में कोविड-19 के बाद की रिकवरी को उलट रहा है।

राज्य का वित्तीय घाटा भी 2022-23 में 46,623 करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 65,522 करोड़ रुपए हो गया। इस अंतर को भरने के लिए सरकार ने बाजार से 63,000 करोड़ रुपए उधार लिए, जो पिछले साल के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा है। CAG ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में कर्ज चुकाने का बोझ और ब्याज का खर्च बढ़ेगा।

दूसरी तरफ बुनियादी ढाँचे पर पूँजीगत खर्च 5,229 करोड़ रुपए कम हो गया। इससे ज्यादातर प्रोजेक्ट रुक गए हैं और अधूरे कामों की संख्या 68% बढ़ गई है। CAG ने साफ कहा कि इस तरह की उत्पादक पूँजी में कटौती कर्नाटक के भविष्य के विकास को नुकसान पहुँचाएगी।

कांग्रेस सरकार का दावा है कि ये योजनाएँ असमानता कम करती हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं और मानव पूँजी विकास को बढ़ावा देती हैं। लेकिन CAG ने चेताया कि अगर दूसरी सब्सिडी को कम या तर्कसंगत नहीं किया गया, तो ये गारंटी योजनाएँ ‘राज्य की वित्तीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डालेंगी।’

इन योजनाओं के शुरू होने के बाद कर्नाटक स्थिरता से कर्ज और वित्तीय तनाव की स्थिति में पहुँच गया है।

2023 में बीजेपी का संतुलित ‘सरप्लस’ बजट

वर्तमान स्थिति फरवरी 2023 के बिल्कुल उलट है, जब बीजेपी के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने सरप्लस बजट पेश किया था। कई लोगों को उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव के चलते बीजेपी लोकलुभावन वादों के साथ बड़ा दाँव खेलेगी। लेकिन बोम्मई सरकार ने लोकलुभावन घोषणाओं को वित्तीय जिम्मेदारी के साथ संतुलित कर सबको चौंका दिया।

बजट में हर विभाग को ध्यान में रखा गया, बिना राज्य के वित्त को नुकसान पहुँचाए। किसानों, युवाओं और महिलाओं को योजनाओं का केंद्र बनाया गया। कृषि को भारी आवंटन मिला और किसानों के लिए ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा बढ़ाई गई। जैसा कि उम्मीद थी, कोई नया कर नहीं लगाया गया और शराब की कीमतों को भी नहीं छुआ गया।

शिक्षा को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जिसमें 37,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का आवंटन किया गया। बोम्मई ने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त बस पास और महिलाओं – छात्रों के लिए सब्सिडी की घोषणा की।

बुनियादी ढाँचे को भी बोम्मई के बजट में जगह मिली। अपर भद्रा जल परियोजना को 5,300 करोड़ रुपए और कालसा बाँदूरी परियोजना को 1,000 करोड़ रुपए दिए गए। कर्नाटक में पानी के मुद्दे संवेदनशील हैं और ये आवंटन बीजेपी की योजनाओं में प्रमुख थे। बेंगलुरु को भी बेहतर गतिशीलता और ट्रैफिक प्रबंधन के लिए बुनियादी ढाँचा फंडिंग का वादा किया गया।

विपक्ष ने दावा किया कि बोम्मई और ज्यादा लोकलुभावन पहल कर सकते थे, खासकर कॉन्ग्रेस के मुफ्त बिजली और नकद पुरस्कारों की आक्रामक गारंटी के सामने। फिर भी दबाव के बावजूद बीजेपी सरकार ने लोगों के लिए केंद्रित और वित्तीय रूप से समझदार बजट पेश किया। उस साल राज्य को राजस्व सरप्लस भी मिला। यह नाजुक संतुलन अब मौजूदा आँकड़ों से साफ तौर पर उजागर हो रहा है।

सिद्धारमैया की मुफ्त योजनाएँ कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कैसे डुबो रही हैं

2023 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व में कर्नाटक सरकार ने अपनी पाँच गारंटी योजनाएँ शुरू कीं। ये योजनाएँ कांग्रेस के चुनाव अभियान का आधार थीं और माना जाता है कि इनकी वजह से पार्टी को भारी जीत मिली। लेकिन अब इनका अर्थव्यवस्था पर खर्च साफ दिख रहा है।
कांग्रेस के सत्ता में आने के दो महीने बाद जुलाई 2024 में सिद्धारमैया के आर्थिक सलाहकार बसवराज रायरेड्डी ने स्वीकार किया कि इन गारंटी योजनाओं के लिए भारी राशि रखने की वजह से विकास परियोजनाओं के लिए पैसा नहीं बचा है।
उन्होंने खुलासा किया था कि इन योजनाओं पर करीब 65,000 करोड़ रुपए का खर्च आ रहा है। रायरेड्डी ने कहा “लोग विकास चाहते हैं। लेकिन मुझ पर विश्वास करें, बिल्कुल भी पैसा नहीं है। चूँकि मैं वित्तीय सलाहकार हूँ, मैंने यहाँ झील विकास परियोजना के लिए फंड जुटाया।”
कर्नाटक के सभी विधायक अपने क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए फंड जुटाने में असमर्थ हैं। यहाँ तक कि कांग्रेस के नेता भी चुपके से स्वीकार कर रहे हैं कि ये गारंटी योजनाएँ सड़कों, सिंचाई और बुनियादी ढाँचे के लिए जरूरी फंड को खत्म कर रही हैं।
बीजेपी विधायक रमेश जारकिहोली ने कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि वह बेंगलुरु पर ही बचे हुए थोड़े पैसे खर्च कर रही है और बाकी राज्य को अनदेखा कर रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार के समय शुरू हुईं अधिकांश परियोजनाएँ जैसे कि अथानी में बसवेश्वर और अम्माजेश्वरी सिंचाई परियोजनाएँ पूरी तरह ठप हो गई हैं।
कांग्रेस की मुफ्त योजनाओं ने पार्टी के अंदर भी तनाव पैदा किया है। कुछ कांग्रेस नेता दावा करते हैं कि इन योजनाओं से अपेक्षित चुनावी फायदा नहीं मिला और इतने भारी खर्च की कीमत सही थी या नहीं, इस पर सवाल उठ रहे हैं।
वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने कई बार वित्तीय तनाव को स्वीकार किया है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जुलाई 2023 में माना कि पार्टी की गारंटी के लिए 40,000 करोड़ रुपए अलग रखने की वजह से विकास के लिए फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है।

मुफ्त योजनाएँ राज्य के बुनियादी ढाँचे के विकास को प्रभावित कर रही हैं

कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने 24 जून, 2025 को खुले तौर पर कहा कि वित्त मंत्रालय भी संभालने वाले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं के लिए पर्याप्त फंड नहीं है।
गृह मंत्री ने बागलकोट जिले में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, “हमारे पास पैसा नहीं है, सिद्धारमैया के पास भी अब फंड नहीं है। हमने पहले ही सब कुछ लोगों को चावल, दाल और तेल के रूप में दे दिया है, हाँ तेल भी।”
परमेश्वर के मुताबिक, कांग्रेस सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं पर भारी खर्च किया है, जिसके चलते नए पूंजीगत परियोजनाओं के लिए बजट में बहुत कम जगह बची है।
इससे पहले, कर्नाटक के लघु-स्तरीय उद्योग और सार्वजनिक उद्यम मंत्री शरणबसप्पा दर्शनपुर ने कहा था कि कांग्रेस सरकार के पहले साल में बुनियादी ढाँचे का विकास कुछ हद तक प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि यह सिद्धारमैया सरकार की गारंटी योजनाओं की वजह से होगा।
मंत्री ने बताया कि इन गारंटी योजनाओं से खजाने पर 40,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपए का वित्तीय बोझ पड़ेगा।
दर्शनपुर ने कहा, “हमें अपनी पाँच गारंटी योजनाओं को लागू करने के लिए हर साल 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की जरूरत है। इससे विकास कार्य आंशिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।”

FREE bees के नाम पर राहुल गाँधी करते हैं झूठे वादे, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ही खोल दी पोल: BJP ने कहा- जनता से माफी माँगें


2024 लोकसभा चुनावों में 'खटाखट' के नाम पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी द्वारा जो सीटें मिलने पर इतने खुश हो रहे है, भूल रहे है कि अगर 
'खटाखट' का लॉलीपॉप नहीं दिया होता, इन दोनों पार्टियों की प्रतिष्ठा धूमिल हो गयी होती। विदेशी चंदे से कभी चुनाव नहीं जीते जाते, जमीन पर काम करना पड़ता है। किसी भी विपक्षी को मोदी को हराने किसी विदेशी भीख की बजाए सरकार की कमियों को लेकर सड़क पर आना चाहिए था। लेकिन विदेशी भीख जो लेनी थी। CAA विरोध से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन और पहलवान महिलाओं का प्रायोजित आंदोलनों आदि का पर्दाफाश हो गया। जनता को गुमराह करना चाहा लेकिन पांसा सच्चाई सामने आने पर उल्टा पड़ गया। संभावनाएं व्यक्त की जा रही है कि महाराष्ट्र और झारखण्ड हारने पर कांग्रेस में दो फाड़ हो सकते हैं।     

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की वादाखिलाफियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) ने हमला बोल दिया है। दरअसल, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कांग्रेस सरकार की योजनाओं की आलोचना करते हुए सुझाव दिया कि वादे उतने ही किए जाएँ, जितने पूरे हो सकें।

खरगे का ये बयान उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के एक बयान के बाद आया, जिसमें उन्होंने कर्नाटक की “शक्ति योजना” की समीक्षा करने का संकेत दिया था। इस योजना के तहत महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का लाभ दिया जाता है, लेकिन कुछ महिलाओं की ओर से इसके लिए भुगतान करने की इच्छा जताने के बाद इसकी समीक्षा की बात कही गई।

खरगे के बयान को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधा। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का बयान इस बात को साबित करता है कि कांग्रेस चुनावी वादों के जरिए जनता को मूर्ख बनाती है। प्रसाद ने खरगे के बयान को कांग्रेस की स्वीकारोक्ति बताया और कहा कि कांग्रेस ने हमेशा से ही झूठे वादों के बल पर जनता को गुमराह किया है। उन्होंने कांग्रेस के पुराने “गरीबी हटाओ” नारे का भी उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस ने 1971 में ये नारा दिया था, लेकिन गरीबी हटाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।

बीजेपी ने कांग्रेस पर केवल कर्नाटक ही नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में भी झूठे वादों के आधार पर वोट लेने का आरोप लगाया। प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस की ऐसी घोषणाओं का असलियत से कोई लेना-देना नहीं होता और ये केवल कागजों पर ही रहती हैं। बीजेपी नेता ने कहा कि कांग्रेस ने कर्नाटक की जनता को पांच गारंटी का वादा किया था, लेकिन अब “शक्ति योजना” की समीक्षा की बात कहकर एक गारंटी पर पुनर्विचार कर रही है। बीजेपी के मुताबिक, कांग्रेस को अपने वादों पर कायम रहने की सीख लेनी चाहिए और जनता के सामने माफी माँगनी चाहिए।

रविशंकर प्रसाद ने आगे कहा कि कांग्रेस को अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट्र और झारखंड में भी झूठे वादों से जनता को गुमराह करने से बचना चाहिए। उन्होंने बीजेपी की केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा शुरू की गई योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी पार्टी अपने वादों को पूरा करती है। प्रसाद ने लाडली लक्ष्मी योजना, किसान सम्मान निधि, गरीब कल्याण, और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं का उदाहरण दिया और कहा कि ये योजनाएं कांग्रेस के चुनावी वादों से अलग हैं जो पूरी की जाती हैं।