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कर्नाटक : कांग्रेस सरकार की ‘खटाखट’ लुभावनी योजनाओं ने कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कर दिया बर्बाद


कर्नाटक की आर्थिक हालत दो साल में बिगड़ गई है। साल 2023 में बीजेपी सरकार के समय सरप्लस बजट था, लेकिन अब कांग्रेस के राज में राज्य कर्ज में डूब रहा है, वित्तीय घाटा बढ़ रहा है और विकास परियोजनाओं के लिए पैसा कम हो रहा है।

कम्पट्रोलर और ऑडिटर जनरल (CAG) ने 31 मार्च 2024 के लिए अपनी हालिया स्टेट फाइनेंस ऑडिट रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच ‘गारंटी’ योजनाएँ, जो बड़े धूमधाम से शुरू की गई थीं, राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रही हैं।

CAG की रिपोर्ट ने चिंता जताई

इस हफ्ते कर्नाटक विधानसभा में पेश की गई CAG रिपोर्ट में कांग्रेस सरकार की पाँच कल्याणकारी योजनाओं गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, अन्न भाग्य, शक्ति, और युवा निधि के प्रभाव का पहला सरकारी ऑडिट किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन गारंटी योजनाओं के लिए 2023-24 में 36,538 करोड़ रुपए का बजट रखा गया था, जो राज्य के कुल राजस्व खर्च का 15% है।

इसका असर साफ दिख रहा है। पिछले साल कर्नाटक की आय में सिर्फ 1.86% की बढ़ोतरी हुई, जबकि इन योजनाओं की वजह से खर्च 12.54% बढ़ गया। इस असंतुलन से राज्य को 9,271 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ, जो 2022-23 में कोविड-19 के बाद की रिकवरी को उलट रहा है।

राज्य का वित्तीय घाटा भी 2022-23 में 46,623 करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 65,522 करोड़ रुपए हो गया। इस अंतर को भरने के लिए सरकार ने बाजार से 63,000 करोड़ रुपए उधार लिए, जो पिछले साल के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा है। CAG ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में कर्ज चुकाने का बोझ और ब्याज का खर्च बढ़ेगा।

दूसरी तरफ बुनियादी ढाँचे पर पूँजीगत खर्च 5,229 करोड़ रुपए कम हो गया। इससे ज्यादातर प्रोजेक्ट रुक गए हैं और अधूरे कामों की संख्या 68% बढ़ गई है। CAG ने साफ कहा कि इस तरह की उत्पादक पूँजी में कटौती कर्नाटक के भविष्य के विकास को नुकसान पहुँचाएगी।

कांग्रेस सरकार का दावा है कि ये योजनाएँ असमानता कम करती हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं और मानव पूँजी विकास को बढ़ावा देती हैं। लेकिन CAG ने चेताया कि अगर दूसरी सब्सिडी को कम या तर्कसंगत नहीं किया गया, तो ये गारंटी योजनाएँ ‘राज्य की वित्तीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डालेंगी।’

इन योजनाओं के शुरू होने के बाद कर्नाटक स्थिरता से कर्ज और वित्तीय तनाव की स्थिति में पहुँच गया है।

2023 में बीजेपी का संतुलित ‘सरप्लस’ बजट

वर्तमान स्थिति फरवरी 2023 के बिल्कुल उलट है, जब बीजेपी के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने सरप्लस बजट पेश किया था। कई लोगों को उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव के चलते बीजेपी लोकलुभावन वादों के साथ बड़ा दाँव खेलेगी। लेकिन बोम्मई सरकार ने लोकलुभावन घोषणाओं को वित्तीय जिम्मेदारी के साथ संतुलित कर सबको चौंका दिया।

बजट में हर विभाग को ध्यान में रखा गया, बिना राज्य के वित्त को नुकसान पहुँचाए। किसानों, युवाओं और महिलाओं को योजनाओं का केंद्र बनाया गया। कृषि को भारी आवंटन मिला और किसानों के लिए ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा बढ़ाई गई। जैसा कि उम्मीद थी, कोई नया कर नहीं लगाया गया और शराब की कीमतों को भी नहीं छुआ गया।

शिक्षा को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जिसमें 37,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का आवंटन किया गया। बोम्मई ने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त बस पास और महिलाओं – छात्रों के लिए सब्सिडी की घोषणा की।

बुनियादी ढाँचे को भी बोम्मई के बजट में जगह मिली। अपर भद्रा जल परियोजना को 5,300 करोड़ रुपए और कालसा बाँदूरी परियोजना को 1,000 करोड़ रुपए दिए गए। कर्नाटक में पानी के मुद्दे संवेदनशील हैं और ये आवंटन बीजेपी की योजनाओं में प्रमुख थे। बेंगलुरु को भी बेहतर गतिशीलता और ट्रैफिक प्रबंधन के लिए बुनियादी ढाँचा फंडिंग का वादा किया गया।

विपक्ष ने दावा किया कि बोम्मई और ज्यादा लोकलुभावन पहल कर सकते थे, खासकर कॉन्ग्रेस के मुफ्त बिजली और नकद पुरस्कारों की आक्रामक गारंटी के सामने। फिर भी दबाव के बावजूद बीजेपी सरकार ने लोगों के लिए केंद्रित और वित्तीय रूप से समझदार बजट पेश किया। उस साल राज्य को राजस्व सरप्लस भी मिला। यह नाजुक संतुलन अब मौजूदा आँकड़ों से साफ तौर पर उजागर हो रहा है।

सिद्धारमैया की मुफ्त योजनाएँ कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कैसे डुबो रही हैं

2023 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व में कर्नाटक सरकार ने अपनी पाँच गारंटी योजनाएँ शुरू कीं। ये योजनाएँ कांग्रेस के चुनाव अभियान का आधार थीं और माना जाता है कि इनकी वजह से पार्टी को भारी जीत मिली। लेकिन अब इनका अर्थव्यवस्था पर खर्च साफ दिख रहा है।
कांग्रेस के सत्ता में आने के दो महीने बाद जुलाई 2024 में सिद्धारमैया के आर्थिक सलाहकार बसवराज रायरेड्डी ने स्वीकार किया कि इन गारंटी योजनाओं के लिए भारी राशि रखने की वजह से विकास परियोजनाओं के लिए पैसा नहीं बचा है।
उन्होंने खुलासा किया था कि इन योजनाओं पर करीब 65,000 करोड़ रुपए का खर्च आ रहा है। रायरेड्डी ने कहा “लोग विकास चाहते हैं। लेकिन मुझ पर विश्वास करें, बिल्कुल भी पैसा नहीं है। चूँकि मैं वित्तीय सलाहकार हूँ, मैंने यहाँ झील विकास परियोजना के लिए फंड जुटाया।”
कर्नाटक के सभी विधायक अपने क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए फंड जुटाने में असमर्थ हैं। यहाँ तक कि कांग्रेस के नेता भी चुपके से स्वीकार कर रहे हैं कि ये गारंटी योजनाएँ सड़कों, सिंचाई और बुनियादी ढाँचे के लिए जरूरी फंड को खत्म कर रही हैं।
बीजेपी विधायक रमेश जारकिहोली ने कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि वह बेंगलुरु पर ही बचे हुए थोड़े पैसे खर्च कर रही है और बाकी राज्य को अनदेखा कर रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार के समय शुरू हुईं अधिकांश परियोजनाएँ जैसे कि अथानी में बसवेश्वर और अम्माजेश्वरी सिंचाई परियोजनाएँ पूरी तरह ठप हो गई हैं।
कांग्रेस की मुफ्त योजनाओं ने पार्टी के अंदर भी तनाव पैदा किया है। कुछ कांग्रेस नेता दावा करते हैं कि इन योजनाओं से अपेक्षित चुनावी फायदा नहीं मिला और इतने भारी खर्च की कीमत सही थी या नहीं, इस पर सवाल उठ रहे हैं।
वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने कई बार वित्तीय तनाव को स्वीकार किया है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जुलाई 2023 में माना कि पार्टी की गारंटी के लिए 40,000 करोड़ रुपए अलग रखने की वजह से विकास के लिए फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है।

मुफ्त योजनाएँ राज्य के बुनियादी ढाँचे के विकास को प्रभावित कर रही हैं

कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने 24 जून, 2025 को खुले तौर पर कहा कि वित्त मंत्रालय भी संभालने वाले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं के लिए पर्याप्त फंड नहीं है।
गृह मंत्री ने बागलकोट जिले में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, “हमारे पास पैसा नहीं है, सिद्धारमैया के पास भी अब फंड नहीं है। हमने पहले ही सब कुछ लोगों को चावल, दाल और तेल के रूप में दे दिया है, हाँ तेल भी।”
परमेश्वर के मुताबिक, कांग्रेस सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं पर भारी खर्च किया है, जिसके चलते नए पूंजीगत परियोजनाओं के लिए बजट में बहुत कम जगह बची है।
इससे पहले, कर्नाटक के लघु-स्तरीय उद्योग और सार्वजनिक उद्यम मंत्री शरणबसप्पा दर्शनपुर ने कहा था कि कांग्रेस सरकार के पहले साल में बुनियादी ढाँचे का विकास कुछ हद तक प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि यह सिद्धारमैया सरकार की गारंटी योजनाओं की वजह से होगा।
मंत्री ने बताया कि इन गारंटी योजनाओं से खजाने पर 40,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपए का वित्तीय बोझ पड़ेगा।
दर्शनपुर ने कहा, “हमें अपनी पाँच गारंटी योजनाओं को लागू करने के लिए हर साल 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की जरूरत है। इससे विकास कार्य आंशिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।”

वित्त मंत्री ने गोल्ड से इंपोर्ट ड्यूटी घटाने से केरल की ब्लैक इकॉनमी डगमगाई: काला धन घटने से रियल एस्टेट में छाई मंदी

       सोने पर आयात घटने से केरल की अर्थव्यवस्था पर पड़ा असर, तस्करी के मामले भी घटे (फोटो साभार: NDTV)
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जुलाई 2024 में देश में सोने के आयात पर 15% से घटाकर 6% शुल्क लगाने का फैसला लिया। इसका सबसे अधिक असर केरल को हुआ, जहाँ सालों से सोने के अवैध कारोबार के जरिए पैरलल इकॉनमी मजबूत हो रही थी। पैरलल इकॉनमी का मतलब है कि पैसों का लेन-देन तो हो रहा होता है, लेकिन वो किसी सिस्टम में दर्ज नहीं होता। इसी पैरलल इकॉनमी से निकले मनी को ब्लैक मनी भी कहते हैं।

बिजनेस वर्ल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, केरल के चार अतंरराष्ट्रीय हवाई अड्डे- तिरुवनंतपुरम, कोच्चि, कोझिकोड और कन्नुर खाड़ी देशों से सोने की तस्करी करने वाले मुख्य रास्ते हैं। यहाँ तक कि केरल की सोने की तस्करी का गढ़ माने जाने वाले दुबई से भी कनेक्शन मिले। केरल इन खाड़ी देशों से संबंध बेहतर करने के चलते ही ‘तस्करों का स्वर्ग’ बनता गया।

साल 2020 से 2023 तक केरल में 3,100 से अधिक सोना तस्करी के मामले सामने आए, इन सभी मामलों में करीब 200 से 400 टन अवैध सोना बरामद किया गया। लेकिन इससे भी हैरानी की बात यह है कि केरल में हर साल ₹1,31,586 करोड़ (15 अरब डॉलर) की कीमत के सोने की तस्करी होती थी, जो कि जब्त किए गए सोने के मुकाबले काफी कम मानी गई।

यह सोना तस्करी का कारोबार तब तक बढ़ता चला गया जब तक सोने के आयात में अच्छा शुल्क था। उस समय एक किलो सोने में करीब ₹9 लाख का मुनाफा होता, जिसमें से कुछ कैरियर शुल्क भी दिया जाता था। इस मुनाफा ने केवल तस्करों को अमीर नहीं बल्कि केरल की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (जिसका कागजों में कोई आकड़ा नहीं है) को भी गति दी।

इस काले धन से बिना हिसाब-किताब के रीयल एस्टेट डील, ज्वैलरी नेटवर्क और हवाला कारोबार चलाया गया। इससे जुड़ा एक मामला भी सामने आया था, जिसमें एक ज्वैलरी चेन के 4000 निवेशक थे, जो SEBI की सीमा का उल्लंघन है। ऐसी कंपनियाँ मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराध में भी सक्रिय रहती हैं।

लेकिन वित्त मंत्री ने जब से सोने के आयात पर शुल्क घटाने का फैसला लिया है, तभी से यह पूरी व्यवस्था ढह गई है। एक किलों पर मुनाफा घटकर अब करीब ₹3 लाख रह गया है, कैरियर की फीस भी कम हो गई और यहाँ तक की खाड़ी देशों से केरल आने वाला सोना भी अब कम हो गया है। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड ने भी इस फैसले के बाद जब्तियों में तेज गिरावट की पुष्टि की है।

एयर ट्रैफिक के आँकड़े बताते हैं कि खाड़ी देशों से आने वाले यात्रियों की संख्या भी भारत में कम हुई है। यहाँ तक कि गल्फ एयर ने डिमांड कम होने के चलते साल 2025 में कालीकट की उड़ानें बंद कर दीं। इससे साफ है कि तस्करी के तार टूटने लगे हैं।

हालाँकि, इससे कानूनी सोने का व्यापार जरूर बढ़ा और वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने साल 2024 की तीसरी तिमाही में हर साल 18% वृद्धि दर्ज की। लेकिन अवैध नगदी के अचानक गायब होने से केरल की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा। 2024-25 में प्रदेश की GSDP ग्रोथ 6.19% रह गई, जो दक्षिण भारत में सबसे कम थी। रीयल एस्टेट, निर्माण और लग्जरी रिटेल जैसे सभी क्षेत्रों में गिरावट साफ दिखने लगी।

इस मंदी ने साफ कर दिया केरल की अर्थव्यवस्था अब तक काले धन पर निर्भर थी। केरल में प्रॉपर्टी डील 18% घटी, लग्जरी हाउसिंग की कीमतें 25% तक नीचे आईं और निर्माण क्षेत्र की वृद्धि राष्ट्रीय औसत से पीछे रह गई। खाड़ी से आने वाले रेमिटेंस में भी 2024 में 10% की कमी आई, जिससे प्रदेश में काला धन लाने वाले कानूनी और अवैध सोर्स दोनों की कमजोर हो गए।

यह कदम महज एक टैक्स सुधार नहीं था बल्कि एक रणनीतिक प्रहार था, जिसने आतंकवाद फंडिंग और राजनीतिक भ्रष्टाचार से जुड़े एक अपराधिक नेटवर्क को कमजोर कर दिया। लेकिन इस कहानी का राजनीतिक पहलू अभी भी जीवित है। साल 2020 के केरल गोल्ड स्मगलिंग केस की मुख्य आरोपितों में से एक स्वप्ना सुरेश ने 2023 में सनसनीखेज दावा किया कि उन्हें मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का नाम केस से हटाने के लिए 30 करोड़ रुपए की पेशकश हुई थी।

एक फेसबुक लाइव ब्रॉडकास्ट में स्वप्ना सुरेश ने आरोप लगाया कि खुद मुख्यमंत्री ने उन्हें देश छोड़ने की धमकी दी और CPM के प्रदेश सचिव गोविंदन मास्टर के कहने पर पार्टी के लोग उन्हें डराने-धमकाने लगे। यहाँ तक कि उन्हें हरियाणा या जयपुर भेजने की योजना बनाई गई थी, जिसमें सरकार की तरफ से फ्लैट और फर्जी पासपोर्ट की भी व्यवस्था की जा रही थी।

स्वप्ना ने कई बार सीएम विजयन और उनके परिवार के सदस्यों और तीन कैबिनेट मंत्रियों के नाम हवाला और तस्करी से जुड़े मामलों में लिए हैं। उन्होंने पहले भी गवाही में कहा था कि 2016 में दुबई में मौजूद सीएम को भेजे जा रहे नगदी से भरे बैग को एयरपोर्ट स्कैनिंग में पकड़ा गया था, जो कांसुलर प्रोटोकॉल के तहत भेजा जा रहा था। उन्होंने यह भी दावा किया कि तब के प्रिंसिपल सेक्रेटरी एम. शिवशंकर के निर्देश पर UAE कॉन्सुलेट से मेटल से भरे बिरयानी के बर्तन मुख्यमंत्री के सरकारी आवास क्लिफ हाउस में ले जाए गए।

ये आरोप 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले सामने आए थे और 2024 में फिर से चर्चा में आ गए, जब केंद्र सरकार के इस राजकोषीय प्रहार ने उस आर्थिक जड़ को काट दिया, जिस पर यह पूरा अवैध साम्राज्य खड़ा था।

फ्री की चीजें देकर नहीं हटा सकते गरीबी: रोजगार से आएगी समृद्धि, सब्सिडी की हो मॉनिटरिंग: ‘रेवड़ी कल्चर’ पर नारायणमूर्ति ने उठाए सवाल

एक समय था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुनाव रैलियों में फ्रीबीस को कोसते थे, लेकिन दिल्ली हथियाने के लिए खुद ही केजरीवाल के जाल में फंस फ्रीबीस के आधार पर दिल्ली हथियाने में सफल हो गए। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बांटे जा रहे हैं, लाखों को फ्री राशन देने और BPL के अंतर्गत जो राशन बांटा जा रहा है क्या कभी इन सबका आर्थिक सर्वे किया? यदि नहीं तो क्यों? आखिर सरकारी धन का दुरूपयोग कब बंद होगा? या फिर कहा जाये कि जो प्रधानमंत्री मोदी करे वह ठीक दूसरा करे तो फ्रीबीस? 
फ्रीबीस के लालच में वोट देने वाले लालचियों को सोंचना चाहिए कि तेल हमेशा तिल से ही निकलता है। जब फ्रीबीस के लालच में वोट देते हो फिर महंगाई को क्यों रोते हैं? रेवड़ी कल्चर को ख़त्म कर इन सियासतखोरों के पीछे भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी ख़त्म करने के लिए कहे। ये लालची भूल रहे हैं कि भ्रष्टाचार कितना फ़ैल रहा है। एक भी public dealing विभाग ऐसा नहीं जहाँ बिना रिश्वत लिए कोई काम होता हो। ईमानदारी से काम करने पर इतनी उलझनों का सामना करना पड़ता है कि पीड़ित को आखिर रिश्वत की ही शरण में जाना पड़ता है।         
IT क्षेत्र की शीर्ष भारतीय कम्पनियों में शामिल इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायणमूर्ति ने ‘रेवड़ी कल्चर’ पर हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि देश में मुफ्त चीजें देने से गरीबी नहीं खत्म होने वाली है। उन्होंने गरीबी खत्म करने का तरीका ज्यादा से ज्यादा नौकरियाँ पैदा करना बताया है। उन्होंने इसके साथ ही सरकारी सब्सिडी की कड़ी देखरेख की वकालत की है।

मुंबई में स्टार्टअप इकोसिस्टम को लेकर आयोजित एक इवेंट में बोलते हुए नारायणमूर्ति ने कहा, “मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि आप में से हर आदमी आने वाले समय में लाखों नौकरियाँ पैदा करेगा और ऐसे ही आप गरीबी की समस्या का समाधान कर सकते हैं, आप फ्रीबीस (रेवड़ियों) से गरीबी की समस्या का समाधान नहीं कर सकते, कोई भी देश इसमें सफल नहीं हो सका है।”

नारायणमूर्ति ने इस दौरान कहा कि सरकार जो भी सुविधाएँ मुफ्त दे, उनको लेकर कड़ी मॉनिटरिंग की जाए। उन्होंने इसके लिए 200 यूनिट मुफ्त बिजली का उदाहरण दिया। नारायणमूर्ति ने कहा कि जिस भी परिवार को 200 यूनिट मुफ्त बिजली दी जाए, 6 महीने बाद उसको लेकर जाँच की जाए कि वह इसका उपयोग कैसे करते हैं।

रेवड़ी कल्चर पर नारायणमूर्ति ने स्पष्ट किया है कि वह किसी पार्टी के वादों पर टिप्पणियाँ नहीं कर रहे बल्कि नीतिगत व्यवस्था पर बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई फायदा जनता को दिया जा रहा है तो इसके बदले में सरकार को कुछ शर्तें भी लगानी चाहिए।

नारायणमूर्ति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियाँ नकद ट्रांसफर, मुफ्त बिजली, मुफ्त बस यात्रा, राशन या फिर बाकी तरीकों का इस्तेमाल करके चुनाव में उतर रही हैं। बीते कुछ चुनावों में यह चलन तेजी से बढ़ा है।

भारतीय राजनीति में रेवड़ी और मुफ्त में सुविधाएँ दिए जाने का चलन आम आदमी पार्टी (AAP) ने दिल्ली में आजमाया था और उसे 2015 तथा 2020 के चुनाव में बड़ी सफलता मिली थी। इसके बाद कॉन्ग्रेस को भी ऐसे ही वादों के सहारे कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में बड़ी सफलताएँ मिलीं।

रेवड़ी कल्चर का पहला विरोध करने वाली भाजपा ने भी बाद में महिलाओं को नकद राशि जैसे वादे किए हैं। हालाँकि, अर्थशास्त्रियों ने इस चलन को बजट के लिए खतरनाक बताया है और इसे अर्थव्यवस्था पर बोझ बताया है। कर्नाटक में कॉन्ग्रेस सरकार के रेवड़ी बाँटने के असर बजट पर दिखाई भी दिए हैं।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस सरकार दलितों और जनजातीय समुदाय के कल्याण के लिए बनाया गया बजट अपनी ‘गारंटी स्कीम’ में लगा दिया है। हजारों करोड़ रूपए की धनराशि गारंटी स्कीम में लगाई गई है। कर्नाटक ने कई टैक्स भी बढ़ा दिए हैं। हालाँकि, इससे कर्नाटक में गरीबी रेखा पर कोई असर पड़ा हो, ऐसी जानकारी नहीं सामने आई है। नारायणमूर्ति ने इसी से जुड़ी बात कही है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि कोई भी देश इसमें सफल नहीं हुआ है। दरअसल, उनका इशारा वेनेजुएला जैसे देशों की तरफ था। वेनेजुएला ने भी तेल की कमाई के सहारे अपने नागरिकों को रेवड़ियाँ बाँटनी चालू की थी। उसने सरकारी नौकरियाँ आदि भी खूब बाँटी थी। बाद में वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई।

प्रयागराज महाकुंभ से अर्थव्यवस्था भी बम-बम : खर्च- 7500 करोड़ रूपए, फायदा- 3 लाख करोड़ रूपए : वह नाविक जिन्होंने 45 दिन में कमाए 30 करोड़ रूपए


उत्तर प्रदेश में महाकुंभ आयोजन के चलते आर्थिक फ्रंट पर काफी फायदा हुआ है। इससे अर्थव्यवस्था में 3 लाख करोड़ रूपए जुड़ने की संभावना है। होटल से लेकर ट्रांसपोर्ट और फ़ूड क्षेत्र में काफी कमाई हुई है। इस दौरान प्रयागराज में छोटे-मोटे धंधे करने वाले लोगों को भी बड़ा फायदा हुआ है। इसी तरह का एक उदाहरण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिया है।

एक नाविक ने कमा लिए 30 करोड़ रूपए 

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बजट पर बोलते हुए मंगलवार (4 मार्च, 2025) को योगी एक नाविक परिवार के विषय में बताया। उन्होंने कहा, “एक ऐसा नाविक परिवार, जिनके पास 130 नौकाएँ थीं। इन लोगों ने 45 दिनों के महाकुंभ में ₹30 करोड़ की बचत की है। यानी एक नाव ने 23 लाख रूपए 45 दिनों में कमाए हैं।”
मुख्यमंत्री योगी ने बताया कि इसी हिसाब से एक दिन में एक नाव ने 50 हजार से लेकर 52 हजार रूपए तक की कमाई की है। सीएम योगी ने महाकुंभ आयोजन को लेकर किए गए खर्च और इससे अर्थव्यवस्था में हुई बढ़ोतरी को लेकर भी बात की।

उत्तर प्रदेश को 3.5 लाख करोड़ रूपए के फायदे का अनुमान

योगी ने बताया कि राज्य में महाकुंभ के आयोजन से राज्य को 3.5 लाख करोड़ रूपए का लाभ होने का अनुमान है। उन्होंने CAIT के आँकड़े भी दिए, जिसने बताया था कि महाकुंभ में लोगों ने 3 लाख करोड़ रूपए का खर्च किया जो अर्थव्यवस्था में जुड़े।
महाकुंभ के चलते ट्रांसपोर्ट, होटल, पूजा सामग्री और बाकी क्षेत्रों में हजारों करोड़ का खर्च हुआ। सीएम योगी ने बताया कि महाकुंभ के दौरान होटल उद्योग में 40 हजार करोड़ रूपए, खाने-पीने और FMCG में 33 हजार करोड़ रूपए, परिवहन क्षेत्र में 1.5 लाख करोड़ रूपए और पूजा सामग्री के चलते 20 हजार करोड़ रूपए का फायदा हुआ है।
प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के चलते अयोध्या और वाराणसी में भी भक्तों के बड़े जत्थे पहुँचे, जिससे यहाँ भी आर्थिक लाभ हुआ है। देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी अनंत नागेश्वरन ने बताया है कि महाकुंभ में हुए बड़े खर्च के चलते देश को 6.5% की GDP बढ़ोतरी की रफ़्तार बनाए रखने में मदद मिलेगी।
महाकुंभ में 60 करोड़ से अधिक लोग शामिल हुए थे। उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के अलावा मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा अदि को भी इससे बड़ा फायदा हुआ है। महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या इन राज्यों से भी थी।

7500 करोड़ हुए थे व्यवस्था पर खर्च

महाकुंभ से 3 लाख करोड़ रूपए का फायदा तब हुआ है जब उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके मुकाबले 7500 करोड़ रूपए का खर्च किया था। उत्तर प्रदेश सरकार में योगी सरकार ने महाकुंभ के लिए प्रयागराज शहर में काफी विकास किया। बड़ा खर्च इन्फ्रा सुधारने पर हुआ था।
योगी सरकार ने प्रयागराज के भीतर 200 से अधिक सड़कों का चौड़ीकरण किया था। योगी सरकार ने प्रयागराज में 14 नए फ्लाईओवर और 9 अंडरपास भी बनाए थे। नदी के तट को लेकर भी योगी सरकार ने काम किया था। मेला क्षेत्र में योगी सरकार ने 30 पीपा पुल बनाए थे। इसका लाभ अब योगी सरकार को मिला है।

प्रयागराज महाकुंभ : सृजित हुआ 3 लाख करोड़ रूपए का कारोबार, 56.25 करोड़ श्रद्धालु लगा चुके हैं डुबकी: व्यापार और आस्था-संस्कृति का नया बेंचमार्क स्थापित

                                                            प्रयागराज महाकुंभ
महाकुम्भ को लेकर सनातन विरोधी खुलकर सामने आ गए हैं। अभिनेता से लेकर नेता तक सब बेनकाब हो गए हैं। महाकुम्भ को आरोपित करने हिन्दू नहीं बल्कि कालनेमि राक्षस जाति के हैं। राक्षसों का काम उपद्रव करना, ऋषि-मुनियों के यज्ञ में विध्न डालना होता था, वही काम कलयुगी कालनेमि कर रहे हैं। हिन्दू तीर्थों को विवादित बना साम्प्रदायिकता फ़ैलाने वाले ये ही लोग हैं। 

इतिहास साक्षी है कि सनातन विरोधी धीरे-धीरे पतन की ओर जा चुके हैं। 'हवा में उड़ गए जय श्रीराम' कहने वाली मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी ही हवा हो गयी और उसी राह पर समाजवादी पार्टी जा रही है और कांग्रेस भी पीछे नहीं। कांग्रेस पुरानी पार्टी होने की वजह से अपनी कुछ पहचान रखे हुए हैं।        

प्रयागराज महाकुंभ अपने अवसान पर है। दुनिया का सबसे बड़ा समागम कुंभ सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक केंद्र बनकर भी उभरा है। कुंभ के लगभग 40 दिनों में लगभग 3 लाख करोड़ रुपए (360 अरब अमेरिकी डॉलर) का कारोबार होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसकी जानकारी अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ (CAIT) ने दी है।

CAIT के महासचिव और चाँदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि कुंभ ने आस्था और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध स्थापित कर दिया है। उन्होंने कहा कि महाकुंभ के कारण स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिल रहा है, क्योंकि महाकुंभ थीम पर आधारित उत्पादों जैसे डायरी, कैलेंडर, जूट बैग और स्टेशनरी की माँग में भारी वृद्धि हुई है। सावधानीपूर्वक ब्रांडिंग के कारण बिक्री में वृद्धि हुई है।

खंडेलवाल ने कहा कि महाकुंभ के शुरुआत होने से पहले प्रारंभिक अनुमानों में 40 करोड़ लोगों के आने और लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का कारोबार होने का अनुमान लगाया गया था। हालाँकि, 40 दिनों में महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 18 फरवरी तक 56 करोड़ पहुँच चुकी है। महाकुंभ 26 फवरी तक है। ऐसे में यह आँकड़ा कम से कम 60 करोड़ पहुँचने का अनुमान है।

श्रद्धालुओं की इस आँकड़े के साथ ही कारोबार भी 3 से अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसके कारण उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जबरदस्त वृद्धि हुई है और रोजगार के नए साधन भी पैदा हुए हैं। खंडेलवाल ने कहा कि महाकुंभ के कारण कई व्यावसायिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियाँ देखी गई हैं, जिनमें आतिथ्य और आवास, खाद्य और पेय क्षेत्र, परिवहन और रसद प्रमुख हैं।

इसके अलावा, धार्मिक पोशाक, पूजा सामग्री, हस्तशिल्प, वस्त्र, अन्य उपभोक्ता सामान, स्वास्थ्य देखभाल एवं कल्याण सेवाएँ, मीडिया, विज्ञापन एवं मनोरंजन, नागरिक सेवाएँ, दूरसंचार, मोबाइल, एआई-आधारित तकनीक, सीसीटीवी कैमरे और अन्य उपकरण आदि से संबंधित व्यवसायिक क्षेत्रों के कारोबार में भारी उछाल देखने को मिला है।

खंडेलवाल ने कहा कि महाकुंभ से संबंधित आर्थिक फायदा सिर्फ प्रयागराज तक ही सीमित नहीं है। इसका असर प्रयागराज के 150 किलोमीटर क्षेत्र की परिधि में देखने को मिला है। इसके अलावा, अयोध्या, काशी, मथुरा, विंध्याचल में श्रद्धालुओं के जाने के कारण इन शहरों एवं उसके आसपास के इलाकों में भी भारी आर्थिक गतिविधियाँ हुई हैं, जिसका फायदा लोगों और सरकार को हुआ है।

खंडेलवाल के अनुसार, महाकुंभ ने भारत में व्यापार, वाणिज्य, कारोबार, सांस्कृतिक क्षेत्र में एक नया बेंचमार्क स्थापित किया है। बता दें कि उत्तर प्रदेश सरकार ने महाकुंभ को लेकर प्रयागराज में फ्लाईओवर, सड़कों और अंडरपास के सुधार के लिए 7500 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इनमें से 1,500 करोड़ रुपए महाकुंभ व्यवस्था के लिए निर्धारित किए गए थे।

महाकुंभ को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 19 फरवरी को 2 बजे तक 56.25 करोड़ लोग आस्था की डुबकी लगा चुके हैं। उन्होंने कहा, “जब हम सनातन धर्म, मां गंगा, भारत या महाकुंभ के खिलाफ कोई निराधार आरोप या फर्जी वीडियो बनाते हैं तो यह इन 56 करोड़ लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ है।”

सीएम योगी ने कहा, “यह आयोजन किसी पार्टी या संगठन विशेष का नहीं, यह आयोजन समाज का है। सरकार अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए सेवक के रूप में है। यह हमारा सौभाग्य है कि हमारी सरकार को इस सदी के महाकुंभ से जुड़ने का अवसर मिला। देश और दुनिया ने इस आयोजन में भाग लिया है और तमाम झूठे अभियानों को दरकिनार करते हुए इसे सफलता की नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है।”

भगदड़ में हुई मौत को लेकर सीएम योगी ने कहा, “महाकुंभ के सात दिन बचे हैं। हमारी संवेदनाएँ उन सभी लोगों के साथ हैं, जो 29 जनवरी को भगदड़ के शिकार हुए। हम उन लोगों के साथ हैं, जिन्होंने कुंभ के लिए यात्रा करते समय सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गँवाई। हमारी संवेदनाएँ परिजनों के साथ हैं। सरकार उनके साथ खड़ी है और उन्हें हरसंभव मदद करेगी। इस पर राजनीति करना उचित नहीं है।”

ये कैसा गड़बड़झाला है : विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति “चीन” विकासशील देश है विकसित देश नहीं

सुभाष चन्द्र

फरवरी, 2024 में विश्व की पहली आर्थिक महाशक्ति IMF के अनुसार 27,974 बिलियन डॉलर की GDP के साथ अमेरिका है और 2nd largest आर्थिक महाशक्ति 18566 बिलियन डॉलर की GDP के साथ चीन है, जबकि जर्मनी, जापान और भारत की GDP क्रमशः 4730, 4291 और 4112 बिलियन डॉलर है। ब्रिटेन 6th, फ्रांस 7th और कनाडा 10th नंबर पर हैं

परंतु अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा को विकसित देशों की श्रेणी में रखा गया लेकिन 2nd largest economy होने के बावजूद चीन को विकासशील देशों (Developing Nation) की श्रेणी में रखा गया है जिसका कोई औचित्य समझ नहीं आता 

World Bank के अनुसार चीन के 85 करोड़ लोग (850 million) Extreme Poverty से बाहर लाए जा चुके है। चीन का Poverty Rate 1981 के 88% से गिर कर 2015 में मात्र 0.7 % रह गया था

चीन को विकासशील देश कहने का कोई कारण समझ नहीं आता। जो देश 18 राष्ट्रों को वर्षों से किसी न किसी तरह के सीमा विवाद में उलझा कर रख सकता है; जो अनेक देशों को कर्ज के  मकड़जाल में फंसा कर blackmail कर सकता है; जो देश Veto Power से UN Security council में हर विषय में रोड़े अटका सकता है; जो देश हर लोकतांत्रिक देश में पैसे के दम पर अस्थिरता पैदा कर सकता है; जो देश विश्व के किसी देश में एटोमिक ताकत के बल पर अशांति पैदा कर सकता और पाकिस्तान एवं उत्तरी कोरिया को विश्व के लिए खतरा बना सकता है; जो अमेरिका जैसे शक्तिशाली मुल्क को हर समय युद्ध के लिए ललकार सकता है और जो भारत की हजारों एकड़ भूमि पर कब्ज़ा किये बैठा है, वह देश किस मायने से Developing Nation कहलाया जा सकता है। 

लेखक 

यह विकासशील देश चीन, पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को कोरोना देकर चौपट करने की ताकत रखता है और अपनी capital market से वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को अस्थिर कर सकता है, वह किसी तरह से भी विकासशील देश नहीं हो सकता बल्कि वह तो सम्पूर्ण रूप से विकसित राष्ट्र है

चीन के पास अमेरिका के 5244 और रूस के 5889 Nuclear Warheads के बाद सबसे अधिक 500 Nuclear Weapons हैं और आज यह देश नेहरू से वरदान में मिली Veto Power के बल पर भारत के Veto Power के अधिकार को रोके बैठा है

कोई ऐसा वैश्विक संगठन नहीं है जिसमे चीन अपनी दादागिरी न दिखाता हो। चीन ने 2016 में 48 सदस्यों के Nuclear Supplier Group में प्रवेश को रोक दिया था और भारत के इस प्रवेश को रोकने वाला NSG में वह अकेला देश था

WTO ने विकसित और विकासशील देशों की कोई परिभाषा तय नहीं की है लेकिन जो भी विकासशील देश माने जाते हैं उन्हें WTO में कुछ सुविधाएं मिलती है। लिहाजा चीन हर तरफ से मौज में रहना चाहता है, एक विकसित देश की तरह दुनिया पर रौब भी दिखाना चाहता है और विकासशील देश की तरह सुविधाएं भी लेना चाहता है

IMF और World Bank को इस पर पुनर्विचार जरूर करना चाहिए

‘भारत को कम मत आँकना’: अंतरराष्ट्रीय मीडिया को आनंद महिंद्रा की चेतावनी, कहा – ऐसे कई दौर देखे हैं

महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा सोशल मीडिया काफी सक्रिय रहते हैं। वह अक्सर वायरल वीडियो और फोटोज को शेयर करते दिखाई देते हैं। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद अडानी ग्रुप के शेयरों में आई गिरावट के बाद आनंद महिंद्रा ने ग्लोबल मीडिया को भारत को कम न समझने की चेतावनी दी है।

आनंद महिंद्रा ने ट्वीट कर कहा है, “ग्लोबल मीडिया अनुमान लगा रहा है कि क्या व्यापार क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियाँ वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की भारत की महत्वाकांक्षाओं को नाकाम कर देंगी। मैंने भूकंप, सूखा, मंदी, युद्ध और आतंकवादी हमलों के कई दौर देखे हैं। मैं केवल यही कहना चाहता हूँ कि भारत को कभी भी कम समझो।”

भारतीय जनमानस को टूलकिट की घिनौनी देशद्रोही हरकतों को पहचानना होगा। जब भी देश में कोई कोई विदेशी मेहमान आता है, टूलकिट जहर उगल उपद्रव करने लगता है। जिस प्रकार जनता ने राम और रामायण विरोधियों को उनकी औकात दिखानी शुरू कर दी है, उसी भांति इस टूलकिट के इशारे पर देश के सम्मान को ठेस पहुँचाने वालों को भी उनकी हैसियत दिखानी होगी। मोदी-योगी विरोध करने के बहुत तरीके हैं, लेकिन किसी विदेशी मेहमान के आगमन पर हंगामा करना क्या देशहित में है? संसद में विदेशी मेहमान आये और संविधान की कसम खाने वालों ने किस तरह मोदी विरोधियों ने हंगामा किया, क्या ऐसे सांसद वोट के हक़दार हैं?  

24 जनवरी को हिंडनबर्ग ने रिपोर्ट आने के बाद से अडानी ग्रुप के शेयरों में तेजी से गिरावट देखी गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, अडानी ग्रुप की कंपनियों के शेयर में सामूहिक रूप से 50 फीसदी से अधिक की गिरावट देखी गई है। इससे अडानी ग्रुप को अब तक 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

अवलोकन करें:-

20 हजार करोड़ रूपए का FPO वापस लेकर अडानी ग्रुप ने चौंकाया: निवेशकों का विश्वास जीतने का नया कदम

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20 हजार करोड़ रूपए का FPO वापस लेकर अडानी ग्रुप ने चौंकाया: निवेशकों का विश्वास जीतने का नया कदम

हिंडेनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में अडानी समूह पर कई आरोप लगाए थे। इनमें मनी लॉन्ड्रिंग, अनऑथोराइज्ड ट्रेडिंग, वित्तीय गड़बड़ी, भारी-भरकम लोन सहित कई गंभीर आरोप थे, जो किसी कंपनी के लिए घातक बताए गए थे। बाद में अडानी समूह ने अमेरिकी रिसर्च कंपनी हिंडनबर्ग द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब दिया था। कंपनी ने 413 पन्नों के जवाब में हिंडनबर्ग द्वारा लगाए गए आरोपों को झूठ करार दिया था। कंपनी ने कहा था कि ये आरोप भारत और यहाँ की कंपनियों तथा देश के विकास पर सुनियोजित हमला है।

संकट में श्रीलंका को आई ‘भगवान श्री राम’ की याद, रामायण से जुड़े स्थानों का हो रहा विकास


चीन के मकरजाल में फंस गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे श्रीलंका को अपने आर्थिक संकट से निकलने के लिए हिन्दुत्व की शरण में आशा की किरण दिखनी शुरू हो गयी है। श्रीलंका की अर्थव्‍यवस्‍था बड़े पैमाने पर टूरिज्‍म पर निर्भर थी। मगर आर्थिक संकट के चलते पर्यटन का कारोबार भी चौपट हो चुका है। भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा यह द्वीपीय देश अब आर्थिक सुधार के लिए पर्यटन को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहता है। इस देश से रामायण का भी गहरा नाता है। श्रीलंका के नवनियुक्त पर्यटन दूत और क्रिकेट खिलाड़ी सनत जयसूर्या ने कहा है कि उनका देश भारतीय पर्यटकों के लिए रामायण से जुड़े स्थलों की यात्रा को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करेगा। इस संदर्भ में जयसूर्या ने हाल में ही कोलंबो में भारत के उच्चायुक्त गोपाल बागले से मुलाकात की। बैठक भारत और श्रीलंका के लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने और आर्थिक सुधार के लिए एक माध्यम के रूप में पर्यटन को बढ़ावा देने पर केंद्रित थी। जयसूर्या ने कहा कि उनका देश भारतीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए रामायण ट्रेल (राम पथ गमन) को प्रोत्साहित करेगा। उन्होंने कहा कि इससे आर्थिक संकट में घिरे देश में पर्यटन को बढ़ावा मिलने से आर्थिक मदद मिलेगी।

संकट में श्रीलंका का मददगार बना भारत

श्रीलंका इस समय गंभीर आर्थिक संकट, ऐतिहासिक मंदी और भयानक महंगाई का सामना कर रहा है। लोगों को अब ईंधन और रोजाना की जरूरत की चीजों के लिए संघर्ष करना पड़ रह है। लोगों को खाने-पीने का सामान नहीं मिल रहा है, जिसकी वजह से पेट भरना भी मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संकटमोचक रूप में सामने आए हैं। श्रीलंका की सरकार और विपक्ष, दोनों मदद के लिए प्रधानमंत्री मोदी की ओर देख रहे थे। संकट काल में भारत ने अपने पड़ोसी देश की मदद कर रहा है। भारत की ओर से 40 मिट्रिक टन डीजल और 50 हजार टन चावल श्रीलंका भेजा गया। इसके साथ ही भारत ने श्रीलंका को 3.8 अरब डॉलर की मदद देने का ऐलान किया है।

अशोक वाटिका में बना है माता सीता मंदिर

माता सीता का हरण करने के बाद रावण ने उन्हें अपने महल की अशोक वाटिका में रखा था। यह जगह आज भी श्रीलंका में मौजूद है। यहां पर सीता माता का एक प्राचीन मंदिर भी बनाया गया है। इस जगह को सेता एलीया के नाम से जाना जाता है। ये नूवरा एलिया नामक जगह के पास स्थित है। मंदिर के पास ही एक झरना भी है। माना जाता है कि इस झरने में सीता माता स्‍नना करती थीं। इस झरने के आसपास की चट्टानों पर हनुमान जी के पैरों के निशान भी मिलते हैं। यही वो पर्वत है जहां हनुमान जी ने पहली बार कदम रखा था। इसे पवाला मलाई कहते हैं। ये पर्वत लंकापुरा और अशोक वाटिका के बीच में है

जहां गिरे थे माता सीता के आंसू, अब सीता तालाब


रावण जब सीता माता को हरण करके ले जा रहा था तब सीता माता अपने पति भगवान राम के पास जाने के लिए रावण से कह रही थीं। मगर, रावण उन्‍हें जबरन अपने साथ लंका ले जा रहा था। उस दौरान सीता माता के आंसू जिस-जिस स्‍थान पर गिरे वहां पर तलाब बन गया। श्रीलंका में भी एक ऐसा ही स्‍थान है जहां सीता माता के आंसू गिरे थे। तब से इस जगह को सीता अश्रु ताल कहा जाता है। श्रीलंका में कैंडी से लगभग 50 किलोमीटर दूर नम्बारा एलिया मार्ग पर यह तालाब मौजूद है। इसे कुछ लोग सीता टियर तालाब कहते हैं। जब लंका में गर्मी पड़ती है और सारे तलाब सूख जाते हैं तब भी यह तलाब नहीं सूखता। इस तलाब का पानी भी बहुत मीठा है।

माता सीता ने यहां दी थी अग्नि परीक्षा

श्रीलंका में वेलीमड़ा नामक एक जगह है। यहां एक मंदिर डिवाउरूम्पाला है। कहा जाता है कि यहां पर माता सीता ने अग्नि परीक्षा दी थी। आज भी स्थानीय लोग इस जगह पर सुनवाई करके न्याय करने का काम करते हैं। मान्यता है कि जिस तरह इस जगह पर देवी सीता ने सच्चाई साबित की थी उसी तरह यहां लिया गया हर फैसला सही साबित होता है।

मई में सबसे अधिक भारतीय पर्यटक श्रीलंका पहुंचे

श्रीलंका में रामायण से जुड़े 52 स्थल हैं। श्रीलंका इस वक्त भीषण आर्थिक संकट से जूझ रहा है, जिसके चलते यहां पर्यटन भी ठप पड़ा है। इस साल मई महीने में भारत की ओर से श्रीलंका के पर्यटन सेक्टर में सबसे अधिक योगदान दिया गया है। यहां 5562 पर्यटक भारत से पहुंचे हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर ब्रिटेन है, जहां के 3723 लोग श्रीलंका घूमने गए। भारत और श्रीलंका के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं से संबंधित विरासत के आदान-प्रदान के लिए वर्ष 2008 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।


सिगिरिया में था रावण का महल

कहा जाता है कि सिगिरिया ही वह स्थान है, जहां रावण रहता था। माना जाता है कि रावण का साम्राज्य मध्य श्रीलंका में, बदुल्ला, अनुराधापुरा, केंडी, पोलोन्नुरुवा और नुवारा एलिया तक फैला हुआ था, मगर रावण सिगिरिया में रहता था। इस महल के लिए कहा जाता है कि यह महल भी कुबेर ने बनाया था, जो उनके भाई हैं। सिगरिया रॉक चट्टान के शीर्ष पर एक प्राचीन महल का अवशेष है, जो किलेबंदी, सीढ़ीदार बगीचे, तालाब, नहर, गलियों और फव्वारों से घिरा हुआ है। ये भी कहा जाता है कि यहां कुछ दिन माता सीता को रखा गया था। इसके बाद दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया था।

आठ हजार फुट की ऊंचाई  पर है रावण की गुफा

साल 2017 में एक रिसर्च हुई थी जिसमें 50 ऐसे स्थानों को खोज निकाले का दावा किया गया था जिनका रिश्‍ता रामायण से था। इसी रिसर्च में कहा गया था कि एक पहाड़ी में बनी गुफा में आज भी रावण का शव सुरक्षित है। रिसर्च में कहा गया है कि श्रीलंका में रैगला के जंगलो में एक चट्टान नुमा पहाड़ी है। इस पहाड़ी में एक गुफा है और गुफा में रावण का शव आज भी सुरक्षित रखा है। यह शोध श्रीलंका के रामायण रिसर्च सेंटर और पर्यटन विभाग ने मिलकर की है। शोध में दावा किया गया कि इसी गुफा में जाकर रावण तपस्या किया करता था। दावा है कि रैगला पहाड़ी में आठ हजार फुट की ऊंचाई पर यह गुफा बनी है जहां रावण का शव रखा गया है।