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कागज तो दिखाना ही पड़ेगा: बेचना है खाना, तो जरूरी है नाम दिखाना; FSSAI अब चलाए डंडा; सुप्रीम कोर्ट हलाल सर्टिफिकेशन पर खामोश क्यों?

नाम बताने से सेकुलरिज्म को खतरा चिल्लाने वाले बताएं कि क्या हलाल सर्टिफिकेट किसी सरकारी संस्था द्वारा दिया जाता है? साल में लाखों-करोड़ों की कमाई की जा रही है, कौन कर रहा है यह कमाई? इस कमाई का कहाँ, किस काम में खर्च किया जा रहा है? क्या सुप्रीम कोर्ट इस अति गंभीर मुद्दे का संज्ञान लेकर ED और CBI को जाँच देगी? बांग्ला देश सरकार द्वारा हलाल प्रमाणित रूहअफजा को यह तर्क देकर बैन कर दिया कि इसमें लिखित कोई भी चीज शामिल नहीं, सेहत के लिए नुकसानदेह है। रामदेव के विरुद्ध तो IMA सुप्रीम कोर्ट पहुँच सकती है लेकिन रूहअफजा पर बांग्लादेश के फैसले पर नहीं।   
सुप्रीम कोर्ट में सावन महीने के पहले दिन यानी सोमवार (22 जुलाई, 2024) को एक गंभीर मामला गया। मामला सावन में बम भोले का नारा लगा गंगाजल उठाने वाले कांवड़ियों से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेसी वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिका लगाई थी कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रूट पर दुकानदारों को नाम दिखाने का आदेश ठीक नहीं है।

जैसा कि अक्सर ऐसे हाई प्रोफाइल वकीलों के मामले में होता है, यह मामला भी तुरंत सुना गया। सुप्रीम कोर्ट में न्याय की राह तक रहे बाक़ी 65,000 मामले अपनी प्रतीक्षा जारी रख सकते हैं। मामला चूंकि हाई प्रोफाइल वकील ने दाखिल किया था और इसलिए दाखिल किया था कि कहीं सेक्युलरिज्म ना खतरे में पड़ जाए, इसलिए एक अंतरिम आदेश भी जारी हो गया।

आदेश सुनाने से पहले जज साहब ने एक कहानी सुनाई, कहानी में बताया कि केरल का एक मुस्लिम मालिक वाला रेस्टोरेंट, हिन्दू मालिक वाले रेस्टोरेंट से बढ़िया खाना खिलाता था। यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रूट पर अगर कांवडियो को यह पता चल गया कि दुकान अब्दुल की है या फिर अभिमन्यु की, तो सेक्युलरिज्म और संविधान के आर्टिकल 14,15 और 17 का उल्लंघन हो जाएगा।

इसके बाद कोर्ट ने कलम उठाई और कहा कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के इस आदेश को रोक दिया जाए, भले ही अंतरिम तौर पर रोका जाए। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांवड़ियों वाले रास्ते पर कोई भी दुकान लगाए, उसका नाम नहीं पता चलना चाहिए। कोर्ट ने अपनी कलम से यह भी लिखा कि पुलिस ऐसा करने के लिए किसी को मजबूर ना करे।

कोर्ट ने यह किस्से-कहानी और आदेश सुनाने के दौरान प्रबुद्ध कांग्रेसी वकील के अलावा दूसरी तरफ नहीं देखा। दरअसल, दूसरी तरफ देखने के लिए कोई था ही नहीं। ना उत्तर प्रदेश के वकील और ना ही उत्तराखंड सरकार का पक्ष रखने के लिए कोई यहाँ था। था इसलिए नहीं क्योंकि जिस याचिका पर सुनवाई हुई वह एक दिन पहले ही दाखिल हुई थी।

याचिका दाखिल हुई और सुनवाई हो गई, लखनऊ और देहरादून से वकील दिल्ली नहीं आ सके। खैर इन सब बातों के बीच कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नाम दिखने पर रोक लगाई जा रही है, लेकिन कागज दिखाने पर कोई रोक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सरकारें सभी दुकानदारों को कागज दिखाने का आदेश दे सकती हैं।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस वाले डंडे के जोर से दुकानदारों को नाम छाती पर लटकाने को ना कहे लेकिन यूपी सरकार कानून के रास्ते पर चले। उसने तरीका भी बताया। कोर्ट ने बताया कि जिस कॉन्ग्रेस के वकील सिंघवी यह याचिका लाए हैं, उसी की सरकार 2006 और 2014 में पहले ही इस बात का इलाज कर चुकी है।

कोर्ट ने बताया कि 2006 में भारत खाद्य सुरक्षा के लिए एक कानून लाया गया था। इसका नाम फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट था। इस कानून में कहा गया कि कोई ढाबा, रेस्टोरेंट या होटल जो खाने के नाम पर कुछ भी बेचता हो, उसे FSSAI से सर्टिफिकेट लेना पड़ेगा। लेने के बाद इसे दुकान पर साफ़ अक्षरों में दिखाना भी पड़ेगा। इस सर्टिफिकेट में दुकानदार का नाम चाहे अब्दुल हो अभिषेक, लिखा होना चाहिए और साथ ही उसका पता और क्या बेचता है, यह सब बताना पड़ेगा।

कोर्ट ने एक और कानून बताया। इसको स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट कहा जाता है। यह कानून 2014 में सरकार लाई थी। इसके तहत रेहड़ी पटरी वालों को एक सर्टिफिकेट दिया जाना था। चाहे कोई फल का ठेला हो या घर घर जाकर सब्जी बेचने वाले, इन सबको नाम और क्या बेचते हैं ये बताते हुए सर्टिफिकेट में जानकारी देनी होगी। इसको माँगे जाने पर दिखाना भी होगा।

अब अगर कोई भले ही नाम ना बताए, कागज तो दिखाना ही पड़ेगा और जरूर दिखाना पड़ेगा। कांवड़ रूट के होटल-ढाबे पर अगर अब भोले के भक्त किसी से सर्टिफिकेट माँग बैठें तो फिर सिंघवी किस अदालत का रुख करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का कर नहीं सकते क्योंकि उसी ने कहा है कि कागज़ तो दिखाना पड़ेगा।

ऐसे में यूपी सरकार अब नासिर फल वाले को अपने नाम की तख्ती हटा कर अपना सर्टिफिकेट चिपकाने को बोल सकती है। इससे नाम क्या गाँव-पता भी मालूम हो जाएगा और सेक्युलरिज्म भी सुरक्षा के घेरे में रहेगा। कोर्ट को यूपी सरकार को यह राह दिखाने के लिए धन्यवाद तो देना ही चाहिए।

अब जब कागज दिखाने की बारी आएगी तो फिर से शायद फैज की नज्में गई जाएँ। कोई क्रांतिकारी यह भी लिख सकता है कि कांवड़ से अपना धंधा चलाएँगे पर कागज नहीं दिखाएँगे। अब नाम दिखाने से चालू हुई यह बहस कागज़ के रास्ते होते हुए कहाँ तक पहुँचती है, ये तो समय ही बताएगा। 

उत्तर प्रदेश : अब नहीं बिकेंगे हलाल प्रोडक्ट? योगी ने दिए कार्रवाई के निर्देश; क्या यह कोई महाघोटाला है?

कई वर्षों से देश में हलाल सर्टिफिकेशन पर प्रतिबन्ध की मांग हो रही है, लेकिन पिछली सरकारों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते अपने खाद्य पदार्थों को प्रमाणित करने वाले संस्थानों को बौना बनाकर कट्टरपंथियों के निजी संस्थानों को सर्टिफिकेशन का काम सौंप दिया था। चर्चा है कि इस आड़ में यही संस्थाएं आतंकवादियों को आर्थिक सहायता प्रदान कर रही हैं। इसी कारण देश में आतंकवाद समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा। कौन-सी चीज शुध्द है अथवा नहीं, इसको प्रमाणित का काम ISI सरकारी संस्थान का किसी मुस्लिम संगठन का नहीं। जो धन सरकारी तिजोरी में आना चाहिए, वह निजी संस्थानों की तिजोरियों में जा रहा है। जिसे दिल्ली शराब घोटाले के समान बड़े घोटाले का नाम दिया जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। किस सरकार ने इसकी अनुमति दी? गंभीर जाँच अति आवश्यक है। संभव हो एक लम्बी कड़ी सामने आए।  

उत्तर प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेशन से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर जल्द प्रतिबंध लग सकता है। बताया जा रहा है कि इस मामले पर खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संज्ञान लिया है। प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेशन को धंधा बनाकर चलाने वाली उन कंपनियों पर कार्रवाई की शुरुआत हो गई है, जो तेल, साबुन, टूथपेस्ट, मधु समेत कई अन्य शाकाहारी उत्पादों को भी हलाल प्रमाण पत्र दे रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हलाल सर्टिफिकेशन देने वाली 9 कंपनियों पर लखनऊ में एफआईआर दर्ज कराई गई है। ये शिकायत शैलेंद्र शर्मा ने अज्ञात कंपनियों पर करवाई है। इनके विरुद्ध आईपीसी की धारा 120 b/ 153A/ 298/ 384 /420 /467/ 468 /471/ 505 के तहत केस दर्ज हुआ है।

एफआईआर में हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड चेन्नई, जमीयत उलेमा हिन्द हलाल ट्रस्ट दिल्ली, हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया मुम्बई, जमीयत उलेमा महाराष्ट्र मुम्बई आदि का नाम है। इन संस्थाओं पर आरोप है कि ये एक मजहब के नाम पर कुछ उत्पादों पर हलाल प्रमाणपत्र दे रहे हैं जबकि ये देने का उनका अधिकार नहीं है। खान-पान के उत्पादों की गुणवत्ता आदि के प्रमाण पत्र के लिए एफएसएसएआई व आईएसआई जैसी संस्थाओं को अधिकृत किया गया है।

शिकायतकर्ता ने आशंका जताई है कि इन सबके पीछे आपराधिक षड्यंत्र वजह हो सकती है। जहाँ हलाल सर्टिफिकेट के नाम पर इकट्ठा हो रही अवैध कमाई से आतंकवादी संगठन व राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को फंडिंग की जा रही हैं। या फिर इसके जरिए उन कंपनियों को वित्तीय नुकसान पहुँचाने का प्रयास हो रहा है जो ऐसे हलाल सर्टिफिकेशन के साथ सामान नहीं बेचतीं।

हलाल क्या होता है?

इस्लाम मजहब के अनुसार, हलाल का मतलब जायज होता है। खाद्य व सौंदर्य उत्पाद पर जब हलाल सर्टिफाइड लिखा जाता है तो उसका अर्थ होता है कि वो उत्पाद मुस्लिमों के इस्तेमाल योग्य है क्योंकि उसमें ऐसा कुछ नहीं डाला गया है जो उनके मजहब में हराम है।
इस्लामी देशों में कोई भी प्रोडक्ट एक्सपोर्ट करने के लिए ये हलाल सर्टिफिकेशन जरूरी होता है। हालाँकि भारत में शाकाहारी वस्तुओं पर इसका प्रयोग क्यों किया जा रहा, ये बात अब तक नहीं समझ आई है। पिछले दिनों भारतीय रेलवे में यात्रा करते वक्त एक यात्री ने इस पर सवाल खड़ा किया था कि उसकी चाय के पैकेट पर हलाल क्यों लिखा है। इस घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, उसी के बाद ये पूरा मुद्दा संज्ञान में आया।