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प्रदूषण पर सांसद कितने गंभीर? संसद में चर्चा के दौरान 100 से भी कम थे मौजूद

प्रदूषण पर सांसद कितने गंभीर? संसद में चर्चा के दौरान 100 से भी कम थे मौजूद, AAP के इकलौते MP भगवंत मान भी रहे गैरहाजिरदेश भर में प्रदूषण की चर्चा है, लोकसभा में भी हुई, लेकिन इतने अहम मसले को लेकर हमारे सांसद कितने गंभीर हैं, ये पहली चर्चा के दौरान उपस्थिति ने बताया और फिर उनके बीच चली सियासत ने। लोकसभा में प्रदूषण पर चर्चा शुरू हुई तो सौ से भी कम सांसद सदन में नज़र आए। इस मसले पर चर्चा का नोटिस देने वाले कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि प्रदूषण से लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं है
70 के दशक में एक बहु-चर्चित फिल्म 'नील कमल' प्रदर्शित हुई थी, जिसका एक गीत 'बाबुल की दुआएं लेती जा...' आज भी शादियों में सुनने को मिलता है, लेकिन इसी फिल्म का एक और गीत 'खाली डिब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार....' चर्चित था। इस गीत में दूध और खाद्य पदार्थों में हो रही मिलावट को उजागर किया गया था। इतना ही नहीं, फिल्म 'दो चट्टानें' में भी मिलावट को दर्शाया गया था, लेकिन सरकारें आयीं और गयीं परन्तु जनहितों की दुहाई देने वाली किसी भी पार्टी ने लेशमात्र भी चिंता नहीं की, क्यों? लेकिन चुनाव निकट आते ही सीलिंग, पानी और प्रदुषण पर शोर मचाया जा रहा है। आखिर जनता को कब तक ये पार्टियां पागल बनाती रहेंगीं?
फिर प्रदुषण के नाम पर कितना शोर मचाया जा रहा है, परन्तु जब उसी मुद्दे पर संसद में चर्चा होने पर अधिकांश सांसद गायब रहते हैं। वैसे भी जब कभी टीवी पर किसी मुद्दे पर चर्चा की छलक दिखाई तब भी अधिकांश संसद खाली ही दिखाई पड़ती है और संसद से बाहर आकर बड़ी-बड़ी ढींगे बांधते सांसद नज़र आते हैं। जब सरकारी कर्मचारी हाजिरी लगाकर गायब होते हैं, उन पर कार्यवाही की जाती है, लेकिन सांसदों पर कोई कार्यवाही नहीं होती। खैर, जिन्हें, हराम का खाना धर्मशाला में सोना हो, उससे क्या शिकवा।  
इसके बाद प्रदूषण का मामला आप और बीजेपी के टकराव में बदलता दिखा। भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा ने सीधे केजरीवाल को प्रदूषण बता दिया। उधर, गौतम गंभीर ने इस मसले को राजनीति से दूर रखने की बात करते हुए कहा कि दिल्ली के प्रदूषण के लिए पराली को दोष देना ठीक नहीं। सदन में चर्चा के दौरान आप (AAP) के इकलौते सांसद भगवंत सिंह मान गैरहाजिर थे। हालांकि, सदन के बाहर राघव चड्ढा ने मोर्चा संभाला था
वहीं, लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला ने नवम्बर 19 को उन अफ़सरों को समन किया जो पिछले हफ़्ते लोकसभा की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में नहीं आए थे। इस बैठक में शहरी विकास मंत्रालय के साथ प्रदूषण के मुद्दे पर चर्चा तय थी। डीडीए, म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, म्युनिसिपल कमिश्नर और दिल्ली जल बोर्ड के आला अफ़सरों को स्पीकर ने चेताया भी कि अगर अगली बैठक में भी यही रवैया रहा तो अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी
दिल्ली में प्रदूषण के लिहाज से चार हॉट स्पॉट की पहचान की गई है। जहां ट्रैफिक की वजह से लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। अब मॉनिटरिंग कमेटी ने पुलिस और राज्य सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि 45 दिन के भीतर इन चारों जगहों का समाधान खोजा जाए। दिल्ली में आनंद विहार, गांधी नगर, तुगलकाबाद और पीरागढ़ी प्रदूषण के लिहाज से चार हॉट स्पॉट हैं। जहां ट्रैफिक या सड़क की वजह से जाम लगता है और फिर प्रदूषण बढ़ता है। दिल्ली में 13 ऐसी जगहें हैं जहां प्रदूषण का स्तर खतरनाक तरीके से बढ़ा रहता है। लेकिन ट्रैफिक जाम की वजह से बढ़ने वाले प्रदूषण को खत्म करने के लिए 45 दिन के भीतर एक ब्लू प्रिंट तैयार करने को कहा गया है
लोकसभा में प्रदूषण पर चर्चा के दौरान सांसदों की संख्या रही कम

वाह केजरीवाल : दिल्ली की हवा ही नहीं बल्कि पानी भी सबसे ज्यादा प्रदूषित

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक तरफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पुनः सत्ता प्राप्त करने जनता को फ्री में बिजली(वैसे चर्चा है कि फ्री बिजली केवल मार्च यानि चुनाव तक ही है), पानी, महिलाओं को फ्री बस यात्रा आदि से लुभाने में व्यस्त हैं, लेकिन जनता को मिलने वाले पानी की गुणवत्ता कितनी निम्न स्तर पर जा रही है, उसकी चिंता नहीं, जबकि दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष स्वयं केजरीवाल हैं। उनकी इस कमी को विरोधी यानि भाजपा भुनाने का प्रयास कर रही है। 
दिल्ली विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले ही अरविंद केजरीवाल को जल स्वच्छता और प्रदेश में प्रदूषण को लेकर कई ओर से घेरा जा रहा है। इसी बीच पोस्टरबाजी की राजनीति भी तेज हो गई है। पहले गौतम गंभीर के ख़िलाफ़ AAP कार्यकर्ताओं ने पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया था और अब भाजपा के युवा मोर्चा ने दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के नेतृत्व में पोस्टर हाथ में लेकर केजरीवाल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया है।
शाहदरा में अक्सर ऐसा गन्दा पानी
आने लगता है, जिस कारण टंकी में भरा
पानी भी नाली में बहना पड़ता है। 
इन पर लिखा है, “क्या आपने दिल्ली जल बोर्ड के चेयरमैन अरविंद केजरीवाल को देखा है।” इसके अलावा इन पोस्टर्स में लिखा है कि दिल्ली के 20 शहरों के पानी का सर्वे हुआ है, जिसमें दिल्ली का पानी सबसे जहरीला पाया गया है।
इन पोस्टरों से दिल्ली की दीवारें पटी हुई हैं, तो इस पोस्टर की भी कमी नहीं, जिस पर लिखा है "बिजली फ्री, पानी फ्री और अब प्रदुषण फ्री", क्योकि प्राप्त समाचारों के अनुसार, केजरीवाल सरकार ने प्रदुषण मद का केवल 20% ही प्रयोग किया है।  
अभी हाल में ही केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्री रामविलास पासवान ने पेयजल की गुणवत्ता के आधार पर देश के प्रमुख शहरों की रैंकिंग जारी की थी। जिसमें दिल्ली का पानी सबसे खराब बताया गया था। इस रिपोर्ट के सामने आते ही विपक्ष ने सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को घेरना शुरु कर दिया था। भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने खुद को ट्रोल किए जाने वाले मुद्दे को उठाकर पूछा था कि ‘जल या जलेबी।’
उन्होंने इशारा किया था कि उनके जलेबी खाने पर उन्हें ट्रोल कर लिया गया, लेकिन दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष होने के बाद भी उनकी ओर से पानी गुणवत्ता को सुधारने के लिए क्या किया गया। उनके अनुसार केजरीवाल ने दिल्ली वालों को पानी मुफ्त दिया, लेकिन उसे जहरीला करके।



हालाँकि पेयजल पर जारी की गई गुणवत्ता वाली रिपोर्ट पर केजरीवाल ने दावा किया है वो बिलकुल गलत है और दिल्ली में पीने वाला पानी एकदम साफ़ है। 9 माह में जाँच के लिए उठाए गए पानी के सिर्फ 1.43 फीसद (करीब डेढ़ फीसद से भी कम) सैंपल ही गुणवत्ता के मानक पर खरे नहीं उतरे। जबकि 98.57 फीसद पानी के सैंपल सही पाए गए।
वहीं, जल बोर्ड के उपाध्यक्ष दिनेश मोहनिया ने ट्वीट कर कहा कि इस साल जनवरी से सितंबर तक विभिन्न इलाकों से 1 लाख 55 हजार 302 सैंपल लिए गए। जिसमें से सिर्फ 2,222 सैंपल दूषित पाए गए। वहीं 1 लाख 53 हजार 80 सैंपल सही पाए गए। 
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पासवान ने केजरीवाल को चुनौती दी है कि वे भारतीय मानक ब्यूरो की जिस रिपोर्ट को गलत बता रहे हैं, वह उसे साबित करके दिखाएँ। केंद्रीय मंत्री पासवान ने केजरीवाल से कहा, “मैं आपको चुनौती देता हूँ कि आप अपने अधिकारियों से एक टीम भेजने को कहें जिसमें बीआइएस के अफसर भी शामिल हों। वे किसी भी इलाके में जाकर नमूना लें और उसकी जाँच किसी भी प्रयोगशाला में कराएँ। केजरीवाल आज शाम अथवा कल या परसों तक अफसरों को नामित करें।”
ये रिपोर्ट भाजपा नेता डॉ हर्षवर्धन द्वारा भी उनके ट्विटर हैंडल पर शेयर की गई है। जिसपर प्रतिक्रिया देते हुए केजरीवाल ने कहा, “सर आप तो डॉक्टर हैं। आप तो जानते हैं सर ये रिपोर्ट झूठी है और राजनीति से प्रेरित है। आप जैसे व्यक्ति को गंदी राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।”
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड यानी BIS ने 20 राज्यों के कई शहरों के पानी की गुणवत्ता की जांच एक निजी लैब में करवाने के बाद ये पाया कि दिल्ली का पानी सबसे प्रदूषित है. दिल्ली में कृषि मंत्रालय, बुराड़ी, सोनिया विहार समेत खुद खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का 12 जनपथ तक के घर के पानी का सैंपल 19 मापदंडो पर फेल मिला. इस पानी का TDS, PH, एल्यूमिनियम, नाइट्रेट, डिटरजेंट के अलावा E.coli जैसे बैक्टीरिया भी मिले हैं. सबसे प्रदूषित पानी में दिल्ली के बाद कोलकाता, चेन्नई, देहरादून और जयपुर का नंबर है. दिल्ली में पानी सप्लाई का जिम्मा दिल्ली जलबोर्ड के हवाले हैं. 
सबसे साफ पानी मुंबई का
BIS की जांच में मुंबई का पानी सबसे साफ पाया गया है. मुंबई के बाद हैदराबाद, भुवनेश्वर, रांची, रायपुर, अमरावती और शिमला का पानी साफ पाया गया है.
पानी की जांच के पीछे राजनीतिक कारण नहीं
खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने साफ किया है कि पानी की इस रैंकिंग के कोई राजनीतिक मायने न निकाले जाए. उनके मंत्रालय के पास कई जगहों से अनुरोध आया था कि पानी के शुद्धता की जांच की जाए. इस पर उन्होंने देशभर में पानी के सैंपल लेकर उनकी जांच करवाई.

क्यों न घुटे दिल्ली का दम ; ग्रीन टैक्स का 20% ही केजरीवाल सरकार ने किया खर्च

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आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार  
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के कारण हवा बेहद जहरीली हो गई है। आलम यह है कि लोगों के लिए घर से निकलना मुश्किल हो गया है। ऐसे में एक आरटीआई जवाब से पता चला है कि दिल्ली में AAP सरकार ने पिछले कई वर्षों में ग्रीन टैक्स के तहत एकत्रित किए गए अधिकतर धन राशि को खर्च नहीं किया है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली सरकार ने पर्यावरणीय समस्याओं को कम करने के लिए एकत्र किए गए धन का लगभग 20 फीसदी ही खर्च किया।
ऐसे में प्रश्न होता है कि आखिर कब तब केजरीवाल सरकार जनता की आँखों में धूल झोंकती रहेगी? मुफ्त पानी और बिजली देकर कब तक सरकारी धन पर वोट खरीदी जाएगी? जनता जानना चाहती है कि पर्यावरण मद का 80 प्रतिशत धन कहाँ खर्च किया? भूतपूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के समय दीपावली पूर्व से इतनी आतिशबाज़ी छोड़ी जाती थी, पंजाब और हरियाणा में तब भी पराली जलती थी, कोई समस्या नहीं हुई, फिर अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनते ही यह विकट समस्या क्यों हुई? जिस मद का धन उस मद पर खर्च करने की बजाए इधर-उधर खर्च होगा, उस स्थिति में जनता को समस्याओं का सामना करना पड़ेगा ही, और अपने दोष दूसरों के सर पटकने से जनता को उस मद के धन के दुरूपयोग से बचा नहीं जा सकता। 
केजरीवाल सरकार को मालूम होना चाहिए की उनके जन्म लेने से पूर्व यमुना पार खेत ही खेत थे, हरियाणा और पंजाब को छोड़ो यहीं इतनी पराली जलती थी, श्राद्ध समाप्त होते ही आतिशबाज़ी वालों की दुकाने सजनी शुरू हो जाती थीं, और गंगा नहान तक आतिशबाज़ी छोड़ी जाती थी, कभी इस तरह की समस्या उत्पन्न ही नहीं हुई। 
अनुमान है, संभव हो अनुमान गलत हो, दीपावली पूर्व से पर्यावरण/प्रदुषण का शोर मचा कर, दीपावली पर हमला तो नहीं हो रहा? क्योकि तीन वर्षों से तो दिल्ली में आतिशबाज़ी पर जरुरत से पाबन्दी होने के बावजूद पर्यावरण की इतनी गंभीर समस्या का होना सिद्ध करता है, की यह ड्रामा कुछ और नहीं दीपावली पर गुप्त हमला है। जिसे दिल्ली की भोली-भाली जनता नहीं समझ पा रही। 
कुछ वर्षों से दीपावली के शुभावसर पर हैदराबाद प्रवास हो रहा है, जहाँ दिल्ली में दरीबा और सदर बाजार के कहीं अधिक आतिशबाज़ी की दुकानें लगती है, संध्या से लेकर रात्रि लगभग 11 बजे तक खूब छोड़ी जाती है, वहां कोई समस्या कोई नहीं

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक एक आरटीआई जवाब में कहा गया कि दिल्ली सरकार ने साल 2015 में कुल ₹1174.67 करोड़ का ग्रीन टैक्स जमा किया था, जिसमें से केवल ₹272.51 करोड़ ही खर्च किए गए। इस ₹272 करोड़ में से ₹265 करोड़ सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर खर्च किए गए। दिल्ली सरकार ने सड़कों की मरम्मत के लिए ग्रीन फंड के कुछ करोड़ रुपए ही खर्च किए। आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि दिल्ली-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम पर ₹265 करोड़ खर्च किए गए। इसका मतलब यह है कि दिल्ली सरकार द्वारा ग्रीन टैक्स के रूप में एकत्र किए गए फंड में ₹902 करोड़ की बड़ी राशि का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह भारी भरकम रकम का 77 फीसदी है।
आरटीआई के जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने कहा कि यह राजधानी के नागरिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली सरकार के लापरवाह और असंवेदनशील रवैये को दर्शाता है। डॉ हर्षवर्धन ने कहा कि ₹900 करोड़ कोई छोटी राशि नहीं है। लोगों ने इसका भुगतान इसलिए किया ताकि सरकार इसका सही चीजों पर सही तरीके से खर्च करे। जिससे कि उनके लिए बेहतर जीवनयापन सुनिश्चित हो सके।
आरटीआई के जवाब पर दिल्ली की AAP सरकार ने कहा ये फंड का पैसा इस्तेमाल किया जाएगा। उनका कहना है कि ये पैसे एक निश्चित प्रक्रिया के तहत अगले 6 महीनों में खर्च किए जाएँगे। केजरीवाल सरकार ने यह भी कहा कि इलेक्ट्रिक बसों को पहले ही चालू कर दिया गया है।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब आरटीआई के जवाब से पता चला है कि दिल्ली सरकार किस तरह से इकट्ठा किए गए ग्रीन टैक्स को खर्च करने में असफल रही है। 2017 में इसी तरह की एक और आरटीआई के जवाब से पता चला था कि ₹787 करोड़ ग्रीन टैक्ट जमा किए गए थे, जिसमें से केवल ₹93 लाख खर्च किए गए थे। यह राशि टोल प्लाजा पर रेडियो-फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन सिस्टम के लिए दस्तावेज तैयार करने पर खर्च की गई थी।
2017 में दिल्ली सरकार ने यह भी कहा था कि 500 इलेक्ट्रिक बसों को खरीदने के लिए अप्रयुक्त राशि का उपयोग किया जाएगा। इस साल मार्च में केजरीवाल सरकार ने 1000 इलेक्ट्रिक बसों की खरीद को मंजूरी दी थी, लेकिन अभी तक राजधानी में इलेक्ट्रिक बस सेवाएँ शुरू नहीं हुई हैं।

'दमघोटू' हुई दिल्ली की हवा का जिम्मेदार कौन?

'दमघोटू' हुई दिल्ली की हवा: SC की पटाखे छोड़ने की तय सीमा का हुआ उल्लंघन, वायु गुणवत्ता हुई ‘बहुत खराब’
तेलंगाना से आर.बी.एल.निगम 
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रविवार(अक्टूबर 27) को दिवाली के दिन प्रदूषण की वजह से धुंध छा गई और वायु गुणवत्ता ‘बहुत खराब' स्तर पर पहुंच गयी। सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखा छोड़ने के लिए दो घंटे की सीमा तय की थी, लेकिन लोगों ने इसके अलावा भी पटाखे छोड़े दिल्ली की हवा में पटाखों की तेज आवाज के साथ ही जहरीला धुंआ और राख भर गया और कई स्थानों पर वायु गुणवत्ता का स्तर ‘गंभीर' स्तर को पार गया लोगों ने मालवीय नगर, लाजपत नगर, कैलाश हिल्स, बुराड़ी, जंगपुरा, शाहदरा, लक्ष्मी नगर, मयूर विहार, सरिता विहार, हरी नगर, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, द्वारका सहित कई इलाकों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पटाखा छोड़ने के लिए तय दो घंटे की समय सीमा का उल्लंघन करके पटाखे छोड़ने की सूचना दी 
आतिशबाज़ी से आनंदित होते लोग 
इसके अलावा नोएडा, गुरुग्राम और गाजियाबाद में भी निवासियों ने निर्धारित समय के अलावा भी पटाखे छोड़ेलोग शाम आठ बजे से पहले भी पटाखे छोड़ते दिखे हालांकि इन पटाखों की आवाज कम रही 
तेलंगाना में आतिशबाज़ी 
ऐसे में प्रश्न है कि जब दिल्ली और उसके आस-पास के राज्यों में धुआँ करने वाले पटाखों की बिक्री नहीं हुई, फिर इतना प्रदुषण कैसे हुआ? दूसरे, क्या पनाली पहली बार जल रही है, वर्षों से जलती आ रही है? तीसरे, दिल्ली में प्रदुषण पर इतना शोर होता है, दिल्ली या इसके निकट राज्यों के कुछ हिस्सों को छोड़ अन्य राज्यों में यह समस्या क्यों नहीं होती? तेलंगाना में अपने प्रवास के दौरान धन तेरस से दो दिन पूर्व बम-पटाखों की खुले मैदानों, बैंकट हॉलों में दुकानें लग जाती हैं, और धन तेरस से आतिशबाज़ी जो शुरू होती है, दिवाली के दो दिन बाद तक चलने पर कोई प्रदुषण समस्या नहीं होती, फिर कुछ वर्षों से दिल्ली में ही क्यों शोर मच जाता है? इस शोर के पीछे कोई हिन्दू त्यौहारों पर अंकुश लगाने का षड्यंत्र तो नहीं? क्योंकि 2014 में मोदी सरकार से पूर्व होली, दिवाली, करवा चौध पर पानी की बर्बादी, प्रदुषण और पति के लिए मैं क्यों भूखी रहूं? आदि प्रवचन सुनने को मिलते थे। और तो प्रवचन रुक गए, लेकिन दिवाली का शोर बाकि है। अब दिल्ली में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं, सभी पार्टियां वोट मांगने आएंगी, जनता को चाहिए उनसे पूछे हिन्दू त्यौहारों पर क्यों प्रदुषण जैसे विवाद खड़े होते हैं?
फिर, प्रदुषण का शोर मचाने वाले दिल्ली यमुना में बहते नालों समान गन्दा पानी पर चुप्पी साधे हुए हैं, क्यों? क्या उससे प्रदुषण नहीं फैलता? विकासपुरी, यमुना पर कितनी कॉलोनियां नालों के किनारे बसी हुई हैं, इतना ही नहीं, आज़ाद नगर और कृष्णा नगर मेट्रो स्टेशन तो गंदे नाले के तट ही बना है, क्या मेट्रो कर्मचारियों के स्वास्थ्य को खतरा नहीं? मेट्रो चालू करने से पूर्व गंदे नाले को बंद करना था। यमुना-पार भीकम सिंह कॉलोनी, बलवीर नगर और अन्य क्षेत्रों में कब सरकारी पानी की लाइन में गन्दा पानी आ जाये, पता नहीं, यह भी प्रदुषण का एक हिस्सा है, इस ओर किसी का कोई ध्यान नहीं। 
भाजपा वाले 'हर हर मोदी, घर घर मोदी, आप वाले 'मुफ्त पानी, मुफ्त बिजली', और कांग्रेस भाजपा और आप की कमियों के प्रचार से जनता को भ्रमित करते आएंगे, परन्तु मूल समस्याओं को कोई नहीं बोलेगा।         
सरकारी एजेंसियों के मुताबिक रविवार रात 11 बजे दिल्ली की औसत वायु गुणवत्ता का स्तर 327 पर पहुंच गया, जबकि शनिवार(अक्टूबर 26) को यह 302 था सरकार की वायु गुणवत्ता निगरानी संस्था ‘सफर' ने दिवाली की रात पटाखे जलाने, मौसम में बदलाव और पराली जलाने की वजह से दिल्ली की औसत वायु गुणवत्ता ‘गंभीर' स्तर पर पहुंचने की आशंका जताई है आंकड़ों के मुताबिक दिन में आनंद विहार में पीएम-10 का स्तर 515 दर्ज किया गया वहीं वजीरपुर और बवाना में पीएम-2.5 का स्तर 400 के पार चला गया राजधानी स्थित 37 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से 25 ने वायु गुणवत्ता ‘खराब' श्रेणी में दर्ज की 
दिल्ली के नजदीक स्थित शहरों फरीदाबाद, गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा और नोएडा में रविवार रात 11 बजे वायु गुणवत्ता का स्तर क्रमश: 320, 382, 312 और 344 रहा. उल्लेखनीय है कि पिछले दिवाली के मौके पर दिल्ली में वायु गुणवत्ता का स्तर सुरक्षित सीमा से 12 गुना अधिक 600 तक पहुंच गया था गौरतलब है कि शून्य से 50 के बीच के एक्यूआई को ‘अच्छा', 51 से 100 को ‘संतोषजनक', 101 से 200 को ‘मध्यम', 201 से 300 को ‘खराब', 301 से 400 को ‘बहुत खराब' और 401 से 500 को ‘गंभीर' और 500 से ऊपर को अति गंभीर आपात स्थिति की श्रेणी में रखा जाता है