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दिल्ली के डिप्टी CM सिसोदिया को असम के CM सरमा ने दी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

अंग्रेजी में कहावत है "hit & run" और आम आदमी पार्टी इसी नीति पर चल जनता को भ्रमित करती आ रही है। जिसे जनता सच मान बैठती है, लेकिन जब इन पर कोई कानूनी कार्रवाई होती है तब माफ़ी मांगते नज़र आते हैं। अब चर्चा है कि क्या अरुण जेटली और नितिन गडकरी की तरह असम मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा माफ़ी मांगने पर मुकदमा वापस लेंगे या फिर सिसोदिया को सजा दिलवाकर ही दम लेंगे?
5 जून को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा लगाए गए आरोपों को लेकर दस्तावेज जारी किए। एक ट्वीट में सीएम सरमा ने कहा, “कंपनी ने असम के एनएचएम को लिखा कि कोविड वॉरियर्स के लिए लगभग 1,500 पीपीई किट की आपूर्ति को सीएसआर योगदान के रूप में माना जाना चाहिए और इसलिए सरकार द्वारा एक भी रुपये का भुगतान नहीं किया जाना चाहिए।”

सीएम सरमा ने अपनी पत्नी रिंकी भुइयां सरमा की कंपनी जेसीबी इंडस्ट्रीज द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) असम को भेजे गए 26 मार्च 2020 के पत्र की स्कैन फोटो भी जोड़ा है। पत्र में जेसीबी इंडस्ट्रीज ने एनएचएम से कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत 1485 पीपीई किट स्वीकार करने का अनुरोध किया था। पत्र में लिखा है, “हमने एमरेलिस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड की कुल 1485 पीपीई किट वाली एक खेप पहुँचाई है।”

सरमा ने 4 जून को डिप्टी सीएम सिसोदिया पर बदनाम करने का आरोप लगाते हुए कानूनी कार्रवाई की धमकी दी। यह सब तब शुरू हुआ जब वामपंथी मीडिया पोर्टल ‘द वायर’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें आरोप लगाया गया कि सीएम सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा की स्वामित्व वाली एक फर्म को पीपीई किट और कोविड-19 संबंधित अन्य सामानों का आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किए बिना आपूर्ति करने का आदेश दिया गया था।

रिंकी भुइयां सरमा ने द वायर की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों का खंडन किया और कहा कि उन्होंने पीपीई किट की आपूर्ति के लिए एक पैसा भी नहीं लिया। उसने कहा कि उसने सीएसआर के तहत राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को पीपीई किट दान की थी और उसके लिए कोई भुगतान नहीं लिया गया था।

वायर की रिपोर्ट का उपयोग करते हुए 4 जून 2022 को दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और हिमंत बिस्वा सरमा पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि हिमंत बिस्वा सरमा ने उनकी पत्नी और करीबी सहयोगियों के स्वामित्व वाली कंपनियों को सरकारी खरीद के ठेके दिए। उन्होंने इसकी कॉपी भी पोस्ट की।

इन आरोपों का जवाब देते हुए, हिमंत बिस्वा सरमा ने अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किया, “ऐसे समय में जब पूरा देश 100 से अधिक वर्षों में सबसे खराब महामारी का सामना कर रहा था, असम के पास शायद ही कोई पीपीई किट था। मेरी पत्नी ने आगे आने का साहस किया और जान बचाने के लिए सरकार को लगभग 1500 मुफ्त में दान दिया। उसने एक पैसा भी नहीं लिया।”

पीपीई किट मांगने पर दिल्ली के हमदर्द अस्पताल ने 84 नर्सों को नौकरी से निकाला

Delhi: हमदर्द यूनिवर्सिटी अस्पताल से ...
                                                                                                                                                                                   साभार 
कोरोना संक्रमित मरीजों के इलाज में तैनात एचएएच सेंटेनरी अस्पताल की एक नर्स ने उसे और अस्पताल के अन्य 83 कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त करने के फैसले को चुनौती देने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
वकील सुभाष चंद्रन द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (HIMSR) के COVID-19 समर्पित HAH सेंटेनरी अस्पताल के इन कर्मचारियों को तब हटा दिया गया था जब उन्होंने स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए COVID-19 ड्यूटी के दौरान एन -95 मास्क, निजी सुरक्षा उपकरण (पीपीई), बेहतर काम के घंटे, पीने के पानी, मुफ्त COVID-19 टेस्ट जैसी बुनियादी सुविधाओं की माँग की थी। 
याचिका के अनुसार, सरकारी आदेश के बावजूद हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (HIMSR) के HAH सेंटेनरी अस्पताल ने COVID-19 के संदर्भ में वैध चिंताओं की तरफ ध्यान दिलाने पर बड़ी तादाद में स्वास्थ्य कर्मियों को नौकरी से निकाल दिया।
याचिका में कहा गया है कि कोरोना काल में 84 नर्सिंग अधिकारियों को बर्खास्त करने के लिए अस्पताल प्रबंधन द्वारा उठाया गया कदम सरकार के निर्देशों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया है कि 84 नर्सों को नौकरी से हटाने का निर्णय स्पष्ट रूप से COVID-19 के संदर्भ में वैध चिंताओं को बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ एक जवाबी कदम है।
वकील सुभाष चंद्रन द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (HIMSR) के COVID-19 समर्पित HAH सेंटेनरी अस्पताल की एक नर्स 3 जुलाई को कोरोना वायरस से संक्रमित पाई गई थीं और उनमें कोरोना के लक्षण दिखाने के बावजूद उनका मुफ्त टेस्ट नहीं किया गया था।
याचिका में अस्पताल प्रशासन के 11 जुलाई के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है जिसमें कहा गया है कि नर्सों को इसलिए नौकरी से निकाल दिया गया है क्योंकि वे छुट्टी के बिना काम से अनुपस्थित थीं, जबकि इनमें से अधिकांश 11 जुलाई तक ड्यूटी पर थीं और कई क्वारंटाइन में थीं।
इसके साथ ही याचिका में कहा गया है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था ख़तरनाक ढंग से दबाव में है, इसमें कर्मचारियों और संसाधनों की कमी है। यह महामारी नागरिकों की ज़िंदगी लील रही है और देश में भारी संख्या में लोग मर रहे हैं। इसे देखते हुए महामारी के बीच नर्सों को नौकरी से निकाल दिया, जबकि अभी स्वास्थ्यकर्मियों की भारी ज़रूरत है। अस्पताल ने दोनों ही आधार पर गलत कदम उठाया है – उसने सरकार के निर्देशों को नहीं माना है और नर्सों और एचआईएमएसआर के बीच करार को तोड़ा है।
याचिकाकर्ता ने राजधानी दिल्ली में स्वास्थ्य कर्मियों की स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अधिक जोखिम से संबंधित गंभीर चिंताओं को दूर करने के लिए एक COVID-19 प्रबंधन प्रोटोकॉल तैयार करने और कोरोना आइसोलेशन वार्डों में काम करने वाले प्रत्येक स्वास्थ्य कर्मी के लिए COVID-19 सुरक्षा किट की उपलब्धता सुनिश्चित करने की भी माँग की है। 

कोरोना काल में जनता को कैसे लूट रहे हैं प्राइवेट अस्पताल? कहीं थर्मल स्क्रीनिंग के बदले 100 रूपये तो कहीं 52 हजार की पीपीई किट

कोरोना काल में अस्पतालों की लूट. सांकेतिक तस्वीर (गूगल)
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कोरोना के नाम पर प्राइवेट अस्पतालों की लूट पर उजागर करने का प्रयास किया, जिसे आलोचनाओं के घने बादलों ने ढक दिया। स्वामी विवेकानंद कहना है की "कभी उपदेशक पर मत जाओ, उसके उपदेशों पर जाओ।" किसी ने प्राइवेट अस्पतालों की लूट पर मंथन करने का प्रयास नहीं किया। लेकिन है हकीकत। जिस का केन्द्र सरकार को संज्ञान लेकर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए। 
आपने कभी गिद्ध देखा है? एक बड़ा सा पक्षी जो अक्सर मरे हुए जानवरों की लाश को नोच-नोचकर खाता हुआ नजर आ जाता है। गिद्ध का खाना ही यही है, सड़ी-गली हुई लाश जिससे वो अपना पेट भरता है। चलो ये तो गिद्ध की नियती है क्योंकि प्रकृति ने उसे यही खाना दिया है ताकि उसका भी पेट भर सके और मरे जानवरों की गंध और बैक्टीरिया से आसपास कोई प्रभावित ना हो।लेकिन एक गिद्ध इंसानी शक्ल में भी होता है जो बस इस इंतजार में बैठा होता है कि आदमी बीमार पड़े और वो उसके जीवनभर की गाढ़ी कमाई को एक मिनट में चट्ट कर जाए। इंसानी शक्ल में दिखने वाले ये गिद्ध दरअसल प्राइवेट अस्पताल के मैनेजमेंट में पाए जाते हैं जिनके लिए मरीज सिर्फ और सिर्फ वो जरिए है जिसे वो नोच-नोचकर खा लेना चाहते हैं
पूरी दुनिया इन दिनों कोरोना महामारी से जूझ रही है. डॉक्टरी पेशे से जुड़े लोगों को कोरोना वॉरियर्स कहा जा रहा है जो अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों की जान बचा रहे हैं। कई डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी इस दौरान अपनी जान भी गंवा चुके हैं। उनके प्रति हमारे दिल में अपार श्रद्धा है। उनका कर्ज शायद हम और आप जीवन भर चुका भी नहीं सकेंगे लेकिन इसी दौर में सफेद कोर्ट पहने कुछ ऐसे भी गिद्ध हैं जो लोगों की गाढ़ी कमाई को चूस लेना चाहते हैं

कई प्राइवेट अस्पताल कोरोना के इलाज के नाम पर लोगों से लाखों रूपये मांग रहे हैं। सोशल मीडिया ऐसी खबरों से भरा हुआ है जहां प्राइवेट अस्पताल की मनमानी देखने को मिल रही है। दिल्ली का सरोज अस्पताल कह रहा है कि अगर आपको इलाज करवाना है तो पहले चार लाख रूपये काउंटर पर जमा करो। कम से कम बिल 3 लाख का तो होगा ही
दिल्ली में एक और तीरथ राम शाह चेरिटेबल अस्पताल हैं जहां टाइफाइड की वजह से चार दिन अस्पताल में रहने वाले मरीज के हाथ में एक लाख रूपये का बिल थमा दिया जाता है। बिल की डीटेल कहती है कि उसमें से 52 हजार रूपये सिर्फ कोविड पीपीई किट और मास्क का है। अब जरा सोचिए कि जो डॉक्टर किट और मॉस्क पहनकर इलाज कर रहे हैं उनके एक दिन की किट पर कितना खर्च होता होगा? चलो मान लेते हैं वार्ड में कम से कम 5 लोग हैं और हर मरीज से 50 हजार रूपये मास्क और किट के नाम पर लिए जाते हैं तो कितना पैसा होता है?
देश में पता नहीं कितने सरोज और तीरथ राम अस्पताल हैं, जहाँ की मरीज की डिस्चार्ज डिटेल देखने पर सरकार को प्राइवेट अस्पतालों द्वारा जा रही खुली लूट सामने आएगी। सबसे पहले जहाँ हर आने वाले मरीज का कोरोना टेस्ट किया जाता है और कोरोना की रिपोर्ट आने तक लगभग एक लाख रूपए के लपेटे में मरीज आ जाता है। जबकि उसकी वास्तविक बीमारी का इलाज कोरोना की रिपोर्ट आने के बाद ही होता है। इतना ही नहीं, प्राइवेट अस्पतालों में इंजेक्शन आदि में इस्तेमाल होने वाली रुई के लिए पूरे बण्डल के पैसे लिए जाते हैं। जबकि डिस्चार्ज करते समय बचा हुआ बण्डल तक रख लिया जाता है, क्या यह लूट नहीं? 
अब दूसरी कहानी झारखंड के शहर रांची की जहां ऑर्किड हॉस्पिटल में कोरोना के नाम पर अस्पताल प्रशासन ने लूट मचा रखी है। अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने की फीस तो अलग है, पहले आपको अस्पताल में घुसने के लिए फीस देनी होगी। ये फीस है थर्मल स्क्रीनिंग का जिसे लेजर से दिमाग पर मारकर शरीर का तापमान जांचा जाता है। अब आप ही बताएं, ऐसे अस्पतालों को गिद्ध ना कहें तो क्या कहें जो कोरोना काल में भी गरीबों का खून चूस रही है

इंदौर : मच्छी बाजार की आड़ में दवाओं का गोरखधंधा: 227 लाशों से पटा कब्रिस्तान

इंदौर के मच्छी बाजार और बंबई बाजार में मछलियों की ख़रीद-बिक्री के बीच दवाओं का कारोबार चल रहा है। सिर्फ़ दवाएँ ही नहीं, ऑक्सीजन जनरेटर, मास्क, पीपीई किट और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन (HCQ) जैसी चीजों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है।
भारत सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स ने कोरोना के मरीजों के लिए HCQ का इस्तेमाल करने की सलाह दी थी। हालाँकि, आमजनों को इसे बिना डॉक्टर की सलाह के लेने के लिए मना किया गया है। बावजूद इसके लोग इसे ख़रीदने के लिए लालायित हैं।
जिन इलाकों में ये सब हो रहा है, वो कोरोना से बुरी तरह प्रभावित है। वहाँ चोरी-छिपे इलाज भी चल रहा है। कई मौतें हो चुकी हैं। ‘दैनिक भास्कर’ के एक स्टिंग के मुताबिक, मेडिकल उपकरणों की ख़रीद-बिक्री और चोरी-छिपे कारोबार के बीच कई लाशों का गिरना संदिग्ध परिस्थितियों की ओर इशारा करता है।
इन चीजों की डिलीवरी के लिए गाड़ी आती है। लॉकडाउन में गाड़ी निकालना संभव नहीं है, इसीलिए उस गाड़ी ने खाद्य सामग्रियों के वितरण का कर्फ्यू पास ले रखा है और उसकी आड़ में ये सब किया जा रहा है।
मुंबई की एक कुरियर कम्पनी के खाते से इन दवाओं के सप्लायर को राशि का भुगतान किया जाता है। स्टिंग में ये भी खुलासा हुआ है कि अप्रैल से लेकर अब तक वहाँ 227 लोगों की मौत हो चुकी है। अप्रैल के शुरुआती सप्ताह में ही यहाँ 127 लोग काल के गाल में समा गए थे। इन सभी की लाशों को वहीं के कब्रिस्तानों में दफनाया गया।
इंदौर पहले से ही कोरोना के हॉटस्पॉट के रूप में चिह्नित है, ऐसे में वहाँ ये सब होना चिंता का विषय है। स्टिंग के बाद माँग की जा रही है कि प्रशासन मेडिकल इक्विपमेंट सप्लायर से पिछले एक माह में सप्लाई किए गए मशीनों की सूची ले। इसमें ऑक्सीजन कंस्ट्रेटर और बायपेप मशीनें शामिल हैं।
ऑक्सीजन सिलिंडर की सप्लाई को लेकर भी नज़र रखने की माँग की जा रही है। ‘दैनिक भास्कर’ ने एक ख़रीददार वाजिद और सप्लायर के बीच के बातचीत को एक्सेस किया है, जिसमें सप्लायर कह रहा है कि मामला स्ट्रिक्ट होने के कारण डिलीवरी में दिक्कत है। इसमें ऑक्सीजन के लिए फिलिप्स के मशीनों के लेन-देन की बात चल रही है। एक पेशेंट के मरने की बात भी कही जा रही है। इससे पता चलता है कि लोगों की मौतें हो रही हैं।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार देश में जारी कोरोना के कहर के बीच शुक्रवार (अप्रैल 17, 2020) को गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों .....
एक सप्लायर को पहली बार 93 हज़ार रुपए और दूसरी बार 1.28 लाख रुपए भुगतान किए गए। इंडेक्स लॉजिस्टिक प्राइवेट लिमिटेड के जरिए भुगतान की बात पता चली है। इसी नाम से एक प्रतिष्ठित कम्पनी भी है। , इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। डीआईजी हरिनारायणचारी मिश्र ने बताया कि पुलिस के पास इस बात की सूचना है कि एक सामानांतर चिकित्सा व्यवस्था चलाई जा रही है। इसकी जाँच क्राइम ब्रांच से कराने का आश्वासन दिया गया है।