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सऊदी अरब : बिना चाँद दिखे मन गयी ईद

                                                                                                                    साभार: मिडल-ईस्ट आई
रमजान के बाद ईद-उल-फितर की तारीख तय करना अक्सर इस्लामी देशों में बहस का विषय रहा है। आमतौर पर यह तारीख लूनर कैलेंडर से तय की जाती है। लेकिन इसे पक्का तभी माना जाता है जब ईद से एक दिन पहले चाँद नजर आ जाए। कुछ देश इसके लिए अपने कुछ स्थानीय चाँद देखने वालों पर यकीन कर लेते हैं और कुछ सऊदी अरब पर छोड़ देते हैं कि जब वो ईद मनाएँगे तभी ईद होगी।

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। लोग सऊदी अरब पर भरोसा करके बैठे थे और सऊदी ने ईद का दिन शुक्रवार बता दिया। सऊदी के ऐलान के बाद ही ये बहस गरमा गई कि क्या वाकई ईद शुक्रवार को होनी चाहिए। कुछ खगोलविद निकलकर आए जिन्होंने चुनौती दी कि ईद शुक्रवार को नहीं हो सकती क्योंकि गुरुवार को चाँद दिख ही नहीं सकता। एक कुवैती खगोलविद ने तो कहा अगर ऐसा है कि गुरुवार को चाँद दिखा तो उसकी फोटो सबूत के तौर पर पेश की जाए।

बावजूद इस चुनौती के सऊदी ने 13 में से 2 क्षेत्रों में चाँद नजर आने पर पर ईद शुक्रवार को मनाई। जबकि मोरक्को, पाकिस्तान, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, भारत और जापान में शनिवार को ईद मनाई गई। साथ ही कुवैती खगोलविद की चुनौती पर सऊदी अरब से चाँद की फोटो दिखाने को कहा गया। इस पर एक सऊदी के खगोलविद मुलहम-अल-हिंद ने धुंधली चांद की फोटो खींचकर दिखाई और कहा कि ये चार्ज कपल्ड डिवाइस इन्फ्रारेड कैमरे का प्रयोग करके खींची गई है।

इस तरह ईद की तारीखों में हेर-फेर के बाद कई इस्लामी देश और मुस्लिम लोग सऊदी अरब से नाराज हैं। उनका मत यही है कि गुरुवार को किसी कीमत पर चाँद का दिखना संभव नहीं था तो सऊदी ने ईद कैसे मनाई। ईराक के शिया मौलवी अली-अल-सिस्तानी ने भी ईद शनिवार को बताई।

इसी तरह लेबनान में भी शिया इस्लामिक काउंसिल ने ईद शनिवार की बताई। इसके अलावा ब्रिटिश सरकार ने भी माह की शुरुआत में यही अनुमान लगाया था कि गुरुवार को यूरोप, अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के बड़े-बड़े क्षेत्र में चंद्रमा नहीं दिखाई देंगे जिसके बाद कई मुस्लिमों ने सऊदी के पल्ला झाड़ते हुए ईद शनिवार की मानी।

सऊदी अरब : मौलाना को मौत की सजा, किंगडम के खिलाफ रूख और मुस्लिम ब्रदरहुड की प्रशंसा का आरोप

अवाद अल-कार्नी (साभार: अरब न्यूज)
सऊदी अरब में ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करने के अपराध में अवाद अल-कार्नी (Awad Al-Qarni) नाम के 65 वर्षीय प्रोफेसर को मौत की सजा सुनाई गई है। उन पर कथित रूप से सरकार विरोधी खबरें सोशल मीडिया पर प्रसारित करने का आरोप है।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के हाथों में सऊदी की बागडोर लेने के बाद सुधार समर्थक कानून के इस मौलवी को 9 सितंबर 2017 को गिरफ्तार किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, अवाद अल-क़ार्नी को सरकारी मीडिया द्वारा ‘खतरनाक उपदेशक’ के रूप में गलत तरीके से चित्रित किया गया है।

ब्रिटिश अखबार द गार्डियन के अनुसार, अपनी गिरफ्तारी से पहले मौलवी के ट्विटर पर 2 मिलियन (20 लाख) फॉलोअर्स थे। उनकी गिरफ्तारी को सत्तावादी सऊदी अरब सरकार द्वारा असंतुष्टों पर कार्रवाई माना जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, मोहम्मद बिन सलमान के शासन द्वारा सऊदी अरब में सोशल मीडिया के उपयोग को अपराध बना दिया गया है। सऊदी अरब में ये हालात तब है, जबकि वहाँ के बादशाह के पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड का फेसबुक और व्हाट्सएप में बड़े पैमाने पर निवेश है।

गार्डियन ने बताया कि अवाद अल-क़ार्नी को यह स्वीकार करने के बाद मौत की सजा दी गई कि उन्होंने हर अवसर पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए अपने ट्विटर अकाउंट (@awadalqarni) का इस्तेमाल किया। उनके बेटे नासिर ने उन पर लगे आरोपों की जानकारी अखबार को दी। नासिर पिछले साल सऊदी से भाग गए थे और तब से वे ब्रिटेन में रह रहे हैं।

अवाद अल-क़ार्नी पर वीडियो और व्हाट्सएप चैट में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड की कथित रूप से प्रशंसा करने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है, “अल-क़ार्नी द्वारा टेलीग्राम पर बनाना और उसका स्पष्ट उपयोग करना भी आरोपों में शामिल है।”

यह पहली बार नहीं है, जब सऊदी के राजशाही ने सोशल मीडिया का उपयोग करने के लिए किसी को दंडित किया है। पिछले साल अगस्त में सलमा अल-शहाब नाम की एक महिला को ट्विटर अकाउंट रखने और मोहम्मद बिन सलमान शासन के आलोचकों के ट्वीट साझा करने पर 34 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।

उसी समय एक अन्य महिला नौरा बिन्त सईद अल-क़हत को उसकी सोशल मीडिया गतिविधि के लिए 45 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। हालाँकि, टेररिज्म कोर्ट में सुनवाई के दौरान उसके अदालती दस्तावेजों में कुछ भी हिंसा या आपराधिक गतिविधि से संबंधित घटना दर्ज नहीं था।

मानवाधिकार समूह रेप्रीव के लिए काम करने वाले जीद बसौनी ने कहा कि अवाद अल-कर्नी को दी गई मौत की सजा आलोचकों को चुप कराने का एक पैटर्न है। उन्होंने कहा, “… मोहम्मद बिन सलमान के मार्गदर्शन में सरकारी वकील लोगों को उनकी राय के लिए, ट्वीट्स के लिए और बातचीत के लिए मारने के लिए कहा है। वे (ऐक्टिविस्ट) खतरनाक नहीं हैं। वे शासन को उखाड़ फेंकने का आह्वान नहीं कर रहे हैं।”

यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब मोहम्मद बिन सलमान अपने अब्बू के हाथों से सऊदी की बागडोर लेने के बाद इसे दुनिया में एक सहिष्णु, बहुलतावादी समाज के रूप में फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा हैं।

सऊदी अरब में CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने पर बड़ी संख्या में NRIs को किया भारत को प्रत्यर्पित

                                                                                        फाइल चित्र 
सऊदी अरब ने बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों (NRIs) को वापस भारत को प्रत्यर्पित किया है। ये सभी खाड़ी मुल्क में रहते हुए CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे थे। इन्होंने दिल्ली के शाहीन बाग़ विरोध प्रदर्शन से प्रेरित होकर वहाँ भी सड़क पर उतर कर मोदी सरकार के इस कानून के खिलाफ जम कर प्रदर्शन किया था। अब सऊदी अरब ने इन सभी को भारत को सौंपने का निर्णय लिया है।

सऊदी अरब की दूसरी वाणिज्यिक राजधानी मानी जाने वाली जेद्दाह में प्लाकार्ड्स लेकर मोदी सरकार और CAA के खिलाफ इन लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए थे। इन सभी ने दिल्ली में इस कानून को लेकर उपद्रव कर रहे लोगों से सहमति जताते हुए उन्हें अपना समर्थन दिया था। इस विरोध प्रदर्शन के बाद से ही इन NRIs के सामने मुश्किलें खड़ी होती गईं। इनमें से कइयों को गिरफ्तार कर के उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई।

उन पर मुल्क के नियम-कायदों का उल्लंघन करने के आरोप लगाए गए। साथ ही उन पर अवैध तरीके से भीड़ जुटाने का आरोप लगाया गया। इनमें से कइयों को वापस भारत प्रत्यर्पित किया जा चुका है। खाड़ी मुल्कों में विरोध प्रदर्शनों को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाती है। घेराव या भीड़ जुटा कर नारेबाजी को भी बर्दाश्त नहीं किया जाता। कुछ युवा प्रदर्शनकारियों का दावा है कि वो इन नियम-कायदों से अनजान थे।

कइयों पर तो सिर्फ इसीलिए कार्रवाई की गई, क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए प्रोपेगंडा फैलाने की कोशिश की थी। अक्टूबर 2019 में सऊदी अरब और भारत ने एक नए रणनीतिक पार्टनरशिप के लिए कदम बढ़ाया था। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान तब नई दिल्ली आए थे और यहीं सुरक्षा के मसलों पर साझेदारी की नई रणनीति बनी। उधर सऊदी अरब ने पाकिस्तान की नाक में दम कर रखा है।

हाल ही में  सऊदी अरब सरकार ने रियाद में मौजूद दूतावास और जेद्दाह स्थित वाणिज्य दूतावास में 27 अक्टूबर को ‘कश्मीर बैक डे’ आयोजन की बात खारिज कर दी। इससे पाकिस्तान को गहरा झटका लगा। सऊदी अरब (जिसे पाकिस्तान अपना नज़दीकी सहयोगी मुल्क मानता है) ने FATF पर पाकिस्तान के विरोध में मत दिया, जिसके चलते पाकिस्तान ग्रे सूची में बना हुआ है। इसके बाद पाकिस्तानी सऊदी अरब को ‘गद्दार’ तक बताने लगे। 

कुवैत से निकाले जा सकते हैं 8 लाख भारतीय नागरिक

कुवैत, भारतीय
                                                                                                     प्रतीकात्मक 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत में नागरिकता संशोधक कानून बनने पर वोट के भूखे नेताओं और पार्टियों ने मुसलमानों को खूब उकसाया, मदारियों की तरह मजमें लगाकर, अराजकता फैलवाई, लेकिन कुवैत में इस तरह कानून बनने पर कोई विरोधी स्वर नहीं उठ रहे, विपरीत इसके सभी समर्थन कर रहे हैं, क्योकि वहां देशहित के नाम भारतीय नेताओं की तरह कोई तमाशा कर अराजकता फैलाकर वोट की सियासत नहीं करते। पार्टी फण्ड से ख़रीदे मकान को बेचकर लंगर लगाने का ड्रामा नहीं करते।  
भारत में जिस तरह वोट के भूखे नेताओं और पार्टियों ने उपद्रव मचवाया, सबके सामने है। खूब "हिन्दुत्व तेरी कब्र खुदेगी", "मोदी तेरी कब्र खुदेगी", "योगी तेरी कब्र खुदेगी", "हम कागज नहीं दिखाएंगे", आदि नारेबाजी करने के साथ-साथ उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगा रच दिया गया। जबकि कुवैत में किसी पार्टी में ऐसा करने की सोंच तक नहीं, विपरीत इसके रोहिंग्या के अवैध रूप से आधार कार्ड तक बनवा दिए गए। क्या वोट और सत्ता के भूखे ऐसे नेता कभी देशहित के बारे में कोई काम कर सकते हैं? 
तीन चौथाई मुस्लिम जनसंख्या वाले खाड़ी मुल्क कुवैत में अप्रवासियों के लिए एक नया बिल लाया गया है। इसके क़ानून बनने के बाद वहाँ रहने वाले 8 लाख भारतीय नागरिकों को लेकर समस्या खड़ी हो गई है।
कुवैत के नेशनल असेम्ब्ली की क़ानूनी और संसदीय समिति ने अप्रवासी कोटा बिल को मॅंजूरी दे दी है। इसके अनुसार भारतीय नागरिकों को वहाँ की कुल जनसंख्या का 15% से ज्यादा हिस्सा बनने से रोका जाएगा।
इसके लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जानी है, इसीलिए इस बिल को अब सम्बद्ध कमिटी के पास भेजा जाएगा। क़ानूनी एवं संसदीय कमिटी ने पहले ही कह दिया है कि ये बिल संवैधानिक है।
‘गल्फ न्यूज़’ के अनुसार, कुवैत में भारतीय समुदाय की कुल जनसंख्या 14.5 लाख है। नए बिल की वजह से इनमें से क़रीब 8 लाख लोग कुवैत छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं।
अगर कुवैत में कुल अप्रवासियों की बात करें तो उनकी संख्या 43 लाख है। साथ ही इस बिल में इजिप्ट के लोगों को भी निकाल बाहर करने की बात की गई है।
भारत में धन के प्रवाह के मामले में भी कुवैत ऊपर की सूची में है, जहाँ से यहाँ काफी धन भेजा जाता है। भारत में कुवैत से हर साल 5 बिलियन डॉलर के क़रीब धनराशि आती है।
कुवैत के सरकार का कहना है कि वहाँ के अपने ही नागरिक अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन कर रह गए हैं, जिन्हें सुरक्षित माहौल देने के लिए इस बिल का क़ानून में बदलना ज़रूरी है। कुवैत विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करने के प्रयास में लगा हुआ है।

कुवैत अब आप्रवासियों को बहुसंख्यक नहीं बने रहने देना चाहता। हालिया कोरोना वायरस संक्रमण आपदा और तेल के दाम में गिरावट को भी इसके पीछे की वजह माना जा रहा है।
कुवैत में जैसे-जैसे कोरोना वायरस संक्रमण का प्रभाव बढ़ा, वहाँ की जनता में अप्रवासियों के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा। वहाँ के नेताओं ने इसी का फायदा उठा कर जनभावनाओं को और हवा दी। अर्द्धलोकतंत्र वाले कुवैत में इसे छोटे नेताओं द्वारा वोट तुष्टिकरण के रूप में भी देखा जा रहा है, जिन्होंने सरकार पर इस क़ानून के लिए दबाव बनाया।
भारत ने अब तक इस विषय पर कोई बयान नहीं दिया है लेकिन इस क़ानून से सम्बंधित हर एक गतिविधि पर कुवैत स्थित भारतीय दूतावास की नज़र है।
कुवैत के स्पीकर मरज़ूक़ अल घनेम ने कहा कि उनके देश की असली समस्या आप्रवासियों की जनसंख्या का 70% पार करना है। उन्होंने दावा किया कि कुवैत की 33.5 लाख आप्रवासियों में से 13 लाख अशिक्षित हैं या फिर उन्हें ठीक से पढ़ने-लिखने तक में भी समस्या आती है। उन्होंने कहा कि ये वीजा ट्रेडर्स की वजह से हुआ है और इस जनसंख्या की कुवैत को ज़रूरत नहीं है। कुवैत सरकार में फिलहाल 28,000 भारतीय नागरिक कार्यरत हैं।
इनमें से अधिकतर इंजिनियर, डॉक्टर, नर्स, वैज्ञानिक हैं या फिर वहाँ की तेल कंपनियों में काम करते हैं। वहाँ अब तक कोरोना वायरस संक्रमण के 50,000 के क़रीब मामले आ चुके हैं। कुवैत के प्रधानमंत्री शेख सबह अल खालिद का भी कहना है कि आप्रवासियों की जनसंख्या को कुल जनसंख्या का वर्तमान 70% से 30% करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। अब सभी को भारत सरकार के बयान का इन्तजार है।

अमेरिका को सबक सिखाने के लिए अब सऊदी अरब पर नए हमले की तैयारी में ईरान

अमेरिका को सबक सिखाने के लिए अब सऊदी अरब पर नए हमले की तैयारी में ईरान, जनरल ने कहा- तलवारें खींच लो- रिपोर्टतेहरान. ईरान और अमेरिका के बीच तनातनी लगातार बढ़ती जा रही है. इस साल सितंबर में सऊदी के तेल संयंत्र पर हुए हमले के बाद माहौल और बिगड़ गया है. हमले की जिम्मेदारी ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने ली थी. हालांकि अमेरिका और सऊदी अरब ने इस हमले के पीछे ईरान का हाथ बताया है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक ईरान अब अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई का मन बना रहा है.
तेहरान में बदला लेने की बातकहा जा रहा है कि इस घटना के करीब चार महीने बाद ईरान के सुरक्षा अधिकारी तेहरान में जमा हुए. यहां इन सबने अमेरिका को 'सबक सिखाने' पर चर्चा की. अमेरिका के खिलाफ नाराज़गी दो चीज़ों को लेकर है पहला न्यूक्लियर ट्रीटी खत्म करना और दूसरा ईरान पर भारी-भरकम पाबंदी लगाना. बता दें कि अमेरिका के इशारों पर दूसरे देशों ने ईरान से तेल खरीद में भारी कटौती कर दी है.
'उठा लो तलवार'
ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख मेजर जनरल हौसियन सलामी ने इशारा किया है कि अब अमेरिका से बदला लिया जाए. उन्होंन कहा, 'वक्त आ गया है कि हम अपनी तलवारें निकाल लें और उन्हें सबक सिखाया जाए.'
निशाने पर सैनिक ठिकानेमीटिंग में अमेरिका के बड़े टारगेट को निशाना बनाने की बात कही गई है, जिसमें अमेरिका की मिलिट्री बेस भी शामिल है. ये मिलिट्री बेस साऊदी अरब में हैं.
दरअसल कुछ अधिकारी अमेरिका पर सीधे हमले के पक्ष में नहीं हैं. उन्हें इस बात का डर लग रहा है कि अमेरिका कहीं खतरनाक तरीके से बदले की कार्रवाई न कर दे. लिहाजा इस साल मई में ईरान के सैन्य अधिकारियों ने तेल संयंत्र पर हमले की योजना बनाई और इसे चार महीने के अंदर ही अंजाम दिया गया. वहीं रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान एक बार फिर इसी तरह सऊदी अरब में अमेरिकी ठिकानों पर हमले की प्लानिंग कर रहा है.
हमले में ईरानी नेताओं का हाथसमाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया कि तेल संयंत्र पर हुए हमले में ईरान के कई नेताओं का भी हाथ था. इनके मुताबिक ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली ख़ामेनई ने इस हमले की इजाजत दी थी. साथ उन्होंने कहा था कि हमले में किसी अमेरिकी या आम नागरिक की मौत नहीं होनी चाहिए. हालांकि ईरान ने इन हमलों से साफ-साफ इनकार किया है.

अरब देशों ने सैंकड़ों पाकिस्‍तानी डॉक्‍टरों की डिग्री मानी अमान्‍य, कहा- जल्‍द देश छोड़ दें

अरब देशों ने सैंकड़ों पाकिस्‍तानी डॉक्‍टरों की डिग्री मानी अमान्‍य, कहा- जल्‍द देश छोड़ दें, वरना...
आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जब से इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं, लगता है सिर मुंडाते ओले पड़ने लगे। कर्ज में डूबी सरकार मिली, भारत से आतंकवाद की आड़ में छद्दम युद्ध करने वाली नीति ने विश्व में अलग-थलग कर दिया, भारत की तरफ से कभी सर्जिकल तो कभी एयर स्ट्राइक ने नाम में दम ही किया था कि अब तक कश्मीर के नाम से वहां के अवाम को गुमराह कर राज करने वालों को अगस्त 5 और 6 को भारतीय संसद के दोनों सदनों ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर बेचैन ही किया था। पाकिस्तान अभी इस जख्म से उभर भी नहीं पाया था कि अरब देशों ने ऐसी चोट मारी, जिसने पाकिस्तान डॉक्टरों के लिए संकट उत्पन्न कर दिया। अरब देशों ने जो पाकिस्तानी डॉक्टरों पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, उसने विश्व के अन्य देशों में गए पाकिस्तानी डॉक्टरों पर सन्देह पैदा करवा दिया है। अरब देशों ने पाकिस्तानी डॉक्टरों की फर्जी डिग्रियाँ होने के कारण तुरन्त देश छोड़ने का आदेश दे दिया है। यानि पाकिस्तान में फर्जी डिग्रियां भी मिलती हैं। दूसरे अर्थों में कहा जाए फर्जीवाड़ा। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो इमरान खान तो विश्व में पाकिस्तान की बेइज्जती कर रहे थे, जनता ने सोंचा हम भी क्यों पीछे रहे।


अरब देशों में काम कर रहे पाकिस्‍तानी डॉक्‍टरों के सामने एक अजब मुसीबत खड़ी हो गई है सऊदी अरब और कुछ अन्य अरब देशों ने पाकिस्तान के सदियों पुराने स्नातकोत्तर डिग्री कार्यक्रम- एमएस (मास्टर ऑफ सर्जरी) और एमडी (डॉक्टर ऑफ मेडिसिन) को अस्वीकार कर दिया है इस तरह उन्‍होंने इन डिग्री धारक डॉक्‍टरों को उच्चतम भुगतान की पात्रता सूची से हटा दिया है इस निर्णय ने कथित तौर पर पाकिस्‍तान के सैकड़ों उच्च योग्यता वाले डॉक्‍टरों की नौकरी पर संकट खड़ा कर दिया है इनमें से ज्‍यादातर सऊदी अरब में हैं, जिन्‍हें कह दिया गया है कि या तो वे खुद उनका देश छोड़ दें या फिर उन्‍हें निर्वासित कर दिया जाएगा
वहीं, भारत, मिस्‍त्र, सूडान और बांग्‍लादेश की डिग्रियों को वैधता प्रदान की है यानि इन देशों के डिग्रीधारक डॉक्‍टर वहां मेडिकल प्रैक्टिस जारी रख सकते हैं
पाकिस्तान के एमएस/एमडी की डिग्री को अस्वीकार करते हुए सऊदी स्वास्थ्य मंत्रालय ने दावा किया कि इसमें संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रम का अभाव है, जो महत्वपूर्ण पदों के लिए मेडिक्स को रखने के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। सऊदी सरकार के कदम के बाद, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने भी इसी तरह का कदम उठाया है
दरअसल, 2016 में सऊदी के स्वास्थ्य मंत्रालय की एक टीम ने अधिकतर प्रभावित डॉक्टरों को काम पर रखा था, जब उन्होंने ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित करने के बाद कराची, लाहौर और इस्लामाबाद में साक्षात्कार आयोजित किए थे

सऊदी अरब देने जा रहा है पाकिस्तान को 7,09,15,00,00,000 रु. का तोहफा

सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान (फाइल फोटो)
आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ रहे पाकिस्‍तान को जल्‍द खुशखबरी मिलने वाली है. खुशखबरी भी छोटी-मोटी नहीं, बल्कि बहुत बड़ी है, क्‍यों‍कि इससे उसकी खस्‍ता आर्थिक स्थिति पटरी पर आ सकती है. दरअसल, सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान पाकिस्‍तान के पहले दौरे पर जाने वाले हैं और इस दौरान वे पा‍किस्‍तान केे साथ 10 बिलियन डॉलर से ज्‍यादा यानि करीब 7,09,15,00,00,000 रुपये के तीन बड़े एमओयू पर साइन कर सकते हैं. 
पाकिस्‍तान का भरने वाला है खजाना, सऊदी अरब देने जा रहा है 7,09,15,00,00,000 रु. का तोहफापाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के न्‍योते पर प्रिंस सलमान संभवत: 16 फरवरी को पाकिस्‍तान आ सकते हैं, जोकि यहां उनका पहला दौरा होगा. इस दौरे में वह तीन बड़े दोनों मुल्‍कों की सरकारों के बीच तीन बड़े समझौतों पर हस्‍ताक्षर करेंगे. यह जानकारी बोर्ड ऑफ इंवेस्‍टमेंट (BoI) के चेयरमैन हारुन शरीफ ने दी. यह समझौते ऑयल रिफाइनिंग, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) और मिनरल डेवलमपेंट के क्षेत्र में होंगे. 
इन समझौतों के अलावा पाकिस्‍तान और सऊदी अरब के बीच कई व्‍यापारिक समझौते भी हो सकते हैं, क्‍योंकि सऊदी के 40 टॉप बिजनेसमैन एक समूह भी प्रिंस के साथ पाकिस्‍तान आ रहा है. यह प्रतिनिधिमंडल स्‍थानीय व्‍यापारियों से मुलाकात भी करेगा. उम्मीद है कि यात्रा के दौरान कुछ अन्य निजी स्तर के समझौते भी हो सकते हैं. 
तेल रिफाइनरी के बारे में बात करते हुए शरीफ ने बताया कि 'सऊदी अरब 8 बिलियन डॉलर की लागत से ग्वादर में तेल रिफाइनरी भी लगाएगा. विदेशी निवेश के इतर वह स्‍थानीय लोगों को भी रोजगार के अवसर प्रदान करेगा. यदि वे (सउदी) रिफाइनरी के साथ एक पेट्रोकेमिकल परिसर भी स्थापित करते हैं, तो इसके लिए अरबों डॉलर के अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होगी'.
BoI प्रमुख ने कहा कि सऊदी सरकार ग्वादर में एक तेल रिफाइनरी स्थापित करने के लिए उत्सुक थी और उसने इस संबंध में व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने का आग्रह किया था.
सऊदी अरब के ग्‍वादर में निवेश से चीन की प्रतिक्रिया को लेकर शरीफ ने कहा कि चीन को वहां तेल रिफाइनरी लगाए जाने से कोई आपत्ति नहीं है. उन्‍होंने बताया कि “वास्तव में जिस क्षेत्र में सउदी रिफाइनरी स्थापित करेगा, वह एक अध्ययन के बाद तय की जाएगी. हालांकि यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से बहुत दूर होगा.