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महाराष्ट्र : कांग्रेस समर्पित महाराष्ट्र सरकार ने दिघी पोर्ट अडानी को सौंप दिया : ₹10000 करोड़ का निवेश कर गेटवे तैयार करेगी कंपनी

अडानी पोर्ट्स-सीएम उद्धव ठाकरे

दिन-रात नरेंद्र मोदी पर अम्बानी और अडानी के हाथ सब कुछ बेचने का आरोप लगाने वाले राहुल गाँधी, अरविन्द केजरीवाल और इनकी मण्डली कांग्रेस समर्थित महाराष्ट्र सरकार द्वारा दिघी पोर्ट अडानी के हाथों बेचने पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? यानि तुम क़त्ल भी करो, चर्चा नहीं होती, हम आह भी भरते हैं अफ़साने बन जाते हैं। राहुल गाँधी और इनकी मण्डली क्यों नहीं करते विरोध? अम्बानी हो या अडानी पूंजीपति भी कांग्रेस के ही कालखंड में बने थे।   

अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड (APSEZ) ने सोमवार (फरवरी 15 , 2021) को 705 करोड़ रुपए में दिवालिया (बैंकरप्ट) प्रक्रिया से गुजर चुकी Dighi Port Limited (DPL- दिघी पोर्ट लिमिटेड) का अधिग्रहण कर लिया है। दिघी पोर्ट को अप्रैल में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा दिवालिया घोषित किया गया था। यह महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के राजपुरी क्रीक के किनारे स्थित है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, APSEZ ने बताया कि वह इसे JNPT (Jawaharlal Nehru Port Trust) के वैकल्पिक गेटवे के तौर पर विकसित करने के लिए 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश करेगी। JNPT भारत का सबसे बड़ा कंटेनर पोर्ट है और देश के 12 बड़े बंदरगाहों में से एक भी।

दिघी पोर्ट के 100% स्टेक अडानी पोर्ट्स के पास होने के बाद कंपनी (APSEZ) के सीईओ करन अडानी ने कहा कि दिघी पोर्ट लिमिटेड (DPL) के सफल अधिग्रहण ने अडानी पोर्ट के बंदरगाहों को बनाने के लक्ष्य में एक अन्य कीर्तिमान जोड़ा है, जिससे भारत के पूरे आर्थिक क्षेत्र में सर्विस कवरेज बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि कंपनी के ग्रोथ पर फोकस, अनुभव और अधिग्रहण करने की निपुणता के साथ, उन्हें DPL को शेयरधारकों के लिए बेहतर वैल्यू वाला बनाने का विश्वास है।

इस अधिग्रहण के बाद उद्योगपति गौतम अडानी के नेतृत्व वाला APSEZ, महाराष्ट्र में ग्राहकों को अपनी सेवा दे सकेगा, जिसके अंतर्गत बड़े औद्योगिक क्षेत्र, मुंबई और पुणे क्षेत्रों का विकास शामिल है। कंपनी मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत और मरम्मत करेगी और ड्राई, कंटेनर और लिक्विड कार्गो के लिए सुविधाओं के विकास में निवेश करेगी।

दिघी पोर्ट के विकास से विभिन्न उद्योगों जैसे- उपभोक्ता उपकरण, धातु, ऊर्जा, पेट्रोकेमिकल्स, और रसायन व्यवसाय महाराष्ट्र में निवेश को बढ़ावा मिलेगा और महाराष्ट्र में औद्योगिक विकास को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। दिघी पोर्ट को मूल रूप से मुंबई के उद्योगपति विजय कलंतरी द्वारा विकसित किया गया था।

रेजोल्यूशन प्लान की शर्तों के अनुसार, राज्य बंदरगाह नियामक ‘महाराष्ट्र मेरिटाइम बोर्ड’ (MMB) और APSEZ से कंसेशन राइट्स के ट्रांसफर को भी मंजूरी मिल गई है, जिसने फाइनेंशियल क्रेडिटर्स, MMB के बकाया और दूसरे लागत और क्लेम का सेटलमेंट कर दिया है।

कृषि कानून : रुबिका लियाकत ने आपिये संजय सिंह को धो दिया


                                      कृषि कानून पर रुबिका लियाकत के सवालों में फंसे AAP नेता संजय सिंह
कृषि कानून को लेकर समस्त मोदी विरोधी अपने ही बुने जाल में फंस कर सांप और छछूंदर वाली स्थिति में हैं। किसी भी पार्टी का घोषणा-पत्र देख को, सब ने इन्हीं सब बातों को लागु करने की बात करते आ रहे हैं, फिर विरोध क्यों? विरोध केवल इसलिए हो रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने लॉलीपॉप देने की बजाए कानून ही बना कर किसानों की समस्त अड़चनों को दूर करने से इन सबको परेशानी हो गयी। जबकि मोदी विरोधी केवल लॉलीपॉप देकर किसानों को बेवकूफ बनाते रहे। 2014 में सरकार बनने के बाद से मोदी सरकार ने जितने भी बिल पारित किये या फिर कानून बनाए, सभी मुद्दे सभी पार्टियों के घोषणा-पत्रों में होने के बावजूद आढ़तियों के दबाव में किसी ने कोई प्रयास नहीं किया गया। 
अभी बिहार में हुए चुनावों से आप क्यों दूर रही? इतना ही नहीं मुस्लिमों का दम भरने वाली यही आप अपने उम्मीदवारों को आज़ाद उम्मीदवार क्यों उतारा? कारण स्पष्ट है, क्योकि इस पार्टी ने दिल्ली की जो हालत है, फिर कोरोना में रोहिंग्यों को बचाने प्रवासी मजदूरों को दिल्ली छोड़ने को मजबूर करने के कारण चुनावों से दूर रखा और अब उत्तर प्रदेश से विधान सभा के सभी सीटों पर लड़ने की कवायत शुरू कर दी है, जहाँ पहले भी जमानत जब्त होती रही है और फिर जब्त होगी। वैसे जमानत जब्त होने में आम आदमी पार्टी का कोई सानी नहीं। दिल्ली और पंजाब के अलावा किसी राज्य में इस पार्टी को शायद ही कोई उम्मीदवार जमानत जब्त न करवा पाया हो, अन्यथा सभी की बुरी तरह से जमानत जब्त होती है। 

नए कृषि कानून को लेकर एक ओर जहाँ किसान धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर, समाचार चैनलों पर भी इस विषय को लेकर बहस का माहौल बना हुआ है। विपक्षी राजनीतिक दल भी इसे केंद्र सरकार पर हमलावर होने का एक और बहाना बनाकर भुनाने का प्रयास कर रहे हैं।

इसी क्रम में समाचार चैनल एबीपी न्यूज़ पर दिसंबर 18, 2020 शाम पाँच बजे कृषि कानूनों को लेकर चल रही बहस में आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और न्यूज़ चैनल की पत्रकार रुबिका लियाकत के बीच बहस तनातनी में बदल गई। बहस के बीच संजय सिंह का चेहरा तब देखने लायक हो गया जब टीवी एंकर ने साक्ष्य पेश कर बता दिया कि AAP नेता किसकी गोद में बैठे हैं।

दिसंबर 18 के इस शो का शीर्षक था- “मोदी के किसान सम्मेलन से दूर होगा ‘कन्फ्यूजन’?” बहस के दौरान रुबिका लियाकत ने AAP नेता संजय सिंह को जमकर लताड़ लगा दी और ऐसा सवाल पूछ लिया जिसका संजय सिंह के पास कोई जवाब नहीं था।

ट्विटर पर मिहिर झा ने इस शो की एक क्लिप ट्वीट करते हुए लिखा है, “ये आपिया @SanjayAzadSln उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी से लड़ने की बात करता है; इसे तो महिला पत्रकार @RubikaLiyaquat ने ही पटक पटक के धो दिया।”

दरअसल न्यूज़ चैनल की एंकर रुबिका लियाकत ने कृषि कानूनों को काला कानून बता रहे AAP नेता संजय सिंह से पूछा कि जब कृषि कानून किसान विरोधी है तो फिर दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में नवंबर 23, 2020 को नोटिफाई कर लागू क्यों किया? ये सवाल सुनते ही AAP नेता संजय सिंह बौखला गए और टीवी एंकर को जवाब देने के बजाय आक्रामक हो गए और उल्टा सवाल पूछने लगे कि क्या आप मोदी की पैरवी में बैठी हैं?

रुबिका लियाकत ने फिरसे सवाल किया कि अगर यह काला कानून था तो फिर आखिर आम आदमी पार्टी ने इसे नोटिफाई क्यों किया? इस पर संजय सिंह टीवी एंकर को धमकाते हुए मोदी और अडानी तक का नाम बहस के बीच लेने लगे और ABP न्यूज़ चैनल को बिकाऊ कहने लगे।

संजय सिंह ने रुबिका लियाकत पर आरोप लगाया कि वो मोदी के लिए काम कर रही हैं, मोदी का चैनल चला रही हैं और अडानी के साथ मिली हुई हैं। यही नहीं, AAP नेता ने यहाँ तक कह दिया कि वो अडानी के गुलामों के पक्ष में बोल रही हैं। इस पर रुबिका ने कहा कि इससे उन्हें क्यों परेशानी हो रही है?

इतना सुनने के बाद रुबिका लियाकत ने भी संजय सिंह के ही अंदाज में उन्हें जवाब देते हुए कहा कि खबरदार अगर मेरे चैनल को बिका हुआ कहा। रुबिका लियाकत ने कहा, “आप मेरे चैनल पर आए हैं और इज्जत के साथ अपनी बात को रखिए। यहाँ पर बैठकर मुझे ज्ञान मत दीजिए। आप जिनकी गुलामी कर रहे हैं उनकी बात करिए, मैं देश की गुलामी कर रही हूँ, हिंदुस्तान की गुलामी कर रही हूँ।”

इसके बाद रुबिका लियाकत ने अपने मोबाइल स्क्रीन पर आम आदमी पार्टी का पोस्टर दिखते हुए कहा कि इसे देखिए। आम आदमी पार्टी के ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट की गई इस पोस्टर में अरविन्द केजरीवाल की तस्वीर लगी नजर आ रही है और इस पर लिखा था, “पंजाब AAP दे नाल। कृषि क्षेत्र को प्रभावी बनाने के लिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट।” दरअसल, यह पोस्टर वर्ष 2016 में आम आदमी पार्टी द्वारा शेयर किया गया था।

रुबिका लियाकत ने हमलावर होते हुए कहा, “अडानी की वकालत कौन कर रहा था? क्या आम आदमी पार्टी रुबिका लियाकत है? किसकी गोद में बैठ गए आप? किसकी गुलामी करने लगे आप?”

ABP न्यूज़ की एंकर ने कटाक्ष करते हुए संजय सिंह से ही सवाल किया कि ये क्या लिखा हुआ है? उन्होंने AAP नेता से कहा कि अगर गलत किया है तो बताना चाहिए कि झूठ बोलना तो आपकी आदत है।

सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असली रंग में आने लगा है। देशद्रोही नारे लगाने के कारण गिरफ्तार हुए शरजील इमाम के पकड़े जाने के ठीक एक दिन बाद ही सोशल मीडिया पर एक नया वीडियो शेयर होते देखा जा रहा है। इस वीडियो में CAA के विरोध प्रदर्शन के लिए जमा भीड़ को एक वकील द्वारा विशेष ब्रांड और कम्पनी के आर्थिक बहिष्कार की सलाह देते हुए देखा जा सकता है।
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 CAA विरोध के नाम पर आर्थिक जिहाद की माँग
CAA विरोधी मुसलमानों को स्वामी रामदेव, रिलायंस,अम्बानी और अडानी के उत्पादों के बहिष्कार करने के लिए बोल सकते हैं, लेकिन आज तक किसी में चीनी उत्पादों के बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं हुई, जहाँ पर अब नए कुरान लिखे जाने की कवायद शुरू होने के अलावा इस्लाम पर इतनी पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं, जिसका समय-समय पर अपने ब्लॉग में उल्लेख भी करता रहा हूँ। यदि इसका एक प्रतिशत भी भारत में हो रहा होता, CAA से कहीं अधिक चीख-पुकार हो रही होने के साथ-साथ सारे मानवाधिकार वाले भी शोर मचा रहे होते। लेकिन चीन में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर सब खामोश हैं, क्यों? इस बात को विश्व भी जनता है कि मुसलमान जितना सुरक्षित भारत में है, कहीं और नहीं। 

टाइम्स एक्सप्रेस द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो को बीजेपी नेता संबित पात्रा ने भी अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया है।

टाइम्स एक्सप्रेस के अनुसार, यह वीडियो उस वक़्त बनाया गया है जब वकील भानु प्रताप सिंह ने CAA पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद दिल्ली के मुस्तफाबाद में धरने पर बैठी जनता को संबोधित कर रहे थे।
इस वीडियो में वकील भानु प्रताप भीड़ को सम्बोधित करते हुए कह रहे हैं- “खुद को हिंदुस्तानी कहना बंद करो, हम भारतीय हैं। इस सरकार की सबसे बड़ी ताकत मीडिया है। वो मीडिया आज की तारीख में अम्बानी ने खरीद लिए हैं। ये अम्बानी ही आरएसएस और भाजपा की पैसे की तिजोरी हैं। बताओ हम टीवी देखकर किसे पैसा दे रहे हैं? अम्बानी को दे रहे हैं या नहीं? हम इनकी रीढ़ की हड्डी तोड़ देंगे। क्या ये सीरियल और पिक्चर हमारे आंदोलन से बढ़कर हैं? हम अपना पैसा दुश्मन को क्यों दें? हम अपना एक भी पैसा रिलायंस को नहीं देंगे। हम इस रिलायंस की कमर तोड़ देंगे।”
“….रवीश जी ने कहा था टीवी मत देख, हम नहीं माने। लेकिन अब तो मानो, सरकार हमें दफन करना चाहती है, मारना चाहती है। सरकार के पास पैसा, पुलिस, फ़ौज और अदालतें भी हैं। हमारे पास कुछ भी नहीं है, ना सरकार, ना फ़ौज, ना पुलिस। हमारे पास बस हमारी एकता और बुद्धि है। इसी बुद्धि का इस्तेमाल कर के आज यहाँ सब लोग निर्णय करो, हम आज से टीवी पर ताला लगा देंगे, टीवी नहीं देखेंगे। रिलायंस के जितने भी… जिओ के मोबाइल हैं, सब चेंज करो, एयरटेल के लो, चाहे आईडिया के लो, चाहे वोडाफोन के खरीदो, जिसके लो लेकिन रिलायंस की कमर तोड़नी है चाहे जो हो जाए। इसके अलावा रिलायंस का पेट्रोल पम्प, जितने भी उत्पादन हैं, कोई भी रिलायंस का उत्पादन, सबका बहिष्कार करो।”
“….इसके साथ-साथ इस रामदेव के जितने भी उत्पादन हैं सब कचरा हैं। सब गाय और गोबर ही तो खिला रहा है वो। इसको बंद करो। रामदेव का सब पैसा हमारे खिलाफ जाता है। हमारा ही पैसा, अधिकतर पैसा आरएसएस के लिए हथियार खरीदने के काम आ रहा है। हम इन दुश्मनों की कमर और रीढ़ की हड्डी तोड़ देंगे। जिसकी रीढ़ टूट जाती है, कभी सीधा खड़ा नहीं हो पाता है। ये काम हमें करना है, ये काम हम ही कर सकते हैं, कोई दूसरा नहीं करेगा।”
वकील भानू प्रताप आगे कहते हैं- “अपने दोस्त, रिश्तेदारों को समझाओ, हम लड़ाई के मैदान में हैं, हम पिकनिक नहीं कर रहे, हम सैर मनाने नहीं आए हैं, लड़ाई की रणनीति हमें अपनानी पड़ेगी और उसका इस्तेमाल करना होगा। अब बस एक जरुरी बात बताना चाहूँगा, साथियों हम सबको सबसे ज्यादा दिक्क्त पुलिस से होती है। क्योंकि कानून हमें मालूम नहीं है और हमारी अज्ञानता का वो फायदा उठाते हैं। ना हम अखिलेश यादव के भरोसे हैं, ना उस दिल्ली के मुख्य्मंत्री केजरीवाल के भरोसे हैं, जो इस आंदोलन में अभी तक एक बार भी नहीं आया।”

इस्लाम की हुकूमत लाने के लिए कैसे करना है बेवक़ूफ़ हिन्दुओ का इस्तेमाल

कुछ दिनों पहले तक कई खबरें आये दिन आती थी जिसमे मुस्लिम कट्टरपंथी कहते थे की हम वन्दे मातरम नहीं कहेंगे, और कई घटनाओं में तो जन गन मन का भी विरोध किया गया, पर इन दिनों देश भर में यही तत्व तिरंगा लेकर चल रहे है और राष्ट्रगान गा रहे है
असल में ये एक सोची समझी चाल है और इस बात को खुद मुस्लिम पत्रकार अरफा खानुम ने स्वीकार किया है, जहाँ सभी धर्म के लोग होते है वहां पर सेकुलरिज्म, देशभक्ति की बात करो, पर जहाँ पर सभी मुसलमान हो वहां पर इस्लामिक हुकूमत की बात करो
अरफा खानुम का विडियो सामने आया है जिसमे वो मुसलमानों की भीड़ के आगे बोल रही है और बता रही है की कुछ समय के लिए हमे भारत के प्रति वफादारी दिखानी है, हमे तिरंगा लहराना है, राष्ट्रगान भी गाना है पर ये चीज सिर्फ तब तक जब तक हम इस्लामिक सोसाइटी यानि भारत में इस्लाम की हुकूमत न ले आये
अरफा खानुम मुसलमानों की भीड़ को बताती है की अभी हम अल्पसंख्यक है अभी संख्या उतनी नहीं हैइसलिए अभी अल तकिया यानि छल छलावा करना होगा और सेक्युलर यानि बेवक़ूफ़ हिन्दुओ का अभी इस्तेमाल करना होगा, इसके लिए हमे तिरंगा लहराना पड़े तो लहराना होगा, राष्ट्रगान गाना पड़े तो गाना होगा

अरफा बताती है की भले हम कुछ समय के लिए सेकुलरिज्म को अपना लेते है पर हम कभी अपनी असल विचारधारा (गजवा हिन्द) को नहीं छोड़ेंगे और ये सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक के लिए है जब तक हम इस्लामिक सोसाइटी यानि भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते
अरफा खानुम किस प्रकार प्लान बता रही है वो आपको गौर से सुनना चाहिए, इन दिनों कट्टरपंथी तत्व जो तिरंगा लहरा रहे है, राष्ट्रगान गा रहे है वो इनकी स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, सुनिए क्या कहती है अरफा
इस देश में काफी सारे सेक्युलर हिन्दू अरफा खानुम और इनके जैसे लोगों का मोदी विरोध में जमकर साथ दे रहे है, अरफा खानुम इन सेकुलरों के सामने तो भाईचारे, दलित, आदिवासी की बात करती है, पर मुस्लिम भीड़ के आगे वो पूरी प्लानिंग समझाती है
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चीन के शिनजिंग प्रांत में उइगर मुसलमानों की भाँति ही हजारों की संख्या में कजाकिस्तान के मुस्लिमों को भी बंदी बनाक....
अरफ़ा की इस बात से देश समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों को अपनी आंखें खोलने चाहिए, जो सेकुलरिज्म का हर वक़्त राग अलापते रहते हैं। वास्तव में हिन्दुओं का छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा मूर्ख ही बनाया जा रहा, बल्कि ये लोग स्वयं गजवा हिन्द बनाने में इन कट्टरपंथी स्लीपर सैल्स की मदद कर, भारत को पुनः गुलाम बनाने की ओर धकेल रहे हैं, जो अरफ़ा के बयानों से स्पष्ट झलक रहा है।  (एजेंसीज इनपुट्स सहित)  

झारखंड सरकार का अडानी प्रेम : बदल गयी नीति और नियम

अडानी पावर लिमिटेड ने 26 अक्टूबर 2015 को प्रस्ताव देकर 800 मेगावाट की दो यूनिट पावर प्लांट झारखंड में लगाने की इच्छा जाहिर की. इसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा के दौरान करार हुआ था कि उसे 1600 मेगावाट बिजली दी जाएगी. उस करार के आलोक में अडानी समूह ने पहली बार ऊर्जा नीति में छूट की मांग की और कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत, यानि 400 मेगावाट बिजली राज्य को दूसरे स्रोत से देने की बात कही, क्योंकि बांग्लादेश के साथ हुए एमओयू के अनुसार, पूरी बिजली उसे ही दी जानी है. राज्य सरकार ने अडानी के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए 17 फरवरी, 2016 को एमओयू स्टेज किया.
इसमें उसे प्रस्तावित प्लांट के बदले किसी दूसरे प्लांट से 25 फीसदी बिजली राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा निर्धारित दर पर राज्य को देने का प्रावधान कर दिया गया. लेकिन राज्य विद्युत नियामक आयोग ने स्टेज-1 में किए गए इस प्रावधान पर आपत्ति जताई और कहा कि ऊर्जा नीति 2012 में 25 प्रतिशत बिजली में से 13 प्रतिशत फिक्स्ड कॉस्ट एवं वैरिएबल कॉस्ट एवं 12 प्रतिशत बिजली वैरिएबल कॉस्ट पर लेने का प्रावधान है.
अन्य बिजली उत्पादन संस्थानों जैसे आधुनिक पावर लिमिटेड, इनलैंड पावर लिमिटेड के साथ इसी प्रावधान के अनुसार एमओयू हुआ है. सभी एमओयू में समानता होनी चाहिए. लेकिन राज्य सरकार ने आयोग की बातों को दरकिनार करने के लिए पूरी नीति में ही संशोधन कर दिया. न सिर्फ ऊर्जा नीति बदली गई, बल्कि भूमि अधिग्रहण कानून में भी संशोधन हुआ. इसके अलावा पावर प्लांट को पानी उपलब्ध कराने के लिए गंगा की जलधारा से भी खिलवाड़ करने की अनुमति दे दी गई.
सीएम ने सचिव की भी नहीं सुनी
इस प्रस्तावित पावर प्लांट को लेकर मई, 2016 में सरकार के भीतर भी विवाद हुआ था. पावर प्लांट के लिए पानी की स्वीकृति मिलने के बाद कंपनी ने सेंकेंड स्टेज एमओयू का प्रस्ताव सरकार को दिया था और पर्यावरण सेस और राज्य को सस्ती बिजली देने की शर्त से छूट मांग रहा था. ऊर्जा विभाग इस पर सहमत नहीं था. विभाग का कहना था कि लीक से हटकर अडानी ग्रुप को यह छूट दी गई, तो राज्य को आने वाले दिनों में हर साल लगभग 2000 करोड़ रुपए राजस्व का नुकसान होगा.
जब सरकार के भीतर इस मामले को लेकर विवाद बढ़ा, तब तत्कालीन ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव एस.के.जी. रहाटे लंबी अवकाश पर चले गए. अवकाश पर जाने से पूर्व उन्होंने अडानी ग्रुप की पेशकश पर गंभीर आपत्ति जताते हुए मुख्यमंत्री को इस मामले में एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया. उन्होंने लिखा था कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली हाईपावर कमेटी ही निर्णय ले कि ऊर्जा विभाग द्वारा तैयार एमओयू ऊर्जा नीति के तर्ज पर है या नहीं और इस नीति में संशोधन करने की आवश्यकता है.
बाद में विवाद बढ़ता देख मुख्यमंत्री सचिवालय में 16 अगस्त 2016 को खान, ऊर्जा एवं उद्योग विभाग के वरीय अधिकारियों की बैठक हुई, जिसमें निर्णय लिया गया कि झारखंड में जो 1600 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा, वो बिजली बांग्लादेश को भेजी जायेगी और अडानी दूसरे स्रोतों से 25 प्रतिशत बिजली की आपूर्ति झारखंड सरकार को करेगा. दरअसल, केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने 2014 में बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति करने के लिए बांग्लादेश के साथ एक समझौता किया था. इसके तहत ही अडानी ग्रुप को संथाल परगना में 800 मेगावाट क्षमता का दो पावर प्लांट लगाने का काम मिला.
महालेखाकार की आपत्ति
राज्य सरकार ने 19 सितम्बर, 2016 को मंत्रिमंडल की बैठक में ऊर्जा नीति में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दिलायी थी. संशोधन के मुताबिक राज्य को उपलब्ध करायी जाने वाली 25 फीसदी बिजली की दर कई खंडों में बंटी होगी. 12 प्रतिशत बिजली राज्य सरकार वेरिएबल कॉस्ट और 13 प्रतिशत बिजली स्थिर कॉस्ट पर खरीदेगी, यह तब होगा, जब राज्य में अडानी को कोयले का लिंकेज मिल जाएगा. अगर अडानी समूह को कोयला ब्लॉक झारखंड में नहीं मिलता है, तो यह पूरे 25 प्रतिशत बिजली की आपूर्ति राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा निर्धारित दर से ही करेगा. इस नीति में ही संशोधन कर राज्य सरकार ने अडानी को भारी फायदा पहुंचा दिया. इससे सरकार को प्रतिवर्ष 294 करोड़ का नुकसान होगा, जो 25 वर्षों में 74 सौ करोड़ रुपए हो जाएगा.
महालेखाकार ने भी इस पर आपत्ति दर्ज कराई है और कहा है कि यह अडानी पावर को तरजीह देने वाली कार्यवाही है. उसने जब इस मामले में राज्य सरकार का पक्ष जानना चाहा, तो कहा गया कि अडानी के साथ हुए एमओयू से सरकार को कोई नुकसान नहीं होगा, जबकि यह स्पष्ट है कि अडानी के साथ हुआ करार पूरी तरह से सरकार के राजस्व पर असर डालेगा. महालेखाकार ने पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि नीतियों में सेशाधन ही इसीलिए हुआ, ताकि अडानी को विवादों में न पड़ना पड़े.
अवधि विस्तार की अनुमति
अडानी ग्रुप को फायदा पहुंचाने के झारखंड सरकार के इन प्रयासों के सार्वजनिक होने के बाद अब यह चर्चा होने लगी है कि मोमेंटम झारखंड का आयोजन ही अडानी को झारखंड लाने के लिए हुआ था. उस अयोजन में देशी-विदेशी निवेशकों के साथ एक लाख हजार करोड़ के एमओयू तो हुए थे, पर अभी तक एक भी उद्योग की स्थापना झारखंड में नहीं हो सकी है. उसी मोमेंटम झारखंड में पावर प्लांट की स्थापना के लिए राज्य सरकार ने अडानी ग्रुप के साथ एमओयू किया था. अडानी पावर गोड्‌डा में 1600 मेगावाट का पावर प्लांट स्थापित करना चाहता था और इसके लिए उसे 950 एकड़ जमीन की जरूरत थी, साथ ही रिजवॉयर बनाने के लिए साहेबगंज में 130 एकड़ जमीन चाहिए थी.
अडानी को जमीन उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में ही संशोधन कर दिया और उसे कौड़ियों के भाव जमीन मुहैया कराई गई. बाद में जब गोड्‌डा के उपायुक्त ने ही इस दर का विरोध करते हुए राजस्व पर्षद को पत्र लिखा, तो प्रति एकड़ भूमि अधिग्रहण का दर बढ़ाया गया. अडानी के लिए सरकार द्वारा 500 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है. शेष जमीन के लिए गोड्‌डा एवं साहेबगंज के उपायुक्त को पत्र लिखा गया है कि इस पावर प्लांट के लिए जल्द से जल्द भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही कंपनी के साथ मिलकर पूरी की जाय. इस पावर प्लांट के लिए साहेबगंज के रिजवॉयर में गंगा नदी से पानी लाया जाएगा.
फिर इस रिजवॉयर से गंगा के पानी की आपूर्ति पावर प्लांट को किया जाएगा. एक तरफ जहां गंगा की अविरल एवं निर्मल धारा बनाए रखने के लिए कई संगठन आंदोलनरत हैं, वहीं रघुवर सरकार गंगा से लाखों गैलन पानी अडानी को देने पर सहमत हो गई है. गौर करने वाली बात यह भी है कि अडानी के एमओयू की अवधि समाप्त होने के बाद इसे लेकर मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें इस कंपनी को दो वर्षों का अवधि विस्तार दे दिया गया.
संभवत: अडानी को ही फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने मार्च 2015 में सभी कैप्टिव कोल ब्लॉक के आवंटन को रद्द कर दिया था. अडानी पावर ने एमओयू स्टेज-1 में कोयले का मुद्दा नहीं उठाया था. इस तर्क के आधार पर भी अडानी ने राज्य सरकार से लाभ लिया कि उसे दूसरे राज्यों से कोयले की आपूर्ति लेनी है. अडानी को लाभ पहुंचाने के बाद अब राज्य सरकार दूसरी ऊर्जा नीति इस वर्ष लाई है. इस ऊर्जा नीति में कई प्रावधान किए गए हैं.
इसके तहत किसी भी निजी एवं स्वतंत्र कंपनी को झारखंड में पावर प्लांट लगाने के बाद कुल बिजली उत्पादन का 35 प्रतिशत राज्य सरकार को देना होगा और इसके लिए बिजली की दर विद्युत नियामक आयोग द्वारा तय की जाएगी. इस ऊर्जा नीति में इस बात का ध्यान रखा गया है कि राज्य के औद्योगिक एवं कोल एरिया में कोल वेस्ट से अधिक से अधिक बिजली का उत्पादन किया जाय.
विपक्षी विरोध की आवाज़ दबाने की कोशिश
झारखंड विकास मोर्चा के विधायक प्रदीप यादव ने जब अडानी समूह के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण का विरोध किया, तो सरकार ने पहले तो प्रदीप उन्हें इस तरह का विरोध नहीं करने को कहा, पर जब झाविमो विधायक ने सरकार की बात नहीं मानी तो उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. बाद में उच्च न्यायालय से उन्हें राहत मिली.
एक तरह से कहा जाय, तो भाजपा सरकार अडानी के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है. लेकिन विपक्षी दल भी एकजुट हेकर इसका विरोध कर रहे हैं. गोड्‌डा में पावर प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण के विरोध में विपक्षी दल एकजुट हैं. इसे लेकर कई बार जिला बंद तो कई बार पूरे प्रमंडल में ही बंद का आह्‌वान किया गया है. मुख्य विपक्षी दल झामुमो का आरोप है कि सरकार विकास के नाम पर जमीन लूट के लिए कहानी गढ़ रही है.
पार्टी ने आरोप लगाया है कि गोड्‌डा में अडानी कंपनी और केंद्र सरकार के दबाव में रैयतों से जबरन जमीन ली जा रही है. इससे यहां के रैयतों में आक्रोश है. झामुमो के महासचिव सुप्रीयो भट्‌टाचार्य ने कहा कि हमारी पार्टी इस तरह के जमीन अधिग्रहण के विरोध में है. पार्टी इसके खिलाफ सड़क पर उतरेगी और जरूरत पड़ी तो इसके खिलाफ उग्र आंदोलन चलाया जाएगा.
पूर्व मुख्यमंत्री एवं प्रतिपक्ष के नेता हेमंत सोरेन ने राज्य सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि भाजपा सरकार उद्योगपतियों द्वारा बनाई गई सरकार है और औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए गरीब लोगों की जमीन का जबरन अधिग्रहण कर रही है. इससे लोग भूमिहीन हो रहे हैं और रोजी-रोटी की तलाश में उन्हें दूसरे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि गोड्‌डा में किसी भी हालत में रैयतों की जमीन नहीं लेने दी जाएगी, इसके लिए सड़क से लेकर सदन तक आंदोलन किया जाएगा. कांग्रेस द्वारा भी इस पावर प्लांट के विरोध में धरना एवं प्रदर्शन किया जा रहा है.