Showing posts with label ajmer. Show all posts
Showing posts with label ajmer. Show all posts

दिल्ली : निजामुद्दीन की दरगाह पर आने वाले हिंदू 60% तक हुए कम

दरगाह पर आने वाले हिंदू सालभर में 60 फीसदी कम
नूपुर शर्मा द्वारा इस्लामिक किताब का हवाला देने से उपजे विवाद में कन्हैया लाल की हत्या ने हिन्दुओं में जागृति का जो काम किया है, वह मुस्लिम कट्टरपंथियों और छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता एवं पार्टियों के लिए बहुत खतरनाक होने जा रहा है। हिन्दुओं का सिर्फ अजमेर दरगाह पर जाना कम नहीं हुआ, यह सभी जगह शुरुआत हो चुकी है। दूसरे, चर्चाओं में एक बात जरूर निकला कर आ रही है कि हिन्दुत्व को जितना अधिक नुकसान सूफिज्म ने किया है, उतना किसी अन्य ने नहीं। 
यहाँ शाम होते ही हिंदू ही हिंदू दिखते थे। दो बजे से रात के 11 बजे तक हिंदू खूब आते थे। लेकिन अब कम आने लगे हैं। आप बाहर देखिए कोई नजर आ रहा है…
यह कहना है 
दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के दीवानअली मूसा निजामी का हैं। निजामी के अनुसार वे 84 साल के हैं और उन्होंने कई दौर देखे। पर ऐसा दौर नहीं देखा। उनके मुताबिक ये ‘नफरत’ अभी और बढ़ेगी। उनका दावा है कि इसी नफरत के प्रचार ने दरगाह पर आने वाले हिंदू कम कर दिए हैं।

निज़ामी के अनुसार निजामुद्दीन की दरगाह पर आने वाले हिंदुओं की संख्या में सालभर के भीतर करीब 60 फीसदी गिरावट आई है। वे बताते हैं कि पहले यहाँ खूब हिंदू आते थे। हर रोज। दोपहर के 2 बजे से रात के 11 बजे तक दरगाह पर आने वालों में खूब हिंदू होते थे। लेकिन अब इक्का-दुक्का हिंदू ही आते रहते हैं। उन्होंने बताया कि पहले यहाँ हिंदू भंडारे भी करते थे। करीब-करीब रोज। अन्न-पैसा बाँटते थे। लेकिन अब वैसी स्थिति नहीं रही।

निजामुद्दीन की गली से हिंदू गायब

निजामी जो बता रहे थे वह 17 जुलाई 2022 को जब ऑपइंडिया की टीम दरगाह पर गई तो दिख भी रहा था। मुख्य सड़क से उतरकर हमने जब दरगाह का रास्ता पकड़ा तो चहल-पहल थी। पर हिंदू नजर नहीं आ रहे थे। न रास्ते में, न दरगाह के भीतर। दरगाह में करीब 2 घंटे बिताने के बाद जब हम लौट रहे थे तब भी यही हाल था।
यह बताने वाले कई मिले कि रात के 2 बजे तक यहाँ इस तरह की चहल-पहल रहती है। लेकिन, कोई यह कैमरे पर कबूल करने को तैयार नहीं था कि अजमेर की दरगाह की तरह यहाँ आने वाले भी कम हुए हैं और उसका असर रोजी-रोजगार पर भी पड़ रहा। खुद निजामी भी शुरुआत में सूफीवाद की शान में कसीदे पढ़ते हुए हमें बताते रहे कि यहाँ हर कौम के लोग आते हैं। हिंदू-मुस्लिम, सरदार भी। लेकिन सवाल दर सवाल जब वे खुलने लगे तो यह सच स्वीकार कर लिया कि दरगाह पर आने वाले हिंदुओं की संख्या घटी है।
निजामी के अनुसार दरगाह पर आने वाले हिंदुओं की संख्या में गिरावट अचानक नहीं हुई है। करीब सालभर से ऐसा दिख रहा है। उनका कहना है कि हिंदुओं के बीच प्रचार किया जा रहा है कि ये कब्र है। यहाँ सजदा करने से कुछ नहीं होता। मंदिर जाओ (अपनी बात को वजनदार बनाने के लिए वे किसी दुबे जी का हवाला देते हैं। जो उनके अनुसार अमेरिका में रहते हैं। उनके मित्र हैं। दरगाह पर आते रहते हैं। ​दीवान के अनुसार उन्हें दुबे जी ने भी इस तरह के प्रचार की बातें बताई थी)।
निजामी आगे बताते हैं कि हिंदू भाई अच्छे लोग हैं, लेकिन ये जो प्रचार चल रहा वह उनमें नफरत पैदा कर रहा है। जब हमने उनसे नूपुर शर्मा को लेकर हुए हालिया विवाद, उदयपुर में कन्हैया लाल की निर्मम हत्या, अजमेर दरगाह से जुड़े लोगों की भड़काउ बयानबाजी के असर को लेकर सवाल किया तो उनका कहना था कि ये सब होता रहता है। हमेशा मजहब को लड़ाने में लोग लगे रहते हैं। लेकिन, ये दरगाह अमन का पैगाम देता है। मोहब्बत का पैगाम देता है। इन जगहों पर हिंदुओं का आना इसलिए कम हुआ है कि काफी समय से उनके बीच नफरत का प्रचार हो रहा। दरगाह के रास्ते में ही तबलीगी जमात का वह​ मरकज है जो कोरोना काल में कुख्यात हुआ था। उस घटना के असर को भी निजामी नकार देते हैं। वे कहते हैं कि उसका असर नहीं है। मरकज में केवल मुस्लिम आते हैं। ये हर कौम के लोगों की जगह है। लेकिन, इसका भी गलत तरीके से प्रचार हो रहा है।
हमने निजामी से पूछा कि जब कभी यहाँ हिंदू इतनी तादाद में आते थे तो क्या दरगाह वाली गली में उनकी भी दुकानें हैं? क्या वे दुकानें आज भी चल रही हैं? हँसते हुए निजामी ने हमारे सवाल का जवाब तो नहीं दिया, लेकिन ये बताया- मेरा नौकर हिंदू है। यहाँ सेवा करने वाले कई हिंदू हैं।

राजस्थान : अजमेर में 100+ छात्राओं का बलात्कार: कांग्रेसियों और दरगाह के खादिमों की करतूत की सज़ा कब? 30 साल हो गए, कई अब भी फरार

 राजस्थान (Rajasthan) के अजमेर शहर में आज से 30 साल पहले 1992 में एक वीभत्स सेक्स स्कैंडल हुआ था, जिसे ‘अजमेर सेक्स स्कैंडल’ के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने समूचे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस घटना में एक गर्ल्स स्कूल की 100 से अधिक स्कूली लड़कियों की अश्लील तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल कर उनका यौन शोषण किया गया था। इस कांड का असली गुनाहगार कांग्रेस नेता और अजमेर शरीफ दरगाह का खादिम था। मास्टरमाइंड था अजमेर शहर के यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष फारुक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपितों ने सबसे पहले एक बिजनेसमैन के बेटे के साथ कुकर्म कर उसकी अश्लील तस्वीर उतारी और उसे अपनी गर्लफ्रेंड को लाने के लिए बाध्य किया। उसकी गर्लफ्रेंड से रेप करने के बाद उसकी भी अश्लील तस्वीर उतारी गई और उसे भी अपनी सहेलियों या दूसरी लड़कियों को लाने के लिए बाध्य किया गया। इसी तरह मजबूर होकर आने वाली हर लड़की का रेप किया जाता और उसे अपनी सहेली को लाने के लिए ब्लैकमेल किया जाता। इस तरह एक चेन बनाते हुए 100 से अधिक रसूखदार घरानों की हिंदू लड़कियों का यौन शोषण किया गया।

पीड़ितों में कई बड़े-बड़े अधिकारियों और शहर के नामचीन घरानों की लड़कियाँ थीं। बताया जाता है कि इस दौरान बदनामी के डर से कई लड़कियों ने आत्महत्या कर ली थी। 30 साल पुराने इस केस में संपूर्ण न्याय मिलना अभी भी बाकी है। हालाँकि, इस कांड से जुड़े 10 दोषी तो जेल की सलाखों के पीछे पहुँच चुके हैं, लेकिन कई अभी भी बाहर घूम रहे हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत की सरकार ने इसकी जाँच सीबी-सीआईडी को सौंप दी। शुरुआत में 18 आरोपितों, जिनमें फारूक चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष), हरीश दोलानी, अनवर चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस का ज्वाइंट सेक्रेटरी), नफीस चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस का वाइस प्रेसीडेंट), पुरुषोत्तम उर्फ बबली, इकबाल भाटी, कैलाश सोनी, सलीम चिश्ती, सोहैल गनी, अल्मास महाराज, जमीर हुसैन, इशरत अली, मोइजुल्लाह उर्फ पूतन इलाहाबादी, परवेज अंसारी, नसीम उर्फ टारजन, महेश लोदानी, शम्शू उर्फ माराडोना, जऊर चिश्ती के खिलाफ जाँच शुरू की गई थी। इस केस में 12 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिसमें से 8 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद एक आरोपित पुरुषोत्तम उर्फ बबली ने आत्महत्या कर ली। नसीम उर्फ टारजन तो जमानत पर बाहर आते ही फरार हो गया था। 2010 में पुलिस ने उसे फिर से पकड़ा। मास्टरमाइंड फारूक चिश्ती को 2007 में सजी सुनाई गई थी, लेकिन उसे सिजोफ्रेनिया की बीमारी के बाद मेंटल घोषित कर दिया गया।

नफीस को 2003 में अरेस्ट किया गया था, लेकिन अब वो बेल पर बाहर घूम रहा है। इकबाल भाटी भी बेल पर बाहर है। सलीम चिश्ती को उस घटना के 20 साल बाद 2012 में गिरफ्तार किया गया था। उस दौरान वह बुर्के में पकड़ा गया था, लेकिन बेल पर वह भी बाहर है। सोहेल गनी चिश्ती ने साल 2018 में आत्मसमर्पण किया था और अब बेल पर बाहर है, जबकि अल्मास महाराज के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुआ है।

पुलिस ने इस केस की जाँच के बाद सप्लीमेंट्री चालान पेश नहीं किया था। इस कारण गवाहों को बार-बार कोर्ट में गवाही देने के लिए आना पड़ा। इसी गलती के कारण यह केस आज भी खींच रहा है।

90 के दशक में अजमेर यूथ कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष फारुक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती ने यह घिनौना कुकृत्य किया था। ये लोग तब राजनीतिक और धार्मिक रूप से इतने प्रभावशाली थे कि इनके खिलाफ कोई मुँह खोलने को तैयार नहीं होता था। जानकारी होने के बावजूद पुलिस कार्रवाई करने से इसलिए बच रही थी कि शहर में दंगा ना भड़क जाए। ये खुद को अजमेर शरीफ के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के खादिम थे और खुद को चिश्ती का वंशज बताते थे। खास बात ये थी कि पीड़िताओं में हिंदू लड़कियाँ ही थीं, जबकि अधिकांश आरोपित मुस्लिम थे।

नेताओं को अजमेर में हिन्दू विरोधी चिश्ती की दरगाह तो याद रहती है महर्षि दयानंद का उद्यान याद नहीं रहता

राकेश कुमार आर्य,

सम्पादक, उगता भारत 
कल शाम लगभग 7:30 बजे हम अजमेर स्थित परोपकारिणी सभा पहुंचे। जहां पर महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज के जीवन से जुड़ी अनेकों घटनाओं का सजीव चित्रण ऋषि उद्यान के एक भवन में किया गया है। महर्षि के जीवन से जुड़ी अनेकों घटनाओं का निरीक्षण कर मन प्रसन्न हो गया।

ब्रह्मचारी नीलेश जी ने इस अवसर पर हमारा मार्गदर्शन किया।

हमारे यात्री दल में मैं स्वयं ,श्री तोरणसिंह आर्य जी, श्रीनिवास आर्य जी व बेटा अमन आर्य रहे।

हम सभी को इस बात पर घोर आश्चर्य व दुख हुआ कि आजादी के बाद जितने भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री ,राज्यपाल या अन्य केंद्रीय व प्रांतीय मंत्री अजमेर पधारे उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मोइनुद्दीन चिश्ती जैसे हिंदूद्रोही व्यक्ति की मजार पर जाकर तो चादर चढ़ाई परंतु महर्षि दयानंद उद्यान में आकर कभी यह कहने का साहस नहीं किया कि महर्षि दयानंद इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्रधार थे ।

 भारत के किसी नेता राजनेता ने कभी यह कहना भी उचित नहीं माना कि महर्षि दयानंद पहली बार ‘स्वराज्य’ शब्द का चिंतन इस देश को दिया और ‘वेदों की ओर’ लौटने का नारा देकर भारत में तेजस्वी राष्ट्रवाद की विचारधारा को मजबूत किया और उसे नई धार दी। निश्चित रूप से इस उपेक्षा वृत्ति के कारण देश का भारी अहित हुआ। क्योंकि स्वराज्य, वेद और वैदिक तेजस्वी राष्ट्रवाद की विचारधारा को आगे बढ़ाने में राजनीति बाधक बन गई । यदि महर्षि दयानंद के उद्यान में हमारे नेताओं का बार-बार आगमन होता रहता तो निश्चय ही महर्षि के जीवन की सुगंध उन्हें तेजस्वी राष्ट्रवाद के निर्माण के लिए प्रेरित करती रहती। लेकिन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाने वाले मानसिक रूप से पक्षाघात का शिकार हुए राजनेता बार-बार चिश्ती की दरगाह पर जाते रहे और इस देश को सेकुलरिज्म का ऐसा बेतुका पाठ पढ़ाते रहे जिससे देश गर्त में चला गया। नेताओं के इस आचरण से ही ‘गंगा जमुनी संस्कृति’ की मूर्खता पूर्ण अवधारणा भारत में विकसित हुई जिससे हम वर्तमान की अनेकों विसंगतियों को झेल रहे हैं।

निश्चय ही यह कहना ठीक है कि उधारी मानसिकता और उधारी सोच देश, समाज और राष्ट्र का भारी अहित करती हैं। जिससे हमारी राजनीति को सबक लेना चाहिए।
महर्षि दयानंद के महान व्यक्तित्व को हम नमन करते हैं । जिन्होंने अपने समय में पौराणिक पाखंडी पंडितों के पाखंड का तो विरोध किया ही, साथ ही मुसलमानों के विज्ञान के विरुद्ध सिद्धांतों, मान्यताओं और धारणाओं का भी जोरदार खंडन किया। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों की धार्मिक ,राजनीतिक व सामाजिक सभी प्रकार की मान्यताओं का भी उतनी ही प्रबलता से विरोध किया । इस प्रकार महर्षि दयानंद एक ऐसे विशाल व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्होंने एक ही समय में अपने लिए अनेकों चुनौतियां खड़ी कीं और उनका निर्भीकता से सामना किया।
समाज सुधारक , वेदोद्धारक, देश धर्म व संस्कृति के रक्षक और मानवता के प्रहरी महर्षि को हृदय से नमन कर हमने उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं का गंभीरता से निरीक्षण किया और उनके स्वयं के द्वारा प्रयोग की जाने वाली उन वस्तुओं को भी बहुत श्रद्धा के साथ देखा जो यहां पर यथावत रखी गई है।
अब प्रातः काल में 4:05 बजे हम ऋषि उद्यान को छोड़कर भीनमाल के लिए प्रस्थान कर चुके हैं।
अजमेर से निकलते – निकलते यह पोस्ट मैंने लिखी है।

अजमेर से भागा ‘डॉ. बम’ कानपुर की मस्जिद से निकलते ही पुलिस ने धरदबोचा

जलीस अंसारी
'डॉ बम' जलीस अंसारी 
मुंबई से गुरुवार (जनवरी 16, 2020) को लापता हुआ आतंकी जलीस अंसारी शुक्रवार को कानपुर में पकड़ा गया। इसकी जानकारी उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने दी। उन्होंने कहा कि जलीस अंसारी को कानपुर की एक मस्जिद से बाहर निकलते वक्त गिरफ्तार किया गया। उसे लखनऊ लाया जा रहा है। उन्होंने इसे उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया। फिलहाल उससे पूछताछ जारी है।
अंसारी 90 के शुरूआती दशक से अब तक 50 से ज्यादा जगहों पर बम धमाका कर चुका है। फिलहाल वह 1993 में मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा था। उसे अजमेर जेल से 21 दिन के
परोल पर छोड़ा गया था। शुक्रवार (जनवरी 17, 2020) को यानी आज उसकी परोल अवधि खत्म हो रही थी और उसे अजमेर जेल पहुँचना था। पेरोल मिलने के बाद वह मुंबई स्थित अपने परिवार से मिलने आया हुआ था।


गुरुवार को उसके बेटे जैद ने पिता के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि जलीस अंसारी तड़के उठा और घरवालों से नमाज पढ़ने की बात कहकर निकला। लेकिन वापस नहीं लौटा।
अंसारी अग्रीपाडा थाने के अंतर्गत मोमिनपुर का रहने वाला है। वह देश के विभिन्न हिस्सों में हुए कई धमाकों में भी सदिंग्ध है। उसे बम बनाने में महारत हासिल है। इसके कारण उसे डॉ. बम भी कहते हैं। वह सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों से जुड़ा था और उन्हें बम बनाना सिखाता था। यही कारण है कि उसके गायब होने की जानकारी मिलते ही महाराष्ट्र एटीएस, मुंबई क्राइम ब्रांच समेत अन्य सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हो गई थी।