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उत्तर प्रदेश : 14.83 करोड़ रूपए संपत्ति कर न चुकाने पर अलीगढ़ नगर निगम ने किया AMU बैंक खाता सीज

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के बैंक खाते सीज कर दिए गए हैं। 14 करोड़ रुपए से अधिक के प्रॉपर्टी टैक्स के भुगतान न करने पर अलीगढ़ नगर निगम ने यह कार्रवाई की है। अधिकारियों का कहना है कि अगर एक सप्ताह के भीतर बकाया भुगतान नहीं किया जाता है, तो एएमयू के खाते से पैसा नगर निगम को ट्रांसफर कर दिया जाएगा। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि यदि एक सप्ताह के भीतर बकाया राशि नहीं दी जाती है तो संपत्तियों को बाधित करने के बारे में भी विचार किया जाएगा।

मुख्य कराधान अधिकारी विनय कुमार राय ने बताया, “अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर अलीगढ़ नगर निगम के लगभग 14.83 करोड़ रुपए का प्रॉपर्टी टैक्स बकाया है। यह बकाया राशि पिछले 8 से 10 सालों से लंबित है। इसको लेकर 2019 में भी खातों को सीज किया गया था। बकाया भुगतान के लिए विश्वविद्यालय को पर्याप्त समय और मौका दिया गया, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसलिए उन्‍हें विश्वविद्यालय के बैंक खाते को सीज करने का निर्णय लेना पड़ा।”

उन्‍होंने बताया कि बकाया भुगतान न करने के कारण उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 की धाराओं 507, 509 व 513 के अन्तर्गत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए अलीगढ़ नगर निगम द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संचालित खाता को तत्काल प्रभाव से सीज किया गया है।

राय ने बताया कि अगर एक सप्ताह के भीतर बकाया राशि जमा नहीं की जाती तो एएमयू के खाते से पैसा नगर निगम को ट्रांसफर कर दिया जाएगा। संपत्तियों को बाधित करने के बारे में भी सोचेंगे। उन्‍होंने बताया कि एएमयू ने शासन को भी कर मुक्त करने के लिए लिखा था, लेकिन वहाँ से कोई राहत नहीं मिली और वसूली के आदेश प्राप्त हुए। 

मुख्य कराधान अधिकारी विनय कुमार राय ने बताया कि इस मामले में कुछ दिन पहले शिक्षा मंत्रालय के अवर सचिव को पत्र लिखा गया था। पत्र में एएमयू की ओर से 10 अप्रैल 1990 में जारी शासनादेश का हवाला दिया गया। यह आदेश उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1916 के तहत प्रदेश सरकार ने जारी किया था। शासनादेश से जो कर मुक्ति दी गई थी, वह नगर पालिका अधिनियम 1916 के तहत थी। वहीं, एएमयू पर जो टैक्‍स लगाया गया है, वह उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 की व्यवस्था के तहत है।

इस संबंध में एएमयू के जनसंपर्क विभाग के एमआईसी इंचार्ज प्रो. शाफे किदवई का कहना है कि नगर निगम द्वारा की गई कार्रवाई का पक्ष अभी देखा नहीं है। पक्ष देखने के बाद विधिक राय लेकर अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।

खाड़ी देशों में रहने वाले हिंदुओं के ख़िलाफ़ AMU छात्र फैला रहे प्रोपेगेंडा

खाड़ी देश, AMU, हिंदू
AMU के छात्र चला रहे खाड़ी देश में रहने वाले हिंदुओं के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा
खाड़ी देशों में हिंदुओं को निशाना बनाने के अभियान के पीछे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के कुछ पूर्व व वर्तमान छात्र-छात्राओं के नाम सामने आया है। आरोप है कि ये लोग खाड़ी देशों में रह रहे हिंदुओं के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया में पोस्ट कर अभियान चला रहे हैं।
इन छात्रों पर शिकायत दर्ज कराने के लिए AMU के ही एक पूर्व छात्र निशित शर्मा ने कुछ स्क्रीनशॉट्स प्रमाण के रूप में पेश किए हैं। शर्मा ने दावा किया है कि इन्हीं सबके कारण अरब देशों में गुजर-बसर कर रहे हिंदुओं का कोरोना महामारी के बीच बहिष्कार शुरू हुआ है। वहाँ हिंदुओं को न उचित इलाज मुहैया कराया जा रहा है और न ही उनका कोरोना टेस्ट हो रहा है।
इन स्क्रीनशॉट्स से साफ मालूम होता है कि AMU के छात्र लगातार अनऑफिशियल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी फेसबुक पेज पर अरब देशों में रह रहे हिंदुओं के ख़िलाफ़ साजिश रच रहे थे। वे अपने पोस्टों में हिंदुओं के ख़िलाफ़ नफरत फैलाने का काम कर रहे थे। ये लोग सोशल मीडिया पर ऐसे हिंदुओं को खोज रहे थे जो खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। जैसे निशित ने जो स्क्रीनशॉट सामने रखे हैं उनमें राजीव नाम के व्यक्ति के ख़िलाफ़ अनऑफिशियल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पेज से शिकायत करने की माँग की गई है।

इसके अलावा एक देवासुरम नाम का व्यक्ति जिसने पिछले दिनों एक पोस्ट किया कि वे मुस्लिमों से सामान नाम नहीं लेगा और न ही मुस्लिमों को कंपनी में हायर करेगा। उसे भी कुछ पूर्व छात्रों ने हाइलाइट किया है।
इसके अतिरिक्त अली सोहराब नामक विवादित पत्रकार भी इस सूची में शामिल है। उसने दुबई में रह रही हिंदू धारा पटेल नाम की महिला की शिकायत की, क्योंकि, वे तबलीगी जमातियों और पाकिस्तानी आतंकी समूह के बारे में मुखर होकर लिख रही थी।

अली सोहराब ने दुबई पुलिस का ध्यान धारा की ओर आकर्षित कराते हुए बोला कि ये महिला सोशल मीडिया पर गलत सूचना फैला रही है। इससे साम्प्रदायिकता फैल सकती है।


इतना ही नहीं, AMU के पूर्व छात्रों ने अरब देशों में रह रहे हिंदुओं के ख़िलाफ़ अपनी कुँठा व्यक्त करने के लिए अपनी टाइमलाइन पर उन्हें संघी करार दिया है और ये भी कह रखा है कि अरब में अभी सिर्फ़ चार लोग एक्टिव हुए हैं और संघी बाप सावरकर की तरह माफी वीडियो डाल रहे हैं। 
अब इन्हीं सब स्क्रीनशॉट्स आदि को प्रमाण के रूप में पेश करते हुए निशित शर्मा ने इन सबके ख़िलाफ़ उपयुक्त कार्रवाई की माँग की है। उन्होंने अपनी शिकायत में लिखा है, “अरब देशों में रह रहे हिंदू भारतीयों पर अत्याचार के पीछे एक संगठित वर्ग है। इसका संचालन पाकिस्तान एवं भारत के विभिन्न स्थानों से सोशल मीडिया के माध्यम से हो रहा है।”
उन्होंने लिखा, AMU के पूर्व एवं वर्तमान छात्र-छात्राएँ सोशल मीडिया पर निरंतर अरब देशों में रह रहे हिंदुओं के विरुद्ध अभियान चला रहे हैं। ये वही अराजक तत्व हैं जो नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन में हिंसक गतिविधियों में लिप्त रहे थे।
अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लिखे गए पत्र में दावा किया गया है कि ये सब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धूमिल करने, हिंदू धर्म के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर द्वेष फैलाने और हिंसा भड़काने की एक सुनियोजित साजिश है। इसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े लोग भी लिप्त हैं।
खाड़ी देशों में कार्य कर रहे भारतीय मूल के लोगों पर अत्याचार एवं धार्मिक कट्टरपंथी मढ़ना कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान के आतंकी समूहों के प्रोपेगेंडा के कारण वहॉं ये सब कई बार हो चुका है। शिकायतकर्ता ने 2019 के एक वाकए का जिक्र किया है, जब केवल सीएए का समर्थन करने के कारण एक भारतीय डॉक्टर को मुस्लिम विरोधी करार देकर, अस्पताल से निकाल दिया गया था।    (साभार)
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एक ओर जब सारा विश्व कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है, ऐसे समय में पाकिस्तान अपने च....

हिन्दुत्व और मोदी के साथ “योगी तेरी क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर”

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज यूनिवर्सिटीओं में जिन दलों द्वारा अराजक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, राज्य एवं केंद्र सरकारों को उसे प्यार से नहीं सख्ती से निपटने की जरुरत है। CAA-NRC का विरोध एक अलग मुद्दा है, लेकिन इस विरोध में "हिन्दुत्व तेरी कब्र खुदेगी", "मोदी तेरी कब्र खुदेगी" और अब "योगी तेरी कब्र खुदेगी" आदि नारों के क्या औचित्य है? क्या आंदोलन के प्रायोजक देश को गृह-युद्ध में धकेलने का प्रयास नहीं कर रहे हैं? और शर्म आती उन्हें हिन्दू कहने पर जो हिन्दू होकर इस तरह के नारेबाजों के साथ खड़े होते हैं। इस तरह के आपत्तिजनक नारों का क्या उद्देश्य है या मंशा है? नागरिकता संशोधक कानून के समर्थकों को कि वह समर्थन में नहीं, बल्कि ऐसे आपत्तिजनक नारेबाज़ और इन्हें प्रायोजित करने वाले दलों के सामाजिक बहिष्कार के लिए सड़क पर आएं।  
देश विरोधी और सांप्रदायिक उन्मादी नारों के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ मुस्लिम विश्वद्यिालय (AMU) रोज नए कीर्तिमान गढ़ रहा है। इस मामले में उसने JNU को भी पीछे छोड़ दिया है। नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध के नाम पर बीते दिसंबर में AMU ने अपने नारों से देश को चौंका दिया था। प्रदर्शनकारी छात्रों ने “हिन्दुत्व की क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगाए थे।
ऐसे नारे लगाने वालों को गिरफ्तार कर देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं चलाया जाता? जिसके मन में जो आएगा बोल देगा? क्या संविधान ऐसे नारे की इजाजत देता है?
AMU के इन नफरती नारों को लेकर देशभर में आक्रोश देखा गया। लेकिन इससे एएमयू के कथित उन्मादी छात्रों को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। गुरुवार (9 जनवरी) को AMU में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कब्र खुदने के नारे लगे। सोशल मीडिया पर नारेबाजी का यह वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून, एनआरसी, जेएनयू हिंसा के विरोध में पंक्तिबद्ध होकर चल रहे छात्र AMU की आर्ट्स फैकल्टी से लेकर एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक तक एक सुर में “मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर”, “योगी तेरी क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगा रहे हैं। देर शाम इस घटना पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने 50-60 छात्रों के ख़िलाफ़ धारा-153 ए के तहत मुक़दमा दर्ज किया है।
ख़बर के अनुसार, गुरुवार को CAA के विरोध में उन्मादी छात्रों की भीड़ जब स्टाफ़ क्लब से AMU गेस्ट हाउस नंबर एक की ओर बढ़ रही थी तभी उन्मादी छात्रों ने मोदी और योगी को लेकर आपत्तिजनक नारे लगाए। पुलिस मामले की जाँच में जुट गई है। भड़काऊ नारेबाज़ी करने वालों से सख़्ती से निपटने की बात कही गई है।
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विरोध की आड़ में साम्प्रदायिकता का जहर
क्यों फैलाया जा रहा है?
नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोगों खासकर मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया आश्चर्यचकित करने वाली है। मुस्लिम समाज के लिए आज जो असमंजस की स्थिति है इसका बीज तो भारत के विभाजन के समय ही बोया गया था। उस समय हुए पूर्व नियोजित नरसंहार से निपटने का कोई भी हथियार भारत सरकार के पास नहीं था। गाँधीजी का एक लाइन का अहिंसक फार्मूला यही जताता था कि वध होने के लिए स्वयं को हत्यारों के सामने प्रस्तुत कर दो। असहायता की यही विरासत आजाद भारत की नीति बना दी गयी, और हम आज इसका परिणाम भुगत रहे हैं। विभाजन के समय हुए दंगों में सदियों से प्यार-मुहब्बत से साथ रहने वाले लोगों ने तलवारें निकाली, एक दूसरे की गर्दनें काटी, औरतें लूटी, सैकड़ों साल साथ रहने के बाद भी जो धार्मिक घृणा थी वह एक ही झटके में कत्लेआम की सूरत में बाहर आ गयी। इस कलह का बीज तो उसी समय बो दिया गया जब कांग्रेस के नेता, खासकर पंडित नेहरू, मौलाना आजाद, आदि ने पाकिस्तान जा रहे बहुत से लोगों के शिविरों में जाकर उन्हें भारत में रुकने के लिए यह कहकर प्रेरित किया कि हिंदुस्तान एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यह देश सिर्फ किसी एक धर्म का नहीं बल्कि इस देश में सभी धर्मों का आदर होगा, और सभी को समान अधिकार दिया जाएगा। और यह धर्मनिरपेक्षता की चाल इस लिए चली गयी कि अगर हिंदुस्तान हिंदुओं के लिए बनाया जाता तो इस देश की कमान उस समय के हिंदुत्ववादी नेताओं खासकर "वीर सावरकर" जैसे नेताओं के हाथों जाने का डर था। जिस धर्मनिरपेक्षता के बहाने मुस्लिम समाज को हिंदुस्तान में रोका गया, उसी धर्मनिरपेक्षता से सही मायनों से मुस्लिम समाज को परिचित होने ही नहीं दिया गया। मुस्लिम समाज को तो सिर्फ वोटबैंक बनाने के षड़यंत्र के तहत ही हिंदुस्तान में रोका गया, इसीलिये तो उनकी अलग बस्तियाँ, उनकी अलग पहचान, उनके लिए अलग संस्थान, और उनके लिए अलग कानून बनाया गया। ऐसा नहीं है कि मुस्लिम समाज की समस्याएं हिंदुओं से अलग हैं, उनकी भी मूल समस्या शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार ही है, पर उन्हें धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने, भारतीय संस्कृति से जोड़ने की जगह उन्हें अरबों और तुर्कों से जोड़ा गया, उन्हें मानवता से परिचित कराने की जगह धार्मिक कट्टरता की तरफ मोड़ा गया। भारतीय मुस्लिम समाज के अंदर राजनीतिक षणयंत्र के तहत राष्ट्रीय नेतृत्व को भारत में विकसित ही नहीं होने दिया गया, मुस्लिम समाज को हमेशा से हिंदुओं का डर दिखाकर देश की मुख्यधारा से जुड़ने ही नहीं दिया गया। मुस्लिम समाज हमेशा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के हाथों कठपुतली की तरह वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। नेतृत्व विहीन मुस्लिम समाज को देश में राजनीतिक सफलता प्राप्त करने के लिए चंद लोंगों ने सीढ़ी की तरह स्तेमाल कर उन्हें दुविधाग्रस्त स्थिति में छोड़ दिया। किसी ने भी भारत में उनकी भूमिका को लेकर स्पष्ट ही नहीं किया कि भारत में इनका किरदार क्या है ? इनकी इस देश में अहमियत क्या है ? इस देश में इनकी जरूरत क्या है ? मुस्लिम समाज आज भी दुविधा में है कि हिंदुस्तान में वह स्थायी हैं या अस्थायी ? मुस्लिम समाज के इसी दुविधा को आज कुछ राजनीतिक दल "नागरिकता संसोधन कानून" के विरोध में देश में अशांति का माहौल पैदा करने में उपयोग कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं। आज जब नागरिकता संसोधन कानून को लेकर हिंसक प्रदर्शनों का दौर चल रहा है तो यह शंका होती है कि कहीं किसी गुप्त एजेंडे के तहत इन्हें प्रभावित कर बरगलाया तो नहीं जा रहा है।
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शास्त्री जी की पुन्य तिथि पर विशेष : - विनोद बंसल 11 जनवरी आते ही छोटे से कद-काठी वाला एक ऐसा चेहरा स्मृति में कौंधने लग...
आखिर पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय को भारत में नागरिकता देने से मुस्लिम समाज को किस प्रकार का खतरा हो सकता है ? आज मुस्लिम समाज को स्वतः सजग और वतनपरस्त होना पड़ेगा, किसी के हाथों कठपुतली बन कर अपने लिए सुरक्षित स्थान तलाशने के बजाय स्वतः आगे बढ़कर देश के विकास में बराबर की भागीदारी निभानी होगी, दुविधा और डर का परित्याग कर देश को अपना मानकर देश के प्रति समर्पित होकर कार्य करना होगा। देश जितना हिन्दू का है उतना ही मुस्लिम समाज का, यह भारत का संविधान कहता है, परन्तु वही संविधान यह भी कहता है कि देश को तोड़ने, दंगा करने वालों, धार्मिक रूप से हिंसा करने वालों, देश विरोधी कृत्यों को अंजाम देने वालों के लिए देश में कोई जगह नहीं है।

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी : दंगाइयों पर होगी गुंडा एक्ट के तहत कार्यवाही

AMU, नागरिकता
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून पर मचे उपद्रव पर उत्तर प्रदेश सरकार सख्ती बरतने में कोई कोताई नहीं कर रही। वोट के भूखे ने अपनी कुर्सी की खातिर जिस तरह मुस्लिम समाज को भ्रमित कर हिंसा पर उतरने को मजबूर किया, और बिना कुछ समझे नेताओं की भ्रमित बातों में आकर प्रदेश को अशान्त करने का दुस्साहस किया, उन्हें सबक सिखाने कमर कसली है। दिल्ली के जामिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी से मचे उपद्रव को देश के अन्य भागों तक ले गए। परिणामस्वरुप, उपद्रवियों ने पुलिस पर बर्बरता, निजी एवं सरकारी सम्पत्तियों को आग के हवाले किया। 
नेताओं की भड़काऊ बातों में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जो उपद्रवी छात्र रडार पर आए हैं, उनका भविष्य इन नेताओं के कारण अंधकारमय होने जा रहा है। गुंडा एक्ट के तहत कार्यवाही होने पर शायद ये नेता भी इनको अपने कार्यालय में स्थान न दे पाएं।     नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में हिंसा भड़काने वाले 12 लोगों की पुलिस ने पहचान कर ली है। इन पर गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई होगी। प्रशासन इन्हें 6 महीने के लिए जिलाबदर करने की तैयारी में भी है। इनमें एएमयू छात्र संघ का अध्यक्ष सलमान इम्तियाज भी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इनमें पॉंच पूर्व छात्र हैं और इनका आपराधिक अतीत भी रहा है।
इनलोगों पर मुस्लिम भीड़ को उकसाने और पुलिस पर हमला करने के लिए भड़काने का आरोप है। घटना 15 दिसंबर की है। सीसीटीवी फुटेज को खॅंगालने के बाद पुलिस ने इनकी पहचान की है। फुटेज एएमयू प्रशासन ने मुहैया कराए थे। पुलिस ने बताया कि इनमें से पॉंच पूर्व छात्र हैं। इन्हें जिले की शांति के लिए खतरा बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि इनका आपराधिक रिकॉर्ड है। अलीगढ़ के एसएसपी आकाश कुल्हाड़ी ने बताया, “मैंने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर इनके खिलाफ गुंडा एक्ट की तहत कार्रवाई करने की इजाजत मॉंगी है। इन्हें छह महीने के लिए जिलाबदर भी किया जा सकता है।”
आरोपितों में शामिल हुज़ैफ़ा आमिर एएमयू छात्र संघ का सचिव रहा है। हमजा सूफ़िया छात्र संघ का उपाध्यक्ष रहा है। नदीम अंसारी, आमिर, मिंटो और उस्मानी- इन पाँचों के अलावा एएमयू स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष सलमान इम्तियाज़ का नाम भी एफआईआर में शामिल किया गया है। हमजा और हुज़ैफ़ा को एएमयू ने 5 सालों के लिए निकाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने वीसी ऑफिस में दंगा किया था। उन पर जुलाई 2019 में ही ये कार्रवाई की गई थी। दोनों ने यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों के साथ भी दुर्व्यवहार किया था।

15 दिसंबर को रात आठ बजे एएमयू में अचानक छात्रों ने पथराव और फायरिंग शुरू कर दी थी। उपद्रवी छात्र जामिया में हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में उग्र हो गए थे। दंगाई छात्रों के उपद्रव के कारण डीआइजी समेत कई पुलिस अधिकारियों को चोट लगी थी। पुलिस को दंगाई छात्रों को रोकने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े थे और लाठीचार्ज करना पड़ा था। इस मामले में पुलिस ने 78 नामजद व 1300 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ सिविल लाइंस थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। अब पुलिस आगे की कार्रवाई में जुट गई है।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार नागरिकता कानून का विरुद्ध करने वाले जामिया मिलिया के छात्रों द्वारा पुलिस पर पत्थरा....
हिंसा वाले दिन प्रॉक्टर की टीम मान-मनव्वल करती रह गई थी लेकिन एएमयू के छात्र गेट तोड़ कर बाहर आ गए थे। उन्होंने पुलिस के साथ झड़प करने के लिए ऐसा किया था। पुलिस ने छात्रों को ग़ैर-क़ानूनी कार्य करने से रोकने के लिए मिन्नतें की लेकिन छात्र लगातार पत्थरबाजी करते रहे। उपद्रवी छात्रों ने पुलिस का बैरिकेड भी तोड़ डाला था।

‘मुसलमान बन जाओ… वरना नौकरी तो जाएगी ही, बीवी-बच्चों को भी मार दूँगा’ – जामिया उर्दू संस्थान के अफसरों की धमकी

दैनिक जागरण में 30 दिसंबर को प्रकाशित खबर
अलीगढ़ में एक जामिया उर्दू संस्थान है। यहीं एक गार्डनर सुपरवाइजर हैं, नाम है – कमल सिंह। कमल पिछले 11 साल से जामिया उर्दू संस्थान में काम कर रहे। लेकिन अब उनकी हाजरी व सैलरी पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके पीछे जो कारण कमल सिंह ने बताया है, वो बहुत ही चिंताजनक है।
कमल सिंह ने जामिया उर्दू संस्थान के ओएसडी फरहत अली व रजिस्ट्रार समुनरजा नकवी पर धर्म परिवर्तन को लेकर दबाव बनाने का आरोप लगाया है। कमल सिंह ने बताया कि ओएसडी फरहत अली व रजिस्ट्रार समुनरजा नकवी न सिर्फ उन पर बल्कि उनकी पत्नी मीना पर भी काफी समय से मुस्लिम धर्म अपनाने का दबाव बना रहे थे।
इन दबावों के बावजूद कमल सिंह ने हिंदू धर्म अपनाए रखा। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि इसके कारण उन्हें नौकरी से हटाने व बच्चों को मार डालने की धमकी दी गई। मारपीट तक की गई और सितंबर 2019 से ओएसडी फरहत अली व रजिस्ट्रार समुनरजा नकवी ने मिलकर उनकी हाजरी व सैलरी पर प्रतिबंध लगा दिया है।
इस संबंध में थाना क्वार्सी में मामला दर्ज कराया गया है। चूँकि मामला धर्म परिवर्तन से जुड़ा था, इसलिए कमल सिंह के साथ स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने थाने का घेराव किया। इसके बाद जब इंस्पेक्टर विनोद कुमार ने मामले पर FIR दर्ज की, तो हंगामा शांत हुआ।
इस संबंध में कमल सिंह अपनी पत्नी मीना के साथ एटा के सांसद राजवीर सिंह से भी मिले। सांसद ने इस संबंध में डीआईजी प्रीतिंदर सिंह को फोन किया और ठोस कार्रवाई की माँग की। इसके बाद पीड़ित दंपती डीआईजी से उनके ऑफिस जाकर भी मुलाकात की। तब डीआईजी ने खुद संबंधित एसएसपी को जाँच व कार्रवाई के निर्देश दिए।
हालाँकि जामिया उर्दू संस्थान के ओएसडी फरहत अली ने बताया, “कमल सिंह चार महीने पहले खुद संस्थान छोड़कर भाग गया था तो सैलरी कैसे मिलेगी? धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने जैसे आरोप बेबुनियाद हैं। इनका भाई यहीं काम कर रहा है। कमल को निकालना तो दूर, उल्टा वापस बुलवाया गया था।”
इस पूरे मामले में एक और बात सामने आई है। कमल सिंह ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके बड़े भाई रघुराज सिंह का भी धर्म परिवर्तन कराया जा चुका है। लेकिन रघुराज सिंह ने इंस्पेक्टर विनोद कुमार को लिखित में दिया कि उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया है।

उत्तर प्रदेश :अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे बाबरी पुनर्निर्माण का विवादित पोस्टर

controversial poster on Babri issue in AMU Aligarh उत्तर प्रदेश  की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) एक बार फिर चर्चाओं में है। इस बार चर्चा का कारण है एएमयू में लगा बाबरी पुनर्निर्माण का पोस्टर। ये पोस्टर उस समय लगे है जब पूरे उत्तर प्रदेश में बाबरी विध्वंस की बरसी मनाई जा रही है। बाबरी विध्वंस की बरसी को लेकर सरकार के साथ-साथ जिला प्रशासन भी पूरी तरह अलर्ट पर है। 
पोस्टर लगने के बाद मचा हड़कंप अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में 6 दिसंबर को विवादित पोस्टर लगे है। पोस्टर लगने के बाद यूनिवर्सिटी में हड़कंप मच गया हैं। पोस्टर में बाबरी के पुनर्निर्माण की बात कही गई है। एएमयू में पोस्टर लगने की जानकारी मिलते ही यूनिवर्सिटी प्रशासन ने आनन-फानन में पोस्टरों को हटा दिया है। फिलहाल यूनिवर्सिटी प्रशासन पूरे मामले की जांच कर कार्रवाई की बात कर रहा है।
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आर.बी.एल.निगम श्री श्री रविशंकर ने अयोध्‍या विवाद के समाधान की पेशकश के साथ नवम्बर 16 को अयोध्‍या में सभी पक्षकारों से मुलाकात की. श्र..






आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर द्वारा मन्दिर मसला सुलझाने के लिए दर-दर जाना, शायद बाबरी समर्थकों को राहत दे रहा है, क्योकि उन्हें मालूम...
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आखिर हिंदुओं से इतनी नफरत क्यों करती है कांग्रेस? इस सच्चाई को जानने के लिए निम्न लेखों का अवलोकन करें :--
यूनिवर्सिटी में बिना परमिशनके नहीं लग सकते पोस्टर इस मामले पर एएमयू के प्रॉक्टर प्रो. मोहम्मद मोहसिन खान ने बताया कि जानकारी मिलने के बाद इन पोस्टरों को हटाया गया है। ये पोस्टर कई जगह लगे हुए थे। इन पोस्टरों में किसी भी आयोजक या संयोजक का नाम नहीं लिखा गया था। इसकी जांच की जा रही है कि इन पोस्टर्स को किसने लगाया है। क्योंकि यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम आयोजन से पूर्व किसी भी प्रकार से कोई भी पोस्टर बिना प्रॉक्टर ऑफिस से पास कराये बिना नहीं लगाया जा सकता है।
वास्तविकता तो यह है कि नाइंसाफी तो हिन्दुओं के साथ हुई है, जिनके आराध्य श्रीराम के जन्मस्थान पर निर्मित मन्दिर को हिन्दू विरोधी बाबर ने तोड़ दिया था। दुःख इस बात का है कि जयचन्दी हिन्दू बाबर वंशों का साथ दे रहे हैं। इतिहास साक्षी है, हिन्दू राज्य से लेकर ब्रिटिश युग तक रहे जयचन्दों का नाम काले अक्षरों में लिखा है।   

मन्‍नान वानी की मौत पर AMU में कश्मीरी छात्रों ने लगाए आजादी के नारे

Mannan Wani
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के पीएचडी स्कॉलर रहे मन्‍नान वानी जो बाद में हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकी बन गया था उसको कुपवाड़ा में सेना ने एनकाउंटर में मार गिराया है। इसके बाद से AMU में पढ़ रहे कुछ कश्मीरी छात्र बेहद परेशान हैं और बताया जा रहा है कि कैंपस में आजादी के नारे भी लगाए गए हैं।
इस मामले में कुछ कश्मीरी छात्रों ने जनाजे की नमाज पढ़ने का भी प्रयास किया था हालांकि नमाज पढ़ने से पहले ही उन्हें रोक दिया गया था। बताया जा रहा है कि नमाज़ पढ़ने से रोकने व मन्नान वानी की मौत से क्षुब्ध कश्मीरी छात्रों ने आजादी के नारे लगाए। एएमयू कैम्पस में आजादी के नारे लगने से हड़कंप मच गया।
इन छात्रों के खिलाफ राजद्रोह, दंगा और धमकी के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई है। बताया जा रहा है कि ये कश्मीरी छात्र इतना उग्र थे कि उनको रोकने वालों के संग उन्होंने धक्कामुक्की के साथ गालीगलौज भी किया। कैंपस में शोक सभा आयोजित करने के मामले में एचआरडी मिनिस्ट्री ने एएमयू प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है। 
एएमयू के शोध छात्र से आतंकी बने मन्नान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर के दर्जनों छात्रों ने कैनेडी हॉल में नमाज-ए-जनाजा पढ़ने का प्रयास किया था। हालांकि प्रॉक्टोरियल टीम एवं सीनियर छात्रों की सूझबूझ एवं विरोध के कारण कश्मीरी छात्र नमाज-ए-जनाजा पढ़ने में कामयाब नहीं हुए। इस क्रम में कश्मीरी छात्रों ने नारेबाजी एवं प्रॉक्टोरियल टीम के साथ बदतमीजी की थी।
एएमयू प्रशासन द्वारा इस मामले में तीन छात्रों को निलंबित करने एवं चार छात्रों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का बयान दिया गया था, लेकिन बाद में एएमयू प्रशासन को अपनी गलती का अहसास हुआ।
Human Resource Development Ministry has asked Aligarh Muslim University for a report on the mourning incident in AMU campus over the death of terrorist who was shot dead yesterday during Handwara encounter in .
विश्‍वविद्यालय प्रशासन इस मामले में 3 छात्रों  वसीम अयूब मलिक, पीएचडी छात्र (शोपियां, जम्मू-कश्मीर) और अब्दुल हसीब मीर, पीएचडी छात्र (हंदवाड़ा, कुपवाड़ा, जम्मू-कश्मीर) को पहले ही निलंबित कर चुका है। अब तक नौ छात्रों को चिन्हित किया गया है, जिनमें दो को निलंबित करते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। छात्रों को 48 घंटे में नोटिस का जवाब देना है। इसके अतिरिक्त डिप्टी प्रॉक्टर के नेतृत्व में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है। सीसीटीवी एवं अन्य साक्ष्य देखकर कमेटी को यह तय करना है कि नमाज-ए-जनाजा एवं हंगामा में कौन-कौन छात्र शामिल थे। 
इन छात्रों को कारण बताओ नोटिस 
जिन छात्रों को कारण बताओ नोटिस दिया गया है उनमें वसीम अयूब मलिक, पीएचडी छात्र (शोपियां, जम्मू-कश्मीर), अब्दुल हसीब मीर, पीएचडी छात्र (हंदवाड़ा, कुपवाड़ा, जम्मू-कश्मीर), पीरजादा दानिश शाबिर, बीएससी छात्र (कुलगाम, जम्मू-कश्मीर),  ऐयाज अहमद भट्ट, एमएससी छात्र (अनंतनाग, जम्मू-कश्मीर), मो. सुल्तान खान, एमफिल छात्र (मानसबाल, गंडरबाल, श्रीनगर जम्मू-कश्मीर), रकीब सुल्तान बीएससी छात्र (बारामुला, जम्मू-कश्मीर), समीउल्ला रॉथर बीएससी छात्र (कुलगाम, जम्मू-कश्मीर), शौकत अहमद लोन (बुडगाम, जम्मू-कश्मीर) एवं पीरजादा महबुबुल हक, बीए छात्र (ड्रगमुला, जम्मू-कश्मीर) हैं।
मन्‍नान वानी को सुरक्षा बलों ने अक्टूबर 11 को जम्मू एवं कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में मार गिराया था। वह एएमयू से पीएचडी कर रहा था, लेकिन जनवरी के बाद उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली।
इस बीच हथियारों के साथ उसकी तस्‍वीरें सामने आई थीं, जिसके बाद इसका अंदेशा जताया गया कि वह जम्‍मू एवं कश्‍मीर में सक्रिय आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने मन्‍नान वानी को निष्‍कासित कर दिया था।
मन्‍नान वानी के मारे जाने के बाद AMU कैंपस में कुछ छात्र विरोध जताने के लिए एकजुट हुए थे। बताया जाता है कि यहां करीब 15 छात्र शोकसभा के लिए जुटे थे। हालांकि इस मामले में त्‍वरित कार्रवाई करते हुए विश्‍वविद्यालय प्रशासन ने 3 छात्रों को निलंबित कर दिया, जबकि 4 अन्‍य को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया।
इन पर शोकसभा के लिए जुटने वाले छात्रों को मदद देने का आरोप है। प्रशासन इन छात्रों के एकेडमिक रिकॉर्ड खंगाल रहा है। विश्‍वविद्यालय ने साफ कर दिया है कि यूनिवर्सिटी कैंपस में किसी भी तरह की राष्‍ट्रविरोधी गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।
ऐसी बात नहीं है कि अलीगढ विश्वविद्यालय में ऐसा पहली बार हुआ हो। विश्वविद्यालय के इतिहास के अवलोकन करने की जरुरत है। कश्मीर मुद्दे से पूर्व इसी विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के पक्ष में प्रदर्शन आदि होते रहते थे। भारत विरोधी नारों के पोस्टर परिसर में चिपकाये जाते थे। डेस्क कार्य के अतिरिक्त, लेखन शुरू किया था। बात 1986/87 की है, एक प्रादेशिक दैनिक में अलीगढ विश्वविद्यालय में चल रही भारत विरोधी गतिविधियों से सम्बन्धित प्रकाशित समाचार को अपने अल्पज्ञान के आधार पर विस्तार से लिखा ही था कि ऑफिस में अचानक गृह मंत्रालय के एक अधिकारी आये और रिपोर्ट को देख, तुरन्त चाय पीकर रिपोर्ट लेकर चले गए। उस रिपोर्ट की मंत्रालय ने तुरन्त पुष्टि करने उपरान्त सख्त कार्यवाही करने उपरान्त सम्पादक प्रो वेद प्रकाश भाटिया के पास कार्यवाही की सूचना ही नहीं दी, उच्च अधिकारीयों के साथ सम्पादक जी के साथ-साथ मुझे भी एक होटल में भोजन के आमन्त्रित किया था। यानि मेरी आयु के वरिष्ठ पत्रकार एवं नेता, चाहे वह किसी भी पार्टी से सम्बंधित हों, अलीगढ विश्वविद्यालय में होती भारत विरोधी गतिविधियों से अच्छी तरह परिचित होंगे।