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BBC ने कहा- ‘मेट्रो खाली’, हकीकत में रिकॉर्ड सवारी और बढ़ता नेटवर्क: अधूरे डेटा से गढ़े गए प्रोपेगेंडा का असली विश्लेषण

                                                                                                                   साभार : Aajtak & BBC
बीबीसी (BBC) ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था, “भारत ने मेट्रो पर अरबों खर्च कर दिए, लेकिन यात्री कहाँ हैं?” इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे भारत की मेट्रो परियोजनाएँ सही तरीके से काम नहीं कर रहीं और लोग उनका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे। लेकिन असल तस्वीर इससे अलग है। हकीकत यह है कि BBC ने दिल्ली मेट्रो जैसे बड़े और सफल मॉडल को ‘अपवाद’ कहकर किनारे कर दिया और नई मेट्रो लाइनों के शुरुआती कम उपयोग वाले डेटा को ही पूरी कहानी मान लिया। यह तरीका पूरा सच नहीं दिखाता।

सच्चाई यह है कि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट- जैसे मेट्रो, हाईवे या एयरपोर्ट को पूरी तरह चलने और लोगों की आदत में आने में समय लगता है। शुरुआत में लोग धीरे-धीरे जुड़ते हैं, नेटवर्क बढ़ता है और फिर उपयोग तेजी से बढ़ जाता है। 2025–26 के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में मेट्रो का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली मेट्रो करोड़ों यात्रियों को रोज सफर करा रही है और मुंबई मेट्रो की नई लाइनों पर भी यात्रियों की संख्या हर महीने बढ़ रही है।

दिल्ली मेट्रो से सीख: सिस्टम धीरे-धीरे मजबूत होता है

BBC का मुख्य तर्क है कि कई शहरों में मेट्रो में उम्मीद से कम यात्री सफर कर रहे हैं। लेकिन इस विश्लेषण में वह दिल्ली मेट्रो के पूरे सफर को नजरअंदाज कर देता है। जब दिल्ली मेट्रो शुरू हुई थी, तब भी इसे लेकर सवाल उठे थे। कई लोगों ने कहा था कि यह महँगा है और ज्यादा काम नहीं आएगा। शुरुआती समय में लोगों को मेट्रो स्टेशन तक पहुँचने में दिक्कत होती थी, क्योंकि फीडर बसें और ई-रिक्शा जैसी सुविधाएँ पूरी तरह विकसित नहीं थीं।

धीरे-धीरे हालात बदले। जैसे-जैसे नेटवर्क बढ़ा, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी मजबूत हुई और लोगों की निर्भरता बढ़ती गई। आज दिल्ली मेट्रो देश ही नहीं, दुनिया के सबसे सफल पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स में गिनी जाती है। साल 2025 में इसमें औसतन 64.6 लाख लोग रोज यात्रा कर रहे हैं और साल भर में यह 235 करोड़ से ज्यादा यात्राएँ पूरी करती है। यह आँकड़ा एक बड़े देश जैसे न्यूजीलैंड की पूरी आबादी से भी ज्यादा है।

अब दिल्ली मेट्रो कमाई के मामले में भी मजबूत स्थिति में है। 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, यह ₹412 करोड़ से ज्यादा का ऑपरेटिंग सरप्लस कमा रही है। इसका मतलब है कि मेट्रो सिर्फ चल ही नहीं रही, बल्कि अपने खर्च निकालकर मुनाफा भी दे रही है। यह साफ दिखाता है कि कोई भी मेट्रो सिस्टम शुरुआत में धीमा हो सकता है, लेकिन समय के साथ वह मजबूत, उपयोगी और आत्मनिर्भर बन जाता है।

मुंबई एक्वा लाइन की सच्चाई: ‘सुनसान’ नहीं, तेजी से बढ़ता इस्तेमाल

BBC ने मुंबई की नई एक्वा लाइन (मेट्रो-3) को ‘सुनसान’ बताने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। यह लाइन पूरी तरह अक्टूबर 2025 में शुरू हुई और अप्रैल 2026 तक इस पर 4 करोड़ से ज्यादा यात्री सफर कर चुके हैं। किसी भी नई मेट्रो लाइन के लिए इतने कम समय में यह बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

मुंबई की सभी मेट्रो लाइनों को मिलाकर अब रोज करीब 7.5 लाख लोग सफर कर रहे हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे लोग नई लाइन के बारे में जान रहे हैं और कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है, यात्रियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।

जहाँ तक किराए की बात है, 10 से 70 रुपए का खर्च मुंबई जैसे शहर में ज्यादा नहीं माना जाता। यहाँ लोग रोज ट्रैफिक में घंटों फँसते हैं। ऐसे में मेट्रो समय बचाती है और सफर आसान बनाती है। सरकार का काम सिर्फ आज की भीड़ संभालना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत ट्रांसपोर्ट तैयार करना भी है, ताकि सड़कों पर दबाव कम हो सके।

मेट्रो का बड़ा फायदा: सफर ही नहीं, जेब भी बचा रही है

मेट्रो का असर सिर्फ यात्रा तक सीमित नहीं है, यह लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधार रही है। जनवरी 2026 की ‘EAC-PM’ रिपोर्ट बताती है कि मेट्रो आने से लोगों का रोज का ट्रांसपोर्ट खर्च कम हुआ है। पेट्रोल, डीजल और टैक्सी पर होने वाला खर्च बच रहा है, जिससे लोगों के पास हर महीने कुछ अतिरिक्त पैसे बच रहे हैं।

इस बचत का सीधा फायदा घर के लोन (होम लोन) चुकाने में दिख रहा है। दिल्ली में मेट्रो वाले इलाकों में लोन न चुका पाने वाले लोगों की संख्या 4.42% कम हुई है। बेंगलुरु में EMI लेट करने वालों की संख्या 2.4% घटी है, जबकि हैदराबाद में समय से पहले लोन चुकाने वालों की संख्या 1.8% बढ़ी है।

सीधी भाषा में समझें तो मेट्रो लोगों की जेब में बचत डाल रही है। इससे उनका आर्थिक बोझ कम हो रहा है और जीवन आसान बन रहा है। लेकिन ऐसे बड़े फायदे अक्सर BBC जैसी कुछ रिपोर्ट्स में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

क्या मेट्रो घाटे में है?

अक्सर कहा जाता है कि मेट्रो प्रोजेक्ट घाटे का सौदा हैं। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। शुरुआत में हर मेट्रो सिस्टम ‘नेट लॉस’ दिखाता है, क्योंकि उस पर बड़े लोन और निर्माण का खर्च होता है। इसे ही डेप्रिसिएशन कहा जाता है। इसलिए सिर्फ कुल घाटा देखकर फैसला करना सही नहीं होता।

असल पैमाना होता है ‘ऑपरेटिंग सरप्लस’। यानी रोजमर्रा का खर्च निकालने के बाद क्या मेट्रो के पास पैसा बच रहा है या नहीं। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो ने 2024-25 में 1,191 करोड़ रुपए कमाए और 229 करोड़ रुपए का ऑपरेटिंग सरप्लस हासिल किया। इसका मतलब है कि मेट्रो अपना खर्च निकालकर बचत भी कर रही है।

अहमदाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में भी यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साफ है कि यह पैसा बर्बाद नहीं हुआ, बल्कि शहरों के लिए लंबी अवधि का मजबूत ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैयार हुआ है। इससे प्रदूषण कम हो रहा है और पर्यावरण को भी फायदा मिल रहा है।

BBC की रिपोर्ट पर सवाल: क्या पूरी तस्वीर दिखाई गई?

बीबीसी की रिपोर्ट को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसमें पूरी तस्वीर नहीं दिखाई गई। कुछ चुनिंदा आँकड़ों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष दिया गया, जैसे मेट्रो प्रोजेक्ट सही दिशा में नहीं हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे अलग है।

आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बन चुका है, जो 1,000 किलोमीटर से ज्यादा फैल चुका है। यह अपने आप में दिखाता है कि यह सिस्टम लगातार बढ़ रहा है और शहरों की जरूरत बनता जा रहा है। मेट्रो ने लोगों को लंबे ट्रैफिक जाम से राहत दी है और सफर को ज्यादा आसान और आरामदायक बनाया है।

लास्ट-माइल कनेक्टिविटी और फीडर बसों की दिक्कतें अभी भी कई शहरों में हैं, लेकिन इन पर तेजी से काम हो रहा है। दिल्ली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहाँ समय के साथ मेट्रो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।

साफ है कि भारत में मेट्रो सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि शहरी बदलाव का बड़ा जरिया बन रही है। यह धीरे-धीरे हर शहर की जरूरत और आदत बनती जा रही है, और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

ये राजनीति ख़ून माँगती है… जाति पूछ-पूछ कर जाति मिटाने की बातें, अगर माँ का दूध पिया है तो क्या मुसलमानों की भी जातियां पूछने की हिम्मत करेगा कोई? ध्रुवीकरण के जरिए आँकड़ों को नेता बनाएँगे हथियार: जाति जनगणना पर क्यों गलत हैं योगेंद्र ‘सलीम’ यादव

राहुल गाँधी समेत सारा विपक्ष जातिगत आधारित करने की बात कर इतिहास के उन पृष्ठों को खोलने को विवश कर रहा है, जिन पर पर्दा डाल दिया गया था। चांदनी चौक, दिल्ली, में हरदयाल लाइब्रेरी है, कौन थे हरदयाल? हरदयाल जब ICS प्रतियोगिता में शामिल हुए, तब How Britishers Rule India पर 300 शब्दों में प्रस्ताव लिखना था, जिसको हरदयाल ने केवल 3 शब्दों Divide And Rule में लिखा, उत्तीर्ण हो गए, डिग्री नहीं दी बल्कि उन्हें कहा गया कि हरदयाल हम तुम्हे कोई प्रमाण तो नहीं देंगे "but you will be known as Lala Hardayal, MA, the Kayastha", शायद यही Divide And Rule नीति सीखने के लिए भारत के स्वतंत्र होने पर जवाहर लाल नेहरू ने लार्ड मॉउन्टबेटन को 10 साल तक रखा था और वही काम कांग्रेस के साथ-साथ सारा विपक्ष कर रहा है। हिन्दुओं को विभाजित करने जातिगत जनगणना के पीछे पड़ा विपक्ष मुसलमानों की जातिगत जनगणना की बात नहीं बोलता।  
कांग्रेस पार्टी आजकल हर आलोचना का जवाब एक ही वाक्य से दे रही है – जाति जनगणना करा के रहेंगे। पार्टी न इसके फायदे गिना पा रही है, न ही ये कि इसके बिना नुकसान क्या है। लेकिन हाँ, जाति जनगणना के नाम पर राजनीति खूब हो रही है। 3000 से भी अधिक जातियों और 25,000 से भी अधिक उपजातियों वाले देश में जातिगत पहचान को और आगे किया जा रहा है, जातिगत भेदभाव को और गहरा किया जा रहा है, जाति आधारित राजनीति को फिर ज़िंदा किया जा रहा है।

योगेंद्र ‘सलीम’ यादव – कांग्रेस पार्टी ने अपने पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकारों में से एक रहे इस शख्स को आगे किया है अपने एजेंडे का बचाव करने के लिए। कारण – योगेंद्र यादव शब्दों को चबा-चबा कर बोलते हैं, अंग्रेजी में लिखते हैं और खुद को ‘सेफोलॉजिस्ट’ जैसी भारी-भरकम उपाधि से नवाज़ते हैं। उन्होंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख लिख कर समझाया है कि जाति जनगणना क्यों ज़रूरी है।

योगेंद्र यादव जी, X-Ray मशीन जाति नहीं पूछती

देखते हैं कि योगेंद्र यादव ने क्या लिखा है और क्यों उनका प्रपंच इस बार नहीं चलेगा। वो अपनी बात शुरू करते हैं एक ‘X-Ray सवाल’ से, कि किसी भी चीज के पक्ष या विपक्ष में होने की शर्त होती है कि अगर वो ज़रूरी और संभव है तो उत्तर ‘हाँ’ होता है और वो जोखिम भरा या फिर पहुँच से बाहर हो तो उत्तर ‘ना’ होता है। ठीक है, बहुत बढ़िया। अब योगेंद्र यादव ‘हाँ’ या ‘ना’ के निर्णय के लिए 5 बिंदु गिनाते हैं, और उनके ही बिंदुओं के हिसाब से पता चल जाता है कि जाति जनगणना ज़रूरी नहीं है।
चूँकि योगेंद्र यादव ने अपनी बात X-Ray से शुरू की है, इसीलिए पहले तो उन्हें ये बताना ज़रूरी है कि आज तक किसी भी X-Ray मशीन ने किसी व्यक्ति की जाति नहीं बताई उसके शरीर को स्कैन कर के। कहाँ फ्रैक्चर है ये तो बताया, शरीर के अंदर क्या समस्याएँ हैं ये भी दिखाया, लेकिन किसी की जाति नहीं बताई। दूसरी बात, एक्स-रे मशीन किसी के शरीर को स्कैन करने से पहले जाति नहीं पूछती। लैब/अस्पताल वाला पैसे लेता है, बिना जाति पूछे मशीन उसकी तस्वीर निकाल देती है।
सबसे पहले योगेंद्र यादव कहते हैं कि कोई समस्या अथवा रोग है या नहीं, इस पर निर्भर करता है कि उसका समाधान किया जाए या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में जातिगत भेदभाव रहा है, लेकिन जिन जातियों को OBC या SC/ST में डाला गया है, उनमें भी आपस में भेदभाव है। ये हम नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के होने वाले मुख्य न्यायाधीश BR गवई ने SC/ST में आरक्षण के आधार पर उपवर्गीकरण का आदेश देते हुए कहा।
उदाहरण के तौर पर, अक्सर ये कहा जाता है कि कोई ब्राह्मण किसी डोम समाज के व्यक्ति के घर में पानी नहीं पीता, लेकिन उदाहरण के लिए ये पूछा जा सकता है कि क्या OBC में शामिल यादव, निषाद, कुर्मी अथवा SC/ST में ही शामिल जाटव, मीणा या फिर पासी समाज के लोग क्या किसी मुसहर या फिर डोम समाज के घर में पानी पीते हैं? एक-दूसरे की जाति में शादी-विवाह करना तो दूर की बात है, क्या इसे भेदभाव की श्रेणी में गिना जा सकता है या नहीं?
तो हाँ, भेदभाव है और इतिहास में भी रहा है। लेकिन, क्या दमा के रोग में गठिया की दवा चलाई जा सकती है? अगर योगेंद्र यादव कहते हैं कि किस जाति के कितने लोग हैं ये गिनती कर लेने से रोग खत्म हो जाएगा या समस्या का समाधान हो जाएगा, तो या तो उनके अंदर का ‘सलीम’ कुछ ज़्यादा ही जाग उठा है या फिर ‘बुद्धिजीवी’ होने की आड़ में वो प्रपंच चला रहे। दूसरी बात, वो कहते हैं कि जाति जनगणना का मतलब सिर्फ जाति गिनने से नहीं है, बल्कि ये एक बड़ी इमारत का स्टोरहाउस है।
बहुत अच्छे! लेकिन, क्या वो भूल जाते हैं कि आज तक ऐसे जितने भी आँकड़े आए हैं उनका इस्तेमाल ग़रीबों के उत्थान के लिए कम और राजनीति के लिए अधिक हुआ है। उदाहरण के रूप में आप ‘मंडल आयोग’ को ही ले लीजिए। इसने OBC को 52% आरक्षण देने की सिफारिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से अधिक किए जाने को असंवैधानिक करार चुका है। VP सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने OBC समाज के लिए 27% आरक्षण की व्यवस्था की।
उस दौरान पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए, सैकड़ों छात्रों ने आत्मदाह कर लिया, लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और खुद VP सिंह नेपथ्य में चले गए। अगर ये फैसला उतना ही क्रांतिकारी होता, तो OBC समाज विश्वनाथ प्रताप सिंह को वैसे ही पूज रहा होता, जैसे दलित भीमराव आंबेडकर को पूजते हैं। बाद में ओबीसी में भी सुप्रीम कोर्ट को क्रीमीलेयर की व्यवस्था करनी पड़ी, अर्थात, जो अमीर हो गए उन्हें आरक्षण छोड़ने का नियम बनाना पड़ा।

OBC के नाम पे राजनीति ही हुई, समाज को क्या मिला?

OBC समाज के नेता होने के नाम पर करोड़ों रुपयों के घोटालों में लालू यादव के नाम आए, मुलायम सिंह यादव पर सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगा, और यहाँ तक कि बिहार में कुछ खास सामान्य वर्ग की जातियों को निशाना बनाते हुए ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा दिया जाने लगा। OBC आरक्षण का हुआ क्या? रोहिणी आयोग ने पाया कि OBC के लिए आरक्षित नौकरियों/एडमिशन में 97% सीटें सिर्फ एक चौथाई जातियों को गई।
और तो और, आयोग ने अध्ययन के बाद ये भी पाया कि 24.95% सीटें तो OBC की सिर्फ 10 जातियों में बँट गईं। समस्या ये है कि एक बार इस तरह के फैसले ले लिए जाते हैं तो पीछे मुड़ कर देखने, पुनः समीक्षा या परिस्थितियों के हिसाब से बदलाव का कोई मौका नहीं रहता 100 साल बाद भी। सिफारिशों के बावजूद OBC वर्ग में उपवर्गीकरण की सलाह ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है। जब ऐसा कुछ फैसला होगा, फिर योगेंद्र यादव जैसे लोग आग लगवाने के लिए बाहर निकलेँगे और लेख लिखेंगे।
इसी तरह उत्तर प्रदेश में रिटायर्ड जज राघवेंद्र कुमार के नेतृत्व वाले पैनल ने भी OBC के उपवर्गीकरण की सिफारिश की। योगेंद्र यादव कहते हैं कि जाति के अलावा अन्य चीजें भी नोट की जाएँगी, जैसे खाना गैस चूल्हे पर बनता है या मिट्टी के चूल्हे पर, बिजली-पानी की व्यवस्था है, घर की स्थिति कैसी है, इत्यादि। अगर समाजिक-आर्थिक सर्वे ही कराना है और उद्देश्य अंतिम पायदान पर खड़े लोगों का उत्थान तो फिर जाति पूछने की ज़रूरत ही नहीं। बिना जाति पूछे ही सर्वे करा कर उन तक सरकारी योजनाओं के लाभ पहुँचाए जा सकते हैं।

बिहार में जाति जनगणना से क्या पटना अब न्यूयॉर्क बन गया?

अब योगेंद्र यादव के तीसरे पॉइंट पर आते हैं, योगेंद्र यादव का कहना है कि ये इस पर निर्भर करता है कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों और उपलब्ध समय के हिसाब से व्यावहारिक होना चाहिए। बिहार में जाति जनगणना के मॉडल की वो बात करते हैं। 500 करोड़ रुपए लगा कर क्या हुआ? कुछ जातियों ने अपनी जनसंख्या छिपाने का आरोप लगाया, आपस में सोशल मीडिया में सिर-फुटव्वल हुई, हर जाति के ठेकेदारों ने इस हिसाब से खुद को तौला और शुरू हो गई नेतागिरी।
ऐसा कुछ तो नहीं है न कि जाति जनगणना करा लिए जाने के बाद से पटना में न्यूयॉर्क जैसे विकास हो गया है? उलटे सत्ता बदल गई, नीतीश कुमार ने एक बार फिर से राजद के साथ गठबंधन तोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया। जाति जनगणना अगर इतना ही सुंदर और व्यावहारिक फैसला होता तो फिर गठबंधन में दरार क्यों आ गई? इसका उद्देश्य था कि हर नेता अपनी-अपनी जाति की जनसंख्या जान ले, बस हो गया। जाति के नाम पर घृणा फैलाने वाले कुछ अन्य जातियों को गाली दे दें, हो गया।
चौथे पॉइंट में योगेंद्र यादव कहते हैं कि जातिगत जनगणना का खर्च असंभव नहीं होना चाहिए। भारत में ऐसे कार्यों के लिए किन्हें लगाया जाता है? शिक्षकों को, सरकारी कर्मचारियों को। इससे पठन–पाठन का नुकसान होता है। सभी जातियों को, क्योंकि 14 साल तक के बच्चों के लिए या 8वीं कक्षा तक के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा बिल्कुल मुफ्त है। यहाँ आरक्षण नहीं है। शिक्षक हमेशा जनगणना से लेकर चुनावी ड्यूटी तक पर लगे रहें, और योगेंद्र यादव जैसे लोग जाति जनगणना की बातें कर-कर के अपना उल्लू सीधा करते रहें, यही उद्देश्य है।
योगेंद्र यादव पाँचवें पॉइंट में कहते हैं कि प्रक्रिया जोखिम भरी नहीं होनी चाहिए और इसका नुकसान इसके लाभ से कम होने चाहिए, फिर उत्तर ‘हाँ’ होता है। ये जोखिम भरा तो है। जिस भारत में जातिवाद मिटाने की बात की जाती है, जहाँ जाति को लेकर कई भीषण संघर्ष हो चुके, वहाँ आप जातिगत पहचान को ही सबकी प्राथमिक पहचान बना दे रहे हैं, क्या ये उचित है? भारतीयता और सामाजिक पहचान गई तेल लेने, सब अपनी-अपनी जाति के आधार पर ही जाने जाएँ, है न?
इसके तहत पहले कथित सवर्णों और पिछड़ों को लड़ाया जाएगा, फिर OBC आरक्षण की सच्चाई सामने आएगी कि कुछ ही समूह सारा लाभ खा रहे हैं और फिर SC/ST को लेकर ये बात सामने आएगी कि कुछ समूह तमाम आरक्षण के बावजूद हाशिए पर पड़े ही हुए हैं, इससे आंतरिक संघर्ष और बढ़ेगा, जाति के आधार पर पहचान ऊपर आ जाएगी और बाकी चीजें नीचे चली जाएँगी तो देश गृहयुद्ध की तरफ बढ़ेगा। तो हाँ, ये खतरनाक है। नेता लोग भी चुनाव जीतने के लिए इस संघर्ष का इस्तेमाल करेंगे, खून बहने से राजनीति को आज तक अफ़सोस नहीं हुआ है।

जाति पूछने पर क्यों भड़कते हैं राहुल गाँधी?

योगेंद्र यादव तर्क देते हैं कि गाँवों-बस्तियों में सबको एक-दूसरे की जाति पता है, इसीलिए जाति पूछना बड़ी बात नहीं है। फिर संसद में राहुल गाँधी की जाति जब पूछ दी गई थी तो वो क्यों उखड़ गए थे? अखिलेश यादव क्यों उखड़ गए थे? यानी, एक नेता को विशेषाधिकार है कि वो अपनी जाति न बताए, लेकिन वही नेता चाहता है कि देश के लोग अपना नाम पीछे लें और अपनी जाति आगे करें। वाह! यही वो राजनीति है तो आपसी संघर्ष माँगती है, ख़ून माँगती है, गृहयुद्ध माँगती है।
‘Caste Identity’ को और मजबूत कर ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के पीछे और क्या उद्देश्य हो सकता है। असली मंशा तो राम मंदिर को लेकर एक हुए हिन्दुओं को बाँटना है। ‘फूट डालो और राज करो’ – शायद अंग्रेजों के ज़माने में ही कॉन्ग्रेस ने ये सीख लिया होगा। हमारी नीतियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक उत्थान की होनी चाहिए, क्योंकि इनके बिना प्रतिनिधित्व संभव नहीं है। प्रतिनिधित्व जबरन नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसके लिए पहला सक्षम बनाना आवश्यक है। ऐसा नहीं होगा तो घाटा सरकारी कामकाज का है।
वोट बैंक की राजनीति से बचना है तो बिना जाति पूछे हर परिवार का सामाजिक-आर्थिक सर्वे करवाइए। भेदभाव का मूल कारण दुनिया भर में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई है। योगेंद्र यादव जाति जनगणना के बाद इस पर आधारित फैसलों के ‘Quiet implementation’ की बात करते हैं, क्या ये लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं है? 150 करोड़ लोगों के देश में ‘चुपचाप’ सब कुछ कैसे किया जा सकता है? उस देश में, जहाँ मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं।
और हाँ, चोरी का काम तो शैतान का होता है। चोरी-छिपे कुछ करने की सलाह दी जा रही है, तो समझ लीजिए कि कोई झोल है। योगेंद्र यादव कहते हैं कि बिना X-Ray के निर्णय नहीं लिया जा सकता कि ऑपरेशन होगा या नहीं। यहाँ तो वो बिना X-Ray के सीधे अंगदान की बात कर रहे हैं, जबकि मरीज को सिर्फ बुखार ही हुआ है। जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए जागरूकता अभियान चलाइए, पिछड़े समाज को सरकारी योजनाओं के लाभ दिलाइए और उनके क्षेत्रों में विकास कार्य की गति को तेज़ कीजिए – उद्देश्य ये होना चाहिए, जाति गिन कर राजनीति करना नहीं।
एक तरफ योगेंद्र यादव ‘बाबासाहब के सपनों’ की बात करते हुए जाति मिटाने की भी बात करते हैं, दूसरी तरफ ये भी चाहते हैं कि हर कोई अपनी जातिगत पहचान आगे करे। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? योगेंद्र यादव राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकार रहे हैं। राहुल गाँधी जाति पूछने पर भड़क जाते हैं, बाकी पूरे देश की जाति जानना चाहते हैं। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? और हाँ, योगेंद्र यादव का इतिहास भी तो दागदार रहा है।
उन्होंने CAA को लेकर कैसे झूठ फैलाया था, हमें याद करना चाहिए। योगेंद्र यादव ‘इच्छाधारी’ हैं, ‘किसान आंदोलन’ के समय वो ‘किसान नेता’ बने हुए थे। NPR को लेकर उन्होंने झूठ बोला था कि इसके तहत माता-पिता के जन्मस्थान के बारे में पूछा जाएगा, जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। उन्होंने झूठ फैलाया था कि मुस्लिमों को भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा। इस कारण NPR के आँकड़े इकट्ठे कर रही कर्मचारियों पर हमले भी हुए थे, वो कर्मचारी मुस्लिम महिलाएँ ही निकली थीं।

राहुल गांधी का डीप स्टेट गठजोड़ बेनकाब! ओपन मैगजीन ने छापा आर्टिकल, सैम पित्रोदा ने किया बचाव, कहा- प्राइवेट मीटिंग के बारे में नहीं बताएंगे


कांग्रेस नेता राहुल गांधी का विदेशी ताकतों और डीप स्टेट से गठजोड़ को अब ‘ओपन’ मैगजीन ने बेनकाब किया है। सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी स्तर तक नीचे गिरने का उदाहरण पेश करने वाले राहुल गांधी ने हाल के अमेरिका दौरे के दौरान ऐसे लोगों से प्राइवेट मीटिंग की जो भारत विरोधी हैं, भारत को लगातार नीचा दिखाने में लगे रहते हैं, कश्मीर और अन्य मुद्दों के नाम पर भारत में अराजकता फैलाने की साजिश रचते हैं। ये वही लोग हैं जो भारत में लोकतंत्र खत्म होने का राग अलापते हैं और अल्पसंख्यकों के पीड़ित होने की बात करते हैं। ये वही लोग हैं जो हिंदू और हिंदुत्व के नाम पर सनातन धर्म का अपमान करते हैं। ‘ओपन’ मैगजीन ने ‘फॉरेन हैंड’ यानि विदेशी हाथ शीर्षक से प्रकाशित लेख में राहुल गांधी के अमेरिकी दौरे में विदेशी ताकतों के गठजोड़ पर से पर्दा हटाया है। इसका बचाव करने आए राहुल के करीबी सैम पित्रोदा ने इस खबर को गलत बताया है जबकि एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि कुछ प्राइवेट मीटिंग हुई थी और हमने उसके बारे में किसी को बताया नहीं और बताएंगे भी नहीं।

प्राइवेट मीटिंग के बारे में हमने किसी को नहीं बताया, बताएंगे भी नहींः सैम पित्रोदा
‘ओपन’ मैगजीन ने जब ‘फॉरेन हैंड’ यानि विदेशी हाथ शीर्षक से प्रकाशित लेख में राहुल गांधी के अमेरिकी दौरे में विदेशी ताकतों के गठजोड़ पर से पर्दा हटाया तो राहुल गांधी के करीबी सैम पित्रोदा बचाव में उतर आए कि कहा कि इस लेख में दी गई जानकारी गलत है। वहीं पित्रोदा ने एक इंटरव्यू में खुद ही स्वीकार किया था कि कुछ प्राइवेट मीटिंग हुई थी। पित्रोदा ने कहा था, ”हमने बहुत लोगों से मुलाकात की थी। सम पब्लिक सम प्राइवेट। जो प्राइवेट मीटिंग थी हमने किसी को बताया नहीं उसके बारे में और बताएंगे भी नहीं। क्योंकि वो प्राइवेट थी। पब्लिक मीटिंग्स जो थी प्रेस क्लब फिर थिंक टैंक, डिनर, एनजीओ के साथ मीटिंग। ये सब मीटिंग है, लोगों को बताया गया इसके बारे में। लेकिन थोड़ी सी मीटिंग प्राइवेट थी, जो हमने प्राइवेट ही रखी अभी तक।” सवाल उठता है कि अमेरिका में इस प्राइवेट मीटिंग का रहस्य क्या है?

कांग्रेस का कम्युनिस्ट पार्टी के बीच आखिर क्या समझौता हुआ था?
अमेरिका में राहुल गांधी ने प्राइवेट मीटिंग की और उसके बारे में किसी को कुछ जानकारी नहीं है। कुछ इसी तरह 2008 में कांग्रेस पार्टी ने चीन से गुप्त समझौता किया था जिसे आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके लिए अदालत में याचिका भी दाखिल की गई थी। वकील शशांक शेखर झा और पत्रकार सेवियो रोड्रिग्स की याचिका में बताया गया था कि 7 अगस्त 2008 को कांग्रेस ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक समझौता किया था। लोगों को यह बताया गया कि यह समझौता ‘आपसी सहयोग’ और ‘जानकारियों के लेनदेन’ के लिए किया गया है। लेकिन कभी भी समझौता पत्र को सार्वजनिक नहीं किया गया। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का शासन 2014 तक चला। इस दौरान चीन ने कई बार भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने वाली हरकतें की। लेकिन उस पर सरकार का रवैया बेहद कमजोर रहा। इसलिए राष्ट्रीय हित में इस बात की जांच की जरूरत है कि इस समय देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी और चीन में सत्ता पर पूरा नियंत्रण रखने वाली कम्युनिस्ट पार्टी के बीच आखिर क्या समझौता हुआ था? मामले में UAPA के प्रावधानों के तहत एनआईए को जांच का आदेश देना चाहिए।

राहुल के बगल में बैठी रिया चक्रवर्ती की फोटो बताती है प्राइवेट मीटिंग का सच
Open मैगजीन के लेख के अनुसार, हमारे पास अज्ञात, संदिग्ध बैठकों के अकाट्य साक्ष्य हैं। बंद कमरे में बातचीत न करने का उनका दावा तथ्यों के सामने गलत साबित होता है। अरबपति जार्ज सोरोस से जुड़े हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (एचएफएचआर) ने कैपिटल हिल कार्यक्रम के आयोजन में भाग लिया। एचएफएचआर की डायरकेक्टर रिया चक्रवर्ती को राहुल गांधी के बगल में बैठे देखा जा सकता है। यह तस्वीर साफ बताती है कि प्राइवेट मुलाकात हुई थी और सैम पित्रोदा का बचाव यहां नाकाफी लगता है।

खालिस्तानी से संबंध रखने वालों से मुलाकात क्यों?
हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की संस्थापक सुनीता विश्वनाथ के सोरोस से संबंध हैं और 2011 में घोषित खालिस्तानी आतंकवादी भजन सिंह भिंडर से उनके संबंध हैं। क्या यह चिंताजनक नहीं है, खासकर उस पार्टी के लिए जो भारतीय जनता के हित की सेवा करना चाहती है?

राहुल गांधी का जमात से जुड़े लोगों के साथ बैठक क्यों?
राहुल गांधी, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) के एडवोकेसी निदेशक अजीत साही और उनकी पत्नी सरिता पांडे के बीच एक बैठक की बात कही गई है। IAMC का आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान और सिमी से संबंध है और वह 2013 से भारत के खिलाफ लॉबिंग कर रहा है।

सार्वजनिक जीवन जी रहे राहुल गांधी को प्राइवेट मीटिंग के बारे में बताना चाहिए
इन सबूतों को देखते हुए भारतीय जनता पारदर्शिता और ईमानदारी की हकदार है और उसे प्राइवेट मीटिंग के बारे में भी जानने का हक है। यदि राहुल गांधी सार्वजनिक जीवन में हैं तो प्राइवेट मीटिंग का क्या महत्व है? सार्वजनिक हस्ती के रूप में यह राहुल का कर्तव्य है कि वह लोगों को इसके बारे में बताएं और देश को आश्वस्त करें कि उनका कार्य भारत के सर्वोत्तम हितों के अनुरूप हैं। क्योंकि लोकतंत्र विश्वास, पारदर्शिता और सच्चाई पर पनपता है। सोशल मीडिया पर भी लोग कह रहे हैं कि अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान राहुल गांधी इन भारत विरोधी लोगों के साथ क्या कर रहे थे? उसकी जांच होनी चाहिए।