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आन्दोलनजीवी योगेंद्र यादव की हो गई कम्बल कुटाई

महाराष्ट्र के अकोला में योगेन्द्र यादव के एक कार्यक्रम में जम कर लात-घूंसे चले। योगेन्द्र यादव के साथ भी धक्का-मुक्की इस दौरान की गई। हंगामा करने का आरोप वंचित बहुजन अघाड़ी के कार्यकर्ताओं पर लग रहा है। इसका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। कई लोग यह भी दावा कर रहे हैं कि इस दौरान योगेन्द्र यादव के साथ भी पिटाई हुई।

योगेंद्र की उन्ही की मीटिंग में पिटाई होना अपने आपमें बहुत कुछ बिलकुल साफ कर रहा है, फिर भी जनता अगर अपनी आंखें मूंद लेती है तो यह उसकी नादानी नहीं नासमझी होगी। यह टूलकिट के सदस्यों की दुर्दशा होने का संकेत है। यानि विदेशी भीख पर जनता के तथाकथित हितैषी बन रहे आन्दोलनजीवियों की असलियत सामने पर पार्टी में ही विद्रोह शुरू हो चूका है। यह केवल योगेंद्र यादव की पार्टी में ही नहीं बल्कि लगभग सभी पार्टियों में शुरुआत हो चुकी है। धीरे-धीरे सबकी सामने आने को है। विदेशी भीख पर CAA विरोध से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन आदि आयोजित करना खासतौर पर चुनाव से पहले या किसी विदेशी नेता के भारत दौरा करने दौरान। यानि इन टूलकिट प्रायोजित आंदोलनों का असली मकसद देश में उपद्रव कर अशांति फैलाना है।   

जानकारी के अनुसार, अकोला में योगेन्द्र यादव भारत जोड़ो कार्यक्रम के लिए पहुँचे थे। जब योगेन्द्र यादव बोलने लगे तो यहाँ VBA के कार्यकर्ता आए और यहाँ हंगामा किया। इस दौरान माइक तोड़ा गया और कुर्सियाँ भी फेंक दी गईं। बताया गया कि VBA कार्यकर्ता कॉन्ग्रेस को लेकर कुछ प्रश्न उठा रहे थे।

वायरल वीडियो में दिखता है कि योगेन्द्र यादव को लोग चारों तरफ से घेरे हुए हैं और हंगामा चल रहा हिया। इस दौरान पुलिस भी लोगों को पकड़ती दिखाई देती है, कई लोग हाथों में कुर्सियाँ लिए हुए भी दिखाई दिए हैं।

ये राजनीति ख़ून माँगती है… जाति पूछ-पूछ कर जाति मिटाने की बातें, अगर माँ का दूध पिया है तो क्या मुसलमानों की भी जातियां पूछने की हिम्मत करेगा कोई? ध्रुवीकरण के जरिए आँकड़ों को नेता बनाएँगे हथियार: जाति जनगणना पर क्यों गलत हैं योगेंद्र ‘सलीम’ यादव

राहुल गाँधी समेत सारा विपक्ष जातिगत आधारित करने की बात कर इतिहास के उन पृष्ठों को खोलने को विवश कर रहा है, जिन पर पर्दा डाल दिया गया था। चांदनी चौक, दिल्ली, में हरदयाल लाइब्रेरी है, कौन थे हरदयाल? हरदयाल जब ICS प्रतियोगिता में शामिल हुए, तब How Britishers Rule India पर 300 शब्दों में प्रस्ताव लिखना था, जिसको हरदयाल ने केवल 3 शब्दों Divide And Rule में लिखा, उत्तीर्ण हो गए, डिग्री नहीं दी बल्कि उन्हें कहा गया कि हरदयाल हम तुम्हे कोई प्रमाण तो नहीं देंगे "but you will be known as Lala Hardayal, MA, the Kayastha", शायद यही Divide And Rule नीति सीखने के लिए भारत के स्वतंत्र होने पर जवाहर लाल नेहरू ने लार्ड मॉउन्टबेटन को 10 साल तक रखा था और वही काम कांग्रेस के साथ-साथ सारा विपक्ष कर रहा है। हिन्दुओं को विभाजित करने जातिगत जनगणना के पीछे पड़ा विपक्ष मुसलमानों की जातिगत जनगणना की बात नहीं बोलता।  
कांग्रेस पार्टी आजकल हर आलोचना का जवाब एक ही वाक्य से दे रही है – जाति जनगणना करा के रहेंगे। पार्टी न इसके फायदे गिना पा रही है, न ही ये कि इसके बिना नुकसान क्या है। लेकिन हाँ, जाति जनगणना के नाम पर राजनीति खूब हो रही है। 3000 से भी अधिक जातियों और 25,000 से भी अधिक उपजातियों वाले देश में जातिगत पहचान को और आगे किया जा रहा है, जातिगत भेदभाव को और गहरा किया जा रहा है, जाति आधारित राजनीति को फिर ज़िंदा किया जा रहा है।

योगेंद्र ‘सलीम’ यादव – कांग्रेस पार्टी ने अपने पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकारों में से एक रहे इस शख्स को आगे किया है अपने एजेंडे का बचाव करने के लिए। कारण – योगेंद्र यादव शब्दों को चबा-चबा कर बोलते हैं, अंग्रेजी में लिखते हैं और खुद को ‘सेफोलॉजिस्ट’ जैसी भारी-भरकम उपाधि से नवाज़ते हैं। उन्होंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख लिख कर समझाया है कि जाति जनगणना क्यों ज़रूरी है।

योगेंद्र यादव जी, X-Ray मशीन जाति नहीं पूछती

देखते हैं कि योगेंद्र यादव ने क्या लिखा है और क्यों उनका प्रपंच इस बार नहीं चलेगा। वो अपनी बात शुरू करते हैं एक ‘X-Ray सवाल’ से, कि किसी भी चीज के पक्ष या विपक्ष में होने की शर्त होती है कि अगर वो ज़रूरी और संभव है तो उत्तर ‘हाँ’ होता है और वो जोखिम भरा या फिर पहुँच से बाहर हो तो उत्तर ‘ना’ होता है। ठीक है, बहुत बढ़िया। अब योगेंद्र यादव ‘हाँ’ या ‘ना’ के निर्णय के लिए 5 बिंदु गिनाते हैं, और उनके ही बिंदुओं के हिसाब से पता चल जाता है कि जाति जनगणना ज़रूरी नहीं है।
चूँकि योगेंद्र यादव ने अपनी बात X-Ray से शुरू की है, इसीलिए पहले तो उन्हें ये बताना ज़रूरी है कि आज तक किसी भी X-Ray मशीन ने किसी व्यक्ति की जाति नहीं बताई उसके शरीर को स्कैन कर के। कहाँ फ्रैक्चर है ये तो बताया, शरीर के अंदर क्या समस्याएँ हैं ये भी दिखाया, लेकिन किसी की जाति नहीं बताई। दूसरी बात, एक्स-रे मशीन किसी के शरीर को स्कैन करने से पहले जाति नहीं पूछती। लैब/अस्पताल वाला पैसे लेता है, बिना जाति पूछे मशीन उसकी तस्वीर निकाल देती है।
सबसे पहले योगेंद्र यादव कहते हैं कि कोई समस्या अथवा रोग है या नहीं, इस पर निर्भर करता है कि उसका समाधान किया जाए या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में जातिगत भेदभाव रहा है, लेकिन जिन जातियों को OBC या SC/ST में डाला गया है, उनमें भी आपस में भेदभाव है। ये हम नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के होने वाले मुख्य न्यायाधीश BR गवई ने SC/ST में आरक्षण के आधार पर उपवर्गीकरण का आदेश देते हुए कहा।
उदाहरण के तौर पर, अक्सर ये कहा जाता है कि कोई ब्राह्मण किसी डोम समाज के व्यक्ति के घर में पानी नहीं पीता, लेकिन उदाहरण के लिए ये पूछा जा सकता है कि क्या OBC में शामिल यादव, निषाद, कुर्मी अथवा SC/ST में ही शामिल जाटव, मीणा या फिर पासी समाज के लोग क्या किसी मुसहर या फिर डोम समाज के घर में पानी पीते हैं? एक-दूसरे की जाति में शादी-विवाह करना तो दूर की बात है, क्या इसे भेदभाव की श्रेणी में गिना जा सकता है या नहीं?
तो हाँ, भेदभाव है और इतिहास में भी रहा है। लेकिन, क्या दमा के रोग में गठिया की दवा चलाई जा सकती है? अगर योगेंद्र यादव कहते हैं कि किस जाति के कितने लोग हैं ये गिनती कर लेने से रोग खत्म हो जाएगा या समस्या का समाधान हो जाएगा, तो या तो उनके अंदर का ‘सलीम’ कुछ ज़्यादा ही जाग उठा है या फिर ‘बुद्धिजीवी’ होने की आड़ में वो प्रपंच चला रहे। दूसरी बात, वो कहते हैं कि जाति जनगणना का मतलब सिर्फ जाति गिनने से नहीं है, बल्कि ये एक बड़ी इमारत का स्टोरहाउस है।
बहुत अच्छे! लेकिन, क्या वो भूल जाते हैं कि आज तक ऐसे जितने भी आँकड़े आए हैं उनका इस्तेमाल ग़रीबों के उत्थान के लिए कम और राजनीति के लिए अधिक हुआ है। उदाहरण के रूप में आप ‘मंडल आयोग’ को ही ले लीजिए। इसने OBC को 52% आरक्षण देने की सिफारिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से अधिक किए जाने को असंवैधानिक करार चुका है। VP सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने OBC समाज के लिए 27% आरक्षण की व्यवस्था की।
उस दौरान पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए, सैकड़ों छात्रों ने आत्मदाह कर लिया, लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और खुद VP सिंह नेपथ्य में चले गए। अगर ये फैसला उतना ही क्रांतिकारी होता, तो OBC समाज विश्वनाथ प्रताप सिंह को वैसे ही पूज रहा होता, जैसे दलित भीमराव आंबेडकर को पूजते हैं। बाद में ओबीसी में भी सुप्रीम कोर्ट को क्रीमीलेयर की व्यवस्था करनी पड़ी, अर्थात, जो अमीर हो गए उन्हें आरक्षण छोड़ने का नियम बनाना पड़ा।

OBC के नाम पे राजनीति ही हुई, समाज को क्या मिला?

OBC समाज के नेता होने के नाम पर करोड़ों रुपयों के घोटालों में लालू यादव के नाम आए, मुलायम सिंह यादव पर सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगा, और यहाँ तक कि बिहार में कुछ खास सामान्य वर्ग की जातियों को निशाना बनाते हुए ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा दिया जाने लगा। OBC आरक्षण का हुआ क्या? रोहिणी आयोग ने पाया कि OBC के लिए आरक्षित नौकरियों/एडमिशन में 97% सीटें सिर्फ एक चौथाई जातियों को गई।
और तो और, आयोग ने अध्ययन के बाद ये भी पाया कि 24.95% सीटें तो OBC की सिर्फ 10 जातियों में बँट गईं। समस्या ये है कि एक बार इस तरह के फैसले ले लिए जाते हैं तो पीछे मुड़ कर देखने, पुनः समीक्षा या परिस्थितियों के हिसाब से बदलाव का कोई मौका नहीं रहता 100 साल बाद भी। सिफारिशों के बावजूद OBC वर्ग में उपवर्गीकरण की सलाह ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है। जब ऐसा कुछ फैसला होगा, फिर योगेंद्र यादव जैसे लोग आग लगवाने के लिए बाहर निकलेँगे और लेख लिखेंगे।
इसी तरह उत्तर प्रदेश में रिटायर्ड जज राघवेंद्र कुमार के नेतृत्व वाले पैनल ने भी OBC के उपवर्गीकरण की सिफारिश की। योगेंद्र यादव कहते हैं कि जाति के अलावा अन्य चीजें भी नोट की जाएँगी, जैसे खाना गैस चूल्हे पर बनता है या मिट्टी के चूल्हे पर, बिजली-पानी की व्यवस्था है, घर की स्थिति कैसी है, इत्यादि। अगर समाजिक-आर्थिक सर्वे ही कराना है और उद्देश्य अंतिम पायदान पर खड़े लोगों का उत्थान तो फिर जाति पूछने की ज़रूरत ही नहीं। बिना जाति पूछे ही सर्वे करा कर उन तक सरकारी योजनाओं के लाभ पहुँचाए जा सकते हैं।

बिहार में जाति जनगणना से क्या पटना अब न्यूयॉर्क बन गया?

अब योगेंद्र यादव के तीसरे पॉइंट पर आते हैं, योगेंद्र यादव का कहना है कि ये इस पर निर्भर करता है कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों और उपलब्ध समय के हिसाब से व्यावहारिक होना चाहिए। बिहार में जाति जनगणना के मॉडल की वो बात करते हैं। 500 करोड़ रुपए लगा कर क्या हुआ? कुछ जातियों ने अपनी जनसंख्या छिपाने का आरोप लगाया, आपस में सोशल मीडिया में सिर-फुटव्वल हुई, हर जाति के ठेकेदारों ने इस हिसाब से खुद को तौला और शुरू हो गई नेतागिरी।
ऐसा कुछ तो नहीं है न कि जाति जनगणना करा लिए जाने के बाद से पटना में न्यूयॉर्क जैसे विकास हो गया है? उलटे सत्ता बदल गई, नीतीश कुमार ने एक बार फिर से राजद के साथ गठबंधन तोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया। जाति जनगणना अगर इतना ही सुंदर और व्यावहारिक फैसला होता तो फिर गठबंधन में दरार क्यों आ गई? इसका उद्देश्य था कि हर नेता अपनी-अपनी जाति की जनसंख्या जान ले, बस हो गया। जाति के नाम पर घृणा फैलाने वाले कुछ अन्य जातियों को गाली दे दें, हो गया।
चौथे पॉइंट में योगेंद्र यादव कहते हैं कि जातिगत जनगणना का खर्च असंभव नहीं होना चाहिए। भारत में ऐसे कार्यों के लिए किन्हें लगाया जाता है? शिक्षकों को, सरकारी कर्मचारियों को। इससे पठन–पाठन का नुकसान होता है। सभी जातियों को, क्योंकि 14 साल तक के बच्चों के लिए या 8वीं कक्षा तक के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा बिल्कुल मुफ्त है। यहाँ आरक्षण नहीं है। शिक्षक हमेशा जनगणना से लेकर चुनावी ड्यूटी तक पर लगे रहें, और योगेंद्र यादव जैसे लोग जाति जनगणना की बातें कर-कर के अपना उल्लू सीधा करते रहें, यही उद्देश्य है।
योगेंद्र यादव पाँचवें पॉइंट में कहते हैं कि प्रक्रिया जोखिम भरी नहीं होनी चाहिए और इसका नुकसान इसके लाभ से कम होने चाहिए, फिर उत्तर ‘हाँ’ होता है। ये जोखिम भरा तो है। जिस भारत में जातिवाद मिटाने की बात की जाती है, जहाँ जाति को लेकर कई भीषण संघर्ष हो चुके, वहाँ आप जातिगत पहचान को ही सबकी प्राथमिक पहचान बना दे रहे हैं, क्या ये उचित है? भारतीयता और सामाजिक पहचान गई तेल लेने, सब अपनी-अपनी जाति के आधार पर ही जाने जाएँ, है न?
इसके तहत पहले कथित सवर्णों और पिछड़ों को लड़ाया जाएगा, फिर OBC आरक्षण की सच्चाई सामने आएगी कि कुछ ही समूह सारा लाभ खा रहे हैं और फिर SC/ST को लेकर ये बात सामने आएगी कि कुछ समूह तमाम आरक्षण के बावजूद हाशिए पर पड़े ही हुए हैं, इससे आंतरिक संघर्ष और बढ़ेगा, जाति के आधार पर पहचान ऊपर आ जाएगी और बाकी चीजें नीचे चली जाएँगी तो देश गृहयुद्ध की तरफ बढ़ेगा। तो हाँ, ये खतरनाक है। नेता लोग भी चुनाव जीतने के लिए इस संघर्ष का इस्तेमाल करेंगे, खून बहने से राजनीति को आज तक अफ़सोस नहीं हुआ है।

जाति पूछने पर क्यों भड़कते हैं राहुल गाँधी?

योगेंद्र यादव तर्क देते हैं कि गाँवों-बस्तियों में सबको एक-दूसरे की जाति पता है, इसीलिए जाति पूछना बड़ी बात नहीं है। फिर संसद में राहुल गाँधी की जाति जब पूछ दी गई थी तो वो क्यों उखड़ गए थे? अखिलेश यादव क्यों उखड़ गए थे? यानी, एक नेता को विशेषाधिकार है कि वो अपनी जाति न बताए, लेकिन वही नेता चाहता है कि देश के लोग अपना नाम पीछे लें और अपनी जाति आगे करें। वाह! यही वो राजनीति है तो आपसी संघर्ष माँगती है, ख़ून माँगती है, गृहयुद्ध माँगती है।
‘Caste Identity’ को और मजबूत कर ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के पीछे और क्या उद्देश्य हो सकता है। असली मंशा तो राम मंदिर को लेकर एक हुए हिन्दुओं को बाँटना है। ‘फूट डालो और राज करो’ – शायद अंग्रेजों के ज़माने में ही कॉन्ग्रेस ने ये सीख लिया होगा। हमारी नीतियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक उत्थान की होनी चाहिए, क्योंकि इनके बिना प्रतिनिधित्व संभव नहीं है। प्रतिनिधित्व जबरन नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसके लिए पहला सक्षम बनाना आवश्यक है। ऐसा नहीं होगा तो घाटा सरकारी कामकाज का है।
वोट बैंक की राजनीति से बचना है तो बिना जाति पूछे हर परिवार का सामाजिक-आर्थिक सर्वे करवाइए। भेदभाव का मूल कारण दुनिया भर में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई है। योगेंद्र यादव जाति जनगणना के बाद इस पर आधारित फैसलों के ‘Quiet implementation’ की बात करते हैं, क्या ये लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं है? 150 करोड़ लोगों के देश में ‘चुपचाप’ सब कुछ कैसे किया जा सकता है? उस देश में, जहाँ मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं।
और हाँ, चोरी का काम तो शैतान का होता है। चोरी-छिपे कुछ करने की सलाह दी जा रही है, तो समझ लीजिए कि कोई झोल है। योगेंद्र यादव कहते हैं कि बिना X-Ray के निर्णय नहीं लिया जा सकता कि ऑपरेशन होगा या नहीं। यहाँ तो वो बिना X-Ray के सीधे अंगदान की बात कर रहे हैं, जबकि मरीज को सिर्फ बुखार ही हुआ है। जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए जागरूकता अभियान चलाइए, पिछड़े समाज को सरकारी योजनाओं के लाभ दिलाइए और उनके क्षेत्रों में विकास कार्य की गति को तेज़ कीजिए – उद्देश्य ये होना चाहिए, जाति गिन कर राजनीति करना नहीं।
एक तरफ योगेंद्र यादव ‘बाबासाहब के सपनों’ की बात करते हुए जाति मिटाने की भी बात करते हैं, दूसरी तरफ ये भी चाहते हैं कि हर कोई अपनी जातिगत पहचान आगे करे। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? योगेंद्र यादव राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकार रहे हैं। राहुल गाँधी जाति पूछने पर भड़क जाते हैं, बाकी पूरे देश की जाति जानना चाहते हैं। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? और हाँ, योगेंद्र यादव का इतिहास भी तो दागदार रहा है।
उन्होंने CAA को लेकर कैसे झूठ फैलाया था, हमें याद करना चाहिए। योगेंद्र यादव ‘इच्छाधारी’ हैं, ‘किसान आंदोलन’ के समय वो ‘किसान नेता’ बने हुए थे। NPR को लेकर उन्होंने झूठ बोला था कि इसके तहत माता-पिता के जन्मस्थान के बारे में पूछा जाएगा, जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। उन्होंने झूठ फैलाया था कि मुस्लिमों को भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा। इस कारण NPR के आँकड़े इकट्ठे कर रही कर्मचारियों पर हमले भी हुए थे, वो कर्मचारी मुस्लिम महिलाएँ ही निकली थीं।

BJP के नाम पर अपने विधायकों को खुद कॉल करवा ब्लैकमेल करती है AAP : योगेंद्र यादव


दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेताओं से जुड़े भ्रष्टाचार को लेकर नित नए खुलासे हो रहे हैं। ऐसे में योगेंद्र यादव ने भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधा है। योगेंद्र यादव ने बताया कि पार्टी की आदत है वे अपने ही विधायकों को भाजपा के नाम पर फर्जी कॉल करवाकर ब्लैकमेल करती है।

योगेंद्र यादव ने अपना यह बयान आजतक द्वारा शेयर एक वीडियो पर दिया, जिसमें पूर्व AAP नेता परमजीत कात्याल बता रहे हैं कि कैसे 2013 में दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने उनसे कहा था कि वह पार्टी नेताओं को कॉल करें और उन्हें पैसों का लालच दें।

परमजीत कात्याल को वीडियो में कहते सुना जा सकता है, “साल 2011अन्ना आंदोलन से लेकर 2015 तक, लगभग हर दिन मैं अरविंद के साथ रहा। 24 घंटों में 18 घंटे उनके साथ रहा। मेरी जो वीडियो वायरल हो रही है वो 2019 की है। मनीष रायजादा, जो कि पार्टी के लिए चंदा इकट्ठा करते थे। उन्होंने ‘चंदा चोर’ नाम से डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसमें मेरा, योगेंद्र, प्रशांत, शाजिया का इंटरव्यू था, उसमें से क्लिप वायरल है।

परमजीत कात्याल ने बताया, “शुरू-शुरू में जब पार्टी की 28 सीटें आई थीं तब ये सुनने में आया कि कुछ लोग पार्टी छोड़ सकते हैं। उस समय हम भी देश बदलने की राह पर चले हुए थे। हमें भी इन छल-कपट का नहीं पता था। उस समय केवल हमें कहा गया था कि कुछ विधायक पार्टी छोड़ सकते हैं, आपको पता करना है कि ऐसा है या नहीं।“

कात्याल आगे कहते हैं, “ 28 सीट जीतने के एक दिन बाद ही शाम के करीब 5 बजे मुझको अरविंद का कॉल आया कि आप अपनी पूरी टीम के साथ दिल्ली आओ। हम गए। दिल्ली बॉर्डर से कुछ दूर पहले एक आदमी आया और हमें दो इंटरनेशनल सिम देकर गया। हमें कहा गया कि हम पता लगाएँ कि कौन बीजेपी से पैसे लेने को तैयार है। एक लिस्ट मिली और जीते हुए विधायकों को कॉल करने को कहा गया। हमने अंजाने में ये काम कर भी दिया। हमने नितिन गडकरी-अरुण जेटली के कार्यालयों का नाम ले लेकर 35-35 लाख रुपए के ऑफर उनको दिए थे।“

कात्याल बताते हैं कि उस समय अरविंद केजरीवाल ने खुद ये प्लॉन बनाया था कि अपने ही विधायकों को फेक कॉल करें।

दिलचस्प बात ये है कि कात्याल का खुलासा ऐसा है जो पार्टी की दो तरह की राजनीति की पोल पट्टी खोलता है। एक वो जो उन्होंने अपने विधायकों के साथ खेली और दूसरी वो जो उन्होंने मीडिया में ये बताकर खेली कि भाजपा उनके विधायकों को खरीदना चाहती है।

योगेंद्र यादव ने साधा अरविंद केजरीवाल पर निशाना

परमजीत कात्याल के बयान को सुनने के बाद योगेंद्र यादव ने ट्वीट में लिखा, “परमजीत ने 7 साल पहले इस घटना के बारे में मुझे जानकारी दी थी। तब मैंने पूछताछ की और पाया कि उनकी बात पूरी तरह सच है। अरविंद केजरीवाल के आदेश पर दिसंबर 2013 में अपने ही MLA को बीजेपी के नाम पर फोन करवाए गए थे। ऐसी करतूतों के कारण हम लोगों का AAP नेतृत्व से मोहभंग हुआ था।”

मनीष सिसोदिया का दावा

इन दिनों जब दिल्ली के उप मुख्यमंत्री के खिलाफ सीबीआई ताबड़तोड़ रेड मार रही है। ऐसे में मनीष सिसोदिया ने दावा किया है कि भाजपा उनको अपने साथ मिलाने के लिए ऑफर दे रही है। हालाँकि उन्होंने इससे मना कर दिया है। कुछ यूजर्स ने ऐसा दावा सुन ये भी कहा कि शायद सिसोदिया ने प्रैंक कॉल को गंभीरता से ले लिया है।

दिल्ली की सीमाओं पर बैठे लोग नहीं हैं किसान : आन्दोलनजीवी योगेंद्र यादव का खुलासा

"सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं", यानि जब कृषि कानूनों की आड़ में मोदी विरोधियों द्वारा हुए जमावड़े पर प्रश्नचिन्ह लग रहे थे, तब उन्हें मोदी का अंधभक्त कहकर सम्बोधित किया जा रहा था। जनवरी 26 को जो हंगामा किया, मोदी विरोधी मोदी सरकार को आरोपित करते रहे, अब देखिए धीरे-धीरे सच्चाई सामने आनी शुरू हो गयी है। अब समय आ गया है कि मोदी को आरोपित करने वाले इन तथाकथित किसान आन्दोलनजीवियों से पूछो कि "बताओं इस आंदोलन में असली किसान कितने हैं? और किसान का चोला ओढ़े बहरूपिये कितने?
दिल्ली में पिछले कई महीनों से चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सनसनीखेज खुलासा हुआ है। पता चला है कि दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे लोग किसान नहीं है, बल्कि किसान के भेष में विपक्षी दलों के लोग है। इसका खुलासा किसी और ने नहीं, बल्कि खुद को किसान नेता बताने वाले योगेंद्र यादव ने किया है।

दरअसल दिल्ली सिंघु बॉर्डर पर धरना देने वाले मेजर खान नाम के एक शख्स की मौत हो गई है। फर्जी किसान नेता योगेंद्र यादव ने ट्वीट कर कृषि कानूनों के विरोध में धरना देने वाले मेजर खान के निधन पर शोक जताया है। मेजर खान आंदोलन की शुरुआत से ही दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

लेकिन योगेंद्र यादव ने अपने ट्वीट में बताया है कि सिर पर पगड़ी पहनने वाले मेजर खान कोई सरदार नहीं थे, बल्कि मुसलमान थे और सबसे बड़ी बात उनके पास जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं था। मतलब साफ है कि वो किसान भी नहीं थे। योगेंद्र यादव के इस ट्वीट से स्पष्ट हो गया है कि दिल्ली की सीमाओं पर जो लोग कृषि कानून के विरोध में जाम लगाकर बैठे हैं वे किसान ही नहीं है।

जाहिर है कि पहले भी इसके सुबूत सामने आ चुके हैं कि दिल्ली की सीमाओं पर जो धरना दे रहे हैं वो किसान नहीं बल्कि बिचौलिये, आढ़तिए और विपक्षी दलों के कार्यकर्ता हैं। क्योंकि जो असली किसान होगा, वो महीनों तक अपने खेत छोड़कर कहीं आंदोलन कर ही नहीं सकता। यानि दिल्ली की सीमाओं पर जो प्रदर्शन कर रहे है, वो किसान नहीं है। और तो और जो पगड़ी पहने सरदार दिखाई दे रहे हैं वो सिख नहीं है, बल्कि मुसलमान हैं

इस सच्चाई की पुष्टि अब इस आंदोलन की अगुवाई करने वाले योगेंद्र यादव ने भी कर दी है। अब आप समझ सकते हैं कि कृषि कानून के विरोध को लेकर कितनी गरही साजिश रची गई है।

योगेंद्र यादव और माओवादी PDFI के ‘किसान नेता’ ने दी माँगें नहीं पूरी होने पर गणतंत्र दिवस को निशाना बनाने की धमकी

          योगेंद्र यादव ने PDFI के साथ दी गणतंत्र दिवस को निशाना बनाने की धमकी (साभार: Indian Express)
‘इच्छाधारी प्रदर्शनकारी’ योगेंद्र यादव ने धमकी दी है कि यदि तथाकथित ‘किसान प्रदर्शनकारियों’ की माँग पूरी नहीं की जाती है तो वे गणतंत्र दिवस को निशाना बनाएँगे। क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने भी शनिवार (जनवरी 02, 2021) को यही घोषणा की।

योगेंद्र यादव ने कहा, “अगर हमारी माँगें 26 जनवरी तक पूरी नहीं होती हैं, तो किसान दिल्ली में ‘किसान गणतंत्र परेड’ करेंगे। हम राष्ट्रीय राजधानी के निकटवर्ती क्षेत्रों के किसानों से अपील करते हैं कि वे तैयार रहें और देश के हर किसान परिवार से अनुरोध करें कि यदि संभव हो तो एक सदस्य को दिल्ली भेजें।”

किसान आंदोलन की आगे की रणनीति के बारे में बात करते हुए क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने कहा, “23 जनवरी को हम विभिन्न राज्यों में राज्यपालों के घरों की ओर मार्च निकालेंगे और अगर सरकार के साथ बैठक में कोई ठोस हल नहीं निकला तो आने वाली 26 जनवरी को दिल्ली में ‘ट्रैक्टर किसान परेड’ आयोजित की जाएगी।”

दर्शन पाल पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PDFI) के संस्थापकों में से एक हैं। बता दें कि पीडीएफआई माओवादी आंदोलन का एक घटक है, जो देश में वामपंथी आतंकवाद का संरक्षक है।

हैदराबाद में डॉ. मैरी चन्ना रेड्डी ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट द्वारा तैयार किए गए एक अध्ययन के अनुसार, पीडीएफआई माओवादियों द्वारा गठित सामरिक संयुक्त मोर्चा (टीयूएफ) का एक हिस्सा था। दर्शन पाल पीडीएफआई की 51 सदस्यीय कार्यकारी समिति के संयोजक थे।

दर्शन पाल के अलावा, PDFI के अन्य संस्थापक सदस्यों में वरवरा राव, कल्याण राव, मेधा पाटकर, नंदिता हक्सर, एसएआर गिलानी, बीडी सरमा आदि जैसे राष्ट्र-विरोधी और भाजपा-विरोधी नाम शामिल हैं।

इस बीच योगेंद्र यादव लगातार सरकार को धमकी देते रहे हैं। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वह कब किसान नेता बन गए। सरकार का कहना है कि वह किसान नहीं है और उन्हें सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच वार्ता में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई।

जनवरी 01, 2021 को ‘इच्छाधारी प्रदर्शनकारी’ ने घोषणा की कि प्रदर्शनकारियों द्वारा 6 जनवरी को कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) में एक मार्च आयोजित किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वे शीघ्र ही एक तारीख की घोषणा करेंगे जब वे शाहजहाँपुर सीमा की तरफ आगे बढ़ेंगे।