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‘हमें जिंदा रहने दो’ : चीन और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ POK में विरोध प्रदर्शन

POK विरोध प्रदर्शन
                                                                   साभार : ANI 
चीन और पाकिस्तान का बढ़ता याराना अब प्रकृति पर खतरा बन रहा है। यही कारण है कि POK के मुजफ्फराबाद में लगातार प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और खुलकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी कड़ी में सोमवार (अगस्त 24, 2020) को भी वहाँ की सड़कों पर लोगों में गुस्सा देखने को मिला।
नीलम-झेलम नदी पर विशाल बाँध निर्माण को रुकवाने के लिए ‘दरिया बचाओ, मुजफ्फराबाद बचाओ’ (सेव रिवर, सेव मुजफ्फराबाद) कमिटी के प्रदर्शनकारियों ने ‘नीलम-झेलम बहने दो , हमें जिंदा रहने दो’ जैसे नारे लगाए। इस प्रदर्शन में सैंकड़ों लोग शामिल हुए। मुजफ्फराबाद को छोड़ दें, तो POK के अन्य शहरों से भी इस प्रदर्शन में काफी लोग थे।
पाकिस्तान ने भारत के डर से चीन को POK के कुछ हिस्से दे रखे हैं और वहाँ के खनिज संसाधनों को भी चीन के हवाले कर दिया है, जो POK का जम कर दोहन तो कर ही रहा है, साथ ही वहाँ कई सारे प्रोजेक्ट्स भी चला रहा है। इससे स्थानीय लोगों मे आक्रोश का माहौल है। 
हाल में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आज़ाद पट्टन और कोहाला हाइड्रोपावर कंपनी ने निर्माण के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के हिस्से के रूप में 700.7 मेगावाट बिजली की आजाद पट्टन हाइड्रो प्रॉजेक्ट पर 6 जुलाई, 2020 को हस्ताक्षर किए गए थे।
ये 1.54 बिलियन डॉलर की परियोजनाएँ चीनी जियोझाबा कंपनी द्वारा प्रायोजित की जाएँगी और कोहारला हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट जो झेलम नदी पर बनाया जाएगा, वह पीओके के सुधनोटी जिले में आज़ाद पट्टन पुल से लगभग 7 किमी और पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 90 किमी दूर है।
कहा जा रहा है कि ये परियोजना साल 2026 तक पूरी होगी। जिसके बाद देश में बिजली सस्ती हो पाएगी। लेकिन वहाँ स्थानीय लोग इस समझौते के सख्त ख़िलाफ़ हैं। वह वहाँ पर चीनियों की उपस्थिति, बांधों के बड़े पैमाने पर निर्माण और नदियों के बहाव मोड़ने से उनके अस्तित्व पर पड़ रहे खतरे को लेकर खासा नाराज हैं।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीन और पाकिस्तान मिलकर पीओके और गिलगित बाल्टिस्टान के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रहे हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं में इसे लेकर अक्सर रोष देखने को मिलता है।
ये विरोध प्रदर्शन पहली बार देखने को नहीं मिला है। इससे पहले भी मुजफ्फराबाद की जमीन पर ऐसे विरोध हुए हैं। 6 जुलाई को ऐसा ही नजारा क्षेत्र में देखने को मिला था। दरअसल, तब भी लोगों का यही आरोप था कि चीन द्वारा बनाए जा रहे बाँधों से वहाँ के वातावरण पर भी काफ़ी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिसके कारण पर्यावरण संबंधी कई समस्याओं के खड़े होने की आशंका है। इसके बाद 13 अगस्त को एक बार फिर ऐसा ही माहौल मुजफ्फराबाद में फिर बना। तब भी लोगों ने विरोध करके अपना गुस्सा जाहिर किया था और जमकर नारेबाजी की थी।

आंदोलनों में हिंसा एवं सुरक्षा हेतु प्रभावशाली उपाय !

(सेवानिवृत्त) ब्रिगेडियर हेमंत महाजन
– (सेवानिवृत्त) ब्रिगेडियर हेमंत महाजन, पुणे (वर्ष २०१८)
ऐसा माना जा रहा है कि, नागरिकता सुधार कानून २०१९ देश की स्वतंत्रता के पश्‍चात पारित किया गया एक महत्त्वपूर्ण कानून है। प्रमुखता से पडोस के इस्लामी देशों में रह रहे अल्पसंख्यक हिन्दुओं की रक्षा के लिए यह कानून बनाया जाना, यह इस दिशा में एक मील का पत्थर प्रमाणित होता है ! ऐसे समय में कुछ विश्‍वविद्यालयों के धर्मांध छात्र, तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी, वामपंथी राजनीतिक दल, ‘टुकडे-टुकडे गैंग, शहरी नक्षलवादी आदि समूह मुसलमानों के तुष्टीकरण के एक भाग के रूप में कहिए अथवा हिन्दुओं के विरोध के रूप में कहिए; इस कानून का विरोध कर रहे हैं ! अनेक शहरों में ये लोग कानून को हाथ में लेकर आगजनी, पथराव जैसी घटनाएं करवा रहे हैं !
नागरिकता सुधार कानून के विरोध में देहली के सीलमपुर क्षेत्र में १७ दिसंबर को पुलिसकर्मियोंपर पथराव करती हुई हिंसक भीड (साभार : समाचारसंस्था रॉईटर्स)
इसी पार्श्वभूमि पर (सेवानिवृत्त) ब्रिगेडियर हेमंत महाजन ने वर्ष २०१७ में ही ऐसे हिंसक आंदोलनों को रोकने हेतु कौनसे प्रभावशाली कदम उठाने चाहिए, इसका दिशादर्शन करनेवाला लेख लिखा था, उसे हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं, जो आज की स्थिति में अत्यंत उपयुक्त है !
1. पुलिस बल को अधिक सक्षम बनाना आवश्यक 
राज्यकर्ताओं का सबसे प्रमुख कर्तव्य होता है सामान्य जनता की रक्षा करना ! उसके लिए कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस बल को अधिक सक्षम बनाने की आवश्यकता है। पिछले कुछ महिनों से महाराष्ट्र एवं संपूर्ण देशभर में ही हिंसा की घटनाएं बढी हैं। इस हिंसा में सर्वाधिक बली चढते हैं सामान्य लोग, ज्येष्ठ नागरिक, महिलाएं और छोटे बच्चे ! ये लोग हिंसा के स्थान पर फंस जाते हैं और हिंसाचारियों की मारपीट अथवा आगजनी पर बलि चढते हैं ! कामकाज के लिए बाहर निकले हुए लोगों को अकस्मात उछली हिंसा पर बलि चढना पडता है; भले वह हिंसा कोरेगांव-भीमा की हो, संभाजीनगर की हो, दूध आंदोलन हो, किसान आंदोलन हो अथवा हाल ही की मराठा आरक्षण आंदोलन में हुई हिंसा हो ! इस आंदोलन में करोडों रुपए की हानि हुई है। सरकारी संपत्ति, राज्य परिवहन विभाग की बसें, निजी वाहन और निजी संपत्ति को बडी हानि पहुंची है। सरकारी बसें निर्धन एवं सामान्य यात्रियों के लिए यातायात का महत्त्वपूर्ण साधन है। उसके कारण बसों को हानि पहुंचाने का सर्वाधिक प्रभाव सामान्य लोगों पर पडता है। उससे बस से यात्रा करनेवाले छात्रों की हानि होती है। रोजीरोटी कमानेवालों को काम नहीं मिलता और बीमार लोग चिकित्सालय पहुंच नहीं पाते। यात्रा के लिए गांव से बाहर निकले लोगों के लिए सडकें बंद हो जाती हैं। राज्य की महत्त्वपूर्ण सडकें बंद होने से अर्थव्यवस्था को बहुत बडी हानि पहुंचती है।
2. सामान्य नागरिक ही हिंसा के बलि
गुजरात में पटेल एवं पाटीदारों का आंदोलन, हरियाणा का जाट आंदोलन और राजस्थान में गुज्जरों का आंदोलन हुआ। वहां हुई हिंसा में सामान्य नागरिक मारे गए और अनेक लोग घायल हुए। इनमें सार्वजनिक संपत्ति की बहुत हानि हुई और वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई, साथ ही महंगाई बढी। हिंसक आंदोलनों को आतंकवाद ही माना जाना चाहिए। देश के किसी समुदाय के साथ अन्याय हो रहा हो, तो उस अन्याय को प्रत्युत्तर के रूप में हिंसा करना उसका उपाय नहीं है ! भारतीय कानून हिंसा का समर्थन नहीं करता। कोई समुदाय अथवा संस्था को सरकार से अपनी मांगें पूर्ण कर लेनी हो, तो उसे कानूनी चौकट में ही करनी होगी। ऐसे बंद अथवा हिंसा के कारण देश को हानि ही पहुंचती है !
3. हिंसा को दी जानेवाली अनुचित प्रसिद्धि 

चुनाव के समय हिंसा और आंदोलनों की मात्रा बढने की संभावना होती है। ऐसी हिंसा को रोक कर सामान्य लोगों की रक्षा की जानी चाहिए। पिछले कुछ समय में हुई हिंसा के लिए अनेक संस्था-संगठन और राजनीतिक दल उत्तरदायी हैं। दूरचित्रवाणी, प्रसारमाध्यम, सामाजिक जालस्थल और समाचार संस्थाएं इस प्रकार की हिंसक आंदोलनों को बिनाकारण अत्यधिक प्रसिद्धि देते हैं। एक ही दृश्य और छायाचित्र निरंतर दिखाए जाते हैं। ऐसी घटनाओं का वृत्तांकन संक्षेप में न कर उन्हें निरंतररूप से दिखा दिखा कर आग में घी डालने का काम क्यों किया जाता है ? हिंसा से संबंधित समाचारों को प्रथम पृष्ठ से निकाल कर अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित किया जाना चाहिए ! 

4.वोट की राजनीति के लिए हिंसा 
राज्यकर्ता और पुलिस बल में इस प्रकार की हिंसा का सामना करने का सामर्थ्य होना ही चाहिए ! मतों की राजनीति के लिए कौन हिंसा करवा रहा है, यह ज्ञात होते हुए भी उसे रोकने के प्रयास नहीं किए जाते। ऐसे हिंसक आंदोलनों के संदर्भ में एक लक्ष्मणरेखा होनी चाहिए। जब लक्ष्मणरेखा पार की जाती है, तब आंदोलनकारी सार्वजनिक और निजी संपत्ति को हानि पहुंचाते हैं। तब उन्हें रोकना पुलिस बल और प्रशासन इन सभी का कार्य है; परंतु मतों की राजनीति को लेकर ये सभी इस ओर आँखे मूँद लेते हैं !
5. सुरक्षा की व्यापकता
5.अ. सामान्य लोगों की सुरक्षा एवं पुलिस बल : आंदोलनकारी इकट्ठा होते हैं और तब हिंसा को नियंत्रित करने पर मर्यादाएं आती हैं। जहां हिंसा होती है, वहां पुलिस बल एवं सुरक्षा बलों की संख्या को बढाने की आवश्यकता है, उससे सडक पर आने-जानेवाले लोगों की सुरक्षा संभव होगी। वीआईपी सुरक्षा की परंपरा को न्यून कर अधिक से अधिक पुलिसकर्मियों को सामान्य लोगों की रक्षा हेतु सडक पर उतारना होगा। पुलिस बल के पास अनेक व्यवस्थापकीय कार्य होते हैं। क्या, उससे पुलिस बल को मुक्त किया जा सकता है ?, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
5.आ. पुलिसकर्मियों की संख्या बढाना आवश्यक : आज महाराष्ट्र में २.५ से ३ लाख तक निवृत्त पुलिसकर्मी हैं। उनमें से ५० से ६० सहस्र पुलिस अधिकारियों ने अपने सेवाकाल में अच्छा काम किया था और जो आज भी शारिरीक और मानसिकदृष्टि से सक्षम हैं, उन्हें कुछ अवधि के लिए पुलिस बल में क्यों नहीं लाया जा सकता ? अर्थात पुनः पुलिस बल में काम करने की उनमें इच्छा होनी चाहिए। राज्य में हॉकगार्डस् की संख्या बढा कर उन्हें कामकाज और विशेष श्रेणी का संरक्षण दिया जा सकता है। प्रशिक्षित पुलिसकर्मी सडक पर हो रही हिंसा का सामना करने के लिए उतर सकते हैं। हम सेवानिवृत्त अनुभवी पुलिसकर्मियों का उपयोग क्यों नहीं कर सकते ?
5. इ. हिंसा की दृष्टि से गुप्तचार विभाग का योगदान महत्त्वपूर्ण ! : हिंसा के संदर्भ गुप्त जानकारी मिलना महत्त्वपूर्ण है ! उसके लिए गुप्तचर विभाग की शक्ति और क्षमता को बढाने की आवश्यकता है। उसके लिए सेवानिवृत्त सक्षम अधिकारियों का पुनः एक बार उपयोग किया जा सकता है। आज जम्मू-कश्मीर, ईशान्य भारत और अन्य स्थानों पर अनेक गुप्तचर संस्थाएं काम करती हैं। उनमें गुप्तचर विभाग, ‘रिसर्च एन्ड एनॅलिसिस विंग’ अर्थात ‘रॉ’, सैन्य गुप्तचर विभाग, राजस्व, आयकर जैसे विभागों के गुप्तचर विभाग कार्यरत रहते हैं। इन सभी विभागों ने हर महिने में एकत्रित होकर गुप्त जानकारी का आदानप्रदान करना चाहिए। पुलिस अधिकारियों ने गुप्तचर संस्थाओं को जो जानकारी चाहिए, उस संदर्भ में कार्य करने को कहना चाहिए। हिंसक आंदोलन की अग्रिम जानकारी लेनी चाहिए। उसके लिए जिला और राज्यस्तर पर सभी गुप्तचर विभागों की बैठक होना आवश्यक है। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, पुलिस महानिदेशक, जिला मंत्री आदि ने ऐसी बैठकें लेनी चाहिए। ‘टेक्निकल इंटेलिजन्स’ के द्वारा संभावित दंगाईयों पर इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से दृष्टि रखना संभव है। ऐसे सभी उपायों के कारण जहां कहीं गडबडी होने की आशंका होती है, तो उसकी जानकारी पहले ही मिलेगी और उससे हिंसा को रोका जा सकेगा !
5. ई. अर्धसैनिक बल एवं सैन्य बल को नियुक्त करें ! : राज्य में सीआरपीएफ और बीएस्एफ् के प्रशिक्षण केंद्र हैं। साथ ही आवश्यकता पडने पर हमें गृहमंत्रालय की ओर से अर्धसैनिक बलों की नियुक्ति मिलेगी; इसलिए राज्य के आरक्षित राज्य पुलिस बल के साथ ही अर्धसैनिक बलों की सहायता लेकर हिंसा को तुरंत रोकना चाहिए। संपूर्ण राज्य में हिंसा की तीव्रता बढने से पुलिसकर्मियों की संख्या न्यून पडती है।
5.उ. हिंसा को अधिक भडकने की प्रतीक्षा ना करते हुए उसे नियंत्रित करने हेतु कार्रवाई करनी चाहिए ! : आज राज्य में मुंबई, पुणे, भुसावळ, संभाजीनगर, नासिक जैसे स्थानोंपर सेना के अनेक कैन्टोन्मेंट हैं। हिंसा ने उग्ररूप धारण करने पर सेना का उपयोग किया जा सकता है। कानून-व्यवस्था को बनाए रखने हेतु देश में अनेक बार सेना का उपयोग किया गया है। जाट और गुज्जर आंदोलनों के समय हरियाणा और राजस्थान में पुलिस बल हिंसा को नहीं रोक पाया, तब सेना को बुला लिया गया। इसलिए हिंसा को अधिक भडकने की प्रतीक्षा न करते हुए उसे नियंत्रित करने हेतु कार्रवाई की जानी चाहिए।
5.ऊ. आधुनिक तकनीक को उपलब्ध कराना आवश्यक ! : पुलिस बल को दंगाईयोंपर नियंत्रण प्राप्त करने हेतु आधुनिक तकनीक उपलब्ध करा देना आवश्यक है। जम्मू-कश्मीर पुलिस बल इस तकनीक का उपयोग कर रहा है। इससे पुलिस बल दंगाईयों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। इससे आंसूगैस के बिना भी पुलिस बल दंगाईयों पर नियंत्रण स्थापित कर सकेगा !
5.ए. आंदोलनकारियों में भय उत्पन्न होना आवश्यक ! : न्यायालयों ने आंदोलनकारी संगठनों को आंदोलन से हुई हानि की भरपाई कराना अनिवार्य बनाना चाहिए। ऐसा करने से भविष्य में होनेवाली हिंसा और हानि को टालने में सहायता मिलेगी। आंदोलनकारियों के विरोध में प्रविष्ट अभियोगों की सुनवाई शीघ्रगति न्यायालयों में चला कर आंदोलनकारियों को दंडित किया जाना चाहिए, जिससे उनमें कानून का भय उत्पन्न होगा। इसमें सामाजिक प्रसार माध्यम और अन्य प्रसार माध्यमों ने आंदोलन का वार्तांकन करते समय उसमें हुई हिंसा को महत्त्व न देकर वार्तांकन करना चाहिए। हिंसक आंदोलनों के लिए अनेक संस्था-संगठन आर्थिक सहायता करते हैं। उनके विरोध में भी कार्रवाई होनी चाहिए। जिस प्रकार राष्ट्रीय गुप्तचर संस्था ने हुरियत कॉन्फरन्स पर आर्थिक नाकाबंदी लगाई, उसी प्रकार इन आंदोलनकारियों पर भी आर्थिक नाकाबंदी लगानी चाहिए !
6.हिंसाचार के सन्दर्भ में स्थानीय लोगों का दायित्व 
स्थानीय नागरिकों को गुप्त जानकारी देने हेतु एक टोल फ्री दूरभाष क्रमांक उपलब्ध कराना चाहिए, जिससे सामान्य नागरिक उनके पास की जानकारी को तीव्रगति से पुलिस बल तक पहुंचा सकेंगें। ऐसी जानकारी देनेवालों के नाम गुप्त रखने चाहिए। भ्रमणभाष पर हिंसक घटनाओं का चित्रीकरण कर उसे पुलिस प्रशासन को भेजना चाहिए, जिससे हिंसक आंदोलनकारियों को पकडना सरल होगा। हिंसक आंदोलनकारी आंदोलन के लिए विविध पद्धतियां अपनाते हैं। उसके लिए सामान्य लोगों को भी पुलिस बल के कान और आंख बनना होगा; और इसी लिए हिंसक आंदोलनों को रोकने हेतु सर्वसमावेशी उपायों की आवश्यकता है !                                                                                                                                  स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक के बयानों पर भड़के अन्ना हजारे


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन के मुखिया और ज्येष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे एनसीपी पर बिफर पड़े हैं। शरद पवार की पार्टी एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवाब मलिक के बयान से नाखुश अन्ना हजारे ने मलिक के ख़िलाफ़ कानूनी कारवाई की बात कही है 
नवाब मलिक ने अन्ना हजारे पर लगाए गंभीर आरोप
अन्ना हजारे ने लोकपाल और लोकायुक्त कानून के पालन की मांग को लेकर जनवरी 30 से अपने गृहनगर रालेगणसिद्धि में अनशन शुरू किया है। अण्णा के इस आन्दोलन से जुड़ी बातों को लेकर जी मीडिया समूह के मराठी न्यूज चैनल, ‘जी24 तास’ के डिबेट शो रोखठोक में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अर्थात एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवाब मलिक ने आरोप लगाया कि अन्ना हजारे पैसे के लिए आंदोलन चलाते हैं
 
2003 में छोड़ना पड़ा था श्रम मंत्री का पद
उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा था कि इससे पहले के आंदोलन में उन्हीं से अन्ना हजारे ने वकील की फीस के बहाने पैसे उगाही की कोशिश की थी। मलिक ने अपने बयान के समर्थन में जरूरी सबूत होने का दावा भी किया। बता दें कि 2003 में नवाब मालिक को कांग्रेस-एनसीपी सरकार से बतौर श्रम मंत्री के पद से तब हटना पड़ा था जब अन्ना हजारे ने उन पर पद के दुरुपयोग का आरोप लगाया था
 
शो के दौरान समाजसेवी विश्वम्भर चौधरी ने और अण्णा के सहयोगी दिलीप अवारी ने मलिक के आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया। लेकिन, इस बात से आहत हुए अण्णा का गुस्सा जनवरी 31 को फूट पड़ा। अण्णा ने उनसे मिलने आ रहे एनसीपी के महाराष्ट्र अध्यक्ष जयंत पाटिल और विधान परिषद में नेता विपक्ष धनंजय मुंडे को आधे रास्ते से लौटा दिया। दोनों नेता अण्णा के इलाके में ही आयोजित पार्टी की परिवर्तन रैली को संबोधित करने के बाद रालेगण निकले थे कि उन्हें आधे रास्ते से ही वापस लौटना पड़ा। उधर, रालेगण में गुस्साए अन्ना हजारे ने संवाददाताओं से बातचीत में ऐलान किया की, वे नवाब मलिक की बयानबाज़ी ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा दायर करेंगे। उन्होंने खुद पर लगे आरोप ख़ारिज करते हुए कहा की, उनका दामन बेदाग है। जनवरी 31को अन्ना हजारे के अनशन आंदोलन का दूसरा दिन था 
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इस वेबसाइट का परिचय
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
अन्ना हजारे ने भूमि अधिगृहण अध्यादेश के खिलाफ देेश के किसानों को ढाल बनाकर सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी अध्यादेश फि.....

अन्ना  आप भी गांधीवादी हो और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी भी गांधीवाद की ही विरासत पर सत्तानशीं हैं, फिर झगडा किस बात का दोनों गांधीवादी एक साथ मिल जुल कर मामले को हल कर लेते लेकिन आपके आन्दोलन के पीछे जिन ताकतों का हाथ है। उन ताकतों की तरफ या तो आप देख नहीं रहे हैं या देख कर भी अनदेखी कर रहे हैं।
अन्ना जी भ्रष्टाचार तो सिर्फ बहाना है, एन.जी.ओ का मतलब ही भ्रष्टाचार है…
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश  है आपके अनशन के पीछे फोर्ड फाउण्डेशन, ब्लैक ऑथोर फाउण्डेशन सहित दुनिया के तमाम साम्राज्यवादी देशों  से सहायता  लेने वाले गैर-सरकारी संगठन (एन.जी.ओ) हैं और मीडिया अपनी खबरें बेचने का काम कर रहा है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार तो सिर्फ बहाना है। एन.जी.ओ का मतलब ही भ्रष्टाचार है और आपके पीछे अधिकांश एन.जी.ओ वाले ही हैं। देश की बहुसंख्यक जनता का लोकपाल या जन लोकपाल से कोई लेना देना नहीं है।
ngo-delhi-anna17 मार्च 2014 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ अन्ना की दिल्ली रैली फ्लाॅप हुई थी। उस रैली में भीड़ नहीं थी। कुर्सियां खाली पड़ी थी। अन्ना को जब मालूम हुआ भीड़ नही जमा हुई, अन्ना रामलीला ग्राउंड ही नही पहुंचे। क्योंकि उस रैली को किसी एनजीओ का समर्थन नहीं था।  उस रैली के बाद अन्ना की इतनी हैसियत नहीं थी, जिससे किसी आम आदमी का ऊपर  उठना संभव हो। लेकिन अब कौन सी ऐसी हिम्मत आ गयी कि अन्ना जंतर-मतर पर यह सोचकर आश्वस्त होकर फिर चल दिए कि भीड़ तो आनी ही है, आंदोलन सफल होना ही है। अगर इस बूते अन्ना धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं तो जो रैली 5 अप्रैल 2011 को हुई थी, उसको सफल करने में कौन सी ताकत प्रयत्नशील थी? इसमे सच्चाई भी है, अतिशीघ्र इसके ऊपर से पर्दा हटेगा, यदि मीडिया निष्ठा एवं ईमानदारी से प्रयत्न करें। क्योंकि यूपीए के शासन काल के यदि वो शक्तियां खुलकर सामने आती तो न अन्ना आंदोलन का साहस कर पाते और न ही भीड़ आ पाती। यानि अन्ना के ड्रामे की पोल ही खुल जाती, अन्ना का आंदोलन फ्लाॅप हो जाता, उसके पीछे किसकी ताकत थी? यह प्रश्न तब उठता है जब अन्ना द्वारा दुबारा आंदोलन की घोषणा की जाती है और कांग्रेस के महारथियों की चहल कदमी उसके पक्ष में हो जाती है। समस्त लामबंधियों के साथ कांग्रेस जुगलबंदी भी सामने आ जाती है, एक नही अनेक पहलू है, जिनकी यदि जांच की जाए तो अन्ना और उनके सहयोगी कटघरे में दिखेंगे।
अन्ना  ईमानदार एवं निष्ठावान गांधीवादी?
annaअन्ना यदि ईमानदार एवं निष्ठावान गांधीवादी है, तो राष्ट्र को बताएं कि जिस चार्टर्ड प्लान से अन्ना पुणे से दिल्ली आए, वह किस कम्पनी का था? किसने उनके आने का खर्चा किया? क्या यह सच नहीं कि उस चार्टर्ड प्लेन में अन्ना के साथ कौन बैठा था? वह व्यक्ति उन्हें क्या मंत्रणा पढ़ा रहा था? क्या यह सच नहीं कि अन्ना के उस प्रदर्शन  को सफल बनाने के लिए पलवल से भीड़ मंगवायी गयी? क्या यह सच नहीं कि इस आंदोलन को सफल बनाने मे कांग्रेसी उद्योगपति पानी की तरह पैसा नहीं बहा रहे थे ? क्या यह सच नहीं के एकता परिषद परिषद के पी. वी. राजगोपाल अन्ना के किसान आंदोलन से अलग हो गए हैं? केरल से गांधीवादी कार्यकर्ता गांधी शांति प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष एवं एकता परिषद के प्रमुख राजगोपाल ने 2011 में ही कहा था कि अन्ना टीम के निर्णयों के उन्हें नहीं पूछा जाता।
आज अमेरिका दिवालियेपन की ओर  बढ़ रहा है, फ्रांस ऋण ग्रस्त हो रहा है, भारत पूंजीवादी विकास के पथ पर एक शक्तिशाली आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। साम्राज्यवादी शक्तियां उस पूंजीवादी आर्थिक विकास को रोकने के लिये हर तरह के हथकंडे अपना रही हैं जिसका एक औजार आप भी बन गए हैं। साम्राज्यवादियों के आका अमेरिका को अब लोकतंत्र याद आने लगा है।
भारतीय दौरे पर आए अमेरिकी सीनेटर जॉन मैक्‍केन ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि भारत में इस समय हर ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। देश के लोकतंत्र के लिए यह चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि देश में लोकतंत्र के लिए यह शुभ  संकेत नहीं है।  उन्होंने कहा कि उनके होटल के सामने हजारों लोग भ्रष्टाचार के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। अन्ना  हजारे की गिरफ्तारी पर अमेरिका की तरफ से यह बयान आया था कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और वहां किसी को अनशन करने की इजाजत मिलने में रुकावट नहीं आनी चाहिए।
क्या अमेरिका बताएगा कि किसको अनशन करने की इजाजत होगी किसको नहीं?
क्या अब अमेरिका बताएगा कि किसको अनशन करने की इजाजत होगी किसको नहीं। ईराक से लेकर अफगानिस्तान तक लोकतंत्र का ठेका अमेरिका ने ले रखा है और इन देशों की दशा और दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। लीबिया में नाटो सेनाएं लोकतंत्र के लिये बम्बार्ड कर रही हैं। अधिकांश एशियाई व अफ्रीकी देश  अमेरिकन साम्राज्यवादियों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से गुलाम हैं। आप अनशन अवश्य करिए सिर्फ 21 दिन का नहीं 121 दिन का कर दीजिये, तो भी इस देश की मेहनतकश जनता का आपको समर्थन नहीं मिलने वाला है और न समर्थन। सिर्फ हिन्दुत्ववादी शक्तियों का आपको समर्थन प्राप्त है जो बेनकाब हो चुकी हैं और आप का लोकपाल बिल भारतीय संविधान की मूल भावना के विपरीत है। आपकी ज़िद है, ज़िद का राजनीति में कोई स्थान नहीं है अगर अमेरिकन इशारे पर यह तय होने लगेगा कि लोकतंत्र है या नहीं तो देश नहीं चलेगा। भारत अमेरिकन साम्राज्यवाद से टक्कर लेने में असमर्थ नहीं है न इस देश की जनता। लेकिन जब बात देश की आन, बान और मर्यादा की होगी तो भारत पीछे भी नहीं रहेगा।
अमेरिका को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि यदि उसने अपने एजेंटों के माध्यम से देश में गड़बड़ी करने की कोशिश की तो दुनिया के नक़्शे पर अमेरिकन साम्राज्यवाद का नामोनिशान भी मिटने में देरी नहीं होगी। यदि अन्ना को वर्तमान गांधी के नाम से सम्बोधित किया जाता है, तो यह सबसे बड़ी भूल होगी। एक आरटीआई को अपवाद को छोड़ उनका कौन सा आंदोलन सफल हुआ ?जनता से बाबा रामदेव आन्दोलन से जनता में प्रज्जवलित हो रही घोटालों एवं विदेशों में जमा काले धन ज्वाला से ध्यान परिवर्तित करने में कांग्रेस के हाथ एक कठपुतली बन एनजीओज की पीठ पर बैठ सुरमा भोपाली बनने का नाटक किया। अन्ना जी अगर साहस है तो एनजीओज को मिल रही विदेशी सहायता के विरुद्ध अनशन करो। क्योंकि  एनजीओज ही भ्रष्टाचार की जननी है।