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भारतीय इतिहास : IPS अधिकारी नागेश्वर राव द्वारा आईना दिखाए जाने पर कम्युनिस्ट वृंदा करात का छलका दर्द

Nageshwar Rao takes charge of CBI, reverses all transfers ordered ...भाजपा ने 'दुष्कर्मी रक्षकों' की टोली ...
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कम्युनिस्ट नेता वृंदा करात ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख आईपीएस अधिकारी एम नागेश्वर राव पर कार्रवाई की मॉंग की है। उन्होंने दिल्ली पुलिस से भी शिकायत की है। राव ने पिछले दिनों भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के अब्राहमीकरण (इस्लाम और ईसाइयत का प्रभुत्व) और मुस्लिम शासकों के खूनी इतिहास को मिटाने के संदर्भ में ट्वीट किया था।
केंद्रीय गृह मंत्री को लिखे पत्र में करात ने आरोप लगाया है कि राव ने सर्विस नियमों का उल्लंघन किया है। उनकी टिप्पणियाँ संविधान के खिलाफ हैं और ‘सांप्रदायिक भावनाओं को उकसाती हैं।
करात ने राव के ट्वीट को अल्पसंख्यकों पर हमला बताते हुए कहा है कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को सॅंभाला था, लेकिन उन पर हिन्दुत्ववादी विद्वानों को दरकिनार करने का आरोप राव ने मढ़ दिया।
उन्होंने कहा है कि मौलाना आजाद के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर राव दो समुदायों के बीच द्वेष को उकसा रहे हैं। साथ ही उन्होंने राव को विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित भी बताया है।
अयोध्या में बाबरी मस्जिद नहीं, राम ...श्रीमति करात को सच्चाई उजागर होने पर नागेश्वर राव, आईपीएस अधिकारी, के ट्वीट से क्यों भड़क रहीं हैं? उन्होंने शायद के के मोहम्मद, रिटायर्ड पुरातत्व निदेशक, द्वारा लिखित पुस्तक को नहीं देखा। जिसमें उन्होंने लिखा है कि "कांग्रेस और वामपंथियों ने रामजन्मभूमि का विवाद हल नहीं होने दिया। खुदाई में मंदिर के अनेक अवशेषों को छुपा, केवल एक खम्बा दिखाकर कोर्ट में झूठ बोला।" दूसरे, 2013 में हिन्दी पाक्षिक का संपादन करते अपने स्तम्भ में इन मुद्दों को उठाया था, तब यूपीए की सरकार थी।      
भारतीय इतिहास से भयंकर छेड़छाड़ का आरोप तो वर्षों से उजागर किये जाने का प्रयत्न किया जा रहा है, लेकिन छद्दम इतिहासकारों और छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा उन्हें साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और शांति के दुश्मन आदि आरोपों से सम्मानित करते रहे। आखिर भारतीयों को किस कारण उनके वास्तविक इतिहास से अज्ञान रखा गया? भारत के गौरवमयी इतिहास को धूमिल करने का अपराध करने का अधिकार किसने दिया था और क्यों? कार्यवाही नागेश्वर पर नहीं इतिहास से छेड़छाड़ करने वालों के विरुद्ध होनी चाहिए। मोदी सरकार को युद्ध-स्तर पर इस गंभीर मुद्दे पर काम करे और सच्चाई सामने आने पर सभी इतिहासकारों को ब्लैकलिस्ट किया जाए। यह किसी पार्टी या मजहब की बात नहीं, देश के सम्मान का है।  
कम्युनिस्ट नेता ने यह भी आरोप लगाया कि राव 31 जुलाई को रिटायर हो रहे है। उन्होंने यह विवादित टिप्पणी इसलिए कि ताकि वे आसानी से बीजेपी और आरएसएस में शामिल हो सके। उन्होंने कहा कि राव ने सेवा में रहते हुए यह ट्वीट किया है जो आईपीएस के नियमों के उल्लंघन है। राव के खिलाफ आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा भी चलाया जाना चाहिए।
करात ने इस संबंध में दिल्ली पुलिस को भी पत्र लिख कर राव के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए और 295 ए के तहत प्राथमिकी दर्ज करने को कहा। दिल्ली पुलिस आयुक्त, डीसीपी, और मंडी मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ को संबोधित पत्र में कहा गया है, “राव समुदायों के बीच दुश्मनी और मुसलमानों के खिलाफ नफरत की भावनाएं को भड़काने का काम कर रहे है।”
कुछ दिनों पहले IPS अधिकारी एम नागेश्वर राव ने वामपंथियों द्वारा भारतीय इतिहास से किए गए छेड़छाड़ के संबंध में ट्वीट किया था। जिसमें उन्होंने शिक्षा मंत्री रह चुके मौलाना अबुल कलाम आजाद के खिलाफ इस्लामिक आक्रांताओं और मुस्लिम शासकों के खूनी इतिहास को छिपाने और उनका महिमामंडन करने का आरोप लगाया था।
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राव ने बताया था कि भारत के इतिहास को बड़ी सफाई से ‘विकृत’ किया गया। ऐसा करने वाले को शिक्षा मंत्री का नाम दिया गया। शिक्षा मंत्री रहते हुए मुस्लिम नेता 1947-1977 के बीच 20 साल भारतीय मन-मस्तिष्क के प्रभारी बने बैठे थे।
एम नागेश्वर राव ने ट्वीट किया था कि, “मौलाना अबुल कलाम आजाद के 11 साल (1947-58) के बाद, हुमायूँ कबीर, एमसी छागला और फकरुद्दीन अली अहमद- 4 साल (1963-67), फिर नुरुल हसन- 5 साल (1972-77)। शेष 10 साल अन्य वामपंथी जैसे वीकेआरवी राव… ने ये जिम्मेदारी सँभाली।”
उन्होंने आगे कहा कि इसके अलावा बाकी के 10 साल वीकेआरवी राव जैसे ‘वामपंथियों’ ने भारतीयों के दिमाग पर राज किया
वीकेआरवी राव तमिलनाडु के एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
राव दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बने, योजना आयोग के सदस्य रहें और 1969 से 1971 के बीच शिक्षा मंत्री बने थे
नागेश्वर राव ने कुछ दिन पूर्व ट्वीट कर कहा, ‘ये लोग हिंदू सभ्यता को नीचा दिखाने, हिंदू धर्म को गाली देने इत्यादि के लिए जिम्मेदार हैं उन्होंने कहा कि इन लोगों ने इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया और खूनी इस्लामिक शासन को नकारा और लीपापोती कर दी
सीपीएम नेता ने कहा कि हर एक अधिकारी संविधान को मानने और उसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी से बंधा हुआ होता है लेकिन राव ने ट्विटर पर सार्वजनिक टिप्पणी कर संविधान की भावना के खिलाफ बोला है और राजनीतिक रूप से प्रेरित बेहद भड़काऊ बातों को लिखा है
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इस पाक्षिक को सम्पादित करते अपने बहुचर्चित स्तम्भ में यूपीए सरकार के कार्यकाल में लाल किले पर उठाया प्रश्न था जिस....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ सर्वविदित हैं। वामपंथियों ने बड़ी सफाई से इस्लामिक आक्रा.....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राम मंदिर भूमि पूजन को लेकर फिर ज़हर उगला है। हैद.....
उन्होंने कहा, ‘यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने सेवा नियमों का उल्लंघन किया है या सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काया है जब वह नब्बे के दशक के अंत में ओडिशा के बरहामपुर विकास प्राधिकरण में सेवारत अधिकारी थे, उन्होंने कुछ इसी तरह के जहरीले सांप्रदायिक बयान दिए थे दो आधिकारिक की पूछताछ में उन्हें दोषी पाया गाया और उन्हें दोषी ठहराया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई इस तरह वे बुरे रिकॉर्ड के साथ आदतन अपमान करने वाले व्यक्ति हैं

ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है बौद्धस्थल जामा मस्जिद

चंपानेर जामा मस्जिद
कांग्रेस और वामपंथी जोड़ी ने तुष्टिकरण को सर्वोपरि मान भारत के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर इस्लामिक आक्रांताओं को महान बताया गया। जब कभी कोई देश के वास्तविक इतिहास की बात करता कांग्रेस और इसके समर्थक दल उसे फिरकापरस्त, साम्प्रदायिक, गंगा-जमुना तहजीब का दुश्मन आदि नामों से बदनाम किया जाता था। इतना ही नहीं, जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर के पक्ष में फैसला देना छद्दम धर्म-निरपेक्षों को रास नहीं आया। 
जब दिसम्बर 6, 1992 को विवादित ढांचा ध्वस्त होने पर कोर्ट के आदेश पर हुई खुदाई में मिले मदिरों के सबूतों को छुपा, केवल एक खम्बा कोर्ट को दिखाया गया। जिसका उल्लेख डॉ के.के.मोहम्मद, तत्कालीन पुरातत्व निदेशक, जिनके उपस्थिति में मंदिर के प्रमाण मिले थे, ने सेवानिर्वित होने उपरांत लिखित पुस्तक में इसका उल्लेख भी किया है। 
यह भारत देश का दुर्भाग्य है कि जनता अपने ही वास्तविक इतिहास से अज्ञान है। मुग़ल आक्रांता जिन्होंने हिन्दुओं के मंदिरों को लूटा, उनकी जगह मस्जिदें और दरगाहें बनायीं, उन्हें महान बताकर देश के इतिहास का मजाक बना दिया।      
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण समतलीकरण और खुदाई के दौरान काफी संख्या में पुरावशेष, देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश, आमलक दोरजाम्ब आदि कलाकृतियां निकली हैं। इन अवशेषों के मिलने से जहां हिंदू समुदाय के लोगों ने खुशी जताई वहीं कुछ लोग इन अवशेषों को बौद्ध धर्म से जोड़ते हुए दावा कर रहे हैं कि जो अवशेष मिले हैं वह सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान की है। दिलीप मंडल ने ट्विटर पर इसे राजनीतिक और धार्मिक रंग देने की कोशिश की। इसके बाद लोगों ने ट्विटर पर उनकी क्लास लगा दी। लोगों ने यह कहकर उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया कि चंपानेर का जामा मस्जिद बौद्ध मंदिर है आप उनके लिए अभियान चलाइए हम आपके साथ हैं। इसके साथ ही ट्विटर पर यह ट्रेंड करने लगा कि चंपोनेर का जामा मस्जिद बौद्ध स्थल है। अब माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर हैशटैग #बौद्धस्थल_जामा_मस्जिद टॉप ट्रेंड कर रहा है।



अयोध्या
स्मृतियों को सहेजने की जरूरत ताकि दुनिया भूल न सके हिन्दुओं का दमन
अयोध्या की पुण्यभूमि की खुदाई शुरू हो गई है। भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए इसे तैयार किया जा रहा है। 500 सालों तक ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ में दफन रहने वाला भारत का वास्तविक इतिहास प्रस्फुटित होने लगा है।
आजादी के 70 साल बाद तक वामपंथी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के ताकतवर गठजोड़ ने इन आवाजों को दबाने की कोशिश की। लेकिन वे असफल रहे। न्याय और सत्य में विश्वास रखने वाले सभी लोगों के लिए यह विजय का क्षण है।
हालाँकि यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ यह जीत पूरी नहीं हुई है। अयोध्या में महज भव्य राम मंदिर का निर्माण ही वास्तविक जीत नहीं है।
वास्तविक जीत वह है, जब भारत के दबे-कुचले हिन्दू पीढ़ियों की व्यथा को इतिहास के पन्नों में दर्ज किया जाएगा। इसके लिए इससे जुड़े साक्ष्यों को संरक्षित और सुरक्षित रखे जाने की आवश्यकता है, जिससे इसे पूरी दुनिया देख सके और याद रख सके।
खुदाई के दौरान राम जन्मभूमि स्थल से मिले मंदिर के
अवशेष और मूर्तियाँ
वामपंथी इतिहासकारों की लॉबी 70 साल बाद भले ही बिखर गई हो, लेकिन अभी खत्म नहीं हुई है। दरअसल वामपंथी इतिहासकारों की बहुत बड़ी साजिश थी, जिसके तहत सैकड़ों वर्षों तक हिन्दुओं पर किए गए अत्याचारों को इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया। यह साजिश आज भी लगातार चल रही है।
यही कारण है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तथ्यों के बजाय भावनाओं पर निर्णय लेने का आरोप लगाते हैं। इतना ही नहीं ये लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भाजपा की राजनीतिक सफलता और ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ के एजेंडे से जोड़ने के साथ अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
वामपंथी इतिहासकार चाहते हैं कि दुनिया को यह लगे कि हिन्दुओं पर अत्याचार कभी हुआ ही नहीं। हम यहूदी लोगों से सीख सकते हैं कि इस तरह के प्रोपेगेंडा को कैसे धराशायी किया जाए।
इसी तरह के अत्याचार झेलने वाली यहूदी लोगों की पीढ़ी ने दो संकल्प लिए। पहला, उन्हें एक महान यहूदी राष्ट्र बनाना है। दूसरा, दुनिया यह कभी नहीं भूले कि उनके साथ क्या हुआ था।
अपने साथ हुए अत्याचारों से संबंधित साक्ष्यों को इकट्ठा करना, उनका दस्तावेजीकरण कर उन्हें सहेजना सुनिश्चित किया। अत्याचारों की निशानियों से संबंधित संग्रहालय पूरे यूरोप के अंदर खोले गए। इनमें स्कूली बच्चों को ले जाया जाता, जिससे वे खुद जान सकें कि अतीत में उनके साथ क्या हुआ था। यहूदी लोगों के खिलाफ हुए भीषण अत्याचारों की गाथाएँ मानवता की अंतरात्मा को चुभती रहे।
उनका मानना था कि अत्याचारों की हकीकत आखिर में लोगों के सामने आएगी। सार्वजनिक स्मृतियाँ कभी भी विशेष रूप से अच्छी नहीं होती। समय के साथ नैरेटिव के युद्ध में वास्तविक इतिहास के खो जाने का भी खतरा है। इसके लिए आपको जनता के सामने वास्तविक इतिहास रखना होगा।
भारत में हम हिन्दुओं के सामने भी इसी प्रकार का खतरा है। वामपंथियों की एक लॉबी इस देश में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों से संबंधित सभी ऐतिहासिक दस्तावेजों को नकारने में लगातार लगी हुई है। वे हमारे ऊपर कथित गंगा-जमुनी तहज़ीब थोपते का प्रयास करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं। वे नहीं चाहते कि अयोध्या में जमीन की खुदाई हो और हकीकत सामने आए।
ऐतिहासिक साक्ष्य हर जगह है। लेकिन वे हमें इसके बारे में बात नहीं करने देंगे और इसके लिए सही शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
यदि साक्ष्य जमीन के अंदर मिलते हैं तो वे कहेंगे कि मंदिर की जगह इस स्थान पर मंदिर होने की कहानियाँ महज किंवदंतियाँ हैं। अगर किसी दस्तावजों में साफ तौर पर लिखा हुआ मिलता है कि एक मंदिर को नष्ट किया गया था, तो वे कहते हैं कि वास्तविक उद्देश्य लूट था न कि किसी धर्म को थोपना। यदि दस्तावेज कहते हैं कि उनका उद्देश्य मूर्ति पूजा करने वालों को कुचलना था, तो वे पूछते हैं कि उन हिन्दुओं के बारे में क्या कहोगे जिन्हें उस समय अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया गया था?
यदि आप वास्तव में पुराने मंदिर के अवशेषों को देखते हैं, तो वे कहेंगे कि यह इंडो-इस्लामिक वास्तुकला की एक अनूठी शैली है, जो गंगा-जमुनी तहज़ीब का हिस्सा है! तो सवाल उठता है कि हम इस प्रोपेगेंडा को कैसे धराशायी कर सकते हैं?
हमें बिल्कुल वही करना है जो यहूदियों ने खुद पर हुए अत्याचारों को लेकर किया था। हमें साक्ष्यों को एकत्रित करना, दस्तावेजीकरण करना और उन्हें संरक्षित करना शुरू करना होगा। हमें अयोध्या में राम मंदिर के साथ ही एक संग्रहालय स्थापित करना होगा, जहाँ दुनिया उन साक्ष्यों को देख सके, जो आज तक लोगों के सामने आए ही नहीं।
इसके बाद हमें इसे वैश्विक स्तर पर लाना होगा। हमें हिन्दुओं के साथ हुए अत्याचारों के बारे में लोगों को बताने के लिए संग्रहालय बनाने, प्रदर्शनियाँ लगाने और स्कूली बच्चों के भ्रमण की शुरुआत करने की आवश्यता है। हमें यह याद रखने के लिए एक वैश्विक दिवस की आवश्यकता है कि हिन्दुओं को अपनी ही भूमि पर क्या-क्या झेलना पड़ा।
आज भी जर्मनी में ऐसे रेल कोच हैं जो एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं और लोगों को याद दिलाते हैं कि उनके साथ क्या अत्याचार हुए थे। दुनिया यह कभी नहीं भूलती, क्योंकि यहूदी लोगों ने ये सुनिश्चित किया कि इसे लोग भूल नहीं पाए।
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मृणाल पांडेय ने फैलाया झूठ अयोध्या में राम मंदिर निर्माण शुरू होने के साथ ही वामपंथियों का गिरोह भी सक्रिय हो गया .....
भारत में हिन्दुओं ने इस तरह की समस्याओं को झेला। मैं कहता हूँ कि अधिकांश हिन्दू यह भूल गए हैं। पहले हमें हिन्दुओं को बताना पड़ेगा कि उनके पूर्वजों ने क्या झेला। फिर हमें यह पूरी दुनिया को बताना होगा।